अनुच्छेद

291. मंत्रों की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे सनातन धर्म में मंत्रों की महत्ता सार्वभौमिक है। जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य, उत्सव, पूजा-पाठ और हवन आदि मंत्रोच्चारण के बिना पूर्ण नहीं होते। यह भी सच है कि आज के भाग दौड़ भरे युग में देश, काल व परिस्थितियों के कारण विशुद्ध मंत्रोच्चारण के कारण संपूर्ण विधि- विधान में विकृति उत्पन्न होती चली गई। मंत्रों का उच्चारण मात्र औपचारिकता पूर्ति के रूप में किया जाने लगा है।

धार्मिक संगठन, दीपक, धूप, धूनी, अगरबत्ती आदि के रूप में इस परंपरा को बनाए हुए हैं। क्रिया कांडों का क्या प्रयोजन है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर उनके पास नहीं है? ऐसे प्रश्न किए जाने पर सभी के उत्तर में यही भाव निकलते हैं कि वे यह कार्य सुख, शांति, स्वास्थ्य, शक्ति, धन, वैभव को प्राप्त करने तथा प्राकृतिक प्रकोपों, रोगों, भयों व अनिच्छित घटनाओं को रोकने के लिए करते हैं।

यद्यपि हमारे सनातन धर्म में हर समस्या से निपटने के लिए मंत्रोच्चारण का विधान है। किंतु मंत्रों पर विश्वास न रखने वाली आज की नई पीढ़ी जो केवल विज्ञान, तर्क, युक्ति तथा प्रत्यक्ष प्रमाणों पर ही विश्वास रखती है, उनके लिए मंत्रों की कोई महत्ता नहीं है। ऐसे में वर्तमान मान्यताओं के बीच अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा-सा समय निकालकर सच्चे हृदय से पूजा-अर्चना, मंत्रोच्चारण आदि के महत्व के बारे में जानने का प्रयास भी आवश्यक है।

वास्तव में मंत्रों की कोई महत्ता नहीं है, यह मात्र कल्पना है, ऐसा कहने वालों की भी कमी नहीं है।मंत्रोच्चार करना, उपासना, ध्यान, पूजा, स्तुति के लिए समय लगाना, धन लगाना, शक्ति लगाना व्यर्थ है। इन काल्पनिक निराधार मान्यताओं में कुछ भी नहीं रखा है, जीवन बहुत छोटा है, समय बहुत कम है और काम बहुत अधिक है। अतः कुछ करने कराने की बात करनी चाहिए। इन व्यर्थ की बातों में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। इस प्रकार की सोच रखने के कारण वर्तमान की नई पीढ़ी में मंत्रों की महिमा केवल आडंबर बनकर रह गई है।

इसी कारण सबसे दूखद बात तो यही है कि मान्यताएं केवल धार्मिक गतिविधियों को संपन्न कराने तक ही सीमित हो चुकी हैं और तो और पूजा- अर्चना, मंत्र, हवन का भी व्यापार- सा ही होने लगा है। लोग धर्म के ठेकेदारों के चंगुल में फंसने लगे हैं।

मंत्रों का गूढ़ रहस्य—

वास्तव में हमें मंत्रों के गूढ रहस्य को समझना होगा। मंत्रों में ऐसी शक्तियां होती हैं, जिनके सही उच्चारण एवम् श्रवण से सकारात्मक तरंगों का उद्दीपन होने लगता है। हमारे ऋषियों ने ग्रंथों, उपनिषदों के माध्यम से अनेक श्लोकों का निर्माण किया है। जिसमें उन्होंने छोटे- छोटे श्लोकों के माध्यम से मंत्रों का बीज रोपित किया है। उन मंत्रों के अंदर ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव का वर्णन निहित है।
ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना के लिए जिन मंत्रों का चयन ऋषियों ने किया है, उन मंत्रों में ईश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए? क्या-क्या मांगना चाहिए? हमें क्या- क्या अपेक्षा है? वो सारी बातें उन मंत्रों में निहित हैं। शरीर के विषय में, मन के विषय में, आत्मा के विषय में जो- जो हमारी अपेक्षाएं हैं, हमें क्या चाहिए? ईश्वर हमें क्या दे सकता है? ये सारी बातें इन मंत्रों में सूत्र रूप में बतायी गयी हैं। ईश्वर कैसा है? उसका गुण, कर्म, स्वभाव कैसा है? हम कैसे ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं? ईश्वर की उपासना करने से क्या लाभ होता है? क्या महत्व है? उपयोगिता क्या है? ईश्वर की उपासना से क्या हमारी प्रयोजन सिद्धि होती है? ये सारी बातें जितनी सूक्ष्मता से, सरलता से, संक्षेप में इन मंत्रों में बताई गई हैं, उतनी और अन्य मंत्रों से नहीं मिलती।

हम किसी भी सामान्य शब्द से ईश्वर की प्रार्थना- उपासना कर सकते हैं। मंत्र ईश्वर भक्ति का एक माध्यम हैं। परंतु एक शर्त है मंत्रों में, श्लोकों में, वाक्यों में, शब्दों में, ईश्वर के गुण- कर्म- स्वभाव का वर्णन होना चाहिए। कोई भी मंत्र, कोई भी वाक्य, कोई भी सूत्र, कोई भी श्लोक, ईश्वर कैसा है? किस प्रकार के गुण वाला है? किस प्रकार के कर्मों को करता है? किस प्रकार के स्वभाव वाला है? आदि विषयों को यदि बताता है, तो उस मंत्र, सूत्र, श्लोक, वाक्य, शब्द से हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करके अपना कार्य सिद्ध कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को मंत्रों के माध्यम से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करनी चाहिए। क्योंकि ऋषियों ने युगों- युगों तक तप, साधना और ध्यान क्रिया करके अपने लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए इन मंत्रों का सर्जन किया। उन्होंने मंत्रों में अपनी आत्मिक शक्ति को रोपित करके उसे जीवंत रूप प्रदान किया।

जैसे हम ‘ओउ्म्’ शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमें यह बोध होता है कि— समस्त प्राकृतिक पदार्थों का आदि मूल ईश्वर है अर्थात् हमारे पास जो भी धन, बल, विद्या, सामर्थ्य आदि पदार्थ हैं, उन सब का उत्पादक, रक्षक, धारक, स्वामी, ईश्वर है, हम नहीं। वेद पुराणों का ज्ञान यह अवश्य बताता है कि मंत्र साधना सभी अन्य साधनाओं से उत्तम है। मंत्र विद्या रहस्यपूर्ण तो अवश्य है, फिर भी आंतरिक इच्छा से श्रद्धा एवम् विधिपूर्वक की गई पूजा, अर्चना समय आने पर सुखद परिणाम अवश्य देती है। श्रद्धारहित मंत्र जाप करने का कोई अर्थ नहीं है।

मनुष्य को जाप के लिए कोई नियम का बंधन नहीं है। ईश्वर की उपासना के लिए स्थान कोई विशेष महत्व नहीं रखता। मन की एकाग्रता, ईश्वर के प्रति समर्पण, प्रेम, श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा, रूचि आदि का विशेष महत्व है। हां इतना अवश्य होना चाहिए कि स्थान शांत हो, एकांत हो, रमणीय हो, स्वच्छ हो और कोलाहल से रहित हो, तो वहां पर अपेक्षाकृत बाधा कम होने के कारण हमारा ध्यान अच्छा लगेगा और हम मंत्रों का शुद्ध उच्चारण कर पाएंगे।

लेकिन यदि मन के ऊपर नियंत्रण हो, ईश्वर के प्रति रुचि हो, प्रेम हो और प्राणायाम के माध्यम से विधिवत् मन को रोककर मंत्रों के माध्यम से उसका ध्यान किया जाए तो ध्यान कहीं पर भी लग सकता है। घर से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। ध्यान आंख बंद करके होता है और आंख बंद करने के उपरांत हम कहां बैठे हैं, किस दिशा में बैठे हैं, इसकी विस्मृति हो जाती है। इसलिए दिशा, स्थान, समय आदि का भी मंत्रों की शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हम जाने-अनजाने इच्छापूर्ति हेतु या कष्ट में कितने ही मंत्रों का जाप मन ही मन करते रहते हैं। इसी भावना के साथ कि हमें एक न एक दिन दुखों से मुक्ति अवश्य प्राप्त होगी। हृदय में आस्था हो तो हम मंत्रों की तरंगों का अवश्य ही अनुभव कर पाएंगे, जिससे आंतरिक शांति का संचार होगा एवम् उर्जा में उत्तरोत्तर वृद्धि होना निश्चित है।

मंत्रों के सार को जानना एक गूढ़ रहस्य है, जो जीवन को लौकिक से पारलौकिक तत्व की ओर ले जाने में सक्षम है। जिस प्रकार तृण को बांटकर बनाई गई रस्सी से हाथी भी बांध लिया जाता है, उसी प्रकार मंत्रों की शक्ति से उस ईश्वर को भी मोह पाश में बांधा जा सकता है। मंत्रों की सही महत्ता को समझे बिना उनकी मान्यता को निर्धारित करना मूर्खतापूर्ण व हानिकारक है। सच तो यही है कि हम मंत्रों का सही उच्चारण करके उनकी शक्ति से कोई भी कार्य कर सकने में सक्षम हो सकते हैं।

290. खुशियों के फूल

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

किसी के जीवन में कांटे बो कर हम खुशियों के फूलों की कल्पना नहीं कर सकते। खुशियों के फूल हमारे कर्मों की खाद- पानी से पल्लवित व पुष्पित हृदयरूपी क्यारी में ही खिल सकते हैं। मन की पवित्रता और सकारात्मक विचारों से बुरे से बुरे कार्य भी अच्छे में परिणत हो सकते हैं। मन की मलिनता दूसरों को क्षति पहुंचाने की बजाय अपने ही प्रारब्ध व भविष्य के पंख कुतरने को विवश करती है। हमारे विचारों और कर्मों के मंथन से ही खुशी या दुख की रचना होती है।

हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों से ही हमारे अगले जन्म में खुशियों के फूल खिलते हैं। वरना क्या कारण है कि एक ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति से, जल-वायु के सानिध्य से पोषित होकर कालांतर में उन बीजों में से एक विष बनता है व दूसरा अमृत। अर्थात् एक ही माता-पिता की संतान होने के बाद भी किसी की जीवन रूपी बगिया में खुशियों के फूल खिलते हैं और किसी को दुख और कठिनाइयों का सामना करते हुए नरकीय जीवन जीना पड़ता है।

यदि पालन पोषण से ही सारे संस्कार आते, तो उसी खाद अथवा मिट्टी- पानी का सेवन कर एक विष व दूसरा अमृत कैसे बन गया? ठीक उसी प्रकार जैसे—एक भरी- पूरी कक्षा में एक छात्र स्वर्ण पदक विजेता व दूसरा अनुत्तीर्ण कैसे हुआ? जबकि दोनों को शिक्षा देने वाले गुरुजन समान थे। दरअसल विगत का कर्म फल ही वर्तमान में प्रारब्ध का बीज बनकर विष- अमृत के रूप में परिभाषित होता है।

व्यर्थ नहीं होते कर्म— जैसे हमारा शरीर एक यंत्र की तरह है। एक ऐसा सुंदर यंत्र जिसके साथ उसकी स्वामी आत्मा विलक्षण रीति से अभिन्न हो जाती है। उसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का यंत्र है। परमात्मा उसके अंदर निवास करता है, उसका उपयोग करता है। व्यक्ति को परमात्मा का जो उसके अंतस में निवास करता है, अच्छा और विश्वस्त यंत्र बनना चाहिए और प्रत्येक कर्म, विचार और वाणी उसको समर्पित करनी चाहिए।

कर्म, शरीर, वाणी और मन से किए जाते हैं। प्रत्येक कर्म का नियत परिणाम होता है। कारण, कार्य- विधान अपरिवर्तनीय हैं। कर्म के संबंध में गौतम बुद्ध के जीवन का एक वाक्य स्मरण हो आया।

गौतम बुद्ध एक आम के पेड़ के नीचे समाधि में बैठे हुए थे। आम तोड़ते समय एक बच्चे के हाथों से फेंका गया पत्थर गौतम बुद्ध के सिर पर जा लगा। सिर से खून निकलने लगा।
बुद्ध परेशान दिखने लगे और उनकी आंखों में आंसू भी आ गए। जब बच्चे ने देखा तो उसे लगा कि अब तो बुद्ध उसे डांट फटकार लगाएंगे। वह डरा- सहमा खड़ा था। उस बच्चे ने बुद्ध को अपनी ओर आते देखा। बच्चा उनसे कुछ कहता, उसके पहले ही बुद्ध बोला— तुमने आम को पत्थर मारा तो आम ने तुम्हें मीठे फल दिए, लेकिन जब तुम्हारा पत्थर मेरे सिर पर लगा तो तुम भयभीत हो गए। क्योंकि मैंने तुम्हें भय दिया। लेकिन ये सच नहीं है— जिस प्रकार पेड़ का धर्म मीठे फल देना है, उसी प्रकार संन्यासी का धर्म क्षमा करना है। इसलिए तुम जाओ, हम तीनों ने अपने- अपने स्वभाव के अनुसार कर्म किया।

इसलिए हमें परिणाम की चिंता किए बगैर कर्म करते रहना चाहिए। परिणाम कारण में वैसे ही निहित रहता है, जैसे बीज में वृक्ष। पानी को सूर्य सुखा देता है, यह अन्यथा नहीं हो सकता। उष्णता और पानी के मिलने से परिणाम होगा ही। यही बात सब के साथ है। परिणाम कारण के गर्भ में रहता है। यदि हम गंभीरता से विचार करें तो संपूर्ण जगत अपने विविध अंगों में कर्म के अपरिवर्तनीय नियमों के अनुसार विकसित होता दिखलाई पड़ेगा।

वेदांत में कर्म के इसी सिद्धांत का निरूपण किया गया है। कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं हो सकता। कर्म करना और उसके परिणाम से बच जाना या किसी ऐसे परिणाम की आशा करना, जो किसी दूसरे कर्म से हो सकता है, संभव नहीं है। निश्चित कर्मों का उनके अनुरूप परिणाम होना अनिवार्य है। कर्म के विधान से सच्चा कर्म स्वातंत्र्य उत्पन्न होता है। कर्म की प्रकृति एवम् गुणधर्म के अनुसार ही जीव भावी जीवन जीने के लिए विवश होता है।
यदि अतीत के कर्मफल से वर्तमान का निर्माण संभव है तो वर्तमान के सदुपयोग से उसी अनुपात में भविष्य का सुखद निर्माण भी।

सदविचारों के समुचित दिशा में प्रसार से हर्ष का परिवेश बनता है, जबकि उन्हीं विचारों का अनुचित दिशा में नकारात्मक उपयोग खुशियों के महल को तहस-नहस कर सभी प्रकार के दुखों, क्लेशों व विपत्तियों का कारण भी बन सकता है। जानबूझकर जो षड्यंत्र अथवा कुचक्र किसी ओर के लिए रचे जाते हैं, वे परोक्षत: स्वंय को ही षड्यंत्रों के भवंर में डुबो देने का उपक्रम करते हैं। किसी का कुछ भी अनिष्ट सोचने से पहले स्वंय को उसके स्थान पर रखकर देखें। यह दुर्लभ शरीर बहुमूल्य है। इसलिए इस मन को इधर-उधर भटकाने की बजाय अपने कर्मों की तरफ ध्यान लगाना चाहिए, न कि रात- दिन कुचिंतन के मार्ग पर अग्रसर हो अनाप-शनाप लिख, बोलकर, कोर्ट- कचहरियों के चक्कर में फंसे दुर्लभ जीवन गवाने में लगाना चाहिए।

जिस प्रकार भ्रमर पुष्प के पराग को ग्रहण कर लेता है, किंतु उसको नष्ट नहीं करता। जैसे दूध दुहने वाला व्यक्ति बछड़े के हित को ध्यान में रखते हुए दूध को दुहता है। वैसे ही हमें सबके हित को ध्यान में रखते हुए अपने कर्मों को संचित करते रहना चाहिए। मनुष्य योनि प्राप्त करने के बाद भी जो अच्छे कर्म के भागी नहीं बनते, वे इस संसार में शोक के पात्र हैं और मनुष्य रूप धारण करके पशुवत् विचरण करते हुए दुख से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। उनके जीवन में खुशियों रूपी फूल कभी नहीं खिलते। ऐसे मनुष्य वृद्धावस्था में चिंता से जलते हुए शिशिरकाल में कोहरे से झुलसने वाले कमल के समान संतप्त जीवन व्यतीत करते हैं।

शरीर से ही उत्पन्न हुई व्याधि अहितकर होती है, किंतु वन में उत्पन्न हुई औषधि उस व्याधि का निराकरण करके मनुष्य का हित साधन करती है। जो मनुष्य सदैव हित में तत्पर रहता है, वह अपने कर्मों को संचित करता हुआ अपने आने वाले जीवन व जन्म में खुशियों रूपी बगिया की जमीन तैयार करता हुआ, बन्धु- बान्धवों, मित्रों का ख्याल रखता हुआ, परिवार का भरण- पोषण करता हुआ, धर्म में प्रवृत्त होता हुआ, दुर्जनों की संगति का परित्याग करता हुआ, साधुजनों की संगति करता हुआ और दिन-रात पुण्य कर्मों का संचय करता हुआ, अपनी मानवीय जीवन यात्रा में खुशियों के फूल संग्रहित करता हुआ, अपनी यात्रा पूर्ण करता है।

289 प्रभु संपदा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

इस संसार में प्रभु- संपदा को छोड़ कर शेष संपदाएं मनुष्य को दुख, तकलीफ, झूठ, छल, कपट, धोखा, विश्वासघात, अन्याय, शोषण आदि के माध्यम से भोग के साधनों का संग्रह करना सिखाती हैं और उसे दुख के भवसागर में डुबोने का काम करती हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि वर्तमान की नई पीढ़ी में नास्तिकता की प्रवृत्ति, आंधी के समान दिन दूनी- रात चौगुनी गति से बढ़ती जा रही है।

यहां तक कि कुछ बुद्धिजीवियों ने तो प्रभु के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही मना कर दिया है।
आज जो मनुष्य धर्म, कर्मकांड, ईश्वर आदि विषयों में आस्था रखते हैं, वे प्रायः विज्ञान से वियुक्त हैं और जो भौतिक विज्ञान, यंत्र, सिद्धांत, कला, निर्माण, प्रबंध, व्यवस्था, तकनीकी आदि विशेषताओं से युक्त हैं, वे प्राय अध्यात्म संबंधी विषयों से उपेक्षित हो गए हैं। वास्तव में अध्यात्म क्या है, इससे उनका कोई लेना देना नहीं है।

यदि विज्ञान धर्म से युक्त नहीं है तो अंधा है और धर्म यदि विज्ञान से युक्त नहीं है तो अपंग है। अब तो हमारे सनातन धर्म में भी ईश्वर उपासना, स्वाध्याय, सत्संग, यज्ञ, तप, सात्विक भोजन, नियमित व्यायाम आदि से संबंधित विषय गौण हो गए हैं, इसका कारण पाश्चात्य सभ्यता का आधिपत्य स्थापित हो जाना है। हमारी सनातन संस्कृति विलुप्त होने के कगार पर है।

आज हमारे जीवन में विपत्तियों की भरमार है। इसका कारण भी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार न करना ही है। एक विपत्ति (प्रभु कृपा से प्राप्त) सांसारिक विपत्तियों से निजात दिलाकर प्रभु संपदा के उस लोक में पहुंचा देती है, जहां से जीव भौतिकता के समस्त बंधनों से मुक्त हो प्रभु दरबार का स्थाई वासी बन जाता है। जबकि दूसरी विपत्ति (विगत कर्म फल से प्राप्त) कामनाओं से वशीभूत यातनाओं के भौतिक जाल में फंसा कर जीव को न केवल भरमाती है, अपितु बार-बार दुख के सागर में डूबने एवम् उतरने और दुर्लभ जीवन लीला को समाप्त करने के लिए विवश करती रहती है।

