211. आध्यात्मिक विकास

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ऋषि-मुनियों ने कहा है कि— मनुष्य जीवन के तीन पहलू हैं—

  1. बौद्धिक
  2. शारीरिक और
  3. आध्यात्मिक
    हमें इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन आज हम भौतिक और शारीरिक विकास में तो बहुत प्रगति कर चुके हैं परंतु आध्यात्मिक पहलू को भूल गए हैं। हमारी जीवनशैली इतनी व्यस्त है कि हम स्वयं के लिए समय निकाल ही नहीं पाते। एक दिन ऐसा आएगा कि हम स्वयं से यह सवाल करेंगे कि क्या हमारे जीवन का उद्देश्य केवल जन्म लेना, बड़ा होना, अपनी जिम्मेदारियों को निभाना और मृत्यु को प्राप्त करना ही है या इसके अलावा कुछ और भी है।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में आज इतना विकास हो चुका है कि हमने बहुत से सुविधाजनक साधनों की खोज कर ली है, जिनसे हमारा समय बचता है। उनके उपयोग से हमें अधिक समय मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हम उन सुविधाओं के इतने आदी हो चुके हैं कि हमारे पास समय ही नहीं होता। हमें स्वयं को जानने, पहचानने, अपने अंदर झांकने और अपने जीवन के उद्देश्य को परखने का समय ही नहीं मिलता। इस कारण हम अपने तीसरे पहलू आध्यात्मिक से दूर होते जा रहे हैं।

यह जगत् पांच भौतिक तत्वों के मिश्रण से बना है। इनमें आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म है। वह इतना सूक्ष्म है कि— वह अपने अस्तित्व को सिर्फ ध्वनि के द्वारा ही सिद्ध करता है। उसकी ध्वनि तरंगों को समझने के लिए एक विशेष प्रकार के वैज्ञानिक यंत्र की आवश्यकता होती है। आकाश तत्व को छोड़ दिया जाए तो बाकी के चारों तत्वों को हम अपनी इंद्रियों की सहायता से आसानी से समझ सकते हैं।

ईश्वर इन पांचों तत्वों से भी सूक्ष्म है। ऐसे में हमारी इंद्रियां कैसे ईश्वर की मौजूदगी को समझ सकती हैं, जब वे आकाश तत्वों को भी आसानी से नहीं पकड़ पाती। दरअसल ईश्वर हमारे मानसिक दायरे से भी परे है। इसलिए अपने मन की सहायता से हम उन तक पहुंचने में असमर्थ हैं। अगर हम कोशिश करेंगे भी तो बार-बार निराश होकर लौटना पड़ेगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने यही समझाया है कि— उस ईश्वर को अपने मन के द्वारा या शब्द के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। जिस तरह अणुओं को देखने के लिए बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता होती है, उसी तरह ईश्वर को देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। अगर यह कहा जाए कि ईश्वर को केवल आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हम खुशनसीब हैं कि हमने मनुष्य जन्म पाया है। अपने इस जन्म में यदि हम अपने आध्यात्मिक विकास के लिए समय नहीं निकाल पाएंगे तो अपने ध्येय को कैसे पूरा करेंगे? अध्यात्मिक विकास के लिए हमें आध्यात्मिक ज्ञान होना जरूरी है, जब हमें अध्यात्म का ज्ञान ही नहीं होगा तो हम उसमें विकास कैसे करेंगे। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अध्यात्म की शिक्षा छोटी उम्र से ही बच्चों को देना शुरू करें ताकि वे बड़े होकर अच्छे इंसान बन सकें।

आध्यात्मिकता एक- दूसरे के लिए प्रेम और दया का भाव जगाती है। दूसरों की मदद करना सिखाती है। अध्यात्म जीवन के उच्च आदर्शो को विकसित करना और हमें बेहतर इंसान बनना सिखाता है। ध्यान का अभ्यास एक ऐसा तरीका है, जिसके द्वारा अपने अंदर सद्गुणों को विकसित कर सकते हैं। यही आध्यात्मिकता है। ध्यान अभ्यास के द्वारा हम न केवल जीवन के उच्च आदर्शो को जान पाते हैं बल्कि अपने अंतर्मन में विद्यमान आत्मा को भी साक्षात्कार करने में सफल हो जाते हैं।

जब हमारा आत्मा से संपर्क हो जाता है तो ईश्वर को पहचानना कठिन नहीं होता। जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसके सभी दुख, चिंताएं दूर हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं को ईश्वर के सानिध्य में पाता है। ऐसे में उसे असीम आनंद और शांति की अनुभूति होती है। ईश्वरीय आनंद में डूबने पर मनुष्य के मन के सारे विकार लुप्त हो जाते हैं। उनके समीप पहुंचने पर मन अस्तित्वहीन हो जाता है और हमारा आध्यात्मिक विकास हो जाता है।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ऋषि-मुनियों ने कहा है कि— मनुष्य जीवन के तीन पहलू हैं—

  1. बौद्धिक
  2. शारीरिक और
  3. आध्यात्मिक
    हमें इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन आज हम भौतिक और शारीरिक विकास में तो बहुत प्रगति कर चुके हैं परंतु आध्यात्मिक पहलू को भूल गए हैं। हमारी जीवनशैली इतनी व्यस्त है कि हम स्वयं के लिए समय निकाल ही नहीं पाते। एक दिन ऐसा आएगा कि हम स्वयं से यह सवाल करेंगे कि क्या हमारे जीवन का उद्देश्य केवल जन्म लेना, बड़ा होना, अपनी जिम्मेदारियों को निभाना और मृत्यु को प्राप्त करना ही है या इसके अलावा कुछ और भी है।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में आज इतना विकास हो चुका है कि हमने बहुत से सुविधाजनक साधनों की खोज कर ली है, जिनसे हमारा समय बचता है। उनके उपयोग से हमें अधिक समय मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हम उन सुविधाओं के इतने आदी हो चुके हैं कि हमारे पास समय ही नहीं होता। हमें स्वयं को जानने, पहचानने, अपने अंदर झांकने और अपने जीवन के उद्देश्य को परखने का समय ही नहीं मिलता। इस कारण हम अपने तीसरे पहलू आध्यात्मिक से दूर होते जा रहे हैं।

यह जगत् पांच भौतिक तत्वों के मिश्रण से बना है। इनमें आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म है। वह इतना सूक्ष्म है कि— वह अपने अस्तित्व को सिर्फ ध्वनि के द्वारा ही सिद्ध करता है। उसकी ध्वनि तरंगों को समझने के लिए एक विशेष प्रकार के वैज्ञानिक यंत्र की आवश्यकता होती है। आकाश तत्व को छोड़ दिया जाए तो बाकी के चारों तत्वों को हम अपनी इंद्रियों की सहायता से आसानी से समझ सकते हैं।

