अनुच्छेद

222. विसर्जन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

विसर्जन हमें मोह माया से मुक्ति का रास्ता दिखलाता है। हमारी आसक्ति को क्षीण करता है और हमारी लोभ प्रवृत्ति को शांत करता है। जिसके अंतर्मन में विसर्जन का भाव जागृत हो गया, समझो वह व्यक्ति संत हो गया।

आदि शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि—एक बार वे स्नानादि से निवृत्त होकर मंदिर में प्रवेश कर रहे थे। उस समय वे काशी में थे। तभी उनके मार्ग में एक चांडाल आ गया। शंकराचार्य जी ने भी सुन रखा था कि— चांडाल से बच कर रहना चाहिए क्योंकि चांडाल पास आने से मनुष्य अपवित्र हो जाता है, ऐसी मान्यता थी।
इसलिए शंकराचार्य जी ने उस चांडाल से कहा— दूर रहो।
तो उस चांडाल ने पूछा— किसे दूर होना चाहिए। मुझे या मेरे शरीर को।
इस प्रश्न ने शंकराचार्य पर बड़ा प्रभाव डाला क्योंकि वे स्वयं उपदेश दे रहे थे कि— तुम शरीर नहीं हो, शरीर माया है।
चांडाल के मुख से यह प्रश्न सुनकर शंकराचार्य जी निशब्द हो गए और यह सोचने के लिए मजबूर हो गए कि जब शरीर माया है तो चांडाल के पास आने से या छूने से क्या होता है?
और इस घटना के बाद शंकराचार्य जी हिमालय की ओर चले गए। केदारनाथ में आज भी उनका एक स्मारक है। माना जाता है यह उनका अंतिम स्थान था, जहां वे देखे गए।
शंकराचार्य जी ने अपने जीवन में काफी वस्तुओं का विसर्जन किया। उनका कहना था कि— हर पल में पूर्णता का एहसास होना चाहिए तभी हम किसी चीज को प्राप्त करने के लिए लालायित नहीं होंगे और हमें पूर्णता का एहसास तभी होगा जब हम कुछ चीजों का विसर्जन करते जाएंगे। अगर हम प्रत्येक वस्तु को हर पल पकड़ कर रखेंगे तो हमें पूर्णता का एहसास कभी नहीं होगा।
अगर हम कल की किसी वस्तु के लिए लालायित हो रहे हैं तो इसका अर्थ यही है कि वर्तमान पल में से हम कुछ गंवा रहे हैं। यदि हम कल के भोजन के बारे में सोच रहे हैं तो आज के भोजन का आनंद नहीं ले पाएंगे। इसलिए हर पल विसर्जन करते रहना चाहिए और आज जो कुछ भी है उसका आनंद लेना चाहिए।
उस चांडाल ने शंकराचार्य जी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि—जीवन में विसर्जन की महत्ती आवश्यकता है। हमारे जीवन में चारों तरफ माया का आवरण ही है।
माया का अर्थ है— भ्रम। यहां हम स्थूल शरीर के साथ हैं जो भोजन, पानी और सांस लेते हैं क्योंकि उसके बगैर हम जिंदा नहीं रह सकते। जिसके कारण हमारे शरीर की कोशिकाएं हर दिन बदलती रहती हैं। यह भी सच है कि— कुछ समय बाद हमारे पास नया शरीर होगा। हमारी आत्मा पुराने शरीर का विसर्जन करके नए शरीर में प्रवेश कर जाएगी। यही माया है।
इस प्रश्न ने शंकराचार्य जी को झकझोर कर रख दिया। तभी उनमें विसर्जन की प्रवृत्ति जागी, तत्पश्चात् ही वे एक महामानव और भारत के आध्यात्मिक गुरु बन सके।

हम देव पूजन करते हैं। उदाहरण के तौर पर हम गणपति जी को अपने घर में लाते हैं। उल्लास एवं उत्सव से उनका स्वागत करते हैं, पूजन करते हैं और उन्हें स्थापित करते हैं। लेकिन एक समय उनका भी विसर्जन करना पड़ता है। इससे स्पष्ट संदेश मिलता है कि— पूज्यनीय एवं वंदनीय देव का भी त्याग करना पड़ता है क्योंकि जब तक हम त्याग नहीं करेंगे, तब तक हम उनका आव्हान कैसे करेंगे? विसर्जन करने के बाद ही हम उसका फिर से आव्हान करते हैं, पूजन करते हैं और स्थापित करते हैं।

समय की अविरलता इसी विसर्जन से उत्पन्न होती है। यह हमें जड़वत् होने से रोकता है। देव विसर्जन हमें सुख और दुख, उत्सव और शोक, आनंद एवं पीड़ा जैसे भावों का दर्शन कराता है। यह हमें प्रेरणा देता है कि सुख के आनंद में दुख का स्मरण कर विचलित नहीं होना चाहिए। हमें हर परिस्थिति में समान भाव रखना चाहिए। जब हमें किसी मनचाही वस्तु की प्राप्ति नहीं होती या हमारे जीवन में कोई संकट आता है तो हम बहुत दुखी हो जाते हैं और एक निश्चित दायरे में सिमट जाते हैं। हमारी योग्यता पर अंकुश लग जाता है और हमारी क्षमता ही कुंठित होने लगती है। उस समय एक विसर्जन का भाव ही है जो हमें बाहर निकलने में सहायता करता है।

विसर्जित भाव ही हमारे मन का भोजन है। यह भोजन हमें आंतरिक रुप से परिपक्व बनाता है। बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक छोटी-छोटी उपलब्धियों के मोह को त्यागना पड़ता है। हमारे ऋषि मुनि विरक्त एवं विसर्जित भाव से ही वर्षों तक कठिन तपस्या करते थे, जिसके कारण उन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त होती थी। जिनका उपयोग लोक कल्याण के लिए करते थे। दूसरी तरफ विसर्जन का भाव लोक कल्याण का बहुत बड़ा कारक भी है। इससे सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का अनुकरणीय भाव जन्म लेता है।

221. आस्तिकता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आस्तिकता का सर्वाधिक लोकप्रिय आधार ईश्वर में आस्था से है। जगत् का सृजन, पालन और संहार ईश्वर की लीला है। सनातन धर्म में ईश्वर को पूर्ण माना गया है। वे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और पूर्णस्वतंत्र हैं।
हमारी सनातन परंपरा में आस्तिकता के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं।
पहला- वेद में विश्वास करना
दूसरा- आत्मा की अमरता में विश्वास करना और तीसरा- ईश्वर के अस्तित्व में श्रद्धा व्यक्त करना।

