31. कर्म बड़ा या भाग्य

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

कर्म बड़ा या भाग्य, यह एक ऐसा प्रसन्न है, जिसके अंतिम निष्कर्ष पर एक मत से नहीं पहुंचा जा सकता। भाग्य के संदर्भ में बहुत पुराने दौर से दो परस्पर विरोधी विचार धाराएं रही  है। एक के अनुसार मनुष्य उस से बंधा हुआ है, जो उसके भाग्य में पहले से ही लिख दिया गया है। वह उससे बाहर नहीं निकल सकता और वही करेगा जो उसके भाग्य में लिखा है। दूसरे मत के अनुसार मनुष्य स्वतंत्र है। वह जो चाहे वह करे, लेकिन जो भी कर्म करेगा उसका परिणाम उसे हर हाल में भुगतना पड़ेगा। इन दोनों विचारधाराओं में से कौन-सी सही है, यह कहना उतना ही कठिन है, जितना यह बताना कि पहले मुर्गी आई या अंडा। इस बारे में धर्म ग्रंथों और वैज्ञानिकों की धारणाओं में भी काफी भेद मिलता है।

जिसका सूक्ष्म रूप से वर्णन इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों में परस्पर विरोधी विचार मिलते हैं। ऋग्वेद में तो एक पूरा प्रश्न भाग्य के पूर्व लिखित होने बनाम मनुष्य द्वारा खुद भाग्य को लिखे जाने को लेकर है। रामचरितमानस में तुलसीदास का एक जगह तो यह विचार है कि सब कुछ पहले से ही निर्धारित और लिखा हुआ है। जब ज्ञानी होने के बावजूद रावण सीता का हरण कर लेता है तो तुलसीदास लिखते हैं- “जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहिले हर लेही”। यानी प्रभु को जिसे दुख देना होता है, उसकी बुद्धि वह पहले ही छीन लेते हैं। लेकिन रामचरितमानस में ही तुलसीदास एक दूसरी जगह पर लिखते हैं- “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा,जो जस करहिं सो तस फल चाखा”। यानी जो जैसा कर्म करेगा, उसको वैसा ही परिणाम भुगतना पड़ेगा, जिससे यह स्पष्ट है कि भाग्य में पहले से कुछ नहीं लिखा हुआ। सब कुछ कर्म पर निर्भर होता है। महाभारत में कर्मफल का सिद्धांत समझाते हुए कृष्ण ने धृतराष्ट्र से कहा- “जैसे बछड़ा सैकड़ों गायों की टांगों में से होता हुआ अपनी मां को तलाश ही लेता है, वैसे ही हमारे कर्म हम पर हावी हो जाते हैं”। बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के अनुसार- “हमें अपने कर्मों पर कोई नियंत्रण नहीं होता। हमारे सारे अनुभव हमारे पिछले कर्मों का नतीजा हैं। मृत्यु तीन प्रकार की होती है- हमारे कर्मों के परिणाम स्वरुप, जब हमारी उपयोगिता समाप्त हो जाती है और दुर्घटना के कारण। लेकिन इन तीनों का आपस में गहरा संबंध है, जो पिछले कर्मों की वजह से है। इसी तरह बीमारी भी कर्मों की वजह से ही होती है”। बहरहाल इस बहस का कोई अंत नहीं है कि कर्म और भाग्य में प्रबल क्या होता है?

सभी स्वयं को सही मानते हैं। सबकी अपनी मान्यता है। वैज्ञानिकों के बारे में कहा जाता है कि वे पूर्व निर्धारित भाग्य में विश्वास नहीं रखते। काफी हद तक यह बात सही भी है। लेकिन विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कहना था हर चीज पूर्व निर्धारित है, आरम्भ से लेकर अंत तक। सब पर उन बलों की हुकमरानी है, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। एक कीड़े से लेकर तारे तक के साथ क्या होगा, यह सब पहले से ही तय है। मानव, सब्जियां या कॉस्मिक डस्ट यानी हम सभी उस रहस्यमय धुन पर नाच रहे हैं, जो फासले पर रहकर एक अदृश्य संगीतकार बजा रहा है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”- अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। यहां पर श्री कृष्ण खुद कह रहे हैं- “कि कर्म प्रधान है”।

कर्म और भाग्य के संबंध में एक कहानी सुनाना चाहती हूं- एक चाट वाला था। जब भी उसके पास चाट खाने जाओ तो ऐसा लगता कि वह हमारा रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर उसको बात करने में बड़ा मजा आता था। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है, जल्दी चाट लगा दिया करो, पर उसकी बात खत्म ही नहीं होती। एक दिन अचानक उसके साथ मेरी कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई। तकदीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फिलासफी देख ही लेते हैं। मैंने उससे एक सवाल पूछ लिया। मेरा सवाल उस चाट वाले से था कि- आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से? उसने जो जवाब दिया, उसके जवाब को सुनकर मेरे दिमाग के सारे जाले साफ हो गए। वह चाट वाला मुझसे कहने लगा, आपका किसी बैंक में लाकर्स तो होगा? मैंने कहा हां, तो उस चाट वाले ने मेरे से कहा कि उस लाकर की चाबियां ही इस सवाल का जवाब हैं। हर लाकर की दो चाबियां होती हैं, एक आपके पास होती है और एक मैनेजर के पास। आपके पास जो चाबी है वह परिश्रम और मैनेजर के पास वाली चाबी है वह भाग्य। जब तक दोनों चाबियां नहीं लगती, लाकर का ताला नहीं खुल सकता। आप कर्म योगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान। आपको अपनी चाबी भी लगाते रहना चाहिए, पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे। कहीं ऐसा ना हो कि भगवान अपनी भाग्य वाली चाबी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाबी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाए। मेरे विचार में न कर्म बड़ा है और न भाग्य। कर्म और भाग्य एक दूसरे के पूरक हैं। जब हम भाग्य की रेखाएं देखते हैं जो हमारी हथेली में मौजूद हैं, तो उनसे पहले उंगलियां आती हैं, जो हमें कर्म करने की प्रेरणा देती हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश किसी के हाथ नहीं होते तो इसका अभिप्राय यह नहीं है, कि उसका भाग्य नहीं है और वह कर्म नहीं कर सकता। हमारे पिछले जन्मों के कुछ संचित कर्म होते हैं, जो भाग्य बनकर हमारे जीवन में प्रवेश करते हैं।

30. एकांतवास

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

एकांतवास से अभिप्राय है- निर्जन स्थान में रहना, अकेले में रहना, सबसे अलग रहना। जो मनुष्य अध्यात्म में विश्वास करते हैं, उनके लिए एकांतवास एक महत्वपूर्ण समय होता है। लेकिन मैं आज के समय की बात कर रही हूं ।जब भारत सहित पूरा विश्व एक अदृश्य संकट से गुजर रहा है। आज दुनिया का हर देश, हर धर्म, जाति, गरीब-अमीर कोरोना वायरस के कहर से डरा हुआ है और सहमा हुआ है। जिन सड़कों-गलियों में रात को भी सरपट गाड़ियां दौड़ती रहती थी, उन पर दिन में भी सन्नाटा पसरा हुआ है। इस महामारी के आगे विज्ञान भी बौना नजर आ रहा है। क्योंकि फिलहाल इसका कोई इलाज नहीं है। संकट बहुत ही भयावह है, जो अति सूक्ष्म विषाणु है। जो एक राक्षस की भांति पूरी मानवता को निगल जाने के लिए आतुर है। इसे फिलहाल मारा नहीं जा सकता, तो इसके प्रभाव से कैसे बचा जाए।

