21. आत्मचिंतन

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

आज पूरा विश्व कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए “त्राहिमाम-त्राहिमाम” कर रहा है। क्योंकि इसके संक्रमण के फैलाव को रोकने की चुनौती विश्व समुदाय के सामने हैं। ऐसे में एक्सपर्ट की मानें तो स्वयं को एकांत में रखना है, ताकि इस वायरस के संक्रमण से स्वयं को बचाया जा सके। आज लगभग पूरा विश्व लोक डाउन है, जिसकी वजह से हमारे पास समय की कोई कमी नहीं है। ऐसे में हमें समय का सदुपयोग करते हुए आत्मचिंतन करना चाहिए। इससे हमें सकारात्मकता मिलेगी और हम इन जटिल परिस्थितियों में भी अपने आपको तनाव और अवसाद का शिकार होने से बचाएंगे। आज आपके पास समय की कोई कमी नहीं है, इसलिए इस बहुमूल्य समय का सदुपयोग अपने व्यक्तित्व को निखारने और अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और परिवार के सदस्यों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें भी आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित करें। इस तरह आप एकांत में रहते हुए भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में सफल होंगे। आत्मचिंतन करते हुए आप अपने जीवन में घटित हुई घटनाओं को समरण कीजिए। अगर आपको किसी काम में सफलता प्राप्त हुई है, तो उसके कारण का पता कीजिए और असफलता प्राप्त हुई है, तो भी उसके कारण का पता कीजिए। कहने का अभिप्राय यह है कि हमें जीवन में सुखद और दुखद दोनों अभिव्यक्तियों से गुजरना पड़ता है। अक्सर लोग कहते हैं कि दुखद अनुभूतियों को कहीं गहराई में दफन कर देना चाहिए, ताकि हमें उनका एहसास न हो। लेकिन मेरा यह मानना है कि सुखद की बजाय दुखद अनुभूतियों को फिल्टर करने की ज्यादा जरूरत है, क्योंकि हमें उनका स्थाई समाधान चाहिए। दोनों ही हमें संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करते हैं और हमारे व्यक्तित्व को निखारने में सहायक सिद्ध होते हैं।

अगर जिंदगी में सुख ही सुख हो तो हमें दुख का सामना करने की शक्ति कहां से आएगी। इसलिए आत्मचिंतन करते हुए अगर आपके जीवन में कोई दुर्घटना हुई हो और वह आपकी परेशानी का कारण बनती हो, तो अपनी मानसिक ताकत को पहचानते हुए अपने अंदर ऊर्जा का संचार कीजिए और उसके प्रति अपनी सद्भावना व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दीजिए। आपके मन का बोझ हल्का हो जाएगा। आप बिल्कुल तरोताजा महसूस करेंगे। क्योंकि कहीं गहराई में दफन की हुई दुखद अनुभूतियां हमारे अवचेतन मन में सक्रिय रहती हैं। हम इनको कितना ही दबाने की या छुपाने की कोशिश करें, समय-समय पर हमारे जीवन में हलचल मचा ही देती हैं और हम इन से भागने की जितनी भी कोशिश करें ये हमारा पीछा तब तक नहीं छोड़ती, जब तक हम निडरता से इनका सामना  न करें। हमारे अवचेतन मन में जन्म-जन्मांतर के संस्कार भरे हुए हैं। इसमें दबी हुई दुखद अनुभूतियों के साथ-साथ हमारी आशाएं और इच्छाएं भी रहती हैं। जिन्हें हम किसी कारणवश पूरी नहीं कर पाए। लेकिन समय के साथ हम इन्हें मन से लुप्त हुई मान लेते हैं। इसी कारण हम सपनों में इन्हें अक्सर देखते रहते हैं।

जीवन में हुई भूलों और समय-समय पर होने वाली बेचैनी का कारण यह दुखद अनुभूतियां ही होती है। अक्सर हम दोस्तों से, परिवार वालों से या कोई जानने वाला है, उससे यह कहते हुए सुनते हैं, कि आज बहुत बेचैनी हो रही है, मन बड़ा उदास है, किसी अनहोनी की आशंका है, यह सब कुछ हमारे दुखद अनुभूतियों के कारण ही होता है। क्योंकि हम उनका सामना करने से घबराते हैं। इसलिए हमारे मन में अंतर्द्वंद चलता रहता है। आपने अपने बड़े-बूढ़ों से सुना होगा कि मुख, हृदय का दर्पण होता है। सारी जाग्रत या प्रसुप्त अनुभूतियां हमारे अवचेतन मन में बीज रूप में विद्यमान रहती हैं। यह भौतिक शास्त्र का सिद्धांत है कि उर्जा कभी नष्ट नहीं होती। जब हमारी कामनाओं की पूर्ति हो जाती है, तो उनकी शक्ति भी शांत हो जाती है। परंतु जब हम उनको बलपूर्वक कुचलते हैं तो वे चित की गहराई में चली जाती हैं और उनकी शक्ति रूपांतरित होकर व्यक्त होने की चेष्टा करती है तथा रुकावट एवं शक्ति के अनुपात में हमारी मानसिक शांति को विकृत कर नाना प्रकार के उपद्रवों के रूप में प्रकट होती है। ऐसे ही प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि कार्य करती है। जो व्यक्ति अपनी दुखद अनुभूतियों को स्वीकार करके आत्मचिंतन के द्वारा बाहर निकल आता है, वह हमेशा सुखी रहता है क्योंकि उसको कोई भी बात या घटना उजागर होने का डर नहीं रहता। लेकिन जो निर्दयतापूर्वक इनको कुचलने में लगे रहते हैं, वे अशांत रहकर अपने लिए खुद की समस्या उत्पन्न करते रहते हैं और हर समय द्वन्द्व की स्थिति में होते हैं।

अगर किसी के साथ ऐसा कुछ हो रहा है, तो यह सही समय है -आत्मचिंतन कर अपनी गलती सुधारने का, क्योंकि ऐसा समय हमारी जिंदगी में पुन: आए, इसकी तो कोई भी कल्पना नहीं करेगा। इसलिए आत्मचिंतन के द्वारा अपनी गलतियों को सुधारिये, किसी के साथ अनबन है, तो उससे बात कीजिए, कोई गलती हुई है, तो बड़प्पन दिखाते हुए माफी मांगीए, अपने रिश्तों को मन में बसाइए न कि समाज में या ऐसा कोई भी कार्य जो करना चाहते थे, लेकिन किसी कारणवश कर नहीं पाए या करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए, उसको पून: करने की कोशिश मत कीजिए बल्कि पुरे आत्मविश्वास और समर्पण के साथ उसको सफलतापूर्वक करने का दायित्व उठाइए। फिर आप देखना कि कोई भी जटिलता आपके मार्ग में बाधक नहीं बनेगी। हम अक्सर सोचते हैं कि इस कार्य को और बेहतर तरीके से कर सकते हैं, तो सोचिए मत बल्कि करिए और आतमचिंतन का रास्ता अपनाकर अपनी जिंदगी को और बेहतर बनाइए, क्योंकि मनुष्य अपने आप को जितना जानता है और समझता है उतना कोई और नहीं समझ सकता। वह अपने गुण व अवगुण से भली-भांति परिचित होता है। इसीलिए कोरोनावायरस की वजह से जो कठिनाइयां, जटिलताएं हमारे जीवन में आई हैं, उनका शोक मनाने की बजाय आत्मचिंतन में ध्यान लगाएं। ताकि अंत समय में यह अफसोस ना रहे कि समय की कमी के कारण हम यह नहीं कर पाए। क्योंकि अंत समय में सभी को यह अफसोस रहता है कि- हमें थोड़ा और समय मिला होता तो हम यह भी कर सकते थे। हमारे को जो प्रकृति ने समय दिया है, उसका भरपूर फायदा उठाइये और कोरोना वायरस जैसी त्रासदी का बगैर डर या भय के डटकर सामना कीजिए।

