अनुच्छेद

176. सेवा भाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक कहावत है— “सेवा स्वयं में पुरस्कार है” जो खुशी और आनंद की प्राप्ति हमें दूसरों की सेवा से मिलती है, उसे लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं पाया जा सकता।

ईश्वर ने मनुष्य को सेवा भाव से परिपूर्ण बनाया है। आज कोरोना वायरस के कारण हम सब आपदा से जुझ रहे हैं तो ऐसे समय में मानवता की पुकार यही सेवा भाव है। यह दौर कठिन अवश्य है लेकिन इसमें हमें अपनी विशेषताओं को उजागर करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे की मदद करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे के साथ खड़े होकर, साथ निभाकर इस कोरोना काल को मात दे सकते हैं। आज जब हम अपनों को खो रहे हैं तो ऐसे में संवेदना के दो बोल और साथ रहने का भरोसा ही सच्ची सेवा भाव है।

आज हमें अपने भीतर सेवा भाव को जगाने की आवश्यकता है। ऐसे समय में एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए चिंतन करना आवश्यक है। प्रकृति ने हमें अपने जीवन पर चिंतन करने का अवसर प्रदान किया है। जीवन शास्वत है, हमने इस सच्चाई पर कभी विचार ही नहीं किया, पर हमें समय के साथ बदलना चाहिए। हमारे जीवन का सत्य क्या है?

यह सत्य है कि— मेरे अंदर एक ऐसा तत्व है, जो कभी नष्ट नहीं होता, जो कभी कम नहीं होता, जो अमर है।

गीता में कहा गया है कि— शरीर मरता है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। वही आत्मा तो हम सब में अमर है। यदि इस समय हम इस पर थोड़ा-सा ध्यान दें लें तो निर्भीक हो जाते हैं और हमारा जीवन मुश्किल समय में भी थोड़ा- सा आसान और सरल हो जाएगा। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेंगे तो सभी बदलावों को स्वीकार करने लगते हैं और शुभ बदलावों के लिए प्रेरित होते हैं।जब हम सब में भी बदलाव लाते हैं तो हमारे भीतर से मुस्कान खिल जाती है। यदि इस समय हम खुद को बदल ले तो हम अपने समाज और दुनिया को बदल सकते हैं।

लोग अक्सर कहते रहते हैं कि—भगवान जाने अब क्या होगा? तो मेरा उनसे कहना है कि— ऐसे नकारा विचारों को अपने आसपास में न फटकने दें। अपने ईश्वर पर विश्वास रखें। जब आप एक बार ईश्वर में विश्वास कर लेते हैं तो डगमगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। क्योंकि एक बार जब आप रेलगाड़ी में सवार हो जाते हैं तो जान लेते हैं कि आप गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। यह तो निश्चित है।

इस समय हमने अपनी इच्छाओं के बारे में न सोच कर, दूसरों की इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति विकसित करनी होगी। हमारी जो इच्छाएं हैं, उन्हें ईश्वर पर छोड़ दें, इस विश्वास के साथ की वे अवश्य पूरी होंगी। हमें कुछ नहीं चाहिए, जब हम यह तय कर लेते हैं तो अंदर से मजबूत हो जाते हैं और जब अंदर से मजबूत हो जाते हैं, तब हम किसी से कुछ भी कहेंगे तो वह आशीर्वाद बन जाएगा।

175. ईश्वर की खोज

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

स्वामी विवेकानंद—

अपने जीवन में जोखिम लो। जीतोगे तो नेतृत्व करोगे, यदि हारोगे तो दूसरों का, जीतने के लिए मार्गदर्शन करोगे।

जो भी मनुष्य अध्यात्म में विश्वास करता है, उसका एक ही लक्ष्य होता है— ईश्वर की खोज।
यह उस मनुष्य का आत्मिक लक्ष्य है लेकिन ईश्वर के बारे में एक दिन में नहीं जाना जा सकता। उसे निरंतर प्रयास करना होगा। शुरुआत उसे स्वयं की खोज यानी आत्मसाक्षात्कार से करनी होगी। उसे स्वयं को जानना होगा। अपनी सभी इच्छाओं का त्याग करते हुए, मैं व मेरा की लालसा और भावना से मुक्त होने के बाद ही उसे अपार शांति की प्राप्ति होगी जो उसे ध्यान की अवस्था में ले जाने के लिए सहयोगी बनेगी। ध्यान के द्वारा ही हम ईश्वर की खोज कर सकते हैं।

यदि कोई मनुष्य सांसारिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है तो सभी सगे- संबंधी उसका हौसला बढ़ाते हैं। वहीं यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कहे कि— वह परमात्मा की खोज करने जा रहा है तो कोई भी उसका उत्साहवर्धन करने नहीं आएगा बल्कि उसका मजाक बनाया जाएगा। लेकिन ईश्वर की खोज जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि ईश्वर का साथ पाकर ही मनुष्य इस आगमन के चक्कर से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार एक चित्रकार कपड़ों पर लगे दागों को बड़ी खूबसूरती से फूल का रूप दे देता है, वैसे ही हर मनुष्य को ईश्वर के सानिध्य की आवश्यकता होती है। ईश्वर का सानिध्य पाकर उसका जीवन पुष्प की भांति सुगंधित हो जाता है।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि— ईश्वर की खोज के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पड़ता, अपने शरीर को भी तपाने की आवश्यकता नहीं है। बस हमें ध्यान की गहराइयों में उतरना होगा। अपनी चेतना का विकास करना होगा। आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई किसी चीज में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है, तब उसमें सतत् सुधार के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है। यही विकास है। लेकिन जब हम आंतरिक विकास की बात करते हैं तो चेतना के विकास की बात होती है।

हमारे मानव शरीर की संरचना में शरीर, मन और आत्मा है।
जो हमारा स्थूल शरीर है, वह भौतिक पदार्थों से निर्मित है।
जबकि जो सूक्ष्म शरीर है, उसमें ऊर्जा व स्पंदन है। जिसे हम मानस कहते हैं।
और हमारा जो तीसरा शरीर है। वह कारण शरीर है। जो आत्मा है। जो हमारे अस्तित्व का आधार है।

स्थूल शरीर ज्यादा विकसित नहीं होता है।
आत्मा भी अपरिवर्तनीय है। जब हम एक बेहतर मनुष्य बनना चाहते हैं तो हम सूक्ष्म शरीर का विकास करते हैं। हम सूक्ष्म शरीर के चारों तरफ मौजूद परतों को हटाकर उसका शुद्धीकरण करते हैं जो ध्यान की गहराइयों में उतर कर ही संभव है।

हमारे सूक्ष्म शरीर के चार प्रमुख कार्य हैं—
चित्त यानी चेतना।
मनस यानी सोचना।
प्रज्ञा यानी बुद्धि और अहंकार।
ये सब मिलकर मन को बनाते हैं। हमारी चेतना अपने आप विकास को प्राप्त नहीं करती। यह विचार, बुद्धि व अहंकार की मदद से विकसित होती है। बुद्धि, विवेक में और सोच, अनुभूति में विकसित होती है।
अहंकार प्रेम में, निस्वार्थता में रूपांतरित हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप चेतना स्थिर व संकीर्ण अवस्था से गतिशील व सार्वभौमिक हो जाती है।

