103. यादों के झरोखे

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यादें मनुष्य के जीवन का अहम् हिस्सा हैं। जैसे-जैसे जीवन रूपी यात्रा चलती है, वैसे- वैसे यादों का कारवां भी अनवरत् चलता रहता है। यादों का यह कारवां फलता-फूलता जाता है। यादें हमसे परछाई की तरह चिपकी रहती हैं। मनुष्य का अतीत यादों से भरा हुआ होता है। कुछ यादें दुख, तकलीफ एवं विषम परिस्थितियों के अवसाद से घिरी रहती हैं, तो कुछ यादें हंसी, खुशी और रोमांच से भर देने वाली होती हैं। मनुष्य का दिमाग प्रायः दुखभरी यादों को ज्यादा ग्रहण करता है। अगर उसके जीवन में कोई दुखद घटना घटी हो तो वे यादें उसके मस्तिष्क में बसेरा डाल लेती हैं। यादें अच्छी हो या बुरी, दोनों ही जिंदगी की सच्चाई हैं। अच्छी यादें हमें जिंदगी में आगे बढ़ने का हौसला देती हैं तो बुरी यादें हमें जिंदगी की आगामी कठिनाइयों से लड़ने का अनुभव प्रदान करती हैं।

दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं – एक तो वे जो अपनी यादों के सहारे पूरी जिंदगी गुजार देते हैं।
दूसरे वे जो यादों से सबक लेकर अपनी जिंदगी संवार देते हैं।
तीसरे वे जो बुरी यादों को याद करके खुद का वर्तमान और भविष्य दोनों ही बर्बाद कर देते हैं।

आज के दौर में ज्यादातर मनुष्य तीसरी टाइप के हैं। वे हमेशा तनाव में रहते हैं। इस तनाव की मूल वजह भी यही है कि मनुष्य अच्छी यादों की बजाय बुरी यादों में ज़्यादा डूबा रहता है। वह हमेशा नकारात्मक विचारों में खोया रहता है। यही नकारात्मकता उसकी जीवनचर्या का हिस्सा बन जाती है, जिससे उसका वर्तमान के प्रति मोहभंग हो जाता है। वह दूसरों से अपनी तुलना करने लगता है। जिससे वह जीवन रूपी यात्रा में पिछड़ जाता है। इस हताशा में मनुष्य मादक एवं नशीले पदार्थों के चंगुल में फंसकर अपना अनर्थ करने लग जाता है।

हमें बुरी यादों को भुनाने की बजाय भुलाने का प्रयास करना चाहिए। जिंदगी उत्कर्ष और अपकर्ष, जय और पराजय, खुशी और गम का मिश्रित रूप है। अतः सुख और दुख प्रत्येक मनुष्य की जिंदगी में स्वाभाविक हैं। दुखों से हम भाग नहीं सकते अर्थात् उनका हमारे जीवन में आना निश्चित है। सुख भी हमसे अधिक समय तक अछूते नहीं रह सकते। इसलिए किसी मनुष्य के जीवन में सबसे ज्यादा जरूरी चीज होती है- धैर्य। एक धैर्यपूर्वक मनुष्य ही अपने दुखों के पलों को गुजार सकता है और सुख का भागी बन सकता है।

यह सर्वविदित है कि—दिन के समाप्त हो जाने पर रात्रि का आगमन होता है। सूर्य के छिपने के बाद चंद्रमा का उदय होता है। ऐसे ही सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख का अनवरत् चक्कर चलता रहता है। फिर क्यों न हम अपनी यादों में अच्छे पलों को शामिल करें और प्रकृति की भांति हमेशा खिलखिलाते और मुस्कुराते रहें। प्रकृति में हमेशा उल्लास की चहक और सुगंधित महक समाई होती है। क्यों नहीं हम अपने जीवन में प्रकृति की यह मस्ती जो लौकिक भी है और अलौकिक भी है, जो विवेक की सरगम बलिदान के गीतों में भी मधुरता भरती है को अपने जीवन में शामिल कर लें।

जब हमारा वर्तमान प्रकृति की खूबसूरती की छांव में, फूलों की तरह पल्लवित व पोषित होगा तभी हमारी यादें खूबसूरत होंगी। जब हम प्रकृति को निहारते हैं तो मानो पूरी प्रकृति एक ही धुन गुनगुनाती है—शांति की स्थापना, दूसरों की खुशी के लिए सर्वस्व का बलिदान कर देने की प्रेरणा। प्रकृति में तो यह सिलसिला हमेशा से चल ही रहा है, क्यों न हम इसे अपने जीवन में शामिल करें।

स्वयं को अत्याधुनिक कहने वाले और समझने वाले हम मनुष्यों ने, न जाने क्यों इस मस्ती से अपने को अछूता करके रखा हुआ है? प्रकृति के वे स्वर हमें क्यों नहीं सुनाई देते जो हमेशा गूंजते रहते हैं—आओ हमारे रस से जिंदगी की नीरसता, हमारी उमंग से जीवन की उदासी, हमारी सम्पन्नता से अपनी दीनता दूर करो। हमारे सानिध्य में आकर उल्लास पूर्ण और गौरवमय जीवन का आनंद लो।

क्या हमारा मन नहीं करता कि—हम प्रकृति के संपर्क में जाकर उस ताजी हवा का आनंद लें जो हमारे मन में गुदगुदी पैदा करे, हलचल मचा दे। हम भी फूलों की तरह खिल उठें, महक उठें। हम आम के बोर की तरह खिल उठें, चिड़ियों की तरह चहक उठें। दिल में एक हूक उठे, जो कोयल की सी कूक बनकर वातावरण में मस्ती बिखेर दें। सरसों के पौधों की तरह झूम उठें, नव पल्लवों की तरह थिरक उठें। सारी उदासी बह जाए, खिलखिलाहटें बिखर पड़ें। लेकिन यह सब तब होगा जब अंदर रस बहे।

