192. शुभ- मुहूर्त से महत्वपूर्ण, शुभ-कर्म

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

शुभ- कर्म, शुभ- मुहूर्त से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि शुभ- मुहूर्त तो महज किसी कार्य के अच्छे परिणाम के लिए राह आसान करता है लेकिन शुभ कर्म के सदैव अच्छे ही परिणाम होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो न कभी रावण नाकामयाब होता और न ही दुर्योधन पराजित होता। रावण तो स्वयं ज्योतिष का बहुत बड़ा ज्ञाता था। वह तो प्रत्येक कार्य शुभ- मुहूर्त देखकर ही करता था, फिर वह असफल कैसे हो गया?

बहुत से लोगों को यह पता भी नहीं होगा कि श्री राम ने अपने पिता राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए एक पूजा करवाई थी। उस समय श्री राम को कोई पंडित नहीं मिल रहा था क्योंकि वे लंका में थे। तब विभीषण ने श्री राम को यह बताया था कि उनके भाई लंकेश बहुत बड़े पंडित और ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता हैं इसलिए आप उनसे पूजा करवा सकते हो। तब हनुमान जी लंकेश के पास श्री राम का संदेश लेकर गए थे और कुछ समय आनाकानी करने के बाद रावण ने श्रीराम का संदेश स्वीकार कर लिया था तत्पश्चात् स्वयं रावण ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए पूजा करवाई थी और इस पूजा के एवज में उन्होंने श्रीराम से दक्षिणा भी ग्रहण की थी।

वैसे भी सभी राजा- महाराजाओं के पास अपने खास ज्योतिषी होते थे अर्थात् शुभ समय जानने की सुविधा सभी के पास थी। दरअसल किसी शुभ समय में प्रारंभ किए गए कार्य का परिणाम अच्छा होता है लेकिन सूक्ष्मता से ऐसे शुभ क्षण को पहचानना और कार्य आरंभ करना बहुत मुश्किल होता है। आप अक्सर देखते होंगे की अच्छे ज्योतिषी से पूछने और शुभ मुहूर्त में कार्य प्रारंभ करने के बाद भी हमें नाकामयाबी हासिल होती है। इसका क्या कारण हो सकता है, कभी यह जानने की कोशिश की?

दरअसल जिनके इरादे नेक नहीं होते वे कभी भी शुभ मुहूर्त में कार्य आरंभ नहीं कर पाते। कोई न कोई अड़चन आती ही रहती है और उनका शुभ समय निकल जाता है। लेकिन जो शुभ संकल्प के साथ कार्य आरंभ करते हैं, उन्हें शुभ मुहूर्त अपने आप मिल जाता है क्योंकि ऐसे मनुष्य ईश्वर को साक्षी मानकर कार्य को प्रारंभ करते हैं। वे सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देते हैं और भला जिस कार्य में ईश्वर की मौजूदगी हो वह समय शुभ कैसे नहीं होगा और उस कार्य में कैसे सफलता प्राप्त नहीं होगी।

मुहूर्त के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं और विश्वास हैं। कहीं चौघड़िया महत्पूर्ण है तो कहीं राहुकाल। कहीं तिथि उपयोगी है तो कहीं वार। इसलिए कई बार एक क्षेत्र में जिस समय को शुभ मुहूर्त माना जाता है, किसी अन्य क्षेत्र में वही समय शुभ नहीं माना जाता। बाधारहित कामयाबी के लिए शुभ समय में कार्य शुरू करने का महत्व है लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि विश्वास, प्रसन्नता और शुभ संकल्प के साथ कार्य आरंभ किया जाए।

191. श्री कृष्ण जन्माष्टमी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में, मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस के अत्याचारों से त्रस्त भक्त जनों की पुकार पर सप्तपुरीयों में श्रेष्ठ मथुरा की दिव्य, पावन भूमि पर कंस के कारागार में 3067 ईसा पूर्व की भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के ठीक 12:00 बजे माता देवकी के गर्भ से हुआ था।

योगेश्वर श्रीकृष्ण, पुरुषशिरोमणि, कर्मवीर, प्रज्ञा और शौर्य के स्वरूप षोडश कलायुक्त भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को पूर्ण अवतार माना गया है। भारतीय संस्कृति में श्री कृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। उनका जन्म उत्सव श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में देश में ही नहीं बल्कि विश्व भर में मनाया जाता है।

श्री कृष्ण जन्म महोत्सव का प्रमुख उत्सव मथुरा की श्री कृष्ण जन्मभूमि में होता है। लोग यह कहकर झुम उठते हैं—

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।

हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की।

इसके अलावा ब्रज के सभी मंदिरों में ठाकुरजी के नयनाभिराम सिंगार होते हैं। मथुरा वृंदावन के अलावा भी सभी मंदिरों में कृष्णाष्टमी को धूमधाम से मनाया जाता है। सारा दिन भजन कीर्तन के कार्यक्रम चलते हैं और रात्रि को जैसे ही 12 बजते हैं, प्रत्येक मंदिर से शंख, घंटा, घड़ियाल आदि की आवाजें गूंजती हैं। सभी अपने- अपने ठाकुर के विग्रहों का पंचामृत से अभिषेक करते हैं और चरणामृत प्राप्त करते हैं।

शास्त्रों में कृष्ण अवतार को पूर्ण अवतार माना गया है, इसीलिए जगद् गुरु के रूप में पूरे विश्व के पथ प्रदर्शक हैं। उन्होंने पूरे विश्व को कर्मयोग का पाठ पढ़ाया। महाभारत युद्ध में उनका उपदेश युग- युगांतर तक प्रासंगिक बना रहेगा। हमारी सभी समस्याओं का तार्किक निदान भगवद्गीता में उपलब्ध है।