यहीं हमारे धर्म ग्रंथ में हमें राह दिखाते हैं- उनमें भी नर और नारायण ने एकांतवास के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में आता है, जब भगवान श्री कृष्ण स्वयं युद्ध के क्षेत्र से भाग कर एकांतवास में चले गए थे। क्योंकि उसका जिस दैत्य से सामना होना था, उसका श्री कृष्ण के पास कोई समाधान नहीं था, अर्थात जब आपदा समझ से परे हो जाए, तो एकांतवास में जाना ही उसका समाधान होता है। दरअसल बात उस समय की है, जब मगध नरेश जरासंध मथुरा पर बार-बार आक्रमण कर रहा था, लेकिन वह मथुरा को जीत नहीं पा रहा था। ऐसे में जरासंध का क्रोधित होना स्वाभाविक था। वह मथुरा पर जीत हासिल करने के लिए नए-नए पैंतरे अपनाता था, कभी किसी राक्षस को लेकर आता, तो कभी छद्म-युद्ध करता था। मथुरा पर विजय प्राप्त करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था, क्योंकि यह उसके लिए मान-अपमान का विषय था। लेकिन लगातार 17 बार आक्रमण करने के बावजूद भी वह मथुरा पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया था। वह मथुरा पर हर हाल में जीत दर्ज करना चाहता था। इसलिए उसने कालयवन को साथ लेकर युद्ध करने की रणनीति तैयार की, क्योंकि कालयवन एक अजेय योद्धा था। उसको शिव का वरदान प्राप्त था। किसी भी अस्त्र-शस्त्र से उसको मारा नहीं जा सकता था। जब श्रीकृष्ण को यह पता चला कि अबकी बार जरासंध के साथ कालयवन भी है, तो उसने अपनी रणनीति बदल ली। कालयवन श्री कृष्ण के सामने पहुंचकर युद्ध के लिए ललकारने लगा। तब श्री कृष्ण वहां से भाग निकले। जब श्री कृष्ण भाग रहे थे, तब कालयवन भी उनके पीछे-पीछे भागने लगा, भागते-भागते श्री कृष्ण एक कन्दरा में चले गए। जहां पर राजा मुचकुंद निद्रासन में था मुचकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था, कि जो भी व्यक्ति उसे निद्रा से जगाएगा तो, उसकी दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो जाएगा। श्री कृष्ण ने कन्दरा में पहुंचकर मुचकुंद पर अपना पितांबर डाल दिया और वहीं छिप गया। पीछा करता हुआ कालयवन जब कंदरा में पहुंचा, तो उसने पितांबर देखकर उसे श्री कृष्ण समझा और उस पर प्रहार कर दिया। जिससे राजा मुचकुंद की निंद्रा टूट गई। जागते ही उसकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी और वह क्षण भर में ही भस्म हो गया। ऐसा ही एक उदाहरण महाभारत में मिलता है, जब पांडवों को दुर्योधन के द्वारा लाक्षागृह में जलाने की योजना बनाई गई। जब लाक्षागृह की सुरंग से निकलकर पांडव बाहर आ गए, तो श्री कृष्ण के कहने पर वे एकांतवास में चले गए। तब विदुर, भीष्म पितामह और श्री कृष्ण ही जानते थे, कि पांडव सुरक्षित हैं। इसलिए वह यह जाहिर नहीं होने देना चाहते थे। इसे एक संकट की घड़ी मानकर श्री कृष्ण ने उन्हें एकांतवास में चले जाने की ही सलाह दी, जिससे वे कुछ समय आराम करने के बाद इस संकट से बाहर निकलने के रास्ते ढूंढ सकें, क्योंकि जब संकट के बादल गहरे हों तो एकांतवास ही एक रास्ता बचता है।

उक्त प्रसंगों को यदि हम वर्तमान परिपप्रेक्ष्य के अनुसार चिंतन करें तो पाएंगे कि, कोरोनावायरस भी उस कालयवन की भांति है, जो इस समय बहुत ही तेजी से अपने पांव फैला रहा है, जिसके संक्रमण को काबू करना मुश्किल हो रहा है। किंतु इसे राजा मुचकुंद की तरह एकांतवास द्वारा अथवा कृष्ण की तरह रणनीतिक रूप से छुपकर खत्म किया जा सकता है। अदृश्य रूप में प्रकट हुए इस दुश्मन का सामना हम अस्त्र-शस्त्रों से नहीं कर सकते। हमें भी अपनी-अपनी गुफाओं अर्थात घरों में छुप कर बैठना होगा। हमें धैर्य से काम लेना होगा। भय का वातावरण नहीं बनने देना होगा। “एक छोटी सी चींटी भी विशाल हाथी को मार सकती है” इस कहावत पर बहुत ज्यादा विश्वास नहीं किया जाता रहा है। किंतु मानव-जाति के लिए यह एक दुखद बात जरूर है, पर सत्य तो यही है कि एक छोटा सा वायरस भी इतना खतरनाक है, जिससे पूरी दुनिया हिल गई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रकृति मानव जाति से बेहद नाराज है। शायद समझा रही है कि हे मानव अभी भी मौका है, संभल जा, मेरे खिलाफ जाना छोड़ दे। हमारे बड़े-बूढ़े अक्सर कहते थे कि- जब खतरा अदृश्य हो तो हमें छुप कर बैठ जाना चाहिए और तब तक बाहर नहीं निकलना चाहिए जब तक वह पूरी तरह टल न जाए। इसलिए हमें अपने बड़े-बूढ़ों के गूढ़ रहस्य को समझते हुए एकांतवास में चला जाना चाहिए। स्वयं श्रीकृष्ण से भी हमें यही संदेश मिलता है।

29. धैर्य से करें देव साधना

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

ईश्वर ने यह दुर्लभ मानव जीवन चालाकियों, व्यर्थ चमचागिरी एवं छद्मपूर्ण कार्यों में नष्ट करने के लिए नहीं दिया है, अपीतु अपने पौरुष से दुर्लभ गुणों एवं शक्ति साधनों का सदुपयोग कर देव-साधना के माध्यम से स्वयं एवं मानव के कल्याण के लिए दिया है। देव साधना के प्रभाव से दुराचारी भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है। परम धर्म परमात्मा में अंगिकार हो जाता है। लेकिन मनुष्य जीने के लिए कई-कई प्रकार के साधन ढूंढता रहता है। अपने लक्ष्य में सफल होने के लिए वह सत्य और असत्य का सहारा ही नहीं, बल्कि पता नहीं कितने टोने-टोटकों, यंत्रों, षडयंत्रों, नीतियों-कुनीतियों का सहारा लेकर अपने खास उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। यह संसार मानव रूपी कल्पनाओं एवं आडम्बरों के मायाजाल में लिप्त है। मनुष्य जिसको सत्य समझता है वह नितांत असत्य एवं कष्टप्रद है। कोई चमत्कारी शिवलिंग अथवा दुर्लभ रतन किन्हीं अनुपयोगी वस्तुओं से ढके होने के कारण विशेष दृष्टि के अभाव में सामान्य आंखों को नहीं दिखाई देता। उसे केवल अनुपयोगी पदार्थ ही दिखाई देता है, लेकिन एक पारखी एवं सत्य की पहचान करने वाली दृष्टि को उन पदार्थों में केवल वही दिव्य रतन अथवा चमत्कारी शिवलिंग ही दिखाई देता है। यह दिव्य दृष्टि केवल देव-साधना करने वाले साधकों को ही प्राप्त होती है।

इस सत्य को देखकर उन्हें अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है। जबकि दूसरी तरफ सत्य को न देख पाने वाले साधक उस संपूर्ण उपकरण में दुख, पश्चाताप एवं विपरीत विचारों के सिवा कुछ भी हासिल नहीं कर पाते। देव साधना का मार्ग पहले-पहल कष्टप्रद एवं दुखों से परिपूर्ण प्रतीत होता है, लेकिन उसका अंत स्थायी आनंद के रूप में होता है। इस मार्ग का पथिक सीमित में भी असीमित आनंद पाता है, एवं भौतिकता की चकाचौंध में डूबा व्यक्ति असीमित ऐश्र्वर्य एवं संपदा के चलते भी मुट्ठी भर आनंद बटोरने के लिए छटपटाता रह जाता है। ऐसे लोगों में धैर्य का अभाव होता है। वे देव-साधना तो करते हैं, और चाहते हैं कि उनको सब कुछ पल भर में प्राप्त हो जाना चाहिए। लेकिन देव-साधना कोई वस्तु नहीं है, जिसे हम पल भर में प्राप्त कर लें। उसके लिए कठोर तपस्या, समर्पण, त्याग और धैर्य की जरूरत होती है।