विपत्तियों के समय संतों और आचार्यों द्वारा निरूपित किया गया ज्ञान मार्ग, ईश्वर की उपासना, जीवन लक्ष्य प्राप्त करने में सर्वश्रेष्ठ उपादान सिद्ध होते हैं। वे ऐसे कर्म करते हैं जो हमेशा मनुष्यों के कल्याण के लिए होते हैं। उनके कर्म समाज में एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं। मनुष्यों व समाज का मार्गदर्शन करने के लिए मील का पत्थर साबित होते हैं।

ज्ञानी गुरु से दीक्षित शिष्य अज्ञान के अंधकार से संघर्ष करते हुए भी अपने सुचिंतन से अपने अभीष्ट तक पहुंचने का मार्ग ढूंढ लेता है, लेकिन अज्ञानी गुरु द्वारा दीक्षित शिष्य तथाकथित मुक्ति मार्गों के बावजूद भी भ्रमवश अपने ही कुचिंतित विचारों में उलझ, अपने दुर्लभ जीवन, समय एवम् ऊर्जा का अपव्यय करता रहता है।

विपत्ति से डरे नहीं सामना करें —
स्वामी विवेकानंद के कई ऐसे जीवन- प्रसंग हैं, जो आम लोगों के लिए लाभदायी हैं। एक बार किसी जनसभा में वे अपने बचपन की एक घटना सुना रहे थे। उन्होंने बताया कि एक बार वे वाराणसी के एक मंदिर गए। वहां उन्होंने पूजा अर्चना की। पूजा के बाद प्रसाद लेकर जब वे मंदिर से बाहर निकल रहे थे, तो बंदरों के एक समूह ने उन्हें घेर लिया। वे उनसे प्रसाद छीनना चाह रहे थे। इसलिए उनका झुंड स्वामी जी के नजदीक आने लगा। उन्हें अपनी तरफ आते देख कर विवेकानंद भयभीत हो गए। वे पीछे की ओर भागने लगे। बंदर भी झुंड के साथ उनके पीछे दौड़ने लगे।
इस घटना को पास खड़े एक वृद्ध संन्यासी देख रहे थे। उन्होंने विवेकानंद को हाथ के इशारे से रुकने को कहा। सन्यासी ने उन्हें डरने की बजाय डर से सामना करने की बात कही। उन्होंने स्वामी जी से कहा कि जितना तुम डर से भागोगे, डर उतना ही तुम्हारा पीछा करेगा। तुम्हें निडर होकर डर का सामना करना चाहिए।
उनकी बात सुनकर स्वामी जी के मन में हिम्मत आई। वे तुरंत बंदरों की तरफ पलटे और उनकी तरफ बढ़ने लगे। उन्हें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके सामने आ जाने पर सभी बंदर भाग खड़े हुए। किसी ने उनका पीछा नहीं किया।
स्वामी जी ने बढ़िया सीख देने के लिए वृद्ध सन्यासी का धन्यवाद करते हुए कहा—
जिससे जीवन में कोई भी सीख मिले, वही गुरु होता है और एक ज्ञानी गुरु कभी भी पथ पर आने वाली विपत्तियों से डरने की बात स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन प्रभु कृपा की दुर्लभ संपदा पूर्व जन्मों के पुण्य फल से प्राप्त होती है तो उसी की आधारशिला पर फिर युगबोध के इतिहास का दिव्य भवन अवस्थित होता है। फिर प्रभु मानवता के दिशा बोध एवम् जीवन मूल्यों के संरक्षण हेतु विपत्तियों का मंथन कर आदेश की स्थापना करते हैं।

भगवद्कृपा के बिना प्राप्त अथाह संपदा भी देखते- देखते आपके हाथों से छीन अथवा छीनी जा सकती है। जो व्यक्ति प्रभु संपदा को मानता ही नहीं, जो यह सोचता है कि जन्म से पहले मेरा कोई अस्तित्व नहीं था और मृत्यु के पश्चात् भी नहीं रहेगा। भूतों के योग से अकस्मात् मेरा शरीर बन गया है तथा मृत्यु के बाद मेरा अंत है। संसार अकस्मात् बन गया है, संसार को बनाने वाला, संचालन करने वाला भी कोई ईश्वर नहीं है। यह सब कुछ तो सृष्टि की स्वाभाविक प्रक्रिया है। ऐसे व्यक्ति के विचार शरीर से परे जा नहीं सकते, वह तो बस इस शरीर को खिलाने, पिलाने, सजाने, संवारने और इसकी रक्षा में ही लगा रहेगा।

आज के मानव समाज में ऐसी मान्यता वाले व्यक्तियों का जीवन प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। खाओ- पिओ और मौज करो। उनकी यह मान्यता बन गई है कि यह जीवन प्रथम और अंतिम है। न पीछे था न आगे होगा। बस येन- केन- प्रकारेण जो कुछ भोगना है, भोग लो। मृत्यु के पश्चात् सब कुछ समाप्त हो जाएगा। इसलिए वह अपने जीवन में कर्मों को संचित करता ही नहीं, जिससे उसे प्रभु संपदा में भागीदार बनने का हक नहीं मिलता।

सर्वथा समर्थ होते हुए भी आप सिवाय पश्चाताप बोध के कुछ करने की स्थिति में नहीं हो सकते। दूसरी और आपके पास कुछ न होने पर भी प्रभु कृपा से आप वह अथाह संपदा पा सकते हैं जिसका उपयोग जनहित एवम् मानव कल्याण में करते हुए आप अदा कर सकते हैं। लेकिन उस संपदा की प्रचुरता में लेश मात्र भी अंतर नहीं आ सकता।

यदि वास्तव में मानव प्रभु संपदा को प्राप्त करने में समर्थ होता तो जितना उसने यश, पद, प्रतिष्ठा एवं वैभव अर्जित किया है, उससे अधिक अर्जित करके दिखाता। हम जीवन में जो भी प्राप्त करते हैं या खोते हैं, वह प्रभु कृपा के बिना संभव नहीं है। अब तो विज्ञान भी परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकारने लगा है— विज्ञान इस बारे में बड़ी शब्द सम्भाव्य स्थापनाएं कर सकता है कि- सृष्टि और पुण्य कैसे होते हैं और कैसे ये तारे और अणुओं आदि का संसार बन जाते हैं। किंतु वह यह बताने में समर्थ नहीं है कि ये द्रव्य और ऊर्जा कहां से आए और विश्व की रचना ऐसी सुव्यवस्थित क्यों है? इसलिए हमारे ऋषियों, गुरुओं और उनके शिष्यों ने जनमानस के हृदय में प्रभु के प्रति आस्था के बीज रोपित करने की कोशिश की है, जिससे वे प्रभु कृपा प्राप्त करके प्रभु- संपदा का संग्रह कर सकें।

288. मन से करें संवाद

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। वह हर समय अपनी परेशानियों के बोझ को मन में दबाए रखता है। जिससे वह मानसिक कुंठा का शिकार हो जाता है। लेकिन कभी- कभी जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं, जब वह बेचैन हो जाता है और अपने मन की बात करना चाहता है, किंतु किससे कहे, यह उसे समझ नहीं आता और उसके सामने यह संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में उसे अपने मन से संवाद करते हुए, ईश्वर के साथ अपनी निकटता को और अधिक अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए।

बहुत से संत मन को परमात्मा का सूक्ष्म रूप मानते हैं। भारत के कई संतों ने मन में परमात्मा को खोज लेने की बात कही है। मन पर नियंत्रण करके उससे संवाद करने के लिए ‘मन व इंद्रियों के जड़त्व’ को समझना चाहिए।
जैसे— मेरा मन एक यंत्र के समान जड़ वस्तु है।

यह अपने आप किसी विषय का चिंतन नहीं करता। मेरे मन में उठते हुए विचार मेरे अपने हैं। अपने देखा होगा कि हर मनुष्य के विचार अलग-अलग होते हैं। किसी- किसी के विचार ही एक- दूसरे के साथ मैच कर पाते हैं। मैं जिस किसी विषय के बारे में संवाद करता हूं, उसी विषय का ज्ञान मेरा मन मुझे करा देता है।

जिस प्रकार फोटोग्राफर की इच्छा के बिना कैमरे में अपने आप चित्र नहीं उतरते, वैसे ही मेरी इच्छा व प्रेरणा के बिना मेरा मन भी किसी वस्तु का ज्ञान मुझे नहीं कराता। मन मनुष्य के विचारों के मूल रूप का साक्षी होता है क्योंकि सारे विचार मन में ही उत्पन्न होते हैं। वह उनका परीक्षण करने में भी समर्थ होता है। विज्ञान ने भी मन की शक्ति को सबसे ऊपर माना है और उसे संकल्पशक्ति का नाम दिया है। जो सभी सांसारिक शक्तियों से श्रेष्ठ है, वह परमात्मा ही है।

मन की शक्ति को पहचानना ईश्वर को पहचानना है। मन से संवाद ईश्वर की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना है। जैसे दूरदर्शन प्रसारण कक्ष में बैठा उद्घोषक यह जानता है कि “चाहे मुझे दिखाई न दे” किंतु लाखों लोगों की आंखें तथा कान मुझे देख व सुन रहे हैं, ऐसा विचार कर वह कोई भी अनुचित क्रिया नहीं करता तथा अभद्र वाक्य नहीं बोलता, ऐसे ही हम अपने मन में स्वीकार करें कि ईश्वर मेरे पास ऐसे ही उपस्थित है जैसे मेरे माता- पिता उपस्थित हैं और अत्यंत प्रेमपूर्वक, पवित्र हृदय से की गई मेरी स्तुति- प्रार्थना को सुन रहा है। मेरी प्रार्थना सुनकर वह परम दयालुमय, कृपा करके, अवश्य ही मेरे से संवाद स्थापित करेगा, जिससे मुझे परमानंद और ज्ञान की प्राप्ति होगी।

मन से संवाद करना है तो उसे विकारों, मोह- माया के अंधेरे से बाहर लाना होगा। मन में प्रतिष्ठित ईश्वर के दर्शन के लिए मन का निर्मल होना आवश्यक है। वास्तविकता यह है कि मन, जड़ प्रकृति से बनी हुई एक जड़ वस्तु है, यह चेतन नहीं है। इसलिए इस मन में अपने आप कोई विचार नहीं आता और न ही यह स्वंय किसी विचार को उठाता है।

