89. मौन का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आधुनिक जीवन शैली में मौन का महत्व चमत्कार उत्पन्न करने में सक्षम है। जब व्यक्ति दिन भर कार्यों में व्यस्त रहता है तो तनाव के मकड़जाल में फंस जाता है। उसी समय मौन का सामीप्य उस पर मातृवत् प्रेम बरसाता है। कहा गया है -मौन सर्वार्थ साधनम् यानी मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। मौन ही जीवन का स्रोत है। मौन दैविय अभिव्यक्ति है। विज्ञान भी मौन के महत्व को प्रमाणित करता है। जब लोग क्रोध के वशीभूत होते हैं तो पहले चिल्लाते हैं और फिर मौन हो जाते हैं। कोई जब दुखी होता है, तब मौन की शरण में जाता है। इसलिए कह सकते हैं कि मौन साधना जीवन को संचालित करने का मूल मंत्र है।

सांसारिक दुश्वारियों व झंझावतों से उपजती मानसिक अशांति और उद्विग्नता आत्मोकर्ष में बाधक हैं। इससे बचने के लिए मौन साधना अचूक उपाय है। जहां शोर उच्च रक्तचाप, सरदर्द और हृदयरोग इत्यादि देता है वहीं मौन इन सबके लिए औषधि का कार्य करता है। मौन ही है जो हमारे चिंतन को विराट् स्वरूप प्रदान करता है। मौन के द्वारा ही चित्तवृत्ति को विचलित होने से बचा सकते हैं। उसे स्थिर आत्मा में रमण करा कर आत्मिक शांति और बल पा सकते हैं।
महर्षि पतंजलि योग सिद्धांत में बताते हैं कि—उथल-पुथल के वातावरण में मौन साधना से शरीर के मूलाधार से लेकर सहस्त्रार तक के सभी षट्चक्र प्राकृतिक ऊर्जा संग्रह करने लगते हैं।
मौन व्रत की दो श्रेणियां बताई गई हैं।
पहला, वाणी का मौन और दूसरा, मन से मौन।
वाणी को वश में रखते हुए कम बोलना या नहीं बोलना बाहृय मौन और मन को स्थिर रखना, बुरे विचार न लाना, आत्मतत्व में लीन होकर अध्यात्म विचार करना अंत: मौन है।
संतों-मुनियों व ऋषियों-महर्षियों ने अंत: मौन धारण किया। उनके अनुसार आत्मिक दृष्टि से मौन महत्वपूर्ण साधन है। मौन साधना चित्त-वृत्तियों को बिखरने से बचाती हैै। चुप रहने से वाणी के साथ व्यय होने वाली मानसिक शक्ति की बचत होती है। इस बचत को आत्मचिंतन में लगाकर सुखद- शीतल और स्निग्ध शांति तक पहुंचा जा सकता है। इससे नवीन चेतन्यता स्फूर्ति और जीवन-शक्ति प्राप्त होती है। जो कार्य क्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।

मौन में वह ताकत होती है जो अंतर्शक्ति को जगाने का सामर्थ्य रखती है। जीवन में उपलब्धियां अर्जित करने के लिए मौन- साधना अनुकरणीय है। जो व्यक्ति जीवन में निरंतर सत्य का शोध कर रहा हो, वह मौन साधना का ही पथ पकड़ता है। वास्तव में मौन साधना की अध्यात्म- दर्शन में बड़ी महत्ता बताई गई है। इसलिए जितना जरूरी है, उतना ही बोलो। शब्दों में बहुत ऊर्जा है, उसे व्यर्थ न गंवाएं। हालांकि बहुधा ऐसा देखने को मिलता है कि आपके मुख से निकले कुछ शब्द आपके लिए अप्रिय स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसी स्थितियों के लिए ही मौन की महत्ता बताई गई है।

कहा भी गया है कि- वाणी का वर्चस्व रजत है, किंतु मौन कंचन है। हम कितना ही अच्छा व श्रेष्ठ क्यों न बोल दें, वह केवल और केवल रजत की श्रेणी में आता है। परंतु व्यक्ति का मौन स्वर्ण है। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को जब बोद्ध प्राप्ति हुई, तो सात दिनों तक मौन ही रहे। मौन समाप्त हुआ तो उनके शब्द थे—जो जानते हैं, वे मेरे कहे बिना भी जानते हैं और जो नहीं जानते, वे मेरे कहने पर भी नहीं जानेंगे। जिन्होंने जीवन का अमृत ही नहीं चखा उनसे बात करना व्यर्थ है। इसलिए मैंने मौन धारण किया था। जो कुछ बहुत आत्मीय व व्यक्तिगत हो, उसे कैसे व्यक्त किया जा सकता है। फिर भी बुद्ध जब भी बोले उनके मुख से निकले शब्दों ने मौन का सर्जन किया, क्योंकि बुद्ध मौन की प्रतिमूर्ति है।

संत कबीर कहते हैं —

“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे,मन का मनका फेर।।”

अभिप्राय यह है कि— जो व्यक्ति माला हाथ में लेकर लंबे समय तक उसके मोतियों को फेरता है उसके मन के भाव नहीं बदलते, मन की हलचल नहीं शांत होती। अतः हाथ की इस माला को फेरना छोड़कर मन के मोतियों को फेरो। कहने का अर्थ यह है कि उसका अंतरात्मा से संसर्ग कराओ।
श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण मौन को अपना स्वरूप ही नहीं बताते, बल्कि स्वयं को गोपनीय विषयों में मौन भाव भी कह जाते हैं। महर्षि व्यास के वचनों को लिपिबद्ध कर पुराण रचने का पुरुषार्थ गणेश जी मौन साधना के बूते ही संभव कर दिखाते हैं। लंबी अवधि तक यह साधना पुरुषार्थ न निभाया गया होता, तो साहित्य सर्जन भी संभव न होता।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि—मौन रखकर स्नान ध्यान करने से सहस्त्र गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है। उनके अनुसार कोई भी धार्मिक कार्य मनसा -वाचा -कर्मणा से ही करने पर पूर्ण होता है। इसमें वाचा-कर्मणा की धूरी मनसा है। जैसा मन होगा, वैसा वचन और कर्म होगा। अनमने तरीके से किया गया कोई अनुष्ठान- विधान पूर्ण नहीं माना जा सकता। अतः इसमें मन की शुद्धि जरूरी है। यह तभी पूरा होगा, जब मन शांत हो, एकाग्र हो, जो मौन से ही संभव है। भौतिक जगत् भले ही शब्दों का प्रवाह रोक लेने, न बोलने को मौन कहता हो, लेकिन वास्तव में यह पांचों इंद्रियों को एकाग्र करने की साधना है। जिसमें कुविचारों के प्रवाह को रोकने के लिए बांध- बांधना है। इंद्रिय संयम का सबसे अच्छा उपाय मौन ही माना गया है। मौन जिसने साध लिया, सारी इंद्रियों को वश में करते हुए जितेंद्रिय कहलाया।

