124. आशा और निराशा

श्री गणेशाय नमः

श्याम देवाय नमः

आशा और निराशा दोनों साथ-साथ चलती हैं। यह निर्णय हमें करना है कि हम आशा को ज्यादा महत्व देते हैं या निराशा को। हमारे मन की संरचना कैसी हो? उसे कैसा बनाना है? हमारी आदतें, विश्वास और वे कौन से तरीके हैं जिनकी सहायता से हम आशा की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। खुद को बुलंद कर सकते हैं। एक अच्छी बात यह भी है कि यह एक ऐसी कला है, जिसे कोई भी विकसित कर सकता है। मनुष्य अपने जीवन में केवल आशा का दामन ही थामे रखना चाहता है। निराशा को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहता, लेकिन वह केवल वही राह सही मानता है, जिस पर वह चल रहा है। वह अपने को हमेशा सर्वश्रेष्ठ मानता है और अपने द्वारा बनाई गई परिपाटी पर ही चलता रहता है लेकिन कभी-कभी वह रास्ता हमें निराशा की तरफ धकेलता है।

आमतौर पर हम अपना जीवन दूसरों की इच्छा के अनुसार ही व्यतीत कर देते हैं। हम स्वयं दूसरों की आलोचना भी करते रहते हैं। यह भूल जाते हैं कि जो आलोचना हम दूसरों के लिए कर रहे हैं, वहीं आलोचना दूसरे भी हमारे लिए कर रहे हैं। फिर आप आलोचना से आहत होते हैं और निराशा की अवस्था में चले जाते हैं। निराश होने की बजाय अगर एकाग्र होकर खुद को देखें और अपना रास्ता स्वयं निर्धारित करें तो आप एक आशापूर्ण जीवन जीते हुए अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। सुबह आंखें मूंद कर बैठ जाएं मन की प्रत्येक गतिविधि को महसूस करें। गहरी सांस लें और भविष्य की सुंदर कल्पनाएं करें। जैसे आने वाले समय में आपको क्या चाहिए? आप कैसी नौकरी चाहते हैं? कैसा परिवार चाहते हैं? अपने सपने को किस तरह से पूरा करना चाहते हैं? इन सबके बीच में अतीत को प्रवेश न होने दें, अन्यथा आपकी चिंताएं फिर सक्रिय हो जाएंगी। भविष्योन्मुखी कल्पनाएं हमें एकाग्र होने में मदद करती हैं। जिससे हमें आशा की एक नई किरण नजर आने लगती है।

अगर हम निराशा को अपने जीवन में शामिल नहीं करना चाहते तो हमारा जीवन विश्वास से भरपूर होना चाहिए।हमारा जीवन ऐसा होना चाहिए जिसमें हमारी तरफ से दूसरों की ओर केवल अच्छा ही जाए। ईश्वर पर हमारा अटूट विश्वास होना चाहिए। हमारा विश्वास इतना दृढ होना चाहिए कि कोई भी बात उस विश्वास को हिला ना पाए। हमें पूरी तरह से निर्भय होकर अपना जीवन गुजारना चाहिए। इस विश्वास के साथ ईश्वर प्रत्येक क्षण हमारे साथ है। हमारी रक्षा और हमारी देखभाल कर रहा है। हमें प्रत्येक के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। चाहे वह हमें सोने की तरह लगे या लोहे की तरह। क्योंकि हमें अहसास होना चाहिए कि एक ही ईश्वर का प्रकाश हम सबके अंदर प्रज्वलित है। ऐसा जीवन गुजारने से ही हम आशा से भरे रह सकते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

मनुष्य दूसरों से अपनी तुलना करता रहता है और अपने गुणों को, खूबियों को नहीं देख पाता। अपनी खूबियां भूलकर कमियों पर ध्यान देना हमें निराशा की तरफ अग्रसर करते हैं। अगर आप खुद को प्राथमिकता नहीं देते तो आप आशावादी नहीं हो सकते। दूसरों के लिए प्रेम, सहानुभूति,दया की भावना रखना ठीक है, पर वह खुद के लिए भी उतना ही जरूरी है। यदि खुद को कमतर समझेंगे तो दूसरे भी हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार करेंगे। इसलिए खुद पर विश्वास रखें, भरोसा रखें, अपनी क्षमता को कम न समझे, दूसरों को खुश रखने के प्रयास में अपने को कभी भी कम नहीं आंकना चाहिए। हमेशा यह याद रखें कि दुनिया केवल अपने बूते चलती है, लोगों को खुश करने के दम पर नहीं। बस जरूरी है, एकाग्र होकर खुद को देखें क्योंकि अपने जीवन के निर्माता हम खुद हैं इसलिए अपने जीवन में आशा को अहमियत दें।