सनातन धर्मियों के सर्वश्रेष्ठ पुरुष के रूप में श्री कृष्ण भारतीय जीवन के आदर्श हैं। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व एक राष्ट्र पुरुष या संस्कृति पुरुष के रूप में मुखरित होता है। मानव के रूप में अवतार लेकर संपूर्ण जगत का कल्याण किया। उन्होंने स्वयं गीता में उद्घोष किया कि—
जब- जब पापियों द्वारा धर्म की हानि होती है ,तब- तब मैं उसकी पुनर्स्थापना के लिए, पृथ्वी पर अवतार लेकर दुष्टों का दमन करता हूं।

द्वापर युग में भी जब कंस के अत्याचारों से पृथ्वी पर पापियों का भार बढ़ता जा रहा था। सर्वत्र अन्याय और अधर्म का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। संत समाज त्राहिमाम्- त्राहिमाम् कर रहा था। ईश्वर का स्मरण करने वालों को कठोर यातनाएं दी जा रही थी। ऐसे संकटकाल में श्री हरि विष्णु का कृष्ण अवतार में प्राकट्य हुआ क्योंकि जन कल्याण हेतु उनका रचना विधान है। राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोपरि है।

मानवता की पीड़ा को समाप्त करने के लिए धर्म एवं सत्य की पुनर्स्थापना के लिए और दुष्टों के पाप से धरा को मुक्त करने के लिए वे प्रकट होते हैं। अत्याचारियों का विनाश कर पृथ्वी पर शांत, समृद्ध राज्य की स्थापना कर वे उद्घोष करते हैं कि— जब-जब मनुष्यता त्रस्त होगी, अत्याचार बढ़ेगा तब कोई महामानव उद्धार हेतु प्रकट होगा। वे सख्त संदेश दे रहे हैं कि— पृथ्वी पर अत्याचार के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानवता के कल्याण के लिए लगा दिया क्योंकि लोकोपकार उनके जीवन का लक्ष्य है।

उनके अवतरण के समय देवताओं ने हर्षध्वनि से पुष्प वर्षा की। सभी दिशाओं में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर थी, चारों तरफ मनमोहक छटा बिखर रही थी, मानों बाहें फैलाकर उनका स्वागत कर रही हों। पक्षियों का कलरव ऐसा लग रहा था जैसे मंगल गीत गा रहे हों। नदियां अपने पूरे उफान पर थी, यमुना नदी ने तो बालक श्रीकृष्ण के चरण धोकर उनका स्वागत किया। श्री कृष्ण का प्राकट्य सृष्टि की वचनबद्धता से प्रेरित था। जब प्राकृतिक व्यवस्था का उल्लंघन होने लगे, नैसर्गिक नियम ध्वस्त हो जाएं, नैतिक मूल्यों का पत्तन हो जाए, तब वसुंधरा पर सामान्य संतुलन को स्थापित करने के लिए भौतिक परिवर्तन अनिवार्य है जो दैवीय विधान है।

श्री कृष्ण ने इस धरा पर जन्म लेने के पश्चात् अपनी लीलाओं से संसार को जीने की कला सिखाई। पृथ्वी पर 120 वर्षों तक निवास करने के पश्चात बैकुंठ धाम लौट गए। उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन काल में समाज को विभिन्न रीति-विधान, कला ज्ञान, व्यवहार आदि की शिक्षा दी। उनका चरित्र बहुआयामी है। कभी वह बाल रूप में नंदरानी को मातृत्व सुख प्रदान करते हैं तो कभी ग्वाल बालों के साथ, उनके सखा के रूप में लीला करते हुए राक्षसों का वध करते हैं। कभी वह यमुना में स्नान करती हुई गोपियों को शिक्षा देते हैं तो कभी कुरुक्षेत्र में वीर अर्जुन को उपदेश देकर विश्व को एक महानतम ग्रंथ भगवद् गीता प्रदान करते हैं। उन्होंने गोपियों के साथ लीला कर उनके अहंकार और काम के घमंड को समाप्त कर निष्काम प्रेम को परिभाषित किया। महारानी द्रोपदी के माध्यम से संदेश देते हैं कि— जहां भी अबला प्रताड़ित होगी, निरीह जनों का शोषण होगा, वहां वासुदेव रक्षा करेंगे।

कुरुक्षेत्र में धर्म- अधर्म रूपी 18 दिवसीय महासंग्राम में अर्जुन का रथ हांक कर उनके सारथी बनें। उन्होंने युद्ध को टालने के लिए 5 गांव मांगे। लेकिन दुष्ट दुर्योधन ने उनकी यह बात भी स्वीकार नहीं की। तत्पश्चात् उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर को समझाया की दुष्ट का दमन होना ही चाहिए। अपराधी को दंड देना सर्वथा उचित है।

उन्होंने अपने युग को नवसृजन की दिशा में मोड़ा। उन्होंने प्राणी मात्र को यह संदेश दिया कि केवल कर्म करना व्यक्ति का अधिकार है, फल की इच्छा रखना उसका अधिकार नहीं है। उन्होंने जीवन सूत्रों को माला की तरह गूंथकर एक- दूसरे से पिरोया। जीव के वास्तविक रहस्य और सत्य आचरण को बताया। धर्म के मार्ग पर पथिक के कर्तव्यों को निर्दिष्ट किया और बार-बार कर्म की कठिन परिभाषाओं का सरल निरूपण किया।

उनका स्वयं का जीवन काफी उतार-चढ़ाव से ओतप्रोत रहा। जेल में जन्म लिया, जन्म लेते ही जननी को छोड़ना पड़ा। गोकुल गए तो नंद बाबा को कंस के राक्षसों का सामना करना पड़ा, जिससे परेशान होकर नंद बाबा को गोकुल छोड़कर, वृंदावन में आश्रय लेना पड़ा। कंस को मारने के पश्चात् भी नित जरासंध द्वारा किए गए आक्रमणों से परेशान होकर वृंदावन छोड़ कर द्वारिका बसानी पड़ी। कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन का सारथी बनना पड़ा और आखिर में जंगल से विदा हुए।