वस्तुत: मौन साधना का मूल अर्थ है—ऊर्जा संचयन, जिसे हम अपनी विद्वता जताने के फेर में शब्दों के जरिए गंवाते जाते हैं। कोलाहल पूर्ण वातावरण में हम पास के शब्द नहीं सुन पाते, लेकिन मौन होते ही नि:स्तब्ध वातावरण में सुदूर की ध्वनियां भी सहजता से सुन पाते हैं। ऐसे ही अशांत, उद्गिन मन अंतरात्मा की आवाज भला कहां सुन पाएगा? मौन साधना मन को ही नहीं, अंतरात्मा को भी स्फूर्ति और नवचेतना प्रदान करती है। मौनावस्था में अतीत के अनुभवों के तार जुड़ते हैं और सद्विचार का सर्जन होता है। इससे व्यक्ति अध्यात्म की ओर मुड़ता है और अंतःकरण निखार पाता है। इससे आत्मा की ध्वनि को सुनने की क्षमता विकसित होती है, जिससे परमात्मा तक पहुंचने का रास्ता स्वत: ही बनता जाता है।

मनुष्य प्राचीन काल से ही अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों का प्रयोग करता आ रहा है। यहां तक कि जब वह भाषा या शब्द भी नहीं जानता था, तब भी उसे अपनी भावनाएं व्यक्त करना आता था। उसने अपने अस्तित्व का बोध कराने के लिए तमाम उपक्रम किए। कभी वह दीवारों पर चित्रों के माध्यम से अपनी बात कहता, तो कभी अजीब- सी आवाजें निकालता। काल की गति के साथ-साथ उस में कई बदलाव आए। उसने भाषा सीखी। बोलना सीखा। चीखना- चिल्लाना भी सीख लिया। आधुनिक समय में तो अभिव्यक्ति के दर्जनों माध्यम हैं। सोशल मीडिया के इस युग में विभिन्न बातें रोचक तरीके से कही जा रही हैं। वे कुछ ही क्षणों में प्रसारित होने में सक्षम हैं। ऐसे में हमें मौन साधना की बड़ी आवश्यकता होती है। अगर हम प्रतिदिन कुछ घंटे मौन के शरणागत होते हैं, तो वह हमें रचनात्मकता प्रदान करता है। हमारी स्मरणशक्ति को बढ़ाता है। हमें ऊर्जा से भर देता है। मौन की साधना, साधक को अनेकों वरदान प्रदान करती है।।

88.कर्मक्षेत्र

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जिस प्रकार पुराणों में वर्णित है कि—ब्राह्मणों का आभूषण विद्या, पृथ्वी का आभूषण राजा, आकाश का आभूषण चंद्र एवं समस्त चराचर का आभूषण शील है, उसी प्रकार मनुष्य का आभूषण उसके कर्म हैं। इस संसार में कर्म ही प्रधान है। इतिहास गवाह है कि भीम, अर्जुन आदि राजपुत्रों ने भी साक्षात् विष्णु के अवतार श्री कृष्ण की शरण में होते हुए भी अपने पूर्व संचित कर्मों के कारण ही राजा धृतराष्ट्र की परवशता के कारण भिक्षाटन करना पड़ा। इस संसार में कौन ऐसा है, किसमें ऐसी सामर्थ्य है, जिसको भाग्य के वशीभूत होने के कारण कर्मरेखा नहीं घुमातीे?

पूर्वजन्म में किए गए कर्म के अनुसार ही हमें दूसरे जन्म में फल मिलता है। इसलिए हम स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करते हैं। यह संसार एक गहन अभ्यारण्य में उग आई अनाप-शनाप झाड़ियों के सदृश है तथा प्रत्येक प्राणी इसमें विचरण या निवास करने के लिए विवश एक प्रशिक्षित माली की तरह है। इस बीहड़ एवं सघन अभ्यारण की जटिलताओं एवं विषमताओं से खीझकर वह तथाकथित माली अपने दुर्लभ जीवन को रूग्ण बनाकर, मृत्यु का पर्याय बनकर, स्वयं के जीवन को औरों की दृष्टि में घृणास्पद बनाकर इस जन्म को कलंकित भी कर सकता है, एवं भाग्यफल से मिले इस प्रारब्धरूपी अभ्यारण्य के कर्म क्षेत्र को अपने कर्म- कौशल से सजा- संवारकर एक दुर्लभतम पुष्प एवं जड़ी-बूटी के विशिष्ट उद्यान में भी परिणत कर उसको सभी की जिज्ञासा, अनुसंधान, ज्ञान, रोग हरण औषधियों के अनुपम केंद्र के रूप में भी विकसित कर सकता है।

साधना एवं संघर्ष काल के व्यतीत होने पर वही उद्यान कालांतर में विशिष्ट तपोभूमि बन जगत् के कल्याण एवं ऋषि-मुनियों की साधना भूमि बन जीव के मोक्ष की आधार भूमि भी सिद्ध हो सकती है। पूर्वजन्म में अर्जित की गई विद्या, दिया गया धन तथा सम्पादित कर्म ही दूसरे जन्म में आगे-आगे मिलते जाते हैं। रावण जैसा विद्वान- जिसका दुर्ग त्रिकूट पर्वत पर था, जिसकी ख्याति दसों दिशाओं में थी, जो राक्षसगण से अभिरक्षित था, स्वयं जो परम विशुद्ध आचरण करने वाला था, जिसको नीतिशास्त्र की शिक्षा शुक्राचार्य से प्राप्त हुई थी, वह भी अपने कर्मों के कारण बेबस था।

हमारे कर्मों के कारण ही हमारे जीवन में- जिस समय, जिस दिन, जिस रात्रि, जिस मुहूर्त अथवा जिस क्षण, जैसा होना निश्चित है, वैसा ही होगा। सुंदर नक्षत्र, ग्रहों का योग, स्वयं वशिष्ठ मुनि द्वारा निर्धारित लग्न में विवाह संस्कार कराए जाने पर भी विशाल हृदय वाले श्री राम, शब्द की गति से चलने वाले श्री लक्ष्मण तथा सघन केश वाली शुभलक्षणा श्री सीता जी—ये तीनों भी जब अपने कर्म के अनुसार दुख के भाजन हो गए तो सामान्य जन के विषय में कुछ कहना ही व्यर्थ है। न पिता के कर्म से पुत्र को सद्गति मिल सकती है और न पुत्र के कर्म से पिता को सद्गति मिल सकती है।

पूर्व जन्म में अर्जित कर्मफल के अनुसार ही शरीर में शारीरिक और मानसिक रोग उसी प्रकार आकर अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं, जिस प्रकार कुशल वीर धनुर्धरों के द्वारा छोड़े गए बाण लक्ष्य को भेदकर कष्ट पहुंचाते हैं। बाल, युवा तथा वृद्ध जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, वह जन्म- जन्मांतर में उसी के अनुसार फल का भोग करता है। उस पूर्व अर्जित फल को न देखने वाला एवं विदेश में रहता हुआ भी मनुष्य अपने कर्मरूपी जहाज के संयमित पवन वेग के द्वारा उस फल तक पहुंचा दिया जाता है। हमें जो इस जन्म में उपहार स्वरूप मिला है, वह अतीत के कर्मों का फल है। आज के कर्म की कृषि भूमि में इस जीवन में बोया गया कर्म का सुविकसित अथवा रूग्ण बीज भविष्य का प्रारब्ध रूपी विटप बन महकेगा।