रस तो हमारे मस्तिष्क में जम गया है— नकारात्मकता का, बुरी यादों का। आत्मविकास के धोखे में स्वार्थ ने डेरा डाल रखा है। आत्मीयता की जगह को अहंकार ने घेर लिया है। यह सब हुआ अविवेक के कारण—क्योंकि हमने बुरी यादों की रस्सी को जकड़ कर पकड़ा हुआ है। हम अविवेक के कारण यह नहीं समझ पाए कि हम अपनी जीवन रूपी यात्रा में अच्छी यादों के घरोंदें बनाकर आगे बढ़ते जाएंगे, तो बुरी यादों को हमारे मस्तिष्क में स्थान ही नहीं मिलेगा।

हमें बीती ताहि बिसार दे, की कहावत को चरितार्थ करते हुए बुरी यादों को भुलाकर केवल अच्छी यादों को अपने जीवन में स्थान देना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन के खट्टे- मीठे अनुभवों से सबक लेकर अपने जीवन को गति देनी चाहिए। यादों के झरोखे हमेशा खुले रखने चाहिएं। जिससे अगर कुछ यादें परेशान करें भी तो उन झरोखों से बाहर निकालने में आसानी हो। अपनी अच्छी यादों को हमेशा स्मरण करते रहना चाहिए। अपने मित्रों एवं सगे संबंधियों को शामिल करना चाहिए।

102. मूर्ति-पूजा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आधुनिक युग में जब मूर्ति पूजा को अंधविश्वास माना जाता है तब भी हमारी सनातन परंपरा में मूर्ति पूजा की जाती है। आज के समय जहां आध्यात्मिक शोध और बौद्धिक बहस चरम पर पहुंच गई है, तब भी अधिसंख्य जनता अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है क्योंकि सरल हृदय भारतीय जनता मूर्तियों में मौजूद प्राण- तत्व से स्वयं के मन प्राण को जोड़े रखने में सफल रही है।

यहां रामकृष्ण परमहंस जैसे विलक्षण संत हुए, जो मां काली की मूर्ति से घंटों बातें करते थे। प्रारंभ में लोग उन्हें गलत समझते थे, वे उन्हें पागल भी कहते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनको समझ आया कि राम कृष्ण के भीतर कुछ घटित हो गया है। मां काली को भोग लगाना उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा था। भोजन की थाली लेकर मंदिर के गर्भ गृह में घुसते तो यह निश्चित नहीं होता था कि वह कब बाहर निकलेंगे। एक दिन उनकी पत्नी शारदा उन्हें ढूंढते हुए मंदिर में पहुंच गई। श्रद्धालु जा चुके थे और परमहंस गर्भग्रह के भीतर भोग लगा रहे थे। उन्होंने दरवाजे की दरार से अंदर झांका तो वह अंदर का नजारा देखकर स्तब्ध रह गई कि साक्षात् मां काली रामकृष्ण के हाथों से भोजन ग्रहण कर रही थी।

मौजूदा समय में करोड़ों लोग मूर्ति पूजा में लगे भी हुए हैं और विरोध भी कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने मूर्ति को बस मूर्ति में तो देखा, पर अपने में वह मूर्ति नहीं देख पाए। हमारी जो मान्यता है, धारणा है, वह हमारी बनाई हुई मूर्ति ही है, जिसकी पूजा हम 24 घंटे करते रहते हैं और लोगों से भी यही आशा करते हैं कि लोग उसी की स्तुति करें उसी का गुणगान करें। हमारी कृति, हमारा सर्जन, हमारा धर्म, हमारी परंपराएं, हमारी अपनी कल्पना से पोषित स्वनिर्मित मूर्तियां हैं। हम इसे ऐसे भी कह सकते हैं जैसे कोई मूर्तिकार अपनी बनाई मूर्ति के स्थान पर, अपनी ही पूजा की इच्छा करने लगे और इच्छा पूरी न होने पर मूर्ति- पूजा का विरोध करने लगे।

ईश्वर निराकार है, यह भी तो एक धारणा ही है। निराकार की धारणा जब तक साकार का चोला ओढ़कर आधार नहीं लेगी तो वह खड़ी कहां होगी अर्थात् हम जिस आदर्श की पूजा कर रहे हैं, वह कभी हमारे बीच मौजूद था यह नहीं स्वीकारेंगे तो पूज्य कौन होगा? भावना को कोई मूर्त रूप दिए बगैर हम न तो पूजा कर सकते हैं और न ही किसी आदर्श की स्थापना कर सकते हैं।
जैसे कोई अविवाहित कन्या अपने हृदय में अपने होने वाले पति का एक काल्पनिक चित्र उकेर लेती है जो निर्गुण और निराकार होता है क्योंकि वह प्रत्यक्ष नहीं होता पर समय आने पर वह अपने उन पूर्व कल्पित गुणों को साकार देखती है तो वह हृदय से उसका वर्णन कर लेती है। यही है हमारी वह सनातन परंपरा और अनेक देव- देवताओं की मूर्ति पूजा का आधार क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अभिरुचि होती है। उसका अपना लक्ष्य होता है‌। जब साधन और साध्य में रुचि का सामंजस्य हो जाता है तो अभीष्ट सिद्धि में सहजता आ जाती है।
माता सीता ने जो आकार अपने पति का बनाया था, वही साकार होने का आशीर्वाद उन्हें पार्वती जी से भी मिला था। यही है निराकार का साकार होना और मूर्ति पूजा का परम सत्य।

हमारी सनातन परंपरा में हजारों वर्ष पहले ही भगवान के प्रति अपने भावों की एकाग्रता और उनसे संवाद के लिए मूर्ति पूजन की परंपरा का विकास हुआ था। तब से लेकर आज तक यह परंपरा अटूट और अविच्छिन्न है। यह तब भी अटूट रही, जब ईशा के प्रारंभिक वर्षों में विश्व के अनेक भागों में एकेश्वरवाद पनपा और यह तब भी अटल रही, जब ईशा के छठवीं शताब्दी में इस्लाम का प्रचार हुआ। मूर्तियों को तोड़ा गया। मंदिरों को तहस-नहस कर दिया गया। मूर्ति- पूजा का विरोध किया गया और मूर्ति- पूजा करने वालों के लिए सजा का प्रावधान रखा गया, फिर भी हमारी सनातन परंपरा कम होने की बजाय और ज्यादा दृढ़ता के साथ खड़ी रही। जिस दौर में अपने-अपने एकेश्वरवाद के घमण्ड में धर्मयुद्धों के रूप में रक्तपात जारी था, तब भी हमारी सनातन परंपरा कम नहीं हुई बल्कि सगुण भक्ति और मूर्तियों में अपने इष्ट के साक्षात्कार का भाव हमारे अंदर यथावत जारी रहा।