इस जड़ मन को चलाने वाला चेतन हमारी जीवात्मा है। जब जीवात्मा अपनी इच्छा से किसी अच्छे या बुरे विचार को अपने मन में उठाना चाहता है, तब ही उस विषय से संबंधित विचार मन में उत्पन्न होता है। जैसे— टेप में अनेक प्रकार की ध्वनियों का संग्रह होता है, ऐसे ही मन में भी अनेक प्रकार के विचार संस्कारों के रूप में संग्रहित रहते हैं। जब व्यक्ति अपनी इच्छा व प्रयत्न से टेप को चलाता है तो ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं, अपने आप ध्वनियां सुनाई नहीं देती। इसी प्रकार मनुष्य मन में संग्रहित संस्कारों को अपनी इच्छा व प्रयत्न से उठाता है, तभी मन में विचार उत्पन्न होते हैं। यह मन के कार्य करने की एक पद्धति है, जिससे हम संवाद कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त मन का कार्य एक कैमरे यंत्र के समान भी समझना चाहिए। जैसे— फोटोग्राफर अपनी इच्छा से जिस वस्तु का चित्र उतारना चाहता है, उस वस्तु का चित्र लैंस के माध्यम से कैमरे का बटन दबाकर रील में उतार लेता है और जिस वस्तु का चित्र उतारना नहीं चाहता, उसका चित्र नहीं उतारता।
ठीक उसी प्रकार से जीवात्मा जिस वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना चाहती है, उस वस्तु का ज्ञान मन में शरीर तथा इंद्रियों के माध्यम से संग्रहित कर लेती है। इस दृष्टांत में शरीर कैमरे के समान है, फोटोग्राफर चेतन जीवात्मा है, मन रील है, जिस पर चित्र उतरते हैं, तथा इंद्रियां लैंस के समान हैं। इसी प्रकार से कार, पंखा, मशीन आदि जड़ यंत्र बिना चेतन मनुष्य के चलाए, अपने आप नहीं चलते हैं, न रुकते हैं, ठीक वैसे ही बिना जीवात्मा की इच्छा तथा प्रेरणा से जड़ मन किसी भी संवाद की ओर न अपने आप जाता है, न उसका विचार आता है।

मनुष्य जब अपने मन के निकट होता है, तो सारी सृष्टि से निकटता बन जाती है। जो बात वह अपने मन से कर सकता है, वह किसी से भी कर सकता है। वास्तव में मनुष्य दूसरों के समक्ष अपनी छवि को लेकर सदैव चिंतित रहता है। जिनके साथ सदैव घर, परिवार में साथ रहा, उनसे भी मन के तल पर हमेशा दूरी बनाकर रखता है। हम अपने को समझाने के लिए चाहे कितने ही दावे कर लें, लेकिन वे सच्चाई के धरातल से कोसों दूर हैं। वास्तविकता यही है कि संसार में कोई भी संबंध ऐसा नहीं है, जिसे समरस कहा जा सके।

एक मनुष्य का मन ही है, जो उसकी समस्त भावनाओं, विचारों के मौलिक रूप का साक्षी होने के साथ-साथ उसके अच्छे व बुरे कर्मों का प्रत्यक्ष गवाह भी है। मनुष्य अपनी बुराइयों को सारी दुनिया से छुपा सकता है, लेकिन उसके मन रूपी कैमरे से नहीं छुपा सकता। लाख प्रयत्न करने के बाद भी कहीं न कहीं उसके मन के किसी कोने में अपने कर्मों के पाप- पुण्य का लेखा-जोखा मौजूद रहता है। अगर वह सभी से झूठ बोलता है और अपने पाप कर्मों को नहीं बताता, सिर्फ अपने पुण्य कर्मों का ही बखान करता रहता है तो उसके मन में कहीं न कहीं एक टीस जरूर उठती रहती है। जो उसको हर समय उसके पाप कर्म याद दिलाती रहती है, जिसके कारण वह सभी से दूरी बना लेता है।

मन को शब्दों की आवश्यकता भी नहीं होती। कोई विचार कहां से उपजा है, किस उद्देश्य को लेकर चलने वाला है, यह केवल स्वयं का मन ही जानता है। यदि उसे निंदा करना, चोरी करना, पाप कर्म जैसे दुर्भावनापूरक कार्य करते हुए आत्मग्लानि का भाव जाग्रत होता है तो वह किसी के लिए भी ऐसे भाव अपने मन में नहीं पनपने देगा। जो स्वयं को स्वीकार्य होगा, वह, वही दूसरों के लिए भी सोचेगा, तभी संतुलन स्थापित होता है। जो मनुष्य मन से संवाद करने में पारंगत हो गया, उसका बौद्धिक विकास हो जाता है। वह बिना विचलित हुए हर परिस्थिति का सामना निडरता से करते हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है क्योंकि उसके मन में हमेशा सकारात्मक विचार ही उत्पन्न होते हैं इसलिए उसे असफलता का मुंह नहीं ताकना पड़ता। उस पर ईश्वर की दया- दृष्टि हमेशा बनी रहती है।

287. जीवन रुपी रथयात्रा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यात्रा से अभिप्राय गतिमान होने से है यानी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना।

मनुष्य ही नहीं बल्कि पूरी सृष्टि अपने- अपने अनुसार यात्रा कर रहे हैं। सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, नदियां, पेड़-पौधे सभी गतिशील है। यदि गतिशीलता नहीं होगी तो विकास प्रक्रिया बाधित हो जाएगी। इस धरा पर जन्म लेने के पश्चात् शिशु शारीरिक और मानसिक विकास के स्तर पर प्रत्येक क्षण गतिशील रहता है और इस तरह वह बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और अंत में वृद्धावस्था को प्राप्त करते हुए अपना जीवन चक्र पूरा करता है। इसी प्रकार प्रत्येक जीव निरंतर अपने जीवन की रथ यात्रा को गतिशील बनाए हुए है, जब तक वह इस धरा पर है। जिस दिन गतिशीलता समाप्त हो जाएगी उसी दिन उसका जीवन चक्र समाप्त हो जाएगा।

सनातन परंपरा जीवन रुपी रथ यात्रा को बखूबी समझती है। उनका कहना है कि यात्रा चाहे किसी भी तरह की हो, वह सुखद तथा लाभकारी होनी चाहिए। जीवन धूप- छांव का खेल है। जब तक जीवन है, कठिनाइयां और बाधाएं तो आती ही रहेंगी। सुख का अर्थ यह नहीं है कि हमें कठिनाइयों का, बाधाओं का सामना करना नहीं पड़ेगा। मनुष्य के जीवन में हमेशा सुख नहीं रहता। जीवन रुपी यात्रा में दुखों का, कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है।

प्रकृति जिसे नायक की भूमिका निभाने के लिए तत्पर करती है, उसे चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। उसके मार्ग में भारी अवरोध उत्पन्न होते रहते हैं। दुष्कर परिस्थितियों से गुजरने पर ही वह तरासा, निखारा और संवारा जाता है। वक्त के थपेड़े उसको जीवन रूपी रथ यात्रा का मर्म समझा जाते हैं। जब तक वह जीवन में कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना नहीं करेगा, तब तक उसे जीवन का मर्म समझ नहीं आएगा। ठहरे हुए समुद्र में नाविक सूझबूझ और कौशल नहीं सीखता। वह भी समुंद्र में उठते तुफानों में ही कुशल नाविक बनता है।

विषम परिस्थितियों को समस्या मानकर घुटने टेकने वाला मनुष्य चिंता और व्याकुलता के भंवर में जकड़ जाएगा। उसे बाहर निकलने का मार्ग मिलेगा ही नहीं। किसी भी कार्य में सफल न होने पर जहां एक मनुष्य हताश और निराश हो जाता है, वहीं दूसरा हार का ही उत्सव मनाता है। उसका कहना है कि हार तभी होती है, जब हार स्वीकार की जाए। यह सब अपने विचारों का फर्क है। कठिनाइयों और कष्टों से छुटकारा नहीं मिलता इन्हें भोगना ही पड़ता है। सकारात्मक विचारों से कठिनाई और कष्टों को शांत किया जा सकता है। समस्या से रूबरू नहीं होंगे तो समस्या हम पर हावी हो जाएगी।

अगर हमारे जीवन में ईश्वर अवरोध डालता है, कठिनाइयां उत्पन्न करता है तो उनका उद्देश्य हमें निराश और हताश करना नहीं बल्कि सशक्त करना है। दुष्कर क्षणों में ही मनुष्य संभावनाएं तलाशते हैं। तूफान की भांति कठिनाई ज्यादा देर तक नहीं रहती। विषम परिस्थितियों से ही हम अपने सामर्थ्य को जान पाते हैं। इसलिए डरिए नहीं, निर्भय होकर आगे बढ़िए। आगे बढ़ने वालों का पथ स्वयं खुलता जाता है। बाधाएं उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाती। दुनिया उनका वंदन करती है। आगे बढ़ना ही एक शुभ कर्म माना जाता है।

अगर जीवन रूपी रथयात्रा में बाधाओं से डर कर हम पीछे हट गए तो हमें अपमान, पतन, दुख और अशांति मिलती है। यह सृष्टि सत्य और धर्म के बलबूते गतिमान है। यदि हम ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए कार्य को करते हैं तो सृष्टि का संतुलन बना रहेगा और हम ईश्वर के कार्य को करने से डर जाएंगे तो असंतुलन आ जाएगा जो उसके विनाश का कारण बनेगा।

सभी जानते हैं कि अच्छा काम करने में बहुत संघर्ष है लेकिन संघर्ष करने से क्यों डरें क्योंकि जो डरा वह मरा। मृत व्यक्ति से तो वैसे भी कोई आशा नहीं की जा सकती। जो संघर्ष करता है, वही जीवन रूपी रथयात्रा में प्रगति करता है। वही जीवंत है। उसे ही यश, कीर्ति, पद, प्रतिष्ठा, मान- सम्मान, खुशी, शांति, आनंद की प्राप्ति होती है। अच्छा कर्म करने वाला मनुष्य अंदर से मजबूत, संतुष्ट और प्रसन्न रहता है और बुरा कर्म करने वाला अच्छे कर्म करने वाले की कभी बराबरी नहीं कर सकता और ना वह अच्छा कर्म करने वाले की भांति निर्भय और प्रसन्न रह सकता है। सत्कर्मी का अस्तित्व कभी नष्ट नहीं होता।