सुख अथवा दुख हमारे कर्मों के संचित मूलधन रूपी वृक्ष पर फल रूप में ही लगते हैं। बोए गए बीज पर इस जन्म में अथवा जब भी फल लगेगा तो उसी बीज का लगेगा। जिस प्रकार मनुष्य अपने प्रारब्ध का फल प्राप्त करता है, देवता भी उस फल भोग को रोकने में समर्थ नहीं हैं, जिस प्रकार सांप, हाथी और चूहा ये शीघ्रतावश अपने वास स्थान, कुआं तथा बिल तक ही भाग सकते हैं। इससे आगे कहां तक भाग सकते हैं? उसी प्रकार अपने कर्म अथवा भाग्य से कौन भाग सकता है? सब तो उसी परम सत्ता के अधीन हैं। तो क्यों नहीं मनुष्य इस दुर्लभ शरीर को धारण करके सद्कर्मों के कर्तव्य-पथ पर चलता? क्योंकि सद्कर्मों रूपी बेल उसी प्रकार बढ़ती रहती है, जिस प्रकार कुएं से जल ग्रहण कर लेने पर भी कुएं का जल बढ़ता ही रहता है।

प्रार्थना आदि के बिना ही समय आने पर वृक्ष के द्वारा फल-फूल की प्राप्ति हो जाती हैं, उसी प्रकार पूर्व जन्मकृत कर्म भी समय आने पर उचित फल देता है। पूर्व जन्मकृत तप से प्राप्त हुआ उसका भाग्य ही समय के अनुसार वृक्ष की भांति उसे फल देता है। जीव की मृत्यु वहां होती है, जहां उसका हंता विद्यमान रहता है। लक्ष्मी वहीं निवास करती है, जहां संपत्तियां रहती हैं। ऐसे ही अपने कर्म से प्रेरित होकर जीव स्वयं ही उन-उन स्थानों पर पहुंच जाता है। पूर्व जन्म में किया गया कर्म कर्ता के पीछे-पीछे वैसे ही रहता है, जैसे झुंड में हजार गायों के रहने पर भी बछड़ा अपनी माता को पहचान लेता है। हर जन्म में प्राणी अत्यधिक चतुर बन विधाता की कर्म सारणी के बंधनों में चालाकी वश हेर फेर कर खुद को कर्मों की दौड़ में आगे निकाल देना चाहता है, लेकिन वह यह भूल जाता है कि उसका रिमोट उस ईश्वर रूपी मालिक के हाथ में है, जिसके पास उसकी हर चालाकी का लेखा-जोखा बिना भेजे स्वत: ही उसके पास आ जाता है। कर्म भी वह अकेले ही करता है एवं कर्म का फल भी उसे अकेले भोगना है, तो फिर क्यों नहीं वह केवल सत्कर्म करता? सत्कर्म के मनोहारी विटप पर सभी के लिए मृदु,स्वादिष्ट एवं कल्याणकारी फल ही लगता है।।

87. युवाओं के प्रेरणापुंज— स्वामी विवेकानन्द

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

युवाओं के प्रेरणापुंज, युगपुरुष, वेदांत दर्शन के पुरोधा, मातृभूमि के उपासक, विरले कर्मयोगी, मानव सेवक एवं विलक्षण प्रतिभा के धनी— स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनके प्रेरक व्यक्तित्व का जितना महिमामंडन किया जाए, कम जान पड़ता है। वे युवाओं के लिए एक रोल मॉडल हैं। मेरे ख्याल से कोई भी युवा ऐसा नहीं होगा, जो उसके विचारों से सहमत नहीं है और उसने, उसके जीवन से कोई न कोई प्रेरणा नहीं ली हो। वे युवा शक्ति को ही देश, समाज की प्रगति का आधार मानते थे। उनका कहना था कि बेहतर समाज के लिए युवा शक्ति की सकारात्मक ऊर्जा का संतुलित उपयोग करना होगा।

युवाओं की ऊर्जा का विवेकपूर्ण और उचित दिशा मैं सृजनात्मक प्रयोग करने के उद्देश्य से विवेकानंद ने युवाओं को आह्वान करते हुए कहा था—तुम अपनी ऊर्जा को संचित करो और उसे उस दिशा में प्रवाहित करो, जिससे सिर्फ तुम्हारा ही नहीं समाज, देश, और विश्व का भला हो सके, मानवता को ऊपर उठाया जा सके। युवा स्वयं अपनी उर्जा को पहचाने, अपनी शक्ति को जाने और आश्वस्त हो कि उनका कोई भी कर्म सिर्फ आत्मकल्याण के लिए न किया गया हो, बल्कि उसमें देश, समाज एवं विश्व कल्याण की भावना छिपी हुई हो। हमारे परिवार का ही नहीं, देश, समाज सबका भला हो। लेकिन ये तभी संभव है, जब हम पूरे विश्व को अपना परिवार मानें। “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना को आत्मसात् करे। स्वयं को एक व्यक्ति की बजाय, समाज की इकाई भी मानें।

लेकिन आज के दौर में एक विकट समस्या है, जिसनें हमारे देश के युवाओं को बेचैन कर रखा है, वह है जल्द से जल्द और हर हाल में सफलता पा लेना। सफलता और असफलता के द्वंद में आज हमारे देश के लाखों करोड़ों युवा तनाव में जी रहे हैं। कुछ निराश हैं तो कुछ आत्महत्या कर लेते हैं। द्वंद में उलझे ऐसे युवाओं से स्वामी जी ने कहा था— हर स्थिति अपने आप में सफल है, उसे समझने की जरूरत है, पहचानने की जरूरत है। वास्तव में असफलताएं, सफलता के मार्ग की अनिवार्य सीढी है। कोई भी व्यक्ति जो सफलता चाहता है, उसे असफलता से होकर भी गुजरना होगा। सफलता की अनिवार्य शर्त ही है असफल होना। थॉमस अल्वा एडीसन ने बिजली के बल्ब के आविष्कार के लिए 1000 से भी अधिक असफलताओं का स्वाद चखा। इसे दो तरीकों से देख सकते हैं। एक— एडीसन बार-बार नाकाम हो रहे थे और दूसरा—उनकी हर असफलता उन्हें सफलता के करीब लेकर जा रही थी। उन्होंने युवाओं को लक्ष्य निर्धारण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था—लक्ष्य के अभाव में हमारी 99% शक्तियां इधर-उधर बिखर कर नष्ट हो जाती हैं। लक्ष्यहीन व्यक्ति बिना पतवार के, लहरों में भटकती नाव के समान होता है। वास्तव में लक्ष्य प्राप्ति से पहले रुकना सड़ांध है, निराशा है और अंत में मृत्यु है। एक प्रवाह बाधित नदी मलिन होकर अंत में मृत्यु को प्राप्त होती है। ठीक उसी तरह एक व्यक्ति ठहरकर अपनी समस्त ऊर्जा का विनाश कर दीन-हीन और असहाय हो जाता है।