चेतना के विकास और विस्तार में अगर कोई सहायता करता है तो वह है— ध्यान की अवस्था। ध्यान के माध्यम से ही मनुष्य सूक्ष्म शरीर से उसकी सभी जटिलताओं को हटाकर, उसके रूपांतरण को संभव बनाते हैं, जिससे मन शांत हो जाता है। शांति और संतोष से रहने की कला जिसे आती है, वह ही चेतना का विकास करने में सफल होता है। बेचैन और अशांत मन मनुष्य को ध्यान की अवस्था में नहीं जाने देता।

एक परेशान व बेचैन मन तूफानी समुंद्र की तरह होता है जो इच्छाओं, कामनाओं, चिंताओं,भयों और आदतों द्वारा अनेक दिशाओं में खींचता रहता है और हमेशा अशांत व असंतुलित रहता है। वह माया रूपी विभिन्न प्रवाहों में बहकर बिखर जाता है। जबकि एक नियंत्रित व संतुलित मन केंद्रित रहता है और उससे सब का कल्याण होता है।

जब मनुष्य ध्यान करता है, तब मन अधिक शुद्ध सहज व हल्का बन जाता है और हमारी चेतना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उस समय मनुष्य अपने आंतरिक सामर्थ्य को उजागर कर पाता है। एक समय ऐसा आता है कि— ध्यान के फलस्वरूप प्राप्त ध्यानमयी अवस्था को पूरे दिन बनाए रखने की कला में माहिर हो जाते हैं। तत्पश्चात् हमारी चेतना जटिलताओं, प्रतिक्रियाओं और भावनाओं से अशांत नहीं होती। ऐसी शांतिपूर्ण अवस्था में विवेक विकसित होता है और हम अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग करते हैं। ऐसी अवस्था प्राप्त करने के बाद मनुष्य सभी कार्यों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है।

ईश्वर की खोज की यात्रा में एक मोड़ ऐसा आता है, जिसे हम प्रज्ञा कहते हैं यानी बुद्धि विकसित होती है। यदि कोई प्रज्ञा पूर्ण हो जाता है तो वह सुख-दुख, स्वर्ग- नरक, सफलता- विफलता से मुक्त हो जाता है। वह प्रज्ञा की मदद से अपने लक्ष्य में स्थित हो जाता है। प्रज्ञा व्यक्ति को सूक्ष्म दृष्टि देती है। यह दृष्टि ही उसे सत्य जानने की प्रेरणा देती है।

यह भी संभव है कि सत्य की तलाश अलग-अलग रास्तों से हो लेकिन अंत में जो समझ प्राप्त होती है, वह एक जैसी ही होती है। इसी समझ से व्यक्ति को अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। इसी रास्ते पर चलने के बाद ही उसे मौन, कैवल्य, मोक्ष, समाधि मुक्ति और निर्माण की अनुभूति होती है। ऐसी अवस्था में पहुंचने के बाद कभी-कभी नकारात्मकता भी बहुत हावी हो जाती है लेकिन उस समय सकारात्मक रहना होगा। सकारात्मकता के पथ पर चल कर ही मनुष्य ईश्वर की खोज की यात्रा को पूर्ण करने में सफल होता है।

174. संजीवनी बूटी— योग और ध्यान

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि— हे अर्जुन योग में स्थित होते हुए सभी कर्मों को करोगे तो सफलता अवश्य मिलेगी।

योग का अर्थ है— संतुलन या संयम अर्थात् आहार, विहार, वाणी, व्यवहार और विचार पर स्वयं का नियंत्रण होना चाहिए।

अगर हमारे आचरण में अनुशासन होगा तो हम जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान सरलता से कर सकते हैं।

“योगो भवति दु:खहा” यानी योग ही हमारी सारी समस्याओं का निदान है। योग और ध्यान जीवन के लिए रामबाण हैं। संजीवनी बूटी हैं।
वर्तमान संकट के दौरान अगर देखा जाए तो स्वस्थ और सुखी रहने का महत्वपूर्ण मंत्र है— योग और ध्यान।
योग करने से शरीर स्वस्थ रहता है और ध्यान करने से मन प्रसन्न हो जाता है। मनुष्य की सबसे बड़ी अभिलाषा भी यही है कि— जीवन सुखी एवं खुशहाल रहे।
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए योग का काफी महत्व है। यह ऊर्जा को बढ़ाता है। योग करने से हमारा शरीर हर प्रकार के वायरस से लड़ने में सक्षम हो जाता है।
ऐसा देखा जाता है की चुनौतीपूर्ण समय में ज्यादातर मनुष्य, जीवन के सरल पहलुओं को भी संभालने में स्वयं को असमर्थ समझते हैं। एक भय का वातावरण बना रहता है क्योंकि मृत्यु की निकटता उन्हें पूरी तरह लाचार महसूस करवाती रहती है।
कोरोना जैसे वायरस का शारीरिक क्षति पहुंचाना एक अलग बात है लेकिन इसके संपर्क में आने के बाद जो मानसिक और भावनात्मक स्तर पर क्षति होती है, उसके बचाव के लिए हमें भरपूर ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकता होती है। इसलिए ऐसे समय में हमें योग और ध्यान का सहारा लेना चाहिए।
मनुष्य दो तरह के कष्टों से गुजरता है— शारीरिक और मानसिक।
योग से आप शारीरिक कष्ट से मुक्ति पा सकते हैं और ध्यान से मानसिक पीड़ा को दूर किया जा सकता है क्योंकि ऐसे समय में शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाकर रखना पड़ता हैं।

योग के अनेक लाभ हैं लेकिन सबसे प्रमुख है— अच्छा स्वास्थ्य।
यह हमें तनाव मुक्त जीवन जीने की कला सिखाता है। यह सिर्फ व्यायाम नहीं है बल्कि हर एक परिस्थिति में हमें कुशलता से कर्म करना सिखाता है। तनावपूर्ण परिस्थितियों में रहते हुए भी मुस्कान बनाए रखना योग का उद्देश्य है। योगाभ्यास से आप सर्वोच्च सत्य ज्ञान के लिए तैयार हो जाते हैैं। दुखी हैं तो यह दुख से बाहर ले जाता है। बहुत बेचैन हैं तो योग आपके अंदर धैर्य लाता है।

यह तो सभी को पता है कि— हमारे कर्म ही हमारे सुख-दुख के कारण होते हैं। जब हमारे कर्म अच्छे होते हैं, तब हमें सुख मिलता है और जब हमारे कर्म बुरे होते हैं, तब हमें दुख की प्राप्ति होती है। जीवन में अधिक जिम्मेदार बनाने में योग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसे ही कर्म योग कहा जाता है।

योग अधिक ऊर्जा और उत्साह पैदा करता है। यदि हमारे पास पर्याप्त उत्साह और ऊर्जा है तो निश्चित मानिए कि हम अधिक जिम्मेदारी लेंगे और कभी उनका भार महसूस नहीं होने देंगे।

योग की एक अन्य परिभाषा है कि— दृश्य से द्रष्टा भाव में आना यानी बहीर्मुखी से अंतर्मुखी बनना।