श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं। वे जन-जन के आराध्य हैं। उनका कोई भी कार्य निरर्थक नहीं है। उनमें वैराग्य योग, ज्ञान योग, धर्म योग, कर्म योग आदि समाहित हैं। अपने व्यवहार से कर्म की व्याख्या पग- पग पर प्रदर्शित की। भक्ति योग व प्रेम योग के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। जीने की कला और जीव के परम उद्धार का सहज ज्ञान कराया। श्री कृष्ण के प्रेम योग का अनुशीलन देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना गया।

वास्तव में देखा जाए तो मनुष्यता को ईश्वरत्व तक उठाने की कला ही श्री कृष्ण लीला है। जीवन के अमूल्य क्षण सांसारिक वासनाओं में ही नष्ट न हो जाएं, इसका ख्याल तो मनुष्य को ही रखना होगा। सनातन धर्म में आदिकाल से ही साधना का यही लक्ष्य रहा है कि— हम अच्छाइयों को धारण करें। मनुष्य रूप में जन्म लेने के पश्चात् ईश्वरत्व की महानतम ऊंचाइयों को प्राप्त करें।

जन्माष्टमी का अमृत मंत्र यही है कि— हम विचारों में कृष्ण को प्रतिष्ठित करें। फल की चिंता से मुक्त होकर केवल कर्म करते हुए आनंद के साथ अपने कार्य का निष्पादन करें। बृज धाम में उनकी अवतरण की बेला में हम नूतन स्फूर्ति और उल्लास धारण करें। श्री कृष्ण सब का साथ देते हैं और सर्वविकास की राह दिखाते हैं। आनंद की अनंत सरिता हैं। उनका उल्लासमय जीवन हमें जीने की कला सिखाता है। वे सनातन परंपराओं के संरक्षण में अग्रणी हैं। गीता को प्रकट कर उन्होंने मानवता के कल्याण का पथ प्रशस्त किया है जो भक्त कृष्ण योग का रसपान करेगा, उसे सभी संकटों से मुक्ति अवश्य मिलेगी।

190. मत दौड़ो, सुख के पीछे

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

संसार में सभी सुख के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, फिर भी सुख प्राप्त नहीं होता। वास्तव में हमें सुख का ज्ञान ही नहीं है। जिसे हम सुख समझते हैं, वह दुख के मूल कारण है। हम पर जो दुख आते हैं, वह हमारे अपने कर्मों का फल होता है। यह हमारा स्वभाव ही है।

60 वर्ष तक जेल में रहने के बाद जब एक चीनी को नए बादशाह के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में जेल से छोड़ दिया गया तो वह चिल्लाने लगा। अब मैं कहां जाऊं? मैं तो कहीं नहीं जा सकता। मुझे तो उसी भयानक कोठरी में चूहों के पास जाने दो। मैं यह उजाला नहीं देख सकता।

उसकी प्रार्थना के अनुसार उसे वापिस उसी कोठरी में फिर बंद कर दिया। हम सब मनुष्यों की हालत ठीक उस कैदी जैसी ही है। हम चाहते ही नहीं की हमें दुखों से छुटकारा मिले, चाहे कोई भी सुख हो, उसे पकड़ने के लिए हम जी तोड़ कर दौड़ लगाते हैं पर दुख से छुटकारा पाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं होते।

महात्मा बुद्ध कहते थे कि— अपने दुखों को पैदा करने वाले तुम स्वयं हो। ऐसा भी तुमसे कोई नहीं कहता कि तुम जीवित रहो अथवा न रहो। तुम क्यों अपने आप ही दुख के चक्कर में पड़कर अनेक प्रकार के कष्टों का अनुभव करते हो। इसमें तो तुम्हें केवल आंसू तथा शून्यता ही प्राप्त होगी।

दुख भी ईश्वर द्वारा प्रदत्त किया गया दुर्लभतम उपहार है। वह उसे ही प्रदान करता है, जिसको वह अपना मानना है। जिसे वह तपा- तपा कर पारस बनाना चाहता है और मनुष्य के रूप में उसकी प्रतिभा, शक्ति, सामर्थ्य का भरपूर उपयोग कर उसके इस जीवन को श्रेष्ठ बनाना चाहता है। जीवन रूपी यात्रा में वही मनुष्य श्रेष्ठ होता है जो जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण होता है अर्थात् सफलता प्राप्त करता है और सफलता वही प्राप्त करता है जो अत्यंत श्रमशील होकर इस शरीर का भरपूर दोहन कर अपने अभीष्ट को प्राप्त करता है।

मानव शरीर दुर्लभ है, यह सभी जानते हैं। फिर भी इस शरीर को सुख पहुंचाने के लिए तरह-तरह के कर्मकांड करते रहते हैं। वह यह भूल जाते हैं कि मनुष्य शरीर उसे इस संसार में आकर कुछ विशेष कार्य करने के लिए, ईश्वर द्वारा निर्धारित समय के लिए मिला हुआ है। इस शरीर की श्रेष्ठता को जानकर जिसने अपने कर्म कर दिए उसी ने इहलोक से परलोक तक का मार्ग सुधार लिया और जो असमर्थ हो गया, वह ईश्वर के इस दुर्लभ उपहार से जन्मों- जन्मों तक के लिए वंचित हो गया।