हमारे भीतर की आत्मिक ऊर्जा और नैतिक मूल्य हमारे भीतर बहने वाली जीवन नदी की धाराओं का बहाव कायम रखते हैं और हमें हमारे लक्ष्य को साधने में सहायता करते हैं। हर व्यक्ति की महान कामयाबी के पीछे हजारों नाकामियां हों, मगर व्यक्ति की महानता, श्रेष्ठता और उसकी पहचान उसकी कामयाबी से ही होती है। हम नाकामियों को जितनी सहजता से लेते हैं, कामयाबी उतनी ही जल्दी हमारे पास आती है। स्वामी जी असफलताओं को जीवन का सौंदर्य कहते हैं। वह कहते हैं— जीवन के संग्राम में जब योद्धा, युद्ध करने उतरते हैं, तो असफलताओं की धूल, मिट्टी उड़ना स्वाभाविक है। दुनिया को गौर से देखें तो पाएंगे कि महान लोगों ने अपनी सबसे बड़ी सफलता, विफलता के बाद हासिल की है। जब बात लक्ष्य के प्रति निरंतरता से कर्म करने की आती है, तो अधिकतर यह देखा जाता है कि युवा मंजिल मिलने से पहले ही थक जाते हैं और ठहर कर अपनी ऊर्जा नष्ट कर लेते हैं। ऐसे युवाओं से स्वामी जी आह्वान करते हैं कि— उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते।

स्वामी जी ईश्वर भक्त होने के साथ-साथ सच्चे राष्ट्र प्रेमी भी थे। उनका मानना था कि राष्ट्र कुछ और नहीं बल्कि हमारे देश के युवाओं द्वारा देखा हुआ एक सुखद स्वप्न है, अहसास है। कोई भी राष्ट्र वहां के युवाओं द्वारा ही निर्मित होता है और उन्हीं के प्रयास से आगे बढ़ता है। अगर किसी राष्ट्र को मजबूत करना हो तो सबसे पहले वहां के युवाओं को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्म रूप से दृढ करना होगा। इस बात में संदेह नहीं कि देश के युवा अगर अपने भीतर की चेतना को जागृत कर लें तो यहां की सारी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। आज भी देश के कुछ युवा अपनी इसी चेतना से प्रेरित होकर देश,समाज एवं मनुष्यता की नि:स्वार्थ भाव से सेवा में लगे हुए हैं। यह चेतना उनके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और उन्हें प्रेरणा देती है। जरूरत है इस चेतना को अधिक से अधिक युवाओं तक प्रसारित करने की। इस बात में संदेह नहीं है कि हर युवा अपनी जिम्मेदारी को अगर पूरी तरह समझ ले और उसी के अनुरूप अपने कार्यों को अंजाम दें, तो जैसे देश का निर्माण होगा, वह स्वामी जी के सपनों का भारत होगा। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि हम स्वामी जी के आह्वान का अनुगमन करें, युवा शक्ति का सकारात्मक उपयोग करें, तो विश्व गुरु ही नहीं, अपितु नए विश्व का निर्माण करने वाले विश्वकर्मा के रूप में भी जाने जाएंगे।

किसी शायर ने कहा है—युवाओं के कंधों पर, युग की कहानी चलती है। इतिहास उधर मूड़ जाता है, जिस पर जवानी चलती है। हम इन भावों को साकार करते हुए अंधेरे को कोसने की बजाय “अप्प दीपो भव:” की अवधारणा के आधार पर दीपक जला देने की परंपरा का शुभारंभ करना होगा। युवावस्था महासागर की उताल तरंगों को फांदकर अपने उदात्त लक्ष्य का वरण कर सकती है, तो नकारात्मक ऊर्जा से संचालित और दिशाहीन होने पर अद्य:पतन को भी प्राप्त हो सकती है। उसमें ऊर्जा का अनंत स्रोत है, इसलिए उसका संयमन व उचित दिशा में संस्कार युक्त प्रवाह बहुत आवश्यक है।चार जुलाई उन्नीस सौ दो (4 जुलाई 1902) को स्वामी जी पंचतत्व में विलीन हो गए, पर अपने पीछे वह असंख्य युवाओं के हृदय में उर्जा पुंज प्रज्वलित कर गए, जो कर्मण्यता को निरंतर प्रोत्साहित करती रहेगी। स्वामी विवेकानंद सदैव प्रासंगिक रहेंगे।

86. परिवार की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे सामाजिक प्राणी इस परिवार रूपी संस्था के कारण ही तो माना जाता है। लेकिन आज उसी परिवार के प्रति, आज की पीढ़ी का उपेक्षित व्यवहार बहुत सारी सामाजिक समस्याओं का आधार है। परिवार हमारी संस्कृति की रीढ़ है। इस परिवार रूपी संस्था के कारण ही हम पाश्चात्य दुनिया से बेहतर हैं। परिवार में सभी सदस्यों की महत्ता और योगदान बराबर होता है। भले ही सभी की भूमिका अलग-अलग हो। यह पूरा विश्व भी एक महापरिवार की तरह है। जिसमें अनेक देशों के परिवार समाए हुए हैं।

लेकिन आज के समय में, अपने काम की व्यस्तताओं और अन्य परिस्थितियों के चलते हम में से बहुत सारे लोगों को इतनी फुर्सत ही नहीं है कि वे घर से जुड़ी स्थितियों की ओर भी पर्याप्त ध्यान दे सकें। व्यवसायिक उन्नति की रेस मे परिवारों के संगठन में गिरावट आती जा रही है। बाहर से संगठित दिखाई देने वाले बहुत से परिवार आंतरिक असामंजस्य से जूझ रहे हैं। आपसी पारिवारिक सामंजस्य की महत्ता का शायद उन्हें भी अंदाजा हो गया होगा। सामाजिक जीवन की सबसे अद्भुत कड़ी होने के बावजूद परिवार के प्रति बढ़ती जा रही उपेक्षा को ठीक से रेखांकित करना होगा। परिवार के प्रति गैर जिम्मेदाराना रुख से कैसे काम चलेगा?

हालांकि, वर्तमान समय में संदेह और अविश्वास ने परिवारों के मूलाधार को नष्ट कर दिया है। वर्तमान समय में परिवारों की स्थिति वैसी नहीं रह गई है, जैसी पुराने समय में हुआ करती थी। अब तो परिवारों के नाम पर सिर्फ दिखावा ही रह गया है। फिर भी परिवार की अवधारणा आज भी उतनी ही सशक्त है, जितनी पहले के समय में हुआ करती थी। आज भी परिवार सुख- समृद्धि और उन्नति का माध्यम हैं।पारिवारिक विचारों ने आज भी समाज को उत्कर्ष एवं सबसे सफल बनाया है। परिवार आज भी पहले की तरह सभ्यता, संस्कृति और विकास का एकमात्र आधार हैं। परिवार की भावना ही एक- दूसरे को जोड़ती है। यही सद्भावना सभी परिवारों का अवलंबन है। चाहे परिवार हो, समाज हो, प्रान्त हो, देश हो या विश्व हो।

मनुष्य दस ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेइंद्रियों से संचालित होता है, तथा मन ग्यारहवीं इंद्री है। इन इंद्रियों का परस्पर सामंजस्य तब तक बना रहता है, जब तक वह स्वस्थ रहता है। ऐसे ही सृष्टि में भी सूरज, चांद, सितारे, पेड़-पौधे, नदियां-झरने सभी जीव- जंतु एक दूसरे के पूरक हैं। शिव जी के परिवार को विरोधों का सामंजस्य माना जाता है। स्वयं शिव के सिर पर जटा में जल और चंद्रमा की अग्नि, गले में विषधर सर्प तो उसके पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर है, जो एक- दूसरे के दुश्मन होते हुए भी एक परिवार की तरह रहते हैं। इसी प्रकार देखा जाए तो शिवजी का वाहन नंदी तथा मां दुर्गा का वाहन शेर, गणेश जी का वाहन चूहा तथा सर्प भी आपस में विरोध छोड़कर परिवार में एकता के साथ रहते हैं। वे एक- दूसरे को किसी प्रकार की भी हानि नहीं पहुंचाते।