मनुष्य का जन्म अच्छा कर्म करने के लिए हुआ है। लेकिन स्वार्थ एवं लोभ के कारण जीवन भर बेईमानी का जाल बुनता नजर आता है और सत्कर्म से भागा रहता है। ईश्वर सबका पालनहार एवं सर्व शक्तिमान है। हमारी सनातन संस्कृति में धर्म के व्याख्या सूत्र बने हैं। जिन्हें उन्होंने ओढ़ा नहीं, साधना की गहराइयों में उतर कर पाया था। जीवन रूपी रथ यात्रा में आगे बढ़ते हुए धर्म को अपनाएं, उसका सही अर्थ समझें, धर्म को सही अर्थ में जिएं। धर्म हमें सुख, शांति, समृद्धि और समाधि अभी दे या भविष्य में, ये ज्यादा आवश्यक नहीं है। धर्म हमें समता, पवित्रता का ऐसा सूत्र देता है, जिससे हम हर परिस्थिति में आनंद की अनुभूति कर पाते हैं।

शुद्ध आचार, शुद्ध विचार और शुद्ध व्यवहार से जुड़ी चारित्रिक व्याख्याएं ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है और इन्हीं में सांसारिक समस्याओं का समाधान छिपा है। इन धार्मिक सूत्रों को भूल जाना या उसके वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ रहने का ही परिणाम है कि आज मनुष्य हर पल दुख और पीड़ा में रहता है। तनाव का बोझ होता है। चिंताओं को विराम नहीं दे पाता। लाभ- हानि, सुख- दुख, हर्ष- विषाद को जीते हुए जीवन के अर्थ को अर्थहीन बनाता है। अपनी जीवन रुपी रथयात्रा को वह भार समझने लगता है। जबकि वह जानता है कि इस भार से मुक्त होने का उपाय, उसी के पास, उसी के भीतर है, सिर्फ अंदर गोता लगाने की जरूरत है।

जब वह अपने अंतर्मन में झांकता है तो उसे महसूस होता है कि जीवन तो बहुमूल्य और आनंदमय है। ऐसे में उसके लिए आवश्यक है कि वह सोचे की मैं जो कुछ हूं, उसे स्वीकार करुं। आखिर स्वयं को स्वयं से ज्यादा और कौन जान सकता है, समझ सकता है। धर्म ग्रंथों के इन सूत्रों को देखते हुए हर मनुष्य को अपने जीवन के रथ का संचालन सही ढंग से करना चाहिए। पारिवारिक एकता के साथ जीवन यापन से घर में उल्लास और उमंग का रथ दौड़ने लगता है।

श्री कृष्ण जब अर्जुन के सारथी बनकर युद्ध क्षेत्र में गए तो वहां पर उन्होंने गीता का उपदेश दिया जो मनुष्य के लिए आध्यात्मिक जीवन का संविधान बन गया। गीता के अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जहां श्री कृष्ण और अर्जुन हैं, वही श्री तथा विजय है। श्री कृष्ण विवेक और अर्जुन कर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं। विवेक के हाथों में लगाम होनी चाहिए। हमारी धार्मिक परंपराओं के अंतर्गत भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की जगन्नाथपुरी यात्रा का संदेश यह भी है, कि वर्षा ऋतु में कृषि के रूप में जीवन प्राप्त करने का पारिवारिक स्तर पर प्रयास किया जाए। बहन के साथ यात्रा नारी को सशक्त सिद्ध करती है।

286. भोग और त्याग का समन्वय

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए भौतिक पदार्थों की महत्ती आवश्यकता है। आज के दौर में मानव ऐशो- आराम की जिंदगी जीना ज्यादा पसंद करता है, जिससे उसकी भौतिक वस्तुओं को पाने की लालसा दिनों- दिन बढ़ती जाती है। वह भौतिक पदार्थों का इतना आदी हो चुका है कि अगर इनके जीवन की कल्पना करना संभव नहीं है। भौतिक सामग्री का उपयोग हम किस भावना से कर रहे हैं, यह समझना बहुत जरूरी है।

वेदों में भी मनुष्य जीवन को सम्यक रूप से चलाने के लिए भोग और त्याग का अद्भुत समन्वय स्थापित करते हुए कहा गया है कि— संसार की समस्त वस्तुओं का उपयोग त्याग भावना से करो यानी त्याग और भोग साथ-साथ। त्यागी तो योगी होता है और भोगी संसारी। ऐसे बहुत से ऋषि- मुनि, तपस्वी हुए हैं, जिन्होंने मानव जाति को पुरुषार्थ का उपदेश दिया, अपने जीवन निर्माण तथा परिवार व राष्ट्र के लिए कर्म का उपदेश दिया, उन्होंने साम्राज्य का त्याग किया और तप- त्याग के द्वारा कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त किया।

वे संदेश देते हैं—पुरुषार्थ के द्वारा अपनी समस्याओं को हल कर, अपने हृदय को विशाल बनाना चाहिए। संकीर्ण विचारों, स्वार्थ लिप्सा की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर परोपकारी बनना चाहिए। उन्होंने खुद अपने कर्मों पर विजय प्राप्त कर दुनिया को त्याग का मार्ग बताया। वास्तव में भोग और त्याग दोनों हमारे जीवन की अवस्था हैं। आवश्यकता है, दोनों में संतुलन बैठाने की। हम त्याग भी करते हैं और भोग भी, लेकिन हम कितना त्याग करते हैं और कितना भोग, यही बड़ा प्रश्न है।

प्रत्येक वस्तु का उपभोग करते हुए हमारी भावना त्याग की होनी चाहिए। जिस प्रकार कमल कीचड़ में होता है, उसका पत्ता पानी के ऊपर तैरता है, लहरें रात- दिन उसके ऊपर से गुजरती हैं, लेकिन आप पत्ते को देखें, सुखा मिलेगा। जल की एक बूंद भी उस पर टिक नहीं पाती। किचड़ और जल में रहते हुए भी वह उनसे लिप्त नहीं होता। ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी भौतिक वस्तुओं का उतना भोग करना चाहिए, जितना कि हमारा जीवन सम्यक रूप से चले। यही आनंद का नैतिक सूत्र है।

संसार में रहते हुए संपूर्ण भौतिक सामग्री का संग्रह करो, परंतु दूसरों के हितों को देखते हुए त्याग की भावना को आत्मसात करते हुए उसका उपयोग करना चाहिए। हमारी ऋषि परंपरा भी इसी सिद्धांत की अनुगामी रही है कि भोग उतना ही होना चाहिए, जितना जीवन के लिए जरूरी होता है। इसलिए वे यज्ञ करते थे। यज्ञ में प्रज्वलित होने वाली अग्नि भी हमें अनेक प्रकार से प्रेरणा देती है। समस्त यज्ञीय प्रक्रिया हमें यह संकेत करती है कि अपने जीवन के व्यवहार व विचारों में त्याग भावनाओं को जगाओ।

अग्नि में मुख्य रूप से तीन गुण होते हैं— प्रकाश, ताप और गति।

1.प्रकाश— यज्ञाग्नि हमें संकेत करती है कि प्रकाशित हो जाओ, न केवल वस्त्र, पात्र, भवन, वाहन, धन-संपत्ति आदि भौतिक पदार्थों से प्रकाशित हो, बल्कि सत्य, प्रेम, दया, संयम, त्याग, तप, सेवा, ज्ञान- विज्ञान से अपने अंत:करण व आत्मा को भी प्रकाशित करो।

  1. ताप— यज्ञाग्नि हमें प्रेरित करती है कि— राग, द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार, आलस्य, प्रमाद, स्वार्थ, मोह से संबंधित अपनी कुवासनाओं को, जो हमें कुमार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं और हमें दुखी करती हैं, उन कुवासनाओं को जलाओ।
  2. गति— यज्ञाग्नि हमारे अंदर चलते रहो, बढ़ते रहो, रुको नहीं की भावना भरती है। बाधाएं आएंगी, कष्ट आएंगे, असफलता भी मिलेगी, फिर भी हताश, निराश ना हो, नया उत्साह, नई प्रेरणा, नए संकल्प लेकर उठो, बढ़ो, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो, चलते रहो। यज्ञ के अंत में “सर्वे पूर्ण स्वाहा” कहकर समग्र द्रव्य पदार्थ यज्ञ वेदी में डाल दिया जाता है। यह इस बात का बोध कराता है कि एक दिन वर्तमान संसार में जो हमारा संबंध बना हुआ है, वह समाप्त हो जाएगा। सब कुछ यहीं रह जाएगा, केवल राख रह जाएगी। इसलिए भौतिक वस्तुओं से मोह न रखो, अन्यथा इनका वियोग होने पर दुख होगा। इसलिए अपने अंदर त्याग की भावना को जागृत रखो।

केवल भोगों में आसक्त हो जाना यह राक्षस प्रवृत्ति है। भोग जब तक त्याग के दायरे में रहता है, तब तक वह मनुष्य के लिए हितकर होता है। जब त्याग की भावना समाप्त हो जाती है, उसी समय मनुष्य की लालसा विशाल रूप ले लेती है, जिसका कोई अंत नहीं है। इस संसार में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे भौतिक वस्तुओं को पाने की और संग्रह करने की लालसा निरंतर बढ़ती रहती है। उसकी भूख कभी शांत नहीं होती, इस सृष्टि का हर प्राणी और समस्त प्रकृति मनुष्य की इस लालसा रूपी प्यास को तृप्त करने में लगे रहते हैं। सृष्टि के कण-कण में त्याग समाहित है, लेकिन मनुष्य के भोग की यही भावना संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए एवं स्वयं मनुष्य के लिए भी आनंद में बाधक बनती है।