सुखों के पीछे हम प्रतिदिन दौड़ते रहते हैं और यही देखते हैं कि मिलने से पहले ही गायब हो जाते हैं। पानी की तरह हमारी उंगलियों के बीच में से सुख बह जाता है परंतु फिर भी पागलों की भांति हम उसके पीछे दौड़ते ही जाते हैं। हमें यह स्मरण ही नहीं रहता कि— दुखों रूपी गहन जंगल में ही शाश्वत सुखों की उर्वरा धरती कर्मशील मनुष्य की आतुरता से प्रतीक्षा करती है। क्योंकि दैहिक दुखों की वैतरणी को पार करने के बाद ही ज्ञान का प्रवेश द्वार खुलता है।
दुखों की वैतरणी को पार करने के दो ही रास्ते हैं—
शारीरिक श्रम की दृढ़ता के साथ-साथ अपने आराध्य पर विश्वास।
श्रेष्ठ एवं निपुण गुरु की कृपा से उसकी नाव में बैठकर उस पार हो जाना।
हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसके अलावा उस पार के देवलोक तक पहुंचने के लिए अन्य कोई मार्ग इस सृष्टि में नहीं बताया है।
अगर ध्यान से देखा जाए तो दुख तो देवताओं और ईश्वर कृपा का सानिध्य, दर्शन तथा सत्संग पाने का एक दुर्लभतम परमिट है। जिसको यह परमिट मिल गया या जिसने इस दुर्लभ जीवन में गहन तप, जप, साधना कर ली, वही उस सर्वेसर्वा की कृपा प्रासाद में प्रविष्ट कर सकता है। सच में वही मनुष्य उस ईश्वर का सानिध्य प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी बन सकता है।

इस संसार में अपने दुखों का रोना रोने या अपने विगत कर्मों पर पश्चाताप करने के अलावा भी अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने और ईश्वर का सानिध्य प्राप्त करने का अवसर भी प्राप्त होता है। इसलिए हमें सुखों के पीछे भागने की बजाए अपने कर्म करने और ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग पर चलना चाहिए तभी हमारा इस जीवन में आने का मकसद पूरा होगा।

189. सीखें, धैर्य रखना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आपने अपने बड़े बुजुर्गों से अक्सर सुना होगा कि—धैर्य का फल मीठा होता है। दरअसल जो मनुष्य धैर्य रखना सीख जाते हैं, उनको मुश्किल समय में समस्या का विश्लेषण करने का अवसर प्राप्त हो जाता है।
कहते हैं कि—स्वर्ग में सब कुछ है लेकिन मृत्यु नहीं है। गीता में सब कुछ है लेकिन झूठ नहीं है। दुनिया में सब कुछ है लेकिन सुकून नहीं है। आज के इंसान ने सब कुछ है लेकिन धैर्य नहीं है।
धैर्य एक ऐसा गुण है जिस पर सवार होकर मनुष्य आकाश की ऊंचाइयों को छू सकता है। इस भौतिक संसार में जो मनुष्य धैर्य धारण करना सीख गया सफलता उसके कदमों को चुमती है। जीवन में उतार-चढ़ाव का दौर चलता रहता है।
जब बुरा दौर चल रहा हो तब खामोशी से इंतजार के साथ काम करते हुए उसे व्यतीत करने की जरूरत होती है। जिसमें धैर्य धारण करने की आवश्यकता होती है। जो मनुष्य मुश्किल हालातों के सामने घुटने नहीं टेकते, वे समय के साथ मजबूत होते जाते हैं। लेकिन इस मजबूती तक पहुंचने के लिए पहले उनको धैर्य की अग्निपरीक्षा को पास करना होता है।
किस्मत एक दिन अवश्य बदलती है और जब बदलती है तो सब कुछ पलट देती है। इसलिए मनुष्य को अपने अच्छे दिनों में अंहकार नहीं करना चाहिए और बुरे दिनों में धैर्य धारण करना चाहिए।

भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। गांव के रास्ते में उनको जगह-जगह पर बहुत सारे गड्ढे मिले। भगवान बुद्ध के शिष्य उन गड्ढों को देखकर बड़े हैरान हुए। वे पूरे रास्ते यही सोच- विचार करते हुए चलते रहे कि— कैसे गांव वाले हैं, जिन्होंने रास्ते में गड्ढे खोद रखे हैं।

भगवान बुद्ध अपने शिष्यों की जिज्ञासा को समझ गए थे। उन्होंने बगैर कुछ पूछे उनसे कहा— यह सब धैर्य न रखने का परिणाम है लेकिन उनके कुछ शिष्य भगवान बुद्ध की बात को समझ नहीं पाए।
उन्होंने जिज्ञासा प्रकट की कि—आखिर इस तरह गड्डे खुदे होने में धैर्य की क्या आवश्यकता है?
भगवान बुद्ध ने कहा— पानी की तलाश में किसी व्यक्ति ने इतने सारे गड्ढे खोदे हैं। यदि वह धैर्य पूर्वक एक स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता पर वह थोड़ी देर गड्ढा खोदता होगा और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढा खोदना शुरू कर देता होगा। उसको परिश्रम करने के साथ-साथ थोड़ा- सा धैर्य भी रखना चाहिए था।

188. सफल जीवन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सफल हो, सुंदर हो तो उसके दो ही रास्ते हैं।
पहला— स्वयं से प्रेम करके और
दूसरा— दूसरों से प्रेम करके।

पहला यह है कि—हम स्वयं से प्रेम करें यानी हमें अपने आप से एक प्रेम भरा संबंध स्थापित करना है जो ध्यान, समाधि और योगासन के द्वारा किया जाता है।

