226. सत्य की शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सत्य अर्थात् जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा अनुभव किया, उसे वैसा ही कहना और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढालना सत्य कहलाता है। सत्य जो पूरी तरह यथार्थ या संपूर्ण हो। जिसमें जरा- सी भी अपूर्णता ना हो, किसी तरह का दोष ना हो। सत्य के बगैर सृष्टि की सत्ता संभव ही नहीं है। सत्य को ईश्वर और ईश्वर को सत्य कहा गया है। जिसने अपने जीवन में सत्य को धारण कर लिया, उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। जैसा उसके मन में होता है, वह वैसा ही बोलता है और उसी के अनुरुप अपना जीवन निर्वाह भी करता है। उसके मन में कुछ और जुबान पर कुछ और तथा व्यवहार में कुछ और नहीं होता।

मुंडक उपनिषद् में वर्णित आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” सबसे पवित्र माना जाता है। सत्य को वेदों में ब्रह्मांड का आधार बताया गया है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह- उपग्रह हैं, सब का अस्तित्व और स्वभाव सत्य से ही निर्धारित होता है। यह बात अलग है कि अंधकार और प्रकाश में, दिन और रात में, शुभ और अशुभ में, हिंसा और अहिंसा में किसमें सत्य है और किसमें असत्य है। हालांकि देखा जाए तो दोनों में सत्य है। अंधकार भी सत्य है लेकिन शुभ नहीं है और प्रकाश भी सत्य है लेकिन यह शुभ है। सुख के साथ जो लाभ प्राप्त होता है, वही सच्चा सुख देने वाला है। इसलिए एक साथ शुभ- लाभ लिखा जाता है। हमारा विकास सत्य होने के साथ-साथ शुभ भी होना चाहिए क्योंकि शुभ से संसार में शुभता बढ़ती है।

सत्य केवल मनुष्य द्वारा सत्य वचन बोलने या जीवन में विभिन्न प्रश्नों के पूर्ण सत्यता से उत्तर देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्य की पहुंच तो मन के भीतर की गहराइयों में वहां तक होनी चाहिए जहां तक मनुष्य की स्वयं की सत्यता की शक्ति से मन के भीतर के द्वार खुल जाएं। इन द्वारों के अंदर जब सत्य की शक्ति की तेजस्वी किरणें पहुंचती हैं, तब वे भीतर की दुनिया को प्रकाश से जगमगाकर व्यक्ति को सत्य की पूर्णता का अहसास करा देती हैं। उस समय मस्तिष्क में उभर चुके तमाम प्रश्न एवं आने वाले विभिन्न स्वाभाविक विचार अपने आप ही विसर्जित हो जाते हैं। यह विसर्जन ही मनुष्य को अद्भुत शांति की ओर ले जाता है।

वास्तव में देखा जाए तो मस्तिष्क में उभरते हुए तमाम पश्न और कुछ नहीं बल्कि हमारे अशांत चित्त की स्वाभाविक उपज ही है। मनुष्य का अध्यात्मिक विकास इस बात पर निर्भर करता है कि— मन स्थिर हो, मानसिक उलझनों और मोह से मुक्त हो। यह सब सत्य की शक्ति द्वारा ही संभव होता है क्योंकि सत्य बोलने वाले मनुष्य का चित्त हमेशा शांत रहता है। मनुष्य का चित्त जैसे- जैसे शांत होता जाता है, वैसे- वैसे अनसुलझे प्रश्नों का उभरना अपने आप बंद हो जाता है और यही व्यक्ति की आत्मिक अवस्था होती है जो उसे ज्ञान प्राप्ति की ओर अग्रसर करती है।

आपने यह अवश्य सुना होगा कि किसी का ध्यान जल्दी लग जाता है और किसी-किसी मनुष्य का ध्यान तो कई वर्षों तक भी नहीं लग पाता। उसके पीछे यही कारण है कि जिसका चित्त शांत होता है, उसका ध्यान जल्दी लग जाता है और जिसका चित्त अशांत होता है, उसका ध्यान नहीं लगता। ऐसा सत्य की शक्ति के कारण ही होता है। जो मनुष्य अध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त करना चाहते हैं, वे सच्चाई के गुण का आदर करते हैं क्योंकि मनुष्य के जीवन में सत्य का बहुत महत्व है। यदि हमारी जीवन रूपी ईमारत सत्य की नींव पर खड़ी होगी तभी हमारा चित्त शांत होगा और शांत चित्त ही सफलता के शिखर स्थापित करने में सहायक होगा।

ध्यान की अवस्था भी एक ऐसी अवस्था होती है। जिसमें अनसुलझे प्रश्नों का विसर्जन हो जाता है। इसे समाधान कहा जाता है तथा इस प्रकार का समाधान ही समाधि की अवस्था होती है। ऋषि-मुनियों द्वारा वैदिक काल से समाधि की अवस्था को प्राप्त करना और फिर अपने अंतर्मन में झांकना एक चमत्कारी ढंग रहा है, जिससे हम यह जान सकने में समर्थ हो सकते हैं कि— जिस सता के अधीन हम जीवन यापन कर रहे हैं, उसे किस प्रकार से अनुभव कर सकें। दूसरे शब्दों में ईश्वरीय सत्ता से किस प्रकार से साक्षात्कार कर सकें। इसलिए हमने सत्य की शक्ति को समझना होगा क्योंकि आवश्यकता इस बात की है कि हमारा चित्त शांत रहे। शांत चित्त ही मस्तिष्क में उतरने वाले अनसुलझे विचारों का विसर्जन यथाशीघ्र करने में सक्षम होता है अर्थात् उसे अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे, उनका समाधान मिल जाएगा, तभी हमारा मन प्रसन्न रहेगा और चित्त शांत रहेगा क्योंकि बगैर शांत चित्त के हम ईश्वर से साक्षात्कार करने में सफल नहीं हो सकते इसलिए हमें अपने जीवन में सत्य को धारण करना चाहिए।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने सदैव सत्य के मार्ग का अनुसरण किया। सत्य ही धर्म है इसलिए उनका मार्ग, धर्म का मार्ग कहलाया। उन्होंने सत्य की शक्ति से असत्य को धराशाई किया। रावण ने असत्य और छल का मार्ग अपनाकर स्वयं के विनाश को आमंत्रित किया। यह स्पष्ट है कि असत्य का मार्ग सदैव विनाश का मार्ग रहा है। असत्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, फिर भी इतना शक्तिशाली नहीं होता कि वह सत्य पर आधिपत्य स्थापित कर सके। असत्य ने चाहे अपनी जड़ें कितनी भी मजबूत कर ली हों फिर भी एक समय ऐसा अवश्य आता है, जब वह सत्य से हार जाता है। रावण बहुत शक्तिशाली, महाज्ञानी और ज्योतिष शास्त्र का बहुत बड़ा विद्वान होने के बावजूद भी श्री राम से युद्ध हार गया, उसके कुल का समूल नाश हो गया। उसके घर में दीपक जलाने वाला भी कोई नहीं रहा। यह सब सत्य की शक्ति के कारण ही हुआ क्योंकि श्री राम के पास सत्य की शक्ति थी लेकिन रावण समय रहते सत्य की शक्ति को जान ही न सका। उसकी नींव असत्य के धरातल पर टिकी हुई थी।

श्री राम सत्य के अनुगामी रहे। उन्होंने सत्य की जीत के लिए अपनी सभी क्षमताओं का प्रयोग किया। रावण के दिग्गज वीर योद्धा श्री राम की वानर सेना के सामने टिक न सके। विजयदशमी का पर्व हमें अपने जीवन में सत्य के मार्ग को आत्मसात् करने के लिए प्रेरित करता है। त्रेता युग से शुरू हुआ यह सिलसिला द्वापरयुग से होता हुआ कलयुग में भी सत्य के प्रभाव को कम नहीं होने देता बल्कि उसका उत्कर्ष बढ़ता ही चला जाता है। सत्य प्रेरणा बनकर हमारे जीवन को आलोकित करता है।

225. प्रभु लहर

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

इस संसार में इंसान के जीवन में सुंदरता, मादकता एवं आकर्षण तभी तक सुंदर और उपयोगी है, जब तक इसमें प्रभु रूपी सांसो की लहर विद्यमान है। इस संसार से परे परब्रह्मस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, निर्मल, स्वयंप्रकाश, आदि-अंत से रहित, निर्गुण और सच्चिदानंद स्वरुप परब्रह्म हैं, उसी के अंश सभी जीव हैं।

