33. जन्म की सार्थकता

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

हर व्यक्ति में दिव्यता के कुछ अंश मौजूद होते हैं। उनमें कुछ विशेषताएं होती हैं। मनुष्य का यह प्रथम कार्य है कि वह उन विशेषताओं को खोज निकाले और अपने मानव रूपी जन्म को सार्थक करे। क्योंकि ईश्वर की संरचना में सर्वाधिक श्रेष्ठ स्थिति मनुष्य की है। मानव शरीर पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। देखा जाए तो सबसे ऊंचे पायदान पर मानव है। जानवर उससे नीचे हैं, लेकिन जो जितनी ऊंचाई पर रहता है, वह जब गिरता है, तो किस निम्न स्तर पर गिरेगा, कहा नहीं जा सकता। सबसे ऊंचे स्तर पर बैठा मनुष्य कभी-कभी जानवर से भी नीचे चला जाता है।

सनातन धर्म अनादि-अनंत है और इसको एकात्म सूत्र में बांधने वाले अप्रतिम व्यक्तित्व के अनेकों स्वामी हैं। जिन के पद-चिन्हों पर चलकर हम अपने जन्म की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। हमारे अनेक ऋषि-मुनियों ने युगों पूर्व अवतरित इन महान संतों की जीवन सरिता को शब्दों में पिरो कर हमें एक अमूल्य धरोहर के रूप में अनेकों ग्रंथ प्रदान कीए हैं। इनसे शिक्षा प्राप्त कर हम उनके अद्भुत और अलौकिक जीवन को लोगों तक सही रूप में पहुंचाने का प्रयास कर, हम अपने जीवन को भी संवार सकते हैं। समाज में फैली बुराइयों और अवगुणों को खत्म करने के लिए ज्ञान का उद्गम अनिवार्य है। धर्म के नाम पर अनुचित, अनैतिक कार्यों में लिप्त लोगों के भ्रामक जाल को दूर फेंक कर मानवता के धर्म का प्रचार-प्रसार होना अत्यंत आवश्यक है। गांव से लेकर महानगरों तक धोखाधड़ी, तिकड़म, नारी अस्मिता का चीरहरण, जिस घटिया स्तर तक हो रहा है, वह जानवरों से भी घटिया स्तर का है। सक्षम होते ही माता-पिता को वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाना क्या यह अच्छा संस्कार है। सामान्य व्यक्ति ही नहीं बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों की करनी का खुलासा होता है तो लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। सार्वजनिक जीवन में आदर्श, सत्य, संस्कार, धर्म का प्रवचन देने वालों  तक की करनी आए दिन लोगों के सामने है।

यह सब कारण था कि राजकुमार सिद्धार्थ को मानव जीवन से नफरत हो गई थी। गोस्वामी तुलसीदास की आत्मा ने उसे झकझोर दिया था। ऐसे समय में किसी ऐसे सत्पुरुष की आवश्यकता होती है, जो मानव-जीवन में धर्म की टूटी हुई कड़ियों को फिर से जोड़कर उसे मजबूत बनाए और धर्म के वास्तविक स्वरूप को  सबके सामने प्रस्तुत करें। इसका प्रथम मार्ग है आत्मसाक्षात्कार, अर्थात अपने आप को जानना। आत्मसाक्षात्कार के द्वारा ही मनुष्य अपने जन्म की उपयोगिता समझ सकता है। इसी मार्ग की साधना से सनातन धर्म के अनेक अनुयायियों ने अपने जन्म को सार्थक किया। आत्मसाक्षात्कार का यह मार्ग आधुनिक समय में भी काफी प्रासंगिक है, क्योंकि विविध सम्पन्नताओं से घिरे मनुष्य के दुख और असंतोष की सीमा नहीं है। हर धर्म-ग्रंथ के अनुयाई अपने-अपने मत को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे हुए हैं। इस विकास की अंधी दौड़ में भीतर से खोखले होते जा रहे समाज के लिए आत्मसाक्षात्कार परम आवश्यक है। इस प्रयोजन को सफल बनाने के लिए संत महात्माओं के अप्रतिम जीवन और कार्यों पर प्रकाश डालते ग्रंथ जीवन प्रयोजन की पूर्णता का मार्ग दिखाते हैं। यह जीवन के शिखर तक पहुंचने में मानचित्र की तरह प्रमाणिक सिद्ध होते हैं। इनके जीवन से यह सीख मिलती है कि घटिया स्तर की सोच जब मनुष्य छोड़ देगा, उसी समय उसका मनुष्य के रूप में जन्म सार्थक होगा। वह महासागर की उत्ताल तरंगों को फांद कर अपने उदात्त-लक्ष्य का वरण कर सकता है।

मनुष्य में ऊर्जा का अनंत स्रोत है। इसलिए उसका संयम व उचित दिशा में संस्कार युक्त परवाह बहुत आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं करता तो उसका अगला जन्म मनुष्य योनि में नहीं होगा, यह तो बिल्कुल स्पष्ट है। अगर कु-संस्कार उसके परिवार में घुस गये तो उसकी अगली पीढ़ी गलत रास्ते पर चली जाएगी क्योंकि घर के बच्चे बड़ों की नकल करते हैं और वे परिवार से जैसे संस्कार लेंगे, वही जीवन में चरितार्थ करेंगे। क्योंकि बहुत सारी साधना और तपस्या के बाद ही हमारे को मनुष्य योनि प्राप्त होती है और मनुष्य जीवन को फिर से प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्मों का होना नितांत आवश्यक है।