दरअसल सनातन परंपरा में मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा का विज्ञान हजारों साल पहले से ही मौजूद रहा है। इसलिए यहां मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करने का विधान है। हमारी मूर्तियां में अटल श्रद्धा है। इसी कारण हम मूर्तियों में अपने इष्ट के साक्षात् दर्शन करते हैं।

101. पाएं, मन पर नियंत्रण

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में वही व्यक्ति श्रेष्ठ होता है जो मन को नियंत्रित कर लेता है। जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली, वही जिंदगी की रेस में विजेता बनता है। किसी दूसरे पर विजय प्राप्त करने से पहले स्वयं पर और अपने मन पर विजय प्राप्त करना परम आवश्यक है। मन से ही हमें सुख और दुख की अनुभूति होती है। अगर हम जीत जाते हैं तो हम सुखी हो जाते हैं और हार जाते हैं तो हमें दुख होता है। हार और जीत का निर्धारण करने वाला हमारा मन ही है। हमारा मन ही है जो हमें विजय और पराजय का अहसास करवाता है।

एक कहावत भी है— मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत अर्थात् जब हम मन से हार जाते हैं तो हमें कोई भी विजय प्राप्त नहीं करवा सकता, अगर मन से जीत जाते हैं तो कोई नहीं हरा सकता।

इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने मन को नियंत्रण किया और इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम अंकित करवाया। हमारे देश में अनेक सिद्ध पुरुष हुए हैं, जिन्होंने मन को नियंत्रित करने की अनेक युक्तियां बताई हैं और स्वयं मन को जीतकर दिखाया है।

विम हाफ एक महान डच एथलीट हैं। वे जमा देने वाले तापमान में अपनी बेहतरीन प्रतिभा व जज्बे को दर्शाने के लिए विश्व भर में मशहूर हैं। उन्होंने बर्फ के भीतर तैराकी ओर लंबे समय तक बर्फ के साथ रहकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। नंगे पांव बर्फ पर मैराथन का भी रिकॉर्ड बनाया है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में ऐसी गतिविधियां आपको चौंका रही होंगी, पर यही तो है, इंसानी जज्बे और दिमाग का कमाल। जिसकी कोई सीमा नहीं। कुछ भी संभव है।
जब उनसे पूछा गया कि आप यह सब कुछ कैसे कर लेते हो तो उन्होंने कहा—जब आप अपने मन को नियंत्रण करना सीख लोगे तब आप वह सब कुछ कर पाओगे, जिसके बारे में दुनिया कहती है कि—यह संभव नहीं है।
अगर आपको लगता है कि मेरी क्षमता इतनी ही है तो आप उसमे भी अधिक क्षमतावान् हैं। यही मेरी सोचने की प्रक्रिया है और इसी को मैं मकसद बनाकर आगे बढ़ता हूं।
मैं मरने से नहीं डरता हूं। बस मुझे इसकी चिंता है कि एक अच्छा जीवन कैसे जी लूं।

इस सत्य को नहीं नकारा जा सकता कि मन पंछी की तरह चंचल होता है। उसे पिंजरे में कैद करके रखना अव्यवहारिक है। उसे खुले आकाश में उड़ने देना चाहिए। यही मन का स्वभाव है, परंतु मन को नियंत्रित करने वाली डोर हमें मजबूती से पकड़ कर रखनी चाहिए। यदि यह डोर हाथों से छूट गई तो मन अनियंत्रित हो जाएगा। अनियंत्रित मन भटकाव पैदा करता है, जिससे शंकाएं जन्म लेती हैं। मन में भटकाव पैदा होने से सफलता हमारे से मीलों दूर चली जाती हैं। दूसरी तरफ मन में विश्वास उत्पन्न करने से ही हम विपरीत परिस्थितियों में लड़ पाते हैं।

मन की स्वतंत्रता जरूरी है लेकिन मन की बातों को विवेक के तराजू पर तोलकर ही कार्य रूप में परिणत करना चाहिए। अगर हम ऐसा कर पाए तो परिणाम सदैव सुखद एवं कल्याणकारी होता है। जब एक व्यक्ति प्रसन्न होता है तभी वह दूसरों को प्रसन्नता बांट सकता है। थका हारा मनुष्य सदैव विषाद से घिरा रहता है। उसमें नकारात्मकता का सीधा प्रभाव देखा जा सकता है। सकारात्मकता रूपी ताकत हमारे अंदर विद्यमान है। हम अपनी इसी अंदरूनी ताकत के बदौलत दुनिया की किसी भी मुश्किल से बाहर आ सकते हैं। यदि हम अपने मन को नियंत्रित करना सीख गए तो हम में आत्मविश्वास भी आएगा जिससे जीत सुनिश्चित है।

100. श्रेष्ठ है घमंडरहित परोपकार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आपने अक्सर देखा होगा कि हम दान देते हुए भी पब्लिसिटी पाना चाहते हैं। हम अगर किसी भी भिखारी को ₹1 का सिक्का भी देते हैं तो अपने चारों तरफ नजर दौड़ाते हैं कि हमें कितने मनुष्य देख रहे हैं ताकि हम उनके मध्य एक परोपकारी और श्रेष्ठ मनुष्य सिद्ध हो सकें। परोपकार से अभिप्राय दूसरों की सहायता करने से है, संसार का भला करने से है। किसी की सहायता करते समय हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे बिना भी यह संसार बड़े अच्छे से चलता रहेगा। हमें किसी की सहायता करने के लिए माथापच्ची करने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी हमें सदैव परोपकार करते ही रहना चाहिए।
यदि हम हमेशा यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना एक सौभाग्य है तो परोपकार करने की इच्छा एक सर्वोत्तम प्रेरणा शक्ति है।

