234.वैज्ञानिकों ने स्वीकारा—आत्मा का अस्तित्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में हजारों साल पहले ही शरीर की काया में विद्यमान आत्मा को अजर- अमर माना गया है। हमारे मनीषियों ने सृष्टि के आरंभ में ही आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारा और इसके संबंध में अपने मत भी व्यक्त किए और फिर महाभारत युद्ध के दौरान भी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिए उपदेश में आत्मा को कभी नष्ट नहीं होने वाला बीज- तत्व माना है।

आत्मा के संबंध में गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश का सार- तत्व इस प्रकार है—
” वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय, नवानि गृहणति नरो: प्रराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानी देही”।।

अर्थात् मनुष्य जैसे पुराने कपड़ों को छोड़कर दूसरे नए कपड़े पहन लेता है, ऐसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नए शरीर में प्रवेश कर जाती है। आत्मा के संबंध में एक श्लोक और है—
नैनं छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं कलेदयंत्यापो न शोषयति मारुत:।।

अर्थात् आत्मा के अस्तित्व को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।

आत्मा की अमरता का यह विज्ञानसम्मत शोध हमारे ऋषियों ने 5000 वर्ष पहले ही कर दिया था। भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से मानता है कि जीवात्मा रूपी ईश्वरीय अंश सभी जीवों में एक समान रूप से विद्यमान है। आत्मा या जीवात्मा का न कोई रंग है, न रूप है।
आत्मा के संदर्भ में आश्चर्य यह भी है कि— आत्मा जिस भी जीव में उपलब्ध है, उसे भी न यह दिखती है और न ही वह जीव इसको शरीर के अन्य अंगों की भांति अनुभव करता है। किसी अन्य को भी यह नहीं दिखती है और न ही अनुभव होती है।

इसीलिए हमारी सनातन परंपरा में उल्लेख है कि— जो जीवात्मा है, वह अनेक स्तरों के माध्यम से शरीर से लिपटी हुई है। अब इसी सनातन- मान्यता को वैज्ञानिक समर्थन मिला है।

भौतिकी और गणित के दो वैज्ञानिकों ने लंबे शोध के बाद निष्कर्ष निकाला है कि—
आत्मा मरती नहीं है, मात्र शरीर मरता है। मृत्यु के बाद आत्मा ब्रह्मांड में विचरण करने लगती है। इसमें अंतर्निहित स्मृति या सूचनाएं भी नष्ट नहीं होती।

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की यह भौतिकवादी व्याख्या ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के गणित और भौतिकी के प्राध्यापक सर रोगर पेनरोज और एरीजोना विश्वविद्यालय के भौतिकी विज्ञानी डॉ स्टुअर्ट हामरांफ ने निरंतर दो दशक अध्ययनरत रहने के बाद छह शोध- पत्रों के माध्यम से की है।

इसी शोध के आधार पर अमेरिका के विज्ञान- चैनल ने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई है— शोधकर्ताओं का कहना है कि—मानव- मस्तिष्क एक जैविक कंप्यूटर की भांति है। इस जैविक संगणक की पृष्ठभूमि में प्रोग्रामिंग आत्मा या चेतना है, जो दिमाग के भीतर उपलब्ध एक क्वांटम कंप्यूटर के माध्यम से संचालित होती है। क्वांटम कंप्यूटर से तात्पर्य मस्तिष्क कोशिकाओं में स्थित उन सूक्ष्म नलिकाओं से है, जो प्रोटीन आधारित अणुओं से निर्मित हैं। बड़ी संख्या में ऊर्जा के सूक्ष्म स्रोत-अणु मिलकर एक क्वांटम क्षेत्र तैयार करते हैं, जिसका वास्तविक रूप चेतना या आत्मा है।

इन वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि जब व्यक्ति दिमागी रूप में मृत्यु को प्राप्त होने लगता है, तब ये सूक्ष्म नलिकाएं क्वांटम क्षेत्र खोने लगती हैं। परिणामत: सूक्ष्म ऊर्जा कण मस्तिष्क की नलिकाओं से निकलकर ब्रह्मांड में चले जाते हैं। जब कभी मरता इंसान अचानक जी उठता है, तब ये कण वापिस सूक्ष्म नलिकाओं में लौट आते हैं। वैज्ञानिकों का यह शोध भौतिकशास्त्र के क्वांटम सिद्धांत पर आधारित है। इसके अनुसार आत्मा, चेतन दिमाग की कोशिकाओं में प्रोटीन से बनी सूक्ष्म नलिकाओं (माइक्रो ट्यूबल्स) में ऊर्जा के सूक्ष्म स्रोत अणुओं और उप-अणुओं के रूप में रहती है।

अर्जित ज्ञान भी इन्हीं सूक्ष्म कणों में संग्रहित रहता है। सूक्ष्म ऊर्जा कणों के ब्राह्माण्ड में जाने के बावजूद उनमें दर्ज सूचनाएं नष्ट नहीं होती। सूक्ष्म नलिकाओं पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणाम स्वरुप मनुष्य को चैतन्यता का अनुभव होता रहता है।दरअसल हमारी आत्मा मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) के बीच बनने वाले संबंध से कहीं ज्यादा व्यापक है। असल में आत्मा का निर्माण उन्हीं तंतुओं या तत्वों से हुआ है, जिनमें सक्रियता और समन्वय के पश्चात् ब्रह्मांड अस्तित्व में आया था। इसलिए भारतीय दर्शन में उल्लेख है कि आत्मा, काल के जन्म से ही ब्रह्मांड में व्याप्त है।

वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को “आर्वेकस्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिएक्शन” नाम दिया है।
आत्मा से मृत्यु के संबंध के बारे में हामरांफ कहते हैं कि “मृत्यु जैसे अनुभव में सूक्ष्म नलिकाएं अपनी क्वांटम अवस्था गवा देती हैं, किंतु इसके अंदर के अनुभव क्षीण नहीं होते। इसलिए आत्मा केवल शरीर छोड़कर ब्रह्मांड में विलय हो जाती है। इस अवस्था में कई बार कोई व्यक्ति, मृत्यु को प्राप्त हो जाने के पश्चात् भी जीवित हो जाता है, तो इसका कारण यह होता है कि सूक्ष्म नलिकाएं क्वांटम अवस्था को पुनः प्राप्त हो जाती हैं।

जीवन और मृत्यु के बीच व्यक्ति के साथ जो घटता है, वह मृत्यु का मात्र अनुभव होता है। मृत्यु के बाद क्वांटम सूचनाएं शरीर के आसपास कुछ समय तक मंडराती रहती हैं। इन्हें पूरी तरह नष्ट करने के लिए ही हिंदुओं में अंतिम संस्कार के समय कपाल-क्रिया करने का प्रावधान है। म्यूनिख के प्लंक इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिक हेंस पीटर ने भी आत्मा की अमरता पर किए इस शोध से सहमति जताई है।