20. कोरोना और मानसिक संयम एवं शक्ति

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कोरोना वायरस की वजह से जीवन असाधारण रूप से उलझ गया है। परिवेश में फैली गलत सूचनाओं और अफवाहों का बाजार गर्म होने की वजह से दहशत का माहौल बना हुआ है। ऐसे में हमें अपनी मानसिक शक्ति और संयम का साथ नहीं छोड़ना है। यह सच है कि चारों ओर बिखराव और जटिलताओं के कारण मानसिक शक्तियों का ह्रास हो रहा है। हमें अपने चारों तरफ घटित हो रही समस्त घटनाओं को निष्पक्ष और सजग होकर देखना होगा। इनसे बचने का सरल उपाय है, इन्हें फिल्टर करते रहना। कोई भी सूचना आने से पहले देखें कि वह कहां से आई है और उसे भेजने का कारण क्या हैॽ 
आज जब कोरोना की दहशत तेजी से फैल रही है, तो मानसिक शक्ति सबसे अधिक कारगर है। हमारी स्वयं की मानसिक शक्तियां हमें इतना संबल प्रदान करती हैं, कि हम जीवन में आने वाली कठिनाइयों में शांत व सहज मन से सयंम धारण करते हुए, सकारात्मक विचार, अध्ययन, कर्म योग, ज्ञान योग, अभिवृत्ति,ध्यान प्रक्रिया, चिंता एवं मनन के माध्यम से नूतन शक्तियों का संचार अविरल करते रहें।कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जटिल स्थितियों में किया गया संघर्ष हमें उत्तम मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा दे जाता है। मानसिक शक्तियों को श्रेष्ठ, विकसित दिशा प्रदान करने में सकारात्मक विचार एवं विश्वास की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जटिल परिस्थितियों से निकलने की उत्कंठा हमारे मन में नवीन आयामों, विचारों एवं लक्ष्यों का सृजन करती हैं। क्योंकि मस्तिष्क का उत्कृष्ट, परिष्कृत व विकसित अस्तित्व हमारे व्यक्तित्व को सफलता, सकारात्मक सोच व प्रसन्नता का उपहार देकर सुखी, सहज और प्रभावशाली बनाता है। मानसिक शक्ति शरीर का वह अतुलनीय शक्तिपुंज है जो प्रतिपल प्रदर्शित होता है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जर्नल नेचर न्यूरोसाइंस के अनुसार जब हम पैनिक यानी भयाक्रांत होते हैं, तो दिमाग एक प्रकार से आर्डर मेकिंग सेंटर बन जाता है। हमारा दिमाग बस निर्देश देने लगता है, जो डर को बढ़ाने वाला होता है। वह तर्क करना भूलने लगता है। यूनिवर्सिटी आफ पिट्सबर्ग के एक शोध में न्यूरोसाइंटिस्ट ने पाया कि जब कोई व्यक्ति पैनिक होता है, तो दिमाग में डिसीजन मेकिंग के लिए जिम्मेदार प्रि-फ्रंटल कार्टेक्स प्रभावित होता है।

जरूरी है कि हम वास्तविकता को समझें कि अधिक पैनिक होकर खुद का ही नुकसान होता है।

मनु तिवारी, मनोचिकित्सक

हम दिमाग को जो फीड करते हैं, वह वही हमारे सामने रखता है। हम दिमाग के नियंत्रण में नहीं, बल्कि दिमाग की डोर हमारे हाथ होती है।

डॉक्टर पंकज कुमार झा, न्यूरोसर्जन

वस्तुतः हमारी मानसिक शक्तियां अतुलित और दिव्य हैं। आज प्रमुख आवश्यकता अपनी मानसिक क्षमताओं को पहचानने, समझने, उन्नत करने व उनका समुचित उपयोग करते हुए संयम धारण करने की है। आज जब पूरे विश्व में कोरोना वायरस की दहशत के काले बादल मंडरा रहे हैं, तो हमें अपनी मानसिक शक्तियों की परीक्षा देने के लिए तैयार रहना चाहिए। युद्ध हर बार अस्त्र-शस्त्र से नहीं लड़ा जाता। कई बार मानसिक ताकते  युद्ध लड़ने का कारण बनती है। इसका एक उदाहरण हमें महाभारत युद्ध में मिलता है, जब स्वयं श्रीकृष्ण अपनी सेना को अस्त्र-शस्त्र त्याग कर अपने मन से युद्ध लड़ने का आदेश देते हैं। महाभारत युद्ध में अपने पिता द्रोणाचार्य के धोखे से मारे जाने पर अश्वत्थामा बहुत क्रोधित हो गए, उन्होंने पांडव सेना पर एक बहुत ही भयानक अस्त्र “नारायण-अस्त्र” छोड़ दिया। इसका कोई भी काट नहीं था। यह जिन लोगों के हाथ में हथियार हों और लड़ने के लिए कोशिश करते दिखें उन पर अग्नि बरसाता था और तुरंत नष्ट कर देता था। भगवान श्री कृष्ण ने सेना को अपने-अपने, अस्त्र-शस्त्र छोड़ कर चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े रहने का आदेश दिया और कहा मन में युद्ध करने का विचार भी ना लाए, अगर किसी भी सैनिक के  मन में युद्ध से संबंधित कोई भी विचार आया तो यह उन्हें पहचान कर नष्ट कर देगा। यह वह अस्त्र है, जिसका और कोई काट नहीं है, इसलिए डरिए मत हौंसला बना कर रखिए और अपने मन में शुद्ध विचारों को रोपित कीजिए। नारायण अस्त्र धीरे-धीरे अपना समय समाप्त होने पर स्वयं शांत हो जाएगा। इस तरह श्री कृष्ण के मार्गदर्शन से पांडव सेना की रक्षा हो गई। हर जगह लड़ाई सफल नहीं होती। प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए हमें भी कुछ समय के लिए सारे काम छोड़ कर चुपचाप हाथ जोड़ कर मन में सुविचार रख कर एक जगह बैठ जाना चाहिए। तभी हम कोरोना जैसे वायरस के कहर से बच पाएंगे। क्योंकि जिस प्रकार नारायण अस्त्र का समय था, उसी प्रकार इस कोरोना वायरस के संक्रमण फेलने का कुछ समय है। वह समय अवधि पूरी हो जाने पर यह स्वयं शांत हो जाएगा। आज का समय हमारी मानसिक शक्तियों और सयंम की परीक्षा का है। हमें अपनी इस परीक्षा में शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त करनी है। इसलिए अपनी मानसिक शक्तियों का सदैव सही प्रतिनिधित्व करें। उसमें अभिनव विकास, ऊर्जा, उत्साह का निरंतर प्रभाह बनाएं रखें, ताकि अंतर्मन में अदम्य,अद्भुत, उमंग व उत्साह की धारा अविरल बहती रहे। खुद को हर समय याद दिलाते रहें, कि किसी भी परिस्थिति में घबराना नहीं है। समय चाहे कितना भी जटिल क्यों न हो, हमें संयम रखना है। खुद के प्रति कड़ा रुख अपनाएं और अफवाहों से दूर रहें।

19. कोरोना और हवन/यज्ञ

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

पिछले कुछ समय से पूरे विश्व की रंगत बदली हुई है। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में तहलका मचा रखा है। लेकिन दहशत और डर का संक्रमण इस वायरस से भी तेज गति से फैल रहा है। जब भय का परिदृश्य बिल्कुल सामने हो तो लोग जानलेवा संक्रमण की चपेट में आने की आशंका से अवश्य भरे रहेंगे। ऐसे में हमें बचाव के तरीकों को अपनाने के साथ-साथ अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की तरफ मुड़ कर देखने की जरूरत है। हमारे ऋषि मुनि किस तरह हवन करके वातावरण को शुद्ध रखते थे, और हानिकारक जीवाणुओं और कीटाणुओं को फैलने से रोकते थे। ऐसे में हम भी यदि सुबह-शाम अपने घर में हवन की परंपरा को अपनाते हैं, तो इससे वातावरण शुद्ध होगा और खतरनाक वायरस जैसे कोविड-19 के संक्रमण का खतरा भी खत्म हो जाएगा। हवन के द्वारा बहुत सी बीमारियों के कीटाणुओं को खत्म किया गया है, यह प्रमाणिक है।
हवन या यज्ञ सनातन धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है। अग्नि को ईश्वर रूप मानकर पूजा करना ही हवन या यज्ञ है। इसे अग्निहोत्र भी कहते हैं। अग्नि ही यज्ञ का प्रधान देवता है। कुंड में हवि डालकर अग्नि मेंआहुति देते हुए ईश्वर की उपासना करने की प्रक्रिया हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित की गई है। वायु प्रदूषण और वातावरण में फैले हुए कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए ही यह हवन करने की परंपरा स्थापित की थी। शुभकामना, स्वास्थ्य एवं समृद्धि इत्यादि के लिए हवन किए जाते थे और तब हमारे देश में कई तरह के रोग नहीं होते थे। क्योंकि अग्नि में वह गुण समाहित है, जिससे वह किसी भी पदार्थ के गुणों को कई गुना बढ़ा देती है। आपने देखा होगा कि अग्नि में यदि मिर्च डाल दी जाए, तो उसका प्रभाव कितना बढ़ जाता है। ऐसे ही जब अग्नि में घी सामग्री की आहुति दी जाती है, तो वह हमारे आस-पास के वातावरण को शुद्ध कर देती है। क्योंकि मौसम के अनुसार वातावरण में विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमंडल स्वास्थ्यकर होता है और कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इन विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियां प्रयुक्त की जाती हैं, जो हमारे उद्देश्य को भली-भांति पूरा करने में सक्षम हैं। यद्यपि हमारी प्राचीन संस्कृति, वेद आदि शास्त्रों में यज्ञ-अनुष्ठान का यह विधान है, किंतु धर्म ग्रंथों पर आस्था न रखने वाली आज की युवा पीढ़ी, जो केवल विज्ञान, तर्क, युक्ति तथा प्रत्यक्ष-प्रमाणों पर विश्वास करती है, उनको ध्यान में रखते हुए मैं कुछ उदाहरण प्रस्तुत करती हूं, जिनको विज्ञान ने मान्यता दी है।

पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज के जीवाणु शास्त्रियों ने एक प्रयोग किया। उन्होंने 36 इंच, 22 इंच और 10 इंच घनफुट के एक हवन कुंड में एक समय का अग्निहोत्र किया। परिणाम स्वरूप 8000 घनफुट वायु में कृत्रिम रूप से निर्मित प्रदूषण का 77 .5 % हिस्सा खत्म हो गया। इतना ही नहीं इसी प्रयोग से उन्होंने पाया कि एक समय के अग्निहोत्र से 96% हानिकारक कीटाणु नष्ट होते हैं। यह सब यज्ञ की पुष्टि कारक गैसों से ही संभव हुआ। अग्निहोत्र जर्मनी के एक वैज्ञानिक जो केमिस्ट्री, बॉटनी मेडिसन, रेडियोलॉजी के ज्ञाता हैं तथा जर्मनी विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, लिखते हैं कि –

After I tested Agnihotra myself it really seems that with Agnihotra you have a wonder weapon in your hands.

अर्थात स्वयं अग्निहोत्र का परीक्षण करने के बाद मैंने पाया है कि सचमुच अग्निहोत्र के आचरण द्वारा मानो आपके हाथ में एक अद्भुत शस्त्र आ जाता है। उक्त वैज्ञानिक जर्मनी की एक कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के संचालक भी हैं।

अग्निहोत्र जलती शक्कर में वायु शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति विद्यमान है। इससे चेचक, हेजा, क्षय (COW POX, CHOLERA, TB) आदि बीमारियां तुरंत नष्ट हो जाती हैं ।मुनक्का, किशमिश आदि फलों को (जिनमें शक्कर अधिक होती है)जलाकर देखा तो पता चला कि इनके धुएं से आंतरिक ज्वर के कीटाणु 30 मिनट में और दूसरे रोगों के कीटाणु 1 या 2 घंटे में  नष्ट हो जाते हैं। 

वैज्ञानिक ट्रिलवर्ट “वैदिक यज्ञ विज्ञान”

घी के जलाने से रोग कीट मर जाते हैं।

डॉक्टर हैफकिन फ्रांस

डॉ कुंदन लाल अग्निहोत्री एम. डी. ने टी.बी. सेनेटोरियम जबलपुर में टी.बी. के रोगियों की यज्ञ के द्वारा चिकित्सा की। उनके अनुसार गाय के घी से यज्ञ करने पर रोगी शीघ्र आरोग्य हुए। यज्ञ विमर्श गाय के घी के साथ सामग्री की मंत्रोच्चार के साथ जब आहुति दी जाती है, तो निम्न प्रकार की चार गैसों का पता चला है।

  1. एथिलीन ऑक्साइड
  2. प्रापिलीन ऑक्साइड
  3. फार्मेल्डिहाइड
  4. बीटा प्रापियों लेक्टोन।

आहुति देने के पश्चात एसिटिलीन निर्माण होता है। यह एसिटिलीन प्रखर उष्णता की ऊर्जा है। जो दूषित वायु को अपनी ओर खींचकर उसे शुद्ध करती है। गो घृत से उत्पन्न इन गैसों में कई रोगों को तथा मन के तनावों को दूर करने की अद्भुत क्षमता है। अग्निहोत्र मनुष्य के स्वास्थ्य की दृष्टि से जर्मनी की एक प्रयोगशाला में अनुसंधान हुआ है। मनुष्य के स्वास्थ्य में चिकित्सकीय या रोग विरोधी दृष्टि से तथा प्राकृतिक वायुमंडल के शुद्धिकरण और उर्वरता की दृष्टि से यज्ञ के धुऐं और राख की उपयोगिता सिद्ध हुई। इस यज्ञ से वायुमंडलीय और पर्यावरणीय स्वास्थ्य बढ़ता है।

सरंक्षण या विनाश कुछ लोगों के प्रश्न है कि वातावरण को सुगंधित करना ही यज्ञ का प्रयोजन है तो यह कार्य अगरबती, धूप, इत्र, सेंट, फूलों आदि के द्वारा भी किया जा सकता है, यज्ञ की क्या आवश्यकता है? यह उनके प्रश्न हैं, जो यज्ञ के महत्व को नहीं समझत। यज्ञ का उद्देश्य केवल सुगंधि फैलाना ही नहीं है, बल्कि प्रदूषण और बहुत सारे हानिकारक जीवाणुओं और विषाणुओं को भी नष्ट करना होता है।अगरबत्ती, धूप आदि द्रव्यों के जलाने से या घर में फूलों को लगाने से केवल सुगंधी ही उत्पन्न होती है। वह भी सीमित मात्रा में व सीमित स्थान पर, जबकि यज्ञाग्नि में डाली गई अनेक प्रकार की औषधियों व घी के जलने पर उत्पन्न धुंआ दूर-दूर के जलवायु के प्रदूषण अथवा दोषों को दूर करता है। तथा उसे सुगंधित भी बनाता है। धूप अगरबत्ती या फूलों में वह सामर्थ्य नहीं होता, जो घर में विद्यमान गंदी वायु को बाहर निकाल दें तथा शुद्ध वायु का बाहर से अन्दर प्रवेश करा सके।

यज्ञ का उद्देश्य केवल  मात्र जलवायु को शुद्ध करना ही होता, तो इस उद्देश्य की पूर्ति तो कहीं पर भी यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा अग्नि जलाकर उसमें घी, सामग्री को डालकर कर ली जाती। किंतु यज्ञ का प्रयोजन केवल भौतिक ना होकर आध्यात्मिक भी है, जो कि भौतिक लाभों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।यज्ञ में जिन मंत्रों की आहूति दी जाती है, उनसे पूर्व शब्द का उच्चारण किया जाता है, जो हमें यह बोध कराता है कि समस्त प्राकृतिक पदार्थों का आदि मूल वह सच्चिदानंद परम तत्व परमेश्वर है, अर्थात हमारे पास जो भी धन, बल, विद्या, सामर्थ्य आदि पदार्थ है, उन सब का उत्पादक, रक्षक, धारक स्वामी परमेश्वर है, हम नहीं। लेकिन हम अहम् के वशीभूत होकर उस परम तत्व को भूल जाते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि प्रभु कृपा से समस्त मनुष्य, समाज, अपनी त्यागी हुई विशुद्ध परंपरा को पुनः अपनी दिनचर्या में अपनाकर इस कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव से परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को बचाकर उसे सुखी, संपन्न बनाऐं। इसी भावना के साथ मैंने अपनी प्राचीनतम परम्परा की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है।

18. कोरोना और जड़ी-बूटी

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

कोरोना वायरस ने इस समय पूरे विश्व को अपनी चपेट में लिया हुआ है। क्योंकि अभी तक इस वायरस का कोई स्थाई उपचार नहीं खोजा गया है। इसलिए यही सलाह दी जा रही है, कि किसी तरह इसके संक्रमण में आने से बचा जाए। चीन के वुहान शहर से शुरू हुए कोरोना कोविड-19 [CORONA (COVID 19 COrona VIrus Disease of 2019)] ने महामारी बनकर पूरे विश्व की चिकित्सा, वित्त, नागरिक, एवं सांस्थानिक व्यवस्थाओं को हिला कर रख दिया है। कोविड-19 के संक्रमण का नियंत्रण व समाधान केवल सरकारी तंत्र का दायित्व नहीं है, बल्कि इसके प्रत्ति हमारा भी कर्तव्य बनता है। एक जिम्मेदार नागरिक होने के कारण हमें भी सरकारी प्रयासों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। सरकारें अपने स्तर पर कदम उठा रही हैं। निर्णायक नियंत्रण जनता को ही करना है, क्योंकि सरकारी प्रयास भी नागरिकों के प्रयास पर निर्भर है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि, किसी को देखने से यह पता नहीं चलता कि, वह संक्रमण से ग्रस्त है या नहीं। क्योंकि संक्रमण के लक्षण जैसे बुखार, खांसी एवं सांस फूलने में दिक्कत आदि सामने आने में 12 से 14 दिन लगते हैं। यह संक्रमण किसी को भी हो सकता है।