एक दाता के रूप में खड़े होकर और अपने हाथ में कुछ सिक्के लेकर कभी यह नहीं कहना चाहिए कि भिखारी लो, मैं तुझे यह देता हूं। हमें तो स्वयं इस बात के लिए कृतज्ञ होना चाहिए कि संसार में हमें अपनी दयालुता का प्रयोग करने का अवसर प्राप्त हुआ है। धन्य पाने वाला नहीं, देने वाला होता है। सभी भलाई के कार्य हमें एक अच्छा मनुष्य बनने में सहायता करते हैं। हम आखिर अधिक से अधिक कर ही क्या सकते हैं? अस्पताल बनवा सकते हैं, रोड़ बनवा सकते हैं, स्कूल खुलवा सकते हैं, कुछ पैसे देकर किसी गरीब की सहायता कर सकते हैं या कोई और समाज सुधारक कार्य में अपना सहयोग दे सकते हैं, परंतु क्या यह सब करने से हम परोपकार करने में सफल हो गए? आंधी का एक झोका तुम्हारी सारी इमारतों को 5 मिनट में नष्ट कर सकता है। भूकंप तुम्हारी तमाम सड़कों को, अस्पतालों, नगरों और इमारतों को धुल में मिला सकता है। इसलिए संसार की सहायता करने की खोखली बातों को हमें मन से निकाल देना चाहिए। फिर भी हमें निरंतर परोपकार करते रहना चाहिए। क्योंकि इसी में हमारा भला है। यही एक साधन है, जिससे हम पूर्ण बन सकते हैं। वास्तव में देखा जाए तो उसका हम पर आभार है क्योंकि उसने इस बात का अवसर दिया कि हम अपनी दया की भावना उसके काम में ला सकें।

घमंड रहित परोपकार की भावना से भरा हुआ, लोकहित के लिए अपने शरीर को भी त्यागने वाला, मनुष्य के रूप में एक सिद्ध पुरुष हुआ है —महर्षि दधीचि।
एक बार की बात है कि महर्षि दधीचि कठोर तपस्या कर रहे थे। उनके तप के तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठे।इंद्र को लगा कि महर्षि उससे इंद्रासन छिनना चाहते हैं। इसलिए उनकी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव और एक अप्सरा को भेज दिया लेकिन वे विफल रहे। तत्पश्चात् वे उन्हें मारने के लिए स्वयं गए। लेकिन उनके अस्त्र-शस्त्र महर्षि के सामने बौने साबित हुए अर्थात् वे उन्हें भेद न सके। वे समाधिस्थ ही रहे। हार कर इंद्र लौट गए।

कुछ समय पश्चात् वृत्रासुर ने देवलोक पर कब्जा कर लिया। देवराज इंद्र प्रजापति ब्रह्मा के पास वृत्रासुर का सर्वनाश करने का उपाय पूछने के लिए गए। तब प्रजापति ब्रह्मा ने इंद्र को बताया कि— वृत्रासुर का अंत महर्षि दधीचि की हड्डियों से बने अस्त्र से ही संभव है। उनके पास जाकर उनकी अस्थियों के लिए याचना करो। महर्षि दधीचि इस समय समाधिस्थ हैं। इंद्र पसोपेश में पड़ गए कि जिन्हें वह मारने गए थे, वे उनकी सहायता क्यों करेंगे? लेकिन और कोई रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था, कुछ तो करना ही पड़ेगा और यह सोच- विचार, करते- करते थक हारकर अंत में दधिचि के पास पहुंचे और तीनों लोकों के मंगल हेतु अस्थियों की याचना करने लगे।
महर्षि विनम्रता से बोले— हे इंद्रदेव, लोकहित के लिए मैं तुम्हें अपना शरीर दान करता हूं। यह कहकर महर्षि ने योग विद्या से अपना शरीर त्याग दिया। उनकी अस्थियों से बने अस्त्र से इंदर ने वत्रासुर का वध किया।

99. बचें, परनिंदा से

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

संसार में कोई भी वस्तु मूल्यहीन और अनुपयोगी नहीं है। ईश्वर ने कुछ सोच समझकर ही प्रत्येक जीव की रचना की है। लेकिन मनुष्य की रचना विशेष गुणों के साथ की गई है। सबकी अपनी- अपनी आवश्यकताएं हैं। निंदा करने वाला मनुष्य अगर ईश्वर के कार्य में सहयोगी नहीं है तो उसे यह अधिकार भी नहीं है कि ईश्वर के कार्य में नास्तिक बन कर हस्तक्षेप करे। क्योंकि यहां विश्व रूपी उद्यान में सभी जीव ईश्वर के ही अंश हैं। यदि हम किसी की रचना नहीं कर सकते, किसी का भला नहीं कर सकते तो उसे बिगाड़ने का कार्य भी नहीं करना चाहिए।

किसी की भी निंदा करना एक दुर्गुण है। निंदा करने की आदत सबसे खराब प्रवृत्ति होती हैै। इस संसार में प्रत्येक मनुष्य किसी के लिए बहुत अच्छा है तो किसी के लिए बहुत बुरा भी है। अगर वह हमारे लिए बुरा है तो इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि वह सभी के लिए बुरा होगा, किसी न किसी के लिए तो वह अच्छा जरूर होगा। हम उसको केवल बुरा समझ कर उसकी निंदा करने का अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते। मैं तो अच्छा हूं, पर वह बुरा है इसलिए मैं उसकी निंदा करता हूं, यह बिल्कुल भी ठीक नहीं है। क्योंकि अच्छाई और बुराई दोनों साथ-साथ चलते हैं।

जिस प्रकार अग्नि स्वयं में अच्छी भी है और बुरी भी है। जब हमें सर्दी लगती है और यह हमें गर्म करती है, उस समय यह हमारे लिए बहुत अच्छी होती है, क्योंकि उस समय इसकी हमें जरूरत होती है। लेकिन जब यह हमारी अंगुली को जला देती है तो यह हमारे लिए बुरी होती है। हम इसे दोष देने लगते हैं और निंदा करने लगते हैं। यही हाल मनुष्य का भी है, इस संसार में सभी मनुष्य अपना प्रयोजन पूर्ण करना चाहते हैं। अगर उसका स्वार्थ सिद्ध हो जाता है तो वह मनुष्य उसके लिए अच्छा होता है, वरना बुरा होता है । ऐसे में वह हर जगह, हर स्थान पर उसकी निंदा करना शुरू कर देता है।