हमारे पुराणों में तो आत्मा का अति सूक्ष्म रूप से वर्णन किया गया है— आत्मा देहरहित, रूप आदि से हीन, इंद्रियों से अतीत है। यह अजर- अमर है। आत्मा सांसारिक बंधन, मोह- माया, दुख-सुख इन सब से परे है। धूमरहित प्रज्वलित अग्नि शिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वंय प्रदीप्त रहती है। जैसे आकाश में विद्युत-अग्नि का प्रकाश होता है, वैसे ही ह्रदय में आत्मा के द्वारा आत्मा प्रकाशित होती है। जैसे दर्पण में दृष्टि डालने पर हम स्वयं को देख सकते हैं, वैसे ही आत्मा में दृष्टि करने पर इंद्रियों को, इंद्रियों के विषयों को तथा पंचमहाभूतों का दर्शन किया जा सकता है। जब आत्मा उज्जवल प्रदीप के समान हृदयपटल पर प्रकाशित होती है, तब पाप कर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

233. मोक्ष प्राप्ति के साधन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

शास्त्रों में जीवन के चार उद्देश्य—धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष बताए गए हैं। सांसारिक बंधनों से मुक्ति ही मोक्ष का द्वार खोलती है। भारतीय दर्शन केवल मोक्ष की सैद्धांतिक चर्चा ही नहीं करता बल्कि उसके व्यावहारिक उपाय भी बताता है।
न्याय दर्शन के अनुसार दुख का निवारण ही मुक्ति या मोक्ष है।
उसी प्रकार बौद्ध, जैन और मीमांसको ने भी मोक्ष की चर्चा की है।
बौद्ध दर्शन के अनुसार आत्मा के निर्वतन तथा निर्मल ज्ञान की उत्पत्ति ही मोक्ष है।
जैन दर्शन के अनुसार कर्म से उत्पन्न आवरण के नाश से जीव का ऊपर उठना ही मोक्ष है।
वहीं मीमांसकों के अनुसार वैदिक कर्म द्वारा स्वर्ग की प्राप्ति ही मोक्ष है।

भगवान बुद्ध ने मोक्ष प्राप्ति के लिए जीवनपर्यन्त साधना की।
भगवान महावीर को भी कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करनी पड़ी।
गरुड़पुराण में प्रसंग आता है कि— कर्म के अनुसार ही जीव को अपनी जाति, देह, आयु तथा भोग की प्राप्ति होती है। सूक्ष्म शरीर के बने रहने तक पुनः- पुनः जन्म-मरण की परम्परा चलती रहती है। स्थावर, कृमि, पक्षी, पशु, मनुष्य, दानव, देवता और मुमुक्षु यथा कर्म चार प्रकार के शरीरों को धारण करके हजारों बार उनका परित्याग करते हैं। यदि पुण्य कर्म के प्रभाव से उनमें से किसी को मानवयोनि मिल जाए तो उसे ज्ञानी बनकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।
चौरासी लाख योनियों में स्थित जीवात्माओं को बिना मानव योनि मिले तत्वज्ञान का लाभ नहीं मिल सकता। इस मृत्युलोक में हजारों ही नहीं, करोड़ों बार जन्म लेने पर भी जीव को कदाचित ही संचित पुण्य के प्रभाव से मानवयोनि मिलती है। यह मानवयोनि मोक्ष की सीढ़ी के समान है। इस दुर्लभ योनि को प्राप्त कर जो प्राणी स्वयं अपना उद्धार नहीं करता, उससे बढ़कर पापी इस जगत् में दूसरा कौन हो सकता है।

सभी प्रकार के दुखों से मलिन बनाये गये इस दुस्तर असार संसार में नाना प्रकार के शरीरों में प्रविष्ट जीवों की अनंत राशियां हैं। वे इसी संसार में जन्म लेती हैं और इसी में मर जाती हैं। किंतु उनका अंत नहीं होता। वे सदैव दुख से व्याकुल ही रहती हैं।

सत्संग और विवेक—ये प्राणी के मलरहित, स्वस्थ दो नेत्र हैं। इन दोनों मार्गों की शरण में जाकर ज्ञानी जन मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। अपने- अपने वर्णाश्रम धर्म को मानने वाले सभी मानव, दूसरे के धर्म को नहीं जानते किंतु वे दंभ के वशीभूत हो जाएं तो अपना ही नाश करते हैं। क्योंकि अज्ञान से स्वयं अपने आत्मतत्व को ढके हुए लोग प्रचारक बनकर देश- देशांतर में विचरण करते हैं। वे उपवास करके तथा नाम कीर्तन करके, यज्ञ आदि का सहारा लेकर मोक्ष के अधिकारी बनना चाहते हैं। लेकिन मूर्ख लोग यह भूल जाते हैं कि ईश्वर दिखावे की अपेक्षा सरल हृदय से प्रसन्न होते हैं।

शरीर को कष्ट पहुंचाने से अज्ञानीजन क्या मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं? क्या वामी को पीटने से महाविषधारी सर्प मर सकता है? यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। आडंबर का सहारा लेकर समाज को वन के समान मानकर निर्वस्त्र और लज्जारहित जो साधु अन्य पशुओं की भांति इस जगत् में विचरण करते रहते हैं, क्या वे विरक्त हो सकते हैं? यदि मिट्टी, भस्म और धूल का लेप करने से मनुष्य मुक्त हो सकता तो क्या मिट्टी और भस्म में नित्य रहने वाला कुत्ता मुक्त नहीं हो जाएगा? वनवासी, ताप्सजन, घास- फूस, पता तथा जल का ही सेवन करते हैं, क्या इन्हीं के समान वन में रहने वाले सियार, चूहे और मृगादि जीव- जंतु तपस्वी हो सकते हैं? क्या जन्म से लेकर मृत्यु तक गंगा आदि पवित्रतम नदियों में रहने वाले मेंढक या मछली आदि प्रमुख जलचर प्राणी योगी हो सकते हैं? कबूतर, शिलाहार और चातक पक्षी कभी भी पृथ्वी का जल नहीं पीते, क्या उनका व्रती होना संभव है? अतः ये नित्यादिक कर्म लोकरञ्जन के कारक हैं। मोक्ष का कारण तो साक्षात् तत्वज्ञान है।

षड्दर्शन रूपी महाकूप में पशु के समान गिरे हुए मनुष्य, पाश से नियंत्रित पशु की भांति परमार्थ को नहीं जानते। अज्ञानी मानव चिंता से अत्यधिक व्याकुल होकर परमतत्व का कुछ और ही अर्थ निकाल लेते हैं। वे वेद- शास्त्रों को पढ़ते हैं और परस्पर उनको जानने का प्रयास करते हैं, किंतु जैसे कल्छी पाक का रसास्वाद नहीं कर पाती, वैसे ही वे परमतत्व को नहीं जान पाते। सिर पुष्पों को ढोता है, परंतु उसकी सुगंध का अनुभव नासिका ही करती है। ऐसे ही बहुत से लोग वेद- शास्त्रों को पढ़ते हैं, किंतु उनके भाव को समझने वाला दुर्लभ ही है। अपने ही भीतर विद्यमान उस ब्रह्म, परमतत्व को न पहचान कर मूर्ख प्राणी शास्त्रों में वैसे ही व्याकुल रहता है, जैसे कछार में आए हुए बकरी या भेड़ के बच्चे को एक गोप कुएं में खोजता है। सांसारिक मोह को विनष्ट करने में शब्द ज्ञान समर्थ नहीं है, क्योंकि दीपक की वार्ता से कभी अंधकार को दूर नहीं किया जा सकता। मूर्ख व्यक्ति का पढ़ना वैसे ही है जैसे अंधे के हाथ में दर्पण दे देना। यह ज्ञान है। इसको जान लेना चाहिए। ऐसे विचारों में फंसा हुआ मनुष्य सब कुछ जानने की इच्छा करता है, किंतु हजार दिव्य वर्षों तक पढ़ने पर भी वह शास्त्रों का अंत नहीं समझ पाता।