इन दिनों सभी अपनी-अपनी क्षमता और ज्ञान के आधार पर इस वायरस से बचाव के सुझाव पेश कर रहे हैं। इस समय सोशल मीडिया पर अफवाहों का दौर भी चल रहा है। ऐसे में पूरे विश्व में सभी मानव-जन परेशान और तनाव से ग्रस्त है। उनको समझ में नहीं आ रहा की इस विपदा से बाहर कैसे निकला जाये, इस मुसीबत के समय में, मैं अपने सुझाव पेश करके अपना थोड़ा-सा योगदान देना चाहती हूं। अनुसंधान में यही बात सामने आई है कि हमें अपने इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत बनाना है। ऐसे में, मैं आप सभी का ध्यान अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की तरफ ले जाना चाहती हूं।

  1. तुलसी – ऐसे में तुलसी जो एक दिव्य पौधा है, हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है। तुलसी के पौधे को हमारी संस्कृति में बहुत पवित्र माना गया है। हमारे देश में शायद ऐसा कोई घर हो जहां तुलसी के पौधे को अपने घर में जगह न दी जाती हो। भारतीय संस्कृति के चिर पुरातन ग्रंथ वेदों में तुलसी के गुणों एवं उसकी उपयोगिता का वर्णन मिलता है। भारतीय संस्कृति में तुलसी को पूजनीय माना जाता है। धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ तुलसी औषधीय गुणों से भी भरपूर है। तुलसी एक जड़ी-बूटी है। लाभकारी गुणों की वजह से आयुर्वेद में इसे जड़ी-बूटियों की रानी कहा गया है। इसमें एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल, एंटी-पायरेटिक, एंटी-सेप्टिक, एंटी -ऑक्सीडेंट और एंटी -कैंसर गुण होते हैं। इसके पत्ते, तना तथा बीज सभी का प्रयोग आयुर्वेदिक औषधि के तौर पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त एलोपैथी, होम्योपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है। तुलसी ऐसी औषधि है जो ज्यादातर बीमारियों में काम आती है। मृत्यु  समय नजदीक आने पर तुलसी  की बड़ी महिमा है।व्यक्ति के गले में कफ जमा हो जाने के कारण श्वसन क्रिया एवं बोलने में रुकावट आ जाती है। तुलसी के पत्तों के रस में कफ फाड़ने का विशेष गुण होता है। इसलिए शैया पर लेटे व्यक्ति को यदि तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस पिला दिया जाए तो व्यक्ति के मुंह से आवाज निकल सकती है। ऐसा हमारी पुरातन संस्कृति में माना गया है।
  2. काली मिर्च – सर्दी-खांसी के लिए काली मिर्च का सेवन प्राचीन समय से किया जाता रहा है। इसमें एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। जो आपको सर्दी-खांसी से राहत दिलाने में  इंफेक्शन से बचाने में मदद करते हैं। काली मिर्च तनाव और डिप्रेशन में भी फायदेमंद होती है। काली मिर्च में पिपेरिन पाया जाता है, जो सेरोटोनिन (दिमाग को शांत रखने वाला केमिकल) के उत्पादन को बढ़ावा देता है। सेरोटोनिन तनाव और अवसाद को कम करने में सहायक हो सकता है। इसके अलावा यह मस्तिष्क में बीटा-एंडोर्फिन को भी बढ़ाता है, जो प्राकृतिक दर्द निवारक और मूड ठीक करने के काम आता है। काली मिर्च में एंटी -ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर में पैदा होने वाले फ्री-रेडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

इस्तेमाल करने का तरीका – मेरा अनुभव है कि यदि हम तुलसी के पत्तों का गाड़ा (काढ़ा) बनाकर पियें, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाएगी। अगर आपको तुलसी के पत्ते नहीं मिल रहे तो आप उसकी जड़, तना कुछ भी ले सकते हैं, इसको आप एक चाय के चम्मच के बराबर ले सकते हैं और अगर पत्ते हैं तो 8 से 10 ले सकते हैं ज्यादा छोटे पत्ते हैं, तो 15 से 16 तक लिए जा सकते हैं। इसको एक गिलास पानी में तब तक उबालना है, जब तक यह आधा गिलास न रह जाए। उसके बाद आप इसको छानकर चाय की तरह पी सकते हैं। आप इसमें 5 से 7 साबुत काली मिर्च भी डाल सकते हें। जब आधा गिलास रह जाएगा तो तुलसी और काली मिर्च का अर्क निकल जाएगा, जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कारगर साबित होगा। सभी ने तुलसी का प्रयोग अपने अनुसार बताया है, आपको जो तरीका अच्छा लगे वैसा करना। हमारा मुख्य उद्देश्य तो अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना ही है। ताकि हम कोरोना के संक्रमण से बचे रहें। काली मिर्च डलवाने से मेरा अभिप्राय यह है कि आज सभी तनाव और अवसाद की स्थिति में है। काली मिर्च हमारे मूड को ठीक करके हमें अवसाद से बाहर निकालने का कार्य करेगी, साथ ही साथ रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। अगर आप कली मिर्च को गाड़े में नहीं डालना चाहते तो अपने खाने में भी काली मिर्च का सेवन कर सकते हैं, आप इसे सब्जी में डालिए, सलाद पर डालिए, जैसा आपको ठीक लगे और जितनी मात्रा में इसका उपयोग करना चाहे कर सकते हैं। बस अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए, ज्यादा मात्रा में  ग्रहण मत कीजिए, वरना एसिडिटी की शिकायत हो सकती है।

कोरोना संक्रमण से ठीक होने की संभावना भी अन्य वायरल बीमारियों के समान ही है, इसलिए घबराने की आवश्यकता नहीं है। कोरोना नया वायरस होने के कारण अभी किसी के पास उसके निदान का उपचार नहीं है। मानव जाति और वायरस, बैक्टीरिया एवं अन्य रोगजनक कीटाणुओं में संघर्ष युगों से चल रहा है, और इस संघर्ष में जीत सदा मानव एवं उसकी प्रतिभा की हुई है। इस बार भी विजयी मानव ही होगा। बस हमें सतर्क रहकर इस वायरस को फैलने से रोकना होगा और सरकार के कार्यों में अपना सहयोग देना होगा।

17. गुरु की महिमा

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

गुरु का वास्तविक अर्थ तो यह ध्वनीत होता है कि जो जीवन में गुरुता यानी वजन -शक्ति बढ़ाए। यह भौतिक पदार्थों से नहीं,बल्कि शास्त्रों के निरंतर अध्ययन और चिंतन-मनन से ही संभव है। एक शिक्षक को ही हम गुरु की उपाधि नहीं दे सकते,बल्कि गुरु तो वे सब भी हैं, जिनसे हम जीवन की कठिनाइयों में सीख लेते हैं। एक छोटी सी चींटी भी हमारी गुरु हो सकती है। उससे भी हम कठिन परिश्रम और अपने से 10 गुना अधिक भार उठाने की सीख ले सकते हैं। वे हमें मिलजुल कर कार्य करने और एक साथ रहने की शिक्षा देती हैं। ऋषि दत्तात्रेय एक विख्यात ऋषि माने जाते हैं। वे बहुत बड़े योगी थे। भागवत महापुराण की एक कथा के अनुसार, दत्तात्रेय ने बताया कि उनके 24 गुरु हैं, जिनसे उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। जब इतने महान योगी के 24 गुरु हो सकते हैं, तो हमारे गुरुओं की गिनती नहीं हो सकती। हम तो प्रकृति के कण-कण से शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। हम  बाहरी गुरु से तो धोखा खा सकते हैं,लेकिन हमारे अंतर्मन में बैठा वह परब्रह्म परमात्मा हमें हर समय एक गुरु की तरह शिक्षा देता रहता है और हमें इन धोखों से बचाने में हमारी मदद करता है। सच तो यह है कि हर मनुष्य गोविंद बनकर ही जन्म लेता है। यही कारण है,  कि ईश्वर के पाने जैसा सुख, जन्म देते ही मां को मिलता है।