शरीर में प्रभु रूपी शिवत्व के अभाव में शरीर से उत्पन्न सभी आसक्तियां शव रूप में परिणत होकर जीव में विरक्ति के संसार का विस्तारण करती हैं। देवत्व से अनुराग के लिए भौतिकता से वैराग जरूरी है। भौतिकता की जड़ और चेतन में प्राण प्रतिष्ठा का प्रवाह सुचारू रूप से तभी संभव है, जब ईश्वर रुपी शक्ति-केंद्र से उनकी दयारूपी करुणादृष्टि का प्रवाह हो। इसके अभाव में उनमें प्राण रूपी संचार कदापि संभव नहीं है। प्रभु रूपी लहर के बगैर हम अपनी जीवन रूपी नैय्या को इस काल रूपी महासागर से पार नहीं पा सकते, क्योंकि काल के इस गहरे महासागर में यह संपूर्ण जगतू डूबता-उतरता रहता है। मृत्यु, रोग और बुढ़ापा रूपी ग्राहों से जकड़े जाने पर भी किसी व्यक्ति को ज्ञान नहीं हो पाता।

मनुष्य के लिए प्रतिक्षण भय है, समय बीत रहा है, किंतु वह उसी प्रकार दिखाई नहीं देता, जिस प्रकार जल में पड़ा हुआ कच्चा घड़ा गलता हुआ दिखाई नहीं देता। प्रभु कृपा की लहर के बिना मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं के महान भवननुमा जीवन में खुशियों की दीपमाला नहीं जल सकती। जिस प्रकार केवल आकर्षक भवन एवं हवेली को तब तक घर नहीं कहा जा सकता, जब तक उस में निवास करने वाला मानव प्रसन्न न हो। यह जगत् सभी दुखों का जनक, समस्त आपदाओं का घर तथा सब प्रकार के पापों का आश्रय है। लौह और काष्ठ के जाल में फंसा हुआ मनुष्य मुक्त हो सकता है, परंतु पुत्र एवं स्त्री के मोह जाल में फंसा हुआ वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। सब कुछ होने पर भी वहां आनंद एवं असली सुख की रिक्तता पग-पग अनुभव की जा सकती है। जो कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं बांधता, वही सत्कर्म है।

जब तक मनुष्यों को कर्म अपनी ओर आकृष्ट करता है, जब तक उनमें सांसारिक वासना विद्यमान है और जब तक उनकी इंद्रियों में चंचलता रहती है, तब तक उन्हें परमात्मा की लहर का ज्ञान कहां हो सकता है। जब तक व्यक्ति में शरीर का अभिमान है, जब तक उसमें ममता है, जब तक उस मनुष्य में प्रयत्न की क्षमता रहती है, जब तक उसमें संकल्प तथा कल्पना करने की शक्ति है, जब तक उसके मन में स्थिरता नहीं है, जब तक वह शास्त्र- चिंतन नहीं करता एवं जब तक उस पर गुरु की दया नहीं होती है, तब तक उसको परम सत्ता की शक्ति का आभास कैसे हो सकता है?

इसके विपरीत महज त्रिपालनुमा घर में भी प्रभु कृपा से खुशनुमा परिवार देखा जा सकता है। मनुष्य आभाषित आनंद के लिए कामनाओं के जितने पासे फेंकता रहता है, उतनी ही बार असली खुशियों की पूंजी से हाथ मलता महसूस करता जाता है। यदि वास्तविक आनंद केवल भौतिकता में होता तो एक अभीष्ट के बाद मनुष्य वांछित सुख के सरोवर में डूब, स्वंय को विश्व का सबसे आनंदित एवं सौभाग्यशाली व्यक्ति घोषित कर चुका होता।
वस्तुतः भौतिकता के एक अभीष्ट की प्राप्ति पुनः अनंत आकांक्षाओं के द्वार खोल देती है। ये असंख्य द्वार हर पिछले लाभदायक लक्ष्य एवं उपलब्धि को पुनः प्राप्त करने के लिए और अगले काल्पनिक और श्रेष्ठ मुकाम की तरफ अग्रसर होने के लिए उकसाते हैं।

मनुष्य का चंचल मन किसी भी पायदान पर पहुंच, कहीं भी उस क्षणभंगुर सुख की लालसा के लिए लालायित रहता है। वह सोचता है कि— धन-दौलत से ही मुझे ज्यादा खुशी मिलेगी। धन-दौलत आपको इस भ्रम में रखती है कि आप ज्यादा स्वतंत्र हैं। आपका मन आपको बताता है कि अधिक धन से व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता मिलती है, जिससे वह खुशी रूपी सागर में डुबकी लगा सकता है, लेकिन एक राजा इसके विपरीत सोचता है, क्योंकि उसके पास धन- दौलत, नौकर- चाकर, ऐशो-आराम के सारे सामान मौजूद हैं, इसलिए वह इन्हें त्याग करके ही सुख की कामना करता है।

एक राजा था। उसने सुना था कि— उसका पुराना दोस्त एक साधु है, जिसके साथ उसने गुरुकुल में पढ़ाई की थी, वह शहर आ रहा था। वह विनम्रता पूर्वक उसे लेने गया। उसने अपने पुराने मित्र को बहुत जर्जर, फटे कपड़ों और जूतों के साथ देखा और कुछ प्रतिक्रिया दिए बिना उसका स्वागत किया। लेकिन वह व्यक्ति असभ्य और कटु था। राजा ने मन ही मन कहा, इसके वस्त्र फटे हैं, लेकिन इसका अहंकार फटा नहीं है। इस त्याग का क्या लाभ ? अधिक विनम्र, समर्पित और प्रेमपूर्ण बनने के लिए राजा सब कुछ त्यागने के बारे में सोच रहा था, लेकिन अपने लापरवाह मित्र को देखकर उसने अपना फैसला बदल लिया।

यह महसूस करना आवश्यक है कि आपके इर्द-गिर्द बनाए गए सुरक्षा कवच झूठे हैं। जिस सुख की चाहत में वह दर-बदर भटकता फिरता है, वह उस सुख को बटोर पाने में सक्षम हो ही नहीं पाता। वह यह भूल जाता है कि— ये सभी सुख इस भौतिक एवं मृत्युमय संसार में होते तो संसार का कोई भी व्यक्ति अभागा न महसुस करता। प्रभु-भक्ति की लहर से तरंगादित संसार अथवा माध्यमों से ही शाश्वत सुख की प्राप्ति संभव है जो पश्चाताप दिग्भ्रमित, अनित्य एवं नश्वरता जैसी अस्थिरताओं के भय से सर्वथा मुक्त हैं।

224. सद्व्यवहार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय में प्रत्येक मनुष्य को कोई न कोई कारण हमेशा परेशान करने के लिए मौजूद रहता है। जिससे उसके सद्व्यवहार और शिष्टाचार में कमी दिखाई पड़ती है। लेकिन आज के दौर में आप किसी भी स्थान पर हों, चाहे सभागार, स्कूल, कॉलेज, कार्यक्षेत्र या घर में ही क्यों न हों, हर मनुष्य का व्यवहार अमर्यादित होता जा रहा है।

दरअसल अच्छा और कुशल व्यवहार हमारे जीवन का आईना होता है। तथ्य, तर्क और संयम इसके साथी होते हैं। वस्तुतः हमारे आचरण से हमारे संस्कार का दर्शन होता है। हमारे व्यवहार से ही घर- बाहर हमारी अच्छी या बुरी छवि बनती है।
चाणक्य तो कहते हैं— सद्व्यवहार और शिष्टाचार से दुश्मन तक को जीता जा सकता है। इतिहास के पन्नों में ऐसी हजारों घटनाएं मोटे अक्षरों में दर्ज हैं। अक्सर यह देखने को मिलता है कि- अंदर से कमजोर लोग, असुरक्षा की भावना या हीन भावना से ग्रसित लोग या फिर बहुत जल्दी सब कुछ पाने के लिए लालायित लोग, जाने-अनजाने में ऐसा अमानवीय व्यवहार ज्यादा करते हैं। आक्रामक, दबंग या लीडर की भूमिका निभाने वाले मनुष्य मानवीयता की मूल भावना को भूलकर पद के अहंकार से ग्रस्त होकर अपने अधीनस्थ कर्मियों को बात-बेबात, डांटते- फटकारते रहते हैं। अगर हमारे कार्य क्षेत्र में आपसी रिश्ते ठीक नहीं हैं, तो इसका प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव हमारे कार्य के साथ-साथ कर्मचारियों के घर पर भी पड़ता है, जिससे घरेलू माहौल भी तनावपूर्ण रहता है।