अत्यधिक भोग भोगने की प्रवृत्ति मनुष्य के जीवन को अधोगति की ओर ले जाती है। इसके विपरीत त्याग की भावना मनुष्य को मानसिक आनंद एवं शांति की प्राप्ति कराती है। त्याग पूर्वक भोग करने वाला मनुष्य अपने जीवन में सदैव खुश और संतुष्ट रहता है। उसका जीवन हमेशा दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाता है। इस संसार की प्रत्येक वस्तु एवं पदार्थ पर परमात्मा का अधिकार है। इस संपूर्ण भौतिक संपदा का स्वामी वह परमात्मा ही है, इसलिए उसकी संपदा को त्याग भाव से भोगने वाला मनुष्य ही सुखी रहता है।

उसे समझना होगा कि संसार के समस्त उत्पन्न पदार्थ अनित्य हैं और इन पदार्थों से मिलने वाला सुख क्षणिक व दुखमिश्रित है। इसलिए कोई भौतिक पदार्थ की प्राप्ति न होने पर भी मन में शांति, प्रसन्नता, सन्तुष्टि की स्थिति बनाए रखें। उसको पाने की और भोगने की लालसा में शोक, चिंता, क्षोभ आदि को उत्पन्न न करें। भोग और त्याग का समन्वय ही संपूर्ण विश्व को शांति पथ की ओर अग्रसर करता है। इसलिए हमें ऋषि-मुनियों के निर्देशानुसार और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अनुगामी बनकर अपनी जिंदगी में भोग और त्याग में संतुलन स्थापित करते हुए अपने कर्तव्यों को अंगीकार करें तथा अपने परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व को भोग के साथ त्याग भावना की ओर अग्रसर करते हुए पथ- प्रदर्शक बनने की कोशिश करें।

285. आंतरिक संघर्ष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानव की जीवन यात्रा संघर्षों से ही प्रारंभ होती है। मनुष्य के जन्म के पश्चात् संघर्ष शुरू हो जाते हैं और संघर्षों की यही यात्रा उसकी मृत्यु तक चलती रहती है।

देखा जाए तो संघर्ष जीवन का पर्याय है। यह जीवन पर्यंत चलता ही रहता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब तक मनुष्य का जीवन है, तब तक संघर्ष है। जब जीवन समाप्त हो जाएगा तो संघर्ष भी समाप्त हो जाएगा।

इसलिए मनीषियों ने संघर्ष का समर्थन किया है कि संघर्ष ही जीवन है। जिस तरह मनुष्य की विकास यात्रा संघर्ष से शुरू होती है, आने वाले समय में भी मानवता का विकास हमारे संघर्षों के इतिहास से ही बनेगा। इस धरा पर मनुष्य आते हैं और चले जाते हैं। परन्तु संघर्ष सदैव बने रहते हैं।

संघर्षों के स्वरूप भी विविध प्रकार के होते हैं। कुछ संघर्ष मनुष्य के बाहरी परिवेश के मध्य होते हैं तो कुछ आंतरिक संघर्ष होते हैं।

बाहृय संघर्षों की यह विशेषता होती है कि इनमें एक पक्ष के द्वारा क्रिया होती है तो दूसरा पक्ष प्रतिक्रिया देता है यानी कि क्रिया और प्रतिक्रिया दो अलग-अलग मनुष्यों द्वारा दी जाती है। जीवन में ऐसे संघर्ष पल- पल घटित होते रहते हैं। जीवन के प्रत्येक मोड़ पर ऐसे संघर्षों के रंग देखे जा सकते हैं। संघर्ष अनुभव को धारदार बना देते हैं। संघर्षों के चलते जीवनयापन आसान हो जाता है। इस धरा पर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जिसके जीवन में संघर्ष की कोई कहानी न हो। कठिन परिस्थितियों में जीवन जीने की कला सिखाता है, संघर्ष। संघर्ष में ही सफलता का मार्ग खुलता है। जिसके जीवन में जीतना ज्यादा संघर्ष होगा, उसको उतनी बड़ी सफलता प्राप्त होगी।

जिस तरह बाह्य संघर्ष होता है, उसी तरह कुछ संघर्ष आंतरिक होते हैं। आंतरिक संघर्ष मनुष्य के अंतर्मन की परिधि के भीतर ही जन्म लेते हैं और अंदर ही अंदर घूमते रहते हैं।
इन संघर्षों की विशेषता यह होती है कि इसमें क्रिया जिस मनुष्य के द्वारा की जाती है, प्रतिक्रिया भी उसी मनुष्य द्वारा होती है यानी कि क्रिया एवं प्रतिक्रिया दोनों के प्रभाव एक ही मनुष्य पर पड़ते हैं।
इसलिए ऐसा संघर्ष बाह्य संघर्षों की अपेक्षा अधिक व्यापक और घातक होता है। क्योंकि स्वयं का स्वयं से होने वाला संघर्ष अंतर्द्वंद कहलाता है और अंतर्द्वंद ऐसी स्थिति होती है जिसमें अंदरूनी उथल-पुथल की स्थिति इतनी तीव्र एवं चरम पर होती है कि कई बार यह मनुष्य के लिए बहुत घातक सिद्ध होती है क्योंकि इससे उसके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। संघर्ष में मनुष्य अपनी भावना से स्वयं के साथ-साथ दूसरों को भी अवगत नहीं करा पाता। ऐसे में बेचैनी व अशांति की थाह लेना भी मुश्किल है।

अगर देखा जाए तो आंतरिक संघर्ष, बाहरी संघर्ष का ही परिणाम होते हैं। लोभ और मोह माया के वशीभूत होकर मनुष्य अपना पूरा का पूरा जीवन इसी सोच- विचार में लगा देते हैं कि हमारे पास इतनी अथाह संपत्ति हो, जिसकी बराबरी धरती का कोई भी दूसरा व्यक्ति कभी ना कर सके और हमारी अपनी संतान भी ऐसी हो जिसका कोई भी मुकाबला न कर सके और फिर अपनी इच्छापूर्ति लिए अनेक प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं, जिसके कारण उनके मन में हमेशा अंतर्द्वंद की स्थिति बनी रहती है। रावण से लेकर कंस तक बहुत से उदाहरण है जो अपने जीवन में अपनी ऐसी ही मानसिक विकृतियों के कारण कभी भी पार न पा सके। हमें इस जगत् की सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि ऊपर से ललित और आकर्षक दिखने वाला यह जगत् अंत में हमारे लिए सुख का नहीं अपितु दुख और पीड़ा देने का ही कारण बनता है। क्योंकि बाह्य जगत से ही आंतरिक संघर्ष उत्पन्न होते हैं।

सांसारिक विकास हो या आत्मिक विकास दोनों के विकास का मार्ग भी संघर्ष है। भौतिक जीवन हो या आध्यात्मिक, संघर्ष तो प्रतिपल विद्यमान है। कोई भी जीव इससे अछूता नहीं है। यह ईश्वरीय विधान है। इन संघर्षों से बचने का केवल एक ही उपाय है कि जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसे प्रकृति की इच्छा मान कर स्वीकार कर लिया जाए क्योंकि परिस्थिति पर हमारा वश नहीं चलता। ऐसी स्थिति में हमें केवल कर्म करने का निर्णय लेकर परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए तभी हम इन संघर्षों से निजात पा सकते हैं।

284. ईश्वरीय कृपा की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अनादि काल से यह चराचर सृष्टि उस निराकार परम सत्ता की न्यायप्रिय बागडोर से ही अधिशासित होती रही है। उनकी यह व्यवस्था बहुत ही सुव्यवस्थित है, जिसके कारण किसी भी जीव के साथ कोई अन्याय नहीं होता। फिर भी सभी को वह सब नहीं मिल पाता, जिसकी वे इच्छा रखते हैं, कामना करते हैं। इससे प्रायः निराशा घेरने लगती है। बिना ईश्वर में श्रद्धा, विश्वास के मनुष्य दुःख, पीड़ा, बन्धन, भय, शोक, चिंताओं से घिरा रहता है।

सनातन धर्म में आस्था रखने वालों के जीवन में ईश्वर का स्थान महत्वपूर्ण है। उनके लिए वही जीवन के उत्पादक, संचालक, रक्षक, प्रेरक हैं। उनके बिना जीवन में निरसता है, जीवन नितांत अपूर्ण है। भयंकर गर्मी देने वाला सूर्य और तारे, असंख्य जीवों को अपनी गोद में शरण दिए हुए यह पृथ्वी, इस बात के पक्के सबूत हैं कि सृष्टि का उद्भव किसी न किसी काल में, काल की किसी निश्चित अवधि में घटित हुआ है और इसलिए इस विश्व पर कोई न कोई ईश्वरीय कृपा की महत्ता होनी चाहिए।

हम सफलतापूर्वक परीक्षण करके यह बात साबित नहीं कर सकते की घड़ी जैसा सूक्ष्म यंत्र अकस्मात् बन गया अर्थात् उसे बनाने में किसी कारीगर के दिमाग और हाथ की जरूरत नहीं पड़ी। अपने आप चाबी लग जाने वाली घड़ी के बारे में भी यह नहीं कहा जा सकता कि किसी के चलाए बिना ही वह चल पड़ी। छोटे-छोटे अनगिनत जीव पृथ्वी की गोद में शरण लिए हुए हैं, वे इतने छोटे हैं कि जिन्हें हम खुली आंखों से देख भी नहीं पाते।

सूक्ष्म दर्शक यंत्र से ही देखे जा सकने वाले सूक्ष्म और हैरत में डालने वाले कार्यों को करने वाला यह कोश अपने वर्तमान रूप में कैसे आया? इसमें गति कैसे आरंभ हुई? तो इसकी शुरुआत या इसके कार्यकलाप के जारी रहने के कारण की व्याख्या का प्रयत्न करते हुए जब तक हम युक्ति और तर्क के साथ यह स्वीकार नहीं कर लेते कि किसी चेतन बुद्धिमान शक्ति ने उसे अस्तित्व दिया, तब तक हमें ऐसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, जिनसे हम पार नहीं जा सकते।

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के शिखर पर पहुंचने के दो सूत्र हैं।
एक कार्य के प्रति निष्ठा एवं ईमानदारी और
दूसरा है ईश्वरीय कृपा, जो बहुत ही निर्णायक है।

डॉक्टर पाल अर्नेस्ट एडोल्फ (फिजीशियन और सर्जन सेंट जॉन विश्वविद्यालय शंघाई- चीन) —