सीपियों की तरह धैर्यवान बनकर ही मोती प्राप्त किए जा सकते हैं।

स्वामी विवेकानंद

हमारे देश में एक सुंदर किवदंती प्रचलित है, वह यह है कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूंद किसी सीपी में चली जाए तो वह बूंद मोती बन जाती है। सीपियों को यह मालूम है। इसलिए जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपीयां पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं। उस समय की एक अनमोल बूंद की प्रतीक्षा करती रहती हैं। ज्यों ही एक बूंद पानी उसके पेट में जाता है, त्यों ही उस जल कण को लेकर मुंह बंद करके समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं। वहां बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती प्राप्त करने के प्रयत्न में लग जाती हैं। हमें भी उन्हीं सीपीओं की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फिर समझना होगा, अंत में बाहरी संसार से दृष्टि बिल्कुल हटानी होगी। सब प्रकार की विक्षेप कारी बातों से दूर रहकर हमें अंतर्निहित सत्य तत्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। एक भाव को नया कहकर ग्रहण करना उसकी नवीनता चले जाने पर फिर एक-दूसरे नए भाव का आश्रय लेना, इस प्रकार बार-बार करने से हमारी सारी शक्ति ही इधर-उधर बिखर जाएगी। इसलिए एक भाव को पकड़ो, उसी को लेकर रहो। उसका अंत देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव लेकर उसी में मस्त रह सकते हैं, उन्हीं के हृदय में सत्य तत्व का उन्मेष होता है। जो लोग सब विषयों को मानो थोड़ा-थोड़ा चखते रहते हैं। वे कभी कोई चीज नहीं पा सकते। बिना भगवत कृपा के संसार के सत्य एवं असत्य का सही-सही बोध संभव नहीं है।

इस नश्वर, मृत्युमय एवं दुखदाता संसार की कोई भी उपलब्धि शाश्वत, स्थाई एवं चिरकालिक नहीं है। अनाप-शनाप माध्यमों से जो धन-संपदा, भौतिक ऐश्र्वर्य, पद-प्रतिष्ठा एवं अस्थाई सुख आपने प्राप्त किया है, वह अंत में ब्याज रूप में आपको गहन कष्ट, पीड़ा, पश्चाताप एवं सबक देने वाला है। संसार के संपूर्ण आभासित सुखों का शुभारंभ सुख से होता प्रतीत होता है। लेकिन उसका अंत गहरी पीड़ा एवं दुख में होता है। लेकिन जो सचमुच देव-साधना की इच्छा रखते हैं उन्हें हर वस्तु को थोड़ा-थोड़ा पकड़ने की वृत्ति सदैव के लिए छोड़नी होगी। वे अपने अंतर्मन में एक विचार को धारण करें, फिर उसी विचार को अपना जीवन बनाएं, उसी का चिंतन करें, उसी का स्वपन देखें और उसी में जीवन बिताएं। आपका मस्तिष्क, स्नायु, शरीर के सर्वांग उसी के विचार से पूर्ण रहें। दूसरे सारे विचार छोड़ दें। यही देव-साधना का उपाय है। इसी उपाय से बड़े-बड़े योगी महात्मा, सिद्ध पुरुषों ने सिद्धियां प्राप्त की हैं। सदाचारी हों या दुराचारी सभी को  देव-साधना का अधिकार है।

28. धर्म और आध्यात्मिकता

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

धर्म और आध्यात्मिकता यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। क्योंकि जहां धर्म होगा, वहां अध्यात्म का होना अनिवार्य है और जहां अध्यात्म होगा, वहां धर्म अपने आप स्थापित हो जाता है। इसलिए ये दोनों शब्द एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। धर्म का अनुसरण तो सभी करते हैं। लेकिन अधिसंख्य लोग इस बात को नहीं जानते हैं कि इसी का सही अनुसरण उन्हें अध्यात्म की उन गहराईयों तक ले जाता है, जहां पहुंचकर मानव को अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति का अनुभव होता है। सभी धर्म ईश्वर तक पहुंचने के विभिन्न मार्गों का उल्लेख करते हैं। इसके लिए बस थोड़े से समर्पण की भावना को विकसित करना होता है। हम सब अपनी-अपनी प्राथमिकता के आधार पर अपनी प्रगति के लिए समय-समय पर संकल्प लेते रहते हैं। कुछ लोग प्रतिदिन व्यायाम का, कुछ ज्यादा मेहनत करने का, कुछ सुबह जल्दी उठने का, कुछ व्यवसायिक प्रगति का जबकि कुछ नशा आदी छोड़ने का, इन सब के साथ हमें आध्यात्मिक प्रगति का भी संकल्प लेना चाहिए। एक अच्छा, नेक, पवित्र और सदाचारी बनने का संकल्प। ऐसा एहसास उन लोगों को भी प्राप्त होता रहता है, जो पूजा स्थल पर नहीं जाते हैं, लेकिन दूसरों के प्रति सदैव अच्छी भावना बनाए रखते हैं। अच्छे कर्मों को संपादित करना भी हमें संतुष्टि का सुखद एहसास कराता है। जीवन में प्राप्त होने वाली यही संतुष्टि जब लंबे समय तक मस्तिष्क में अनुभव होती है, तब यह मस्तिष्क की गहराइयों की ओर बढ़कर यहां स्थायीत्व लाती है। इसके लिए हमें बाहरी दुनिया में नहीं बल्कि अपने अंदर काम करना होगा। अपनी सोच और समझ को धीरे-धीरे निखारना होगा। हम सभी अपना-अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझ बढ़ती है, वैसे ही हमारी सोच भी बढ़ती चली जाती हैं।

कई बार आप किसी से मिलते हैं। उनके त्वरितत व्यवहार के आधार पर आप उनके अवगुण के बारे में बताने लगते हैं। पर यहां आप भूल कर रहे हैं। यह भी संभव हो सकता है, कि उस व्यक्ति में कोई गुण भी हो। हमारे अंदर इतनी शक्ति ही न हो कि हम उसके गुणों को देख सकें। सामान्य स्थिति में हर मानव के अंत:करण में विभिन्न भाव उत्पन्न होते हैं। लेकिन ये भाव इतने शक्तिशाली नहीं होते जो ऐसी शक्तिशाली तरंगों को उत्पन्न कर सकें जो दैवीय शक्ति तक पहुंचने में सफल हो जाएं। यही कारण है कि लोगों की आवाज या लोगों के भाव ईश्वरीय शक्ति तक नहीं पहुंच पाते हैं। हमें हर समय याद रखना चाहिए कि हम सब ईश्वर की संतान हैं। पशु-पक्षी या जितने भी जीव जंतु है, सभी में उनका ही वास है। वे संसार के कण-कण में विद्यमान हैं। हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि, हमारा दृष्टिकोण खुला हो। हम सभी को एक ही नजर से देख पाएं। हमें जब यह एहसास हो जाएगा, तो हमारी दूसरों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाएगी। हर धर्मग्रंथ में ऐसे भावों को उत्पन्न करने की तकनीक का वर्णन किया गया है। लेकिन ज्यादातर लोग इस तरफ ध्यान नहीं दे पाते। ऐसा नहीं है कि वे इस विशेष तकनीक को नहीं समझते हैं, लेकिन इसका अनुसरण इसलिए नहीं करते हैं, क्योंकि इसके अंतर्गत अच्छे कर्मों का किया जाना भी शामिल रहता है। जिन्हें करने से ऐसे लोग प्राय: दूरी बनाए रखते हैं। अच्छे कर्मों का तात्पर्य, समर्पित भाव से संपूर्ण ईश्वरी व्यवस्था के प्रति भावनात्मक झुकाव होता है। जिसमें अपने स्वयं के हित को नजरअंदाज कर दूसरों के हित को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे लोगों की सोच व समझ भी सही मायने में बढ़ जाती है। जो लोग ऐसा करते रहते हैं, उनके हृदय में निश्चित ही ऐसी भावनाओं का जन्म होने लगता है, जो उन्हें ऐसे कार्य के प्रति और भी अधिक प्रेरित करती रहती हैं। ऐसा करते रहने में व्यक्ति मे स्वयं की संतुष्टि का स्तर बढ़ता ही रहता है। जो एक दिन उसे जीवन के ऊंचाइयों पर ले जाने में पूरी तरह सक्षम होता है। इसलिए हमें अपनी संपूर्ण प्रगति के लिए आध्यात्मिक संकल्प भी करना चाहिए।