मेडिकल साइंस भी यह स्वीकार करता है कि— किसी के साथ गलत या अमर्यादित व्यवहार करने से सबसे पहले हम स्वयं नकारात्मकता से भर जाते हैं। जिसका बुरा असर हमारे मेटाबालिज्म पर पड़ता है। कहा भी गया है—”जैसा बोएंगे वैसा ही काटेंगे” यानी आज नहीं तो कल ब्याज समेत उसी तरह का व्यवहार हमें भी मिलता है, जिससे हमारा तनाव और ज्यादा बढ़ जाता है। कभी-कभी यह परिवार के किसी सदस्य, मित्र या फिर किसी पड़ोसी का व्यवहार हो सकता है, जिससे आप परेशान हो सकते हैं। यदि इस प्रकार की कोई समस्या नहीं हो रही तो किसी पशु जैसे कि कुत्ते के रात को भोकने पर भी आपको समस्या हो सकती है। पाया गया है कि इस श्रेणी के लोग भी कहीं न कहीं अंदर से दुर्बल और अनजाने भय के शिकार होते हैं। बुद्धि के मामले में भी वे कमतर पाए गए हैं। अपनी कमियों को छिपाने और अपने को निडर दिखाने के प्रयास में अमर्यादित व्यवहार का तरीका अपनाते हैं।

आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यह है कि हम सद्व्यवहार के साथ अच्छे कार्य करें। लोगों और स्थितियों को उसी तरह स्वीकार करें, जैसा कि वे हैं। जिस क्षण आप किसी स्थिति या व्यक्ति को स्वीकार करते हैं, मन शांत हो जाता है और आपको प्रतिक्रिया की बजाय सोचने और कार्य करने के लिए समय मिल जाता है। यह समझने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए कि स्वीकृति का यह सूत्र निष्क्रियता की वकालत करता है। आप शांत मन से और निश्चय पूर्वक होकर सक्रिय कार्य करते हैं। स्वीकृति का सूत्र सोच-समझकर कर्म करने के लिए कहता है न की हताश होकर कार्य करने के लिए। कर्मों में सबसे अच्छा संतुलन केवल तभी संभव है, जब शांत मन से और सद्व्यवहार से सटीक कर्म किया जाए। इसलिए न तो लोगों से निराश हों और न ही खुद से। अपना व्यवहार अच्छा रखें, अपना उत्साह बनाए रखें और जहां जरूरत हो वहां काम करें।

आपका शरीर एक कमजोर खोल की तरह है। आपका मन या भीतर का स्वयं, पानी जैसा है। आप अंदर पानी की तरह हैं— स्वच्छ और निर्मल। पानी की प्रकृति ठंडी और बहने वाली है, लेकिन जब आपका अंतरतम ईर्ष्या, क्रोध, हताशा और आपके द्वारा दिए गए सभी तरह के नकारात्मक तापों से जल रहा होता है, तो यह पानी की तरह उबलने लगता है और इसकी शीतल प्रकृति गायब हो जाती है। जब यह नकारात्मक विचार मन में आता है, तो यह आप को बांधता है। जब आप बंधा हुआ महसूस करते हैं, तो मन में स्वतंत्रता का भाव नहीं होता। जिस क्षण आपके अंदर विरोध खत्म हो जाता है और आप नरम हो जाते हैं, तो कठोरता पिंगल जाती है। बंधे रहने का एहसास खो जाता है और आपके अच्छे व्यवहार की बदौलत सुख, समृद्धि व धन सहित सभी कुछ प्राप्त होने लगता है।

यदि सब ज्वलनशील नकारात्मक विचारों को हटा दिया जाता है, तो जल शीतल हो जाता है। शीतलता पानी की प्रकृति है। ठीक इसी तरह जब अन्य सभी नकारात्मक तनाव को हटा दिया जाता है, तो अंतर्मन अपने सभी प्राकृतिक गुण, विनम्रता, विनयशीलता और स्वाभाविकता को प्राप्त कर लेता है। आपको यह कभी नहीं मानना चाहिए कि आपके अंदर गहराई में कोई नकारात्मकता, दुख, क्रोध या ईर्ष्या है। ईश्वर ने आपको सर्वगुण संपन्न करके इस धरा पर अवतरित किया है। आपके सद्व्यवहार से आपके व्यक्तित्व की एक पहचान बनती है। इसलिए अपने व्यवहार को और बेहतर बनाने में ध्यान लगाइये। हमें कोशिश करनी चाहिए कि इस ध्यान को हम खुद को विकसित करने में, स्वंय को बेहतर करने में लगाएं, न कि दूसरों को जज करने में उसे व्यर्थ करें। हमने अपने जजमेंट को पूरी एकाग्रता के साथ स्वयं को व्यवहार कुशल होने में लगाना चाहिए।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण सभी सद्गुणों के बारे में बात करते हैं और फिर कहते हैं कि— ये सभी गुण पहले से ही आप में हैं। एक अणु की तरह आपके केंद्र में सकारात्मकता है और परिधि पर नकारात्मकता। नकारात्मकता ज्यादा गहरी नहीं है, क्योंकि यह केंद्र में नहीं है। शांति और शीतलता आपके स्वभाव और व्यवहार में शामिल है। कठोरता और विनम्रता एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं। अगर आम इंसानों से हमारा व्यवहार अमानवीय और नकारात्मक है, तो हमारी सारी अचीवमेंट निरर्थक साबित होती है। कहने का आशय यह है कि हम कितने भी कीमती और सुंदर कपड़े पहन लें, बहुत अमीर हों या बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर बड़ी-बड़ी डिग्रियों के मालिक हों, अगर हमारा व्यवहार अच्छा नहीं है, तो हम अच्छी पहचान नहीं बना पाएंगे।

दिलचस्प बात यह है कि— जिसे आपने भी नोटिस किया होगा कि कई लोग बस अपने आस-पास के लोगों में अपना अच्छा इंप्रेशन बनाने के लिए अच्छा होने या अपने आचरण को अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं, लेकिन देर-सवेर उनके इस कृत्रिम रूप का पर्दाफाश होना तय होता है। कहते हैं न कि झूठ का मुखोटा सत्य को बाहर आने से ज्यादा दिन तक नहीं रोक सकता। इसलिए समाज और देश के उत्थान के लिए हमें सद्व्यवहार को अपने जीवन में शामिल कर लेना चाहिए और उच्च पदों पर आसीन हुए मनुष्यों को सदैव अपने पद और गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वे जिस प्रकार का व्यवहार करेंगे, आम मनुष्य भी उसी का अनुसरण करेंगे। वे अच्छा आचरण करेंगे, तो उनके सहकर्मी के साथ-साथ अधीनस्थ कर्मी भी अच्छे आचरण को प्रेरित होंगे, जिससे व्यक्ति, समाज, देश और अंततः विश्व का कल्याण होगा।

इसलिए अक्सर हमें देखने को मिल जाता है कि बड़े पदों पर बैठे जो भी अच्छे एवं सच्चे लोग हैं, उनका व्यवहार बहुत ही शालीन और हृदयस्पर्शी होता है। वे मूलत: “सर्वे भवंतु सुखिन:” तथा ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के सिद्धांत पर चलते हैं। इसके परिणामस्वरुप वे दूसरों की तुलना में ज्यादा परफॉर्मिंग, सरल, सामाजिक, मिलनसार एवं लोकप्रिय होते हैं। इसलिए मेरा यह मानना है कि अपने सद्व्यवहार से सकारात्मकता का इतना बड़ा केंद्र बनाया जाए कि मनुष्य चुंबक की तरह खुद ही आपकी तरफ खींचे चले आएं।

223. जागृत रहो

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है। जो क्षण बीत गया वह कभी लौट कर वापस नहीं आता। इसलिए मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रत्येक क्षण जागृत रहे क्योंकि इस संसार में मनुष्य का जन्म ही जागने और जगाने के लिए हुआ है। जब वह जागृत होगा तभी प्रत्येक क्षण सार्थक बना सकता है। प्रत्येक क्षण की सार्थकता के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य को स्थिर बनाकर कार्य में लगे। लक्ष्य के प्रति समर्पित होने से जीवन में आने वाली बाधाओं से विचलित होने की आशंका नहीं रहती अन्यथा संकटों को पहाड़ जैसा दुरुह मानकर लक्ष्य से भटक जाते हैं।

जो व्यक्ति दृढ लक्ष्य वाला होता है, वह सभी बाधाओं को तृणवत समझकर विजय प्राप्त कर लेता है। बहुत सारे लोग यही समझते हैं कि जीवन में सांसारिक मोहमाया में उलझ कर, हम कभी अपने जीवन लक्ष्य यानी आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त नहीं कर सकते। इसके लिए हमें संसार का त्याग कर सन्यास धारण करना आवश्यक है। परंतु यह विचार भ्रम पूर्ण है। वास्तव में हम जिस स्थान पर हैं, जिस भूमिका में हैं, उसे निभाते हुए जीवन को सफल बना सकते हैं परंतु हमें प्रत्येक पल जागते रहना होगा और अपने लक्ष्य को नहीं भुलना होगा।