ईश्वर इन पांचों तत्वों से भी सूक्ष्म है। ऐसे में हमारी इंद्रियां कैसे ईश्वर की मौजूदगी को समझ सकती हैं, जब वे आकाश तत्वों को भी आसानी से नहीं पकड़ पाती। दरअसल ईश्वर हमारे मानसिक दायरे से भी परे है। इसलिए अपने मन की सहायता से हम उन तक पहुंचने में असमर्थ हैं। अगर हम कोशिश करेंगे भी तो बार-बार निराश होकर लौटना पड़ेगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने यही समझाया है कि— उस ईश्वर को अपने मन के द्वारा या शब्द के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। जिस तरह अणुओं को देखने के लिए बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता होती है, उसी तरह ईश्वर को देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। अगर यह कहा जाए कि ईश्वर को केवल आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हम खुशनसीब हैं कि हमने मनुष्य जन्म पाया है। अपने इस जन्म में यदि हम अपने आध्यात्मिक विकास के लिए समय नहीं निकाल पाएंगे तो अपने ध्येय को कैसे पूरा करेंगे? अध्यात्मिक विकास के लिए हमें आध्यात्मिक ज्ञान होना जरूरी है, जब हमें अध्यात्म का ज्ञान ही नहीं होगा तो हम उसमें विकास कैसे करेंगे। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अध्यात्म की शिक्षा छोटी उम्र से ही बच्चों को देना शुरू करें ताकि वे बड़े होकर अच्छे इंसान बन सकें।

आध्यात्मिकता एक- दूसरे के लिए प्रेम और दया का भाव जगाती है। दूसरों की मदद करना सिखाती है। अध्यात्म जीवन के उच्च आदर्शो को विकसित करना और हमें बेहतर इंसान बनना सिखाता है। ध्यान का अभ्यास एक ऐसा तरीका है, जिसके द्वारा अपने अंदर सद्गुणों को विकसित कर सकते हैं। यही आध्यात्मिकता है। ध्यान अभ्यास के द्वारा हम न केवल जीवन के उच्च आदर्शो को जान पाते हैं बल्कि अपने अंतर्मन में विद्यमान आत्मा को भी साक्षात्कार करने में सफल हो जाते हैं।

जब हमारा आत्मा से संपर्क हो जाता है तो ईश्वर को पहचानना कठिन नहीं होता। जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसके सभी दुख, चिंताएं दूर हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं को ईश्वर के सानिध्य में पाता है। ऐसे में उसे असीम आनंद और शांति की अनुभूति होती है। ईश्वरीय आनंद में डूबने पर मनुष्य के मन के सारे विकार लुप्त हो जाते हैं। उनके समीप पहुंचने पर मन अस्तित्वहीन हो जाता है और हमारा आध्यात्मिक विकास हो जाता है।

210. क्षमा बनाती है, सहनशील

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जैन धर्म में पर्युषण महापर्व के एक दिन बाद जो महत्वपूर्ण पर्व मनाया जाता है, वह है— क्षमा पर्व। इस दिन गृहस्थ और साधु दोनों ही वार्षिक प्रतिक्रमण करते हैं। जाने या अनजाने यदि उन्होंने पूरे वर्ष किसी भी सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव के प्रति कोई भी अपराध किया हो तो उसके लिए, वह उनसे क्षमा याचना करते हैं। अपने दोषों की निंदा करते हैं और क्षमा मांगते हैं।

क्षमा पर्व पर मनुष्य सभी जीवों को क्षमा करते हैं। सबसे क्षमा याचना करते हैं और कहते हैं— मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हों, मेरी किसी से भी शत्रुता नहीं है। इस दिन लोग प्रायश्चित भी करते हैं और हाथ जोड़कर नतमस्तक होकर याचना करते हुए कहते हैं— मैं सभी जीवो को क्षमा करता हूं और सभी जीव भी मुझे क्षमा करें। मेरी प्रत्येक जीव के साथ मित्रता है, किसी के साथ शत्रुता नहीं है।
इस प्रकार वे क्षमा के माध्यम से अपनी आत्मा से सभी पापों को दूर करके उनका प्रक्षालन करके सुख और शांति का अनुभव करते हैं।

क्षमा पर्व एक बहुत ही खूबसूरत पर्व है, जिसमें मनुष्य अपनी आत्मा के सारे बोझ उतार देता है, जिससे उसमें सहनशीलता आ जाती है। आज पूरे विश्व में उथल-पुथल मची हुई है। अशांति और हिंसक घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसके लिए हमें बदले की भावना से ऊपर उठना होगा और दूसरों की गलतियों को माफ करना सीखना होगा क्योंकि संसार की बहुत सी समस्याएं केवल बदले की भावना से ही शुरू होती है। एक मनुष्य दूसरे को दुख पहुंचाता है और दूसरा मनुष्य उससे बदला लेना चाहता है। यह कर्म निरंतर चलता रहता है और प्रतिशोध की भावना इतनी बढ़ जाती है कि वह खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। प्रतिशोध की इस भावना को केवल क्षमा द्वारा ही खत्म किया जा सकता है।

इसलिए हमें ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने अंतर में ध्यान अभ्यास द्वारा शांति को प्राप्त कर लेना चाहिए, तभी हम क्षमा के गुणों को आत्मसात् कर पाएंगे। ऐसे में हम में से प्रत्येक व्यक्ति शांति का एक प्रकाश स्तंभ बन जाएगा और फिर धीरे-धीरे संपूर्ण विश्व में सुख, शांति फैल जाएगी क्योंकि क्षमा कर देना बहुत बड़ी क्षमता का परिचायक है।

जो मनुष्य क्षमा के गुण को अपने जीवन में धारण कर लेता है, वह पलक झपकते ही बड़े से बड़े अवरोधों को पार करने का सामर्थ्य रखता है। क्षमा एक ऐसा गहना है जो शत्रु को भी मित्र बना सकता है। जिनसे बोलचाल बंद है, उनसे भी याचना करके बोलचाल प्रारंभ कर, अनंत कषाय को मिटाने का सर्वोत्तम साधन है— क्षमा।

संवादहीनता जितना बैर को बढ़ाती है, उतना कोई और नहीं। इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए, संवाद का मार्ग कभी बंद नहीं होना चाहिए। अगर संवाद बचा रहेगा तो क्षमा की सभी संभावनाएं शेष रहेंगी। इसलिए हमें क्षमा के गुण को अपने भीतर धारण करना चाहिए ताकि यह संसार शांति और प्रेम से भर जाए।
कहा भी गया है—
क्षमावीरस्य भूषणं अर्थात्
क्षमा वीरों का आभूषण है।

209. परम सुख

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य सुख में खुश होता है जबकि दुख में वह रोता है। यह बिल्कुल सच है लेकिन ऐसी स्थिति में जन्म के समय बच्चे के रोने को आप क्या कहेंगे? निश्चित रूप में उसे सुख नहीं कहा जाएगा क्योंकि सुख या प्रसन्नता में आंखों का नम होना तो स्वाभाविक है, मगर इस प्रकार का रुदन करना नहीं। जन्म के समय बच्चे के रोने का क्या कारण हो सकता है? विज्ञान के अनुसार जन्म के समय बच्चे का रोना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