32. शब्दों की शक्ति

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

शब्द व्यक्ति के व्यक्तित्व का आईना होते हैं।शब्दों की शक्ति से ही मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार आता है।अगर हम कोई भी संकल्प लेने से पहले शब्दों की ताकत का भी संज्ञान लें, तो हमारा कार्य समय से पहले ही पूरा हो जाता है। बार-बार संकल्पों को लेकर निराशा के भाव से पीड़ित लोग अक्सर कठोर रणनीति अपना लेते हैं। इस कारण वह स्वयं के शत्रु बन जाते हैं। ये स्वजनित शत्रु संकल्पों की सिद्धि में और अवरोध ही उत्पन्न करते हैं। ऐसे में इस प्रकार की परिस्थितियों से बचने के लिए कठोर बनने की बजाय शब्दों का प्रयोग कर लचीला बनना सीखें। यह स्मरण रखें कि सकारात्मक और रचनात्मक नीति हर विपरीत परिस्थिति को सहज बनाकर हमारी राह आसान बना देती है। यह बेहद कारगर नीति है। सकारात्मक शब्दों की ताकत को आज विश्व के कोने-कोने में महसूस किया जा रहा है।

ऊंची आवाज रखने से अच्छा है कि तुम्हारे शब्दों में वजन होना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद

अर्थात शब्दों में इतनी शक्ति हो कि दूसरा उसे आराम से सुन और समझ ले। और इसका उदाहरण उन्होंने खुद शिकागो सम्मेलन में अपने प्रथम भाषण में ही दे दिया था। प्रथम दिन स्वामी जी को शून्य में बोलने का अवसर दिया गया था, क्योंकि उनका कोई समर्थक नहीं था, उन्हें कोई जानता नहीं था, किंतु उसके बाद सम्मेलन में, जो उनके दस-बारह भाषण हुए, वे भाषण भी उन्होंने प्रतिदिन सभा के अंत में ही दिए, क्योंकि सारी जनता उन्हीं का भाषण सुनने को अंत तक बैठी रहती थी। यह स्वामी जी के शब्दों की शक्ति ही थी। इसलिए वे हमेशा कहते थे कि- सकारात्मक सोच और ऊंचे विचारों के साथ-साथ शब्दों की शक्ति को भी पहचानों। अक्सर हम देखते हैं कि अनेक विवाद केवल शब्दों के हेर-फेर से पनपते हैं और हैरानी की बात यह है कि तमाम विवादों का अंत भी केवल समझदारी भरे शब्दों का चयन करके ही किया जा सकता है। समझदारी भरे कुछ शब्द अपने सामने रखिए। अपने जीवन में उनका प्रयोग करने की आदत डालिए। धीरे-धीरे ये नये शब्द कुछ ही समय में आपकी किस्मत और व्यक्तित्व को बदल देंगें और आप एक चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी बनकर उभरेंगे।

जीवन की लंबी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। सफलता-असफलता से भी हमें  रूबरू होना पड़ता है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। ऐसे में सकारात्मक सोच की रणनीति में यदि लचीले शब्द डाल दिए जाएं तो फिर भंगुर लोहा भी टूट जाता है। फ्रांस के विचारक ज्यां पाल सार्त्र ने अपनी आत्मकथा का नाम ही शब्द रखा। उनका कहना है कि हम जन्म से लेकर मृत्यु तक शब्दों के संसार में ही जिया करते हैं। विचार, स्मृतियां, कल्पनाएं और स्वपन ये सभी शब्द ही तो हैं। शब्द हमारे संसार में, बाहरी जीवन से जुड़ा है। भले ही शब्दों की यात्रा हमारे जीवन में बाहरी यात्रा है। लेकिन यह भीतर की यात्रा का पहला पड़ाव है। शब्दों से ही तो मानवीय जीवन में विचारों का सृजन होता है। सकारात्मक सोच और शब्दों के तालमेल से ही उसमें इच्छा शक्ति जागृत होती है। कोई भी प्राकृतिक-मानवीय आपदा भी ऐसे व्यक्ति को तोड़ नहीं सकती। इसलिए अपने शब्दों पर गौर करें और उन्हें बदलने का प्रयत्न करें। यदि लोग आपके शब्दों से नाराज हो जाते हैं, आपके काम बिगड़ जाते हैं, तो तुरंत लचीले शब्दों को अपने जीवन में लाने का प्रयत्न करें। सफलता पाने का मूल मंत्र भी शब्दों की गहराई में ही छिपा हुआ है। हर स्थिति में मतभेद से कार्य बिगड़ जाते हैं, इसलिए मतभेद की बजाय सहमति एवं मन मिलाने का प्रयत्न करें। प्रतिरोध की बजाय खुले दिमाग वाला बनने का प्रयास करें। फिर क्यों न आज ही से सकारात्मक और लचीले शब्दों का प्रयोग करना शुरू किया जाए, ताकि जीवन रूपी यात्रा में ये शब्द आपकी जिंदगी को सही राह पर ले जाएं, और आपको प्रारंभ में ही सफलता रूपी फल का स्वाद चखने को मिले।