अध्यात्मिकता केवल हिमालय पर ही नहीं मिलती, बल्कि आध्यात्मिकता वहीं है, जहां पर आप हैं। लोगों के मध्य में भी अध्यात्म को साधा जा सकता है। धर्म दिव्यता का एक गुण  है। धार्मिक भावनाओं के द्वारा ही हम अपनी सोच और समझ को विकसित करके एक महान व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते हैं। हर धर्म ग्रंथ का मूल निचोड़ एक ही है, कि संपूर्ण मानवता के प्रति आपसी प्रेम, सद्भावना, भाईचारा, शांति,  उन्नति का विस्तार हो।

27. सत्य की खोज – शिक्षा

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

शिक्षा गुरु शिष्य की परंपरा से होते हुए बहुत लंबा सफर तय कर चुकी है। आज के समय में आप मोबाइल पर किसी को भी अपना गुरु बना सकते हैं और किसी से कुछ भी सीख सकते हैं। नई-नई तकनीकों ने हमें कहीं भी, कभी भी पढ़ने का मौका दिया है। अब क्लास रूम की बंदिशे हट गई हैं और कई मोबाइल एप्स पर आप अपनी शंकाओं का समाधान भी कर सकते हैं।

वास्तव में शिक्षा सत्य की खोज है। यह ज्ञान और अंतर्ज्ञान के माध्यम से अंतहीन  यात्रा है। इस तरह की यात्रा से मानवतावाद के विकास का नया रास्ता खुलता है, जहां न घृणा, न ईष्र्या और न ही दुश्मनी की कोई गुंजाइश है।

महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम

शिक्षा प्रणाली को छात्रों की शक्ति का पता लगाना और उनका निर्माण करना है। साथ ही उनकी रचनात्मकता को बाहर लाना है जिससे धीरे-धीरे एक जिम्मेदार नागरिक का विकास हो सके। इसलिए हमारी शिक्षा प्रणाली को यह चाहिए कि, वह छात्रों को यह जानने में मदद करने के लिए खुद को फिर से उन्मुख करें कि वे किस ताकत के मालिक हैं, क्योंकि इस ग्रह पर पैदा होने वाले हर इंसान को कुछ खास ताकतें प्राप्त हुई हैं। ये मनुष्य के व्यक्तित्व को एक महान आत्मा और ब्रह्मांड में कीमती चीज में बदल देती है। अपने वास्तविक अर्थों में सार्वभौमिक भाईचारा ऐसी शिक्षा के लिए सहारा बन जाता है। वास्तविक शिक्षा मनुष्य की गरिमा  और उसके स्वाभिमान को बढ़ाती है। यदि शिक्षा का वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति द्वारा महसूस किया जा सकता है, और मानव गतिविधि के हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया जा सकता है, तो दुनिया में रहने के लिए एक बेहतर जगह होगी। शिक्षित व्यक्ति ही सुशिक्षित समाज का निर्माण करता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति से समाज की ओर उन्मुख है, जिसमें एक बच्चे का अपने कदमों पर खड़ा होना पिढियों तक ज्ञान के प्रसार का माध्यम बनता है। शिक्षा में धीरे-धीरे किताबी ज्ञान के साथ और भी बहुत सी चीजें जुड़ती जा रही हैं, जो एक शिक्षित व्यक्ति को सुशिक्षित समाज में बदल सकती हैं। यह बदलाव तेज होगा और हम ज्यादा बेहतर इंसान बनकर अपने दायित्वों और कर्तव्यों से राष्ट्र निर्माण में भागीदार बन सकेंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है। अब शिक्षक भी अपने शिष्यों को बेहतर तरीके से समझाने में विश्वास करते हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण केमिस्ट्री के प्रोफेसर बंकिम बाबू हैं। उन्होंने केमिस्ट्री की साहित्य से अनूठी जुगलबंदी कर इसे बहुत सरल बना दिया है। 75 बरस के बंकिम बाबू सही मायने में शिक्षा के दूत हैं। उन्होंने वंचित छात्र-छात्राओं को पढ़ाने में अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। 1970 में आईआईटी खड़कपुर से केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद सामने नौकरियों की झड़ी लग गई थी। विदेश से भी बड़े-बड़े ऑफर मिले। उनके सारे साथी सुनहरे भविष्य का सपना लिए देश छोड़कर चले गए, लेकिन बंकिम बापू ने मातृभूमि की सेवा करने की ठानी और अपने गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। केमिस्ट्री की पढ़ाई में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए उन्होंने एक नायाब तरीका ढूंढा। उनका मानना है कि केमिस्ट्री बहुतों के लिए मिस्ट्री या गुत्थी से कम नहीं। रासायनिक समीकरण-प्रतिक्रिया और सूत्रों को समझने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं, लेकिन जब बंकीम बिहारी पढ़ाते हैं तो विज्ञान की यह बेहद मुश्किल विद्या बहुत आसान लगने लगती है। उनका पढाने का अंदाज बेमिसाल है। उन्होंने केमिस्ट्री को मजेदार कविताओं का रूप दे दिया है। स्कोर बंकिम,अगर मस्तिष्क के दो हिस्से मान लिए जाए तो एक विज्ञान और दूसरा साहित्य है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्य व विज्ञान से ही शिक्षा पूर्ण होती है। केमिस्ट्री के कई सूत्र मुश्किल से याद रहते हैं। जबकि कविताएं आसानी से याद हो जाती हैं। इसलिए मैंने केमिस्ट्री को कविताओं का रूप देकर पढ़ाने की सोची। जैसे- लेकर गरम इथर, घोलें सल्फ्यूरिक एसिड रत्ती भर, मिल जाएगा अल्कोहल भरकर। इस तरह की करीब 50 कविताएं लिख चुके हैं। यह शिक्षा के क्षेत्र में एक नया अविष्कार है। बच्चे केमिस्ट्री के पीरियोडिक टेबल आसानी से याद कर लेते हैं। अब वे केमिस्ट्री की मुश्किल से मुश्किल चीज को कविता के रूप में समझ कर धारा प्रवाह से बोलते हैं। शिक्षा वो नहीं होनी चाहिए, जो छात्रों के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंस दे। वास्तविक शिक्षा वह कहलाती है, जो उसे आगामी कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे। हमें शिक्षा को अपने जीवन में अंगीकार करना होगा, न कि उससे सिर्फ ज्ञान प्राप्त करें। हम ज्ञान से शक्तिशाली तो बन सकते हैं, लेकिन अनुभव से हम परिपूर्णता प्राप्त करते हैं। उच्चतम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को गतिशील बनाते हुए, सामंजस्य स्थापित करती है। शिक्षा हमारे जीवन में मार्ग-दर्शक की भूमिका निभाती है। इसलिए कहा गया है- सत्य की खोज – शिक्षा ।