पहले भौतिक शरीर से अपने ध्यान को मन की ओर ले जाना। मन में उत्पन्न विचारों को साक्षी भाव से देखने से वह भी दर्शक बन जाते हैं। हम उस तत्व तक पहुंच जाते हैं जो सब कुछ देख रहा है। यही योग है और ध्यान की अवस्था भी है। जब भी हम ध्यान की अवस्था में पहुंचकर खुशी, उत्साह, परमानंद और सुख का अनुभव करते हैं तो जाने अनजाने में उस परमात्मा से संपर्क स्थापित करने में थोड़े बहुत सफल अवश्य हुए हैं। योग और ध्यान के माध्यम से हम उस परम तत्व का अनुभव सहजता से कर सकते हैं।

योग से हम आंतरिक सौंदर्य को निहारना सीख सकते हैं। जब हम आंतरिक सौंदर्य को निहारना सीख जाते हैं, तभी हमें बाहरी सौंदर्य का अहसास होता है जो योग और ध्यान में अपना समय निवेश करते हैं, उन्हें बाहरी दुनिया में भी अद्भुत सौंदर्य दिखाई देने लगता है।

हमारे चारों तरफ सौंदर्य बिखरा पड़ा है। खूबसूरत पेड़ हैं, सुहावने बादल हैं, प्रकृति ने हमें ऐसे सुंदर- सुंदर फूल दिए हैं, जिनको हम कभी देखते ही नहीं। ऐसा- ऐसा सौंदर्य भरा पड़ा है, जिसे हमने कभी देखने की कोशिश ही नहीं की। हम तो अपनी ही परेशानियों, समस्याओं, इच्छाओं और चिंताओं में जरूरत से ज्यादा व्यस्त रहते हैं। हमने कभी किसी सूर्योदय या सूर्यास्त को नहीं निहारा।

सच तो यह है कि हमने पहले कभी बाहरी सौंदर्य की कद्र ही नहीं की लेकिन जब हमारे अंदर आंतरिक सौंदर्य की उपस्थिति होती है तो हमें बाहरी सौंदर्य का भी एहसास होने लगता है। देखा जाए तो सौंदर्य वस्तुओं, तस्वीरों, कहीं किसी सूर्यास्त अथवा किसी सुंदर फूल पर निर्भर नहीं करता। उस सौंदर्य का आगमन तभी होता है जब अगाध प्रेम, करुणा हमारे भीतर मौजूद हो। जब हम अंदर से मजबूत होते हैं, तभी हमें बाहरी सौंदर्य अच्छा लगता है क्योंकि जब तक हम अंदर से खुश नहीं होंगे, तब तक हमें सौंदर्य का प्रगाढ़ अहसास नहीं होगा और जब तक अहसास नहीं होगा तब तक हमें सौंदर्य कभी दिखाई नहीं देगा क्योंकि जब तक इच्छा प्रबल नहीं होगी, तब तक सब झूठ लगता है। जब अंदर से आंतरिक सौंदर्य का एहसास होता है, तभी इच्छाएं पनपती हैं और तब जब इच्छा होती है, तब हमें प्रकृति की हर वस्तु सुंदर लगती है।

यह सब कुछ होता है योग और ध्यान से। इसलिए योग और ध्यान के माध्यम से स्वयं को तराशें। संकट के समय योग और ध्यान से ही हम जीवन को सुखी बना सकते हैं। यही एक मार्ग है जो हमें नीरोगता के पथ पर ले जाता है।

मैं यह बिल्कुल भी नहीं कह रही कि— आप योगी बनें। भले ही आप योगी न बने लेकिन इस संकट के समय सहयोगी और उपयोगी अवश्य बनें। अपनी चिंता को एक किनारे रख कर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से अपने को उन्नत अवश्य करें।

स्वामी विवेकानंद—
योग वह विज्ञान है जो हमें चित्त की परिवर्तनशील अवस्था से निरुद्ध कर उसे वश में करने की शिक्षा देता है।

173. मौन से करें संवाद

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मौन से अभिप्राय यह नहीं है कि— हम सिर्फ वाणी से चुप हो जाएं और बोलना बंद कर दें यानी वाणी को लगाम लगा लेना मौन की श्रेणी में नहीं आता। सच्चा मौन तो विचारों से मुक्ति है। मौन रहकर मनुष्य अपने अंदर झांकता है। जिससे वह अपनी अंतरात्मा से संवाद करता है, उस को जाग्रत करने की कोशिश करता है।

अंतरात्मा या यह कहें कि—आत्मा को जागृत करने की कोशिश करता है, जो सुप्तावस्था में है। आत्मा जो अजर- अमर है। अगर एक बार उसका अपनी आत्मा से संपर्क हो गया तो समझो उसने परमतत्त्व ईश्वर के साथ साक्षात्कार कर लिया।

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है की— बोलो या न बोलो, कहीं भी रहो, यदि तुम्हारा मन 24 घंटे ईश्वर के ध्यान में लगा हुआ है और प्रसन्न है तो वही मौन है। फिर गाओ तो भी मौन और चुप हो जाओ तो भी मौन। मन प्रसन्न है, तब खुशी मनाओ तो भी मौन और एकांत में बैठ जाओ तो भी मौन। ध्यान देना, कुछ नहीं करने की अवस्था नहीं बल्कि होने की अवस्था का नाम मौन है।

इससे यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि— श्री कृष्ण स्वयं यह कहते हैं की वाणी को लगाम देना मौन नहीं है बल्कि पूरा समय ईश्वर में ध्यान लगाना मौन की अवस्था को प्राप्त करना है। बहुत सारे ऋषि-मुनियों ने मौन को धारण किया। उन्होंने अपने जीवन का बहुत लंबा समय मौन रहकर या पहाड़ों, गुफाओं में एकांत अवस्था में रहते हुए व्यतीत किया और उस परमात्मा से अपने आप को एकाकार किया। लेकिन हमने मौन को केवल चुप रहना ही समझ लिया। हम अकेले बैठ जाते हैं और बोलना बंद कर देते हैं, यही मौन की परिभाषा है। लेकिन वास्तव में मौन ऐसा नहीं है। मनुष्य अकेला बैठता है तो उसके दिमाग में विचार ही विचार आते रहते हैं। हम अपनी जुबान पर तो रोक लगा सकते हैं लेकिन विचारों पर रोक लगाना हमारे सामर्थ्य से बाहर है। लेकिन जब किसी सिद्ध पुरुष के सानिध्य में बैठे हैं तो मन की हलचल स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं और हमें शांति महसूस होने लगती है।

मेरा मानना है कि यदि मनुष्य अपने जीवन में कुछ समय सिर्फ अपनी जुबान पर लगाम लगा ले तो वह भी, भले ही कुछ समय ही सही, मौन धारण तो कर ही सकता है। क्योंकि जिसको देखो, उसको सुनाने की लगी रहती है। वाणी पर बिल्कुल भी कंट्रोल नहीं है। बहुत ज्यादा बोलते हैं। अगर मौन धारण करेंगे तो कम बोलेंगे और कम बोलेंगे तो ज्यादा झूठ नहीं बोलेंगे। एक तो वह झूठ बोलने से बचेंगे और दूसरा किसी की निंदा करने से बचेंगे। इससे एक तो यह फायदा होगा कि उनमें सच बोलने की भावना पनपने लगेगी और दूसरा उनमें मौन रहने की क्षमता भी विकासित हो जाएगी।