हर समय निंदा करने वाले मनुष्य के जीवन में नकारात्मक भाव उत्पन्न हो जाता है। ऐसे लोगों की भावना और विश्वास दूषित होने लगते हैं। इस दुर्गुण के कारण अपना भी पराया बन जाता है और यही दुर्गुण चिंतन और चरित्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करता है। निंदा करने वाला मनुष्य दुष्ट होता है और प्रशंसा करने वाला सज्जन। लेकिन जो मनुष्य ईश्वर को मानता है, अपने आपको ईश्वर का अंश समझता है, वह मनुष्य भूल कर भी किसी दूसरे मनुष्य की निंदा नहीं करता है क्योंकि उसे प्रत्येक के अंदर अपने इष्ट की छवि ही दृष्टिगोचर होती है। किसी मनुष्य की निंदा करते हैं तो इसका मतलब है कि हम ईश्वर की शिकायत कर रहे हैं, क्योंकि मनुष्य की संरचना ईश्वर की अद्वितीय कृति है। इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ईश्वर ने हम मनुष्यों के हाथों में सौंपी है, क्योंकि संसार के सभी प्राणियों में चेतनशील प्राणी सिर्फ मनुष्य ही है।

दूसरों की निंदा करने से पहले हमें अपने अंतर्मन में झांक लेना चाहिए और अपने आचरण की समीक्षा कर अपने दुर्गुणों को ढूंढना चाहिए कि हमारे अंदर कितनी बुराइयां और अवगुण भरे पड़े हैं। हमें अपनी कमी समझ में आ जाएगी और उस दिन से हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव आने लग जाता है क्योंकि उस दिन से हम अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न करने लगते हैं और फिर इस संसार को भी ईश्वर का स्वरूप समझने लगते हैं। फिर हम भूल कर भी किसी मनुष्य की निंदा नहीं करते क्योंकि उस दिन हमारी अंतरात्मा में ज्ञान की लौ जल चुकी होती है।

98. जीवन और संघर्ष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन है तो संघर्ष है। संपूर्ण मानव जीवन ही संघर्ष का पर्याय है। संघर्ष जीवन के साथ ही प्रारंभ होता है और जीवन पर्यंत चलता रहता है। इसलिए संघर्ष को जीवन का सत्य मानकर प्रत्येक व्यक्ति को उसे सहर्ष स्वीकार करते हुए अपने जीवन का हिस्सा बना लेना चाहिए। यह भी सच है कि जब हम संघर्ष करते हैं, तभी हमें अपनी क्षमता और सामर्थ्य का पता चलता है। क्योंकि संघर्ष ही जीवन को तरासता, निखारता और संवारता है। संघर्ष से ही मनुष्य सही अर्थों में जीना सीखता है। कठिनाइयों से पार कैसे पाया जाए, यह संघर्ष ही सिखाता है। संघर्ष करने से ही मनुष्य में अनुभव आता है और उस अनुभव से ही वह जीवन जीना सीखता है।

संघर्ष ही है जो हमें जीवन में आने वाली बाधाओं और कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। बगैर संघर्ष तो जीवन उस तितली के समान है, जो ताउम्र उड़ान नहीं भर सकी।
एक बार की बात है तितली का एक बच्चा ककून (खोल) से बाहर आने के लिए संघर्ष कर रहा था। एक व्यक्ति वहां बैठा हुआ था और वह तितली के बच्चे के उस संघर्ष को देख रहा था। बहुत समय व्यतीत हो चुका था, पर ककून से बाहर निकलती नन्ही तितली लगातार प्रयास कर रही थी। लेकिन बाहर नहीं निकल पा रही थी। उस व्यक्ति से उसका कष्ट देखा नहीं गया। बिना देर लगाए उसने कैंची ली और ककून के शेष बचे हुए हिस्से को काट कर तितली को बाहर निकाल दिया। बाहर निकली नन्ही तितली के पंख अभी विकसित नहीं हुए थे। शरीर भी सुझा हुआ था। उस व्यक्ति ने महसूस किया कि उसने मदद के नाम पर कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है। वह समझ गया था कि ककून से बाहर आने के लिए दरअसल, तितली को जिस संघर्ष की जरूरत थी, वह नहीं कर सकी। वह एक अनिवार्य प्रक्रिया थी जो पूरी नहीं होने के कारण तितली ताउम्र उड़ान नहीं भर सकी। जिस प्रकार तितली के विकास के लिए संघर्ष जरूरी है, उसी तरह हमारी शक्तियां भी ऐसे ही दुरूह संघर्ष के दौरान ही विकसित होती हैं। इसलिए जीवन में बाधाएं और चुनौतियां जरूरी है।

एक जापानी कहावत है कि— पत्थर और पानी के बीच संघर्ष में अंतत: पानी जीतता है। संघर्ष के महत्व को ध्यान रखते हुए हमें यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि अक्सर जीवन में संघर्ष और कठिनाइयां हमारे आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए ही होते हैं। संघर्ष से हमें बिल्कुल भी भयभीत नहीं होना चाहिए। कितनी भी बड़ी मुश्किल और विषम परिस्थितियां क्यों ना हो, विजय हासिल करने का एक ही विकल्प है कि पूरे आत्मविश्वास के साथ संघर्ष करना। जो संघर्ष से बच कर चलते हैं, वे कायर होते हैं। दूसरी तरफ जो व्यक्ति संघर्ष का स्वागत करता है, वह एक न एक दिन सफल होकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।

दरअसल संघर्ष एक ऐसा अनुभव है, जिससे हम सब परिचित है। लक्ष्य प्राप्ति या किसी क्षेत्र में कामयाबी इस अनुभव के बिना नहीं मिल सकती। यह वह कुंजी है, जिससे कामयाबी की राह खुल सकती है। संघर्ष से आपको भले ही कड़वा अहसास मिला हो, उसके कारण स्वयं को पीड़ित महसूस करते हों, पर एक समय के बाद स्वयं देखना यही हमें मंजिल तक पहुंचाहता है। यह हमें ऐसे सांचे में गढता है, जो हमें समाज में एक पहचान देता है। यह हमें हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि बिना संघर्ष के किसी को अपनी मंजिल नहीं मिली।