बच्चे के रोने का दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि माता के गर्भ से बाहर आने के बाद उसे लगता है, वह एक अनजानी दूनिया में आ गया है और उसे यह संसार सुरक्षित नहीं लगता। इसलिए वह रोता है और जब माता उसे सीने से लगा लेती है तो उसे विश्वास हो जाता है कि वह सुरक्षित है।

ऐसा नहीं है कि जीवन में केवल सुख ही सुख है, सुख के साथ दुख का भी अस्तित्व है। सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं। शायद ही कोई मनुष्य ऐसा हो जिसने जीवन में कभी दुख का अनुभव न किया हो। दूसरी तरफ कोई व्यक्ति ऐसा भी नहीं होगा, जिसे जीवन में एक बार भी सुख का भोग न किया हो। सुख- दुख जीवन की पूर्णता के लिए आवश्यक है।

यदि हम सनातन संस्कृति को देखें, परखें और शास्त्रों का आश्रय लेकर अथवा विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत परखें तो यही पाते हैं कि— सुख के तीन स्तर हैं।

  1. देह का सुख।
  2. अंत:करण में मन- बुद्धि का सुख।
  3. आत्मा का सुख।
    देह और मन- बुद्धि का सुख तो सभी को आकर्षित करता है लेकिन आत्म सुख के मार्ग पर तो कोई कोई ही चल पाता है।

आत्म अनुभव के बाद कुछ और नहीं करना पड़ता। अपने आप सुख का प्रकाश फैलता है और सारा भ्रम मिट जाता है लेकिन जब तक आत्म अनुभव न हो, तब तक आत्मा का सुख तो ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है। देह का सुख और मन बुद्धि का सुख तो साधारण आदमी को भी प्रभावित करता है।

आत्मा का सुख अध्यात्म से जोड़ता है। भारतीय मनीषियों ने सदैव स्थूल और सुक्ष्म के महत्व को स्वीकार किया है तथा आत्मसुख को परम सुख मानते हुए देह और मन के सुख को भी सर्वोपरि माना है।
स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि— आत्मा के सुख को प्राप्त करने से पूर्व देह और मन बुद्धि का सुख भी आवश्यक है क्योंकि आत्मा के सुख को प्राप्त करने से पहले जमीन तैयार करनी होती है। भोग की इच्छा कुछ तृप्त हो जाने पर ही मनुष्य योग की बात सुनते हैं या समझते हैं। अन्न के अभाव में भूख और प्यास से पीड़ित मनुष्यों को भाषण देने से क्या लाभ। उन्होंने अरुंधति तारे के बारे में एक बहुत ही सुंदर बात कही कि— यह बहुत ही छोटा तारा होता है। उसे देखना हो तो दिखाने वाला, पहले उसके पास के किसी बड़े तारे को दिखाता है फिर उससे छोटे तारे को और अंत में दृष्टि अरुंधती तारे तक पहुंच पाती है। आत्मा का सुख विराट है लेकिन आत्मदर्शन तो सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है। इसलिए दृष्टि को स्थूल और सूक्ष्म से होते हुए, अति सूक्ष्म तक जाना पड़ता है। आत्म सुख से पूर्व देह का सुख और मन का सुख पा लेने के पश्चात ही प्रत्येक मनुष्य उस परम सुख की और आकर्षित होगा जो जीवन का परम सुख है।

208. कर्म की निरंतरता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

धर्म शास्त्रों के अनुसार आत्मा को कई योनियों में भटकने के बाद मनुष्य रूप में जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन ही एक ऐसा जीवन है जिसमें कर्म करना जीव के वश में होता है। दूसरे योनि में जीव या तो परजीवी होता है या उसके कर्म इतने सीमित होते हैं, जिनका कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे में मनुष्य को चाहिए कि वह अपने लिए कर्म निर्धारित करे और फिर उसका सही से निर्वहन करे, जिससे उसका जीवन उद्देश्य पूर्ण और सार्थक बन सके क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना कहीं बेहतर होता है। वैसे भी कर्म के बिना जीवन निर्वाह करना संभव ही नहीं है।

इस भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी कर्म में प्रवृत्त होना ही पड़ता है। कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। एक कर्म ही है जिसके माध्यम से मनुष्य अपना जीवन बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। ऐसे में मनुष्य को चाहिए कि वह सकारात्मक कर्म करता हुआ अपने जीवन को सार्थक और मूल्यवान बनाने का प्रयास करे। अपने कर्मों के माध्यम से ही गरीब परिवार में जन्मा मनुष्य अमीर बन जाता है ज्ञानवान और गुणवान बन जाता है। अपने नकारात्मक कर्मों से कई मनुष्यों ने अपने जीवन को तबाह किया है ऐसे उदाहरण समाज में अक्सर देखने को मिलते हैं।

पूरी प्रकृति अपने निर्धारित कर्म में बंधी हुई है। सूर्य, चंद्रमा, ऋतु, हवा, पानी और यहां तक ईश्वर भी अपने निर्धारित कर्म के अनुसार ही गतिमान है। सृष्टि की रचना से लेकर आज तक इनमें से किसी ने कभी भी अपने निर्धारित कर्म का उल्लंघन नहीं किया। अगर मनुष्य भी इनका अनुसरण करते हुए अपने जीवन में कर्म की निरंतरता को बनाए रखेगा तो वह जीवन में अवश्य सफल हो जाएगा क्योंकि कर्म में निरंतरता का अपना विशेष महत्व है। कर्म एक गूढ़ विषय है, जिसकी बारिकियों को समझना बहुत कठिन है। मनुष्य को चाहिए कि वह सिर्फ इतना जान ले कि उसका कर्म क्या है? अगर वह अपने निर्धारित कर्म को जान जाए और पूरी लगन से उसे संपन्न करें तो निश्चित रूप से उसका कल्याण संभव है।