यदि अपना परिवार ही सफल न हो तो अन्य परिवारों की बात करना बेमानी होगा। इसलिए हमें सर्वप्रथम अपने परिवार को संगठित करना चाहिए। परिवार का संगठन सभी सदस्यों के परस्पर विचार एवं व्यवहार पर निर्भर करता है। भिन्न-भिन्न विचार और व्यवहार से फूट पड़ना स्वाभाविक है। परंतु मतभेदों को आपस मैं विचार-विमर्श करके सुलझाया जा सकता है। सहयोग और सहचार्य परिवार के दो पैर हैं। सद्कर्म और सद्भाव तो हाथ हैं। इसलिए अगर मानव समाज को संगठित करना है तो समुदाय की पहली इकाई इस परिवार को संरक्षित करना होगा। एकता की भावना को सुदृढ करना होगा। यही सूत्र परिवार को ऊपर उठा सकता है।

85. अज्ञानता रूपी अहंकार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अज्ञानता रूपी अहंकार एवं अंधकार में डूबा मनुष्य हर अच्छे काम का श्रेय स्वयं को देने का भ्रम करता रहता है। लेकिन इस रहस्य से प्रायः अनभिज्ञ रहता है कि यदि किसी भी अच्छे, उत्तम एवं सफल काम का मूल केवल वही है, तो फिर वह कार्य उसके जीवन की इतनी लंबी अवधि बीतने से पहले क्यों नहीं संपन्न हुआ? प्रत्येक इंसान केवल यही समझता है कि जो वह कर रहा है वह सबसे अच्छा है। वह जैसी जिंदगी जी रहा है, उससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता।

कई बार प्रभु भक्ति करने वाले लोगों के अंदर भी अहंकार आ जाता है, वह सोचने लगता है कि मैंने तो बहुत दान- पुण्य किया है, मैं बहुत से तीर्थ स्थानों पर गया हूं। ऐसे लोगों को अपने आप पर बड़ा घमंड होता है। उनको लगता है कि उन्हें जीवन में जो कुछ मिल रहा है वह उनके स्वयं के कारण मिल रहा है। इंसान अहंकार में सच्चाई से बहुत दूर चला जाता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष मानव जीवन के चार लक्ष्य हैं। इन लक्ष्यों को प्राप्त करके ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब मनुष्य के विनाश का समय आता है, तो भगवान सबसे पहले उसके विवेक का हरण करता है। यदि वह इस अहंकार से छुटकारा पा लें और विवेकशीलता अपना सके, तो इतने भर से ही स्वयं पार उतरने और अनेकों को पार उतारने में सक्षम हो सकता है। इसके लिए विद्वान या पहलवान होना आवश्यक नहीं है। कबीर, दादू, रैदास, मीरा, शबरी आदि ने विद्वता या सम्पन्नता के आधार पर वह श्रेय प्राप्त नहीं किया था। मनुष्य के पास शरीर, मन और अंतःकरण ये तीन ऐसी खदानें हैं, जिनमें से इच्छानुसार मणिमुक्तक खोदकर निकाले जा सकते हैं।

मनुष्य ईश्वर से सदैव याचक बन कर कुछ न कुछ मांगता रहता है, उन्हीं की अनुकंपा से कुछ पाकर इतराता है और अपनी अज्ञानतावश स्वयं को कर्ता मानता है। जब-जब कर्ता भाव से चालाकी वश मनुष्य अपने लक्ष्य को छल- बल से प्राप्त करना चाहता है, तो लक्ष्य उससे उतना ही दूर होता चला जाता है और परेशानियां मुफ्त में उसकी चालाकियों का परीक्षण करने के लिए तैयार रहती हैं। बिना ईश्वर कृपा के न तो उसे अच्छा परिवेश मिल सकता है और न ही कुछ अच्छा करने की प्रेरणा।

हम अज्ञानता के वशीभूत होकर भांति-भांति के अभिनयों एवं भाव- भंगिमाओं द्वारा अपने जीवनयापन के तरीके ढूंढते रहते हैं। लेकिन अहंकारी मनुष्य जीवनपर्यंत विगत कर्म का लेखा-जोखा जो उसे, उस कर्म के तहत करना होता है, वही करता रहता है। प्रभुकृपा का याचक व्यक्ति कोई भी कार्य कर्ता भाव से नहीं करता बल्कि याचना के उपरांत मिले किसी भी प्रकार के कार्य को प्रभु निर्णय मानकर स्वीकार करता है और अपने कार्य को निष्काम भाव से करते हुए अपने अभीष्ट की ओर अग्रसर होता चला जाता है।

प्रभु द्वारा निर्धारित किए गए सुनिश्चित मार्ग में बाधाएं अथवा कष्ट झांकने का भी साहस नहीं जुटा पाते। लेकिन अज्ञानता के अहंकार में डूबे हुए जिस किसी भी व्यक्ति ने अपना चातुर्य-प्रदर्शन करने की कुचेष्टा की है, वह महज लक्ष्य से ही नहीं, अपितु अपने इस दुर्लभ जीवन से भी हाथ धो बैठा। प्रभु कृपा के प्रसाद से कोई भी रंक, राजा बनने का गौरव हासिल कर सकता है, लेकिन अपने आपको ईश्वर मानने वाले अहंकारी मनुष्य का वही हाल होता है, जो रावण का हुआ था। रावण एक बहुत बड़ा विद्वान और पंडित था, लेकिन अज्ञानतावश अपने को ईश्वर मानने लगा और उसका यही अहंकार उसके विनाश का कारण बना।

84. एकांतवास का महत्त्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नम

एकांतवास का शाब्दिक अर्थ है— अकेले रहना। अपने जीवन में कुछ समय भौतिक जंजाल एवं दुनियादारी से अलग होकर रहना ही एकांतवास है। कोरोना काल में, लॉकडाउन के समय यह शब्द काफी प्रचलन में आया। हमारे में से प्रत्येक एकांत में जाने की बात कर रहा था। हमारे में से बहुत से मनुष्यों के जीवन पर एकांतवास का सकारात्मक प्रभाव पड़ा तो बहुत से मनुष्यों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा। इस संसार में निवास करते हुए कई बार हमारे जीवन में ऐसा समय भी आता है, जब शारीरिक व्याधि और मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाने पर एकांतवास में रहना पड़ता है।

लेकिन वास्तव में देखा जाए तो एकांत जीवन का दुखांत नहीं, बल्कि सुखांत का प्रवेश द्वार है। एकांत में रहकर हम उन वस्तुओं पर भी ध्यान देते हैं, जिन पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता है। एकांत सफलता और भविष्य निर्माण की आधारशिला है। एकांत में रहकर ही हम भीड़ से हटकर कोई ऐसा कार्य कर सकते हैं, जिससे हम भीड़ के लिए आदर्श एवं प्रेरणादायक बन सकते हैं। यह मनुष्य की प्रतिभा और सृजन शक्ति को जागृत करता है। अनेकों साहित्यकारों एवं वैज्ञानिकों ने एकांत में रहकर ही संसार को महान रचनाएं एवं सिद्धांत प्रदान किए।