हमें यह सदैव स्मरण रखना होगा कि—बिना संघर्ष के किसी को भी अपनी मंजिल नहीं मिली। संसार रूपी सागर की ऊंची- उफनती लहरों को जिसने चुनौती देना सीख लिया, सफलता की अनुपम मणियां उसी ने बटोर ली। जो डर कर किनारे बैठ गया, वह तो जीवन से ही हार गया। इसलिए हमें जीवन में संघर्षों का स्वागत करना चाहिए। जो भी मनुष्य महान बने हैं, यह संघर्ष करके ही इतिहास में अपना नाम दर्ज कर पाए। क्योंकि उन्होंने संघर्ष के सामने घुटने नहीं टेके। संघर्ष इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह हमें बताता है कि किसी उपलब्धि व सफलता को प्राप्त करने लिए हमें कितना परिश्रम और पुरुषार्थ किया है। तभी हम उस उपलब्धि का महत्व और मूल्य समझ पाते हैं।

97. शांति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

महावीर स्वामी ने कहा— हम शांति से जिएं और दूसरों को भी शांति से जीनें दें।
हम सब के जीवन का सिद्धांत भी यही होना चाहिए। अगर देखा जाए तो यही विश्व कल्याण का मंत्र है। विश्व का कल्याण शांति के मार्ग पर चल कर ही संभव हो सकता है। क्योंकि जहां शांति है वहां राग- द्वेष, असहिष्णुता, शत्रुता, दुख ऐसा कुछ भी नहीं होता। जहां शांति है, वहां संघर्ष कभी नहीं होते। तमाम महापुरुषों ने शांति की खोज में अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय लगा दिया। उन्होंने शांति के लिए जीवन के सारे सुख साधन और वैभव को त्याग दिया। क्योंकि शांति में जो सुख है उसके सामने समस्त महलों का सुख भी धूल के समान है।

महात्मा बुद्ध ने शांति की खोज में अपना सारा जीवन लगा दिया। उनके अमृतमयी उपदेशों में कहा गया है कि— हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाए। संवाद वही उत्तम होता है जो शांति का मार्ग प्रशस्त करे, जो शांति तक पहुंचाए। शांति से हमें असीम ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यह हमारे अंतः करण में सकारात्मक भाव का स्त्रोत प्रस्फुटित करती है। जिससे हमारे विचार पावन हो जाते हैं। शांति के द्वारा हमारे सकारात्मक विचार पोषित होते हैं। हमारा शांत व्यक्तित्व ही हमें दया और प्रेम के मार्ग की ओर उन्मुख करता है। शांति से ही संपन्नता का आगमन होता है।

हम शांत कैसे रह सकते हैं? जिसे देखो वही तनाव में रहता है। क्रोध और ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता है। ऐसे में हमें बिल्ली से सीखना चाहिए। बिल्ली को देखिए वह कितनी देर तक शांत और चुपचाप बैठी रहती है। खूब आराम करती है, ज्यादा तनाव नहीं लेती। आप भी बिल्ली की तरह चुपचाप बैठ कर देखिए। अपने किसी भी कार्य में जल्दबाजी मत करिये। संयम बरतेगें तो आप जरूर धीरे चलने का अर्थ समझ जाएंगे। बिल्ली शिकार पकड़ने के लिए चौकस ही नहीं रहती। नए-नए उपाय भी सोचती रहती है। उसके लिए जोखिम लेती है। आपको भी जब अवसर मिले, उस अवसर का भरपूर फायदा उठाना चाहिए। वह नींद खूब लेती है आपको भी अपने स्लीप पैर्टन के अनुसार सोना चाहिए। सावधान और चौकन्ना रहना भी बिल्ली से सीख सकते हैं। आपने बिल्ली को गुस्सा करते हुए भी खूब देखा होगा, पर वह तुरंत शांत भी हो जाती है। इसलिए गुस्सा आए तो उसे नियंत्रित करने की कोशिश करें।

आपने अक्सर सुना होगा कि सभी शांति की तलाश में हिमालय पर्वत पर जाने की बात करते रहते हैं। हिमालय की महानता उसकी उन्नत पर्वत श्रृंखलाएं नहीं, उसकी रजत सदृश आभा नहीं, उसका विस्तार नहीं, उसका विराट स्वरूप नहीं बल्कि हिमालय की महानता उसका शांत स्वरूप है। उसकी विनम्रता है। तभी तो सभी हिमालय पर जाकर शांति प्राप्त करने की बात करते हैं। वह शांति जिसकी प्राप्ति के लिए सभी भटकते रहते हैं। शांति की खोज निश्चित ही देवत्व की खोज है। ईश्वर को शांति प्रिय है। जिसे शांतिप्रिय है वह ईश्वर का कृपा पात्र है। शांति का भाव प्रेम और बंधुत्व को जन्म देता है।

96. दुर्लभ मानव तन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने उद्धार के लिए भगवान का परम पद पा सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। मनुष्य अपने जीवन की गति को परम गति और अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन कर सकता है। यह मानव तन बड़ा दुर्लभ है। इसे प्राप्त करने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। उन्हें मानव की तरह कर्म की महान शक्ति प्राप्त नहीं है।

जप, तप, ध्यान, योग और बुद्धि द्वारा मनुष्य परमात्मा की गोद में बैठने का अधिकार प्राप्त कर सकता है। इसमें जरा भी संदेह नहीं है, लेकिन वह ऐसे भ्रम जाल में जीवन भर फंसा रहता है, जहां से निकलने का अवसर ही नहीं मिलता। मनुष्य प्रतिक्षण अपने तन के सुख में ही डूबा रहना चाहता है। उसे अपनी आत्मा के साथ रहने में अच्छा नहीं लगता बल्कि उसे आत्मा से दूर रहने में सुख की अनुभूति होती है।

ऐसे कुचक्र में फंस कर मनुष्य अपने जीवन के स्वर्णिम समय को व्यर्थ गंवा देता है। वह केवल खाने-पीने, हंसने- गाने, घर-परिवार और वैभव के ही उपायों में दिन- रात डूबे रहने में ही आनंदित महसूस करता है। वह झूठे सुख को सच और सच्चे आनंद को झूठ समझने की भूल करता है। अगर ऐसा न होता तो यह मनुष्य शरीर व्यर्थ न होता। इस तन की महिमा ऋषियों और मुनियों ने हर युग में बताई है।