वेद अपौरूषेय हैं। ये किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा रचित नहीं हैं, न भगवान के द्वारा ही रचे गए हैं। दरअसल वेद भगवान की वाणी हैं। ऋषि वेदमंत्रों के दृष्टा यानी साक्षात्कारकर्ता हैं। इसलिए जो लोग वेद के मंत्रों में श्रद्धा व्यक्त करते हैं वे आस्तिक कहे जाते हैं। इसके अलावा आत्मा की अमरता में विश्वास करने वालों को भी आस्तिक कहा जाता है। आत्मा चेतन, शाश्वत और अविनाशी है। यह काल से परे है अर्थात् नश्वर है।

प्रत्येक जीव में अलग-अलग आत्मा है। इसे जीवात्मा भी कहा जाता है। आस्तिक व्यक्ति ईश्वर पर अटूट विश्वास करते हैं। वे अपना प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। वे ईश्वर में उस बच्चे की तरह विश्वास करते हैं जिसको आप हवा में उछालो तो भी वह हंसता ही रहता है। क्योंकि उसको पता है कि आप उसे गिरने नहीं देंगे। ठीक इसी प्रकार आस्तिक लोग निडर होकर कठिन से कठिन कार्य को भी ईश्वर को समर्पित कर हंसते हुए कर जाते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि ईश्वर उन्हें असफल नहीं होने देगा।

ईश्वर और आस्तिक व्यक्तियों का संबंध ऐसा है, जिसमें कुछ खर्च करना नहीं पड़ता। दुनिया में किसी से बात करने के लिए फोन की जरूरत पड़ती है और उसका बिल अदा करना पड़ता है। लेकिन ईश्वर से बात करने के लिए मन की गहराइयों में उतरना पड़ता है। मौन धारण करना पड़ता है। ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। सम्बन्ध उस जल के समान निर्मल और पवित्र होना चाहिए, जिसका कोई रंग और रूप नहीं है, लेकिन जिस में वह मिलता है, उसी के अनुरूप हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य को भी ईश्वर में एकाकार हो जाना चाहिए। जिन्होंने अपने सर्वस्व को ईश्वर को न्यौछावर कर दिया ईश्वर उन्हें उसी प्रकार अपनी शरण में ले लेता है, जिस प्रकार मां अपने छोटे बच्चे को अपने आंचल में छुपा लेती है और दुख, परेशानियों की छाया भी उस पर नहीं पड़ने देती।

जिस प्रकार भ्रमर पुष्प के पराग को ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्प को नष्ट नहीं करता, जैसे दूध दुहने वाला व्यक्ति बछड़े के हित को ध्यान में रखते हुए दूध को दुहता है। वैसे ही ईश्वर अपने भक्तों का ख्याल रखता है और जीवन की इस कठोर डगर पर चलने में सहायता करता है। ईश्वर अपनी कुशलता से जगत् का निर्माण करते हैं, वे जगत को अपने अंदर से उत्पन्न करते हैं। ईश्वर जगत् में व्याप्त रहने के कारण जगत् का उपादान भी करते हैं।

ईश्वर अनंत गुणों से युक्त हैं, परंतु छह गुण उनमें प्रधान हैं— आधिपत्य, सर्वशक्तिमता, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य।

ईश्वर मनुष्य को उसके नैतिक, अनैतिक कर्मों का परिणाम देते हैं। मनुष्य के जीवन में सुख- दुख इन्हीं के कारण आते हैं। लेकिन जो मनुष्य ईश्वर द्वारा बनाई इस सृष्टि में विश्वास करते हैं, उनके लिए सुख-दुख, धूप-छांव की तरह हैं। वे उनकी जीवन यात्रा में अपना योगदान देते हैं और चले जाते हैं। लेकिन जो ईश्वर में आस्था नहीं रखते वे दुखों के बोझ को सहन नहीं कर पाते और रास्ता भटक जाते हैं। फिर उन दुखों में अपने आप को बंधा हुआ महसूस करते हैं और ईश्वर को कोसते हुए अपनी जीवन यात्रा को पूरी करते हैं।

आस्तिकता में कितनी शक्ति होती है इसका मैं एक उदाहरण पेश करती हूं—
रामायण में जब श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तब वह मां सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में चला गया। वहां पर मां सीता का रावण हरण कर ले गया। रावण की कैद से जानकी को वापस लाने के लिए श्री राम को रावण के साथ युद्ध करना पड़ा। उस युद्ध में मेघनाथ के साथ युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिए संजीवनी का पहाड़ लेकर लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृतांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया और लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही सभी अपनी-अपनी बात कहने लगे। माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी, परंतु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो वह हतप्रभ रह गए। उसके चेहरे पर कोई दुख के भाव नहीं थे। हनुमान जी सोचने को मजबूर हो गए कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी है? क्या इन्हें अपने पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं है?
हनुमान जी पूछते हैं—देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जाएगा।

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किए बिना नहीं रह पाएगा। वे बोली— मेरा पति संकट में नहीं है, सूर्य कुल का दीपक बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात, तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिए, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने स्वयं कहा कि— प्रभु श्री राम, मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर, श्री राम की गोद में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वे दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गए हैं, तब से सोए नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था, इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं और जब खुद भगवान की गोद मिल गई तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जाएंगे और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो श्री राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम है, हर धड़कन में राम है, उनके रोम- रोम में राम है,उनके रक्त की बूंद- बूंद में राम है और जब उनके शरीर और आत्मा में सिर्फ राम है तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा है। इसलिए हनुमान जी आप निश्चिंत होकर जाएं। सूर्य उदित नहीं होगा।

वास्तव में सूर्य में इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते। एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा। ये उर्मिला का अपने इश्वर पर अटूट विश्वास था, जो मौत के मुंह में गए हुए अपने पति को भी सकुशल वापिस ले आया।

आस्तिक मनुष्यों का अपने ईश्वर पर यही अटूट विश्वास उन्हें विचलित नहीं होने देता। संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है। कहा भी जाता है कि भगवान की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं। जाहिर है ईश्वर ही इस जगत् का सर्वेसर्वा है। वह इस जगत के कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर में आस्था रखने वाले को भौतिक जीवन में सफलता मिलने पर अहंकार नहीं होता और असफलता मिलने पर निराशा नहीं होती। इसलिए हमें ईश्वर में श्रद्धा रखनी चाहिए। जिस प्रकार बीज की यात्रा वृक्ष तक है, नदी की यात्रा सागर तक है, उसी प्रकार आस्तिक मनुष्यों की यात्रा परमात्मा तक है।

220. परोपकार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके समाज के प्रति कुछ कर्तव्य भी होते हैं। लेकिन आज के समय में मनुष्य स्वार्थी हो गया है। परोपकार की भावना को उसने तिलांजलि दे दी है। वह हर समय अपने स्वार्थ के बारे में ही सोचता रहता है। वह परोपकार की परिभाषा ही भूल गया है।