अध्यात्मिक साधना में एकांतवास का विशेष महत्व है। पर्वतों, गुफाओं और वनों के मध्य एकांतवास में रहकर ही मनीषियों, साधु-संतों ने तप-साधना को फलीभूत कर सिद्धियां प्राप्त की। पांचो इंद्रियां जो मनुष्य को भौतिकता की दलदल में धकेल देती हैं, एकांत इन इंद्रियों की तृष्णा को समाप्त कर देता है। असल में एकांत एक आनंद है, जो हमें चिंतन का अवसर प्रदान करता है। परम शांति और जीवन का यथार्थ है। एकांत स्वयं को परखने और गुण- दोष के मूल्यांकन का माध्यम है। एकांत में रहकर ही हमारी वृत्ति अंतर्मुखी हो जाती है। यही अंतर्मुखी वृत्ति साधना के मार्ग को प्रशस्त करती है। साधना के पथ पर चलकर ही मनुष्य उस ईश्वर से साक्षात्कार करने में सफल होता है। संसार की भीड़ में रहते हुए मनुष्य चाहते हुए भी अपनी मानसिक पीड़ा एवं तनाव को कम नहीं कर सकता। संसार के भौतिक विषयों का आकर्षण बड़ा प्रबल होता है। वह मनुष्य की मानसिक शक्तियों की एकाग्रता में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करता है।

एकांतवास में ही हमारी स्वयं से स्वयं की मुलाकात होती है। हम स्वयं को अच्छी तरह से समझ पाते हैं। यह हमारी बिखरी हुई अंतःकरण की शक्तियों को, एकत्रित कर, नई उर्जा प्रदान करके, एकाग्रता प्रदान करता है। एकांतवास मन में उठने वाली तामसिक विचारों की लहरों को शांत कर देता है। चिंतन, प्रतिभा एवं सर्जन का मार्ग एकांतवास में ही खुलता है। हमारे ऋषियों का भी यही संदेश था कि— सर्वप्रथम स्वयं को एकांत में साधो। आत्म निरीक्षण करो। शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम बनो। क्योंकि वे जानते थे कि मानसिक और आत्मिक रूप से सक्षम मनुष्य ही इस संसार रूपी सागर को सफलतापूर्वक पार कर सकता है।

83. पाएं, भय से मुक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भय एक ऐसा भाव है, जिससे मनुष्य अपना पूरा जीवन जूझता ही रहता है। वह अपना पूरा जीवन भय के साए में ही गुजार देता है। वह हमेशा भयग्रस्त रहता है। भयभीत वातावरण में सद्गुण भी दुर्गुण बन सकते हैं। सत्प्रवृत्तियां कमजोर पड़ जाती हैं। भय भी विभिन्न प्रकार का होता है। किसी को अपनी धन-संपत्ति को खोने का भय सताता है, तो किसी को अपनी प्रतिष्ठा का।

महाराज भर्तृहरी कहते हैं— भोगों से रोग का भय है, ऊंचे कुल में पत्तन का भय है, धन में राजा का भय है, मान में दीनता का, बल में शत्रु का, रूप में वृद्धावस्था का, शास्त्र में वाद- विवाद का, शरीर में काल का भय है। इस प्रकार संसार की सभी वस्तुएं भयग्रस्त हैं। भय से रहित तो केवल वैराग्य है—— क्योंकि वैराग्य के विपरीत मोह उत्पन्न होता है। मोह से वस्तु, पद या स्थिति से लगाव हो जाता है और यही लगाव संबंधित वस्तु के छिन जाने या नष्ट हो जाने की आशंका से भयग्रस्त रहता है।

भय के भले ही विभिन्न रूप हो सकते हैं, लेकिन उनका मूल भाव एक ही है। अगर देखा जाए तो अधिकांश भय निराधार और खोखले होते हैं। हम अपने जीवन में जिन- जिन वस्तुओं से डरते हैं, उनमें से अधिकांश का कोई ठोस आधार ही नहीं होता। ऐसे में यदि हम उनका कुछ संकल्प के साथ सामना करें तो हम न केवल भय से मुक्त हो सकते हैं, बल्कि अपने जीवन को सही दिशा की ओर उन्मुख कर, दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।

भय को मूल रूप से नकारात्मक भाव माना जाता है परंतु कुछ अर्थों में यह सकारात्मक भी होता है। भौतिक वस्तुओं के छिनने का भय, भले ही आपके जीवन को कष्टदायक बनाएगा, परंतु ईश्वर का भय आपको तमाम तरह के पाप करने से बचाने का भी काम करता है। इस भय पर विजय प्राप्त करना ही भय से मुक्ति पाना है और भय से मुक्त होने पर ही आप सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस करते हैं। भय से मुक्ति प्राप्त करने के बाद ही प्रह्लाद अपने पिता हिरण्यकश्यप के समक्ष अडिग बना रहा। पांच वर्ष का बालक ध्रुव भय रहित होने पर ही अकेला वन में जाकर कठोर तप करके परम पद को प्राप्त करने में सफल हुआ। इसी गुण के कारण नचिकेता भी सत्य और नीति के पक्ष में अपने पिता से प्रश्न कर सका। छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह भी, भय से मुक्ति प्राप्त करके ही अपने देश और समाज का उद्धार कर सके।

हमें यह भी भली-भांति ज्ञात होना चाहिए कि मानव जीवन एक महासंग्राम है। हम जैसे ही अभिलाषाएं, आकांक्षाएं लेकर सफलता प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ते हैं, वैसे ही गतिरोध, अपमान, ग्लानी, हानि और मृत्यु रूपी भय हमारे सामने आ खड़े होते हैं। इससे साधारण मनुष्य के कदम ठिठक जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप हमारा पूरा जीवन भय के साए में ही निकल जाता है। ऐसे में इस भय से मुक्त होना ही मनुष्य को अपने कर्तव्य पथ पर विपत्तियों के बीच भी विजय दिला सकता है।

किसी भी भय को दूर करने का पहला प्रयास यही है कि— इसे लेकर यह दृढ़ भाव उत्पन्न करना कि इससे मुक्ति पाई जा सकती है। फिर इसके लिए शुद्ध अंत: करण से संकल्पबद्ध होना होगा कि— मैं वीर हूं, अजर-अमर हूं। मैं अपने निश्चय से एक कदम भी पिछे नहीं हटूंगा। वैसे आप भय से भयभीत रहिए, लेकिन उसके समक्ष घुटने कभी न टेकें। यह ध्यान रखना चाहिए कि भय को खत्म करने के लिए सबसे बड़ा काम संकल्प के साथ यह तय करना होगा कि— मैं अब चिंता और भय के वश में नहीं रहना चाहता। मैं अपने मन से चिंता और भय को बाहर निकालना चाहता हूं। अब मैं उन के शिकंजे में नहीं रहना चाहता। मैं इसी समय यह संकल्प करता हूं कि अपने मन के अंदर बैठे हुए भय को बाहर निकाल कर फेंक दूंगा। फिर आप देखना आपके भीतर बैठा हुआ भय, आपको छोड़ने लगेगा और आप बिना भय के हर मुश्किल का सामना आसानी से कर सकेंगे।