हमें इस दुर्लभ मानव तन की महत्ता को समझना होगा। यह तन ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक बहुमूल्य खजाना है। जिसे संभालना और संरक्षित करना मनुष्य के हाथ में है। इसे श्रेष्ठ बनाने के लिए हमें राष्ट्र की रक्षा, समाज सेवा और प्रत्येक जीव के कल्याण के अनेक उपाय करने चाहिए। प्रेम, परोपकार, दान, त्याग, धर्म, पराक्रम, शील, क्षमा, ज्ञान को कर्म की धरा पर, गंगा की धारा बनाकर प्रवाहित करना चाहिए।

इस दुर्लभ मानव तन को प्राप्त करने के बाद हमें समय की महिमा को अच्छी तरह से समझना चाहिए। इसे व्यर्थ के कार्यों में नहीं लगाना चाहिए। बल्कि प्रत्येक क्षण का भरपूर फायदा उठाना चाहिए।
एक बार ग्रीस के दार्शनिक, सुकरात से कोई परिचित मिलने आया। वह सुकरात को, उसके मित्र के बारे में बताने आया था, पर सुकरात ने उसकी बात सुनने से पहले तीन शर्ते रखी—
1 वह बात सच हो, जिसके बारे में उसका परिचित आश्वस्त हो।
2 वह बात अच्छी हो।
3 वह बात उपयोगी भी हो।
पर परिचित उक्त तीनों शर्त पूरी नहीं कर पा रहा था। दरअसल उसने सुकरात के मित्र की आलोचना किसी अन्य व्यक्ति से सुनी थी। इसलिए उसे सच नहीं कहा जा सकता था। इसी प्रकार बाकी की दोनों शर्तों पर भी वह खरा नहीं उतर सका था। क्योंकि वह बात न अच्छी थी और न ही उपयोगी।
तीनों शर्तों पर असफल होने के बाद सुकरात ने उनसे पूछ लिया कि जो बात न सच है,न अच्छी है और न उपयोगी तो आप मुझे क्यों सुनाना चाहते हो?
अब उसके पास कोई जवाब नहीं था।
कहने से तात्पर्य यह है कि इस दुर्लभ तन को पाकर हमें अपने समय को बर्बाद नहीं करना चाहिए बल्कि ऐसे कार्य करने चाहिएं, जिससे समाज में प्रतिष्ठा मिले और साथ ही साथ हमें आवागमन के चक्कर से छुटकारा प्राप्त हो। जिस दिन मनुष्य इस दुर्लभ तन रूपी खजाने को समझ लेगा, उस दिन उसकी यात्रा प्रारंभ हो जाएगी।

95. कर्मों की गति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह सार्वभौमिक सत्य है कि— प्रत्येक मनुष्य के भाग्य का निर्माण उसके कर्म ही करते हैं। इसलिए मनुष्य ही स्वयं का भाग्य विधाता है। भाग्य के निर्माण में कर्मों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्योंकि कर्म ही निर्णायक होते हैं। मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी के अनुसार उसके भाग्य का निर्माण होता है।
शास्त्रों में कर्मों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है—
1 क्रियमाण
2 संचित
3 प्रारब्ध

क्रियमाण—कर्म वे होते हैं जो तत्काल फल देते हैं यानी कर्म करते ही उसका फल तुरंत मिल जाता है, इनका औचित्य भी समझ आ जाता है। जैसे अगर कोई विष खा लेता है तो तुरंत उसका प्रभाव दिखाई देता है। इसलिए क्रियमाण कर्म वे होते हैं जो वर्तमान में किए जाते हैं और जिनका फल भी उसी समय मिल जाता है। वास्तव में जो कर्म शरीर के किसी अंग द्वारा किए जाते हैं, उन्हें हम क्रियमाण कर्म कह सकते हैं।

संचित—हमारे दूसरे कर्म होते हैं, संचित कर्म। इन का फल तत्काल नहीं मिलता। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के चक्र में उलझा रहता है। उसके हर जन्म के कुछ कर्म होते हैं जो भाग्य बन कर दूसरे जन्म में संचित कर्म के रूप में प्राप्त होते हैं। परंतु शास्त्र कहते हैं कि— यदि इन्हें अनुकूल परिवेश और गति मिले तो इनका फल भी शीघ्रता से मिल सकता है। अगर हम सच्चे दिल से ईश्वर का स्मरण करें और बुरे कर्म, छ्ल कपट आदि न करें तो इनका फल भी हमें शीघ्रता से ही मिल जाता है। अक्सर ऐसा होता है कि हम दिखावा करने के लिए कुत्तों को रोटी डालते हैं, पक्षियों के लिए दाना डालते हैं या कोई वस्तु दान करते हैं तो उसका फोटो खिंचवाते हैं, उस पर बड़े- बड़े अक्षरों में लिखवाते हैं कि यह वस्तु हमने दान की है यानी कि हर तरफ से पब्लिसिटी स्टंट करते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता लगे और खासकर यह ध्यान रखते हैं कि हमारे आसपास के लोगों को पता लगे कि हम काफी धार्मिक हैं। लेकिन जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां जाकर हमारा ध्यान ईश्वर पर नहीं बल्कि बाहर निकाले गए अपने जूते-चप्पलों पर होता है। हम करना तो अच्छे कर्म चाहते हैं लेकिन दिखावे के चक्कर में आकर उनका परिणाम अच्छा नहीं रहता। वहीं बुरे कर्मों की स्थिति में संचित कर्मों का फल निष्प्रभावी हो जाता है। हम एक तरफ शुभ कार्य कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ कुछ अशुभ तो संचित कर्मों का अच्छा फल नहीं मिलता जैसे एक तरफ दिखावे के लिए हम ईश्वर के नाम का जाप करें लेकिन दूसरी तरफ छल-कपट जैसे अधर्म करें तो हमारे अच्छे कर्म भी अप्रभावी हो जाते हैं।