26. संघर्ष

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

अगर जीवन में संघर्ष न हो तो मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता। बिना कड़ी मेहनत के जो सफलता पाई जाती है, वह महत्वहीन होती है। परिस्थितियों से जूझते हुए, कठिनाइयों से लड़ते हुए यदि हिम्मत ना हारी जाए, तो सफलता रूपी मंजिल जरूर मिलती है। चुनौतियों से लड़ते हुए, संघर्ष करते हुए व्यक्ति की जीवात्मा के ऊपर छाया हुआ अंधेरा छंटता है और जीवन प्रकाशमान होता है। आमतौर से अपने बचपन से ही हम ऐसे जुमले सुनते हुए बड़े होते हैं, कि जीवन संघर्ष का ही नाम है। बगैर संघर्ष किए जीवन रूपी नैया को पार लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। जब हम छोटे होते हैं, किशोर होते हैं, उन दिनों की सुनी गई तमाम बातें हमारे चेतन, अवचेतन में हमेशा रहती हैं और कहीं ना कहीं हमारी तमन्नाऐं भी उनसे प्रभावित होती हैं। बचपन में हम बड़े-बूढों से सुनते हैं, कि जितनी चादर हो उतने पैर फैलाने चाहिए। उनके कहने का अभिप्राय यह था कि हमें अपनी हैसियत के अनुसार कार्य करना चाहिए, ताकि किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन मेरे विचार थोड़े से भिन्न हैं, जरा सोचिए चादर तो बढ़ाई जा सकती है, पर क्या चाह कर भी हम पैर बढ़ा सकते हैं। इसलिए अगर हमारे पास बड़े पैर हैं, लंबे पैर हैं तो हमें क्यों नहीं उनके हिसाब की चादर का इंतजाम करना चाहिए। हम अपने पैर ही क्योंं सिकोडें ? दरअसल सुनने में यह बात (उतने पैर फैलाइये, जितनी लम्बी चद्दर) भले ही व्यवहारिक और सजग रहने के लिए जरूरी लगती हो, लेकिन हकीकत में यह बहुत नकारात्मक बात है। जब हमारे जीवन में कुछ भी सरल नहीं है। यहाँ हर व्यक्ति को अपनी मंजिल को पाने के लिए संघर्ष का सहारा लेना ही पड़ता है। तो इस तरह की प्रतिबंधित सोच के बीच हम कभी भी बड़ा नहीं  सोच सकते। हम हमेशा अपनी चादर से कम के बारे में सोचेंगे और ऐसे में अगर दुर्भाग्य से हमारे पैर बड़े हुए तो हमें उनके सिकोड़ने की कला में पारंगत होना पड़ेगा, जबकि यह चादर को बड़ा बनाने के मुकाबले कहीं ज्यादा पीड़ादायक है।

बावजूद इसके कोई भी उपदेशक हमसे यह नहीं कहता कि अपने पैरों से बड़ी चादर की व्यवस्था करें। एक बार जब हमारे अंदर इस तरह की आदत घर कर जाती है तो, फिर हम हमेशा पैर सिकोड़ने के बारे में सोचते रहते हैं। यहाँ तक कि सिकोड़ते-सिकोड़ते इतना सिकोड़ देते हैं कि अपना वजूद ही खो देते हैं। हालांकि जब जीवन में बुनियादी समस्याएं हों तो संघर्ष करने की इच्छाशक्ति को बनाए रखना थोड़ा कठिन होता है। क्योंकि ऐसे में लक्ष्य की प्राप्ति के साथ बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। इस तरह से जीवन का संघर्ष दोगुना हो जाता है। ऐसे में यदि व्यक्ति के अंदर आतंरिक बल है, प्रर्याप्त शारीरिक और मानसिक क्षमता है, तो दोगुने संघर्ष में भी कोई दिक्कत नहीं आती। इसके लिए सिर्फ जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, चाहत और लक्ष्य को पाने की मन में ललक होनी चाहिए। लेकिन भारतीय समाज में ही नहीं दुनिया के ज्यादातर समाज में नकारात्मकता मौजूद होती है। यही वजह है बिजनेस के क्षेत्र में सिर्फ 10% लोग सफल होते हैं। लेकिन अगर इस आंकड़े को इस प्रकार से देखा जाए की भरपूर उदारता के साथ कारोबार करने वाले लोग ज्यादा सफल होते हैं, तो पता चलेगा कि ज्यादातर लोग काम से नहीं, अपनी सोच से असफल होते हैं। दरअसल जो व्यक्ति हमेशा नकारात्मक सोचता है, वह हमेशा डरी-डरी मन: स्थिति में रहता है। उसका आत्मविश्वास हमेशा कमजोर रहता है। यही कारण है कि वह कभी उंचे ख्वाब नहीं देखता। कोई जोखिम नहीं लेता। संघर्ष करने की लगन ही व्यक्ति की लक्ष्य की ओर गति को थमने नहीं देती। आशा की किरण को टूटने नहीं देती, बल्कि उत्साह-उमंग को निरंतर बढ़ाती है। यही कारण है कि आज देश में अभावों के अंधेरों के बीच भी सफलता की रोशन राहें निकाल रही हैं।

सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति चुनौतियों को पसंद करता है। परिणाम स्वरूप वह किसी कार्य में हाथ आजमाने से नहीं चूकता। सहूलियतों के बीच जीवन जीकर मुकाम बनाना ही सब कुछ नहीं है, बल्कि अभावों के बीच जीवन जीना भी जरूरी है। तभी जीवन के सही मर्म का पता चलता है। वास्तव में सफलता प्राप्त करने के लिए जीवन में संघर्ष जरूरी है। इसके साथ ही चुनौती पसंद होना भी जरूरी है। खाब जब तक ऊंचे नहीं होंगे, तब तक उसे पाने की चाहत के चलते हम कठिन परिश्रम नहीं करेंगे, मेहनत करने से कतराते रहेंगे। इसलिए मेहनत, परिश्रम, अनुशासन, समय का सदुपयोग, इन सब गुणों को सीखने से पहले जरूरी है कि हम अपनी सोच बदलें। सकारात्मक बनें। अगर किसी काम में बार-बार असफलता मिल रही है तो उसके पीछे के कारण को जानें। स्नातक की उपाधि प्राप्त करने वाली पहली बधिर एवम् दृष्टिहीन अमेरिकी महिला हेलेन एडम्स केलर का कथन था- संघर्ष हमारे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। यह हमें सहनशील और संवेदनशील बनाता है और साथ ही हमें यही सिखाता है कि भले ही यह संसार दुखों से भरा हुआ है, लेकिन उन दुखों पर काबू पाने के तरीके भी अनेकों हैं। इसी प्रकार जान डी लेते के अनुसार- संघर्ष की चाबी जीवन के सभी बंद दरवाजे खोल देती है और आगे बढ़ने के लिए नए रास्ते भी प्रशस्त करती है। इस तरह संघर्ष की तपन मनुष्य के जीवन को तपा कर कुंदन बना देती है। संघर्षशील व्यक्ति ही जीवन रूपी नैया को पार करने का माद्दा रखता है। सफलता की इमारत संघर्ष की नींव पर ही खड़ी होती है।

25. स्वयं की तलाश

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मैं कौन हूं? मेरा वजूद क्या है? मैं कहां से आया हूं? वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति को खुद के बारे में कोई भी ज्ञान नहीं होता। इस भौतिक संसार में वह किस प्रयोजन के लिए आया है। ऐसे बहुत सारे प्रश्न मानव के मस्तिष्क में उत्पात मचाते रहते हैं। किंतु इन प्रश्नों का उत्तर इतना आसान और साधारण नहीं है। दुर्भाग्यवश हम खुद को पहचान ही नहीं पाते और अपना सारा जीवन इसी अज्ञानता में गुजार देते हैं। पुराणों में भी कहा गया है- “अहम् ब्रह्मास्मि” अर्थात में ही ब्रह्म हूं। आशय यह है कि इस संसार का हर व्यक्ति ब्रह्म का अवतार होता है। लेकिन मानव में ब्रह्म की खोज का मार्ग आसान नहीं है।

ब्रह्म निर्माण के लिए उसे स्वयं की शिद्दत से तलाश करनी होगी। इस मायावी संसार में मानव केवल ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है। मानवीय कमजोरियों के रूप में लोभ, तृष्णा, मोह-माया और विविध प्रकार के लौकिक बंधनों से खुद को मुक्त करने की दरकार है। स्वयं को तराशने के लिए खुद में छुपे हुए बाह्य अवगुणों के रूप में बेकार मलबे को तप-त्याग और तपस्या की छेनी से हटाने की जरूरत है। जिस दिन हम ऐसा करने में सफल हो जाएंगे, वह दिन मानव के सर्जन और विकास का दिन होगा। लेकिन व्यक्ति को व्यथित एवं बेचैन करने वाली मनोवृति अभाव रूप में नहीं बल्कि भाव रूप में विद्यमान है। भाव की उत्तेजित अवस्था प्राय: इसलिए होती है कि अन्य लोग क्यों इन वस्तुओं का उपयोग करते हैं? जबकि वह वस्तु उसके पास नहीं है।