बहुत से मनुष्य ऐसे भी हैं जो यह दावा करते रहते हैं की हम सिर्फ मौन की भाषा ही समझते हैं। वास्तव में देखा जाए तो मौन को समझने की आवश्यकता ही क्या है? मौन कोई समझने की भाषा नहीं है। कोयल की कुहू- कुहू कोई समझने का विषय है। नदी के कल- कल को क्या भाषांतर की जरूरत है। चांद धीरे-धीरे निकलता है, उसे समझने की जरूरत नहीं है, उसे देखना ही पर्याप्त है। हवा की सरसराहट क्या कोई समझ पाया है, उसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है। इसी तरह मौन है, इस का आनंद लो। शब्दों में सब कुछ नहीं कहा जा सकता।

मौन को समझने के लिए कोई साधन नहीं है और उसे समझने की चेष्टा भी नहीं करनी चाहिए। बस अपने आप को मौन में उतारने की आवश्यकता है। ध्यान देना, कुछ नहीं करने की अवस्था नहीं बल्कि होने की अवस्था का नाम मौन है। आप एक बार अपने जीवन में मौन रहने की कोशिश जरूर करना। शुरू- शुरू में बाहरी आवाजें बहुत आएंगी क्योंकि हम चुप हो जाते हैं। जब हम बोल रहे होते हैं तो बाहरी आवाजों का हिस्सा होते हैं। अब मौन हो गए तो बाहरी आवाजें हमारे ऊपर हावी होने लगती है। थोड़ा- सा धैर्य रखने की जरूरत है। तत्पश्चात् बाहरी आवाजें कितनी भी हों, शोर कितना भी हो, मौन रखने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लगातार अभ्यास करते रहने से बाहर की आवाजें सुननी बंद हो जाती हैं और अंदर की आवाजें सुनाई देने लगती हैं।

जब हमें अपने ही अंदर की आवाजें सुनने लगें तो हम ध्यान की अवस्था को प्राप्त करने लगते हैं। अनेक प्रकार की आवाजें हमारे अंदर से आने लगती हैं। उस समय डरना नहीं है बल्कि उनको शांत करना है। यह सच है कि उनको शांत करना थोड़ा- सा मुश्किल है परंतु अपने आप पर विश्वास और थोड़ा- सा धैर्य हमें उस अवस्था से भी पार ले जाता है।

उसके बाद मौन की एक और अवस्था आती है कि— अंदर की आवाज आनी बंद हो जाती हैं और हम बिल्कुल शांत हो जाते हैं। एक सन्नाटा छा जाता है और हमारे विचार बंद हो जाते हैं। हम शांत चित्त होकर सिर्फ एक दृष्टा की भांति उनको देखते रहते हैं‌। यही मौन की असली अवस्था है। इस अवस्था में हम अपनी आत्मा से संपर्क करके परम तत्व परमात्मा में एकाकार होने की कोशिश में लग जाते हैं। जब हम उस परम तत्व से संपर्क स्थापित कर लेते हैं तो असलियत में यही मौन है और यही आत्मा की चेतन अवस्था है।

रमण महर्षि कहते हैं कि— भाव विचार शुन्य हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसी सिद्ध पुरुष का हाथ हमारे सिर पर होना बहुत आवश्यक है। उनका होना हमें संतुलित करता है।

मौन एक ऐसी साधना है, जिसमें किसी भी प्रकार का दासत्व एवं अहंकार नहीं होता। मौन रहकर मनुष्य स्वयं को जानने की कोशिश करता है। मौन एक ऐसा समर्पण है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार आता है जो मौन धारण करना सीख लेता है, उसको भक्ति अपने आप आ जाती है। मौन एक प्रकार की भक्ति ही है, जिसमें भक्त मौन रहकर सिर्फ अपने ईश्वर के बारे में विचार करता है। जो मौन धारण कर लेते हैं, उनको सिर्फ नाद मुक्त वीणा की आवाज ही सुनाई देती है। मौन एक ऐसी साधना है जो भक्ति, प्रेम, करुणा और उपासना का संगम है।

भक्ति भाव के इस संगम को प्राप्त करने के लिए मौन सबसे अच्छा माध्यम है‌। मौन साधन भी है और श्रद्धा भी। उत्तम वाणी भी मौन की श्रेणी में आती है। जो मौन की भाषा को समझ गया, वह अपनी वाणी को वश में करना सीख जाता है और जो वाणी को वश में करना सीख जाता है, समझो उसने मौन की भाषा सीख ली है। इसलिए जितनी आवश्यकता हो, उतना ही बोलना चाहिए और यदि बोलना पड़े भी तो सिर्फ सत्य बोलें।

172. जीवन परिवर्तनशील है

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जिस प्रकार प्रकृति में परिवर्तन होता है, कभी गर्मी होती है तो कभी सर्दी, उसी प्रकार जीवन में हर समय परिवर्तन होता रहता है जो निरंतर चलता रहता है। यह कभी नहीं रुकता। सारी सृष्टि परिवर्तनशील है।

डार्विन का एक सिद्धांत है— “सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट” जीवन परिवर्तनशील है, जिसके कारण निरंतर नए प्रकार के जीवन का विकास होता रहता है। जो जीव अपने को समकालीन वातावरण के अनुकूल ढाल लेते हैं, वे जीवन के विकास क्रम में आगे बढ़ जाते हैं और अधिक दिनों तक स्थाई बने रहते हैं। इसके विपरीत जो अपने को वातावरण के अनुकूल नहीं बना पाते, वे जीव जीवन के विकास क्रम में पिछड़ जाते हैं और जीवन की रेस में अपने आप को बनाए नहीं रख पाते हैं।

आज कोरोनावायरस की वजह से हमारी जिंदगी भी परिवर्तित हुई है। हमारे खाने का ढंग बदल गया। हमारा घूमना-फिरना बंद हो गया। जिन्होंने अपने को इस वातावरण में ढाल लिया, वे जीवन में ओर बेहतर करने के लिए आगे बढ़ गए लेकिन बहुत से लोगों की जिंदगी वहीं पर रुक गई, जो नहीं रुके, उन्होंने घर में बंद होकर भी कुछ न कुछ नया किया है।
कहने का तात्पर्य यही है कि— जिनकी जिंदगी रुक गई, उनके जीवन में नकारात्मकता आ गई लेकिन जिसने कुछ करने की ठान ली, वे आज भी सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

सकारात्मक शक्ति के द्वारा हम अपने जीवन में आए हुए इस परिवर्तन को भी आसानी से पार कर सकते हैं। हां यह मुश्किल वक्त जरूर है। आज के समय हम में से प्रत्येक का कोई न कोई अपना हॉस्पिटल में जन्म और मृत्यु के बीच झूल रहा है। कोरोनावायरस ने उनको आई- सी-यू में जाने पर मजबूर किया हुआ है लेकिन फिर भी अच्छे विचार, अच्छी आदतें और अपने आराध्य पर विश्वास हमारे भीतर आशा का संचार करते हैं। जो जीवन की परीक्षा को सही आकार देते हैं। ऐसे भाव जब निरंतर हमारे मानस पटल पर तरंगित होंगे तो स्वाभाविक रूप से हम सब जीवन की परीक्षा को आत्मसात् कर सकेंगे।