हमें लाख बाधाओं के बावजूद अंतिम सांस तक दृढ संकल्पित रहने को प्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ेगा। जीवन के उद्देश्य को सदैव दृष्टिगत रखकर उसके पथ पर निर्बाध गति और अविचलित भाव से चलने वाला मनुष्य सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त कर, अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। जागृत मनुष्य को कभी भी मार्ग की बाधाएं विचलित नहीं कर सकती क्योंकि लक्ष्य की लगन कांटो की परवाह नहीं किया करती।

धूप और छांव की तरह जीवन में कभी दुख तो कभी सुख आते- जाते रहते हैं। जीवन में जितनी अधिक समस्याएं होती हैं, सफलता भी उतनी ही तेजी से मिलती है। बिना समस्याओं के जीवन के कोई मायने नहीं हैं।
समस्या क्यों होती है? यह एक चिंतनीय प्रश्न अवश्य है परंतु यह भी एक प्रश्न है कि— हम समस्याओं को कैसे कम कर सकते हैं। इस प्रश्न का समाधान केवल जागृत रहकर, अध्यात्मिक परिवेश में ही खोजा जा सकता है। क्योंकि बगैर जागरण के मनुष्य अध्यात्म में प्रवेश कर ही नहीं सकता।
किसी चीज की अति जैसे अति चिंतन, अति स्मृति और अति कल्पना ये तीनों ही समस्या पैदा करती हैं। शरीर, मन और वाणी इन सब का उचित रूप से प्रयोग होना चाहिए। इनके द्वारा उत्पन्न समस्या का कारण मनुष्य स्वयं है और फिर वह समाधान खोजता है— दवा में, डॉक्टर में या बाहर ऑफिस में। यही समस्या मनुष्य को अशांत बनाती है। इसलिए संतुलित जीवन शैली की बहुत आवश्यकता है। जीवन शैली के शुभ मुहूर्त पर हमारा मन उगती धूप की तरह भरा होना चाहिए। यदि हमारे पास विश्वास, साहस, उमंग और संकल्पित मन है तो दुनिया की कोई ताकत हमें अपने पथ से विचलित नहीं कर सकती और यह सब जागृत अवस्था में ही होता है।

जीवन को चेतन बनाइए, जागृत कीजिए और फिर अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिए। इसे कभी भी कर्तव्य से विमुख मत रहने दीजिए। बहुत सारे लोग जागते हुए भी सोते रहते हैं। अपने कर्तव्यों का बोध नहीं कर पाते‌, बस अन्य जीवों की तरह खाते हैं, पीते हैं, सांस लेते हैं, सोते हैं, जागते हैं और फिर एक दिन मृत्यु के आगोश में समा जाते हैं। वे अपने पूरे जीवन यह समझ ही नहीं पाते कि वे मनुष्य हैं और उनका जीवन अमूल्य है। अपने को अन्य प्राणियों से पृथक नहीं कर पाते। इसलिए उनका दुर्भाग्य है कि वह सब कुछ हो कर भी कुछ नहीं हैं। भगवान से साक्षात्कार करने में समर्थ हैं परंतु अपना जीवन पत्थर की तरह गुजार देते हैं। उनमें जागने की शक्ति नहीं रहती। सोते रहने में ही सुख की अनुभूति करते हैं। ईश्वरत्व के रहते हुए भी शरीर के मोह में फंसे हैं और सदैव ऐसे सोए रहते हैं कि कभी जागने का नाम ही नहीं लेते।

आत्मिक ज्वाला जो प्रज्जवलित होती है, वह कभी बूझती नहीं। इसलिए सोने का अवसर है ही नहीं। निंद्रा में भी काम है और नींद भी एक क्रिया है। इसलिए जागृत मनुष्य निंद्रा को कर्तव्य समझ कर उसे करते हैं क्योंकि जागृत अवस्था को ही जीवन कह सकते हैं। सुषुप्तावस्था को अस्थाई मृत्यु मानना चाहिए। हर मनुष्य के लिए दिन और रात, जागना और सोना, चेतन और अवचेतन की स्थितियां नित्य आती हैं। फिर भी मनुष्य जागने की कोशिश नहीं करता। वह कुछ सीख ही नहीं पाता। प्रकृति ने, सूर्य और चंद्र ने, आकाश और पाताल ने कर्म के चक्कर का विधान बनाया है। जिसे मनुष्य को भी अपने जीवन में उतारना ही होगा। प्रकृति कभी सोती नहीं, सूर्य कभी ठहरता नहीं, अनवरत चलते जाना ही उनका कर्त्तव्य है। मानव भी इस कर्तव्य से अलग नहीं है, उसे यह बात आत्मसात् करनी होगी।

इसलिए इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य का सोना मना है। इस जगत् में सावधान होकर चेतन स्वरूप को धारण करना ही जागृत अवस्था होती है। जीवन को अंधकारमय रात्रि नहीं, प्रकाशमय दिन बनाना अनिवार्य है। स्वयं जागना और सोने वालों को जगाना यही धर्म की राह है‌। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम इस संसार में एक पथिक हैं और हमें हमेशा जागते रहना चाहिए।

222. विसर्जन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

विसर्जन हमें मोह माया से मुक्ति का रास्ता दिखलाता है। हमारी आसक्ति को क्षीण करता है और हमारी लोभ प्रवृत्ति को शांत करता है। जिसके अंतर्मन में विसर्जन का भाव जागृत हो गया, समझो वह व्यक्ति संत हो गया।

आदि शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि—एक बार वे स्नानादि से निवृत्त होकर मंदिर में प्रवेश कर रहे थे। उस समय वे काशी में थे। तभी उनके मार्ग में एक चांडाल आ गया। शंकराचार्य जी ने भी सुन रखा था कि— चांडाल से बच कर रहना चाहिए क्योंकि चांडाल पास आने से मनुष्य अपवित्र हो जाता है, ऐसी मान्यता थी।
इसलिए शंकराचार्य जी ने उस चांडाल से कहा— दूर रहो।
तो उस चांडाल ने पूछा— किसे दूर होना चाहिए। मुझे या मेरे शरीर को।
इस प्रश्न ने शंकराचार्य पर बड़ा प्रभाव डाला क्योंकि वे स्वयं उपदेश दे रहे थे कि— तुम शरीर नहीं हो, शरीर माया है।
चांडाल के मुख से यह प्रश्न सुनकर शंकराचार्य जी निशब्द हो गए और यह सोचने के लिए मजबूर हो गए कि जब शरीर माया है तो चांडाल के पास आने से या छूने से क्या होता है?
और इस घटना के बाद शंकराचार्य जी हिमालय की ओर चले गए। केदारनाथ में आज भी उनका एक स्मारक है। माना जाता है यह उनका अंतिम स्थान था, जहां वे देखे गए।
शंकराचार्य जी ने अपने जीवन में काफी वस्तुओं का विसर्जन किया। उनका कहना था कि— हर पल में पूर्णता का एहसास होना चाहिए तभी हम किसी चीज को प्राप्त करने के लिए लालायित नहीं होंगे और हमें पूर्णता का एहसास तभी होगा जब हम कुछ चीजों का विसर्जन करते जाएंगे। अगर हम प्रत्येक वस्तु को हर पल पकड़ कर रखेंगे तो हमें पूर्णता का एहसास कभी नहीं होगा।
अगर हम कल की किसी वस्तु के लिए लालायित हो रहे हैं तो इसका अर्थ यही है कि वर्तमान पल में से हम कुछ गंवा रहे हैं। यदि हम कल के भोजन के बारे में सोच रहे हैं तो आज के भोजन का आनंद नहीं ले पाएंगे। इसलिए हर पल विसर्जन करते रहना चाहिए और आज जो कुछ भी है उसका आनंद लेना चाहिए।
उस चांडाल ने शंकराचार्य जी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि—जीवन में विसर्जन की महत्ती आवश्यकता है। हमारे जीवन में चारों तरफ माया का आवरण ही है।
माया का अर्थ है— भ्रम। यहां हम स्थूल शरीर के साथ हैं जो भोजन, पानी और सांस लेते हैं क्योंकि उसके बगैर हम जिंदा नहीं रह सकते। जिसके कारण हमारे शरीर की कोशिकाएं हर दिन बदलती रहती हैं। यह भी सच है कि— कुछ समय बाद हमारे पास नया शरीर होगा। हमारी आत्मा पुराने शरीर का विसर्जन करके नए शरीर में प्रवेश कर जाएगी। यही माया है।
इस प्रश्न ने शंकराचार्य जी को झकझोर कर रख दिया। तभी उनमें विसर्जन की प्रवृत्ति जागी, तत्पश्चात् ही वे एक महामानव और भारत के आध्यात्मिक गुरु बन सके।