भगवान और गुरु दोनों साथ मिलें, तो गुरु के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए।

संत कबीरदास

जिस गुरु की और कबीर का संकेत है ,उस गुरु के दो चरण हैं- पहला चरण बुद्धि और दूसरा चरण विवेक। जिसने भी गुरु के इन चरणों को मजबूती से पकड़ लिया, उसका गुरुत्व और गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष उसी की ओर खींचे चले आते हैं। यह गुरु हमें बाह्य् जगत में नहीं मिल सकता, इसको हमने अंतर्जगत में तलाशना पड़ेगा। इस गुरु को पाने के लिए मां के गर्भ में 9 माह पोषित होते समय स्नेह, प्रेम, करुणा, दया, आत्मीयता एवं आनंद की जो अनुभूति हुई, उसी को जीवन में विकसित करने की जरूरत है। यह सारे गुण मिलकर व्यक्ति के गुरुत्व को बढ़ाते हैं।

गुरु और शिष्य के आत्मिक संबंधों का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती हूं- जापान में ध्यान की एक प्राचीन पद्धति है जेन। जेन गुरुओं में बनकेई का नाम बड़ी श्रद्धा और प्रेम के साथ लिया जाता है। एक बार जेन मास्टर बनकेई ने ध्यान करना सिखाने के लिए एक कैंप लगाया। पूरे जापान से कई बच्चे उनके पास सीखने के लिए आए। कैंप के दौरान एक दिन किसी छात्र को चोरी करते हुए पकड़ लिया गया। अन्य छात्रों ने उस चोर को पकड़ लिया। वे उसे पकड़कर बनकेई के पास ले गए। उन लोगों ने उस चोर के बारे में पूरी बात बताई। उन लोगों ने चोरी करने वाले छात्र को सजा स्वरूप कैंप से बाहर करने का अनुरोध बनकेई  से किया। बनकेई ने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और चोरी करने वाले छात्र को पढ़ने दिया। कुछ दिन बाद फिर उस छात्र ने चोरी की और अन्य छात्रों ने बनकेई से दोबारा उसे कैंप से बाहर करने का अनुरोध किया। इस बार भी बनकेई ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। तीसरी बार जब उस छात्र ने चोरी की, तो सभी ने मिलकर एक पत्र लिखा, जिसमें यह उल्लेख किया गया, यदि उस चोर छात्र को स्कूल से नहीं निकाला गया, तो सभी छात्र कैंप छोड़ देंगे। पत्र पढ़कर बनकेई ने जवाब दिया, कि आप लोग जानते हैं, कि क्या सही है और क्या गलत। इसलिए आप सभी कहीं और पढ़ने जा सकते हैं। यह बेचारा तो यह भी नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत है। यदि इसे मैं नहीं पढ़ाऊंगा, तो फिर कौन पढ़ाएगा। इसमें विवेक और बुद्धि दोनों की कमी है। यह सुनकर चोरी करने वाला छात्र फूट-फूट कर रोने लगा। अब उसके मन का मैल धुल गया था।

गुरु और शिष्य का यही आत्मीयता का एक अनमोल रिश्ता होता है, जिसमें गुरु अपने शिष्य की बुराइयों और अच्छाइयों को भली-भांति जानता है। कहा भी गया है- कि गुरु वही जो अपने शिष्य की बुराइयों का अंत करें और अच्छाइयों को समाज के सामने प्रस्तुत करें, जिससे उसका शिष्य अपने जीवन में एक अच्छा मुकाम हासिल करे। वही गुरु श्रेष्ठता की उपाधि पाता है, जो अपने शिष्य से हार जाए। अंतर्जगत का यह गुरु सच में हर पल हारता है। एक-एक उपलब्धि, रिद्धि-सिद्धि और समृद्धि देने के बावजूद उसे लगता है, कि कुछ और देना बाकी है। कठिनाई यही है, कि इसे पाने का स्थान कहीं और है, लेकिन हम इसे इस बाह्जगत में तलाश रहे हैं, मुट्ठी बांधकर जब बच्चा इस भौतिक संसार में आता है, तो वह इसलिए रोता है, कि मां के गर्भ में जो अनमोल रत्न मिला जिसे वह मुठ्ठी में बांधकर इस संसार में लाया वहां इसकी जरूरत ही नहीं। अंत में सब कुछ यहीं छोड़कर खाली हाथ ही लौटना पड़ता है। इसलिए गुरु के लिए सर्वश्रेष्ठ वाक्य “शीश कटाए गुरु मिले तो भी सस्ता जान” शत प्रतिशत सही है। यह शीश अहंकार का है जिससे मनुष्य को अपने मान-सम्मान, ख्याति, बड़प्पन के लिए नकारात्मक कार्य करने पड़ते हैं और न जाने कितनी उर्जा व्यर्थ में गंवा देनी पड़ती है।

गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है, जिससे भीतर से हाथ का सहारा देकर बाहर से चोट मार-मार कर और गढ़-गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकालते हैं।

संत कबीरदास

अंधकार में प्रकाश फैलाने वाला पूर्णिमा का चंद्रमा यह कह रहा है कि आकाश-सी ऊंचाई और व्यापकता चाहिए, तो इन गुणों को आत्मसात करना चाहिए।

16. समय का चक्कर

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

समय के चक्र में नए – पुराने के मायने नहीं होते, यह अतीत, वर्तमान और भविष्य की त्रिपक्षीय किंतु एकल और अनवरत यात्रा है। समय की परिकल्पना एक चक्कर के रूप में की गई है, जो क्रमशःआगे की ओर घूमता रहता है और कभी पूर्ण अवस्था में नहीं लौटता। इस समय चक्कर की धुरी वर्तमान है, जिसके एक छोर पर अतीत है, तो दूसरे पर भविष्य। समय के बारे में जितना गहन, व्यापक एवं व्यावहारिक चिंतन भारतीय मनीषियों ने किया है, उतना किसी भी अन्य संस्कृति में नहीं है। जब हम बिना किसी क्रिया के कल कहते हैं, तो पता ही नहीं चलता कि यह कौन- सा कल है -आने वाले कल या वह कल जो बीत गया। अब प्रश्न यह उठता है कि हमारे पूर्वजों ने ऐसा क्यों किया? क्या उनके पास शब्दों का अभाव था? नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। ऐसा उन्होंने बहुत गहरे चिंतन – मनन के बाद किया होगा। इस शब्द में उनकी अवश्य कोई दूर दृष्टि छिपी हुई है। जो उन्होंने अतीत और भविष्य के लिए एक ही शब्द “कल” का उपयोग करके यह उद्घोषित किया है कि ये दोनों अलग-अलग नहीं ,बल्कि एक ही हैं। दोनों का मूल तत्व एक ही है। फर्क केवल समय का है। एक कल बीत चुका है और दूसरा आने वाला कल है। ये दोनों परस्पर एक-दूसरे के साथ घनिष्ठता से बंधे हुए हैं। इन तीनों में मुख्य है -वर्तमान। यह वर्तमान, इन दोनों की जननी है।

बीता हुआ कल भी कभी वर्तमान था और जो आने वाला कल है, वह भी वर्तमान को स्पर्श करने के बाद अतीत बन जाएगा, यानी कि यह वर्तमान ही इन दोनों की विभाजन रेखा है। इधर का हिस्सा अतीत और उधर का हिस्सा भविष्य। हम अतीत का कुछ नहीं कर सकते क्योंकि वह हमारे हाथों से छूट चुका है। हमारा अतीत, हमारे वर्तमान का ही संचित फल है। इसलिए अगर हम अपने अतीत को सुखद बनाना चाहते हैं, तो वर्तमान को सुखद बना कर ही कर सकते हैं। क्योंकि प्रत्येक गुजरता हुआ पल तत्काल अतीत में तब्दील होता रहता है। जिसे हम स्मृति कहते हैं, वह हमारा अतीत है,जो हमारे मस्तिष्क में दर्ज है। जिसे हम जब-तब याद करके फिर से जीने की कोशिश करते हैं। हम कोई भी कार्य करते हैं, तो बार-बार अतीत की स्मृतियों में गुम हो जाते हैं। अगर हमारी स्मृतियां सुखद हैं, तो हमें आनंद की अनुभूति होती है और यदि हमारी स्मृतियां दुखद हैं, तो उनको बार-बार सोचकर दुखी होते रहते हैं।इसलिए हमें अपने वर्तमान को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जिससे हमारा अतीत सुखद रहे।