एक बार योग गुरु सत्यानंद स्वामी अपने आश्रम में संध्या के समय टहल रहे थे। उसी समय एक संपन्न परिवार का व्यक्ति योग सीखने के उद्देश्य से स्वामी जी के पास आया। स्वामी जी ने उसका कुशलक्षेम पूछा और उसे आश्रम के नियमों से अवगत करवाया। जब स्वामी जी ने यह कहा कि जब तक तुम योग में पारंगत नहीं हो जाते, तब तक तुम्हें आश्रम में ही रहना पड़ेगा और यहां के नियमों के अनुसार ही जीवन जीना होगा तो उस व्यक्ति ने खीजते हुए कहा— स्वामी जी! मैं आपके आश्रम में नहीं रह सकता क्योंकि मैं सुख सुविधाओं से संपन्न जीवन जीता हूं, आपके आश्रम में उन साधनों का अभाव है।
स्वामी जी ने कहा— फिर तो तुम किसी और गुरु के पास जाओ जो तुम्हारी इच्छा को पूरी कर सके।
स्वामी जी से यह सुनकर वह व्यक्ति मन मसोसकर रह गया और उसे वही आश्रम में रहना पड़ा।
अगले दिन स्वामी जी उसी समय जब टहल रहे थे तो वह व्यक्ति स्वामी जी से मिलने गया और शिकायती लहजे में स्वामी जी से बोला— आपके आश्रम में खाने में मुझे जो रोटियां मिलती हैं, वो ठंडी, सख्त और अधपकी होती हैं।
उस व्यक्ति की इस बात पर स्वामी जी मुस्कुराए और पूछा— आपको समय पर खाना मिल गया था।
उस व्यक्ति ने हां में सिर हिला दिया।
स्वामी जी बोले— यहां लोग मिलजुलकर खाना बनाते हैं। वे पाककला में दक्ष नहीं है। ऐसा करते हैं रोटी बनाने की जिम्मेदारी आपको सौंप देते हैं। आशा करता हूं आपके हाथों की गरम-गरम और पूरी पक्की रोटियां सभी को खाने को मिलेंगी।
स्वामी जी के मुख से यह सुनते ही वह व्यक्ति अधीर हो गया। उसने कहा रोटियां पकाना मेरा काम नहीं है।
स्वामी जी ने उत्तर दिया— यहां सभी लोग, सभी काम करते हैं।
अगले दिन उस व्यक्ति ने सचमुच अच्छी रोटियां पकाई। सभी ने उसकी नरम मुलायम रोटियों की तारीफ की।
लेकिन उससे अगले दिनों में वह थोड़ी-सी बेडौल,अधपकी और सख्त रोटियां बनाने लगा। एक दिन रोटियां बनाने के लिए वह रसोई में काफी देर से पहुंचा। यह बात स्वामी जी तक पहुंची तो उन्होंने उनसे भोजन में देरी होने की वजह जाननी चाही।

उस व्यक्ति ने झेंपते हुए कहा— मैं रोज- रोज रोटियां बनाते-बनाते उब गया हूं इसलिए देर से पहुंचा।

स्वामी जी ने उस व्यक्ति के साथ-साथ और सभी शिष्यों को भी संबोधित करते हुए कहा— अगर हमारा लक्ष्य परम योग को प्राप्त करना है तो हमें रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान देना होगा। जिस कार्य की हम निंदा कर रहे हैं, उस कार्य को स्वयं करके देखें तभी हम दूसरों के श्रम और मेहनत का सम्मान करना सीख पाएंगे। हमें मात्र अपने कर्तव्य का निर्वहन ही नहीं करना है बल्कि निरंतरता भी बनाए रखनी है।

इसलिए जीवन में कर्म की निरंतरता अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना हम जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते।

207. आत्म- समीक्षा का अवसर

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

इतिहास में जहां कोविड-19 के समय को महामारी, बेशुमार मौतों और शारीरिक-मानसिक तथा अन्य समस्याओं के लिए जाना जाएगा, वहीं हमारी सनातन संस्कृति में संकल्प शक्ति, मंत्रों, प्रार्थनाओं और प्रकृति के साथ चलते हुए, उसी से समाधान तलाशने की पूरी जिजीविषा के साथ, इस संकट से जूझने के लिए भी जाना जाएगा।

यह सर्वविदित है कि— कोरोना की दूसरी लहर के घातक तूफान ने जो तबाही मचाई उसके बाद से हम सभी की अपनी-अपनी दुनिया वैसी नहीं रही, जैसी वह पहले थी। हम में से बहुतों ने अपने प्रियजनों को खोया है। जिसके कारण हम सभी की स्मृतियों में कुछ खरोचें आ गई हैं। भविष्य की जो रंगबिरंगी खूबसूरत तस्वीरें थी, जो सपने थे, वे सब कोरोना की वजह से बदरंग हो गए, धूमिल हो गए। हमारे अंदर जड़ता आ गई है क्योंकि वहां शुन्य का जन्म हो चुका है। फिलहाल वहां किसी भी तरह की हवा, पानी, रोशनी और हरियाली की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है।

आज जो कोरोना वायरस का संकट हम झेल रहे हैं, यह हमारी ही लापरवाही का परिणाम है क्योंकि आज के मनुष्य को अपने शक्तिशाली होने का अंहकार है। इसलिए वह प्रकृति से खिलवाड़ करने से नहीं चुकता। वह यह भूल जाता है कि प्रकृति एक सीमा तक ही खुद पर किसी भी प्राणी का आधिपत्य स्वीकार करती है। जब अति हो जाती है तो वह उसे या तो किसी खगोलीय घटना से या किसी महामारी से नियंत्रित करती है। हमारे सनातन धर्म में यह बात सर्वविदित है कि कई करोड़ वर्ष पूर्व अंतरिक्ष से एक छोटा-सा उल्का पिंड पृथ्वी पर गिरा और डायनासोर युग समाप्त हो गया। अपने अहंकारवश मनुष्य यह स्मरण ही नहीं रखता कि विराट अंतरिक्ष में हम एक छोटे- से पृथ्वी के गोले पर एक छोटे-से कण की भांति हैं। सनातन धर्म ने इस बात को बहुत पहले ही समझाने की कोशिश की। महाप्रलय में मत्स्य अवतार के साथ पृथ्वी की रक्षा का वर्णन हो या ऋग्वेद की अनेक ऋचाएं महामारी उन्मूलन की प्रार्थना करते हुए पाई जाती हैं।

कोरोना कि दूसरी लहर में हमारे कुछ अपने चले गए लेकिन हम बच गए या यह कहें कि हमें बचा लिया गया। क्या इसको हम यह समझे कि इसमें ब्रह्मांड का कोई संदेश निहित है?
यदि वैज्ञानिक डार्विन के दिमाग से सोचें तो यह कह सकते हैं कि प्रकृति ने हमारा चयन किया है। चयन इसलिए किया है क्योंकि हमने इस झंझावत के दौर में बने रहने की अपनी क्षमता को प्रमाणित किया है। लेकिन क्या अपनों के साथ के बिना हम में से कोई यहां पर रहना चाहेगा।
इसका जवाब डार्विन के पास नहीं है। लेकिन भारत की सांस्कृतिक मेधा के पास है। भारतीय संस्कृति यह उदात्त घोषणा हजारों साल पहले कर चुकी है कि—पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूं। इसलिए प्रकृति के नियम कायदों में ना तो कोई अपना है और ना ही कोई पराया। यह पूरी वसुधा मेरा परिवार है।
प्रकृति की इसी विराट चेतना का हम बचे हुए मनुष्यों के लिए निर्देश है कि— भले ही तुम्हारे साज आज टूटे हुए हों लेकिन तुम्हें उससे रचनात्मक मधुर धुन निकालनी ही होगी क्योंकि जीवन की इसी निरंतरता को बनाए रखना बहुत आवश्यक है और इसलिए मैंने तुम्हें बचाया है।