82. फूलों-सा महकता जीवन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जब हम फूलों का नाम सुनते हैं, तो हमारे चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ जाती है और जब हम उन्हें देखते हैं, स्पर्श करते हैं, तो हमारा रोम-रोम फूलों की तरह खिल उठता है। आखिर फूलों में कुछ तो खूबियां होंगी ही, तभी तो इन्हें देखकर हमारा मन प्रसन्न हो जाता है, तो क्यों ना हम अपने जीवन में ऐसे कार्य करें, जिससे हमारा यश, कीर्ति फूलों की महक की तरह दूर-दूर तक फैले। जीवन के उतार-चढ़ाव से न घबराते हुए, हर पल आनंद का अनुभव करते हुए, आगे बढ़ते जाएंगे, तभी हमारा जीवन फूलों की तरह महकेगा।

जिस प्रकार प्रकृति में हर पल उत्सव चल रहा होता है, हर रोज पेड़-पौधों पर विभिन्न रंग के फूल खिल रहे हैं, पुराने पत्तों की जगह नई कोंपले आकार ले रही हैं, पक्षी गा रहे हैं, आकाश में चांद-तारे चमक रहे हैं, हवा मंद- मंद बह रही है। लहरों के संग पूर्णिमा की चंद्रिका हमारे मन को उद्वेलित कर रही है। हम सांस ले रहे हैं। हवा में फूलों की महक से सारा वातावरण सुगंधित है। प्रकृति में रोजाना नया साल, दिवाली, होली और नूतनता की प्रक्रिया जारी है। केवल यही सत्य है, यही बात हमें समझनी होगी। हमें समझना होगा कि जिस प्रकार प्रकृति में सब कुछ हर पल बदलता रहता है, नवीनता का संचार होता है, उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर पल बदलाव होता रहता है। जब हम इस बदलाव को स्वीकार करके खुशियां मनाना सीख लेंगे, तभी हमारे जीवन में फूलों की सुगंध बिखर जाएगी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जब भी आप अपने को उदास महसूस करें तो फूलों के करीब जाकर थोड़ा सा वक्त बिताएं। आप चाहे तो अपने पास ताजे फूलों का एक बुका रखें और इसकी खुशबू व सौंदर्य का आनंद लें। इससे न केवल आपका मन प्रसन्न रहेगा, बल्कि उदासी भी दूर होगी। मनोवैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि घर में विभिन्न रंगों के फूल वाले पौधे लगाने से दिमाग में हमें प्रसन्न रखने वाले हार्मोन का स्राव तेजी से होता है और हमारा मन अधिक प्रसन्न होता है। आप चाहें तो अपने घर के अलग-अलग हिस्सों में फूल वाले पौधे सजा सकते हैं। फूल वाले पौधे कमरों की शोभा में भी चार चांद लगा देंगे।

अमेरिका के कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन के अनुसार प्रतिदिन कुछ समय फूलों के निकट बिताने के साथ ही इन्हें अपने आसपास रखने से हम काफी हद तक स्वयं को तनावमुक्त महसूस करते हैं। इस संदर्भ में यूनाइटेड किंगडम के एक मेडिकल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि रंग- बिरंगे फूलों को अपने पास रखने से हमारे मन में सहानुभूति का भाव उठता है। इससे हमारे मन में दूसरों की तकलीफों के प्रति हमदर्दी पैदा होती है। इसके साथ ही फूलों के करीब रहने से मन से टेंशन और चिंता सरीखी शिकायतें दूर होती हैं। इसलिए हमेशा खुश रहिए। कभी भी अपने दिल में थोड़ा-सा भी राग या द्वेष का अंश मत रहने दें। इसे तो फूलों की तरह ताजा, कोमल और सुगंधित बना रहने दें। फिर देखना आपकी जीवन रूपी बगिया कैसे फूलों से महक उठेगी।

81. जीवन जीनें की कला

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन स्वयं, जीने की एक कला है अर्थात् जीवन वही जिसमें जीने का मर्म छिपा है। जीने का मर्म और जीने का धर्म दोनों ही इस जीवन धारा के प्रवाह में दो किनारे हैं। धर्म यह है कि— जीवन जीने के विज्ञान और कला को एक सूत्र में बांधा जा सके और कर्म यह है कि— जीवन मर्म को प्रकाशित किया जाए, संप्रेषित किया जाए। यदि मनुष्य जीवन का रहस्य जान सके, समझ सके और अपना सके तो उसका लक्ष्य भेद सफल हो सकता है।

जीवन के रंग मंच पर ईश्वर कर्म रूपी पिक्चर के सर्वश्रेष्ठ निर्माता और निर्देशक हैं। हम सब तो केवल उस पिक्चर के अभिनय दल के जीवंत पात्र मात्र हैं। एक कुशल निर्देशक सबसे पहले सभी पात्रों की जांच- परख करता है, फिर उनकी क्षमता, योग्यता, कुशलता के अनुसार उन्हें अभिनय की भूमिकाएं वितरित करता है। जो सबसे दुर्बल होता है, उसे उसी की तरह भूमिका देता है। जो उससे कुछ अधिक बलिष्ठ होता है, उसे उससे कुछ अधिक क्षमता वाली भूमिका देता है। संपूर्ण अभिनय दल में जो सबसे अधिक ऊर्जावान, समर्थ और हर प्रकार की चुनौतियों से निपटने में सक्षम होता है, निर्देशक उसे ही नायक की भूमिका देता है। इस प्रकार कठिन भूमिका से ही उत्तम नायक की पहचान होती है। सहज भूमिका कोई भी कर सकता है। लेकिन जो कठिन से कठिन भूमिकाओं को सहर्ष करने को उत्सुक हो, उसे ही निर्देशक नायक की भूमिका सौंपता है।

वास्तव में देखा जाए तो ईश्वर रूपी निर्देशक भी अति सक्षम और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले साहसी व्यक्ति की ही परीक्षा लेता है। दुख तो केवल मनुष्य के पौरुष और साधना की परख के प्रमाण मात्र हैं। दुखों को सहन करने का सामर्थ्य सभी में नहीं होता। पहाड़ जैसे दुख ईश्वर उन्हें ही उपहार स्वरूप प्रदान करता है, जिनकी वह परीक्षा लेता है। ईश्वर परम न्यायवेत्ता और करुणानिधान है। उनके निर्णय जीव के लिए श्रेष्ठ और कल्याणकारी होते हैं। यह जीव का कलुषित मन और अल्पज्ञता ही है कि वह उसमें भी कुछ न कुछ नकारात्मक खोजता रहता है। लेकिन नियत प्रारब्ध से अधिक और समय से पूर्व बहुत कुछ हड़प लेने की इच्छा हमें सत्कर्म और धर्म के मार्ग से भटका कर अधर्म एवं दुष्प्रवृत्तियों की गलियों में ला फंसाती हैं। जीवन के रंगमंच पर ईश्वर द्वारा निर्धारित भूमिकाओं का आनंद पूर्वक निर्वहन ही वास्तव में जीवन जीने की कला है।