शास्त्र तो अनेक है किंतु आयु बहुत ही कम है और उसमें भी करोड़ों विघ्न बाधाएं हैं। इसलिए जल में मिले हुए क्षीर को जैसे हंस ग्रहण कर लेता है, वैसे ही उसके सार- तत्व को ग्रहण करना चाहिए। वेद- शास्त्रों का अभ्यास करके जो बुद्धिमान व्यक्ति उस परम तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसको सभी दूरविकारों का परित्याग उसी प्रकार करना चाहिए, जिस प्रकार एक धान्यार्थी पुरुष धान ग्रहण कर लेता है और पुआल को फेंक देता है। जैसे अमृत के पान से संतृप्त प्राणी का भोजन से कोई सरोकार नहीं रह जाता, वैसे ही तत्व को जानने वाले विद्वान का शास्त्र से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।

वेदाध्ययन से, शास्त्रों को पढ़ने से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। यह केवल ज्ञान से ही संभव है। हजारों शास्त्रों का भार सिर पर होने पर भी प्राणी को तो संजीवनी देने वाला वह परमतत्व तो अकेला ही है। जिसे गुरु के मुख से प्राप्त करना चाहिए। बंधन और मोक्ष के लिए इस संसार में दो ही पद हैं।
पहला—यह मेरा है।
दूसरा— यह मेरा नहीं है।
यह मेरा है, इस ज्ञान से वह बंद जाता है और यह मेरा नहीं है, इस ज्ञान से वह मुक्त हो जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार— अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवंतिका तथा द्वारका यह सात पुरियां मोक्षप्रदा हैं।
“जो व्यक्ति ज्ञानरूपी हृदय में राग- द्वेष नाम वाले मल को दूर करने वाले सत्य रूपी जल से भरे हुए मानसतीर्थ में स्नान करता है” उसी को मोक्ष प्राप्त होता है।
“प्रोढ वैराग्य में स्थित होकर अनन्य भाव से जो मनुष्य परमतत्व का भजन करता है, वह पूर्ण दृष्टि वाला प्रसन्न आत्मा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है।”

“घर छोड़कर मरने की अभिलाषा से जो तीर्थ में निवास करता है और मुक्ति क्षेत्र में मरता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है”।
तत्वज्ञ ही मोक्ष प्राप्त करते हैं, धर्मनिष्ठ स्वर्ग जाते हैं और पापी नरक में जाते हैं। सभी भारतीय दर्शन बंधन और मोक्ष संबंधी विचार से सहमत हैं। यदि कोई अपवाद है तो वह है— चार्वांक दर्शन, जो घोर नास्तिक और भौतिकवादी दर्शन है। इसी प्रकार कुछ लोग समझते हैं कि मोक्ष मरने के बाद शरीर रूपी बंधन छूटने पर मिलता है। परंतु यह सत्य नहीं है।

मेरा यह निजी अनुभव है कि— जो प्राणी अपनी वाणी, संयम, ब्रह्मचर्य, शास्त्र- श्रवन, अध्ययन, एकांतवाद, जप, समाधि, लोभ, मोह- माया आदि विकारों को त्यागकर अपने मन में शांति, धैर्य, शालीनता, सद्विचार व सरल हृदय से आडंबर रहित व स्थितप्रज्ञ होकर सारी इंद्रियों को लगाम लगाकर उन्हें कर्मयोग (प्रभु-भक्ति) में जोतता है, जो इंद्रियरूपी बैलों से निष्काम स्वधर्माचरण की खेती भली-भांति करा लेता है और अपनी हर श्वास को परमार्थ में खर्च करता हुआ, मौन, निराहार रहकर विषय- भोगों से इंद्रियों को समेट लेता है और अपने मनरूपी घोड़े को बुद्धिरूपी सारथी द्वारा सांसारिक भोगों से अनासक्त करते हुए कर्मों से मन को रोककर, बुद्धि द्वारा शुभ कार्यों में लगाता हुआ उस परमतत्व को प्राप्त कर उसमें एकाकार हो जाता है, तभी वह मोक्ष का अधिकारी होता है।
परंतु हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि—मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किंतु लक्ष्य सभी का एक ही है और वह है जीव को बंधनों से मुक्त करना। इस मृत्युलोक में आवागमन (जन्म-मृत्य) के चक्र से मुक्ति पाना।

232. सेवा भाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बचपन की एक घटना है। एक दिन एक गरीब व्यक्ति उनके घर पर आया और उनसे कुछ मांगने लगा।
ईश्वर चंद्र दौड़ते हुए अपनी मां के पास गए और उनसे उस गरीब व्यक्ति की सहायता करने के लिए कहा।
मां ने अपने बच्चे के अबोध मन को पहचान लिया। वह समझ गई कि मेरे बच्चे का कोमल हृदय सेवा भाव से भरा हुआ है। इसलिए उसने बगैर कुछ सोचे- विचारे तुरंत अपने हाथ से कंगन उतार कर उसकी तरफ बढ़ा दिए।
ईश्वर चंद्र ने अपनी मां के हाथ से कंगन लिए और उस गरीब व्यक्ति को दे दिए।
लेकिन इस घटना को ईश्वर चंद्र बड़े होने तक नहीं भूल पाया। जब वह बड़ा हुआ और कमाने लगा, तब अपनी पहली कमाई से कंगन खरीद कर लाया और अपनी मां को कंगन देते हुए कहा— लो, मां यह कंगन। आज आपका ऋण उतर गया।
मां ने कंगन लेते हुए कहा— मेरा ऋण तो उसी दिन उतर पाएगा, जिस दिन किसी और जरूरतमंद के लिए मुझे अपने कंगन दोबारा नहीं उतारने पड़ेंगे।

मां की यह बात ईश्वर चंद्र विद्यासागर के दिल को छू गई। उन्होंने उसी समय अपना जीवन दीन- दुखियों की सेवा में समर्पित करने का संकल्प ले लिया।
इस संकल्प को पूरा करने के लिए उनके जीवन में बहुत सारी कठिनाइयां आई लेकिन उन्होंने हर कठिनाई को पार किया।

समस्त जगत् के मालिक, पालक और रक्षक ईश्वर हैं। उस ईश्वर के द्वारा बनाई गई समस्त चराचर जगत् के जीवों की सेवा करने से हम ईश्वर के विधान के अनुपालन में योगदान देते हैं। इसीलिए सेवा को सभी पंथो ने स्वीकार करते हुए इसे पुण्य और सराहनीय कदम बताया है। वही सेवा सार्थक होगी जो नि:स्वार्थ भाव से संपन्न की जाए। पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया कार्य सेवा में नहीं आता अपितु यह तो सेवा का आडम्बर होता है।

हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि— वही तीर्थाटन फलीभूत होता है, जिस पर व्यय भी अपनी शुद्ध कमाई से किया जाए। अनैतिक कार्यों से प्राप्त आय से तीर्थाटन उचित फल नहीं देता। असमर्थ, वंचित, निर्धन की सेवा धन, वस्त्र आदि देकर या किसी मनुष्य को उसके उपयोग की वस्तु प्रदान कर की जा सकती है। बेसहारा बच्चों का पालन, उनकी शिक्षा या चिकित्सा में सहायता करना भी सेवा भाव में आता है। वृद्ध जनों की सेवा करना एक बहुत ही पुण्य का कार्य है।

कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। आपने गुरुद्वारे में अक्सर देखा होगा कि— बड़ी-बड़ी पोस्ट पर तैनात अधिकारी भी दूसरों के जूते चमकाने, प्रसाद खिलाने या बर्तन साफ करने में अपना योगदान देते हैं। इससे उनके रुतबे में कोई अंतर नहीं आता। सेवा एक पुनीत मानवीय कर्म है। ऐसी बहुत-सी पुण्य आत्माओं ने इस धरा पर जन्म लिया है, जिनके मन में बचपन से ही सेवा भाव था और जिन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया।

231. जीवन यात्रा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भगवद् गीता में कहा गया है कि— मानव जीवन को प्राप्त करना विजय नहीं है बल्कि जीवन में संघर्ष करते हुए विजय प्राप्त करना ही जीवन की सफलता है।

मानव रूप में जन्म लेकर मनुष्य बहुत चिंतन मनन करता रहता है। जीवन को सुचारू रूप से चलायमान रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि उसका जीवन सुख- सुविधाओं से संपन्न हो। इसके लिए वह निरंतर प्रयत्न करता रहता है लेकिन इसके पश्चात् भी वह जीवन को सफल रूप से नहीं समझ पाता। इसका प्रमुख कारण यही है कि जीवन रूपी यात्रा में जब हमारे सामने कोई भी प्रश्न आता है तो हम उससे विमुख हो जाते हैं। हम उन प्रश्नों के उत्तर तलाशने का प्रयास ही नहीं करते।

एक बार किसी संत ने एक मछुआरे से पूछ लिया था कि— जीवन क्या है? क्या तुम उसे जानते हो?

मछुआरे ने बड़ी सहजता से कहा— हां जानता हूं। मैं नदी से मछलियां पकड़ कर उन्हें बाजार में बेच कर अपने जीवन का निर्वाह करता हूं। मेरे लिए यही जीवन है।

इस पर संत ने कहा—जिसे तुम जीवन कह रहे हो, वह तो मृत्यु की तरफ जा रहा है। ऐसे जीवन से क्या लाभ? मैं तुम्हें उस जीवन की ओर ले चलता हूं जो मृत्यु के पश्चात् भी मौजूद रहता है।

मछुआरे को बड़ा आश्चर्य हुआ— मृत्यु के पश्चात् भी जीवन।

संत ने कहा— हां वत्स! मृत्यु के पश्चात् भी जीवन संभव है। जिसे तुम जीवन कह रहे हो, इसका उद्देश्य ही उस जीवन को जानना है।

स्पष्ट है की संत मछुआरे को शाश्वत सत्य बता रहे थे। वही सत्य जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाने के लिए गीता का उपदेश दिया था। वास्तव में देखा जाए तो मनुष्य के कर्म ही उसे मृत्यु के उपरांत भी इस चराचर जगत् में जीवित रखते हैं।

ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को अलग बनाया है। सबकी अपनी जीवन यात्रा है। इसलिए अपनी तुलना औरों से करना व्यर्थ है। क्योंकि इससे केवल चिंता में ही वृद्धि होगी। इसलिए चिंता में वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए बल्कि जो है, बस उसे लेकर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। जीवन कैमरे की तरह है, हम जिस वस्तु पर भी फोकस करेंगे, उसकी तस्वीर उतनी ही अच्छी आएगी। जीवन को हम जब तक केवल दुख और संघर्ष मानते रहेंगे तो यह एहसास मन में पीड़ा ही देगा लेकिन जब इसे अनमोल मानेंगे तो हर वस्तु में बच्चों की तरह आनंद महसूस करने लगेंगे।

जीवन क्या है? हम यहां क्यों हैं? जब जीवन में समस्याएं उत्पन्न होती हैं तो ऐसे अनेकों प्रश्न स्वाभाविक रूप से हर किसी के मन में उपजते रहते हैं। लेकिन अपनी जीवन यात्रा में हमें इन प्रश्नों का सामना करने से डरना नहीं चाहिए। देखा जाए तो यह एक अच्छा तरीका है जीवन में प्रेम जगाने का। हमें अपने मन को लगातार प्रशिक्षित करना होगा कि जीवन हमारी मर्जी से नहीं चलता। इसके पश्चात् ही हम जीवन का आनंद ले सकते हैं। लेकिन यदि मन अस्थिर है, हताश है तो वह जीवन दृष्टि को भी क्षीण कर देता है। इससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है, जो अपने जीवन को लेकर सजग है, वह समस्याओं के बीच भी जीवन से प्यार करना छोड़ते।

यदि आपके पास संतोष नहीं है तो जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित जरूर होगी। हमेशा याद रखना चाहिए कि स्वयं की दृष्टि ही बाहर बदलाव का वाहक बनती है। इसलिए अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए अपनी खूबियों की भी सराहना करें। सुंदर जीवन यात्रा के लिए रोजमर्रा के जीवन में बहुत सारी बातों पर अमल करना होगा। कुछ दिनों के नियमित अभ्यास के बाद आप स्वयं बदलाव महसूस करने लगेंगे।

प्रत्येक मनुष्य के अंतर्मन में एक दुनिया समाहित होती है। जिसमें उसकी वास्तविक शक्ति और ज्ञान का समावेश होता है। इस अंदर की दुनिया की वाणी को ही सुनकर हमें स्वधर्म का ज्ञान होता है। इस संसार में जो भी मनुष्य उस में प्रवेश करना सीख जाता है, उन्हें अपनी वास्तविक शक्ति और ज्ञान का अहसास होना प्रारंभ हो जाता है। लेकिन इसके लिए यह परम आवश्यक है कि वह बाहरी दुनिया की चकाचौंध में डूबने से अपने आप को बचाए रखे।

स्वधर्म का वास्तविक ज्ञान अंदर की दुनिया में डुबकी लगाने से ही होता है। प्रतिपल प्रयास करते रहने से स्वधर्म के केंद्र तक पहुंचा जा सकता है। जहां पहुंचकर हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगती है। यह आवाज बहुत ही धीमी तथा सूक्ष्म होती है। इसे सुनने के लिए गहरी शांति और मौन की आवश्यकता होती है।

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि—सांसारिक कर्मों में लिप्त मनुष्य समय रहते हुए इस पर ध्यान ही नहीं देता। वह सांसारिक सुखों को भी जीवन यात्रा का परम उद्देश्य मानकर ईश्वर से विमुख होता जाता है। जबकि वास्तविकता यही है कि सांसारिक सुखों में लिप्त सभी मनुष्य प्रतिफल अपने जीवन को गंवा रहे हैं। वे अपनी जीवन यात्रा को और कठिन बना रहे हैं। लेकिन जो समझदार हैं, वे अपने पुरुषार्थ से सत्कर्म करते हुए इस जीवन में ईश्वर को जानने का प्रयास करते हैं और अपनी जीवन यात्रा को शांति पूर्वक पूरा करते हुए ईश्वर में विलीन हो जाते हैं।

230. अपना मूल्य पहचानें

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य की एक आदत है कि— वह कुछ कार्यों को तुरंत कर लेता है और कुछ को अगले दिन के लिए छोड़ देता है। लेकिन ज्यादातर वही कार्य अगले दिन पर छोड़े जाते हैं जो अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते। क्योंकि मनुष्य अपनी सफलता का मूल्यांकन भौतिक वस्तुओं की उपलब्धियों के आधार पर करता है। वह यही सोचता है कि उसके पास जितने ज्यादा ऐसो- आराम के साधन उपलब्ध होंगे, वह उतना ही सफल होगा। परंतु क्या उसने कभी यह भी सोचा है कि—वह जिस जीवन को भौतिक सुखों को पाने की लालसा में दिन-रात लगा रहा है, वह जीवन उसे क्यों मिला है? उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? उसके इस जीवन का मूल्य क्या है?