परोपकार से अभिप्राय है कि— बगैर किसी भेदभाव के एक दूसरे के सुख- दुख में शामिल होना और परेशानी के समय निस्वार्थ भाव से सहायता करना।

जिस प्रकार पुष्प इकट्ठा करने वाले के हाथ में कुछ सुगंध हमेशा रह जाती है, उसी प्रकार परोपकार करने वाले की जिंदगी भी हमेशा सुगंधित और आबाद रहती है। जो व्यक्ति दूसरों की जिंदगी रोशन करते हैं, उनकी जिंदगी खुद रोशन हो जाती है। हंसमुख, विनोद प्रिय, आशापूर्ण लोग प्रत्येक जगह अपना मार्ग बना ही लेते हैं।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि— खुशी का कोई निश्चित मापदंड नहीं होता। एक मां बच्चे को स्नान कराने पर खुश होती है, छोटे बच्चे मिट्टी के घर बना कर और उन्हें ढहाकर, पानी में कागज की नाव चला कर खुश होते हैं। इसी प्रकार विद्यार्थी परीक्षा में अव्वल आने पर उत्साहित हो सकते हैं। भूखे- प्यासे बीमार की आहों को कम करना, सर्दी से ठिठुरते व्यक्ति को कंबल ओढाना या जीवन और मृत्यु से जूझ रहे व्यक्ति के लिए रक्तदान करना हो, ये जीवन के सुख हैं जो व्यक्ति को भीतर तक खुशियों से सराबोर कर देते हैं। ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने मानव सेवा के साथ-साथ इस सृष्टि की निर्जीव वस्तुओं में भी अपना योगदान देकर आदर्श स्थापित किए हैं।

ऐसे ही एक महापुरुष हैं, सिखों के सातवें गुरु हरिराय जी। जो महज 14 वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर आसीन हो गए थे। अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कला में पारंगत होने के बावजूद वे प्रेम, दया, कोमलता व भक्ति भावना से परिपूर्ण थे। परोपकार की भावना उनके अंदर कूट-कूट कर भरी हुई थी। उनका मानना था कि किसी भी मनुष्य के मन को दुख पहुंचाना सबसे बड़ा पाप है। उनका कहना था कि—किसी टूटी हुई भौतिक वस्तु को तो पुनः जोड़ा जा सकता है, लेकिन आहत मन को नहीं। वे सदैव मानवीय संवेदनाओं का पूरा सम्मान करने का उपदेश दिया करते थे और स्वयं अपने जीवन काल में इसका सर्वोत्तम आदर्श बने। परोपकार की भावना को नया आयाम देते हुए, उन्होंने एक बड़ा औषधालय खोला, जिसमें विभिन्न दवाएं और दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संग्रह किया गया। इसमें उपचार के लिए बिना किसी भेदभाव के जहां रोगियों की चिकित्सा होती, वहीं आत्मबल में वृद्धि के लिए आध्यात्मिक उपदेश भी दिए जाते थे। वे अपने उपदेशों के माध्यम से परोपकार की भावना को जागृत करते थे। सिखों को घर-घर लंगर चलाने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि कोई भी भूखा वापस नहीं जाना चाहिए। गुरु जी की भावना व प्रेम सभी जीवों के लिए समान था। प्रकृति को वे स्वयं के निकट मानते थे। यही कारण था कि वे खुद अपने बगीचे की देखभाल करते थे। उनका मानना था कि प्रकृति को हम जितना देंगे, पेड़- पौधे लगाएंगे, उतना ही प्रकृति हमें सूद समेत वापिस कर देगी।

ऐसे बहुत सारे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देकर परोपकार का संदेश दिया है। उन्होंने हमें जीवन में खुश, नेक एवं नीतिवान बनने का रास्ता दिखाया। उनका समूचा जीवन मानवजाति को बेहतर अवस्था में पहुंचाने की कोशिश में गुजरा। किसी की परिस्थितियां अनुकूल नहीं थी। हर किसी ने मुश्किलों से जूझकर उन्हें अपने अनुकूल बनाया और जन-जन में खुशियां बांटी।

बुद्ध ने शिष्य आनंद को “आधा गिलास पानी भरा है” कहकर हर स्थिति में खुशी बटोरने का संदेश दिया। परोपकार को जीवन में स्थान दीजिए, जरूरी नहीं है कि इसमें धन ही खर्च हो। बगैर धन खर्च किए भी आप बहुत से ऐसे कार्य कर सकते हैं, जिससे दूसरों की मदद हो जैसे— रोड क्रास करते समय किसी वृद्ध या लाचार की सहायता कीजिए, दुर्घटना के समय उसे नजदीक के अस्पताल पहुंचाने का कार्य कीजिए। आप अपने हुनर के द्वारा समाज के व्यक्तियों की मदद कीजिए। इस प्रकार के छोटे-छोटे कार्य करके भी आप परोपकार कर सकते हैं। इस तरह के कार्य करके आपको जो आंतरिक संतुष्टि होगी उसका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते। वह आपकी कल्पना से परे होगी। बस मन को उदार बनाइए और दूसरों की मदद करने का कोई भी अवसर मत छोड़िए।

आपके आस-पास अनेकों लोग रहते हैं। हर व्यक्ति दुख- सुख के चक्र में फंसा हुआ है। आप उनके दुख- सुख में सम्मिलित होइए। यथाशक्ति मदद कीजिए। फिर देखना आपके मोहल्ले, कार्यक्षेत्र और समाज में आपको जो मान- सम्मान मिलेगा वह अकल्पनीय होगा। जिस प्रकार मधुमक्खी निस्वार्थ भाव से दुर्लभ औषधीय गुणों से भरपूर मधु एकत्रित करती है, उसी प्रकार हमें भी निस्वार्थ भाव से परोपकार की भावना को अपने अंदर जागृत करना चाहिए। अगर हर व्यक्ति में परोपकार की भावना जागृत हो गई तो हमारा समाज, देश, विश्व में ऊंचाइयों को छुएगा।

219. एकाग्रता की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मन की एकाग्रता हमारी शक्ति की आधारशिला बनती है। यह जीवन की समस्त शक्तियों को समाहित कर मानसिक क्रांति उत्पन्न करती है। जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने में एकाग्रता की बहुत महत्ता है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि में एकाग्रता की महत्ता को हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। हार्डवेयर यानी कठिन परिस्थितियां और सॉफ्टवेयर यानी सरल परिस्थितियां। दोनों से जैसे कंप्यूटर चलता है, वैसे ही जीवन का कंप्यूटर भी चलता है।