दूसरा— संपूर्ण जगत या अन्य प्राणियों के साथ संबंध स्थापित करना जो कि दूसरों के प्रति प्रेम विकसित करके ही संभव होता है।
लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि हम इन दोनों को स्थापित करने के लिए ज्यादा समय नहीं दे पाते। यदि संसार के साथ हम प्रेम पूर्ण संबंध बनाने में असफल रहते हैं तो उस दिशा में हम स्वयं से भी संबंध स्थापित करने में असफल रहेंगे।
यदि हम स्वयं से संबंध बनाना सीख जाते हैं तो हमारा दूसरों से संबंध बनाना आसान हो जाता है या दूसरी तरफ यह कहा जाए कि यदि हम बाहरी दुनिया से प्रेम संबंध स्थापित करने में सफल हो जाते हैं तो स्वयं से भी संबंध बनाने में सफल हो सकते हैं।
मनुष्य का स्वयं उसकी मूल शक्ति होती है। अगर मनुष्य स्वयं पर विश्वास कर ले तो वह परमात्मा से भी संबंध स्थापित करने में सफल हो जाता है। मनुष्य स्वयं से प्रेम उसी स्थिति में कर पाता है, जब वह सांसारिक विचारों से मुक्त होकर ध्यान की गहराईयों में उतर जाता है।

वास्तव में ध्यान मन की लहरों को शांत करना है यानी मन को विचारों से मुक्त कर देना है और यह ध्यान मन की एकाग्रता से प्रारंभ होता है। हम अपने कार्यों के प्रति एकाग्र नहीं होते।

अक्सर ऐसा होता है कि— जब हम एक कार्य कर रहे होते हैं तो दूसरे के बारे में सोचते रहते हैं। जैसे हम स्नान कर रहे होते हैं तो भोजन या अन्य कार्य के बारे में सोचते हैं। जब हम खाना खा रहे होते हैं तो हमारे मन में दूसरे विचार पनपते रहते हैं। कहने से अभिप्राय यह है कि— हम एक कार्य कर रहे होते हैं परन्तु सोचते हैं, दूसरे कार्य के प्रति। इससे मन की एकाग्रता क्षीण होती है।

लक्ष्य प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि— हम जिस कार्य को करें, प्रत्येक क्षण उसी के बारे में सोचें। धीरे-धीरे हम इसके अभ्यस्त हो जाएंगे। ध्यान करते समय हमारे मन में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न हो जाते हैं। उन विचारों को दबाना नहीं है, बस साक्षी भाव से देखना है। कुछ समय के अभ्यास के बाद हम महसूस करेंगे कि—ये विचार मन के अंदर नहीं बल्कि बाहर ही गुजर रहे हैं। यही वह अवस्था होती है, जब मनुष्य ध्यान की गहराईयों में जाता है।

यही ध्यान की अवस्था उसके स्वयं के प्रेम को परिभाषित करती है। यही वह अवस्था है जो हमें शक्ति प्रदान करती है। यदि हम स्वयं से प्रेम नहीं करते या यह कहा जाए कि हमें स्वयं से प्रेम करने का समय ही नहीं मिलता तो इसका अभिप्राय बिल्कुल स्पष्ट है कि— हम समय-समय पर दुखी होते रहते हैं। प्रेम एक ऐसा शब्द है, जिसमें सब कुछ समाहित है और यही सफल जीवन की कुंजी है। जब स्वयं से प्रेम बढ़ जाता है, तब संपूर्ण प्रकृति से हमें अपने आप ही प्रेम होने लगता है और हमारे जीवन में खुशियों की झड़ी लग जाती है, जिससे हमें अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त होती रहती है।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो मनुष्य इन दोनों पहलुओं को एक साथ साध लेता है, उसका जीवन सफल होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

187. याचना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक मनुष्य अपने इष्टदेव से यानि ईश्वर से प्रतिक्षण कुछ न कुछ याचना करता ही रहता है। इसका कारण स्पष्ट है कि— मनुष्य के अंतर्मन में प्रतिपल कोई न कोई प्रबल इच्छा उभरती ही रहती है और यह भी सच्चाई है कि अंतर्मन से जो भी इच्छा या कामना की जाती है, वही मनुष्य की वास्तविक याचना होती है। प्रत्यक्ष में हम न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं परंतु सच्ची याचना वही होती है जो हमारे अंतर्मन में विद्यमान है।

हमारा इष्ट हमारे बाहरी रूप को नहीं देखता परंतु हमारे अंतर्मन के पर्दों के भीतर अवश्य झांकता है और हमारे मन की थाह लेता है। जो हमारे मन की आवाज होती है, उसी को ईश्वर सुनते हैं और हमारी याचना को पूरी करते हैं। इसलिए हमें स्वयं अपने अंतर्मन में झांककर देखना चाहिए कि हमारे मन की वीणा पर हर समय कौन-सा राग बज रहा है अर्थात् हमारे दिल से क्या आवाज निकल रही है? ऐसी कौन- सी प्रबल इच्छा है जो हमारे अंत: स्थल को प्रतिपल मथ रही है, इसका निर्णय तो हमें स्वयं करना होगा।

हमारी यह आंतरिक प्रबल इच्छा ही हमारी सच्ची याचना है और प्रकृति इसको पूरा करने का प्रबंध प्रतिक्षण करती रहती है। प्रकृति हमारी आंतरिक भावनाओं को जांचती, परखती और उसके अनुसार ही हमारे लिए वातावरण तथा अन्य आवश्यक सामग्री की रचना करती है। जब परिस्थितियां हमारे अनुकूल होती हैं तो हम अपने इष्ट देव को धन्यवाद देते हैं लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों में हम अपने इष्ट देव को ही कोसने लग जाते हैं। परंतु ऐसा करने से पहले हमें तनिक अपने अंतर्मन की जांच पड़ताल कर लेनी चाहिए।

हमें हमेशा अपनी आंतरिक कामनाओं को परखना और जांचना चाहिए। तदुपरांत ही यह विचार करना चाहिए कि जो कुछ हमें कुदरत से मिला उसी आंतरिक कामना के अनुरूप है या नहीं। अगर हम ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तो हम समझ जाएंगे कि हमारे साथ कोई अन्याय नहीं हुआ। हमें वही मिला जो हम ने मांगा था, फिर हम अपने इष्ट देव को शिकायत क्यों कर रहे हैं?