आज हमें सिर्फ इतना करना है कि— नकारात्मकता को अपने मन में घर नहीं करने देना चाहिए ताकि जीवन के एक पड़ाव पर सफलता न मिलने से या एक छोटे से वायरस की वजह से हमारे जीवन में जो परिवर्तन हुआ, उसके कारण हमारा संघर्षमय जीवन व्यर्थ न हो जाए। निसंदेह ऐसी निराशा से ऊपर उठना आसान नहीं होगा‌। हमें सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन में कुछ भी स्थाई नहीं है। कभी सफलता आपकी दासी होती है तो कभी असफलता सामने आकर हमें चिढ़ाती है।

प्रकृति का शाश्वत नियम है कि— दोनों स्थितियां एक साथ विद्यमान नहीं रहती। समस्याओं का मुकाबला करने से ही उन पर विजय प्राप्त की जा सकती है। सकारात्मक शक्ति ही नकारात्मकता पर प्रहार कर, हमारे जीवन को सही दिशा देने में सक्षम होती है। हमें यह समझना होगा कि हर प्राणी की तरह, हमने भी अपना जीवन शुन्य से शुरू किया था। समय के साथ अपनी लगन और परिश्रम से उसका फल अवश्य प्राप्त होगा। ठीक है, आज समय हमारे अनुसार नहीं है। इसलिए तमाम प्रयासों के बावजूद सफलता न मिलने पर निराशा और अवसाद के शिकार हो रहे हैं‌। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है
कि समय परिवर्तित नहीं होगा। जीवन यात्रा रूपी पथ पर मनुष्य प्राचीन काल से संघर्ष करता रहा है।
इतिहास साक्षी है कि— सकारात्मक सोच ने ही तमाम साधारण जनों को असाधारण बनाने का कार्य किया है।

171. कर्म योग

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कर्म योग यानी कर्म के द्वारा ईश्वर के साथ योग अर्थात् कर्म करते हुए ईश्वर के साथ एकाकार हो जाना।
अनासक्त होकर किए जाने पर प्राणायाम, ध्यान-धारणा आदि अष्टांग योग या राजयोग भी कर्म योग ही हैं।
संसार में निवास करने वाले मनुष्य यदि अनासक्त होकर सिर्फ ईश्वर में भक्ति रखकर कर्म करें और फल की चिंता न करें तो यह कर्म योग की श्रेणी में आता है।

ईश्वर के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण कर, अपने को सिर्फ ईश्वर का दास समझकर, उसके चरणों में रहते हुए कर्म करना भी कर्म योग की श्रेणी में आता है।
ईश्वर का ध्यान तथा नाम जप करते हुए, स्वयं को समर्पण करके, अपने कर्तव्यों का पालन करना भी कर्म योग कहलाता है।
यह सदैव स्मरण रखें कि—ईश्वर को तुम जो कुछ भी अर्पित करोगे, उसका हजार गुना पाओगे।
इसलिए सब कार्य करने के बाद जलांजलि दी जाती है— श्री कृष्ण को फल समर्पण किया जाता है।

महाभारत के युद्ध के पश्चात् युधिष्ठिर अपने आप को माफ नहीं कर पा रहा था। वह कहीं न कहीं इस युद्ध का दोषी अपने आप को मान रहा था और स्वयं को बहुत बड़ा पापी समझ रहा था। जिसके कारण वह पश्चाताप की अग्नि में धधक रहा था। सभी पांडवों और सगे- संबंधियों ने युधिष्ठिर को पश्चाताप की पीड़ा से बाहर निकालने की बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। आखिर में सभी पांडवों ने अपनी परेशानी श्री कृष्ण के सामने रखी।

श्री कृष्ण ने कहा— बड़े भैया! अपने सभी पापों को मुझे दे दो क्योंकि वैसे भी सभी मुझे युद्ध का दोषी समझ रहे हैं।

युधिष्ठिर को श्री कृष्ण की यह बात अच्छी लगी और एक दिन वह अपने सभी पापों को, श्री कृष्ण को अर्पण करने के लिए जाने लगा, तब भीम ने उन्हें रोककर सावधान करते हुए कहा— बड़े भैया! ऐसा बिल्कुल भी मत कीजिए क्योंकि श्रीकृष्ण को जो कुछ भी अर्पित करेंगे, उसका हजार गुणा आपको प्राप्त होगा।

कलयुग में कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि की अपेक्षा भक्ति योग्य सर्वश्रेष्ठ है परंतु कर्म करना कोई छोड़ नहीं सकता। मानसिक क्रियाएं भी कर्म हैं। मैं विचार कर रहा हूं, ध्यान कर रहा हूं यह भी कर्म है। कर्म अर्थात् आलस्य छोड़ का श्रेष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी जी जान लगा देना। पूजा-अर्चना, अध्ययन, मनन, योग इत्यादि तपस्या रोज कीजिए।
तपस्या का अर्थ यह नहीं है कि— आप अपना घर, परिवार, व्यापार छोड़कर जंगल चले जाएं। आप चाहे कोई भी कार्य करते हो, टीचर हो, प्लंबर हो। कहने का अर्थ यह है कि आप चाहे जो भी कार्य करते हो, उसी भाव से करें। बस आपने तो निस्वार्थ भाव से कर्म करना है। फल की चिंता नहीं करनी।

प्रेम भक्ति के माध्यम से कर्म योग आसान हो जाता है। ईश्वर पर प्रेम भक्ति बढ़ने से कर्म कम हो जाता है और शेष कर्म अनासक्त हो कर किया जा सकता है। वैसे भक्ति का अर्थ भगवान से भीख मांगना नहीं होता। भक्ति तो एक विश्वास, एक प्रार्थना होती है जो हम अपने आराध्य के लिए करते हैं। भक्ति लाभ होने पर धन, मान-सम्मान अच्छे नहीं लगते। मिश्री का शरबत पीने के बाद गुड़ का शरबत भला कौन पीना चाहेगा। ईश्वर में भक्ति के बिना कर्म बालू की भीती की तरह निराधार हैं।

कर्म, भक्ति, ज्ञान के मार्ग, साधक को ध्यान के दरवाजे तक ले जाएंगे तथा ध्यान की दस्तक से ईश्वर का दरवाजा खुल जाएगा। तत्पश्चात् मनुष्य ईश्वर में उसी प्रकार एकाकार हो जाएगा, जिस प्रकार नदी पहाड़ों से निकलती, गिरती, चलती, कूदती आगे बढ़ती रहती है परंतु जैसे ही वह सागर में मिलती है तो उसमें विलीन हो जाती है। जिस प्रकार नदी की यात्रा समुद्र तक है, उसी प्रकार मनुष्य की यात्रा ईश्वर के साथ साक्षात्कार करने तक है। दोनों अपनी यात्रा में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने गंतव्य को प्राप्त करते हैं।

इस धरा पर आने के बाद मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है और वह, यहां की भौतिक वस्तुओं और मोहमाया के जाल में फंस जाता है। जिससे उसका ईश्वर से साक्षात्कार करने का कार्य अधूरा रह जाता है क्योंकि वह मोह माया के बंधन से मुक्त नहीं हो पाता। वैसे देखा जाए तो हम स्वयं सांसारिक बंधनों से बंधे हुए हैं। मनुष्य हर उस बंधन से मुक्ति चाहता है जो उसे बांधता है लेकिन वह, यह कभी नहीं सोचता कि— मैं स्वयं बंधा हुआ हूं। संसार ने हमें नहीं बांधा। हम सब स्वयं इस संसार में बंधे हुए हैं।