एकाग्र मन, भटकाव के शिकार मस्तिष्क की तुलना में अवसरों का अधिक लाभ उठा पाता है। एकाग्रता एक तरह से हमारी शक्तियों को जागृत कर मुश्किलों को हटाकर हमारे लिए मार्ग तैयार करती है। जिसका मन पूर्णरूपेण एकाग्र है, वही अपने लक्ष्य को साधने में समर्थ है। एकाग्रता में वह ऊर्जा होती है जो आवेश को शांत कर देती है। वास्तव में पूर्ण एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जो लोग चित्त को चारों ओर बिखेर कर काम करते हैं, उन्हें इसकी क्षति बाद में पता चलती है।

कार्नेगी कहते हैं कि— नवयुवकों के व्यापार में असफल होने का एक बड़ा कारण यह है कि वे अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाते। हर समय सभी चीजों का सही होना संभव नहीं है। यहां तक की सर्वोत्तम और शुभ इच्छाओं के साथ किए गए महानतम कार्यों में भी खामियां हो सकती हैं।

मन की बुरी प्रवृति हमारी भावनाओं और मन को अपूर्ण और नकारात्मक बना देती हैं। यदि आप एकाग्र होना चाहते हैं, तो मन को किसी भी प्रकार की नकारात्मकता के चक्रों से बाहर निकालना और भीतर से अछूते और मजबूत रहना होगा। यह दुनिया विपरीत मूल्यों के माध्यम से कार्य करती है। दरअसल आपके विचारों का सम्पूर्ण प्रवाह आपके आदर्श की ओर प्रवाहित होना चाहिए। उसके विपरीत या भिन्न दिशा में नहीं।

एकाग्रता और एकचित्तता से बड़े से बड़े व कठिन से कठिन कार्य पूरे किए जा सकते हैं। यदि आप विषम से विषम परिस्थिति में भी मन को लगातार एकाग्र करके संरचनात्मक स्थिति बनाए रख सकते हैं और अपने आदर्श की ओर बढ़ने में निरंतर संघर्ष करते रह सकते हैं तो समझ लीजिए कि आपके जीवन का लक्ष्य बहुत पास है।

स्वेट मार्डेन ने कहा है कि— जबरदस्त एकाग्रता के बिना कोई भी व्यक्ति आविष्कारक, दार्शनिक, लेखक, मौलिक कवि या शोधकर्ता नहीं हो सकता। यदि हम चाहें तो अपने उद्देश्य को मन ही मन में बार-बार दोहराते हुए, लगातार उस मकसद की पूर्ति का संकल्प करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रह सकते हैं और धीरे-धीरे उस मकसद के लिए कार्य करना हमारा स्वभाव बन सकता है। अगर हमने निराश होने की आदत बना ली है, तो आपको असफलता से कोई नहीं बचा सकता। सफलता पाने के लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करें, अगर आप एक बार नकारात्मकता में फंस गए हैं तो आप अवश्य ही असफल होंगे। आप अपने स्वयं के प्रयास और एकाग्र मन की शक्ति की मदद से ही इससे बाहर निकल सकते हैं।

आपको अपने जीवन में मिलने वाले लोगों या परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करने की बजाय अपनी धारणाओं को बदलने की जरूरत है। लोगों को अपूर्ण होने का अधिकार है, उन्हें सही करना आपका काम नहीं है। यदि आप एकाग्रता रूपी चोले को धारण करके अपने कार्य में सफलता प्राप्त करते जा रहे हैं तो यह स्वाभाविक है कि आपको प्रशंसा मिलेगी लेकिन अगर आप जरा से भी लड़खड़ाये तो आपको निन्दा का भागी भी होना पड़ेगा।

एकाग्रता के बगैर कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। धनुर्धर अपने लक्ष्य को नहीं साध सकता, विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकता, बगुला मछली नहीं पकड़ सकता, बाज अपने शिकार को हासिल नहीं कर सकता। कहने का अभिप्राय है कि जीवन के हर क्षेत्र में एकाग्रता की महत्ता परम आवश्यक है।

जर्मन महाकवि गेटे ने कहा है कि—जहां भी तू है, पूरी तरह वहीं रह। यह एक महामंत्र है। जिसका आशय है कि एक समय में सिर्फ एक काम को करो। जो काम हाथ में है उसमें अपने समस्त व्यक्तित्व को केंद्रित करो। परिणाम क्या होगा? यह मत सोचो। काम खत्म होने का परिणाम चाहे कुछ भी हो, पश्चाताप मत करो।

एक कहानी जहन में आती है— सफलता न मिलने के कारण एक लड़की पुल पर से नदी में कूद गई। उसे बचाने के लिए एक लड़का भी नदी में कूद गया जो तैरना नहीं जानता था। इस पूरे घटनाक्रम में जब लड़की ने देखा कि जीवन पाने के लिए वह लड़का पानी में संघर्ष कर रहा है, तब उसकी आंख खुल गई। उस लड़की ने न सिर्फ अपनी बल्कि लड़के की भी जान बचाई। इस घटना के बाद उस लड़की ने अथक प्रयास किया और अपना लक्ष्य पाया।

सफलता प्राप्त कर लेने के बाद जब उस लड़की से इसका राज पूछा गया तो उसने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया— एकाग्रता।
उसने बड़ी आत्मीयता से अपनी गलती स्वीकारते हुए कहा कि मैंने पहले भी सफल होने के पूरे प्रयास किए थे लेकिन मैं सफल नहीं हो पाई क्योंकि मेरे अंदर एकाग्रता की कमी थी। मैंने पूरी तरह एकाग्र होकर अपना कार्य किया और सफलता मेरे कदम चूमने लगी।

किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धन समय होता है। उसकी सफलता समय के इस्तेमाल पर निर्भर करती है। सभी सफल लोगों ने समय का सदुपयोग कर अपने लक्ष्य को एकाग्रता के साथ पाया। मैडिनो विदेशी लेखकों में सबसे आगे हैं। जब से उन्हें एकाग्रता को धारण किया वे प्रभावी वक्ताओं में से एक रहे। उनके जादुई शब्दों से प्रभावित होकर कई लोगों ने अपनी जिंदगी संवारी। जिस प्रकार एक विशालकाय हाथी शक्कर के दानों को उठा नहीं सकता, उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति बगैर एकाग्रता के अपने जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

218. इच्छाशक्ति से पाएं सफलता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारी इच्छाशक्ति वह अस्त्र है, जो मन को शुद्ध रखती है। मधुर मन और खुश मन सदैव सफलता की ओर अग्रसर करता है। मन को मजबूत और बलवान बनाना हमारा संकल्प होना चाहिए क्योंकि मन का स्वस्थ होना ही होश में होना कहलाता है।

महान और सफल व्यक्ति हमेशा कहते आए हैं कि— कामयाब होना है तो आदमी को कोई भी कदम अपने दम पर उठाना चाहिए। क्योंकि दूसरों के दम पर उठाए गए कदम पर हमें दूसरों की अनुकंपा पर निर्भर होना पड़ता है और वह कब साथ छोड़ दें भरोसा नहीं।