दरअसल हम जो कर्म करते हैं, उसी का फल ईश्वर हमें प्रतिक्षण देते रहते हैं। अक्सर क्या होता है कि— हम विष बो कर अमृत की मांग करते हैं। हम दूसरों के लिए विष रुपी शब्दों के बाण छोड़ते हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरे हमारे से बहुत अच्छा व्यवहार करे। हमारा आदर- सत्कार करें, समाज में हमारी मान- प्रतिष्ठा बढे। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि तुम्हारे कड़वे वचनों से दूसरे भी आहत होते हैं।

प्रत्येक मनुष्य यही सोचता है कि— मैं जो कुछ कहता हूं, वह सब ठीक है। मैं ही सर्वश्रैष्ठ हूं। इसलिए मेरा ही मान- सम्मान होना चाहिए। ईश्वर ने सिर्फ मेरी ही याचना को स्वीकार करना चाहिए। अगर उसके अनुसार उसको समाज में रुतबा नहीं मिलता, उसकी इच्छा पूरी नहीं होती तो वह अपने इष्टदेव को भी कोसने लगता है लेकिन वह यह भूल जाता है कि वह इष्टदेव उसका भी है, जिसके बारे में उसने कठोर वचन कहे थे। ईश्वर के लिए हम सभी एक हैं, बराबर है क्योंकि हम सभी उसी की संतान हैं। इसलिए ईश्वर हमारी वही याचना पूरी करता है जिसके हम अधिकारी हैं, जो हमारे कर्मों के अनुसार ईश्वर हमें प्रदान करता है।

186. आत्मनियंत्रण

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आत्मनियंत्रण से अभिप्राय है— स्वयं पर नियंत्रण यानी अपने मन पर नियंत्रण। क्योंकि आत्मनियंत्रण का मार्ग हमारे मन से होकर गुजरता है। यदि हमारे अंदर मन को नियंत्रित करने की सामर्थ्य है तो हम निश्चित रूप से स्वयं पर नियंत्रण कर लेंगे। हम जब भी कोई कार्य आरंभ करते हैं तो उस समय आत्म नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि नए कार्य को आरंभ करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उस समय यदि हमारा मन शांत होगा तो हमारे संकल्प भी मजबूत होंगे और हम कार्य को उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं यानि अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

यह तो बिल्कुल सत्य है कि मनुष्य अपनी उन्नति का निर्धारक स्वयं है। उसके कर्म ही उसे महान बनाते हैं क्योंकि कर्म के आधार पर ही ईश्वर उसके भाग्य का निर्माण करता है। जिस व्यक्ति के भीतर आत्म नियंत्रण होता है वह आत्मशक्ति को उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखता है और वही आत्म शक्ति हमें हमारे लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक बनती है। जब हम स्वयं के नियंत्रण में होते हैं तो वही करते हैं जो श्रेष्ठ होता है।

नियंत्रण सर्जन का कारक है। नियंत्रणहीन वस्तु या मनुष्य हमेशा विपदा को आमंत्रित करते हैं। आपने पतंग को उड़ते हुए देखा होगा। जब तक वह नियंत्रण में होती है, तब तक वह आकाश में नई ऊंचाइयों को छूती है। लेकिन जैसे ही पतंग उड़ाने वाले का उस से नियंत्रण हट जाता है या पतंग की डोर टूट जाती है तो पतंग गिरने लगती है। ठीक इसी तरह यदि हम स्वयं पर से नियंत्रण खो देते हैं तो हमारी अवनति निश्चित है। अगर हमारा खुद पर नियंत्रण है तो हम किसी भी कार्य को अंजाम तक पहुंचा सकते हैं।

185. समय की गति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

समय की गति को रोकना या शिथिल करना मनुष्य के हाथ में नहीं है। जब तक जीवन है, विघ्नकारी व्यक्तियों और परिस्थितियों से आमना- सामना भी होता रहेगा। जीवन के कटु क्षणों को यदि चित्त में धारण कर लेंगे तो समय बोझिल होकर वर्तमान के सुख- चैन को हर लेगा। जिन अप्रिय प्रसंगों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता, उन में उलझ कर समय नष्ट करेंगे तो हम अपने जीवन को नकारात्मकता से भर लेंगे। ऐसे मनुष्य ना उम्मीदी एवं निराशा में ज्यादा रहते हैं। उनके जीवन में कोई न कोई समस्या हमेशा बनी रहती है।

दूसरी तरफ जो मनुष्य समय की कद्र करते हैं और प्रत्येक कार्य समय पर करते हैं, उनका जीवन हमेशा समस्यामुक्त रहता है। ऐसे मनुष्य दुनिया के लिए आदर्श एवं प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। आपने अक्सर लोगों को कहते हुए सुना होगा कि— समय है, कटता ही नहीं‌। आपने देखा भी होगा कि किसी के पास समय है ही नहीं और किसी का समय कटता ही नहीं। जीवन में जो चाहा, जैसा चाहा, वह मिला या नहीं, इस बात पर निर्भर करता है कि— क्या खाना, सोना और दैनिक दिनचर्या के आवश्यक कार्य निपटाने के अलावा भी आपका कोई बड़ा लक्ष्य है और यदि है तो क्या उसको प्राप्त करने के लिए आपने उसे भरपूर समय दिया।

आप अक्सर देखते होंगे कि ज्यादातर मनुष्य हर समय बेचैन रहते हैं, फिक्रमंद रहते हैं लेकिन उनकी यह बेचैनी और यह फ़िक्र अपने बारे में नहीं, दूसरों के बारे में होती है। उन्हें जीवन में क्या करना चाहिए, क्या नहीं? कैसे रहना चाहिए आदि बहुत सारे सवाल हैं, जिनका उनके पास कोई जवाब नहीं होता, लेकिन दूसरों के जीवन के हर सवाल का जवाब उनके पास अवश्य होता है।
लेखक पाउलो कोएलो कहते हैं—प्रत्येक व्यक्ति यह साफ-साफ सोच पाता है कि दूसरे लोगों को अपनी जिंदगी में क्या करना चाहिए, बस उन्हें अपनी ही जिंदगी का पता नहीं होता। ऐसे लोग समय के साथ आगे नहीं बढ़ पाते।