एक शिष्य अपने गुरु से कहने लगा कि— संसार के चक्रव्यूह ने मुझे जकड़ा हुआ है। लोगों ने मुझे पूरी तरह से बांधा हुआ है। मैं मुक्ति चाहता हूं पर मुक्त नहीं हो पा रहा हूं। इसलिए हे गुरुदेव! मुझे ज्ञान योग सिखाइए, जिससे मैं इन सांसारिक बंधनों से मुक्त हो सकूं।

गुरु ने अपने शिष्य की बात बड़े ध्यान से सुनी लेकिन कोई जवाब नहीं दिया और उसकी बात को टाल दिया। अगले दिन सुबह-सुबह गुरु और उनका वही शिष्य व्यायाम के लिए जा रहे थे, तभी गुरु महाराज एकदम जाकर पेड़ से चिपक गए और जोर- जोर से चिल्लाने लगे कि—पेड़ ने मुझे बांध लिया है। पेड़ मुझे छोड़ नहीं पा रहा। मुझे पूरी तरह से जकड़ लिया है।

गुरु की यह हरकत देखकर शिष्य बोला कि— गुरु देव! यह आप क्या कह रहे हो? आपको नहीं पता, आप खुद ही बंधे हुए हो। आप स्वयं ही आकर पेड़ पर लिपट गए। पेड़ ने आपको नहीं पकड़ा।

अपने शिष्य की बात सुनकर गुरुदेव जोर-जोर से हंसने लगा तत्पश्चात् शांत होकर कहने लगा— यही तो मैं तुम्हें समझा रहा हूं कि संसार ने किसी को बंधनों में नहीं बांधा बल्कि हम खुद ही संसार के बंधनों में जकड़े हुए हैं। हम स्वयं ही बंधन से मुक्त नहीं होना चाहते।

गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं— हे अर्जुन! तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है, जो कुछ स्वधर्माचरण स्वरूप तप करता है, वह सब मुझे अर्पण कर। अर्थात् मन में कर्ता भाव न लाकर, तू जो भी कर्म करता है, उसके फल की चिंता न कर और अपने कर्तव्य मार्ग पर आगे बढ़।

यहां तो भगवान श्री कृष्ण ने बड़े गजब की बात कह दी है, वे कहते हैं कि— मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों अथवा कर्त्तव्यों को, भगवान को, अर्पण करने को ही सन्यास योग कहते हैं। एक बार, तेरा मन इस सन्यास योग में रम जाए अर्थात् तेरी प्रकृति ऐसी बन जाए कि— तू कर्म तो करे पर उनके फल की इच्छा ना करे अपितु उनके फल को परमात्मा पर छोड़ दे, तू स्वयं को ऐसे मन वाला बना ले कि— हे ईश्वर! मैं तो आपका दास हूं। अच्छा- बुरा, मेरे से जो भी बन पड़ा है, उसे आपको अर्पण कर रहा हूं। आप चाहे जैसा फल दो, वह मुझे स्वीकार है। मैं तो आपकी रजा में ही राजी हूं।
भगवान आगे कहते हैं कि— जब तेरा ऐसा चिंतन, ऐसी प्रकृति अथवा ऐसा मन हो जाएगा, तब तेरे से चाहे शुभ कर्म हों अथवा अशुभ। तुझे उनका फल नहीं भुगतना पड़ेगा और तब तेरा- मेरा मिलन हो जाएगा।

170. आत्मबल की शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय समस्त विश्व वैश्विक महामारी के अत्यंत कष्टदायक दौर से गुजर रहा है। इस स्थिति के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने भौतिक संसाधनों के आकर्षण में आकर अपनी सनातन प्रवर्त्ति को तिलांजलि दे दी है। आज जब एक छोटे से अदृश्य वायरस ने चारों तरफ कोहराम मचा रखा है तो हम अत्यंत दुख और संताप से भरे हुए हैं। हमारे चारों ओर अनिश्चितता और शंकाओं के बादल घुमड़ रहे हैं। हमारा मन द्रवित और व्यथित हो रहा है। अपनों को खोने का डर हमें अत्यंत पीड़ा में डाल रहा है। ऐसे समय में हमें आत्मबल की शक्ति की बहुत आवश्यकता है जो हमें सकारात्मकता प्रदान करती है।

आत्मबल का भाव ही हमें अजेय बनाता है। हमें स्वयं के आत्मबल की शक्ति को जाग्रत करना होगा और साथ-साथ दूसरों के आत्मबल को भी प्रबलता प्रदान करनी होगी। आज सकारात्मक विचारों के प्रभाव को बढ़ाने की बहुत जरूरत है। आज हमें इस अदृश्य शत्रु से लड़ने के लिए आत्मबल की बहुत आवश्यकता है क्योंकि आत्मबल के सहारे ही विपरीत परिस्थितियों को जीता जा सकता है।

जब चारों तरफ अंधकार का साम्राज्य फैला हो, ऐसे समय में आत्मबल का एक छोटा-सा दीया जलाकर उजाला फैलाया जा सकता है। आत्मबल का यह दीया ही अंधकार के साम्राज्य के समूल नाश का कारण बन सकता है। हमारे मन में जो अनावश्यक भय बना हुआ है, वह आत्मबल की ऊर्जा से ही कम हो सकता है और इसी ऊर्जा से हमें निडरता प्राप्त होती है।

आत्मबल की शक्ति ही हमें एक निर्भय भविष्य की दहलीज पर ले जाएगी। इसके सहारे ही हम सुंदर कल के सपने बुन सकते हैं। कल के उल्लास और उत्सावों के स्वागत के लिए विचार कर सकते हैं। महामारी के वीभत्स रूप को देखते हुए अब समय आ गया है कि हम अपने ऋषि-मुनियों द्वारा, जीने की जो कला बताई गई थी उस और लौटें और अपनी सनातन परंपरा को स्वीकार करें। जिसमें हम सूर्य को जल अर्पण और गायत्री मंत्र के जप से दिन की शुरुआत करते थे। जिससे हमारे ऊपर ईश्वर कृपा का वरदान बरसता रहता था।

ईश्वर कृपा का अर्थ सिर्फ पद- प्रतिष्ठा या पैसा ही नहीं है बल्कि शरीर और मन को आहत करने वाली शक्तियों से मुकाबला करने का सामर्थ्य पैदा करना भी है। इसकी कमी से ही रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है।
अगस्त्य ऋषि पर भी जब शत्रु रूपी आतापी नामक दैत्य ने हमला किया था, उस समय वह राक्षस ऋषि के खाद्य पदार्थ में छिपकर एक वायरस के रूप में पेट में चला गया था। उसने जैसे ही ऋषि के पेट में प्रवेश किया, ऋषि समझ गए और फिर योग शक्ति से उसे पेट में ही मारना शुरू कर दिया।

आतापी नामक दैत्य चिल्लाने लगा कि— हे ऋषिवर! मुझे माफ कर दीजिए। मुझे प्राण- दान दीजिए।
यह योग की ही शक्ति है, जिससे हमारे अंदर प्रवेश कर गए अदृश्य वायरस को हम अपने शरीर के अंदर ही खत्म कर सकते हैं। आज इस वायरस की वजह से शरीर में जो ऑक्सीजन की कमी हो रही है, उस कमी को हम अपने आत्मबल की शक्ति से पूरा कर सकते हैं। शरीर में ही हम ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना करते हुए उस वायरस को खत्म कर सकते हैं। योग के द्वारा हम जब अपनी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करेंगे तो इस वायरस की क्या मजाल जो हमें नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए अपनी पुरातन संस्कृति में लौटिये और अपने आत्मबल की शक्ति को पहचानिए, तभी हम एक अच्छा जीवन जी सकते हैं और हर प्रकार के वायरस से बच सकते हैं।