के अनुसार मनोचिकित्सक जिन महत्वपूर्ण कारणों का निर्देश करते हैं, उनमें से कुछ ये हैं— अपराध, आक्रोश, भय, चिंता, विक्षोभ, अनिश्चय, सन्देह, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ और उदासी।

दुर्भाग्य की बात यह है कि अनेक मनोचिकित्सक बीमारी पैदा करने वाले भावावेग की गड़बड़ियों के कारणों को तो तलाश लेते हैं, किंतु उन गड़बड़ियों का इलाज करने में वे जिन विधियों का प्रयोग करते हैं, उनमें ईश्वरीय विश्वास जैसी बुनियादी चीज की उपेक्षा कर जाते हैं।
तभी मुझे इस बात का भान हुआ कि मुझे शरीर के उपचार के साथ-साथ आत्मा का भी उपचार करना चाहिए और डॉक्टरी और शल्यक्रिया संबंधी उपायों में विश्वास के साथ- साथ मुझे अपने ईश्वरीय विश्वास का भी प्रयोग करना चाहिए।
केवल इसी तरीके से मैंने अपने मन में सोचा कि मैं मरीज की पूर्ण चिकित्सा कर सकता हूं, जिसकी उसे आवश्यकता है। इसके बाद और अधिक गंभीर विचार करने पर मैंने देखा कि वर्तमान चिकित्सा संबंधी उपचार में और परमात्मा में, मेरा जो विश्वास है, वह आधुनिक चिकित्सा दर्शन की जरूरतों को भी पूरा करता है।

उसके बाद जो मुझे अनुभव हुआ, वह अकल्पनीय था और मैं समझ गया कि ईश्वरीय कृपा बगैर कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। टूटी हुई हड्डियों और टूटे हुए दिलों का उपचार उसी के माध्यम से होता है। प्रभुसत्ता के समक्ष संसार की सारी सत्ताएं धरी की धरी रह जाती हैं। बिना उस सत्ता के वे वैभव व श्री से हीन हो जाती हैं। यदि मनुष्य के हाथ में कुछ होता तो वह मनचाहा जीवन जीने की प्रभुता रखता, लेकिन एक क्षण भी वह ईश्वरीय कृपा की स्नेह छांव के बिना जीवन यात्रा का एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता। संसार में जिसने जो भी प्राप्त किया है, वह केवल ईश्वरीय कृपा से ही संभव हुआ है।

इस सृष्टि में नियम, व्यवस्था और कर्म उस सर्वोच्च सत्ता की कृपा के बगैर संभव नहीं है। क्या इसको आकस्मिक घटना कहा जाएगा कि— केसर के पुष्प का छोटा- सा कण पृथ्वी में समाहित हो जाए और उसमें से एक नया पौधा पैदा हो जाए? क्या यह अधिक युक्तिसंगत नहीं है कि हम इस बात में विश्वास करें कि परमात्मा के अदृश्य हाथों ने उन नियमों के द्वारा इन चीजों की व्यवस्था की है, जिन नियमों को सीखना हम शुरू ही कर रहे हैं? चाहें तो इसकी स्वयं पुष्टि करके देख लें कि ईश्वरीय कृपा से पहले किसी व्यक्ति के पास वह सब क्यों नहीं था और ईश्वर की कृपा के बिना वह कब तक उन सौगातों को सहेज कर रख पाएगा? वह उतनी ही देर उस पद अथवा सत्ता पर आसीन रह सकता है जितनी देर ईश्वरीय कृपा से उसे अवसर प्राप्त हुआ है।

ईश्वरीय कृपा का महत्व अक्सर वनस्पति जगत् के आश्चर्यों और रहस्यों में, कभी विफल न होने वाले नियमों के माध्यम से देखा जा सकता है। यदि किसी को ईश्वरीय कृपा के प्रमाण अपने चारों ओर के संसार में दृष्टिगोचर नहीं होते तो यही समझना होगा कि, उसकी देखने की शक्ति ही जाती रही है। जीव को जीवन का प्रत्येक अवसर ईश्वर द्वारा उसकी उत्तम बुद्धिमता, शक्ति, विवेक, पोरुष व उसकी मौलिकता की परीक्षा के लिए दिया जाता है कि उसमें वह ईश्वर के सौंपे गए उत्तरदायित्व में कितना खरा सिद्ध होता है।

जीवन मूल्यों को स्थापित करने के लिए ईश्वर बार-बार इस प्रकार के प्रेरक चित्रों की रचना करते हैं। सत्य व मूल्य रचना हेतु किए गए ये कार्य ही परंपरा का निर्वहन कराते हैं। इस अक्षुण्ण परंपरा को जीवित रखने के लिए समयानुसार ईश्वर पात्र व उनकी काया में परिवर्तन करते रहते हैं, लेकिन परंपरा को पोषित करने के निमित्त वे उन्हीं मूल्यों के संरक्षण हेतु अपना सर्वस्व अर्पित कर उसे जीवित रखते हैं।

उस परमसत्ता की व्यवस्था सर्वत्र स्पष्ट है। ऐसी व्यवस्था के पीछे एक कुशल व्यवस्थापक होने के साथ-साथ, उसमें अनंत गुण होने चाहिए और वह ईश्वर ही हो सकता है। यह उस परम सत्ता के कार्य करने की कुशलता ही है कि कार्य और कारण के सम्बन्ध का प्राकृतिक नियम इतना जबरदस्त है कि तीन से पांच वर्ष तक के बच्चे का विकसित होता हुआ मन भी यह जान लेता है कि कोई न कोई ईश्वरीय सत्ता है, जिसकी कृपा की उस पर बारिश हो रही है।

यदि इस धरा पर जीवन को श्रेष्ठ बनाना है और उसमें अनगिनत विशेषताओं को समाविष्ट करना है, तो किसी दिव्य शक्ति के पथ प्रदर्शन की आवश्यकता है। जो स्वयं कर्ता बनकर समय की शिला पर अमिट छाप छोड़ना चाहता है, वह पल भर में ही अस्तित्वहीन हो जाता है। जिसे ईश्वर का सरंक्षण प्राप्त होता है, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

ईश्वरीय कृपा से मनुष्य में जो आत्मिक बल आता है, वह इस बात की गारंटी देता है कि उस प्रकार का विश्वास करने वाले व्यक्ति की दुर्गति कभी नहीं हो सकती। इसके साथ ही ईश्वर में विश्वास करने वाले मनुष्य का जीवन हर प्रकार से पूर्ण अर्थ देने के लिए अपेक्षित है और विचारशील लोग इस प्रकार के अर्थ की हमेशा तलाश करेंगे। अतः ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करके ही हम परम सत्ता को प्राप्त करने के सुपात्र बन सकते हैं।

283. शांति, मन की

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

शांति मनुष्य के जीवन में तभी हो सकती है, जब वह अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रकार की परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित कर लेता है। उस समय उसका मन-मष्तिस्क चिंता ग्रस्त एवं तनाव में नहीं रहता। चिंता से भागकर कभी नहीं बचा जा सकता परंतु यदि मानसिकता को बदला जाए तो चिंता को दूर भगाया जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं होता या यह कहें कि मनुष्य में इतना सामर्थ्य नहीं होता कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने जीवन में संयम और संतुलन का विकास करने की क्षमता विकसित कर सके।

उसके जीवन में तब तक शांति नहीं हो सकती, जब तक वह दुख को सुख में बदलने की कला से सुसज्जित नहीं हो जाता। परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं रहती। ऐसा कभी नहीं होता की हम जो चाहें, वही हमें प्राप्त हो। प्रत्येक कार्य हमेशा सुचारू रूप से संपन्न हो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं है। यदि हम शांत रहना सीख लेंगे तो दूसरों को भी शांति दे सकेंगें।

आपने अक्सर देखा होगा कि कुछ मनुष्यों की प्रकृति ऐसी होती है कि वे हमेशा शांत रहते हैं और कुछ हमेशा अशांत। ईश्वर ने अन्य जीवों की अपेक्षा मनुष्य को अद्भुत शक्ति से नवाजा है। हम अपने मन के मंदिर में किसी भी विचार को प्रतिष्ठित कर सकते हैं। हमारे विचार ही ये निर्धारित करते हैं कि हम जीवन में कितना शांत और निश्चिंत रहेंगे अथवा चिंतित।

जब भी किसी मनुष्य के मन में उठी इच्छा की पूर्ति होती है तो परम आनंद को प्राप्त होता है, पर वह भूल जाता है कि यही इच्छापूर्ति उसके मन में एक और उससे बड़ी इच्छा जागृत करके उसके चित्त को अव्यवस्थित कर देगी। मनुष्य के विचारों में भी भिन्नता होती है। एक ही कार्य के प्रति दोनों का नजरिया अलग- अलग हो सकता है। ऐसे में दोनों ही एक- दूसरे को हानि करने के लिए तत्पर हो जाते हैं और अपने चित्त की शांति को खो बैठते हैं। ऐसी स्थिति में जिसकी हानि होती है, वह तो दुखी होता ही है परंतु जो लाभ में रहता है, वह भी हारे हुए पक्ष की ओर से आने वाली संभावित प्रतिक्रिया से हर समय चिंता में डूबा रहता है और इस तरह से क्रोध भी व्यक्तियों को पीड़ित करने का काम करता है।

शांति प्रार्थना से नहीं मिलती। यह सकारात्मक विचारों की एक स्वाभाविक परिणति है। आपने देखा होगा कि प्रतिकूल परिस्थितियों में एक व्यक्ति शांत रहता है और दूसरा अशांत हो जाता है। शांत रहने वाला मनुष्य दूसरों के अप्रिय व्यवहार से अपनी शांति को भंग नहीं होने देता। हम जिन धारणाओं को, मान्यताओं को अपने मन में सहेज कर रखेंगे और पोषित करेंगे, कालांतर में वही धारणाएं और मान्यताएं हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करेंगी।