प्राय: मनुष्य इसलिए दुखी नहीं रहता कि उसके पास भवन, वस्त्र एवं सुविधायुक्त वस्तुएं क्यों नहीं है? परन्तु दूसरों के पास ऐसी वस्तुएं क्यों उपलब्ध हैं इसलिए ज्यादा परेशान रहते हैं। कुछ लोगों में यह प्रवृत्ति अधिक विकसित होती है। किसी को नया वस्त्र, आभूषण चाहिए। ऐसी अनेकानेक बातें निरंतर उसके मन में अशांति उत्पन्न करती रहती हैं और वह ईर्ष्या के प्रभाव से ग्रस्त हो जाता है। अपनी मनपसंद वस्तु पाने के लिए तरह-तरह के तरीके अपनाता है। लेकिन फिर भी वह ईर्ष्या की तपन में जलता रहता है।

एक बार एक गुरु ने अपने शिष्यों से कहा कि वे घर जाकर आलू पर उन व्यक्तियों का नाम लिखें, जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। आप जितने भी व्यक्तियों से् ईर्ष्या करते हैं, उतने ही आलू लेकर प्रत्येक पर उनका नाम लिख दें और उन आलुओं को थैली में रखकर  मेरे पास लेकर आएं। अगले दिन सभी शिष्य आलू की थैली लेकर आए। किसी के पास 4 आलू थे, तो  किसी के पास 2 या 8, प्रत्येक आलू पर उनका नाम लिखा था, जिनसे वे ईष्र्या करते थे। इसके बाद गुरु जी ने कहा कि अगले 7 दिन तक वे सोते-जागते, खाते-पीते हमेशा जहां भी जाएं आलू की थैली को अपने साथ लेते जाएं। 7 दिन के बाद सभी गुरुजी के पास पहुंचे। गुरू जी ने सभी को अपनी थैलियां उनके पास रखने को कहा, इतना सुनते ही सभी ने चैन की सांस ली। दो-तीन दिन के बाद जब आलू सड़ने लगे तो सभी उसकी सड़न और बदबू से परेशान होने लगे थे। गुरु जी के पूछते ही सभी आलू की दुर्गंध से होनेवाले कष्टों का ब्यौरा देने लगे। गुरु जी ने  हंसते हुए कहा कि जब मात्र 7 दिनों में ही आपको ये आलू  बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ऐसा करते हैं। उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा। आप लोगों को ईष्र्या की सड़न जरूर परेशान करती होगी। मगर उस बोझ को आप पूरी जिंदगी ढोते रहते हैं। इस अनावश्यक बोझ से आपके मन और दिमाग को कितनी परेशानी होती होगी, फिर भी आप ईष्र्या के भाव को नहीं छोड़ते। दूसरों से अच्छे रहें यही भाव मनुष्य की अशांति, आंतरिक दुख और शिक्षा का अहम कारण होता है। मन बेचैन रहता है। सब कुछ होते हुए भी मनुष्य अतृप्त रहता है। यह एक छूत से फैलने वाले रोग के सदृश्य शीघ्र ही विकसित होने वाला मनोभाव है। अभी आप शांत, गंभीर और प्रसन्न है। परंतु जैसे ही दूसरों की कोई भी उत्तम वस्तु देखी, आप चिंता में जलने लगते हैं। उसको पाने के लिए मन मचल उठता है। याद रखिए, आप चाहें सब कुछ पा लें, परंतु फिर भी किसी न किसी वस्तु का अभाव सदा बना ही रहता है। अभाव मानव मस्तिष्क की प्रबलतम कमजोरी है। हमें इस बात का बोध होना चाहिए कि जीवन में किसी भी चीज की अति न हो। जैसे-बीज में अत्यधिक पानी डालने से बीज अंकुरित नहीं होता और वह पेड़ नहीं बन पाता है। उसी तरह हमें अति नहीं करनी चाहिए। हमें ईष्र्या को अपने भावों में  स्थान नहीं देना चाहिए। ईष्र्या से बड़ी कोई बीमारी नहीं है। मनुष्य वही है, जो कल्पना के माया जाल एवम ईष्र्या जैसे मनोविकार के वश में न होकर अपनी प्राप्त वस्तुओं का ही सबसे उत्तम उपयोग करता है। हर समय सपनों के मायाजाल में उलझे रहना अनहितकारी है। सच पूछिए तो इस सृष्टि में मानव का अवतरण एक अद्भुत घटना है। मनुष्य के व्यक्तित्व में छिपे हुए संदेश प्रेरणा से ओतप्रोत हैं। संजीदगी से विचार करें, तो यह समझते देर नहीं लगती कि इस सृष्टि में हर व्यक्ति की प्रारब्ध की कहानी उसके अवतरण से शुरू होती है और तराशने के बाद उसके व्यक्तित्व का सर्जन होता है।

24. अमंगल से मंगल

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

अमंगल अर्थात मनुष्य के जीवन की वह स्थिति जिसमें मनुष्य अपने जीवन के किसी विशेष समय में, किसी विशेष संकट में पड़ कर, अपने दुर्भाग्य को देख रहा होता है। जैसे कि वह किसी दुर्घटना का शिकार हो अथवा किसी अनचाही स्थिति में फंसकर अपयश का भागी बनना पड़ा हो। इसके विपरीत मनुष्य जीवन की मांगलिक स्थिति वह होती है, जब वह स्वस्थ, संपन्न और यशस्वी होकर जीवन को आनंद से जीता है, तथा उसके जीवन में ऐसी कोई भी घटना न घटी हो, जिससे उसे अपयश का भागी बनना पड़ा हो। इस तरह मनुष्य के जीवन की यह दोनों घटनाएं विपरीत ध्रुवों पर खड़ी होती हैं और प्राय: कभी भी एक दूसरे को उत्पन्न करने का कारण नहीं बनती।

परंतु विधि का विधान विचित्र और सामान्य बुद्धि से परे है। इसलिए हमारी सृष्टि में अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें यह देखने को मिल जाता है की यद्यपि व्यक्ति के जीवन में घटित तो हुआ था अमंगल किंतु उसका जो परिणाम निकला वह मंगलदायक हुआ।

मैं महाभारत की एक घटना की ओर ध्यान दिलवाना चाहती हूं। जब पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास की सजा मिली, तब अर्जुन अपने अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ाने के लिए तप कर रहा था। उसी  दौरान उसे देवलोक में जाने का रास्ता मिला। वहां पर अप्सरा उस पर मोहित हो गई और उसे प्रेम निवेदन करने लगी। लेकिन अर्जुन ने मना कर दिया, जिससे क्रोधित होकर उसने अर्जुन को किन्नर होने का श्राप दे दिया। जब अर्जुन ने उसे अनुनय-विनय किया तो, उसने श्राप की अवधि 1 वर्ष कर दी। यह स्थिति अर्जुन के लिए बहुत ही कष्टकारी ओर अमंगलकारी थी। लेकिन जब अर्जुन को देवराज इंद्र ने समझाया कि तुम्हारा यह श्राप मंगलदायी होकर फलीभूत होगा, तब उसको इस कष्टकारी स्थिति से राहत मिली। जब उनका अज्ञातवास शुरू हुआ तो हर किसी को पहचान छुपाने की चिंता थी। ऐसे में अर्जुन को अपनी पहचान छुपाने के लिए उसका वह श्राप मंगलकारी सिद्ध हुआ था।

ऐसा ही एक वाक्या चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के साथ भी हुआ। एक बार जब वे शिकार करने वन में गए थे तो उन्हें घडे़ में पानी भरने की आवाज को जानवर की आवाज समझ कर शब्दभेदी बाण चला दिया। जिससे शांतनु और ज्ञानवती के पुत्र श्रवण कुमार ने दम तोड़ दिया। श्रवर्ण के माता-पिता अंधे थे। उन्होंने जब अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार सुना तो व्यथित होकर राजा दशरथ को श्राप दे दिया कि- राजन जिस प्रकार हम अपने पुत्र के वियोग में अपने प्राण त्याग रहे हैं, उसी तरह से तुम्हें भी अपने पुत्र के वियोग में प्राण त्यागने पड़ेंगे। उस समय तक राजा को कोई संतान नहीं थी। किंतु बाद में श्री राम उनको पुत्र रत्न के रूप में प्राप्त हुए और उनका श्रापमंगलकारी साबित हुआ।