राजनीति में एक कहावत है कि— पैर का कांटा निकालने तक ठहरने से ही व्यक्ति बिछड़ जाते हैं। प्रतिक्षण और प्रति अवसर का यह महत्व जिसने भी नजरअंदाज किया उसने उपलब्धि को दूर कर दिया क्योंकि नियति एक बार, एक ही क्षण देती है और दूसरा क्षण देने से पहले उसे वापस ले लेती है। जीवन यात्रा के दुष्कर पलों को अपरिहार्य मानते हुए जो भी वर्तमान में बेहतर उपलब्ध है, उसमें रस लेने, सहेजने में ही समय लगाएं क्योंकि समय का चक्र हमेशा एक स्थिति में नहीं रहता। वह निरंतर चलता रहता है। यही समय की गति है और यही नियति है।

आपने अक्सर कहते सुना होगा कि— वह समय न रहा तो यह भी नहीं रहेगा। हमें हमेशा यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारा जीवन बहुत लंबा नहीं है। हमें अतीत की अरुचिकर परिस्थितियों की चिंता या उनके विश्लेषण में समय नहीं गंवाना चाहिए। हमें हमेशा खुश रहने का अभ्यास निरंतर करते रहना चाहिए। खिलखिलाता, मुस्कुराता चेहरा किसी को भी आपका मुरीद बना सकता है।

हमें हमेशा यह स्मरण रखना चाहिए की वर्तमान, भविष्य से नहीं, अपितु अतीत में किए गए पुरुषार्थ से बनता है। हम केवल घर को ही देखते रहेंगे तो बहुत बिछड़ जाएंगे और केवल बाहर को देखते रहेंगे तो टूट जाएंगे। मकान की नींव देखे बिना मंजिलें बना लेना खतरनाक है पर अगर नींव मजबूत है और फिर मंजिल नहीं बनाते तो यह बेवकूफी है।

कभी-कभी हम सोचते हैं कि हमारे पास पर्याप्त समय है। हम अमुक कार्य भविष्य में कभी भी कर लेंगे। लेकिन जिंदगी का कोई भरोसा नहीं, मृत्यु कब हमें अपने आगोश में ले ले, यह कोई नहीं कह सकता। लेकिन मनुष्य है कि—वह इस सच को स्वीकार ही नहीं कर पाता और इसी भ्रांति में जिंदगी गुजार देता है। जब उसे होंश आता है तो बुढ़ापा अपने पांव पसार चुका होता है।

जीवन वही सार्थक है, जिसने समय की तीव्र गति को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। विस्मयकारी ऊंचाइयों तक वहीं पहुंच पाए जिन्होंने समय का सदुपयोग अपना कौशल तराशने और परिमार्जित करने में किया। निर्णय आपका है, समय की आंधी में गुम हो जाना है या ऐसे कार्य करने हैं जिनका सुखद प्रतिपल स्वयं को और भावी पीढ़ी को मिले।

184. मन पर नियंत्रण

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मन पर नियंत्रण रखना बहुत मुश्किल कार्य है। मन को काबू में रखने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों में ध्यान और योगाभ्यास की परंपरा रही है।
हमारे बड़े- बुजुर्ग कहते हैं कि— किसी राज्य का राजा बनना आसान है परंतु अपने मन का राजा होना बहुत मुश्किल होता है। इसके पीछे कारण केवल यही है कि मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण नहीं कर पाता। इसलिए जो व्यक्ति मन का राजा हो जाता है, उस पर नियंत्रण कर लेता है, वह स्थितप्रज्ञ हो जाता है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ के बारे में बताया है। वे अर्जुन को स्थितप्रज्ञ होने के लिए कहते हैं। क्योंकि श्री कृष्ण जानते थे कि— जब मनुष्य एक बार स्थितप्रज्ञ हो जाता है तो उसके लिए सुख- दुख सब एक जैसे हो जाते हैं और वह सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण जैसे गुणों से ऊपर उठ जाता है। जब मनुष्य इस अवस्था में पहुंच जाता है तो फिर वह न तो दुख में ज्यादा दुखी रहता है और न ही सुख में ज्यादा सुखी। वह सुख और दुख को समान भाव से देखता है। ऐसे मनुष्य के जीवन में यदि दुख आता भी है तो उसे परेशानी का अनुभव नहीं होता। उसके हृदय में क्रोध, मोह, भय जैसे विकारों के लिए कोई जगह नहीं होती।

यदि मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण पाने में सफल हो जाता है तो वह सारे दुखों से सहजता से मुक्ति पा सकता है। क्योंकि सब कुछ मन पर ही निर्भर करता है। अगर एक बार मन को साध लिया तो जीवन बहुत आसान हो जाता है फिर वह छोटी-छोटी बातों को भी बड़ी-बड़ी समस्याएं बनाकर उनका भार अपने सिर पर उठा कर नहीं घूमेगा क्योंकि जब मन पर नियंत्रण होगा तो समस्याएं भी नहीं रहेंगी।

एक व्यक्ति अपने दोस्त के घर गया। उसका दोस्त अपनी समस्याओं से काफी विचलित था। वह उसके सामने अपनी समस्याओं का पिटारा खोल कर बैठ गया। घरेलू समस्या, आर्थिक समस्या और भी न जाने कितनी समस्याएं। वह व्यक्ति धैर्य पूर्वक सब सुनता रहा। काफी समय व्यतीत हो गया लेकिन उसकी समस्याओं का पिटारा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
अंत में वह व्यक्ति बोला— मुझे पानी नहीं पिलाओगे क्या?
वह उठा और तुरंत एक गिलास पानी ला कर दिया, फिर अपनी समस्याओं के बारे में बताने लगा।

उस व्यक्ति ने आराम से पानी पिया और पानी पीने के बाद कहा— अगर मैं 15 मिनट गिलास को हाथ में ही पकड़े रहूं तो क्या होगा?