दूसरी लहर से बचने के बाद भी बहुत सारे मनुष्य आज भी खोफजदा हैं क्योंकि कोरोना संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है। धीरे-धीरे तीसरी लहर दस्तक दे रही है। लेकिन हमने कुछ संकल्पों और विकल्पों के साथ, कुछ आचरण और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन के साथ या फिर कोरोना को अपने वैज्ञानिक औषधीय शौधों से पराजित कर अपनी नई दुनिया की रचना करनी ही होगी। पहले भी बीमारियां आई थी। उनका समाधान निकाला गया। हमेशा के लिए इससे छुटकारा पाने का उपाय भी मनुष्य ढूंढ ही लेगा, पर इसने हम सभी को आत्म- समीक्षा का अवसर अवश्य प्रदान कर दिया।

इस पर हमें विचार करना चाहिए कि आने वाले समय में भी क्या हम प्रकृति के खिलाफ जाते रहेंगे? क्या धरती का दोहन ऐसे ही करते रहेंगे? क्या अपनी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश नहीं लगाएंगे? क्या मृत नदियों की यादें लेकर हम नई दुनिया में प्रवेश करेंगे या दोनों किनारों पर पेड़-पौधों की हरियाली के मध्य से कल-कल का मधुर संगीत बिखेरती नदियों और साफ नीले आकाश को छूने की प्रतिस्पर्धा करते पहाड़ों और उन्मुक्त विचरते पक्षियों के कलरव गान के साथ मनुष्यता विरोधी कार्यों को छोड़कर प्रकृति से सामान्जस्य स्थापित करके शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे।

206. पितृयज्ञ/श्राद्ध

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

वेद भारतीय संस्कृति के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। उनमें पितृयज्ञ का वर्णन मिलता है। श्राद्ध, पितृयज्ञ का ही दूसरा नाम है।

ब्रह्म पुराण में श्राद्ध के संबंध में कहा गया है कि— उचित देश, काल और पात्र में जो भी भोजनादि श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त दिया जाता है, वह श्राद्ध है।
इससे यह सब पता चलता है कि सनातन धर्म में श्राद्ध की प्रथा अति प्राचीन है जो अबाध गति से अब तक चली आ रही है।
कहा जाता है कि हिंदू धर्म के श्राद्ध की प्रशंसा मुगल बादशाह शाहजहां ने भी की थी। जब उसके पुत्र औरंगजेब ने उसे कारागार में डाल दिया था। तब उसके लिए कारागार में भोजन और पानी की भी पूरी व्यवस्था नहीं थी। कहने का अभिप्राय है कि— शाहजहां को जितनी सामग्री मिलती थी, उससे उसकी भूख और प्यास भी नहीं मिटती थी। तब शाहजहां ने कारागार से अपने पुत्र के लिए एक पत्र लिखा था कि— तू अपने जीवित पिता को पानी के लिए तरसा रहा है। शत-शत बार प्रशंसनीय हैं, वे हिंदू, जो अपने मृत पितरों को जलांजलि देते हैं।

हमारी प्राचीन सभ्यताओं में भी मृतक को दफनाते समय कब्र में दैनिक भोग की आवश्यक सामग्री रखने की प्रथा थी, जो श्राद्ध का ही एक रूप थी।

प्रसिद्ध गजल गायक. जगजीत सिंह द्वारा गाई गई एक गजल है—
चिठ्ठी ना कोई संदेश, जाने वो कौन- सा देश, जहां तुम चले गए।

हमारी सांस्कृतिक मेधा का जवाब है— पितृलोक। यह वह दुनिया है, जहां हमें छोड़ कर गए हुए, हमारे सभी सगे- संबंधी निवास करते हैं। वर्ष में एक बार हम तिथियों के अनुसार उन्हें अपने यहां आमंत्रित करते हैं। उनकी पसंद का भोजन बनाते हैं ताकि उसे पाकर वे तृप्ति का अनुभव कर सकें। इस समय लोग अपने पितरों की स्मृति में पूजन व तर्पण के अतिरिक्त निर्धन व्यक्तियों को भोजन व अन्य वस्तुओं का दान भी करते हैं। हमारा यह विश्वास है कि यह निश्चित रूप से हमारे पित्तरों को प्राप्त होता है क्योंकि हमारी संस्कृति स्थूल शरीर के अतिरिक्त एक सूक्ष्म शरीर को भी स्वीकार करती है। जो मृत्यु के बाद भी नष्ट नहीं होता। मान्यता है कि पित्तर इसी सूक्ष्म शरीर से पूजन और तर्पण को ग्रहण करते हैं और फिर वे उसी पितृलोक को लौट जाते हैं। अपने संबंधों को हमेशा के लिए बरकरार रखने की यह भारतीय युक्ति अद्भुत है। वह हमें सांत्वना देती है कि— वे न होकर भी हैं और इस बात का आश्वासन भी देती है कि हम से फिर मुलाकात होगी‌

भारतीय संस्कृति दुनिया में सबसे विलक्षण संस्कृति है क्योंकि यह “सर्वे भवन्तु सुखिन:” का उद्घोष करती है। इसका हर विधान लोकमंगलकारी है। इसमें संशय की कोई गुंजाइश नहीं होती। मानवीय संबंधों की गहराई जितनी भारतीय संस्कृति में है, उतनी पूरे विश्व में कहीं नहीं है। हमारे रिश्ते अटूट होते हैं। उनका संबंध केवल एक जन्म में नहीं होता बल्कि जन्म- जन्मांतर का होता है। मृत्यु के पश्चातु भी हमारा रिश्ता खत्म नहीं होता। हमारी संस्कृति में जब बच्चा जन्म लेता है तो उसे पहला पाठ यही सिखाया जाता है— मातृदेवो भव और पितृदेवो भव। माता को धरती और पिता को आकाश से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। यह उदात्त घोषणा भारतीय चेतना हजारों साल पहले कर चुकी है। ऐसे आत्मीय रिश्ते को भला मृत्यु भी कैसे तोड़ सकती है। हमारी संस्कृति में यह कहा जाता है की पित्तर, पितृलोक में निवास करते हुए सदा अपनी संतानों की मंगल कामना करते हैं। हम तो कृतज्ञता प्रकट करने के लिए नित्य सूर्य और चंद्रमा को भी अर्ध्य देते हैं जो हमें ऊष्मा, प्रकाश और शीतलता प्रदान करते हैं। फिर हम अपने उन पूर्वजों को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने हमें अमूल्य जीवन दिया। उनका ऋण शायद हम कभी नहीं चुका सकते।

सनातन संस्कृति समतामूलक है। ऐसे अवसरों पर दान आदि का विधान इसलिए किया गया है, जिससे जरूरतमंदों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। भूखों को भोजन मिल सके। पशु- पक्षियों, कीट- पतंगों को भोजन देने का उद्देश्य भी यही है कि— मनुष्य प्राणी मात्र से भी प्रेम भाव रखे। वैसे भी हमारी संस्कृति में किसी भी रूप में प्राणी जगत् की सेवा, ईश्वर की ही सेवा होती है।
गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि— उचित देश काल में उचित पात्र को दिया गया दान सफल होता है। सुपात्र को दिए गए दान से पित्तर अवश्य तृप्त होते होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। पूर्वजों की स्मृति में दिया गया दान किसी भूखे का पेट भर सकता है। किसी जरूरतमंद की जरूरत बन सकता है। हमारी नई पीढ़ी को भी श्राद्ध कर्म के विधान को समझना चाहिए, जो संपूर्ण मानवता को समर्पित है।