किसी ने कहा है कि—
” उड़ने दो मिट्टी को, आखिर कहां तक उड़ेगी।
जब भी हवाओं ने साथ छोड़ा, धरती पर गिरेगी।”

इसलिए केवल दूसरों के सहारे पर निर्भर न रहें, स्वावलंबी बने और अपनी इच्छाशक्ति और धैर्य के साथ सकारात्मकता से सफलता की तरफ अग्रसर हों। इच्छाशक्ति जीवन और सूकून के बीच एक तारतम्यता लाती है। हमारे मन और उसकी सारी चिंता को शून्य कर देती है— विश्वास से भरी हुई इच्छाशक्ति।

आसान है, मेहनत की पगडंडी पर चलना और सफलता के राजमार्ग पर दौड़ लगाना। बस एक शर्त है कि अपना आईना, अपने सामने रखना।

सुकरात ने हमेशा अपने शिष्यों से कहा—जो तुम हो, वही बने रहो, किसी मुखोटे के सहारे मत रहो।

अगर यही सवाल आप अपने आप से करेंगे, तो एकाएक अपनी मौलिकता पर भरोसा होने लगेगा। खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे। आपको यह अहसास होगा कि ईश्वर ने आपको यह मनुष्य शरीर बेकार में ही नहीं दिया और फिर विश्वास की एक रोमांचक लहर दिनचर्या को जीवंत कर देगी।

चाणक्य यह मानते थे कि— हम कितने भी दुबले-पतले क्यों न हों, बस इच्छाशक्ति से अद्भुत और अकल्पनीय कार्य कर सकते हैं। दरअसल मनुष्य की मानसिक ताकत अलौकिक होती है। जिसका हम उपयोग ही नहीं कर पाते।

आपको एक कहानी के माध्यम से समझाना चाहती हूं कि— एक लकड़हारा अन्य साथी लकड़हारों से ज्यादा लकड़ी काट लेता था और ज्यादा कमा लेता था। जब उससे भेद पूछा गया, तो उसने बताया कि- जब बीच में उसे अवकाश मिलता है, तो बाकी लकड़हारे गप्पे हांकने में लगाते हैं, वह उसी समय अपनी कुल्हाड़ी में सान (धार) रखने लगता है। इससे वह ज्यादा तेजी से लकड़ी काट पाता है। यह तो बात कुल्हाड़ी की थी कि उसमें सान रखने से वह और ज्यादा धारदार हो जाती है।

हमारा दिमाग भी ऐसा ही होता है। थोड़े समय में अगर सफलता का स्वाद चखना है तो दिमाग को शार्प करने के लिए सान तो रखनी ही होगी। ऐसे में अगर निराशा के बादल छाने लगें तो अपनी रूचि के अनुसार कार्य करके उसे धार तो दे सकते हैं। गिटार बजाने का शौक है तो गिटार बजाइए, कहानी पढ़ने का शौक है तो अपनी पसंदीदा कहानी की किताब उठा लीजिए। कुछ भी नहीं करना तो टीवी पर अपना मनपसंद कार्यक्रम देखकर ही रिलैक्स हो जाइए। यह सब दिमाग के लिए सुकून भरा होगा।

हमें जीवन में विष और अमृत दोनों का अवसर मिलता है। यहां विष का आश्य विपरीत परिस्थितियां अर्थात् असफलताओं से है और अमृत का आश्य अनुकूल परिस्थितियां यानी सफलताओं से है। ऐसा नहीं है कि जीवन एकांगी हो गया। लेकिन यदि प्रतिकूल हालात उत्पन्न हों तो धैर्य का अमृत पीना चाहिए और अनुकूल समय है तो धैर्य का अमृतपान करना चाहिए। अक्सर देखने को मिलता है कि प्रतिकूल वक्त में व्यक्ति साहस खो देता है और नकारात्मक चिंतन में लग जाता है और अनुकूलता के समय अहंकार में डूब जाता है।

हमें भगवान शिव से प्रेरणा लेनी चाहिए जो हर स्थिति में प्रसन्न रहते हैं। यदि शिवजी का उपासक जीवन की कठिनाइयों को आत्मविश्वास एवं नेक इरादों की दवात में घोलकर दृढ़ इच्छाशक्ति से अपने जीवन पथ के कागज पर, बुद्धि में निवास करने वाली ज्ञानशक्ति से लिखे तो उसके जीवन पथ पर आनंद प्रदाता शिवजी दिखाई पड़ने लगेंगे और उसे आनंद की अनुभूति होगी। शिव की उपासना से यह प्रेरणा मिलती है कि भिन्न-भिन्न प्रकृति और अभिरुचि के लोगों को एक साथ करना ही सार्थक जीवन पद्धति है।
शिवजी के सिर में जल रूप में गंगा और ऊर्जा के रूप में चंद्रमा, गले में सर्प और पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर, पुत्र गणेश का वाहन मूषक (चूहा), मां पार्वती का वाहन शेर और खुद उनका वाहन नंदी (बैल) आपस में एक-दूसरे के बैरी होने के बावजूद एक साथ, एक परिवार में रहते हैं। इस प्रकार शिव जी की सच्ची आराधना से विपरीत परिस्थितियों में विचलित होने की बजाय उसके साथ तादात्म्य बनाने की क्षमता प्राप्त होती है। इसके अलावा शिवजी के अर्धनारीश्वर स्वरूप पर दृष्टि डालने से जहां दाहिना हिस्सा शिवजी के रूप में कर्मक्षेत्र का परिचय देता है, वहीं वाम भाग, भाव पक्ष का स्वरूप है। दोनों पक्षों के सहयोग से कोई कार्य किया जाएगा तो सफलता जल्दी मिलेगी।

लेकिन हम अनुसरण ही नहीं करते और एक उम्र गुजर जाती है। तब जाकर समझ में आता है कि जो उपलब्धि कोई और हासिल कर रहा है, वह तो हम भी प्राप्त कर सकते थे। लेकिन हम अपनी इच्छाशक्ति को जगाना ही भूल गए। संतुलन स्थापित कर ही नहीं पाए और सर्वोत्तम के अधिकारी होने के बावजूद उससे वंचित रह गए। हम हर कार्य में सफलता तो चाहते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि शुरुआत करने से पहले किन- किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।

हमें कई ऐसे प्रसिद्ध लोगों के जीवन की रोचक जानकारी, उनके अनुभवों और विचारों को आत्मसात् कर लेना चाहिए, जो अपने- अपने क्षेत्र में सफल हुए हैं। उनके अनुभवों से सीख लेकर संभवतः हम भी अपनी इच्छा शक्ति को जागृत करने में सफल हो जाएं। यदि विफलता से हम हताश और निराश हो गए हैं तो सफल व्यक्तियों के जीवन की सच्ची घटनाएं हमें नकारात्मकता के भंवर में फंसने नहीं देंगी। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने निराशा के दौर में अपने आप को संभाला और संघर्ष कर सफलता प्राप्त की।