123. खुशी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सलाहकार जेमी इलियन ने पहली बार 2006 में इसका प्रस्ताव रखा था। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने जुलाई 2012 में इसे मनाने की घोषणा की और पहला अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस 20 मार्च 2013 को मनाया गया। कोविड-19 को देखते हुए इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस का थीम था— शांत रहिए, बुद्धिमान एवं दयालु बनिए।
प्रत्येक मनुष्य खुश रहने की कामना अवश्य करता है लेकिन रहता नहीं। इसका प्रमुख कारण यही है कि वह अपने मन में बेवजह के अवसाद, चिंता उत्पन्न करके उनसे ग्रस्त रहता है। वह उन काल्पनिक चिंताओं की छवि को हृदय में आकार देकर रखता है, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। कई बार वह पुरानी पीड़ाओं के घाव को पीड़ा मुक्त होने के बाद भी स्मरण करता रहता है। हमारे हृदय में अवचेतन मन 24 घंटे उपस्थित रहता है। यह अवचेतन मन व्यक्ति के अंतर्मन में रहता है। जो मनुष्य अपनी परेशानियों को दिन- रात सोचते रहते हैं, अवचेतन मन में दिशा दी कल्पनाएं संग्रहित होती रहती हैं और उन परेशानियों का बोझ बढ़ता रहता है। मनुष्य के चेहरे पर उन कल्पनिक परेशानियों का बोझ बीमारी, चिंता, क्रोध, ईर्ष्या के रूप में उजागर होता रहता है।
खुशी आखिर है क्या? इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इन सवालों के जवाब हर कोई जानना चाहता है। जब हम छोटे होते हैं तो खुशी को हम पार्टी करने, मस्ती, धमाल या शोर- शराबे से जोड़ते हैं। लेकिन जब हम व्यस्क हो जाते हैं तब भौतिक वस्तुएं जैसे नौकरी, विवाह, अच्छा भोजन, घर, गाड़ी आदि वस्तुओं में हम खुशी तलाशने लगते हैं लेकिन वास्तव में देखा जाए तो यह सभी वस्तुएं क्षणिक आनंद प्रदान करने वाली हैं, यह खुशी का प्रतीक भर है, लेकिन वास्तविक खुशी नहीं। असली खुशी एक अच्छे अहसास से कहीं ज्यादा बड़ी वस्तु है। यह केवल हंसता हुआ चेहरा नहीं है।
खुशी दरअसल मन की एक अवस्था है इसे मन के अंदर ही प्राप्त किया जा सकता है।
खुशी तो वह अवस्था है जिसे प्रकृति ने निःशुल्क प्रदान किया है लेकिन मनुष्य इसके निःशुल्क महत्त्व को नहीं समझता और अपनी समझ से इसकी कीमत निर्धारित कर लेता है, जो मनुष्य खुश होने का मंत्र जान जाता है, उसके लिए भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति का अधिक महत्व नहीं होता क्योंकि वह उनके न रहने पर या विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहना जानता है।
खुशी यानी जब मन प्रफुल्लित होने का एहसास हो। हम कोई ऐसा कार्य करें जिससे संतुष्टि मिलें। हमें लगे कि मैंने वह कार्य किया जो मायने रखता है। जिस कार्य को करने के बाद आत्मसम्मान बढे। खुद पर गर्व का एहसास हो। वह एहसास जो उमंग से भर देता है और हमें सदैव बेस्ट करने के लिए प्रेरित करता रहता है।
वास्तव में देखा जाए तो हम सब खुश रहना चाहते हैं पर कभी- कभी कुछ वस्तुएं हमारे नियंत्रण में नहीं होती। कभी-कभी हमें महसूस होता है कि मुश्किल समय खत्म हो जाएगा तो हम खुश हो जाएंगे पर ऐसा हो यह जरूरी नहीं तो फिर कहां मिलेगी खुशी? कैसे मिलेगी खुशी?
खुशी को प्राप्त करने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि—हमें क्या चाहिए? हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? दूसरों की नजर में हम किस तरह से याद किए जाना पसंद करेंगे और उसके लिए हम क्या कर रहे हैं?
यह सब पता होना चाहिए। जब हमारी प्राथमिकताएं तय हो जाएंगी, उसके बाद हमें अपने अंतर्मन में झांकने की कोशिश करनी चाहिए कि वह कौन- सी वस्तु है जो हमें संतोष दे सकते है। हमें आत्मगौरव का एहसास करा सकती है। यदि यह जान गए तो हम उसी दिशा में प्रयास करने लगेंगे और खुशी को अपने पास पाएंगे। कभी-कभी हम बहुत अधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं। छोटी-छोटी बातों पर झल्लाने लगते हैं। अपनी बात कहना चाहते हैं, पर उसे किसी के सामने कहना सही नहीं समझते।
खुशी को चुनने का विकल्प मनुष्य के पास सदैव मौजूद रहता है। अगर हम अपने जीवन में कुछ उपाय आजमा कर देखें तो खुशी सदैव हमारे आंगन की रौनक बन सकती है।