जिस प्रकार -“एक नदी में दो बार नहीं नहाया जा सकता” से आशय है कि गुजर चुकी परिस्थिति हूबहू उसी रूप में पुनः नहीं आएगी। उद्भव होते रहने, यानी जीवंतता की शर्त है परिवर्तनशीलता, जो सृष्टि को चलायमान रखती है। इस तथ्य को हृदयगंम न करते हुए जो अतीत में जकड़ा रहेगा, वह अपनी प्रगति अवरुद्ध करेगा तथा अपने परिवेश में नैराश्य पूर्ण, जीवन-विरोधी भाव संचारित-प्रसारित करेगा। इस चराचर जगत में स्थितियां-परिस्थितियां स्थाई नहीं रहती। इन्हें बदलना ही है। स्थाई है तो मनुष्य का दिव्य स्वरूप, जिसे अपने मूल स्थान यानी परमशक्ति में समा जाना है। अतीत तो हमारे अपने अनुभवों से बना हुआ है, इसलिए उसमें समाहित सब कुछ यथार्थ है। भविष्य के साथ ऐसा नहीं है वहां जो कुछ भी है वह केवल कल्पनाएं हैं। वह सब या तो मन की रंगीन तरंगें हैं या आशंकाओं के काले डरावने तूफानी बादल। इनके बारे में हम तब तक कुछ नहीं कह सकते जब तक कि भविष्य के वर्तमान में परिवर्तित नहीं हो जाते। यह सच है कि वर्तमान में हम जो कुछ भी कर रहे होते हैं, वह सब भविष्य के लिए ही कर रहे होते हैं। इसलिए वर्तमान पर हम लगातार हस्तक्षेप करके उसे अपनी इच्छा के अनुसार स्वरूप देने में लगे रहते ह‌ैं। भविष्य के लिए हम जो कुछ भी करेंगे, वह भी केवल वर्तमान में रहकर कर सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में ही कर्म किया जा सकता है हमारे ही कर्म हमारा अतीत बनेंगे और यही हमारे भविष्य का निर्धारण करेंगे।

कर्म पर ही मनुष्य का अधिकार है। कर्म केवल वर्तमान में ही संभव है। वर्तमान को अतीत से हेय मानने वाले या सदा सुनहरे भविष्य के ख्यालों में मग्न रहने वाले वर्तमान सुखों से वंचित रहेंगे। समय की परिवर्तनशीलता को समझने वाले विश्वस्त रहते हैं कि जब वे दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे। जीवन के प्रत्येक क्षण का आस्वादन लेना उनका स्वभाव होता है कल कुछ नहीं होगा, वह आएगा ही नही। यह प्रवृत्ति जीवन में अनायास पसर जाने वाली नीरसता और नैराश्य को निरस्त करती है। उनके जीवन को बोझिल नहीं बनने देती। आशा और प्रफुल्लता से सरोबार वह सार्थक जीवन व्यतीत करने में विश्वास रखते हैं। वे जीवन में अनायास आने वाली उलझनों और समस्याओं के समक्ष घुटने नहीं टेकते। प्रकृति का विधान है -एक बार जीवन में ढाल लिए गए व्यवहार और सोच में निरंतर सवृंद्धि होती रहेगी। हृदय में प्रेम, सौहार्द, दया जिन भी भावों को संजोएगे और सिंचित करेंगें, वही भाव कालांतर में लहराते रहेंगे। समय के चक्कर को समझने वाले योगी और बुद्धिजन अपनाई गई अपनी जीवनशैली में त्रुटियां देख लेते हैं। वे अपनी त्रुटियों में संशोधन के लिए प्रतिबद्ध और सहर्ष तत्पर रहते हैं। वे अपने अथक प्रयास से जीवन को नई दिशा दे डालते हैं। समय के चक्कर को समझने वाले उसकी महत्ता को भलीभांति समझते हैं। वे वर्तमान में रहकर अपने अतीत की सुखद यादों के साथ भविष्य को सुनहरे रंग में रंगते चले जाते हैं। उन्हें एहसास रहता है कि इस जीवन रूपी यात्रा में मनुष्य की परख उसकी विफलताओं से नही, बल्कि उनके पुनः उठने और अदम्य साहस तथा उत्साह के साथ कर्मशील होने से होती है।

15. सफलता और विफलता

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

दरअसल सफलता और विफलता जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। सही मायने में जीवन संघर्ष और विजय का फलसफा है। कोई जरूरी नहीं आपका हर प्रयास सफल ही हो, लेकिन यह भी सच है कि- कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। अगर किसी काम में सफल न भी हुए तो क्या -कम से कम अनुभव तो प्राप्त हो जाता है। जो बहुत बड़ी सीख का कारण बनता है। अगर हम असफल होने के डर से कुछ करेंगे ही नहीं, तो सफलता कहां से मिलेगी। अक्सर आदमी संघर्ष के रास्ते में उस वक्त भटक जाता है, जब वह मंजिल के करीब होता है। इसका प्रमुख कारण है कि वह अपनी कोशिश, सफलता और विफलता की तुलना दूसरों से करने लगता है। उसके मन में अपने पूर्वजों के मान- अपमान की गाथाएं और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह ठीक से न करने की भावनाएं प्रफुल्लित होती हैं। वह निराशा रूपी अंधकार से ग्रसित हो जाता है। उसको यह बात सताने लगती है कि – वह विफल हो गया तो मेरे पूर्वजों का, मेरे खानदान का, हमारी कुल परंपरा का नाम मिट्टी में मिल जाएगा। यह स्वाभाविक तौर पर हर मनुष्य सोचता रहता है। लेकिन कहीं ना कहीं हम वर्षों तक अंधकार में रहे हैं। यह अंधकार है- स्पष्ट लक्ष्य के न होने का। जब तक प्रकाश पुंज के रूप में सामने कोई लक्ष्य नहीं होता है, तब तक मनुष्य अंधेरे में हाथ-पांव मारता रहता है। विरासत, परंपरा, मान -सम्मान, यश -कीर्ति ये ही वे लक्ष्य हैं, जिन्हें मनुष्य पाना चाहता है, बल्कि इसके भी पार जाना चाहता है। बेहतर बनने और बनाने के लिए श्रेष्ठता चाहता है। लेकिन उसके लिए निराशा को दूर करना पड़ेगा और विफलता से मित्रता करनी पड़ेगी।

पूर्वजों के महानतम कार्यों में विश्वास जगाने और गलतियों को सुधारने की जिम्मेदारी भी हमारी है। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से विचार-विमर्श करके ही किसी काम की शुरुआत की जा सकती है। हम अपने जीवन और जीवन शैली दोनों में सकारात्मक परिवर्तन लाकर ही सफलता का स्वाद चख सकते हैं। आम तौर पर हम यह मानते हैं कि -हमारी नियति में जो लिखा है, उसके अनुरूप ही हमें सफलता मिलेगी, जबकि कर्म के माध्यम से उत्तम लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। विषम परिस्थितियों में भी हम स्वंय पर विश्वास बनाए रखें। हमें मुश्किलों को एक अवसर की तरह लेना चाहिए और हर चुनौती का सामना डट कर करना चाहिए। आज के समय में खुद को खुश रखने, उपयोगी बनाने और निराशा को मात देने के लिए जरूरी है कि -आप अपने काम को बेहतर तरीके से करें। जिम्मेदारियां लें और उसे शिद्दत से निभाएं ।

घर, ऑफिस या समाज, आप कहीं भी हो, खुद को दायरे में न बांधे। जो सही लगता हो और आप जो कर सकते हों जरूर करें। कुछ दिनों तक लोग आपके काम की व्याख्या अलग-अलग तरीके से करेंगे। लेकिन जब उन्हें आपकी क्षमता का एहसास होगा, तो वह आपका सम्मान करने लगेंगे। किसी भी काम के तुरंत परिणाम की उम्मीद ना करें। कई बार किसी काम में लंबा समय लग जाता है। समय-समय पर खुद का और अपने काम का आकलन करते रहें। जब कभी कोई दुविधा हो तो परिजनों, मित्रों, व विषय के जानकारों से चर्चा करें। मन में शंका की गुंजाइश कभी न छोड़ें। आपकी इस विशिष्टता पर कुछ दिनों तक कोई गौर न करें, लेकिन यह तय है आपका यह गुण बहुत दिनों तक छिपा भी नहीं रहेगा।