एक पत्ता जब तक पेड़ की डाल पर होता है तो वह भी वृक्ष कहलाता है, पक्षियों को नीड़ प्रदान करता है और गिलहरी को खेलकूद भरी शरारत का अवसर भी। उसी तरह यह इच्छाशक्ति भी है, जब तक यह मन से जुड़कर हिलोरे लेती है, तब तक जज्बा, जोश, जुनून भी कायम रहता है। बाज हमेशा बादलों से भी ऊपर उड़ान भरता है, क्योंकि वहां उसकी इच्छाशक्ति उसको बदलते मौसम के मिजाज से बेफिक्र बना देती है। मनुष्य भी वही महान है, जो स्थिरता को छोड़कर ऊंचाई की तरफ बढ़ता है।

ऊंचा उठने के लिए समर्पण चाहिए। बेचैन रहने से आत्मविश्वास डगमगा जाता है। हमें पूरे पैशन एवं उत्साह के साथ हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसलिए जरूरी है कि भविष्य को लेकर मन में नकारात्मक सोच न पनपने दें। हमें अपने लक्ष्य पर फोकस रखना चाहिए कोई भी असफलता जिंदगी का फुलस्टाप नहीं हो सकती। अपनी प्राथमिकताएं तय करें और इच्छाशक्ति रूपी सीढ़ियों से अपनी सफलता रूपी मंजिल को प्राप्त करें।

217. संतोष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह संसार आंसुओं की घाटी नहीं, संतोष का उपवन है। संतोष एक जादुई दीपक की तरह है।
कवियों ने संतोष के बारे में बहुत ही सुंदर चित्रण किए हैं —
संतोष के दीपक से मछुआरे की टूटी- फूटी झोपड़ी चांदी के महल में बदल जाती है। उस झोपड़ी के शहतीर, उसका फर्श, उसकी छत और उसका फर्नीचर सब नए प्रकाश से चमकने लगते हैं।

मेरा मुकुट मेरे हृदय में है।
वह मेरे सिर पर नहीं।
उस मुकुट में हीरे और मरकत की मणियां नहीं जड़ी हुई।
मेरा मुकुट दिखाई नहीं देता —अदृश्य है।
उसका नाम संतोष है।
यह ऐसा मुकुट है, जो बादशाहों को भी शायद ही कभी नसीब हुआ हो।

फारस के बादशाह को उसके बुद्धिमान सलाहकारों ने सलाह दी—
तुम संतोष की कमीज पहनो।
फिर क्या था?
बादशाह ने आदेश दे दिया कि—
संतोष की कमीज लेकर आओ। चारों दिशाओं में घुड़सवार दौड़ा दिए गए।
बहुत खोज करने के बाद केवल एक ही व्यक्ति मिला जो संतोषी था। लेकिन उसके पास कोई कमीज नहीं थी। वह तो एक निर्धन और अन्धा मनुष्य था, जो घूम- घूम कर सुई-धागा और बटन बेचकर गुजारा करता था।
घुड़सवार उसे पकड़ कर बादशाह के पास ले आए।
बादशाह ने जब उसे देखा तो उस पर दया आ गई।
बादशाह ने उसे अपने पास बुलाया और उससे पूछा कि—
तुम्हें जिंदगी से कोई शिकायत नहीं।
तुम्हारे अंदर इतना संतोष कैसे है?
उस व्यक्ति ने बादशाह को बताया— मैं अपने व्यापार से इतना कमा लेता हूं कि— मेरी तमाम आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। यदि जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान से शिकायत करूं तो मेरा यह कार्य नीचतापूर्ण होगा।
उसकी यह बातें सुनकर बादशाह बड़ा हैरान हुआ।
वह सोचने लगा कि— इस प्रकार की दृढचित्तता केवल संतुष्ट और आनंदित मनुष्य में ही हो सकती है।

216. यादों के झरोखे

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यादें मनुष्य के जीवन का अहम् हिस्सा होती हैं। जैसे-जैसे जीवन रूपी यात्रा चलती है, वैसे- वैसे यादों का कारवां भी अनवरत् चलता रहता है। यादों का यह कारवां फलता-फूलता जाता है। यादें हमसे परछाई की तरह चिपकी रहती हैं। मनुष्य का अतीत यादों से भरा हुआ होता है। कुछ यादें दुख, तकलीफ एवं विषम परिस्थितियों के अवसाद से घिरी रहती हैं, तो कुछ यादें हंसी, खुशी और रोमांच से भर देने वाली होती हैं।

मनुष्य का दिमाग प्रायः दुखभरी यादों को ज्यादा ग्रहण करता है। अगर उसके जीवन में कोई दुखद घटना घटी हो तो वे यादें उसके मस्तिष्क में बसेरा डाल लेती हैं। यादें अच्छी हों या बुरी दोनों ही जिंदगी की सच्चाई हैं। अच्छी यादें हमें जिंदगी में आगे बढ़ने का हौसला देती हैं, तो बुरी यादें हमें जिंदगी की आगामी कठिनाइयों से लड़ने का अनुभव प्रदान करती हैं।

दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं—
एक तो वे जो अपनी यादों के सहारे पूरी जिंदगी गुजार लेते हैं।
दूसरे वे जो यादों से सबक लेकर अपनी जिंदगी संवार लेते हैं और
तीसरे वे जो बुरी यादों को याद करके खुद का वर्तमान और भविष्य दोनों ही बर्बाद कर लेते हैं।
आज के दौर में ज्यादातर मनुष्य तीसरी टाइप के हैं। वे हमेशा तनाव में रहते हैं। इस तनाव की मूल वजह भी यही है कि मनुष्य अच्छी यादों की बजाय बुरी यादों में ज्यादा डूबा रहता है। वह हमेशा नकारात्मक विचारों में खोया रहता है। यही नकारात्मकता उसकी जीवनचर्या का हिस्सा बन जाती है, जिससे उसका वर्तमान के प्रति मोहभंग हो जाता है। वह दूसरों से अपनी तुलना करने लगता है। जिससे वह जीवन रूपी यात्रा में पिछड़ जाता है। इस हताशा में मनुष्य मादक एवम् नशीले पदार्थों के चंगुल में फंसकर अपना अनर्थ करने लग जाता है।