हम देव पूजन करते हैं। उदाहरण के तौर पर हम गणपति जी को अपने घर में लाते हैं। उल्लास एवं उत्सव से उनका स्वागत करते हैं, पूजन करते हैं और उन्हें स्थापित करते हैं। लेकिन एक समय उनका भी विसर्जन करना पड़ता है। इससे स्पष्ट संदेश मिलता है कि— पूज्यनीय एवं वंदनीय देव का भी त्याग करना पड़ता है क्योंकि जब तक हम त्याग नहीं करेंगे, तब तक हम उनका आव्हान कैसे करेंगे? विसर्जन करने के बाद ही हम उसका फिर से आव्हान करते हैं, पूजन करते हैं और स्थापित करते हैं।

समय की अविरलता इसी विसर्जन से उत्पन्न होती है। यह हमें जड़वत् होने से रोकता है। देव विसर्जन हमें सुख और दुख, उत्सव और शोक, आनंद एवं पीड़ा जैसे भावों का दर्शन कराता है। यह हमें प्रेरणा देता है कि सुख के आनंद में दुख का स्मरण कर विचलित नहीं होना चाहिए। हमें हर परिस्थिति में समान भाव रखना चाहिए। जब हमें किसी मनचाही वस्तु की प्राप्ति नहीं होती या हमारे जीवन में कोई संकट आता है तो हम बहुत दुखी हो जाते हैं और एक निश्चित दायरे में सिमट जाते हैं। हमारी योग्यता पर अंकुश लग जाता है और हमारी क्षमता ही कुंठित होने लगती है। उस समय एक विसर्जन का भाव ही है जो हमें बाहर निकलने में सहायता करता है।

विसर्जित भाव ही हमारे मन का भोजन है। यह भोजन हमें आंतरिक रुप से परिपक्व बनाता है। बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक छोटी-छोटी उपलब्धियों के मोह को त्यागना पड़ता है। हमारे ऋषि मुनि विरक्त एवं विसर्जित भाव से ही वर्षों तक कठिन तपस्या करते थे, जिसके कारण उन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त होती थी। जिनका उपयोग लोक कल्याण के लिए करते थे। दूसरी तरफ विसर्जन का भाव लोक कल्याण का बहुत बड़ा कारक भी है। इससे सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का अनुकरणीय भाव जन्म लेता है।

221. आस्तिकता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आस्तिकता का सर्वाधिक लोकप्रिय आधार ईश्वर में आस्था से है। जगत् का सृजन, पालन और संहार ईश्वर की लीला है। सनातन धर्म में ईश्वर को पूर्ण माना गया है। वे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और पूर्णस्वतंत्र हैं।
हमारी सनातन परंपरा में आस्तिकता के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं।
पहला- वेद में विश्वास करना
दूसरा- आत्मा की अमरता में विश्वास करना और तीसरा- ईश्वर के अस्तित्व में श्रद्धा व्यक्त करना।

वेद अपौरूषेय हैं। ये किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा रचित नहीं हैं, न भगवान के द्वारा ही रचे गए हैं। दरअसल वेद भगवान की वाणी हैं। ऋषि वेदमंत्रों के दृष्टा यानी साक्षात्कारकर्ता हैं। इसलिए जो लोग वेद के मंत्रों में श्रद्धा व्यक्त करते हैं वे आस्तिक कहे जाते हैं। इसके अलावा आत्मा की अमरता में विश्वास करने वालों को भी आस्तिक कहा जाता है। आत्मा चेतन, शाश्वत और अविनाशी है। यह काल से परे है अर्थात् नश्वर है।

प्रत्येक जीव में अलग-अलग आत्मा है। इसे जीवात्मा भी कहा जाता है। आस्तिक व्यक्ति ईश्वर पर अटूट विश्वास करते हैं। वे अपना प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। वे ईश्वर में उस बच्चे की तरह विश्वास करते हैं जिसको आप हवा में उछालो तो भी वह हंसता ही रहता है। क्योंकि उसको पता है कि आप उसे गिरने नहीं देंगे। ठीक इसी प्रकार आस्तिक लोग निडर होकर कठिन से कठिन कार्य को भी ईश्वर को समर्पित कर हंसते हुए कर जाते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि ईश्वर उन्हें असफल नहीं होने देगा।

ईश्वर और आस्तिक व्यक्तियों का संबंध ऐसा है, जिसमें कुछ खर्च करना नहीं पड़ता। दुनिया में किसी से बात करने के लिए फोन की जरूरत पड़ती है और उसका बिल अदा करना पड़ता है। लेकिन ईश्वर से बात करने के लिए मन की गहराइयों में उतरना पड़ता है। मौन धारण करना पड़ता है। ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। सम्बन्ध उस जल के समान निर्मल और पवित्र होना चाहिए, जिसका कोई रंग और रूप नहीं है, लेकिन जिस में वह मिलता है, उसी के अनुरूप हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य को भी ईश्वर में एकाकार हो जाना चाहिए। जिन्होंने अपने सर्वस्व को ईश्वर को न्यौछावर कर दिया ईश्वर उन्हें उसी प्रकार अपनी शरण में ले लेता है, जिस प्रकार मां अपने छोटे बच्चे को अपने आंचल में छुपा लेती है और दुख, परेशानियों की छाया भी उस पर नहीं पड़ने देती।

जिस प्रकार भ्रमर पुष्प के पराग को ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्प को नष्ट नहीं करता, जैसे दूध दुहने वाला व्यक्ति बछड़े के हित को ध्यान में रखते हुए दूध को दुहता है। वैसे ही ईश्वर अपने भक्तों का ख्याल रखता है और जीवन की इस कठोर डगर पर चलने में सहायता करता है। ईश्वर अपनी कुशलता से जगत् का निर्माण करते हैं, वे जगत को अपने अंदर से उत्पन्न करते हैं। ईश्वर जगत् में व्याप्त रहने के कारण जगत् का उपादान भी करते हैं।

ईश्वर अनंत गुणों से युक्त हैं, परंतु छह गुण उनमें प्रधान हैं— आधिपत्य, सर्वशक्तिमता, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य।

ईश्वर मनुष्य को उसके नैतिक, अनैतिक कर्मों का परिणाम देते हैं। मनुष्य के जीवन में सुख- दुख इन्हीं के कारण आते हैं। लेकिन जो मनुष्य ईश्वर द्वारा बनाई इस सृष्टि में विश्वास करते हैं, उनके लिए सुख-दुख, धूप-छांव की तरह हैं। वे उनकी जीवन यात्रा में अपना योगदान देते हैं और चले जाते हैं। लेकिन जो ईश्वर में आस्था नहीं रखते वे दुखों के बोझ को सहन नहीं कर पाते और रास्ता भटक जाते हैं। फिर उन दुखों में अपने आप को बंधा हुआ महसूस करते हैं और ईश्वर को कोसते हुए अपनी जीवन यात्रा को पूरी करते हैं।

आस्तिकता में कितनी शक्ति होती है इसका मैं एक उदाहरण पेश करती हूं—
रामायण में जब श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तब वह मां सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में चला गया। वहां पर मां सीता का रावण हरण कर ले गया। रावण की कैद से जानकी को वापस लाने के लिए श्री राम को रावण के साथ युद्ध करना पड़ा। उस युद्ध में मेघनाथ के साथ युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिए संजीवनी का पहाड़ लेकर लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृतांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया और लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही सभी अपनी-अपनी बात कहने लगे। माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी, परंतु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो वह हतप्रभ रह गए। उसके चेहरे पर कोई दुख के भाव नहीं थे। हनुमान जी सोचने को मजबूर हो गए कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी है? क्या इन्हें अपने पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं है?
हनुमान जी पूछते हैं—देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जाएगा।

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किए बिना नहीं रह पाएगा। वे बोली— मेरा पति संकट में नहीं है, सूर्य कुल का दीपक बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात, तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिए, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने स्वयं कहा कि— प्रभु श्री राम, मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर, श्री राम की गोद में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वे दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गए हैं, तब से सोए नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था, इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं और जब खुद भगवान की गोद मिल गई तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जाएंगे और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो श्री राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम है, हर धड़कन में राम है, उनके रोम- रोम में राम है,उनके रक्त की बूंद- बूंद में राम है और जब उनके शरीर और आत्मा में सिर्फ राम है तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा है। इसलिए हनुमान जी आप निश्चिंत होकर जाएं। सूर्य उदित नहीं होगा।