सदैव सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण रखें।

भय, क्रोध, ईर्ष्या को पंख न दें।

अपनी पसंद का काम करना खुशी देता है इसलिए प्रतिदिन
कुछ समय अपने पसंदीदा काम में लगाएं।

उन कार्यों पर फोकस करें जो सचमुच महत्व रखते हैं जो हमें सिखाते हैं कि— दूसरों की जिंदगी में हम कैसे बदलाव लाएं। ऐसा कोई भी कार्य हो सकता है जैसे दूसरों की मदद करना या पर्यावरण को बचाना इत्यादि। खुशी से इन चीजों का गहरा नाता होता है।

दया भाव, करुणा, सहानुभूति का भाव, हास्य बोध या नेतृत्व के गुण इनमें से कोई न कोई गुण या एक से अधिक गुण हर व्यक्ति में मौजूद होते हैं। उनका अभ्यास करें। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने गुणों को बाहर निकालिए। इसे व्यक्तित्व की मजबूती बढ़ती जाएगी और खुशी भी देर तक बनी रहेगी।

खुशी के लिए रिश्तो की मजबूती भी जरूरी है।

कुछ अलग से भी सीख सकते हैं जैसे संगीत, पढ़ना- लिखना इत्यादि। इससे आपको अलग से ख़ुशी का एहसास होगा।

किसी भी कार्य को बोझ मत समझिए। यह मत सोचिए कि यह कार्य करना ही होगा बल्कि यह सोचिए कि यह काम किया जाएगा तो हमें कितना संतोष प्राप्त होगा।

ऐसी कौन सी वस्तु है जो आपको खुशी से दूर ले जा सकती है यानी अपनी कमियों पर फोकस कीजिए और उन कमियों को दूर करने का प्रयास शुरू कर दीजिए।

आज से ही खुशी को चुनें और अपने मन के सहज भावों से खुशी के पंख लगाएं जिससे कि वह हमारे इर्द- गिर्द उड़कर चारों ओर खुशी फैलाए और सबको सुखी बनाए।

122. जीवन का उद्देश्य

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य जीवन एक अमूल्य ईश्वरीय देन है। जीवन का उद्देश्य इस संसार में जन्म लेकर सिर्फ अपनी सांसे पूरी कर इस दुनिया को अलविदा कहना मात्र नहीं है बल्कि यह जीवन तो इतिहास बनाने का नाम है। यह एक ऐसा मंच है, जहां पर मनुष्य अपना हर सपना पूरा कर इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम दर्ज करवा सकता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को इसे सार्थक बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।
जीवन को सार्थक बनाने के लिए यह परम आवश्यक है कि सबसे पहले अपने जन्म के उद्देश्य को पहचान कर उसका अनुसरण करें। किसी भी मनुष्य का जन्म एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए होता है। हमें उसी उद्देश्य को तलाशना होगा, जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें यह मानव शरीर प्राप्त हुआ है। यहां तक की ईश्वर ने भी विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही मानव शरीर धारण किया है।

किसी भी मानव के लिए उसके जीवन के दो दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। एक वह जिस दिन वह जन्म लेता है और दूसरा वह, जिस दिन उसे अपने जन्म के उद्देश्य का भान हो जाता है। हमारा हमेशा यह प्रयास होना चाहिए कि हम अपने जीवन का मकसद तलाशकर अपनी क्षमतानुसार परिश्रम करते हुए उस लक्ष्य को हासिल करें जो हमारे लिए निर्धारित है, अन्यथा उद्देश्य विहीन जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।

वास्तव में मानव जीवन की सार्थकता त्याग की भावना से जीवन जीने और दूसरे के दुख को दूर करने में निहित है। दूसरों के लिए प्रकाश की एक किरण बनना सबसे बड़ा सुख है। वास्तव में देखा जाए तो हमारा जीवन हर क्षेत्र में त्याग से जुड़ा हुआ है। जन्म लेने के बाद मां द्वारा अपनी हर इच्छा का त्याग करने के बाद ही हम अपना वृक्ष रुपी जीवन जी पाते हैं और अपने आकाश जितनी ऊंचाई वाले बड़े- बुजुर्गों के साएं में उनको अपना बागवां मानते हुए जीवन रूपी नैया को पार ले जाने में सफल हो पाते हैं। इन सब के लिए भगवान श्री राम जी जैसा त्याग होना आवश्यक है। मानव सेवा का वृत लेने से बढ़कर कोई दूसरा वृत मीठा फल देने वाला नहीं है।