हमें बुरी यादों को भुनाने की बजाय भुलाने का प्रयास करना चाहिए। जिंदगी उत्कर्ष और अपकर्ष, जय और पराजय, खुशी और गम का मिश्रित रूप है। अतः सुख और दुख प्रत्येक मनुष्य की जिंदगी में स्वाभाविक हैं। दुखों से हम भाग नहीं सकते अर्थात् उनका हमारे जीवन में आना निश्चित है। सुख भी हमसे अधिक समय तक अछूते नहीं रह सकते।
इसलिए किसी मनुष्य के जीवन में सबसे ज्यादा जरूरी होती है, वह है- धैर्य।
एक धैर्यपूर्वक मनुष्य ही अपने दुखों के पलों को गुजार सकता है और सुख का भागी बन सकता है। यह सर्वविदित है कि— दिन के समाप्त हो जाने पर रात्रि का आगमन होता है। सूर्य के छिपने के बाद चन्द्रमा का उदय होता है। ऐसे ही सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख का अनवरत् चक्कर चलता रहता है। फिर क्यों न हम अपनी यादों में अच्छे पलों को शामिल करें और प्रकृति की भांति हमेशा खिलखिलाते और मुस्कुराते रहें।

प्रकृति में हमेशा उल्लास की चहक और सुगंधित महक समाई होती है। क्यों नहीं हम अपने जीवन में प्रकृति की यह मस्ती जो लौकिक भी है और अलौकिक भी है, जो विवेक की सरगम बलिदान के गीतों में भी मधुरता भरती है, को अपने जीवन में शामिल कर लें? जब हमारा वर्तमान प्रकृति की खूबसूरती की तरह छांव में फूलों की तरह पल्लवित व पोषित होगा, तभी हमारी यादें खूबसूरत होंगी। जब हम प्रकृति को निहारते हैं तो मानो पूरी प्रकृति एक ही धुन गुनगुनाती है— शांति की स्थापना, दूसरों की खुशी के लिए सर्वस्व का बलिदान कर देने की प्रेरणा। प्रकृति में तो यह सिलसिला हमेशा से चल ही रहा है। क्यों न हम इसे अपने जीवन में शामिल करें?

खुद को अत्याधुनिक कहने वाले और समझने वाले हम मनुष्यों ने, न जाने क्यों इस मस्ती से अपने को अछूता करके रखा हुआ है। प्रकृति के वे स्वर हमें क्यों नहीं सुनाई देते जो हमेशा गूजंते रहते हैं। आओ, हमारे रस से जिंदगी की नीरसता, हमारी उमंग से जीवन की उदासी, हमारी सम्पन्नता से अपनी दीनता दूर करें। हमारे सानिध्य में आकर उल्लासपूर्ण और गौरवमय जीवन का आनंद लो। क्या हमारा मन नहीं करता कि— हम प्रकृति के संपर्क में जाकर उस ताजी हवा का आनंद लें जो हमारे मन में गुदगुदी पैदा करे, हलचल मचा दे? हम भी फूलों की तरह खिल उठें, महक उठें। हम आम के बौर की तरह खिल उठें, चिड़ियों की तरह चहक उठें। दिल में एक हूक उठे, जो कोयल की कूक बनकर वातावरण में मस्ती बिखेर दे। सरसों के पौधों की तरह झूम उठें, नवपल्लवों की तरह थिरक उठें। सारी उदासी बह जाए, खिलखिलाहटें बिखर पड़ें। लेकिन यह सब तब होगा जब अंदर रस बहे?
रस तो हमारे मस्तिष्क में जम गया है—नकारात्मकता का, बुरी यादों का।

आत्मविश्वास के धोखे में स्वार्थ ने डेरा डाल रखा है। आत्मीयता की जगह को अहंकार ने घेर लिया है। यह सब हुआ अविवेक के कारण क्योंकि हमने बुरी यादों की रस्सी को जकड़कर पकड़ा हुआ है। हम अविवेक के कारण यह नहीं समझ पाए कि हम अपनी जीवन रूपी यात्रा में अच्छी यादों के घरोंदें बनाकर आगे बढ़ते जाएंगे, तो बुरी यादों को हमारे मस्तिष्क में स्थान ही नहीं मिलेगा।

हमें “बीती ताहि, बिसार दे” की कहावत को चरितार्थ करते हुए बुरी यादों को भुलाकर केवल अच्छी यादों को अपने जीवन में स्थान देना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन के खट्टे- मीठे अनुभवों से सबक लेकर अपने जीवन को गति देनी चाहिए। यादों के झरोखे हमेशा खुले रखने चाहिएं। जिससे अगर कुछ यादें परेशान करें भी तो उन झरोखों से बाहर निकालने में आसानी हो। अपनी अच्छी यादों को हमेशा स्मरण करते रहना चाहिए और अपने मित्रों एवं सगे- संबंधियों को शामिल करना चाहिए।

215. चेतना का विकास

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जब आप किसी कार्य में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहते हैं तो उसमें सतत् सुधार के लिए निरंतर प्रयास करते हैं और एक दिन आप उसमें पारंगत हो जाते हैं, यह विकास है। लेकिन जब हम आंतरिक विकास की बात करते हैं, तो चेतना के विकास के बात करते हैं।

चेतना के विकास के लिए हमें अपने अंतर्मन में झांकना होगा और इसके लिए हमें ध्यान की अवस्था को प्राप्त करना होगा। जब हम ध्यान करते हैं तब हमारा मन अधिक शुद्ध, सहज व हल्का बन जाता है। हमारी चेतना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है, तब हम अपने आंतरिक सामर्थ्य को उजागर कर पाते हैं। जब हमारी चेतना विकसित हो जाती है तो जटिलताओं, प्रतिक्रियाओं और भावनाओं से अशांत नहीं होती। हम अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए सभी कार्यों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकते हैं।

अपनी चेतना के विकास के लिए पहले हमें अपने मन को शांत करना होगा क्योंकि एक परेशान और बैचेन मन, तूफानी समुद्र की तरह होता है जो इच्छाओं, कामनाओं और चिंताओं के कारण अनेक दिशाओं में खिंचता रहता है। वह विभिन्न प्रवाहों में बह कर बिखर जाता है जबकि एक नियंत्रित व संतुलित मन केंद्रित रहता है और उससे सब का कल्याण होता है।

अपनी चेतना के विकास के लिए अध्यात्म के रास्ते पर चलना होगा। अपने जीवन पर चिंतन करना, उसकी जांच करना, उसका अवलोकन करना अध्यात्म है। जब हम ध्यान के द्वारा उस अवस्था में पहुंच जाते हैं कि— हमारी सभी इच्छाएं समाप्त हो जाएं और जीवन में हम अपने लिए किसी भी वस्तु की कामना ना करें, तब हम दूसरों की इच्छा को पूरा करने की शक्ति विकसित करते हैं। अपनी इच्छाओं पर अंकुश मत लगाइए बल्कि अपनी इच्छाओं के प्रति जागरूक होइये। आपकी जो भी इच्छाएं हैं, उन्हें ईश्वर पर छोड़ दीजिए और विश्वास कीजिए वे अवश्य पूरी होंगी।