वास्तव में सूर्य में इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते। एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा। ये उर्मिला का अपने इश्वर पर अटूट विश्वास था, जो मौत के मुंह में गए हुए अपने पति को भी सकुशल वापिस ले आया।

आस्तिक मनुष्यों का अपने ईश्वर पर यही अटूट विश्वास उन्हें विचलित नहीं होने देता। संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है। कहा भी जाता है कि भगवान की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं। जाहिर है ईश्वर ही इस जगत् का सर्वेसर्वा है। वह इस जगत के कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर में आस्था रखने वाले को भौतिक जीवन में सफलता मिलने पर अहंकार नहीं होता और असफलता मिलने पर निराशा नहीं होती। इसलिए हमें ईश्वर में श्रद्धा रखनी चाहिए। जिस प्रकार बीज की यात्रा वृक्ष तक है, नदी की यात्रा सागर तक है, उसी प्रकार आस्तिक मनुष्यों की यात्रा परमात्मा तक है।

220. परोपकार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके समाज के प्रति कुछ कर्तव्य भी होते हैं। लेकिन आज के समय में मनुष्य स्वार्थी हो गया है। परोपकार की भावना को उसने तिलांजलि दे दी है। वह हर समय अपने स्वार्थ के बारे में ही सोचता रहता है। वह परोपकार की परिभाषा ही भूल गया है।

परोपकार से अभिप्राय है कि— बगैर किसी भेदभाव के एक दूसरे के सुख- दुख में शामिल होना और परेशानी के समय निस्वार्थ भाव से सहायता करना।

जिस प्रकार पुष्प इकट्ठा करने वाले के हाथ में कुछ सुगंध हमेशा रह जाती है, उसी प्रकार परोपकार करने वाले की जिंदगी भी हमेशा सुगंधित और आबाद रहती है। जो व्यक्ति दूसरों की जिंदगी रोशन करते हैं, उनकी जिंदगी खुद रोशन हो जाती है। हंसमुख, विनोद प्रिय, आशापूर्ण लोग प्रत्येक जगह अपना मार्ग बना ही लेते हैं।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि— खुशी का कोई निश्चित मापदंड नहीं होता। एक मां बच्चे को स्नान कराने पर खुश होती है, छोटे बच्चे मिट्टी के घर बना कर और उन्हें ढहाकर, पानी में कागज की नाव चला कर खुश होते हैं। इसी प्रकार विद्यार्थी परीक्षा में अव्वल आने पर उत्साहित हो सकते हैं। भूखे- प्यासे बीमार की आहों को कम करना, सर्दी से ठिठुरते व्यक्ति को कंबल ओढाना या जीवन और मृत्यु से जूझ रहे व्यक्ति के लिए रक्तदान करना हो, ये जीवन के सुख हैं जो व्यक्ति को भीतर तक खुशियों से सराबोर कर देते हैं। ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने मानव सेवा के साथ-साथ इस सृष्टि की निर्जीव वस्तुओं में भी अपना योगदान देकर आदर्श स्थापित किए हैं।

ऐसे ही एक महापुरुष हैं, सिखों के सातवें गुरु हरिराय जी। जो महज 14 वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर आसीन हो गए थे। अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कला में पारंगत होने के बावजूद वे प्रेम, दया, कोमलता व भक्ति भावना से परिपूर्ण थे। परोपकार की भावना उनके अंदर कूट-कूट कर भरी हुई थी। उनका मानना था कि किसी भी मनुष्य के मन को दुख पहुंचाना सबसे बड़ा पाप है। उनका कहना था कि—किसी टूटी हुई भौतिक वस्तु को तो पुनः जोड़ा जा सकता है, लेकिन आहत मन को नहीं। वे सदैव मानवीय संवेदनाओं का पूरा सम्मान करने का उपदेश दिया करते थे और स्वयं अपने जीवन काल में इसका सर्वोत्तम आदर्श बने। परोपकार की भावना को नया आयाम देते हुए, उन्होंने एक बड़ा औषधालय खोला, जिसमें विभिन्न दवाएं और दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संग्रह किया गया। इसमें उपचार के लिए बिना किसी भेदभाव के जहां रोगियों की चिकित्सा होती, वहीं आत्मबल में वृद्धि के लिए आध्यात्मिक उपदेश भी दिए जाते थे। वे अपने उपदेशों के माध्यम से परोपकार की भावना को जागृत करते थे। सिखों को घर-घर लंगर चलाने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि कोई भी भूखा वापस नहीं जाना चाहिए। गुरु जी की भावना व प्रेम सभी जीवों के लिए समान था। प्रकृति को वे स्वयं के निकट मानते थे। यही कारण था कि वे खुद अपने बगीचे की देखभाल करते थे। उनका मानना था कि प्रकृति को हम जितना देंगे, पेड़- पौधे लगाएंगे, उतना ही प्रकृति हमें सूद समेत वापिस कर देगी।

ऐसे बहुत सारे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देकर परोपकार का संदेश दिया है। उन्होंने हमें जीवन में खुश, नेक एवं नीतिवान बनने का रास्ता दिखाया। उनका समूचा जीवन मानवजाति को बेहतर अवस्था में पहुंचाने की कोशिश में गुजरा। किसी की परिस्थितियां अनुकूल नहीं थी। हर किसी ने मुश्किलों से जूझकर उन्हें अपने अनुकूल बनाया और जन-जन में खुशियां बांटी।

बुद्ध ने शिष्य आनंद को “आधा गिलास पानी भरा है” कहकर हर स्थिति में खुशी बटोरने का संदेश दिया। परोपकार को जीवन में स्थान दीजिए, जरूरी नहीं है कि इसमें धन ही खर्च हो। बगैर धन खर्च किए भी आप बहुत से ऐसे कार्य कर सकते हैं, जिससे दूसरों की मदद हो जैसे— रोड क्रास करते समय किसी वृद्ध या लाचार की सहायता कीजिए, दुर्घटना के समय उसे नजदीक के अस्पताल पहुंचाने का कार्य कीजिए। आप अपने हुनर के द्वारा समाज के व्यक्तियों की मदद कीजिए। इस प्रकार के छोटे-छोटे कार्य करके भी आप परोपकार कर सकते हैं। इस तरह के कार्य करके आपको जो आंतरिक संतुष्टि होगी उसका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते। वह आपकी कल्पना से परे होगी। बस मन को उदार बनाइए और दूसरों की मदद करने का कोई भी अवसर मत छोड़िए।

आपके आस-पास अनेकों लोग रहते हैं। हर व्यक्ति दुख- सुख के चक्र में फंसा हुआ है। आप उनके दुख- सुख में सम्मिलित होइए। यथाशक्ति मदद कीजिए। फिर देखना आपके मोहल्ले, कार्यक्षेत्र और समाज में आपको जो मान- सम्मान मिलेगा वह अकल्पनीय होगा। जिस प्रकार मधुमक्खी निस्वार्थ भाव से दुर्लभ औषधीय गुणों से भरपूर मधु एकत्रित करती है, उसी प्रकार हमें भी निस्वार्थ भाव से परोपकार की भावना को अपने अंदर जागृत करना चाहिए। अगर हर व्यक्ति में परोपकार की भावना जागृत हो गई तो हमारा समाज, देश, विश्व में ऊंचाइयों को छुएगा।

219. एकाग्रता की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मन की एकाग्रता हमारी शक्ति की आधारशिला बनती है। यह जीवन की समस्त शक्तियों को समाहित कर मानसिक क्रांति उत्पन्न करती है। जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने में एकाग्रता की बहुत महत्ता है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि में एकाग्रता की महत्ता को हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। हार्डवेयर यानी कठिन परिस्थितियां और सॉफ्टवेयर यानी सरल परिस्थितियां। दोनों से जैसे कंप्यूटर चलता है, वैसे ही जीवन का कंप्यूटर भी चलता है।

एकाग्र मन, भटकाव के शिकार मस्तिष्क की तुलना में अवसरों का अधिक लाभ उठा पाता है। एकाग्रता एक तरह से हमारी शक्तियों को जागृत कर मुश्किलों को हटाकर हमारे लिए मार्ग तैयार करती है। जिसका मन पूर्णरूपेण एकाग्र है, वही अपने लक्ष्य को साधने में समर्थ है। एकाग्रता में वह ऊर्जा होती है जो आवेश को शांत कर देती है। वास्तव में पूर्ण एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जो लोग चित्त को चारों ओर बिखेर कर काम करते हैं, उन्हें इसकी क्षति बाद में पता चलती है।