23. परिवार का महत्व

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

इंसान के जीवन में परिवार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जीवन की हर परिस्थिति में परिवार हमारे साथ खड़ा रहता है। हमें हर प्रकार से मनोबल प्रदान करता है। घर के बड़े बुजुर्ग हमें अपने अनुभवों से जीवन में आगे बढ़ने, उन्नति करने व हर परिस्थिति में खुश रहने की शिक्षा प्रदान करते हैं। परिवार का अपनत्व हमें अकेला महसूस नहीं होने देता। परिवार हमारे जीवन में रीढ की हड्डी की तरह महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार रीढ की हड्डी हमारे शरीर का सारा भार वहन करती है, उसी प्रकार परिवार भी हमारे जीवन में आने वाले सुख-दुख, उतार-चढ़ाव, यश-अपयश आदि का भार उठाता है। विषम परिस्थितियों में परिवार हमारे लिए रक्षा कवच बन जाता है। जीवन की परेशानियों और कठिनाइयों से वह हमें उसी प्रकार बाहर निकाल लाता है, जिस प्रकार माली फूलों को चुनते हुए पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। इस दुनिया में वह इंसान खुश-किस्मत है, जिसके पास सुख में ह्रास-परिहास करने के लिए और दुख-विपत्ति में साथ में बैठकर गम बांटने के लिए परिवार है।

परिवार की पाठशाला से ही एक व्यक्ति संस्कारों की शिक्षा ग्रहण करता है। बचपन से ही बच्चों में संस्कारों का बीज बो दिया जाता है। जब बच्चे दादी-नानी को पूजा-पाठ  व उपवास करते हुए देखते हैं, तो उनके कोमल मन में स्वाभाविक रूप से उपवास करने की भावना जागृत हो जाती है और वे बचपन से ही ईश्वर में विश्वास करने लग जाते हैं। उनके जिज्ञासु मन में पूजा-पाठ और उपवास को लेकर अनेक सवाल उमड़ पड़ते हैं। जिनका समाधान ढूंढने के लिए वे बार-बार प्रश्न करते रहते हैं। उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए दादी-नानी समझाती हैं- उपवास में तन और मन के साथ, श्रेष्ठ समाज का निर्माण भी समाहित है। उन्होंने फिर पूछा- अब तक हमने सुना था- उपवास से तन स्वस्थ व आत्मा पवित्र होती है, यह समाज बीच में कहां से आ गया? तब दादी-नानी गंभीरतापूर्वक एवं धैर्य के साथ समझाना शुरू करती हैं कि- बात दरअसल यह है कि उपवास करने से धार्मिक भावना का उद्गम तो होता ही है, उसके साथ-साथ यह भी ज्ञात हो कि भूख क्या होती है? भूख का महत्व मालूम होना ही चाहिए, ताकि बड़े होकर दिन-हीन व्यक्तियों के प्रति इनके मन में सहिष्णुता एवं उदारता के भाव हों, भूखों को भोजन कराने की लालसा इनके मन में जागृत रहे। कुछ नहीं तो किसी जरूरतमंद को हेय दृष्टि से तो नहीं देखेंगें। ये सभी संस्कारों की अनमोल कड़ी है, जो स्वस्थ समाज के लिए अति आवश्यक है।

इस तरह के अनेकों संस्कार बच्चों को परिवार के सदस्यों से मिलते रहते थे। लेकिन आज के वैश्वीकरण के दौर में कहने को विश्व संकीर्ण हो गया है। लेकिन इसके हानिकारक प्रभाव के रूप में परिवार के सदस्यों के मध्य की दूरियां कम होने की बजाय और बढ़ गई हैं। संयुक्त परिवार की प्रथा अपने अद्योपतन को पा चुकी है। आज एकल परिवार में माता-पिता को अपने बच्चों के लिए समय नहीं है और बच्चों को अपने माता-पिता के लिए समय नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में खटास उत्पन्न हो रही है। भाई-भाई का दुश्मन हो गया है। छोटे-छोटे बच्चे घर छोड़कर जाने की, आत्महत्या करने की धमकी अपने माता-पिता को देते रहते हैं। माता-पिता अगर उनको समझाने की कोशिश करते हैं तो उनकी बात पर गुस्सा करते हैं। दरअसल उनकी भी गलती नहीं है। वे माता-पिता हैं। बच्चों का भला ही चाहते हैं। लेकिन बच्चे कुछ समझने को तैयार नहीं होते।

एक कहानी याद आती है- एक सुनार की और एक लोहार की दुकान आसपास थी। सुनार सोने को हथौड़ी से पीटकर आकार दे रहा था तो, वह लोहार की दुकान पर लोहे के कण के पास आ गिरा। सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- तू इतना दुखी क्यों है? लोहे ने कहा- मुझे तो अपना ही पिटता है। अपनों की चोट ज्यादा तेज होती है। तो सोने का कण बोला- यही चोट हम दोनों को सुंदर आकार में भी ढाल देती है। तुम्हे तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारे अपने ही तुम्हारा भविष्य गढ रहे हैं। इस कहानी की तरह सोने के कण वाले विचार रखिए तो, आपको उनकी बात से टेंशन नहीं होगी और न ही गुस्सा आएगा। लेकिन आज के दौर में बच्चे हों या बड़े अपने व्यावहारिक जीवन के रिश्तों के प्रति विमुख होकर सोशल जगत में आभासी मित्रों से रिश्ते बनाने और उनसे संवाद साधने में अधिक व्यस्त होते जा रहे हैं। सस्ती लोकप्रियता के फेर मेंआत्ममुग्ध इंसान आज अपने हित और अहित की चिंता भी ठीक से नहीं कर पा रहा है। परिवार में पहले एक साथ मिलकर खाना खाने वाले अब समय के अभाव के चलते न तो एक साथ मिलकर खाना खा पाते हैं और न ही एक घर, एक परिवार में रहने के बाद मिल पाते हैं। साथ रहकर भी उनके बीच एक तरह की दूरी बनी रहती है। यदि आप संयुक्त परिवार में रहते हो, तो यह स्वाभाविक है कि कभी आपको प्रशंसा मिलेगी, तो कभी निदां का भागी भी बनना पड़ेगा। कभी-कभी परिवार के किसी सदस्य का व्यवहार भी आपको परेशान कर सकता है। तो इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है  कि आप अकेले रहने लग जाएं। अगर कोई समस्या है भी तो उसका विचार-विमर्श कर समाधान निकालें, न कि परिवार के विघटन का कारण बने। ना समझी और गलतफहमियों के शिकार होकर लिए गए निर्णय गलत ही साबित होते हैं। परिवारों का बिखराव हमारे संस्कारों और मूल्यों की परंपरा को ध्वस्त कर रहा है। गूगल हमें हर चीज ढूंढ कर दे सकता है। माता-पिता और बुजुर्गों का अनुभव हमें किसी भी कीमत पर लाकर नहीं दे सकता। इसलिए आभासी दुनिया से निकलकर  वास्तविक दुनिया में परिवार के प्रति हमें अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है। क्योंकि परिवार के बिना बड़ी से बड़ी कामयाबी और समृद्धि खोखली है। आज के समाज में परिवारों के विघटन को रोकने का यही एक तरीका है, कि वे परिवार के जीवन मूल्यों और उनके  महत्व को समझें और उन्हें स्वीकार करें।

22. सुनना भी एक कला है

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

कुछ लोग बहुत ज्यादा बातें करते हैं, वे दूसरों को बोलने का अवसर ही नहीं देते। उनको लगता है कि वो सर्वश्रेष्ठ हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं वो ही सर्वोपरि होता है। ऐसे मनुष्य अपनी मर्यादा भूल जाते हैं। उन्हे इस बात से बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला उनके बारे में क्या सोच रहा है। वे सिर्फ अपनी बात कह कर खत्म कर देते हैं, बगैर यह जाने कि सामने वाला उनकी बातों में दिलचस्पी ले भी रहा है या सिर्फ इग्नोर कर रहा है। जब हम एक-दूसरे से संवाद करते हैं, तो उसमें दोनों का योगदान होना भी आवश्यक है। संवाद सिर्फ बातचीत नहीं बल्कि दो लोगों के बीच का संतुलन है। उनमें से एक वक्ता तथा दूसरा श्रोता होता है। अगर एक ही बोलता रहेगा तो संवाद अधूरा रहता है। यदि आप सिर्फ बात करने के आदी हैं, तो सुनने की कला भी सीखनी होगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि- ज्यादा बोलने की बजाय, ज्यादा सुनना फायदेमंद होता है।