169. साधक और योगक्षेम

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि— भगवान के स्वरूप की प्राप्ति का नाम योग है और भगवान प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम क्षेम है अर्थात् भगवत प्राप्ति हेतु किए गए प्रयासों को ही योगक्षेम की संज्ञा दी गई है। कहने का अर्थ यह है कि— मनुष्य को तो केवल निष्काम भाव से परमात्मा का चिंतन करना है। साधक को अपनी प्राप्ति का साधन तो वह स्वयं बना देते हैं।

एक साधक को साधना में तीन चीजों की आवश्यकता होती है— साधक, साधना और साध्य
यानि भक्त, भक्ति और भगवान।

साधक वे हैं जो साध्य तक पहुंचने के लिए साधना पथ पर अग्रसर हैं।

साध्य वह है, जिसकी प्राप्ति के लिए साधक साधना पथ पर चल रहा है।

साधना वह प्रचेष्टा है, वह सुनियंत्रित संग्राम है, जिससे साधक, साध्य को प्राप्त करना चाहता है अर्थात् साध्य को प्राप्त करने का मार्ग है।

इसी मार्ग का अनुसरण करते हुए बहुत सारे ऋषि- मुनियों और तपस्वियों ने अपने साध्य से साक्षात्कार किया है।

अध्यात्मिक साधना में साधक को अनेक प्रकार की बाधाओं से लड़ना पड़ता है। अपने कुसंस्कार, दुर्गुण सभी को त्याग कर आगे बढ़ना पड़ता है। साधक को साधना में ऐसे ही तपना पड़ता है जैसे सोने को तपा कर कुंदन बनाया जाता है। साधक को सिर्फ अपने लक्ष्य पर ध्यान रखकर निरन्तर लक्ष्य की ओर बढ़ना पड़ता है।

एक साधक को साधना करने के लिए योगक्षेम का सहारा लेना चाहिए। योगक्षेम के बारे में भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं कि— जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करता है, उसका भार में स्वयं वहन करता हूं।

यहां योगक्षेम का अर्थ विद्वान भिन्न-भिन्न बताते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य के अनुसार— अप्राप्त को प्राप्त करने का प्रयास “योग” तथा प्राप्त की रक्षा करना “क्षेम” कहलाता है।

योगक्षेम की उपायदेता जितनी आध्यात्मिक क्षेत्र में है, उससे कहीं अधिक लौकिक क्षेत्र में भी है। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन का योग क्षेम स्वयं वहन करना पड़ता है। संवहन क्या योग से पुरुष और स्त्री तथा पुरुष सिद्धि ही जीवन की सफलता की गारंटी है।

योग क्षेम का एक और उदाहरण हमारे देश के असंख्य वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान कर भारत मां को आजादी दिला कर योग की प्राप्ति तो करा दी, क्षेम तब तक सिद्ध नहीं हो सकता, जब तक देश का प्रत्येक नागरिक सैनिक बनकर अपने क्षेत्र में कर्म निष्ठा प्रमाणित नहीं करेगा।

योग और क्षेम इन दोनों शब्दों का प्राण यदि कोई है तो वह है निष्ठा भाव से किया गया संघर्ष। संघर्ष के बिना ये दोनों शब्द निष्प्राण हैं।

अर्जुन कोई और नहीं हम सब हैं। कुरुक्षेत्र का रण हम सबका जीवन रण है। बात चाहे किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने की हो। संघर्ष के बिना इसकी प्राप्ति की कोई संभावना नहीं है। इसलिए साधक को योगक्षेम का सहारा लेकर अपनी साधना को पूरा करना चाहिए।

168. मर्यादित जीवन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे जीवन में मर्यादा का बहुत ही ऊंचा स्थान है। अगर हम यह कहें कि मर्यादित जीवन ही मनुष्य जीवन है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मर्यादा जीवन रूपी नदी के तट के समान है, जिसको तोड़ने से अपने ही नहीं बल्कि दूसरों के जीवन में भी सैलाब आ जाता है। मर्यादा जीवन की आचार संहिता है, जिसका पालन करते रहने से कोई भी मनुष्य आसानी से जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है।

मर्यादा मानव जीवन का आधार है, जिस पर खड़े किए गए जीवन के प्रसाद को सांसारिक झंझावतों से कोई खतरा नहीं होता। मर्यादा जीवन का संविधान भी है, जिसके सम्मान से समाज का रूप सौंदर्य निखरता है। मर्यादा जीवन जीने का विधान है, जिस पर चलकर जीवन की मंजिल बहुत आसान हो जाती है। मर्यादा लक्ष्मण रेखा के समान है, इसका उल्लंघन, माता सीता की तरह किसी भी मनुष्य के जीवन में केवल अशांति और दुख का कारण बनता है।

मनुष्य कई बार अहंकार वश अपने जीवन की मर्यादा को तोड़ देता है। अगर गौर किया जाए तो मनुष्य की अधिकांश समस्याओं के मूल में उसका अहंकारी स्वभाव ही है। वह अपने धन, कुल, जाति और भोतिक साधनों पर अहंकार करता है। वह प्रत्येक क्षण अधिकाधिक संचित करने तथा बनाए रखने के लिए लालायित रहता है। हालांकि मनुष्य के अहंकार का सबसे बड़ा कारण उसका ज्ञान है और ज्ञान पर अहंकार करना सबसे बड़ी मूर्खता है क्योंकि ज्ञान का प्रकाश ही ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग है और यही सत्य है।

आज के समय मनुष्य का ज्ञान जो पर्वत जैसा दिखाई देता था, वह राई के दाने के बराबर हो गया है क्योंकि आज कोरोनावायरस की चपेट में पूरा विश्व है और वही मनुष्य है, जिसे अपने ज्ञान पर अहंकार था। वह न तो कोई स्टिक दवा ढूंढ पाया है और न बचाव का कोई ठोस उपाय। यह सही समय है कि मनुष्य अपने ज्ञान और कौशल पर अहंकार करना हमेशा के लिए त्याग दें क्योंकि जब मनुष्य अपने ज्ञान पर अहंकार का त्याग करेगा तभी उसे ईश्वर की कृपा से सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होगी। ईश्वर तो ज्ञान का सागर है‌। उसी ने सृष्टि का सृजन किया है और वही उसे चलाने की विधी जानता है। अगर दुःख देता है तो उपहार स्वरूप सुख भी प्रदान कर सकता है।

अगर वह कष्ट देता है तो उससे उभारता भी वही है। ईश्वर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है। किसी को रोगियों की भीड़ में भी निरोग रखे हुए हैं और किसी को चिकित्सकों की भीड़ से भी ले जा रहा है। इससे ज्यादा वह अपनी मोजुदगी कैसे दिखा सकता है? मनुष्य को अपने ज्ञान का इतना अहंकार हो गया था कि— वह ईश्वर के अस्तित्व को ही नकारने लगा था।