205. जीवन का गूढ़ रहस्य

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जन्म से पहले और मृत्यु के पश्चात् का संसार कैसा होता है? यह एक गूढ़ रहस्य है। इसे जानने की जिज्ञासा सृष्टि के आरम्भ से ही मनुष्य को विचलित करती रही है। हमारे सनातन धर्म में ध्यान, समाधी एक ऐसा मार्ग है, जिस पर चलकर हमारे ऋषि-मुनियों ने इस रहस्य को उजागर किया है और उन्हीं के द्वारा कई धर्म ग्रंथों में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। परंतु हमारी जिज्ञासा उसके प्रत्यक्ष अनुभव की रही है। इसमें सबसे बड़ी बाधा यही है कि— जीवित व्यक्ति बगैर आध्यात्मिक दृष्टि के, जीवन के उस पार नहीं देख सकता और मृत व्यक्ति इस पार आकर बता नहीं सकता।

इसको लेकर विज्ञान और अध्यात्म में मतभेद है। विज्ञान तो सिर्फ सिद्धांत को मानता है— ज्ञात और अज्ञात।
जिसे जान लिया गया है, वह ज्ञात की श्रेणी में आता है।
जिसे अब तक नहीं जाना गया जैसे जन्म के पहले और मृत्यु के बाद का जीवन। वह अज्ञात की श्रेणी में आता है।
विज्ञान को यह विश्वास है कि चाहे लाखों वर्ष और लग जाएं, इस रहस्य को भी जान लेंगे जबकि अध्यात्म ज्ञात-अज्ञात के अलावा तीसरे सिद्धांत अज्ञेय को भी मानता है। अध्यात्म मान्यता है कि जन्म के पहले और मृत्यु के पश्चात् जैसे रहस्य सदा रहस्य ही बने रहेंगे। यह अज्ञेय है। इसे कभी भी जाना नहीं जा सकेगा।

अध्यात्म का स्पष्ट कहना है कि— मृत्यु के पश्चात् आत्मा पुनर्जन्म लेती है। यह शरीर तो नश्वर है‌। आत्मा शरीर छोड़ने के बाद दूसरा शरीर धारण करती है। जिस प्रकार हम पुराने कपड़े उतार कर नए कपड़े धारण करते हैं, वैसे ही आत्मा इस पुराने, जीर्ण-क्षीर्ण शरीर का त्याग कर, नया शरीर धारण करती है। जो चला गया है, वह नया शरीर धारण कर वापिस लौट आएगा, नए रिश्तों के साथ, नए संबंधों के साथ, नए नाम के साथ। रिश्ता चाहे कोई भी हो, लेकिन वह वापिस लौट आता है, इस बात की पुष्टि अध्यात्म करता है कि—वे हमारे बीच ही रहते हैं।

दूसरा अध्यात्म यह भी कहता है कि— वे अत्यंत सूक्ष्म तत्व के रूप में होते हैं। वे गए नहीं हैं, यही हैं बस फर्क इतना हो गया कि— अब उनके पास शरीर नहीं है। इसलिए हम उन्हें देख नहीं सकते लेकिन वे हमें देख रहे हैं। शरीर के बंधन से छूटने के बाद वे अनंत शक्तियों के स्वामी हो गए हैं। वे हमेशा हमारा ध्यान रखेंगे। उनका आशीर्वाद हमेशा हम पर बना रहेगा। जीवन की कठिन परिस्थितियों में हम उम्मीद से उनसे प्रार्थना करते हैं और ज्यादातर हमारी प्रार्थनाएं स्वीकार भी होती हैं। ऐसे रोमांचक क्षणों में पल भर के लिए ही सही उनके यहीं कहीं आस-पास मौजूद होने का अहसास भी कर लेते हैं।

हमारे मध्य में ही कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो इस तरह की बातों को कोरी बकवास कहते हैं। उनके लिए उपनिषदों में वर्णित एक कथा है।
इस कथा के अनुसार माता पिता अपने बालक की अकाल मृत्यु से अत्यंत दुखी हैं। किसी संत-महात्मा के पास जाते हैं। महात्मा के पास अलौकिक शक्तियों का भंडार है। उन अलौकिक शक्तियों के द्वारा उस मृत बालक का आह्वान करके, उसे उनके सामने उपस्थित कर देता है। माता-पिता भाव-विभोर होकर जैसे ही उस बालक की ओर लपकते हैं, वह बालक पीछे हटते हुए बड़े निर्विकार भाव से पूछता है कि— आप कौन हैं?
माता-पिता रोते हुए कहते हैं कि— तुम हमारे पुत्र हो। लेकिन बालक उन्हें पहचानने से इंकार करते हुए कहता है कि— मेरे तो न जाने कितने जन्म हो चुके हैं और वह भी न जाने कितने- कितने रूपों में।

यह सुनते ही माता-पिता का मोह भंग हो जाता है और उनका उद्वेलित मन शांत हो जाता है।

भौतिक विज्ञानी इस जगत को निरंतर गतिमान एवं परिवर्तनशील मानते हैं। जब सब कुछ परिवर्तनशील है तो यह जीवन, यह शरीर और हमारे संबंध अपरिवर्तित कैसे रह सकते हैं?
भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं कि— आत्मा अपने पुराने जीर्ण-शीर्ण शरीर को त्याग कर, नए शरीर को धारण करती है। जो पुराना था वह छूट गया। अब जो नया है, वह पुराने को पहचान नहीं पा रहा यानी कि मृत्यु यदि एक का अंत है तो दूसरे का प्रारंभ है। यह एक अनंत क्रम है और इस क्रम में हम भी शामिल हैं इसलिए अफसोस कैसा, दुख कैसा।

लेकिन विज्ञान तो प्रत्यक्ष को स्वीकार करता है। अध्यात्म की इन बातों पर विश्वास नहीं करता। हम में से बहुत से ऐसे मनुष्य भी हैं जो विज्ञान की बातों को स्वीकार करते हैं तो ऐसे मनुष्यों के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए विद्वानों ने मध्यमार्ग अपनाया। उन्होंने कर्म के महत्व को समझाया। उनका कहना है कि— जन्म के पहले का संसार कैसा था और मृत्यु के पश्चात् क्या होता है? इसकी चिंता किए बिना जो जीवन जी लेता है। वही यथार्थ है।

अच्छे कर्मों से हम अपने जीवन में ही अपने लिए स्वर्ग की रचना कर सकते हैं क्योंकि रामचरितमानस और भगवत गीता में भी कर्म को ही प्रधानता दी गई है। सच्चाई यही है कि हम अपने कर्मों से ही अपने भाग्य को बनाते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं। केवल हमें यह ध्यान रखना है कि कर्म सिर्फ शरीर की क्रियाओं से ही नहीं बल्कि मन से, विचारों से, एवं भावनाओं से भी संपन्न होता है। कर्म के इस भेद को समझे बिना जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाना संभव नहीं है। इसलिए हमें कर्म की महत्ता समझनी होगी।