जीवन जीने की कला चिंतन से कहीं अधिक यह अनुकरण का मार्ग है। जीवन को जीना एक वैज्ञानिक पद्धति से ही संभव है। कोई भी जीव अवैज्ञानिक तरीके से नहीं रह सकता। यह केवल वचन, प्रवचन या सैद्धांतिक विस्तार का विषय नहीं है। यह प्रयोग एवं व्यवहार का विषय है। कर्म और धर्म का अनुसरण करके ही जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। यह कला ईश्वरीय है। यह जीवन को दिशा देती है, आयाम देती है। जीवन को संवारने, सहेजने एवं सुंदर बनाने में इस कला का अद्भुत योगदान है। जीवन जीने की कला अलौकिक है। सर्वोत्तम कला ईश्वर से निकटता का दर्शन करा सकती है। यह ईश्वर के दर्शन का रास्ता है। समस्त कलाओं में श्रेष्ठ यह आत्मकला ईश्वर की ओर उस पथिक को लेकर अवश्य जाती है, जो भवसागर से पार जाना चाहता है।

80. बाल संस्कार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे संस्कारी बनें, तो बचपन में ही हमें उनमें संस्कार डालने होंगें, तभी वे बड़े होकर एक संस्कारी और श्रेष्ठ व्यक्तित्व को प्राप्त करेंगे। क्योंकि संस्कार मनुष्य के आभूषण होते हैं। यह मनुष्य को गुणवान एवं लोकप्रिय बनाते हैं। संस्कारी व्यक्ति की सभी प्रशंसा करते हैं और वह समाज में लोकप्रियता हासिल करता है।अगर हमारे समाज में ज्यादातर मनुष्य संस्कारी होंगे तो इससे हमारा समाज, प्रांत और देश, सभ्य और सुव्यवस्थित होगा। एक सभ्य समाज ही उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है।

यदि बाल्यावस्था से ही बच्चों को संस्कारित किया जाए तो उनमें वे स्थाई रूप से वास करते हैं। क्योंकि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है। हम उन्हें जैसा आकार देना चाहते हैं, वैसा दे सकते हैं। जिस तरह कच्ची मिट्टी से एक सुंदर घड़े या सुराही का निर्माण होता है। तत्पश्चात् उस घड़े या सुराही में रंग भर कर उसे आकर्षक बनाया जाता है। ठीक वैसे ही हम बच्चों के साथ कर सकते हैं। क्योंकि बाल्यावस्था के संस्कार स्थायी होते हैं। अगर इस अवस्था में श्रेष्ठ संस्कारों का पीयूषपान कर लिया जाए तो जीवन के सफल होने का मार्ग स्वत: खुल जाता है।

व्यक्ति के अंदर एक क्रमिक प्रक्रिया द्वारा ही संस्कारों का समावेश होता है। अगर हम उसे श्रेष्ठ संस्कारों से परिष्कृत करें तो भविष्य श्रेष्ठता को प्राप्त होगा। हमें बचपन में ही बच्चों के अंदर संवेदना का भाव उत्पन्न करना चाहिए। जिससे वे संवेदनशील बन सकें। जब कभी कोई भी व्यक्ति किसी अन्य का दुख देखकर उसके सुख- दुख का अनुभव, उसके बराबर ही करने लगता है, तब समझा जाता है कि ऐसा व्यक्ति संवेदनशील है। उसे केवल अपने सुख-दुख का ध्यान नहीं है, बल्कि वह दूसरों के सुख- दुख का भागीदार भी बनता है, इतना ही नहीं, वह बड़ा होकर न केवल मनुष्य के सुख-दुख को देखकर दुखी और सुखी होता है बल्कि वह मानव, पशु- पक्षी, कीट-पतंग, जलचर और नभचरों की पीड़ा को भी देख कर संवेदना के भाव से भर उठता है। सनातन परंपरा इसीलिए विश्व की परंपराओं में श्रेष्ठ रूप से स्वीकार की गई है, क्योंकि इसी परंपरा में अतिथि, गाय, कुत्ता और कौए को रोटी देने के साथ-साथ सर्प को दूध पिलाने, मछली और चींटी को आटा खिलाने की परंपरा आदि काल से प्रचलित रही है।

सामाजिक समरसता एवं सहिष्णुता का अनुसरण हमें स्वयं भी करना चाहिए और बच्चों को भी उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। “वसुधैव कुटुंबकम्” का जो मंत्र हमारी संस्कृति ने दिया है, वह इसी का एक हिस्सा है। सबसे पहले इसे स्वयं पर लागू करना चाहिए, जिससे हम अपने बच्चों के अंदर भी संस्कार डाल सकें। हमारे शरीर को ज्ञानेंद्रियां संचालित करती हैं। हम कुछ देखते हैं और मन उसे अपराध कहता है, तो हमें अपनी आंखों के प्रति सहिष्णु बनाना चाहिए और तत्काल उधर से दृष्टि हटा लेनी चाहिए, क्योंकि दूसरा कोई भले न जान पाए कि हम क्या गलत कर रहे हैं पर हमारा मन प्रत्येक कार्य के गलत सही के बारे में बताता रहता है। इसकी सीधी- सी पहचान है कि जो काम हम खुले आम नहीं बल्कि चोरी से करते हैं वह गलत है। गलत न होता तो सार्वजनिक रूप से हम उसे करते। जब हम स्वयं मन बुद्धि से एक सूत्र में नहीं रहेंगे तो समाज को एक सूत्र में नहीं रख सकते। क्योंकि जब स्वयं हमारे कर्म और चिंतन में विरोधाभास रहेगा तो वह हमारी कार्यपद्धती में भी उतर आएगा।

समाज को उत्तम और आदर्शवादी बनाने के लिए आलीशान मकान और भारी-भरकम भौतिक साधन नहीं, बल्कि सुसंस्कारित व्यक्ति का होना जरूरी है और यह तभी संभव है जब हम अपने बच्चों में संस्कार डालें। हमें यह सोचना होगा कि जो हमारे लिए ठीक नहीं है, वह दूसरों के लिए भी ठीक नहीं हो सकता। इसी सोच को मजबूती से पकड़ने की जरूरत है। येन केन प्रकारेण उपलब्धि अनेक विकृतियों को जन्म देती है और तब समाज में विषमता, विषाक्तता और नफरत का माहौल बनने लगता है। अपने लाभ के लिए दूसरों का अहित करना दानवीय प्रवृत्ति है। जो व्यक्ति समाज के लिए सहिष्णु नहीं होता, एक दिन ऐसा आ जाता है कि वह अपने परिवार के प्रति भी क्रूर हो जाता है और फिर उसका निजी जीवन कष्टदायी हो जाता है।

हमें यह स्वीकार करते हुए हिचक नहीं होनी चाहिए कि बाल संस्कारों का पोषण हमारे व्यवहार से होता है। हम जैसा व्यवहार बच्चों के साथ करते हैं, वे वैसा ही सीखते हैं। बच्चों में सच बोलने का संस्कार हमारे सच बोलने से ही आता है। माता-पिता और परिवार के सदस्यों के आचरण का बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में आवश्यक है कि हम बच्चों के समक्ष अच्छा व्यवहार करें। संस्कारों के बीजारोपण के लिए श्रेष्ठ साहित्य की भूमिका भी अहम् रोल अदा करती है। नैतिक शिक्षा बच्चों के जीवन की दिशा बदल देती है। ज्ञानवर्धक कहानियों का बच्चों के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। यह कहानियां बच्चों के मन में दया, करुणा, साहस, शौर्य, पराक्रम, सत्यवादिता, जिज्ञासा, सरलता और इमानदारी जैसे गुणों का अंकुरण करने में सहायक होती हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण से ही संभव है और श्रेष्ठ व्यक्ति निर्माण बाल संस्कारों से ही होता है।