आज अपने चारों तरफ दृष्टि दौड़ा कर देखो मनुष्य तो घर में दुबका बैठा है और पक्षी स्वतंत्र आकाश में निर्भय होकर उड़ रहे हैं। ऐसे में करें तो आखिर क्या करें? मनुष्य यह समझने में विफल है। यह संकट कैसे आया और कहां से आया, यह मात्र ईश्वर ही जानता है। हमारे हाथ में तो बस इतना ही है, ईश्वर की इच्छा और योजना को समझें और उसके अनुरूप जीवन को डालें।

आज हम जिस समस्या से जूझ रहे हैं, यह मनुष्य के मर्यादा को तोड़ने के कारण ही आई है। आज पूरे विश्व को जिस महामारी का संकट झेलना पड़ रहा है, वह सब मनुष्य की गलती का ही परिणाम है। अगर कुछ लोग प्रकृति विरुद्ध आचरण न करते तो आज हमें इस महामारी की चपेट में नहीं आना पड़ता। कुछ लोगों की नासमझी के कारण आज पूरे विश्व पर खतरा मंडरा रहा है।

मनुष्य के व्यक्तित्व की ऊंचाई का निर्धारण उसके मर्यादित आचरण से ही होता है। इसके अलावा उसे मापने का कोई पैमाना नहीं है। इसलिए मनुष्य को मर्यादा रखनी चाहिए। रामायण में तुलसीदास ने भगवान श्री राम के मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र को साकार किया है जो युगों- युगों तक लोगों को मर्यादा का पाठ पढ़ाता रहेगा। श्रीराम का प्रत्येक आचरण मर्यादा की सर्वोत्कृष्ट परिभाषा है।

167. मानव की परीक्षा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

समस्त सृष्टि के संचालक ईश्वर, मानव की किसी न किसी रूप में जीवन पर्यंत परीक्षा लेते ही रहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि— वे मानव से अत्यंत स्नेह करते हैं। ईश्वर गुरु के समान हैं तो मनुष्य शिष्य के समान। अज्ञानता के पथ पर भटकते हुए अपने शिष्य के व्यवहार पर ईश्वर को दया आती है। इसलिए वे अपने अनुभव की हथोड़ी से उसके व्यक्तित्व को तराशते रहते हैं। उसे पुचकारते हैं तो फटकारते भी हैं।

उनका पुचकारना और फटकारना, मानव के जीवन में, सुख-दुख, जय-पराजय, लाभ- हानि, यश- अपयश या यूं कहें कि अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों के चक्र के रूप में चलता ही रहता है। मानव हमेशा यही चाहता है कि— उसके जीवन में सदैव अनुकूल परिस्थितियां रहे अर्थात् हमेशा खुशी और आनंद का वातावरण बना रहे और मुश्किल परिस्थितियों का सामना न करना पड़े यानि दुखों के बादल उसके जीवन में कभी न मंडराएं। हर हाल में जीवन को मधुर बना कर रखना चाहता है। परंतु अक्सर ऐसा नहीं होता। परिस्थितियां कभी अच्छी होती हैं और कभी बुरी यानि कभी सुख होते हैं तो कभी दुख। सभी के जीवन में सुख और दुख का यह चक्र निरंतर चलता ही रहता है।

हम में से ज्यादातर मनुष्य इसलिए निराश- हताश हो जाते हैं की संसार में सब कुछ उनके अनुकूल नहीं हो रहा। अक्सर हम यही देखते हैं कि थोड़ी- सी प्रतिकूल परिस्थितियां आते ही हम कहीं अटक जाते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में सुख के वशीभूत होकर भटक जाते हैं। ज्यादातर दुख में तनावग्रस्त हो जाते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं तो सुख में अहंकार उन पर हावी हो जाता है जबकि इसके विपरीत होना चाहिए। मानव को सुख में तो फूलना चाहिए और दुख में घबराना नहीं चाहिए। उसे हमेशा याद रखना चाहिए कि सुख और दुख जीवन रूपी रथ के दो पहिए हैं। उनसे कभी घबराना नहीं चाहिए। यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि परिस्थितियों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।

जीवन में चाहे कैसे भी उतार-चढ़ाव आएं, हमें उनका डटकर सामना करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। मानव यदि जीवन जीने की कला को सीख ले तो किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अपने जीवन रूपी पथ से नहीं भटकता। इसलिए जब भी कभी जीवन में दुख, तकलीफ हो तो शिकायत की जगह हमें अपने नजरिया को व्यापक बना लेना चाहिए। जिसका नजरिया बड़ा होता है, उसके सामने कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती। मानव को हर प्रतिकूल परिस्थिति को एक चुनौती और अवसर की तरह लेकर सीखना चाहिए। जीवन में कभी भी परिस्थितियों से हारना नहीं चाहिए बल्कि उनका डटकर मुकाबला करना चाहिए। क्योंकि तेज सूर्य को भी अपने उदयकाल में अंधेरे से लड़ कर उसे भगाना पड़ता है। उसके उपरांत ही वह प्रखर हो पाता है।

ऐसा नहीं है कि ईश्वर अपने द्वारा बनाई गई अनमोल कृति यानि मनुष्य को दुखी देखना चाहता है इसलिए उन्हें दुख देता है, पीड़ा देता है। ईश्वर जब अपने बच्चों को दुखी देखता है तो उनको स्वयं भी पीड़ा होती है परंतु इससे मानव के होने वाले कल्याण की भावना से उन्हें सुख भी प्राप्त होता है। जीवन में निखरना है तो पिटना तो पड़ेगा ही, तभी वह कुंदन बनेगा क्योंकि कुंदन, सोने को तपा कर ही प्राप्त होता है। ईश्वर यही चाहता है कि मानव को जो अनमोल जीवन प्राप्त हुआ है, उसका वह सदुपयोग करे। किसान जब तक परिश्रम नहीं करेगा, तब तक अन्न का उत्पादन कैसे संभव हो सकेगा? यह सच्चाई है कि कोई भी परीक्षा प्रारंभ में कष्टप्रद प्रतीत होती है लेकिन जब परिणाम अपेक्षित आ जाए तो वही सुखदाई हो जाती है। इसे केवल वही मनुष्य ही नहीं अपितु उससे जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को गर्व एवं संतोष की अनुभूति होती है।

कई बार ऐसा भी होता है कि मनुष्य परीक्षाएं देते- देते इतना थक जाता है कि उसे अपने गुरु समान ईश्वर पर अत्यंत क्रोध भी आता है। वह ईश्वर की आलोचना भी करता है लेकिन ईश्वर उसका हित चिंतन करना नहीं छोड़ता। अपने कलुषित विचारों से कई बार मनुष्य अपने ईश्वर के प्रति असंतोष व्यक्त करता रहता है परंतु ईश्वर सदैव उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता रहता है। जिस प्रकार गुरु जीवन के हर पड़ाव पर शिष्य के भाग्य, भविष्य और ज्ञान को समृद्ध करने के लिए कृत संकल्पित होते हैं, उसी प्रकार ईश्वर भी हर एक जीव को अच्छे व सच्चे मार्ग की ओर उन्मुख करने के लिए उत्सुक होकर परीक्षा लेते रहते हैं। परीक्षा लेना वास्तव में गुरु द्वारा शिष्य को हर क्षण जागरूक व चौकन्ना करना है। उसमें कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उनसे लड़ने की क्षमता विकसित करना है।