204. समस्याओं से लड़ने की ऊर्जा— ध्यान

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ध्यान करने से हमारे जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन होते हैं, जिससे हमें समस्याओं से लड़ने की ऊर्जा प्राप्त होती है। प्रत्येक मनुष्य आमतौर पर तनाव ग्रस्त रहता है। उसके जीवन में कोई न कोई परेशानी आती ही रहती है। मानसिक तनाव, भावनाओं का उतार-चढ़ाव, क्रोध, निराश होना, अवसाद महसूस करना, हमेशा भयभीत रहना आदि, ये सब कुछ कोरोना की दूसरी लहर के बाद लोगों में देखने-सुनने को मिल रहे हैं। इससे संबंधित शिकायतों की बाढ़- सी आई हुई है।

बहुत सारे मनुष्य जो कोरोना से ठीक हो कर वापिस घर आ गए थे, वे भी काफ़ी भयभीत हैं, क्योंकि उनमें से काफी सारे मनुष्य कोरोना से ठीक होने के पश्चात् भी दो से तीन महीने के अंदर ही काल का ग्रास बन चुके हैं। किसी को ब्रेन हेमरेज हो रहा है तो किसी का हर्ट फेल हो जाता है। ऐसे में किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा।

आज लोगों का न सिर्फ मानसिक बल्कि भावनात्मक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अस्थमा, हृदय रोग जैसी बीमारियों में वृद्धि हुई है। कोरोना से उबर चुके बहुत से मनुष्य मानसिक और शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। वे आज ऐसे विकल्पों की तलाश में हैं जो उन्हें तन के साथ-साथ मन को भी सुकून प्रदान करें। ऐसे में ध्यान ही एक ऐसी चमत्कारी दवा है, जिसके प्रभाव से वह अपने तन और मन दोनों को स्वस्थ रख सकते हैं।

मुश्किलें हमेशा हमारी हिम्मत और समझदारी की परीक्षा लेने के लिए ही आती हैं। ऐसे समय में जो मनुष्य हिम्मत का दामन छोड़ देते हैं और समझदारी का परिचय नहीं देते, वही मनुष्य बेहद निराश होकर अवसाद में चले जाते हैं। हमारी चिंताएं बेवजह की होती हैं। बहुत से बीमार मनुष्य यही सोचने लगते हैं कि उनके संसार में से चले जाने के बाद उनके परिवार का क्या होगा? जब वे आर्थिक संकट से गुजरते है तो वे उनका हल खोजने के बजाय निराशा के गर्त में जाने लगते हैं। सच्चाई तो यही है कि जीवन समस्याओं की एक श्रृंखला है। हमें बड़ी समझदारी, धैर्य और हिम्मत से काम लेना चाहिए और यह तीनों ध्यान के अभ्यास से ही आ सकती हैं।

ध्यान हमारी समस्याओं का खात्मा नहीं करता। ऐसा नहीं है कि ध्यान करने से हमारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी बल्कि ध्यान तो हमें आनंद के ऐसे स्थान पर ले जाता है, जहां पर हम उन समस्याओं के कष्टदायी प्रभावों को महसूस नहीं करते। हमारे अंदर समस्याओं से लड़ने की ऊर्जा पैदा कर देता है। हमारा जीवन को देखने का दृष्टिकोण बदल देता है। जिससे हम यह समझ जाते हैं कि परेशानियां अस्थाई होती हैं। आज हैं, कल नहीं रहेंगी। जिससे हमारे अंदर हिम्मत और धैर्य उत्पन्न होता है और हम अधिक मजबूत होकर समस्या से उभर पाते हैं।

हावर्ड की न्यूरोसाइंटिस्ट सारा लेजर कहती है— ध्यान ब्रेन के चार हिस्सों— लेफ्ट हिप्पकैंपस, पोस्टेरियर, सिंगुलेट, पान्स एवं द् टेंपेरो पेरिएटल जंक्शन पर गहरा प्रभाव डालता है। इससे सोचने की शक्ति बढ़ जाती है। दिमाग की क्षमता बढ़ जाती है। एकाग्रता आती है। किसी कार्य पर अधिक फोकस कर पाते हैं।

वैज्ञानिक शोध के अनुसार— मानव मस्तिष्क में दिन में 60 से 70000 से भी अधिक विचार उत्पन्न होते हैं। जिनमें नकारात्मक, फिजूल विचार अधिक होते हैं। ध्यान दिमाग में चल रहे विचारों पर विराम लगा कर उसे शांत करने में मदद करता है।

जिस प्रकार किसी पौधे के बढ़ने के लिए उसकी जड़ों में पानी डाला जाता है न की पत्तों में, वैसे ही हमें मन को शांत करने के लिए, अपने संकल्पों को श्रेष्ठ एवं सकारात्मक बनाने के लिए अपनी आंतरिक एवं आध्यात्मिक शक्ति को जगाना होगा। जब हम मन का, ईश्वर के साथ संबंध स्थापित कर लेंगे तो हमें एक ऐसी ऊर्जा प्राप्त होगी जो सब परेशानियों से बाहर निकलने में हमारी सहायता करेगी।

203. मिटा दें, मन के विकार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय हममें से ज्यादातर मनुष्य मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, बीमार हैं। अधिकतर तो अपनी स्वयं की स्थिति से परेशान है क्योंकि वे अपनी परेशानी से परेशान नहीं है बल्कि उनके आस- पड़ोस वाले, उनके रिश्तेदार स्वस्थ क्यों हैं? उनको सफलता कैसे प्राप्त हो गई? वे हमारे से ज्यादा अमीर कैसे हो गए? ईश्वर उन पर इतने मेहरबान क्यों हैं? आदि-आदि। ऐसे ढेरों प्रश्न है, जिनसे वह परेशान रहता है। यह सोच हमारे मानसिक संतुलन को खराब कर देती है। हम में से प्रत्येक यही चाहता है कि वह हमेशा प्रसन्न रहे, सफल रहे, जीवन में उसको सब कुछ प्राप्त हो। विश्व में सबसे ऊंचा मुकाम हासिल हो। लेकिन दूसरों को यह सब मिले, वह बर्दाश्त नहीं कर सकता और अपने मन में ईर्ष्या को पाल लेता है, जिसके कारण वह हर समय परेशान रहता है, दुखी रहता है और अवसाद ग्रस्त हो जाता है।

मनुष्य अपने जीवन में हमेशा असंतुष्ट रहता है। उसे जीवन में जो भी प्राप्त हुआ है, उसमें कमियां ढूंढता रहता है। वह हर समय अपनी तुलना दूसरों के साथ करता रहता है। वह, यह समझना ही नहीं चाहता कि उसे जो प्राप्त हुआ है, वह उसके कर्मों का फल है। लेकिन वह इसे स्वीकार करने की बजाय प्रतिपल ईश्वर को कोसता रहता है। वह भूल जाता है कि ईश्वर ने उसे वही प्रदान किया है, जैसे उसने कर्म किए हैं।