अगर देखा जाए तो एक तरफ सारे ऐसो- आराम के साधन हैं और दूसरी तरफ है, हमारा जीवन!
जो खुद हमारे लिए है, जिसके बारे में हम कभी नहीं सोचते। यह सच्चाई है कि जो वस्तु हमें जीवन में आसानी से उपलब्ध हो जाती है, उसके मूल्य को हम जानने की कोशिश ही नहीं करते। ईश्वर ने जिस उद्देश्य से हमें जीवन दिया है, उसकी तरफ हम ध्यान देते ही नहीं बल्कि इस संसार में आने के बाद भौतिक संसाधनों को इकट्ठा करने में लग जाते हैं।

अक्सर देखा जाता है, जहां पानी की बहुतायत होती है यानी पानी की कमी नहीं होती, वहां लोग पानी को बर्बाद करते हैं, पर जहां पानी की कमी होती है, वहां नल के नीचे भी एक बर्तन रख दिया जाता है ताकि पानी बर्बाद न हो। इसी तरह हमारा जीवन भी है जिसका हर श्वास मूल्यवान है। एक दिन ऐसा था जब हमने पहला श्वास लिया था और एक दिन ऐसा भी होगा, जब हमारा अंतिम श्वास होगा। पहले श्वास और अंतिम श्वास के मध्य में है, आज का समय। इस आज के समय को हम दुनिया की सभी भौतिक वस्तुओं को संग्रह करने में लगा देते हैं लेकिन जो अनमोल जीवन मिला है, उस पर ध्यान ही नहीं देते।

एक व्यक्ति बहुत बीमार था। वह अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। इसलिए उसने अपने पुत्र को अपने पास बुलाया और अपनी आखरी इच्छा जाहिर करते हुए कहा— यह लो, वह घड़ी जो तुम्हारे दादा जी ने मुझे दी थी। यह लगभग 200 वर्ष पुरानी है। परंतु मैं यह चाहता हूं कि तुम इसे ज्वेलरी की दुकान पर ले जाओ और इसका मूल्य पूछो।

पिता की इच्छा को जानकर पुत्र ज्वेलरी की दुकान पर गया और उस घड़ी का मूल्य पूछा।

ज्वेलर की दुकान पर उसका मूल्य मात्र ₹400 बताया गया क्योंकि वह एक बहुत पुरानी घड़ी थी।

पिताजी ने कहा ठीक है, अब जरा इसे साहूकार के पास ले जाओ।

पुत्र ने साहूकार के पास जाकर उस घड़ी का मूल्य पूछा।

साहूकार ने उसका मूल्य ₹200 लगाया क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा खरोंच लगी हुई थी।

इसके पश्चात् पिता ने कहा कि— अब तुम संग्रहालय में जाओ और इस घड़ी को दिखाओ।

पुत्र के मन में भी सवाल उठने लगे। आखिर पिताजी इस तरह एक जगह से, दूसरी जगह क्यों भेज रहे हैं? इस घड़ी में ऐसा क्या है जो पिताजी मुझे बार-बार दूसरी जगह भेज रहे हैं? वह परेशान हो गया परंतु यह पिताजी की आखिरी इच्छा थी, इसलिए वह संग्रहालय में गया और वहां जाकर वह घड़ी दिखाई।

संग्रहालय में उस घड़ी का मूल्य ₹375000 लगाया गया। वे इस कीमती और अनमोल वस्तु को अपने पास रखना चाहते थे।

इतना मूल्य सुनकर पुत्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। इसलिए उसने वापस आकर पिता जी से पूछा—आप क्या कहना चाहते हो? आपको पहले से ही इस घड़ी का मूल्य पता था फिर भी आप मुझे इधर-उधर इसका मूल्य पूछने के लिए भेज रहे थे। इसका क्या कारण है?

अब पिताजी ने कहा— बस मैं यही चाहता था कि तुम जीवन में सही जगह कार्य करो। जहां तुम्हें अपने वास्तविक मूल्य का पता चले।

पिता ने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा— उस जगह पर कभी कार्य मत करना, जहां पर लोग तुम्हारे मूल्य को न समझें, तुम्हें कमतर समझें या तुम्हारी प्रशंसा न करें।

दरअसल जो मनुष्य अपने मूल्य को नहीं जानता, वह बहुत कम में समझौता कर लेता है परंतु जो अपने मूल्य को जानता है, वह उनको अनदेखा करता हुआ जीवन में आगे बढ़ जाता है।

अपने जीवन को अनमोल बनाने के लिए हमें स्वयं पर नियमित ध्यान देना होगा। प्रत्येक दिन जो हम कार्य करते हैं, वह हमारे मूल्य को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाता है। दिन आता है, चला जाता है कोई बहाना नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं। केवल समर्पण और संकल्प हमें वह बना देता है जो हम बनना चाहते हैं।

अक्सर हम उसी दिन को अच्छा समझते हैं, जिसमें हमारे कारोबार में वृद्धि होती है। अच्छी नौकरी मिलती है परंतु हमें यह जानना होगा कि अच्छा दिन तो वह होगा, जिस दिन हम कहेंगे मेरा श्वास चल रहा है, मैं जीवित हूं। मेरे पास यही अवसर है। मैं इसे खोना नहीं चाहता। जिस दिन स्वयं के मूल्य को समझ जाएंगे, उस दिन से हमारा जीवन व्यर्थ नहीं होगा। उस दिन हम भी अपना हृदय रूपी बर्तन उस नल के नीचे रख देंगे जो पानी व्यर्थ बह रहा था। हमारी जिंदगी संवर जाएगी। हम अपने जीवन को सुखपूर्वक जीने लगेंगे।

हम प्रत्येक दिन हृदय से और आनंद के साथ कहने लगेंगे कि—
हे सृष्टि रचयिता परमपिता परमात्मा! आपका लाख-लाख धन्यवाद!
और उस दिन हम कहेंगे कि आज का दिन ही हमारे जीवन का पहला दिन है। कल अगर फिर यह दिन आया तो हम इसे बेकार नहीं जाने देंगे। उस दिन हम यह समझ जाएंगे कि यदि हमें कोई कमत्तर समझता है तो उस पर ध्यान नहीं देना है। अपनी उर्जा और समय को उन बातों में, उन मनुष्यों से दूर हटा लेना है, जो हमारे मूल्य को नहीं जानते। उस दिन हमें अपने प्रत्येक श्वास का मूल्य समझ में आ जाएगा। हम यह जान जाएंगे कि हमारा जीवन कितना अनमोल है और अपने जीवन को ओर बेहतर बनाने के लिए प्रतिपल  प्रयास करेंगे।