कहा गया है कि— त्याग से तप, तप से भोग और भोग से राज। यही जीवन का सार है। त्याग की महिमा का कोई अंत नहीं है। हम अपने जीवन से भी बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। मां के साएं में रहकर बहुत कुछ सीखते हैं। यह सत्य है की त्याग रुपी जीवन जीने से, अंतिम समय में हम अपना जीवन सुखमय, भक्तिमय और करुणामय बना पाते हैं।
प्रख्यात लेखक स्वेट मार्डन कहते हैं कि— जो दूसरों के दुखी एवं अंधकारमय जीवन में सुख का प्रकाश पहुंचाते हैं, उनका नाम सदैव संसार में रहेगा। ऐसे लोग अमर होते हैं।

ऐसे में समय पर यह आभास होना आवश्यक है कि मनुष्य जीवन कुछ अच्छा करने के लिए मिला है। इसलिए हमें सजग हो जाना चाहिए कि यह जीवन कहीं व्यर्थ न चला जाए। जीवन को सार्थक बनाने के लिए हमें अपने भीतर की ऊर्जा का उपयोग सार्थक एवं उचित लक्ष्यों के लिए करना चाहिए क्योंकि मनुष्य जीवन की सार्थकता उद्देश्य पूर्ण जीवन जीने में है।

121. ॐ के लाभ

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

  • इससे मन को एकाग्र करने में मदद मिलती है।
  • इसके नियमित उच्चारण से मानसिक बीमारियां दूर होती हैं।
  • दिल की धड़कन और रक्त संचार ठीक रहता है।
  • काम करने की शक्ति बढ़ती है।
  • इसका उच्चारण करने वाला और सुनने वाला दोनों ही लाभान्वित होते हैं।
  • ॐ का ध्यान करने से जीवन में आने वाली बाधाएं स्वत: ही दूर हो जाती हैं।
  • रोग, निराशा, संदेह, आलस्य, झूठी धारणा, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि ये सब मानसिक बीमारियां दूर हो जाती हैं।
  • मानसिक विकृतियों के साथ शारीरिक दर्द, शरीर में कंपन और सांस लेने में परेशानी आदि ॐ का उच्चारण करने से दूर हो जाती हैं।
  • अगर आपको घबराहट हो रही हो तो ॐ का उच्चारण कीजिए।
  • यह शरीर के विषैले तत्वों को दूर करता है अर्थात् तनाव के कारण होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।
  • पाचन शक्ति तेज होती है।
  • यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।
  • नियमित उच्चारण करने से शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है।
  • कुछ प्राणायाम भी साथ किए जाएं तो फेफडों में मजबूती आती है।
  • नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय इस को लगातार करने से कुछ ही समय में नींद की समस्या दूर हो जाती है।
  • कायरतापूर्ण विचारों का आना बंद हो जाता है।
  • जीवन से भय का नाश हो जाता है। मनुष्य निर्भीक होकर अपनी जिंदगी जीता है।
  • परिस्थितियों को पहले ही भांपने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
  • जीवन से क्रोध खत्म हो जाता है।
  • जीवन जीने की शक्ति और दुनिया की चुनौतियों का सामना करने का अपूर्व साहस मिलता है।
  • इससे जीवन के उद्देश्य स्पष्ट होते हैं और हमें ईश्वर का सानिध्य प्राप्त होता है।
  • अगर ॐ का उच्चारण लंबे समय तक किया जाए तो हमारे अंदर ईश्वर को महसूस करने की ताकत प्राप्त हो जाती है।
  • इस दुनिया में आकर अंधी दौड़ में खो चुके खुद को फिर से पहचान मिलती है। स्वयं को जानने के बाद मनुष्य दौड़ में शामिल नहीं होता बल्कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दौड़ता है।

120. योग और स्वाध्याय

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हम कई प्रकार के योगों के नाम सुनते हैं, परंतु वास्तव में योग मात्र एक तरह का ही होता है। जीवन और परमात्मा का संयोग साधन ही योग का उद्देश्य है अर्थात् जीवात्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है।
परब्रह्म परमेश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है। उसकी सत्ता है, अस्तित्व है। वह सत्यस्वरूप है। वह चेतनस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और आनंदस्वरूप है। सुखों का भंडार एवं आनंद का स्रोत है।
वेदव्यास के पुत्र शुकदेव जी ने पूर्व जन्म में किसी वृक्ष की शाखा में भगवान शिव के मुख से निकला हुआ योगोपदेश श्रवण किया और उसी के सुनने मात्र से पक्षी योनि से उधार पाकर परजन्म में परम योगी बन गए। योग का उपदेश सुनने मात्र से जब इतना लाभ होता है, तब उसकी साधना करने से ब्रह्मानंद तथा समस्त सिद्धियों के प्राप्त होने में क्या संदेह रह जाता है?
परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति तीनों ही सत् हैं, नित्य हैं, अविनाशी हैं। जीव पूर्ण आनंद की प्राप्ति के लिए परमात्मा से सदैव कामना करता रहता है। मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य सृष्टि कर्ता, अनुपम, शुद्धस्वरूप, सर्वशक्तिमान, सर्व व्यापक, सर्वेश्वर के दर्शन करना तथा मुक्ति की प्राप्ति करना है, जिसके लिए वह निरंतर प्रयत्नशील रहता है।