कई बार हम बिना सोचे-समझे और बिना सुने किसी नतीजे पर पहुंच जाते हैं। हम बिना सच्चाई जाने अपनी बात पर अड़ जाते हैं कि हम ही सही हैं। जबकि हम सिक्के का एक ही पहलू देख रहे होते हैं। इसलिए हमें अपने अंदर सुनने की कला पैदा करनी चाहिए। जिससे हम अपनी बात को तो रखें ही, लेकिन दूसरों की बातों को ध्यान से सुनकर, समझ कर, हम किसी नतीजे पर पहुंच कर अपना नजरिया पेश करें, न की बगैर सच्चाई जाने आनन-फानन में अपना पक्ष रखें, जिससे बाद में हमें पछताना पड़े। मैं एक कहानी के माध्यम से समझाना चाहती हूं।

एक गांव में 6 दृष्टिहीन व्यक्ति रहते थे। एक बार उनके गांव में हाथी आया। सभी लोग उसे देखने जा रहे थे। उन्होंने भी सोचा कि काश वे दृष्टिहीन न होते तो वे भी हाथी देख सकते थे। इस पर गांव वालों में से एक ने कहा कि – तुम हाथी को भले ही देख न सकते हो, लेकिन छू-कर महसूस तो कर ही सकते हो, कि हाथी कैसा होता है। सभी उसकी बात से सहमत हो गए और हाथी को छूने के लिए तैयार हो गए। हाथी वाली जगह पर पहुंच कर सभी ने हाथी को छूना शुरु कर दिया। उन सब ने हाथी के शरीर के अलग-अलग हिस्सों को स्पर्श किया था। इसलिए हाथी के बारे में सबकी अपनी-अपनी राय थी। जब उन्होंने आपस में चर्चा करते हुए हाथी का वर्णन शुरू किया तो, जिसने हाथी के अगले पांव को छुआ था, उसने कहा कि हाथी किसी खंभे की तरह होता है। जिसने हाथी की पूंछ को छुआ था ,उसने कहा कि वह रस्सी की तरह होता है। पिछले पैरों को छूने वाला बोला, वह पेड़ के तने की तरह होता है। जिसने कान का स्पर्श किया था, उसने कहा कि, वह तो बहुत बड़े सूप (छाज) की तरह होता है। हाथी के पेट को छूने वाले ने कहा कि वह तो एक दीवार की तरह विशाल होता है। सूंड को छूने वाले ने कहा कि वह मोटी नली की तरह होता है। सभी के अलग अलग मत होने के कारण उनमें बहस होने लगी। और प्रत्येक अपने आप को सही साबित करने में लग गया। क्योंकि सभी अपनी बात पर अडिग थे और कोई भी एक-दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं था। तभी वहां पर वही व्यक्ति आ गया जो उनको हाथी के स्थान पर ले गया था और हाथी को छूकर देखने के लिए कहा था। उसने उनसे पूछा कि वे बहस क्यों कर रहे हैं? उन्होंने कहा हम यह तय नहीं कर पा रहे कि हाथी दिखता कैसा है। फिर एक-एक करके उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझाई। उस व्यक्ति ने सबकी बात ध्यान से सुनी और बोला कि, तुम सब सही हो तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है क्योंकि तुम सब ने हाथी के शरीर के अलग-अलग भागों को छुआ एवं महसूस किया है। अब सबको बात पूरी समझ आ गई। उस व्यक्ति ने कहा कि यदि आप सब ने जो महसूस किया इसके अलावा भी आगे कुछ महसूस करते तो आपको हाथी असल में कैसा होता है, समझ आ जाता।

वेद-पुराणों में भी कहा गया है कि – एक सत्य को कई तरीकों से बताया जा सकता है। इसलिए यदि जब अगली बार आप ऐसी किसी बहस में पड़े तो याद कर लीजिएगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ में सिर्फ कान हों और बाकी हिस्से किसी और के पास हों। इसलिए कम बोलने और अधिक सुनने की कला को अपने अंदर विकसित करें। भले ही आप दूसरों के विचारों को सुनते हुए उनसे सहमत न हों, आपको दूसरों के विचार या बातें सही न लगें, फिर भी आपको अपनी सोच और विचारों को किनारे रखकर सामने वाले की बात को पूरी तन्मयता और गंभीरता से सुनना चाहिए। जब आप सुनने की कला उत्पन्न करने के बाद किसी की बात सुनते हैं तो आप उस पर अधिक ध्यान देते हुए उनकी बातों के दूसरे पहलुओं को अच्छी तरह समझ और देख पाते हैं। ऐसे में आप दूसरे की भावनाओं को समझने में देर नहीं लगाते। यदि आप इस आदत को अपनाना चाहते हैं, तो पहले आप को कम बोलना सीखना होगा और दूसरों को भी अहमियत देनी होगी। सुनने वाले को यहां दो बातों का फायदा होता है। पहला- इससे नई जानकारी मिलती है- क्योंकि ज्यादा बोलने वाले अपनी जानकारी से अधिक कह जाते हैऔर दूसरा- वह उस जानकारी का अच्छी तरह उपयोग कर सकता है। क्योंकि जो लोग सुनने में दिलचस्पी लेते हैं वे सभी की बातों को ध्यान से सुनते हैं। जब आप किसी की बात को ध्यान से सुनते हैं, तो बात करने वाले व्यक्ति को अच्छा महसूस होता है। इससे उसमें आत्मीयता का भाव उत्पन्न होता है और वह आपकी बात पर अधिक विश्वास और आप पर ज्यादा भरोसा करने लगता है। जब आप सुनने की आदत डाल लेते हैं तो दूसरों की बातों को अच्छी तरह समझ कर और उनकी भावनाओं को अच्छी तरह महसूस करके  आप एक उचित प्रतिक्रिया देने योग्य बनते हैं। यदि आप सोच विचार कर बात करते हैं तो लोग आपकी बातों को दिलचस्पी से सुनते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि- उनके बीच में आपने अपना एक मुकाम बना रखा है। कि आप जो भी बोलेंगे वो सही होगा। वे जानते हैं कि आप जरूरत पड़ने पर ही बात करते हैं। इसलिए आप कुछ कह रहे हैं तो अवश्य ही जरूरी होगा। इससे आपके, उनके साथ रिश्ते मजबूत होते हैं और साथ ही समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है। जिससे आप जरूरत पड़ने पर अपनी राय रख सकते हैं और वह उन लोगों की भलाई के काम आएगी।

इसलिए जो लोग जरूरत के समय बोलते हैं, वह हर बात को गंभीरता से समझते हैं। इसलिए हमें बेवजह अपनी एनर्जी को खर्च नहीं करना चाहिए। हमें तभी बोलना चाहिए जब हमें किसी चीज की ठोस जानकारी हो। कम बोलने से आपकी बात में गंभीरता आती है। जिससे प्रत्येक आपकी बात को सुनने में दिलचस्पी लेता है। जो लोग ज्यादा बात करते हैं, उनकी बातों की कोई अहमियत नहीं होती। ऐसे लोग अक्सर अपने जीवन के सीक्रेट सभी के सामने खोल देते हैं क्योंकि वह उनकी निजी जिंदगी के अहम पहलू होते हैं। जिससे बाद में उन्हें पछताना पड़ता है। इसलिए अक्सर कहा जाता है कि- कम बोलें लेकिन सोच विचार कर बोलें। अक्सर आपने यह नोटिस किया होगा कि कम बोलने वालों की यह खासियत होती है कि वह कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाते हैं। जिसके कारण उनकी बात हर किसी को याद रह जाती है। और किसी को भी उनकी बात सुनने में झिझक नहीं होती। इसलिए बातों को घुमा-फिरा कर करने की बजाय कम शब्दों में अपनी बात स्पष्ट करें और अपने अंदर सुनने की कला पैदा करें।