229. आध्यात्मिक पेंशन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आध्यात्मिक पेंशन से अभिप्राय है— आत्मिक शांति या आध्यात्मिक शांति।
यह सिर्फ प्रभु भक्ति से ही प्राप्त हो सकती है। परंतु हमारे समाज में मनुष्य की यह विडंबना ही है कि वह अध्यात्मिक पेंशन को जानता ही नहीं।

वह सिर्फ मौद्रिक पेंशन को ही जानता है। इसलिए अज्ञानी मनुष्य जीवन के अंतिम पड़ाव पर अशांत एवं असंतुष्ट दिखाई देता है। वह अपने जीवन का अधिकांश समय मौद्रिक पेंशन को कमाने में गंवा देता है परंतु वह अपने आंतरिक संसार में बैठे दुश्मनों जैसे— दुराग्रह, अहंकार, मोह, माया इत्यादी के विरुद्ध कोई युद्ध नहीं लड़ता। इसलिए उसे दोहरी पेंशन के रूप में आध्यात्मिक पेंशन नहीं मिल पाती।

यह पेंशन जीवन में मनुष्य को सम अवस्था के रुप में प्राप्त होती है। मनुष्य जब तक अपने दुराग्रहों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह किसी शाश्वत सत्य को नहीं समझ सकता। जन्म- जन्मांतर से जमा हो रहे कर्मफल के कीचड़ में सना मानवीय मन सांसारिक माया के वशीभूत होकर असहज जीवन व्यतीत करने पर मजबूर होता है। वह अज्ञानी, मानव रुपी चोला धारण करने के बाद उस निरंकारी ब्रह्म का स्मरण करना भूल जाता है।

किसी भी प्रकार का कर्म, शरीर के बिना संभव नहीं है। अतः शरीर रूपी धन की रक्षा करते हुए पुण्य कर्म करना चाहिए। आत्मा सभी का पात्र है। इसलिए उसकी रक्षा में मनुष्य सर्वदा संलग्न रहें। जो व्यक्ति आजीवन उस आत्मा की रक्षा में प्रयत्नशील रहता है, वह जीवित रहते हुए भी अपना कल्याण देखता है। मनुष्य को ग्राम, क्षेत्र, धन, घर, शुभाशुभ कर्म और शरीर बार-बार नहीं प्राप्त होता।

विद्वान लोग सदैव शरीर की रक्षा के उपाय में लगे रहते हैं। कुष्ठादि महाभयंकर रोगों से ग्रस्त होने पर भी मनुष्य शरीर को छोड़ना नहीं चाहता। शरीर की रक्षा धर्म के लिए, धर्म की रक्षा ज्ञान के लिए, ज्ञान की रक्षा ध्यान-योग के लिए तथा ध्यान-योग की रक्षा तत्काल मुक्ति प्राप्ति के लिए होती है। यदि आत्मा ही अहितकारी कार्यों से अपने को दूर करने में समर्थ नहीं हो सकती तो अन्य दूसरा कौन ऐसा हितकारी होगा जो आत्मा को सुख प्रदान करेगा।

यदि यहां इसी लोक में नर्करूपी व्याधि की चिकित्सा नहीं की गई तो औषधिविहीन देश (परलोक) में जाकर रोगी उससे मुक्ति का क्या उपाय करेगा? बुढ़ापा तो बाघिन के समान है। जिस प्रकार से फूटे हुए घड़े का जल धीरे-धीरे बह जाता है, उसी प्रकार आयु भी क्षीण होती रहती है। शरीर में विद्यमान कष्ट शत्रु के सदृश कष्ट देते हैं। इसलिए इन सभी से मुक्ति प्राप्त करने का सत्प्रयास किया जाए।

जब तक शरीर में किसी प्रकार का दुख नहीं होता, विपत्तियां सामने नहीं आती और शरीर की इंद्रियां शिथिल नहीं पड़ती, तब तक ही आत्मकल्याण का प्रयास हो सकता है। जब तक यह शरीर स्वस्थ है, तब तक ही तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए सम्यक् प्रयत्न किया जा सकता है। कोषागार में आग लग जाने पर मूर्ख ही कुआं खोदता है अर्थात् मानव अपने अंतिम समय में ही आध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करता है तो ऐसे पर्यत्न का क्या लाभ?

गरुड़ पुराण के अनुसार— मनुष्य नाना प्रकार के सांसारिक कार्यों में व्यस्त रहने से, समय को नहीं जान पाता। वह दुख-सुख तथा आत्महित को भी नहीं जानता। पैदा होने वालों को, रोगियों को, मरने वालों को, आपत्तिग्रस्त को और दुखी लोगों को देखकर (मनुष्य मोहरुपी मदिरा को पीकर जन्म- मरणादि दुख से युक्त संसार से) भी नहीं डरता।

सम्पदाएं स्वप्न के समान हैं, यौवन पुष्प के सदृश है, आयु चंचल बिजली के तुल्य नष्टप्राय: है। ऐसा जानकर भी किसको धैर्य हो सकता है। सौ वर्ष का जीवन भी बहुत कम है क्योंकि परिमित आयु का आधा भाग रात्रियों में ही व्यतीत हो जाता है। शेष बचे हुए समय का आधा भाग व्याधि, दुख तथा वृद्धावस्था में निष्क्रियता के कारण व्यतीत हो जाता है। अभिप्राय यह है कि मनुष्य की आयु सौ वर्ष मानी गई है। आयु का आधा भाग रात्रियों में ही समाप्त हो जाता है। उसकी शेष आधी ही आयु बचती है, जिसमें से आधे से कुछ अधिक भाग बाल्यावस्था में बीत जाता है, कुछ भाग परिजनों के वियोग, उनकी दुखदायी मृत्यु से प्राप्त कष्ट तथा राजसेवा में चला जाता है। इसके बाद जो आयु का शेष भाग बचता भी है, वह जलतरंग के समान चंचल होने के कारण बीच में ही विनष्ट हो जाता है।

मृत्यु दिन- रात वृद्धावस्था के रूप में लोक में विचरण करती रहती है। वह प्राणियों को वैसे ही अपना ग्रास बनाती है, जैसे सर्प वायु का ग्रास करता है। चलते हुए, रुकते हुए, जागते हुए और सोते हुए भी व्यक्ति सभी प्राणियों के हित के लिए चेष्टा नहीं करता, तो उसकी समस्त चेष्टा पशुवत् ही है। कदाचित् वायु को बांधकर रखा जा सकता है, आकाश का खंडन हो सकता है, तरंगों को किसी सूत्रादि में पिरोया जा सकता है किंतु आयु में विश्वास नहीं किया जा सकता। जिसके प्रभाव से पृथ्वी दहकती है, सुमेरु पर्वत विशीर्ण हो जाता है तथा सागर का जल सूख जाता है, फिर इस शरीर के संबंध में तो बात ही क्या? पुत्र मेरा है, स्त्री मेरी है, धन मेरा है, बंधु- बांधव मेरे हैं। इस प्रकार मैं-मैं चिल्लाते हुए बकरे की भांति कालरूपी भेड़िया बलात् मनुष्य को मार डालता है।