डॉक्टर विनीत कौशिक

इसको मैं एक कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश करती हूं। एक व्यक्ति लॉन्ड्री चलाता था। अपने काम के सिलसिले में उसने एक गधे और कुत्ते को पाल रखा था। गधा ग्राहकों के कपड़ों को नदी तक पहुंचाता और ले आता, तो कुत्ता घर की रखवाली करता। गधा कारोबार का हिस्सा था और ज्यादा काम करता था। इसलिए मालिक उसकी ज्यादा चिंता करता था। उसके खानपान पर खास ध्यान देता था। यह बात कुत्ते को बुरी लगती थी। धीरे-धीरे कुत्ते के मन में यह बात बैठ गई की मालिक उसके साथ भेदभाव करता है। वह परेशान रहने लगा। एक रात लांड्री मालिक के घर चोर घुस आए। कुत्ते ने चोरों को देखा लेकिन चुप बैठा रहा। गधे ने कुत्ते को उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाते हुए कहा कि उसे भोकना चाहिए। इस पर कुत्ते ने कहा कि मालिक तुम्हें ज्यादा चाहता है, इसलिए तुमसे जो कुछ भी हो सकता हो तुम करो। मैं नहीं भौंकता। गधे से नहीं रहा गया। वह जोर से ढेंचू -ढेंचू करने लगा। उसकी आवाज सुनकर मालिक की नींद खुल गई और चोर भाग गए। मालिक ने घर में सब कुछ सही सलामत पाया तो उसने गुस्से में गधे की पिटाई कर दी। कुत्ता बहुत खुश हुआ और कहा, जिसका काम उसी को साजे- दूसरा करे तो डंडा बाजे। इसके बाद भी लॉन्ड्री मालिक के यहां कई बार चोरी के प्रयास हुए और गधे ने हर बार ढेंचू-ढेंचू करके चोरों को भगा दिया। लेकिन इनाम की बजाय हर बार उसे पिटाई मिलती और कुत्ता हर बार खुश होकर उसे चिढ़ाता। कुछ दिनों बाद फिर लॉन्ड्री मालिक के घर चोर घुस आए। लेकिन वह चुप रहा। चोर काफी देर तक घर में रुके और सामान समेटकर जाने लगे। तब गधे से नहीं रहा गया। अपने मालिक का नुकसान बचाने के लिए उसने ढेंचू-ढेंचू करना शुरू कर दिया। चोर सामान छोड़कर भाग गए। लांड्री मालिक की नींद खुली और जब उसकी नजर घर के खुले दरवाजे पर पड़ी तो, वह ठिठक गया। बाहर निकल कर देखा तो पास में ही गठरियां दिखाई दी। जिसमें उसके घर का सामान था। लांड्री मालिक सब समझ गया। इस बार पिटाई की बारी कुत्ते की थी। उसने न सिर्फ कुत्ते की पिटाई की बल्कि उसकी जगह दूसरे कुत्ते को पाल  लिया। गधे की मंशा शुरू से ठीक थी। वह काम भी ठीक कर रहा था। लेकिन उसे गलत समझा गया। बाद में उसे सफलता मिली।

हमें सफलता और विफलता से ऊपर उठकर अपने द्वारा खींची गई परिपाटी और घरोंदो से बाहर निकलना होगा। हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो आशा का बोध कराए, शील का संस्कार दे,  शिष्ट मर्यादाओं और आदर्शों की ओर उन्मुख हो। तभी वैचारिक और ऐतिहासिक दीनता से मुक्ति मिलेगी और शिक्षा राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान का उपक्रम बनती नजर आने लगेगी। यह शिक्षा हमें परंपरागत, धार्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों के प्रति सुमुख भी बनाएगी। जिससे हमारा बौद्धिक विकास होगा और हमें सफलता और विफलता का कीड़ा नहीं काटेगा। हम निर्भीक होकर किसी भी कार्य को करने में पीछे नहीं हटेंगे।

14. विचारों की शक्ति

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

किसी भी मनुष्य की जिंदगी में उसके विचारों का बहुत महत्व है। विचारों से ही मनुष्य के व्यक्तित्व का पता चलता है। सकारात्मक सोच ही मनुष्य की जिंदगी को खूबसूरत बनाती है। जिस व्यक्ति की सोच सकारात्मक है, वह अपने आसपास के वातावरण को सुगंधित फूलों की तरह महका देता है। हंस की तरह हमें भी अपने जीवन के लिए सकारात्मक विचारों के मोती ही चुनने चाहिए। सकारात्मक विचारों के कारण व्यक्ति वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है, जो वह सोच भी नहीं सकता। इसका एक उदाहरण ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल हैं, जो एक इतिहासकार, साहित्यकार और एक कलाकार भी थे।वह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। एक बार उन्हें हाथ में लकवा मार गया। शुरुआत में उन्हें थोड़ी बहुत चिंता हुई, लेकिन बाद में उन्होंने अपने मन में असीम उत्साह का संचार करते हुए इसे ठीक करने का एक उपाय निकाल लिया। उपचार के साथ-साथ वे प्रतिदिन अपने हाथ को बार-बार आदेश देते हुए कहते तुम्हें ठीक होना है। इस बात का उसके हाथ पर जबरदस्त असर हुआ और वह ठीक हो गया।

दरअसल हमारे मन पर विचारों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। आप जैसी सोच रखते हैं उसी के अनुरूप आपका शरीर और हाव-भाव भी काम करते हैं। यदि आप खुद को हमेशा बीमार घोषित करते रहते हैं या घर ऑफिस में हमेशा बुझे बुझे से रहते हैं तो, ऐसे भाव न सिर्फ आप की कार्य क्षमता को प्रभावित करते हैं बल्कि जाने – अनजाने अपने इर्द-गिर्द नकारात्मक भाव का संचार भी करते रहते हैं। इससे दूसरे लोग भी प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर यदि आप सुबह की शुरुआत मन में सकारात्मक भावों से करते हैं, तो कोई भी बीमारी या नकारात्मक भाव आपके आसपास नहीं फटकता। यदि आप बीमारी की चपेट में आते भी हैं, तो आपकी इच्छा शक्ति उसे जल्द ठीक कर देती है। एन. के. भाटिया हमेशा बिस्तर पर पड़े रहते हैं। जब भी कोई उनसे कुशल- क्षेम पूछता है, तो उनका सिर्फ एक ही जवाब होता है – मैं तो बीमार हूं। थोड़ी बहुत तकलीफ होने पर भी वे इतने बेचैन हो जाते हैं, कि उनको संभालना बड़ा मुश्किल होता है। वह अपने साथ साथ घर के प्रत्येक सदस्य को परेशान कर देता है ।डॉक्टर जब उनका परीक्षण करते हैं, तो उनको शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ पाते हैं। यह सिर्फ उनके नकारात्मक विचारों का ही प्रभाव है, कि वे हमेशा बीमार ही बने रहते हैं

हम बीमार नहीं होते, बल्कि हमारा मन बीमार होता है,भाव बीमार होते हैं।

ओशो

अगर कोई व्यक्ति पेट दर्द की शिकायत कर रहा हो और बिस्तर पर पड़ा हो, तभी दूसरा व्यक्ति  यदि उसके बिस्तर पर सांप होने का शोर मचाए, तो लेटा हुआ व्यक्ति तुरंत उठ कर भाग जाएगा। पेट दर्द की बात वह उस क्षण बिल्कुल भूल जाएगा। अगर हम हमेशा खुश रहने की कोशिश करें और नकारात्मक विचारों को मन में न बैठने दें, तो हम जल्दी बीमार नहीं पड सकते।

बीमारी के बहाने बिस्तर पर पड़े रहने की बजाय हमें अपने मस्तिष्क को अच्छे विचारों से भरना चाहिए।