आपने देखा होगा कि एक ही घटना को दो व्यक्ति भिन्न- भिन्न प्रकार से ग्रहण करते हैं। जिनका चिंतन सकारात्मक है, वे दुख को सुख, अभाव को भाव, अशांति को शांति और अंधेरे को प्रकाश में बदलने का माद्दा रखते हैं और जो इस तरह की कला जानते हैं, उन्हीं का जीवन सार्थक होता है। वही अपने जीवन में शांति स्थापित कर सकते हैं। शांति परिस्थितियों को ठीक करने से नहीं मिलती बल्कि सकारात्मक विचारों के साथ जीवन की सत्यता को स्वीकार करने से मिलती है।

जब मन में शांति के फूल खिलते हैं तो कांटो में भी फूलों का ही दर्शन होता है। जब मन में अशांति के कांटे होते हैं तो फूलों में भी चुभन और पीड़ा का अनुभव होता है। मन चंचल होता है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है इसलिए जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करें। किसी भी स्थिति में धैर्य न खोएं। अपने विचारों के अनुरूप ही कर्म करें। कर्म के अनुसार ही हमें फल की प्राप्ति होगी। शांति का स्रोत हमारे अंतर्मन में विद्यमान है। बस उसे जानने की, पहचानने की आवश्यकता है।

282. सत्यता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जिस प्रकार बीज की यात्रा वृक्ष तक है, नदी की यात्रा सागर तक है, जन्म की यात्रा मृत्यु तक है, उसी प्रकार मनुष्य की यात्रा परमात्मा तक है, यही सत्यता है। इसको कोई नकार नहीं सकता। यह सत्य है कि परमात्मा की निकटता पाने के लिए हमारे भीतर सत्य का भाव होना जरूरी है। इसके लिए परमात्मा के नाम का सहारा लेना ही एक उपाय है। कोई भी परमात्मा का नाम, जिसमें आप श्रद्धा रखते हैं, जो आप के आराध्य हैं, जो आपके हर श्वास में समाहित हैं, उस परम सत्ता के नाम का सहारा ही आपकी जीवन यात्रा को कुशलतापूर्वक पार लगा सकता है।

विनोबा भावे ने एक बार कहा था कि— दो धर्मों के बीच कभी झगड़ा नहीं होता। झगड़ा सदैव दो अधर्मों के बीच होता है। धर्म के नाम पर झगड़े होने का कारण यह है कि— हम दूसरे के सत्य को कुबूल नहीं करते। मैं जो कुछ कह रहा हूं, वही सत्य है, वही सही है। दूसरे का सत्य सही नहीं है। यही भावना मनुष्य को असत्य बोलने पर विवश करती है। हमें इस मानसिकता को छोड़ना होगा। हमें अपने सत्य को विनम्रता से पेश करना चाहिए। उसे जबरदस्ती किसी पर थोपने की जिद नहीं करनी चाहिए। मेरे पास गाड़ी है, यह मेरा सत्य है। दूसरे के पास बाइक है, यह उसका सत्य है। आकाश में सूरज है, यह सब का सत्य है। रात के बाद दिन निकलता है, अंधेरे के बाद उजाला, सुबह के बाद शाम, ये सृष्टि का सत्य है। अगर सभी सत्य स्वीकार कर लिए जाएं तो विवाद की गुंजाइश ही नहीं रहेगी।

मैं सत्यता को एक सच्ची घटना के माध्यम से प्रस्तुत करती हूं—
रामायण में जब रावण, माता सीता का हरण करके आकाश मार्ग से जा रहा था, उस समय माता की चीख-पुकार सुनकर जटायु उन्हें बचाने के लिए दौड़ा। रावण के साथ युद्ध करने में गिद्धराज जटायु काफी कमजोर और असहाय था, लेकिन फिर भी वह रावण से भिड़ गया और उससे युद्ध करने लगा। अपनी इस सत्यता को जानते हुए भी कि मैं रावण का मुकाबला करने में समर्थ नहीं हूं, फिर भी माता सीता को बचाने के लिए अपने प्राणों को संकट में डाल दिया। जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले तो काल आया और जैसे ही काल आया, गिद्धराज जटायु ने मौत को ललकार कर कहा —

खबरदार! ऐ मृत्यु! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना। मैं मृत्यु को स्वीकार तो करूंगा— लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती, जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु श्री राम को नहीं सुना देता। मौत उन्हें छू नहीं पा रही है— कांप रही है, खड़ी होकर———।
मौत तब तक खड़ी रही, कांपती रही, जब तक श्री राम माता सीता की खोज करते हुए वहां तक नहीं पहुंचे। जब श्रीराम वहां पर पहुंचे तो जटायु अंतिम सांस गिन रहा था। तब श्री राम ने जटायु से उसकी इस हालत के बारे में जानना चाहा तो जटायु ने कहा— रावण, माता सीता का हरण करके ले जा रहा था। तब मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। एक नारी का अपमान होता देख कर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने रावण को युद्ध के लिए ललकारा। जबकि मुझे पता था कि मैं रावण से जीत नहीं सकता, लेकिन फिर भी मैं लड़ा। यदि मैं नहीं लड़ता तो आने वाली पीढ़ियां मुझे कायर कहती।

श्री राम ने जटायु को अपनी गोद में उठा लिया और काल भी खड़ा होकर देखता रह गया। ये सत्य का फल है जो जटायु को सत्य का साथ देने पर मिला। उसे भगवान श्री राम की गोद प्राप्त हुई।

दूसरी तरफ महाभारत में भीष्म पितामह हैं जो बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे।— आंखों में आंसू हैं—रो रहे हैं— भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं।

कितना अलौकिक है, यह दृश्य— रामायण में गिद्धराज जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं—प्रभु श्री राम रो रहे हैं और जटायु हंस रहे हैं।

वहीं महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान श्री कृष्ण हंस रहे हैं।

दोनों में भिन्नता सत्यता की है। जटायु ने सत्य का साथ दिया तो उसे अन्त समय में प्रभु श्रीराम की गोद की शय्या मिली। मृत्यु भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाई और हाथ बांधकर उसके सामने खड़ी होकर कांपती रही और उसकी हां का इंतजार करती रही।

लेकिन भीष्म पितामह को असत्य का साथ देने की वजह से मरते समय बाणों की शय्या मिली। इच्छा मृत्यु का वरदान मिला होने के कारण भी भीष्म पितामह मौत का इंतजार करते रहे। क्योंकि वह सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे थे। जटायु अपने सत्य रूपी कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है—प्रभु श्री राम की शरण में है। जबकि बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह की आंखों से अश्रुधारा बह रही है।——

ऐसा इसलिए हो रहा था कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रोपदी की इज्जत को लूटते हुए देखा था— विरोध नहीं किया था।
दुशासन को ललकार देते— दुर्योधन को ललकार देते— लेकिन द्रोपदी रोती रही— बिलखती रही— चीखती रही— चिल्लाती रही —लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे— नारी की रक्षा नहीं कर पाए।

उसका परिणाम यह हुआ कि—इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली। समर्थ होते हुए भी नारी का अपमान होते हुए देखा। ऐसी दुर्गति तो होनी ही थी।

जटायु ने नारी का सम्मान किया—समर्थ न होते हुए भी अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हो गया।

यही सत्यता की परिभाषा है।

जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेता है। सत्य का साथ नहीं देता, उसकी गति भीष्म जैसी होती है। जो अपना परिणाम जानते हुए भी, औरों के लिए संघर्ष करता है, उसका अंत जटायु जैसा होता है कि भगवान स्वयं अपनी गोद में लेकर रो रहे होते हैं। इसलिए हमें सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए।

सत्य परेशान जरूर करता है, पर पराजित नहीं होता। रामायण में ऐसे कई उदाहरण हैं, जो सत्य की परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं। माता सीता ने रावण का डटकर और निडरता से सामना किया। अनेक प्रलोभन देने के बावजूद भी वह अपने धर्म से विचलित नहीं हुई, उसने सत्य का साथ दिया।

फिर माता की खोज में जब हनुमान लंका गए तो रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवा दी। उसके बावजूद भी हनुमान डरे नहीं, अपने सत्य पर अडिग रहे। ऐसे बहुत से उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है, जो सत्य के पथ पर चलकर एक मिसाल बन गए। सत्य को जीवन में मन, वचन और कर्म से स्वीकार करने वाला व्यक्ति ही सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठा एवम् सम्मान का अधिकारी बनता है।

जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा अपने मन में हो, उसको वैसा ही कहना और स्वीकार करना सत्य कहलाता है। परंतु वह सत्य मधुर और परोपकारक होना चाहिए।

शास्त्रों में कहा है—
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्”— सदा सत्य बोलें, प्रिय बोलें।

इसलिए सत्य बात भी मधुर शब्दों में कहने पर ही सुख देती है।
महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार— सत्य बोलना अच्छा है परंतु सत्य से भी हितकारी वचन बोलना श्रेष्ठ है। जिससे प्राणियों का वास्तविक हित या भलाई होती हो, वही सत्य है। जिस सत्य को बोलने से किसी निरपराध प्राणी को कष्ट या उसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़े, वह सत्य न होकर पाप ही माना जाता है। यदि आपके सत्य बोलने से किसी व्यक्ति का भला नहीं होता हो तो उसे नहीं बोलना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि बिना अवसर के सत्य को सबके सामने प्रकट किया जाए। सत्य सदा सरल होता है। सत्यता में किसी प्रकार का छल-कपट और कुटिल व्यवहार नहीं होता।

जिस बात को कहने से मन में निर्भीकता बनी रहे, मन में संकोच, भय, लज्जा के भाव नहीं आएं और उत्साह बना रहे, वह सत्य है। परमात्मा ने सत्य में श्रद्धा और झूठ में अश्रद्धा को स्थापित किया है। सत्यवादी को किसी प्रकार का भय नहीं होता। आत्मा की आवाज को दबाकर सत्य के स्थान पर असत्य बोलना महापाप है। ईश्वर सत्य की सदा रक्षा करता है। मन, वचन और कर्म में सत्य की पूर्ण प्रतिष्ठा होने पर व्यक्ति जो कुछ वाणी से कह देता है, उसका वह वचन पूरा होता है। एक और अश्वमेघ यज्ञ के फल को तराजू के पलड़े में रखें और दूसरी और सत्य को रखने पर, सत्य का पलड़ा ही भारी रहेगा।