जब हम दूसरों का सुखी देखकर, दुख महसूस करते हैं तो हमें अपने सुख की अनुभूति नहीं होती। हम इसमें सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। जिससे हम मानसिक रूप से परेशान रहने लगते हैं। हमें अपने नजरिए को बदलना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमें जो कुछ प्राप्त हुआ है, इसके जिम्मेवार हम स्वयं हैं इसलिए उसी में प्रसन्न रहना सीखना होगा। अगर हम मानसिक रूप से संतुष्ट नहीं रहेंगे तो शारीरिक रूप में बीमार रहने लग जाएंगे। मन और शरीर एक- दूसरे पर आश्रित हैं। मन खुश रहेगा तभी तन खुश रहेगा। मन का प्रभाव शरीर पर और तन का प्रभाव मन पर पड़ता है। ईश्वर ने किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है। हम सभी उसी ईश्वर की संतान है। अपनी संतान से ही वह भेदभाव कैसे कर सकता है? यह बात हमें समझनी चाहिए।जैसे सूर्य सभी को धूप, गर्मी और रोशनी देता है, वह सभी को समान रूप से प्राप्त होती है, वैसे ही ईश्वर ने सब चीजें सबके लिए समान रूप से बनाई हैं।

इसलिए जो मिला है, उसी में हमें संतुष्ट रहना चाहिए। आनंद की अनुभूति करनी चाहिए। कोई सुखी है तो उसे देखकर हमें खुश होना चाहिए। दूसरों की खुशी में शामिल होकर, अपने व्यक्तित्व को निखारना चाहिए। मन में करुणा का भाव जागृत करना चाहिए। दूसरों को दुख में देखकर उसकी मदद के लिए सोचें, उसके कष्ट दूर करने के बारे में सोचें, ऐसी स्थिति में जब करुणा हमारे भीतर पनपेगी तो मन का सारा मैल बाहर आ जाएगा।

किसी की मदद करके देखिए तो आप स्वयं महसूस करेंगे कि आप के भीतर कितना आनंद भर जाता है। करुणा का भाव हमें निर्मल बनाता है और मन जितना निर्मल होता है, हम ईश्वर के उतने ही निकट पहुंच जाते हैं। मन को निर्मल करने के लिए सत्य का सहारा लीजिए। अपने जीवन में सत्य को धारण कीजिए। सत्य से मन शुद्ध होता है। ज्ञान बुद्धि को शुद्ध करता है। अगर इन भावनाओं को साथ लेकर चलेंगे तो मन के विकार मिट जाएंगे।

वरिष्ठ मनोचिकित्सक मेडिटेशन डॉक्टर गिरीश पटेल कहते हैं कि— हम तब तक तनाव का अनुभव नहीं करते, जब तक कि उसके बारे में हमारे चेतन और अवचेतन मन में कोई विचार नहीं चलता है। जब हमारे विचार नकारात्मक होते हैं, उसमें बेचैनी, ईर्ष्या अथवा अवसाद का एहसास होता है तो वह तनाव उत्पन्न करता है। इनके बारे में चिंतन बंद कर देने से संभव है कि हमें तनाव का अनुभव भी नहीं हो। यदि हम प्रतिकूल या कथित तौर पर तनावपूर्ण वातावरण में भी शांत, खुश एवं रिलैक्स रहते हैं तो हमारा मन भी सकारात्मक रहता है और हम अपने मन के विकारों से काफी हद तक छुटकारा पाने में कामयाब हो जाते हैं।

202. योग का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

योग का शाब्दिक अर्थ है जोड़ना। अध्यात्म में आत्मा को परमात्मा से जोड़ना योग है। पतंजलि के योग सूत्र के अनुसार चित वृत्तियों के नियमन को योग कहते हैं।
योग जीवन जीने की शैली है लेकिन लोग यही सोचते हैं कि प्राणायाम और आसन ही योग हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। यह बहुत बड़ा आध्यात्मिक शास्त्र है। चित्त की प्रवृत्तियों का निरोध ही योग है।
प्रत्येक साधना परमात्मा से जोड़ती है। लेकिन योग साधना में अध्यात्मिक ज्ञान जुड़ा है। इस कारण यह सर्वोपरि है। इसमें कायाकल्प करने की शक्ति निहित है।

योग का सिद्धांत है कि जो स्वस्थ है, वह स्वस्थ बना रहे। अगर कोई बीमार हो जाए तो योग के द्वारा निवारण संभव है। योग में उपचारात्मक अवस्था सम्मिलित है। योग शरीर का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक दृष्टि से विकास करता है। जीवन में असंतुलन की समस्या को ठीक करने में भी योग मार्गदर्शक है।

वेदों के अनुसार आचरण करना, वैदिक दिनचर्या को वहन करना और योग को अपने जीवन में शामिल कर स्वस्थ और संतुलित जीवन जीना ही योग का महत्व है। योग के आठ अंग हैं— यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह सभी एक- दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हम जीवन में प्रतिदिन इनका अभ्यास करना शुरू कर देंगे तो न केवल शारीरिक रूप से बल्कि आत्मिक रूप से भी मजबूत हो जाएंगे।

जो मनुष्य अनासक्त भाव से अपने सभी कर्म ईश्वर को समर्पित कर देता है, वही सच्चा योगी है क्योंकि ईश्वर को अर्पण करने वाला मनुष्य कोई भी दुष्कृत्य कर ही नहीं सकता। उसे सांसारिक प्रपंचों में आसक्ति भी नहीं होती। ईश्वर को समर्पित प्रत्येक कर्म, यज्ञ की पावन आहुतियां बन जाते हैं और समत्व बुद्धि को प्राप्त मानव कर्त्ताभिमान से मुक्त होकर परम योगी बन जाता है।

जब हम कोई भी कार्य बुद्धिमत्ता एवं कुशलता से करते हैं तो वह योग के प्रभाव से ही होता है। योग उनके लिए नहीं है जो सिर्फ खाने के बारे में सोचते रहते हैं या फिर स्वयं को भूखा रखने की कोशिश करते हैं। उनके लिए भी नहीं है जो अत्यधिक नींद लेते हैं या फिर जरूरत से अधिक जागते रहते हैं। योग उनके लिए है जो खानपान एवं आराम करने में संयम रखते हैं, जिनके सोने और उठने का समय निश्चित होता है।

सभी प्रकार की पीड़ा एवं दुखों को नष्ट करने की शक्ति योग में है। योगी किसी से डरता नहीं है क्योंकि वह योग के द्वारा स्वयं को पवित्र बना लेता है। सबसे अधिक भय तो मृत्यु का होता है। योगी को मालूम होता है कि वह अपने शरीर से अलग है। शरीर उसकी आत्मा का अस्थाई घर है। इसलिए उसे डर नहीं लगता। बीमारी तो शरीर में आती है। आत्मा तो अजर- अमर, अविनाशी है।