यह मैंने किया है, यह मुझे करना है, मैंने अच्छा किया है— इस प्रकार की भावना से युक्त मनुष्य को मृत्यु अपने वश में कर लेती है। इसलिए कल किए जाने वाले कार्य को आज ही कर लेना चाहिए। जो दोपहर के बाद करना है, उसको दोपहर से पहले ही कर लेना चाहिए। क्योंकि कार्य हो गया है अथवा नहीं हुआ है, इसकी मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती।

वृद्धावस्था पथ- प्रदर्शक है, अत्यंत भयंकर रोग सैनिक हैं, मृत्यु शत्रु है। ऐसी विषम परिस्थितियों में फंसा हुआ मनुष्य अपने रक्षक “भगवान” का स्मरण क्यों नहीं करता? वह क्यों नहीं अपनी आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है? तृष्णा रूपी सुई से छिद्रित, विषयरूपी घृत में डूबे, राग- द्वेष रूपी अग्नि की आंच में पकाये गए मानव को मृत्यु खा लेती है। बालक, युवा, वृद्ध और गर्भ में स्थित सभी प्राणियों को मृत्यु अपने में समाहित कर लेती है। ऐसा है यह संसार। इतना होने के बावजूद भी मनुष्य इस सांसारिक मोह- माया का परित्याग नहीं कर पाते और दुख के भागी बन कर आध्यात्मिक पेंशन को प्राप्त नहीं कर पाते।

मनुष्य मन को प्रिय लगने वाले जितने पदार्थों से अपना संबंध स्थापित करता जाता है, उतनी शोक की कीलें उसके हृदय में चुभती जाती हैं। जैसे मांस के लोभ में फंसी हुई मछली, बंसी के कांटे को नहीं देखती, वैसे ही सुख के लालच में फंसा हुआ मानव शरीर, यम की बाधा को नहीं देखता है। इसलिए मनुष्य को उनकी ओर बढ़ी हुई अपनी आसक्ति का परित्याग करना चाहिए।

यदि आसक्ति छोड़ी न जा रही हो तो प्रभु- भक्ति के साथ उस आसक्ति को जोड़ देना चाहिए। क्योंकि आसक्ति रुपी व्याधि की औषधि प्रभु- भक्ति है। युवा तथा प्रौढ़ावस्था में मनुष्य भौतिक व्यसनों और सुख- सुविधाओं से मानसिक अशांति को कुछ समय के लिए शांत कर लेता है, परंतु वृद्धावस्था में जब शारीरिक शक्ति कमजोर हो जाती है, तब वह उनसे शांति नहीं पाता। तब उसे अध्यात्मिक पेंशन की आवश्यकता होती है।

यह आध्यात्मिक पेंशन भी मनुष्य को अपने आंतरिक संसार के दुश्मनों से लड़ कर कमानी पड़ती है। परंतु जिस कार्य को तुरंत आरंभ कर देना चाहिए था, उसके संदर्भ में तो वह उद्योगहीन होकर बैठा रहा। जहां जागते रहना चाहिए था, वहां सोता रहा। ऐसा कैसे हो सकता है कि- जो मनुष्य अहित में हित, अनिश्चित में निश्चित और अनर्थ में अर्थ को विशेष रूप से जानने वाला है, वह मनुष्य अपने मुख्य प्रयोजन को नहीं जानता अर्थात् वह जानता तो है लेकिन माया रूपी अंधकार ने उसे घेर रखा है। इसलिए वह देखते हुए भी गिर जाता है, सुनते हुए भी सद्-ज्ञान को नहीं प्राप्त कर पाता, सद्ग्रंथों को पढ़ते हुए भी उसे नहीं समझ पाता क्योंकि वह प्रभु-भक्ति से विमुख है।

प्रत्येक धर्म में इसकी प्राप्ति के नियम लगभग एक समान ही होते हैं। जैसे— सच्चे मूल्यों से अर्जित जीवन यापन, दया एवं करुणा, आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना, अहिंसा, सत्य और सही दृष्टिकोण इत्यादि। पतंजलि ने इन्हें अष्टांग योग के रूप में परिभाषित किया है। इन जीवन मूल्यों को अपनाने से मनुष्य धीरे-धीरे कर्म फलों से मुक्ति पाकर सम स्थिति में पहुंचकर आध्यात्मिक पेंशन के रूप में शांति का अनुभव करने लगता है और इस प्रकार इस पेंशन द्वारा मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है।

लेकिन इस धरा पर मनुष्य को हजारों चिंताओं ने अपना ग्रास बना रखा है, जिसके कारण वह अध्यात्म रूपी नौकरी कर ही नहीं पाता। मनुष्य को इस सार्वभौमिक सत्य को समझना होगा कि अगर उसने मौद्रिक पेंशन के साथ- साथ आध्यात्मिक पेंशन का सुख भी प्राप्त करना है तो उसके लिए प्रभु-भक्ति करनी ही पड़ेगी। वरना वह जन्म- जन्मांतर के चक्रों से छुटकारा नहीं पा सकता।

228. सदैव सत्य बोलें

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनीषी कहते हैं कि— “मनसा वाचा कर्मणा” यानी मन, वचन और कर्म से सत्य बोलना चाहिए।
जो विचार मन में हों, वही वाणी में भी होने चाहिएं और उसी के अनुरूप ही मनुष्य का व्यवहार होना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि मन, वचन और कर्म से अलग रहने वाले मनुष्य पूर्णरूपेण सत्य का आचरण नहीं कर सकते। प्रायः सत्य कड़वा होता है। इसलिए सत्य बोलने वाले मनुष्यों को कोई भी पसंद नहीं करता। फिर भी उनकी उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है क्योंकि असत्य बोलने वालों की भीड़ ज्यादा है इसलिए मनुष्य का आचरण पशुवत् हो गया है।

प्रत्येक क्षण हमें यह चुनाव करना होता है कि हम जीवन में सत्य बोलें या झुठ बोलें। हम में से बहुत से मनुष्य यही समझते हैं कि अगर वो झूठ बोलते हैं या दूसरों को धोखा देते हैं तो कभी भी, कोई भी उसके झूठ का पता नहीं लगा पाएगा इसलिए कुछ प्राप्त करने या किसी वस्तु से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य अक्सर झूठ बोलते रहते हैं। वे भूल जाते हैं कि सत्य हमेशा किसी न किसी प्रकार से प्रकट हो ही जाता है। जब हम अपने जीवन में सत्य को धारण कर लेते हैं, हमेशा सच बोलते हैं तो फिर डरने की क्या आवश्यकता है?