दोस्त ने कहा— पकड़े रहो, कुछ नहीं होगा।

उस व्यक्ति ने कहा— अगर मैं 2 घंटे गिलास को पकडे रहूं तो क्या होगा?

तुम्हारे हाथ में दर्द शुरू हो जाएगा और क्या?

उस व्यक्ति ने कहा—अच्छा! तो मैं क्या करूं जिससे मेरे हाथ में दर्द न हो।

दोस्त ने कहा— यह तो बिल्कुल आसान है। तुम इस गिलास को रख दो। इसको हाथ में मत रखो।

उस व्यक्ति ने कहा— ठीक कहा तुमने। तुम जानते हो यदि मैं इस गिलास को हाथ में पकड़े रहूंगा तो मेरे हाथ में दर्द होना निश्चित है क्योंकि इसको पकड़े रहने से मेरे हाथ का ब्लड सर्कुलेशन रुक जाएगा और दर्द बढ़ जाएगा।

दोस्त ने कहा— जब तुम्हें सब पता है तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो?

उस व्यक्ति ने कहा— तुम्हें भी तो सब पता है। तुम भी तो अपनी समस्याओं का इतना भारी पिटारा उठाकर घूम रहे हो। अगर तुम भी इस पिटारे को नीचे रख दो तो तुम्हारी समस्या का समाधान भी हो जाएगा।
अब उस दोस्त को सब समझ आ गया।

183. त्याग का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य के जीवन में त्याग का बहुत बड़ा महत्व है। यहां तक की हम जब दूसरी सांस लेते हैं तो पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। त्याग मात्र एक कर्म ही नहीं अपितु यह एक भाव है। यह हमें सांसारिक भोगों से अलग करने के साथ ही हमारे व्यक्तित्व निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाता है।

त्याग के बिना तो मनुष्य की, सांसारिक भोगों की तृष्णा कभी समाप्त ही नहीं होगी। जब हम एक वस्तु की कामना करते हैं और वह वस्तु हमें मिल जाती है तो हम दूसरी की कामना करने लग जाते हैं। जब दूसरी मिल जाती है तो तीसरी की कामना करने लगते हैं। यह सिलसिला अनवरत् चलता रहता है और कभी खत्म नहीं होता, कामनाओं की पूर्ति करते हुए धीरे-धीरे मनुष्य का जीवन ही खत्म हो जाता है, लेकिन उसकी इच्छाएं, तृष्णाएं कभी खत्म नहीं होती, जब तक वह त्याग नहीं करता।

संसार में निवास करते हुए प्रत्येक मनुष्य यही कामना करता है कि वह संसार में सर्वोच्च पद को प्राप्त करे। पूरी सृष्टि पर उसी का शासन चले। वह भली भांति जानता है कि ऐसा तो बिल्कुल भी संभव नहीं है लेकिन फिर भी वह यही इच्छा रखता है। उसमें त्याग करने की भावना बिल्कुल भी नहीं होती क्योंकि उसमें संतोष नहीं है और अधिक प्राप्त करने के चक्कर में वह अपने उस सुख को भी भूल जाता है जो ईश्वर ने उसे दिया है।

जब तक मनुष्य त्याग करना नहीं सीखता, तब तक भोगों की कामनाएं उसके मन में हिलोरें मारती रहेंगी। सांसारिक भोगों की तृष्णा मन का अंधकार है। आज वह जितना भी पुरुषार्थ कर रहा है, जितनी भी दौड़ धूप कर रहा है, वह मात्र अपनी इन्हीं कामनाओं की पूर्ति के लिए ही कर रहा है। ऐसा कौन है जो अपनी मान- प्रतिष्ठा नहीं चाहता, जो सबसे अधिक सुखी होना नहीं चाहता और जो बहुमूल्य अथवा दुर्लभ पदार्थों का मालिक बनना नहीं चाहता। इन इच्छाओं को पूरा करते-करते वह अपना सुख चैन भूल जाता है और अपने स्वास्थ्य को खराब कर लेता है, जिससे वह गंभीर बिमारियों का शिकार हो जाता है और अपनी इच्छाओं को पूरी करने की स्थिति में नहीं रहता। ऐसी अवस्था में उसकी इच्छाएं और भी ज्यादा बलवती होने लगती हैं और वह इस दलदल से कभी बाहर निकल ही नहीं पाता।

महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है कि— त्याग के समान कोई सुख नहीं है। मनुष्य ही नहीं साक्षात् ईश्वर को भी बिना त्याग के यश एवं वैभव की प्राप्ति नहीं हुई। त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में भगवान श्री राम का नाम सर्वोपरि है। पिता की आज्ञा का मान रख कर, राजपाट त्याग कर वनवास को चले गए थे। वनवास को जाते समय सिर्फ राम थे लेकिन जब वनवास पूरा करने के बाद अयोध्या लौटे तो वे मर्यादा पुरुषोत्तम बन चुके थे। राजकुमार सिद्धार्थ ने भी सांसारिक मोह का त्याग मानवता को दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए किया, जिससे वे सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बन गए।

वास्तव में देखा जाए तो जो मनुष्य दूसरों के हित में अपने सुखों का त्याग कर सकता है वही साधारण मनुष्य से ऊपर उठकर एक महामानव बनता है और ऐसे महामानव ही सृष्टि के कल्याण का निमित्त बनते हैं।