जब आप यह तय कर लेंगे कि मुझे कुछ नहीं चाहिए तो आप अंदर से इतने मजबूत हो जाएंगे कि आप जो भी कुछ किसी से कहेंगे, आपके मुख से निकला हुआ एक- एक शब्द, आशीर्वाद बनकर फलीभूत होने लगेगा।

214. सेवा भाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के अपने कुछ नियम और कायदे होते हैं जिनका पालन करना प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य होता है। अगर वह समाज में नहीं रहता तो वह मनुष्य नहीं है फिर या तो वह दानव है या फिर देवता। समाज में रहते हुए प्रत्येक मनुष्य के कुछ सामाजिक दायित्व होते हैं। उन दायित्वों के मध्य में जो भावना निहित होती है, वह है— सेवा भाव।

ईश्वर ने मनुष्य को ही इस भाव से परिपूर्ण बनाया है, इसलिए मनुष्य की जिम्मेवारी बढ़ जाती है।
एक कहावत है— सेवा स्वयं में पुरस्कार है।
जो खुशी और आनंद की प्राप्ति हमें दूसरों की सेवा से मिलती है, उसे लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं पाया जा सकता।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है— यही पशु पर्वत्ति है कि— आप, आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
अर्थात् सिर्फ अपने भले के बारे में सोचना, निज स्वार्थ में अंधे होकर जीवन जीना, वास्तव में अर्थहीन जीवन है। बदले में कुछ पा लेने की लालसा में, किसी की मदद या सेवा करना भी व्यर्थ है।
सेवा का प्रतिफल तो असीम संतुष्टि है, किसी की सेवा करने के पश्चात् यदि मन आनंद विभोर हो जाए, एक सुकून मिले और आप एक सुकून भरी नींद ले सकें तो वही सच्ची सेवा है।

एक कहावत भी है कि— सेवा स्वयं में पुरस्कार है। जो खुशी और आनंद की प्राप्ति हमें दूसरों की सेवा करने से मिलती है, उसे लाखों रुपए खर्च करने के पश्चात् भी नहीं प्राप्त किया जा सकता।

तुलसीदास के अनुसार— दूसरों की भलाई से बढ़कर कोई भी धर्म नहीं है।

वैसे भी मानव जीवन की सार्थकता इसी बात पर निर्धारित होती है कि— उसने अपने जीवन को कैसे उपयोगी बनाया है? हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम सब साथ हैं और जब तक हम इस दुनिया में हैं, तब तक एक-दूसरे की सेवा कर एक दिव्य समाज का निर्माण कर सकें। क्योंकि मानव जीवन की उपयोगिता भी परहित में ही निहित है और इसका आधार है—सेवा भाव।

213. जीवन- यात्रा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन रूपी यात्रा में अपनी मंजिल पर पहुंचना मनुष्य के लिए बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है, परंतु उसके लिए आत्मविश्वास और इरादा मजबूत होना चाहिए। इनके अभाव में किसी भी प्रकार की सफलता और सिद्धि के द्वार पर नहीं पहुंचा जा सकता। मंजिल पर पहुंचने के लिए हृदय में श्रद्धा और विश्वास, मन में चाहत और लगन होनी चाहिए। अगर ऐसा है तो मनुष्य राह की खोज कर ही लेता है।

मनुष्य में विकास की असीम संभावनाएं होती हैं, जब तक उनके विचारों में निराशा, हीनता और भीरुता का आवरण होता है, तब तक वह अपनी संभावना और शक्तियों पर विश्वास नहीं कर पाता। वह एक दो बार की कोशिश में ही हार मान कर बैठ जाता है और उनके भीतर का हीरो बाहर निकलने की बाट जोहता रहता है। वह अपनी तरक्की के दरवाजों को बंद कर यह मान बैठता है कि अब कुछ नहीं हो सकता।

सभी मनुष्य मनचाही मंजिल को पाने के लिए तत्पर रहते हैं। हममें से ज्यादातर को तुरंत अपनी मंजिल पर पहुंचने की जल्दबाजी लगी रहती है। मंजिल ढूंढने में जरा- सी देर क्या हुई रास्ते को ही गलत ठहरा देते हैं। जरूरी तो यह है कि हम सिर्फ मंजिल नहीं बल्कि पूरी जीवन-यात्रा पर ध्यान दें। हमें यह समझना चाहिए की सफलता एक दिन में नहीं मिलती, निरंतर प्रयास करना पड़ता है।

वास्तव में देखा जाए तो मानव जीवन की सफलता किसमें है, यह तो विरले ही सोच पाते हैं। यह जीवन हमें क्यों मिला, किसने दिया? इस प्रश्न पर विचार करना और जीवन को सफल करने के लिए मंजिल की खोज करना ही मानव जीवन का अहम् उद्देश्य होना चाहिए। हम में से सभी मनुष्य यह भली-भांति जानते हैं कि— मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता। यह जन्म- जन्म के पुण्य की प्रबलता होने पर ही मिलता है।
शास्त्रों के अनुसार यह जीवन ईश्वर भक्ति के लिए मिला है, इसी से ही जीवन सफल हो पाएगा। ईश्वर ने प्रकृति में प्राणियों के लिए हवा, पानी और प्रकाश की निशुल्क व्यवस्था की है। जो व्यक्ति इसको समझते हैं, वे ही ईश्वर भक्ति और सत्कर्म करते हैं।

जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है, यही ईश्वरीय विधान है। जिनके अंदर इंसानियत है, वे ईश्वर भक्ति कर जीवन को सफल बनाते हैं। जिन्हें भक्ति नहीं करनी है, उनके तो बहाने अनगिनत हैं। ईश्वर की पद्धति और नियम में भी जो उपयुक्त होता है, वह उसे ही गले से लगाकर रखता है। आलसी, प्रमादी, कामी और नास्तिक व्यक्ति तो वैसे भी पृथ्वी पर बोझ के समान है। ऐसे मनुष्य स्वयं का शरीर भी ढोने के काबिल नहीं होते। दुख की बात यह है कि ज्यादातर समय हम मुखौटा ओढ़े रहते हैं जैसे भीतर से होते हैं, वैसे ही बाहर बने रहने से बचते हैं। डरते हैं, खुद को छुपाए रहते हैं।

संत कबीर कहते हैं—
नदियां एक घाट बहु तेरे, कहे कबीर वचन के फेरे।

सच है, ईश्वर प्राप्ति ही मानव जीवन के लिए असली मंजिल है। इरादा नेक हो तो किसी भी पंथ या संप्रदाय के माध्यम से ईश्वर को पाना संभव है।