कार्नेगी कहते हैं कि— नवयुवकों के व्यापार में असफल होने का एक बड़ा कारण यह है कि वे अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाते। हर समय सभी चीजों का सही होना संभव नहीं है। यहां तक की सर्वोत्तम और शुभ इच्छाओं के साथ किए गए महानतम कार्यों में भी खामियां हो सकती हैं।

मन की बुरी प्रवृति हमारी भावनाओं और मन को अपूर्ण और नकारात्मक बना देती हैं। यदि आप एकाग्र होना चाहते हैं, तो मन को किसी भी प्रकार की नकारात्मकता के चक्रों से बाहर निकालना और भीतर से अछूते और मजबूत रहना होगा। यह दुनिया विपरीत मूल्यों के माध्यम से कार्य करती है। दरअसल आपके विचारों का सम्पूर्ण प्रवाह आपके आदर्श की ओर प्रवाहित होना चाहिए। उसके विपरीत या भिन्न दिशा में नहीं।

एकाग्रता और एकचित्तता से बड़े से बड़े व कठिन से कठिन कार्य पूरे किए जा सकते हैं। यदि आप विषम से विषम परिस्थिति में भी मन को लगातार एकाग्र करके संरचनात्मक स्थिति बनाए रख सकते हैं और अपने आदर्श की ओर बढ़ने में निरंतर संघर्ष करते रह सकते हैं तो समझ लीजिए कि आपके जीवन का लक्ष्य बहुत पास है।

स्वेट मार्डेन ने कहा है कि— जबरदस्त एकाग्रता के बिना कोई भी व्यक्ति आविष्कारक, दार्शनिक, लेखक, मौलिक कवि या शोधकर्ता नहीं हो सकता। यदि हम चाहें तो अपने उद्देश्य को मन ही मन में बार-बार दोहराते हुए, लगातार उस मकसद की पूर्ति का संकल्प करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रह सकते हैं और धीरे-धीरे उस मकसद के लिए कार्य करना हमारा स्वभाव बन सकता है। अगर हमने निराश होने की आदत बना ली है, तो आपको असफलता से कोई नहीं बचा सकता। सफलता पाने के लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करें, अगर आप एक बार नकारात्मकता में फंस गए हैं तो आप अवश्य ही असफल होंगे। आप अपने स्वयं के प्रयास और एकाग्र मन की शक्ति की मदद से ही इससे बाहर निकल सकते हैं।

आपको अपने जीवन में मिलने वाले लोगों या परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करने की बजाय अपनी धारणाओं को बदलने की जरूरत है। लोगों को अपूर्ण होने का अधिकार है, उन्हें सही करना आपका काम नहीं है। यदि आप एकाग्रता रूपी चोले को धारण करके अपने कार्य में सफलता प्राप्त करते जा रहे हैं तो यह स्वाभाविक है कि आपको प्रशंसा मिलेगी लेकिन अगर आप जरा से भी लड़खड़ाये तो आपको निन्दा का भागी भी होना पड़ेगा।

एकाग्रता के बगैर कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। धनुर्धर अपने लक्ष्य को नहीं साध सकता, विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकता, बगुला मछली नहीं पकड़ सकता, बाज अपने शिकार को हासिल नहीं कर सकता। कहने का अभिप्राय है कि जीवन के हर क्षेत्र में एकाग्रता की महत्ता परम आवश्यक है।

जर्मन महाकवि गेटे ने कहा है कि—जहां भी तू है, पूरी तरह वहीं रह। यह एक महामंत्र है। जिसका आशय है कि एक समय में सिर्फ एक काम को करो। जो काम हाथ में है उसमें अपने समस्त व्यक्तित्व को केंद्रित करो। परिणाम क्या होगा? यह मत सोचो। काम खत्म होने का परिणाम चाहे कुछ भी हो, पश्चाताप मत करो।

एक कहानी जहन में आती है— सफलता न मिलने के कारण एक लड़की पुल पर से नदी में कूद गई। उसे बचाने के लिए एक लड़का भी नदी में कूद गया जो तैरना नहीं जानता था। इस पूरे घटनाक्रम में जब लड़की ने देखा कि जीवन पाने के लिए वह लड़का पानी में संघर्ष कर रहा है, तब उसकी आंख खुल गई। उस लड़की ने न सिर्फ अपनी बल्कि लड़के की भी जान बचाई। इस घटना के बाद उस लड़की ने अथक प्रयास किया और अपना लक्ष्य पाया।

सफलता प्राप्त कर लेने के बाद जब उस लड़की से इसका राज पूछा गया तो उसने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया— एकाग्रता।
उसने बड़ी आत्मीयता से अपनी गलती स्वीकारते हुए कहा कि मैंने पहले भी सफल होने के पूरे प्रयास किए थे लेकिन मैं सफल नहीं हो पाई क्योंकि मेरे अंदर एकाग्रता की कमी थी। मैंने पूरी तरह एकाग्र होकर अपना कार्य किया और सफलता मेरे कदम चूमने लगी।

किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धन समय होता है। उसकी सफलता समय के इस्तेमाल पर निर्भर करती है। सभी सफल लोगों ने समय का सदुपयोग कर अपने लक्ष्य को एकाग्रता के साथ पाया। मैडिनो विदेशी लेखकों में सबसे आगे हैं। जब से उन्हें एकाग्रता को धारण किया वे प्रभावी वक्ताओं में से एक रहे। उनके जादुई शब्दों से प्रभावित होकर कई लोगों ने अपनी जिंदगी संवारी। जिस प्रकार एक विशालकाय हाथी शक्कर के दानों को उठा नहीं सकता, उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति बगैर एकाग्रता के अपने जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

218. इच्छाशक्ति से पाएं सफलता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारी इच्छाशक्ति वह अस्त्र है, जो मन को शुद्ध रखती है। मधुर मन और खुश मन सदैव सफलता की ओर अग्रसर करता है। मन को मजबूत और बलवान बनाना हमारा संकल्प होना चाहिए क्योंकि मन का स्वस्थ होना ही होश में होना कहलाता है।

महान और सफल व्यक्ति हमेशा कहते आए हैं कि— कामयाब होना है तो आदमी को कोई भी कदम अपने दम पर उठाना चाहिए। क्योंकि दूसरों के दम पर उठाए गए कदम पर हमें दूसरों की अनुकंपा पर निर्भर होना पड़ता है और वह कब साथ छोड़ दें भरोसा नहीं।

किसी ने कहा है कि—
” उड़ने दो मिट्टी को, आखिर कहां तक उड़ेगी।
जब भी हवाओं ने साथ छोड़ा, धरती पर गिरेगी।”

इसलिए केवल दूसरों के सहारे पर निर्भर न रहें, स्वावलंबी बने और अपनी इच्छाशक्ति और धैर्य के साथ सकारात्मकता से सफलता की तरफ अग्रसर हों। इच्छाशक्ति जीवन और सूकून के बीच एक तारतम्यता लाती है। हमारे मन और उसकी सारी चिंता को शून्य कर देती है— विश्वास से भरी हुई इच्छाशक्ति।

आसान है, मेहनत की पगडंडी पर चलना और सफलता के राजमार्ग पर दौड़ लगाना। बस एक शर्त है कि अपना आईना, अपने सामने रखना।

सुकरात ने हमेशा अपने शिष्यों से कहा—जो तुम हो, वही बने रहो, किसी मुखोटे के सहारे मत रहो।

अगर यही सवाल आप अपने आप से करेंगे, तो एकाएक अपनी मौलिकता पर भरोसा होने लगेगा। खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे। आपको यह अहसास होगा कि ईश्वर ने आपको यह मनुष्य शरीर बेकार में ही नहीं दिया और फिर विश्वास की एक रोमांचक लहर दिनचर्या को जीवंत कर देगी।

चाणक्य यह मानते थे कि— हम कितने भी दुबले-पतले क्यों न हों, बस इच्छाशक्ति से अद्भुत और अकल्पनीय कार्य कर सकते हैं। दरअसल मनुष्य की मानसिक ताकत अलौकिक होती है। जिसका हम उपयोग ही नहीं कर पाते।

आपको एक कहानी के माध्यम से समझाना चाहती हूं कि— एक लकड़हारा अन्य साथी लकड़हारों से ज्यादा लकड़ी काट लेता था और ज्यादा कमा लेता था। जब उससे भेद पूछा गया, तो उसने बताया कि- जब बीच में उसे अवकाश मिलता है, तो बाकी लकड़हारे गप्पे हांकने में लगाते हैं, वह उसी समय अपनी कुल्हाड़ी में सान (धार) रखने लगता है। इससे वह ज्यादा तेजी से लकड़ी काट पाता है। यह तो बात कुल्हाड़ी की थी कि उसमें सान रखने से वह और ज्यादा धारदार हो जाती है।