सवामी विवेकानंद

क्योंकि हम जैसा सोचते हैं ,वैसे ही बनते चले जाते हैं। हमारी नकारात्मक सोच हमें सभी संबंधों से दूर कर देती है, और हम अकेले पड़ जाते हैं। जबकि सकारात्मकता हमें जिन रिश्तो से जोड़ती है, वे हमारे जीवन को महका देते हैं। जब हम कोई भी काम अच्छे मन से करते हैं, तो उसका फल अच्छा होता है।जबकि दूसरी तरफ जब हम कोई काम बुरे मन से करते हैं, तो उसका फल बुरा होता है। सकारात्मक होकर जब हम रिश्तो के तार दूसरों से जोड़ते हैं, तो उसका सकारात्मक असर होता है, जो हमारे जीवन को महका देता है। जो व्यक्ति अपने अहम और अपनी श्रेष्ठता का गुलाम होता है। वह एक दिन इस संसार में अकेला रह जाता है। दुनिया के किसी भी तानाशाह की कहानी पढ़ लीजिए, उसकी जवानी चाहे जितनी हसीन रही हो, बुढापा बहुत तन्हा रहा है। अकेलेपन का दंश बेहद दुखद होता है। अपने टूटते रिश्तो को अगर आपने आज नहीं जोड़ा तो देर हो जाएगी। जोड़ लीजिए उन सब से अपने रिश्तो के तार, जिनसे आपने अपनी नकारात्मक ऊर्जा के कारण टूटने दिया। हमारे विचारों में जितनी सकारात्मकता होगी, हमारे आस-पास का वातावरण, रिश्ते, दोस्त सब सकारात्मकता से ओत-प्रोत होंगे।

13. मानवीय जीवन का मूल्य

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मानवीय जीवन का मूल्य अनमोल है। इसके मूल्य की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। फिर भी हम पता नहीं क्यों इस अनमोल मानवीय शरीर को बर्बाद करने पर लगे हुए हैं। आज हर कोई परेशान है और अपने जीवन को बर्बाद करने पर या अपनी जीवन – लीला खत्म करने पर लगा हुआ है । वह यह भूल जाता है कि बड़ी मुश्किल से ये मानव शरीर मिला है। क्यों ना हम अच्छे कर्मों से अपने जीवन को सफल बनाएं और देश के निर्माण में सहयोग करें। क्योंकि अगर हर व्यक्ति अपनी सोच को सकारात्मक रखें तो वह उन्नति की ओर अग्रसर होता है। इससे समाज में सकारात्मक  विचारों का विकास होता है और मनुष्य अपने आसपास के वातावरण को सुगंधित करता है। लेकिन आज हम जहां निवास करते हैं, वहां हर व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है। उसको पता ही नहीं की वह क्या कर रहा है? कहां जा रहा है? खाना खाते हुए भी वह कहीं और होता है।

मैं एक उदाहरण से आप को समझाने की कोशिश करती हूं – एक शख्स अपने घर की चोथी मंजिल की छत पर घूम रहा था। जमीन से किसी व्यक्ति ने पुकारा – अरे श्याम लाल तेरी लड़की का एक्सीडेंट हो गया है। उसने बगैर सोचे -समझे छत से छलांग लगा दी। जब वह गिरता हुआ तीसरी मंजिल पर पहुंचा तो उसे याद आया कि उसकी कोई लड़की है ही नहीं। जब वह दूसरे मंजिल पर आया तो उसको याद आया कि उसकी शादी ही नहीं हुई और जब वह जमीन पर गिरने लगा तो उसे याद आया कि उसका नाम भी श्यामलाल नहीं है। यह है हमारे समाज में रहने वाले मनुष्यों का हाल। वे यह भूल जाते हैं – कि यह मानव जीवन कितनी योनियों में जन्म लेने के बाद बड़ी मुश्किल से नसीब होता है।

गुरु नानक देव जी ने मानव जीवन के मूल्य को बड़ी सरल व स्पष्ट भाषा में समझाया है – एक बार की बात है – एक व्यक्ति हताश और निराश होकर बार-बार गुरुजी के पास आता और उनसे मानवीय जीवन के मूल्य के बारे में पूछता। गुरुजी ने उनको बड़ी सरल भाषा में समझाया। लेकिन वह इतना परेशान था, कि कुछ समझना ही नहीं चाहता था।  फिर गुरु जी ने उन्हें एक सुर्ख लाल रंग की रूबी दी और उसको कहा मार्केट में जाकर इसके मूल्य का पता करके आना, ध्यान रहे कि उसने सिर्फ मूल्य का पता करना है इसको बेचना नहीं है। वह व्यक्ति उस कीमती रूबी को लेकर चल पड़ा लेकिन उसके लिए तो वह एक मामूली लाल रंग का पत्थर था। इसलिए वह एक आलू के व्यापारी के पास गया और उसका मूल्य पूछा। व्यापारी ने रूबी को देखा और बोला यह पत्थर मेरे किस काम का है, फिर भी यह देखने में सुंदर लग रहा है इसलिए एक बोरी आलू ले जाओ। उस व्यक्ति ने कहा- नहीं, बेचना नहीं है, सिर्फ इसकी कीमत पता करनी थी। फिर वह फल के व्यापारी के पास गया और उससे भी रूबी की कीमत जाननी चाही। उसने भी उसे हाथ में लेकर देखा और बोला यह बहुत सुंदर पत्थर है। मैं ज्यादा से ज्यादा एक पेटी संतरे दे सकता हूं। फिर उस व्यक्ति ने कहा – नहीं गुरु जी ने कहा है – कि बेचना नहीं है। फिर वह व्यक्ति सुनार के पास गया और सुनार को भी रूबी को दिखाया। सुनार को पत्थरों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी थी। इसलिए उसने उसे मलमल के कपड़े में रखा और अच्छी तरह जांचा परखा। फिर उस व्यक्ति से उसके मूल्य के बारे में पूछा। सुनार ने कहा इसकी सही कीमत तो मैं नहीं जानता लेकिन यह बहुत महंगी है। तुम जो भी मांगोगे, उतना ही दाम में तुम को दे दूंगा। वह व्यक्ति सोच में पड़ गया  कि इतना महंगा पत्थर गुरुजी ने मुझको क्यों दिया ।फिर उस व्यक्ति ने सुनार से पूछा कि इसकी असली कीमत कौन बताएगा। तो सुनार ने उसको जोहरी के पास भेज दिया। वह जोहरी के पास गया और उसने उस कीमती रूबी को दिखाया। जोहरी ने जैसे ही उस व्यक्ति के हाथ में उस सुर्ख लाल रंग की रूबी को देखा तो वह हैरान रह गया कि – इतनी बेशकीमती रूबी इस व्यक्ति के पास कैसे आई। उस व्यक्ति ने उस जोहरी  से गुरु जी की बात बताई और उसका मूल्य पूछा। उस जोहरी ने उसे मलमल के कपड़े से साफ किया और लाल रंग का कपड़ा बिछाया। फिर उस बेशकीमती पत्थर को उसके ऊपर रखा और नतमस्तक होकर उस को प्रणाम किया। वह व्यक्ति यह सब कुछ देख कर बड़ा हैरान हो रहा था – कि यह सब क्या हो रहा है? प्रणाम करने के बाद उस जोहरी ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और बोला तू इसकी कीमत पूछ रहा है। तुझे पता भी है कि यह क्या हैॽ यह बेशकीमती है। इसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता। इस हीरे पर तो सारी दुनिया की दौलत कुर्बान है। इसका मूल्य कोई नहीं लगा सकता यह इतनी बेशकीमती है – कि किसी के पास इसको खरीदने की हैसियत नहीं है। उस व्यक्ति ने उस लाल रंग की रूबी को मलमल के कपड़े में लपेटा और बड़ी सावधानी से लाकर गुरु जी के चरणो में बैठ गया। जो व्यक्ति अब तक  इसे एक मामूली सा पत्थर समझ कर सबको दिखाता घूम रहा था। अब उसकी सुरक्षा की चिंता भी उसे सता रही थी। उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि, उसको काटो तो मानो उसमें खून नहीं है। उसका गला सूख गया था। उसकी आवाज में कंपन था और उसका पूरा शरीर एक सूखे हुए पत्ते की तरह कांप रहा था।  गुरुजी ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और फिर बोले कितना मूल्य है इसका पता कर लिया। उस व्यक्ति ने सारी बात बता दी, फिर गुरुजी ने बड़े प्यार से समझाया, जैसे यह हीरा बेशकीमती है, वैसे ही यह मानव शरीर बेशकीमती है। अब तुम चाहो तो इसे एक बोरी आलू के भाव बेच दो, चाहे एक पेटी संतरो के भाव बेच दो, यह तुम्हारे हाथ में है। इस मानव शरीर की असली परख तो एक पारखी ही कर सकता है। अतः हर व्यक्ति को अपने जीवन का मूल्य समझते हुए, इसे अपने देश, समाज, परिवार इन सब की उन्नति में लगाना चाहिए। फिर देखना देखते ही देखते हमारे देश की तस्वीर क्या होगी।