महर्षि पतंजलि ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अष्टांग योग का मार्ग दिखाया है। उन्होंने पूर्ण योग की 8 सीढ़ियां बताई हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है। जिसका अनुसरण करने से हम दुखों से छूटकर उस मोक्ष धाम अर्थात् मुक्ति, श्रेष्ठ गति, परम आनंद को प्राप्त कर सकते हैं, जिससे मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है और वह परमात्मा के सच्चे दिव्य स्वरूप के दर्शन कर सकता है।
इसकी पहली सीढ़ी है यम और दूसरी है नियम।
यम में साधक को सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह तथा नियम में शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणीधान को अपनाना होता है।
यम और नियम का उद्देश्य मनुष्य की मानसिक स्थिति को अवगुणों से मुक्त कर उसे ईश्वर साधना के लिए तैयार करना है। इसमें स्वाध्याय का विशेष स्थान होता है।
स्वाध्याय का तात्पर्य वास्तव में धर्म ग्रंथों में वर्णित आध्यात्मिक ज्ञान के संदर्भ में स्वयं का अध्ययन करने से है। श्रीमद्भगवद् गीता में इसका मर्म समझाया गया है। गीता के अनुसार प्रत्येक जीव में ईश्वरीय अंश विद्यमान है। इसलिए मनुष्य को बाहरी संसार में ईश्वर को खोजने की बजाय अपने भीतर ही यह खोज करने चाहिए। इसी प्रकार का आध्यात्मिक ज्ञान अलग-अलग धर्म ग्रंथों से प्राप्त होता है।

योग धर्म जगत का एकमात्र सच्चा मार्ग है। योगाभ्यास के द्वारा चित्त की एकाग्रता प्राप्त हो जाने पर ज्ञान उत्पन्न हो जाता है और उसी ज्ञान से जीवात्मा को मुक्ति मिलती है। शास्त्र पढ़ने से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह बिना स्वाध्याय के ज्यादा फलदाई नहीं होता। मन, बुद्धि और इंद्रियों को सभी बाहरी विषयों से निवृत करके अंतर्मुखी होकर परमात्मा से मिलने का नाम हू वास्तविक ज्ञान है। यह ज्ञान स्वाध्याय के बिना प्राप्त नहीं होता है। साधारण मनुष्य जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह केवल भ्रांति है क्योंकि सभी जीव माया के फंदे से जकड़े हुए हैं और इस फंदे को तोड़े बिना सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। योग एक ऐसी क्रिया है जो हमें दिव्यज्ञान से साक्षात्कार कराती है। योग विहीन सांसारिक ज्ञान वास्तव में अज्ञानता है। इससे सुख की अनुभूति होती है, न कि मुक्ति मिलती है।

स्वाध्याय में मनुष्य ज्ञान के प्रकाश में स्वयं का अध्ययन करता है कि— क्या वह उचित ज्ञान के अनुसार अपना जीवनयापन कर रहा है? यदि वह अपने व्यवहार में कुछ भिन्नता पाता है तो उसे स्वाध्याय के द्वारा सुधारने का प्रयास करता है। स्वाध्याय के द्वारा मनुष्य मानवीय दुर्गुणों से मुक्त होकर ईश्वर से जुड़ने के लिए स्वयं को तैयार करता है। इसके उपरांत ही वह योग द्वारा इस प्रक्रिया को पूरा करता है। स्वाध्याय के महत्व को समझने से पहले यह आवश्यक है कि साधक की आध्यात्मिक ज्ञान में श्रद्धा हो क्योंकि श्रद्धा के द्वारा ही वह, उस ज्ञान को स्वीकार करता है। इसलिए योग में स्थित होने के लिए प्रत्येक मनुष्य को, अपने जीवन में स्वाध्याय को अवश्य अपनाना चाहिए।