प्रारब्ध कर्म—प्रारब्ध का अर्थ है कि पूर्व जन्म अथवा पूर्व काल में किए गए अच्छे व बुरे कर्म, जिनका वर्तमान में फल भोगा जा रहा है। प्रारब्ध कर्मों को कुछ मनुष्य भाग्य या किस्मत का नाम दे देते हैं। क्योंकि इनसे कोई महापुरुष भी नहीं बच सका। इनके प्रभाव से यकायक कुछ शुभ या अशुभ ऐसा हो जाता है कि विश्वास करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन-सा लगता है कि यह भी हो सकता है। राजा रंक हो जाता है और रंक राजा बन जाता है। प्रारब्ध के कर्मों का दुष्प्रभाव तप एवं पुरुषार्थ से कम तो किया जा सकता है, लेकिन उन्हें पूर्णता समाप्त नहीं किया जा सकता । बड़े-बड़े महापुरुषों और सिद्ध पुरुषों को भी अपने प्रारब्ध के कर्मों को भोगना पड़ा है। अक्सर मनुष्य का जन्म ही इन कर्मों को भोगने के लिए होता है।

इसलिए हमें हमेशा शुभ कर्म ही करते रहना चाहिए और जो भी यकायक घट जाए, उसे सहजता से स्वीकार करते हुए, अपने ही कर्म का फल मानकर भविष्य के लिए बेहतर कर्म करने में सलंग्न होना चाहिए ताकि आने वाले समय को सुधारा जा सके और हमारे अगले जन्म के लिए संचित कर्मों का फल हमें शुभ मिले।

95. कर्मों की गति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह सार्वभौमिक सत्य है कि— प्रत्येक मनुष्य के भाग्य का निर्माण उसके कर्म ही करते हैं। इसलिए मनुष्य ही स्वयं का भाग्य विधाता है। भाग्य के निर्माण में कर्मों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्योंकि कर्म ही निर्णायक होते हैं। मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी के अनुसार उसके भाग्य का निर्माण होता है।
शास्त्रों में कर्मों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है—
1 क्रियमाण
2 संचित
3 प्रारब्ध

क्रियमाण—कर्म वे होते हैं जो तत्काल फल देते हैं यानी कर्म करते ही उसका फल तुरंत मिल जाता है, इनका औचित्य भी समझ आ जाता है। जैसे अगर कोई विष खा लेता है तो तुरंत उसका प्रभाव दिखाई देता है। इसलिए क्रियमाण कर्म वे होते हैं जो वर्तमान में किए जाते हैं और जिनका फल भी उसी समय मिल जाता है। वास्तव में जो कर्म शरीर के किसी अंग द्वारा किए जाते हैं, उन्हें हम क्रियमाण कर्म कह सकते हैं।

संचित—हमारे दूसरे कर्म होते हैं, संचित कर्म। इन का फल तत्काल नहीं मिलता। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के चक्र में उलझा रहता है। उसके हर जन्म के कुछ कर्म होते हैं जो भाग्य बन कर दूसरे जन्म में संचित कर्म के रूप में प्राप्त होते हैं। परंतु शास्त्र कहते हैं कि— यदि इन्हें अनुकूल परिवेश और गति मिले तो इनका फल भी शीघ्रता से मिल सकता है। अगर हम सच्चे दिल से ईश्वर का स्मरण करें और बुरे कर्म, छ्ल कपट आदि न करें तो इनका फल भी हमें शीघ्रता से ही मिल जाता है। अक्सर ऐसा होता है कि हम दिखावा करने के लिए कुत्तों को रोटी डालते हैं, पक्षियों के लिए दाना डालते हैं या कोई वस्तु दान करते हैं तो उसका फोटो खिंचवाते हैं, उस पर बड़े- बड़े अक्षरों में लिखवाते हैं कि यह वस्तु हमने दान की है यानी कि हर तरफ से पब्लिसिटी स्टंट करते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता लगे और खासकर यह ध्यान रखते हैं कि हमारे आसपास के लोगों को पता लगे कि हम काफी धार्मिक हैं। लेकिन जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां जाकर हमारा ध्यान ईश्वर पर नहीं बल्कि बाहर निकाले गए अपने जूते-चप्पलों पर होता है। हम करना तो अच्छे कर्म चाहते हैं लेकिन दिखावे के चक्कर में आकर उनका परिणाम अच्छा नहीं रहता। वहीं बुरे कर्मों की स्थिति में संचित कर्मों का फल निष्प्रभावी हो जाता है। हम एक तरफ शुभ कार्य कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ कुछ अशुभ तो संचित कर्मों का अच्छा फल नहीं मिलता जैसे एक तरफ दिखावे के लिए हम ईश्वर के नाम का जाप करें लेकिन दूसरी तरफ छल-कपट जैसे अधर्म करें तो हमारे अच्छे कर्म भी अप्रभावी हो जाते हैं।

प्रारब्ध कर्म—प्रारब्ध का अर्थ है कि पूर्व जन्म अथवा पूर्व काल में किए गए अच्छे व बुरे कर्म, जिनका वर्तमान में फल भोगा जा रहा है। प्रारब्ध कर्मों को कुछ मनुष्य भाग्य या किस्मत का नाम दे देते हैं। क्योंकि इनसे कोई महापुरुष भी नहीं बच सका। इनके प्रभाव से यकायक कुछ शुभ या अशुभ ऐसा हो जाता है कि विश्वास करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन-सा लगता है कि यह भी हो सकता है। राजा रंक हो जाता है और रंक राजा बन जाता है। प्रारब्ध के कर्मों का दुष्प्रभाव तप एवं पुरुषार्थ से कम तो किया जा सकता है, लेकिन उन्हें पूर्णता समाप्त नहीं किया जा सकता । बड़े-बड़े महापुरुषों और सिद्ध पुरुषों को भी अपने प्रारब्ध के कर्मों को भोगना पड़ा है। अक्सर मनुष्य का जन्म ही इन कर्मों को भोगने के लिए ही होता है।

इसलिए हमें हमेशा शुभ कर्म ही करते रहना चाहिए और जो भी यकायक घट जाए, उसे सहजता से स्वीकार करते हुए, अपने ही कर्म का फल मानकर भविष्य के लिए बेहतर कर्म करने में सलंग्न होना चाहिए ताकि आने वाले समय को सुधारा जा सके और हमारे अगले जन्म के लिए संचित कर्मों का फल हमें शुभ मिले।