दूसरे व्यक्ति हमारा आदर करते हैं, सम्मान करते हैं, हम पर विश्वास करते हैं और जब हम उनके बीच में जाते हैं, तब हमारा मन बिल्कुल साफ होता है, तब हम गर्दन उठा कर बात कर सकते हैं क्योंकि हमने कोई छल कपट नहीं किया होता। लेकिन जब हम झूठ बोलते हैं तो हमें एक झूठ को छुपाने के लिए कई और झूठ बोलने पड़ते हैं। इतने सारे झूठ को याद रखना बहुत कठिन होता है। जबकि सच तो केवल एक ही होता है और याद रखना भी आसान होता है। झूठ ऐसा उलझा हुआ जाल बुनता है, जिसके हर रेशे को याद रखना पड़ता है। जिसको हम चाहते हुए भी याद नहीं रख सकते और हमें अंदर से यह डर भी सताता है कि किसी को सच का पता लग जाएगा तो क्या होगा। उस समय हमारे मन का शांत होना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए डर कर जीने की बजाय हमें सत्य बोलना चाहिए ताकि शांति से अपने जीवन में आगे बढ़ सकें।

“सत्य बोलें और प्रिय बोलें” के सिद्धांत का अनुपालन करने वाला कभी भी कठोर वाणी का प्रयोग नहीं करता क्योंकि कड़वा बोलकर किसी का मन दुखाना उसका उद्देश्य नहीं होता। सत्य बोलने वाला यह कभी नहीं देखता कौन उसका अपना है और कौन पराया है। क्योंकि उसे पता होता है कि सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है और धर्म धारण करना ही मनुष्य के जीवन का कल्याणकारी मार्ग है। इसलिए वह अपने- पराए का विचार किए बिना निर्भय होकर सत्य ही बोलता है।

सत्य को छोड़कर जो असत्य बोलता है। धर्म का उल्लंघन करता है। परलोक की जिसे चिंता नहीं, वह मनुष्य बड़े से बड़ा पाप कर सकता है। इसलिए असत्य का परित्याग करना ही श्रेयस्कर है। एक सत्य हमें तमाम असत्य बोलने से बचा लेता है। सत्य केवल शब्दों की सत्यता ही नहीं बल्कि विचारों की सत्यता भी है। हमारी समस्त गतिविधियां सत्य पर केंद्रित होनी चाहिए। सत्य ही हमारे जीवन का प्राण तत्व होना चाहिए क्योंकि सत्य के बिना व्यक्ति अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। असत्य के बल पर मनुष्य को एक बार सफलता अवश्य मिल सकती है परंतु आंतरिक शांति और संतुष्टि तो कभी प्राप्त नहीं हो सकती।

सत्य सदैव विजयी होता है और सत्य के पथ का अनुसरण करने वाला विजेता बनता है। सत्य की शक्ति अलौकिक होती है। उसमें असीम ऊर्जा समाहित रहती है। सत्य के आलोक में व्यक्ति का व्यक्तित्व अद्भुत हो जाता है। सत्य का आचरण करने वाला सदैव आत्मविश्वास से भरा रहता है, उसे भय स्पर्श भी नहीं कर सकता। उसका मस्तक सदैव ऊंचा रहता है। यह सच है कि सत्य के मार्ग में विपत्तियां अवश्य आती हैं। यह मार्ग पग-पग पर कांटो से भरा हुआ होता है परंतु इस पर चलने वाले मनुष्य को जो आनंद मिलता है, वह अनिर्वचनीय है।

227. उत्साह

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

रामायण में महर्षि बाल्मीकि लिखते हैं— उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
कहने का अर्थ यही है कि बलवान व्यक्तियों का सबसे कीमती आभूषण उनका उत्साह ही है।

कभी पत्थरों से आग जलाने वाले मानव ने अब चांद पर कदम रखना सीख लिया है। मनुष्य के विकास का यह उत्थान एक दिन में तो नहीं हुआ बल्कि इसमें सदियां लगी हैं। मार्ग में कितनी असफलताएं आई होंगी लेकिन मनुष्य ने कभी हार नहीं मानी। कैसी भी परिस्थितियां आए, उसे लड़ने का जज्बा हमेशा रखा और ऐसा मनुष्य तभी कर पाया जब उस में उत्साह का बल था। उत्साह जब प्रबल होता है, तब वह सबसे बड़ा बल होता है।

किसी के जीवन का उत्साह चला गया तो समझो सब लुट गया। जीवन में सब कुछ खत्म होने के बावजूद भी उत्साह को नहीं खोना चाहिए। उत्साह बना रहेगा तो मनुष्य खोई हुई चीजों को वापस पा सकता है। यदि किसी में प्रगति करने का जज्बा नहीं है तो उसे छोटी से छोटी समस्या भी पर्वत की तरह विशाल नजर आती है। यदि कोई आगे बढ़ते जाने को लेकर गंभीर है तो इसका कारण यही है कि उसमें प्रेरणा भरपूर है। वह बड़ी से बड़ी और मुश्किल चुनौतियों को पार करते हुए आगे बढ़ता जाएगा क्योंकि चुनौतियां उसको छोटी लगती हैं।

कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जो समस्याओं से मुक्त हो और यह भी सच्चाई है लक्ष्य जितना बड़ा होगा, राह में आने वाली बाधाएं भी उतनी ही बड़ी होंगी। कोई सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ता रहता है तो कोई अपना धैर्य खोकर मन को छोटा कर लेता है और हार मान लेता है। ऐसे में उसको कहीं से प्रेरणा मिल जाए तो मन में उत्साह बना रहता है। विषम परिस्थितियों में एक प्रेरणा ही है जो आगे बढ़ने का जज्बा भरती है।

उत्साह ऐसी मनोवृति है जो कार्य का स्वरूप देखकर बनती-उभरती है। कार्य यदि बड़ा और महत्वपूर्ण है तो उसमें लगने वाला उत्साह भी बड़ा होता है। किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए ललक और लग्न दोनों की अति आवश्यकता होती है। सफल होने की ललक हर व्यक्ति में होती है। परंतु लग्न की कमी के कारण सफल नहीं हो पाता। मन में उत्साह का संचार अगर सतत् रूप से होता रहता है तो मन में धैर्य एवं लग्न की धारा प्रवाहित होती रहती है।

एक बार एक वृद्ध आदमी कहीं से आ रहा था, तभी उसने देखा की एक इमारत बन रही है और उसमें तीन मजदूर कार्य कर रहे हैं।

वह पहले मजदूर के पास गया और उससे पूछा— तुम क्या कर रहे हो?

उसने गुस्से में आकर कहा— दिखाई नहीं देता क्या? मैं ईंट ढो रहा हूं।

फिर वह वृद्ध आदमी दूसरे मजदूर के पास गया और उससे भी वही सवाल किया। तुम क्या कर रहे हो?

दूसरे मजदूर ने कहा— मैं अपने परिवार का पेट पालने के लिए मेहनत मजदूरी कर रहा हूं। उसकी आवाज में भी रोष था।

फिर वह वृद्ध आदमी तीसरे मजदूर के पास गया और वही प्रश्न दोहराया कि— तुम क्या कर रहे हो?

उस मजदूर ने उत्साह के साथ उत्तर दिया—मैं इस शहर का सबसे भव्य मंदिर बना रहा हूं।

आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हो कि इन तीनों में से कौन अपने जीवन में सफलता प्राप्त करेगा।

कहा जाता है कि मृत्यु कुछ और नहीं आशा का खत्म होना है। दुनिया में आशा, हर्ष और उल्लास का वातावरण होना मनुष्य की सफलता के लिए बहुत ही आवश्यक है। मनुष्य में उत्साह का गुण नैसर्गिक भी हो सकता है और अभ्यास के द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। सफल लोगों की जीवनी से, उनके आचरण से, महान कार्यों से, हम अपने जीवन में उत्साह ला सकते हैं।