119. ॐ का महत्व एवं उच्चारण विधि

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

  • उच्चारण की विधि— प्रातः उठकर पवित्र होकर ॐ का उच्चारण करने से पूरे शरीर में एक स्पंदन होता है। जो हमारे आलस्य और निराशा को दूर भगाता है और हम पूरे दिन तरोताजा महसूस करते हैं। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, बज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। आप अपने समय के अनुसार 5,7,10 जितनी बार चाहे कर सकते हैं। उच्चारण करते समय यह आप पर निर्भर करता है कि आप जोर-जोर से उच्चारण करेंगे या धीरे-धीरे। आप जैसे भी करें, इसका फल बराबर ही मिलता है। यह जरूरी नहीं जोर-जोर से करने से ज्यादा फायदा होगा और धीरे-धीरे करने से कम फायदा होगा। बस आप ध्यान और एकाग्रता से उच्चारण करने का अभ्यास करते रहिए। धीरे-धीरे आपको इसकी शक्ति का आभास स्वयं होने लगेगा।
  • वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों का कहना है कि—ॐ तथा एकाक्षरी मंत्र का उच्चारण करने में दांत, नाक, जीभ सब का उपयोग होता है, जिससे हार्मोनल स्राव कम होता है तथा ग्रंथि स्राव को कम करके यह शब्द कई बीमारियों से रक्षा तथा शरीर के सात चक्कर (कुंडलिनी) को जागृत करता है। साथ ही पद्मासन में बैठकर इसका जप करने से मन को शांति तथा एकाग्रता की प्राप्ति होती है।
  • ॐ का महत्व— धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है।
  • ॐ का जाप कर साधक अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर लेते हैं।
  • कोशातकी ऋषि निसंतान थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने सूर्य का ध्यान कर ॐ का जाप किया तो पुत्र की प्राप्ति हो गई।
  • गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार—जो कुश के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हजार बार ॐ रुपी मंत्र का जाप करता है। उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
  • “सिद्धयन्ति अस्य अर्था: सर्वकर्माणि च”
  • श्रीमद्भागवत् में आठवें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि— जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है।
  • “ध्यान बिन्दुपनिषद” के अनुसार ॐ मंत्र की विशेषता यह है कि—पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इस का जप करता है। उच्चारण करता है तो उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप कर्त्ता पर कोई कलुष नहीं लगता।
  • ” तैत्तिरीयोपनिषद् शिक्षावली अष्मोऽनुवाक:” के अनुसार ॐ ही ब्रह्म है, ॐ ही प्रत्यक्ष जगत् है, ॐ ही जगत् की अनुकृति है।
  • हे आचार्य ॐ के विषय में और भी सुनाएं।
  • आचार्य सुनाते हैं—ॐ से प्रारंभ करके साम गायक सामगान करते हैं।
  • ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मंत्र पढे जा़ते हैं।
  • ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मंत्रों का उच्चारण करता है।
  • ॐ कह कर ही अग्निहोत्र प्रारंभ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करते हैं।
  • ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
  • कठोपनिषद् (अध्याय।, वल्ली 2) के अनुसार— सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं। जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। उस पद को मैं, तुम्हें संक्षेप में कहता हूं। वह पद ॐ है।
  • मांडूक्योपनिषद् (गौ०का०श्लोक।)— ॐ अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है। उसी की व्याख्या है। इसलिए यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है, वह भी ओंकार ही है।
  • गुरु नानक जी का शब्द “एक ओंकार सतनाम” बहुत प्रचलित तथा शतप्रतिशत सत्य है। एक ओंकार ही सत्य नाम है। राम, कृष्ण सब फलदाई नाम ओंकार पर निहित हैं तथा ओंकार के कारण ही इनका महत्व है। बाकी नामों को तो हमने बनाया है, परंतु ओंकार ही है जो स्वयंभू है तथा हर शब्द इससे ही बना है। हर ध्वनि में ओउम् शब्द होता है।
  • यह सर्वविदित है कि ओउम् (ॐ) तीन अक्षरों से बना है। अ, उ् , म् ।
  • यहां पर अ का अर्थ है —आविर्भाव या उत्पन्न होना।
    उ का अर्थ है—उठता, उड़ना अर्थात् विकास।
    म् का अर्थ है —मौन हो जाना अर्थात ब्रह्मलीन हो जाना।
  • यह तो स्पष्ट है कि ॐ संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का घोतक है। ॐ में प्रयुक्त अ तो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है। वहीं उ उड़ने का अर्थ देता है, जिससे अभिप्राय ऊर्जा से है।
  • जब आप किसी मंदिर या तीर्थ स्थल पर जाते हो तो वहां ऊर्जा के सानिध्य में थोड़े से समय रहने के बाद भी काफी ऊर्जावान महसूस करते हो। वहां की अगाध ऊर्जा ग्रहण करने के बाद व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को आकाश में उड़ता हुआ देखता है।
  • मौन का महत्व ज्ञानियों ने बताया ही है।
  • अंग्रेजी में एक उक्ति है—
  • silence is silver and absolute silence is gold.
  • गीता में स्वयं श्री कृष्ण ने मौन के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए स्वयं को मौन का ही पर्याय बताया है।
  • “मौनं चैवास्मि गुह्यानां”
  • सनातनधर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ॐ को महत्व प्राप्त है।
  • बौद्ध दर्शन में “मणिपद्मेहुम” का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार ॐ को मणिपुर चक्र में अवस्थित माना जाता है। यह चक्कर दस दल वाले कमल के समान है।
  • जैन दर्शन में भी ॐ के महत्त्व को दर्शाया गया है।
  • हिन्दू धर्म में महाविस्फोटक शब्द ॐ की ध्वनि का कलरव हमेशा बहता रहता है। ॐ सभी मंत्रों में मंत्रराज होने के कारण हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है जो प्रतिदिन ॐ का उच्चारण करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह एक संपूर्ण मंत्र है, जो सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने में सहायक होता है। किसी भी मंत्र के प्रारंभ में तथा अंत में ॐ का प्रयोग करने से हमारे शारीरिक तथा मानसिक दोष नष्ट हो जाते हैं। ॐ परम शांति व मोक्षदायक मंत्र है।