हमारा दिमाग भी ऐसा ही होता है। थोड़े समय में अगर सफलता का स्वाद चखना है तो दिमाग को शार्प करने के लिए सान तो रखनी ही होगी। ऐसे में अगर निराशा के बादल छाने लगें तो अपनी रूचि के अनुसार कार्य करके उसे धार तो दे सकते हैं। गिटार बजाने का शौक है तो गिटार बजाइए, कहानी पढ़ने का शौक है तो अपनी पसंदीदा कहानी की किताब उठा लीजिए। कुछ भी नहीं करना तो टीवी पर अपना मनपसंद कार्यक्रम देखकर ही रिलैक्स हो जाइए। यह सब दिमाग के लिए सुकून भरा होगा।

हमें जीवन में विष और अमृत दोनों का अवसर मिलता है। यहां विष का आश्य विपरीत परिस्थितियां अर्थात् असफलताओं से है और अमृत का आश्य अनुकूल परिस्थितियां यानी सफलताओं से है। ऐसा नहीं है कि जीवन एकांगी हो गया। लेकिन यदि प्रतिकूल हालात उत्पन्न हों तो धैर्य का अमृत पीना चाहिए और अनुकूल समय है तो धैर्य का अमृतपान करना चाहिए। अक्सर देखने को मिलता है कि प्रतिकूल वक्त में व्यक्ति साहस खो देता है और नकारात्मक चिंतन में लग जाता है और अनुकूलता के समय अहंकार में डूब जाता है।

हमें भगवान शिव से प्रेरणा लेनी चाहिए जो हर स्थिति में प्रसन्न रहते हैं। यदि शिवजी का उपासक जीवन की कठिनाइयों को आत्मविश्वास एवं नेक इरादों की दवात में घोलकर दृढ़ इच्छाशक्ति से अपने जीवन पथ के कागज पर, बुद्धि में निवास करने वाली ज्ञानशक्ति से लिखे तो उसके जीवन पथ पर आनंद प्रदाता शिवजी दिखाई पड़ने लगेंगे और उसे आनंद की अनुभूति होगी। शिव की उपासना से यह प्रेरणा मिलती है कि भिन्न-भिन्न प्रकृति और अभिरुचि के लोगों को एक साथ करना ही सार्थक जीवन पद्धति है।
शिवजी के सिर में जल रूप में गंगा और ऊर्जा के रूप में चंद्रमा, गले में सर्प और पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर, पुत्र गणेश का वाहन मूषक (चूहा), मां पार्वती का वाहन शेर और खुद उनका वाहन नंदी (बैल) आपस में एक-दूसरे के बैरी होने के बावजूद एक साथ, एक परिवार में रहते हैं। इस प्रकार शिव जी की सच्ची आराधना से विपरीत परिस्थितियों में विचलित होने की बजाय उसके साथ तादात्म्य बनाने की क्षमता प्राप्त होती है। इसके अलावा शिवजी के अर्धनारीश्वर स्वरूप पर दृष्टि डालने से जहां दाहिना हिस्सा शिवजी के रूप में कर्मक्षेत्र का परिचय देता है, वहीं वाम भाग, भाव पक्ष का स्वरूप है। दोनों पक्षों के सहयोग से कोई कार्य किया जाएगा तो सफलता जल्दी मिलेगी।

लेकिन हम अनुसरण ही नहीं करते और एक उम्र गुजर जाती है। तब जाकर समझ में आता है कि जो उपलब्धि कोई और हासिल कर रहा है, वह तो हम भी प्राप्त कर सकते थे। लेकिन हम अपनी इच्छाशक्ति को जगाना ही भूल गए। संतुलन स्थापित कर ही नहीं पाए और सर्वोत्तम के अधिकारी होने के बावजूद उससे वंचित रह गए। हम हर कार्य में सफलता तो चाहते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि शुरुआत करने से पहले किन- किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।

हमें कई ऐसे प्रसिद्ध लोगों के जीवन की रोचक जानकारी, उनके अनुभवों और विचारों को आत्मसात् कर लेना चाहिए, जो अपने- अपने क्षेत्र में सफल हुए हैं। उनके अनुभवों से सीख लेकर संभवतः हम भी अपनी इच्छा शक्ति को जागृत करने में सफल हो जाएं। यदि विफलता से हम हताश और निराश हो गए हैं तो सफल व्यक्तियों के जीवन की सच्ची घटनाएं हमें नकारात्मकता के भंवर में फंसने नहीं देंगी। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने निराशा के दौर में अपने आप को संभाला और संघर्ष कर सफलता प्राप्त की।

एक पत्ता जब तक पेड़ की डाल पर होता है तो वह भी वृक्ष कहलाता है, पक्षियों को नीड़ प्रदान करता है और गिलहरी को खेलकूद भरी शरारत का अवसर भी। उसी तरह यह इच्छाशक्ति भी है, जब तक यह मन से जुड़कर हिलोरे लेती है, तब तक जज्बा, जोश, जुनून भी कायम रहता है। बाज हमेशा बादलों से भी ऊपर उड़ान भरता है, क्योंकि वहां उसकी इच्छाशक्ति उसको बदलते मौसम के मिजाज से बेफिक्र बना देती है। मनुष्य भी वही महान है, जो स्थिरता को छोड़कर ऊंचाई की तरफ बढ़ता है।

ऊंचा उठने के लिए समर्पण चाहिए। बेचैन रहने से आत्मविश्वास डगमगा जाता है। हमें पूरे पैशन एवं उत्साह के साथ हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसलिए जरूरी है कि भविष्य को लेकर मन में नकारात्मक सोच न पनपने दें। हमें अपने लक्ष्य पर फोकस रखना चाहिए कोई भी असफलता जिंदगी का फुलस्टाप नहीं हो सकती। अपनी प्राथमिकताएं तय करें और इच्छाशक्ति रूपी सीढ़ियों से अपनी सफलता रूपी मंजिल को प्राप्त करें।

217. संतोष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह संसार आंसुओं की घाटी नहीं, संतोष का उपवन है। संतोष एक जादुई दीपक की तरह है।
कवियों ने संतोष के बारे में बहुत ही सुंदर चित्रण किए हैं —
संतोष के दीपक से मछुआरे की टूटी- फूटी झोपड़ी चांदी के महल में बदल जाती है। उस झोपड़ी के शहतीर, उसका फर्श, उसकी छत और उसका फर्नीचर सब नए प्रकाश से चमकने लगते हैं।

मेरा मुकुट मेरे हृदय में है।
वह मेरे सिर पर नहीं।
उस मुकुट में हीरे और मरकत की मणियां नहीं जड़ी हुई।
मेरा मुकुट दिखाई नहीं देता —अदृश्य है।
उसका नाम संतोष है।
यह ऐसा मुकुट है, जो बादशाहों को भी शायद ही कभी नसीब हुआ हो।

फारस के बादशाह को उसके बुद्धिमान सलाहकारों ने सलाह दी—
तुम संतोष की कमीज पहनो।
फिर क्या था?
बादशाह ने आदेश दे दिया कि—
संतोष की कमीज लेकर आओ। चारों दिशाओं में घुड़सवार दौड़ा दिए गए।
बहुत खोज करने के बाद केवल एक ही व्यक्ति मिला जो संतोषी था। लेकिन उसके पास कोई कमीज नहीं थी। वह तो एक निर्धन और अन्धा मनुष्य था, जो घूम- घूम कर सुई-धागा और बटन बेचकर गुजारा करता था।
घुड़सवार उसे पकड़ कर बादशाह के पास ले आए।
बादशाह ने जब उसे देखा तो उस पर दया आ गई।
बादशाह ने उसे अपने पास बुलाया और उससे पूछा कि—
तुम्हें जिंदगी से कोई शिकायत नहीं।
तुम्हारे अंदर इतना संतोष कैसे है?
उस व्यक्ति ने बादशाह को बताया— मैं अपने व्यापार से इतना कमा लेता हूं कि— मेरी तमाम आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। यदि जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान से शिकायत करूं तो मेरा यह कार्य नीचतापूर्ण होगा।
उसकी यह बातें सुनकर बादशाह बड़ा हैरान हुआ।
वह सोचने लगा कि— इस प्रकार की दृढचित्तता केवल संतुष्ट और आनंदित मनुष्य में ही हो सकती है।