118. ॐ का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

महर्षि पतंजलि के ग्रंथ “योगदर्शन” के 27वें सूत्र में कहा गया है—”तस्य वाचक प्रणव:” ईश्वर शब्द का बोध करने वाला शब्द ॐ है।
*यजुर्वेद 40/17 में कहा गया है—”ओम स्वयं ब्रह्म” अर्थात् ॐ ही सर्वत्र व्यापक परम ब्रह्म है।
*आइंस्टीन भी यही कह कर गए हैं कि—ब्रह्मांड फैल रहा है।
*आइंस्टीन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था— महावीर से पूर्व वेदों में इसका वर्णन है। महावीर ने वेदों में पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतरकर देखा,अनुभव किया, तब कहा।
*”ओम सतनाम कर्ता पुरख, निर्भाऊ निर्वेर अकालमूरत” अर्थात् ओउ्म सतनाम जपने वाला पुरुष निर्भय, बैर- रहित एवं अकाल- पुरुष’ के सदृश हो जाता है।
*ॐ ब्रह्मांड का नाद है, एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक है।

  • छान्दोग्योपनिषद् में ऋषियों ने कहा है—ॐ इत्येतत् अक्षर: अर्थात् ॐ अविनाशा, अव्यय एवं क्षरण रहित है।
  • अध्यात्म जगत्— अध्यात्म में ॐ का विशेष महत्व है।वेद शास्त्रों में भी ओम के कई चमत्कारिक प्रभावों का उल्लेख मिलता है। ॐ को बोलते वक्त ओ पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं, क्योंकि इसका प्रारंभ है,अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि होने के कारण अनवरत गुंजायमान रहती है।
    तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई ऐसी ध्वनि है, जो लगातार सुनाई देती रहती है। जब ध्यान लगाते हैं तो अंदर भी सुनाई देती हैै और बाहर भी। हमारे चारों तरफ वह ध्वनि अनवरत प्रवाहित होती रहती है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा, शांति महसूस करती हैं, तो उन्होंने उस ध्वनि का नाम दिया —ॐ।
    साधारण मनुष्य उसे सुन नहीं सकता, लेकिन जो आध्यात्म में विश्वास करता है और ॐ का उच्चारण करता रहता है, उसके आस-पास सकारात्मक उर्जा का विकास होने लगता है। वह उस ध्वनि को सुन तो नहीं पाता, पर महसूस कर सकता है। क्योंकि उसे अपने आसपास सुकून भरा अहसास होता है, जिससे उसका मन हमेशा अच्छा रहता है और उसका जीवन खुशियों से सराबोर हो जाता है। उस ध्वनि को सुनने के लिए या उसका पूरा लाभ उठाने के लिए तो उसे अध्यात्म जगत् की गहराइयों में जाना होगा, क्योंकि तभी वह पूर्णतः मौन धारण कर पाएगा और ध्यान की अवस्था को प्राप्त करेगा। यह सत्य है कि जिसने भी उस ध्वनि को सुना, वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगा। परमात्मा से जुड़ने का साधारण- सा तरीका है— ॐ का उच्चारण करते रहना।
    *ॐ का वैज्ञानिक महत्व—आधुनिक युग में जब विज्ञान प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्वों का मूल्यांकन करता है तो, इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशाई हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में पूरी तरह कामयाब नहीं हुआ है,किंतु वेदांत में जिस सनातन धर्म की सत्यता की महिमा का वर्णन किया है, विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है। आज के समय में वैज्ञानिकों ने भी शोध के माध्यम से ॐ के चमत्कारिक प्रभाव की पुष्टि की है। पाश्चात्य देशों में भारतीय वेद पुराण और हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति और परंपरा काफी चर्चाओं और विचार-विमर्श का केंद्र रहे हैं। दूसरी और वर्तमान की वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रेरणास्रोत भारतीय शास्त्र और वेद ही रहे हैं। हालांकि स्पष्ट रूप से इसे स्वीकार करने से भी वैज्ञानिक बचते रहे हैं।
  • कुछ समय पहले यूरोपियन स्पेस एजेंसी और नासा की संयुक्त प्रयोगशाला सोहो ने संयुक्त रूप से सूर्य से निकलने वाली ध्वनि का अध्ययन किया। काफी समय की रिसर्च के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ये ध्वनि हिंदू धर्म के ॐ की भांति है।
  • ॐ की शक्ति परमाणु बम से हजारों गुना शक्तिशाली है। इसकी शक्ति को पहचानने पर कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। कुछ समय पूर्व रूस के ध्वनि विशेषज्ञों ने अपनी रिसर्च में दावा किया था कि— यदि ॐ का उच्चारण विशेष फ्रीक्वेंसी के तहत किया जाए तो सिर्फ कांच ही नहीं, अपितु पत्थर की दीवार में भी दरार उत्पन्न हो सकती है।
    हमें यह भान होना चाहिए कि हम 21वीं सदी में हैं। विज्ञान अब बहुत अधिक प्रगति कर चुका है। गायत्री मंत्र में ॐ को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि— हमारे पृथ्वी मंडल, ग्रह मंडल एवं अंतरिक्ष में स्थित आकाशगंगाओं की गतिशीलता से उत्पन्न सामूहिक ध्वनियां ही ॐ की दिव्य ध्वनि है। अब यह केवल कल्पना नहीं बल्कि वास्तविकता है। विभिन्न ग्रहों की ध्वनियों को नासा के वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड किया है, जिन्हें planet sounds के नाम से इंटरनेट पर सुना जा सकता है।
    विभिन्न ग्रहों की गतिशीलता से उत्पन्न ध्वनियां ही हमें निरंतर इस बात का अहसास कराती हैं कि— प्रत्येक ग्रह अपनी धुरी पर एवं सूर्य के चारों ओर एक निश्चित गति से निरंतर चक्कर लगाते रहते हैं। जिनसे ये अनंत ब्रह्मांड, अनंत काल से गतिशील हैं। जिससे सृष्टि का जीवन चक्र बिना किसी अवरोध के निरंतर चलता रहता है। भौतिक नियमों के अंतर्गत पृथ्वी की गतिशीलता से दिन-रात एवं ऋतु में परिवर्तन आदि होता रहता है। ग्रहों की गतिशीलता से उत्पन्न ये ध्वनि तरंगें जो समस्त ब्रह्मांड में सदा व्याप्त रहती हैं, सृष्टि की निरंतरता का हमें बोध कराती हैं तथा इन्हीं से सृष्टि का निर्माण एवं सृजन होता है।
    विभिन्न ग्रहों से आ रही विभिन्न ध्वनियों को ध्यान की पूर्ण अवस्था में जब मन पूरी तरह एकाग्र होकर विचार शून्य हो जाता है, तब इन ध्वनियों को सुना जा सकता है। क्योंकि यह तो विज्ञान का सामान्य नियम है कि—कोई भी ध्वनि स्वत: उत्पन्न नहीं हो सकती। जहां हलचल होगी वहीं ध्वनि उत्पन्न होगी। अनेक संत महात्माओं ने भी ॐ के ध्वन्यात्मक स्वरूप को ही ब्रह्म माना है तथा ॐ को शब्द ब्रह्म भी कहा है। ऋग्वेद के “नाद बिंदु” उपनिषद में आंतरिक और आत्मिक मंडलों में शब्द की ध्वनि को समुद्र की लहरों, बादल, ढोल, पानी के झरनों, घंटे जैसी आवाज के रूप में सुने जाने का वर्णन है। “हठयोग प्रदीपका” में भंवरे की गुंजार, घुंगरू, शंख, घंटी, खड़ताल, मुरली, मृदंग, बांसुरी और शेर की गरज जैसी ध्वनियों का वर्णन है। स्वामी शिवानंद ने अपनी पुस्तक “जप योग” में लिखा है— ध्यान के किसी सुविधाजनक आसन में बैठ जाओ। अंगूठे से कानों को बंद कर लो। विभिन्न प्रकार की आवाजें जैसे बांसुरी, वार्यालन, नक्कारा, शंख, घंटी आदि की आवाजें सुनाई पड़ेगीं। इन ध्वनियों या नाद को ब्रह्मांड के बाहर शून्य से आता हुआ कहा गया है, किंतु वास्तव में यह विभिन्न ग्रहों की गतिशीलता से उत्पन्न ध्वनियां हैं। चूंकि प्रत्येक ग्रह का आकार, गति तथा पृथ्वी से दूरी भिन्न-भिन्न होती है। ये ध्वनियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं।
    *तंत्र योग में ॐ का महत्व—तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व होता है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप प्रदान किया गया है। जैसे —कं, खं, गं, घं आदि।
    इसी तरह श्रीं, कलीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। इनको बीज मंत्र भी बोला जाता है। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालु, दांत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि से शरीर के सभी चक्र और हारमोन स्राव करने वाली सभी ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं। जो एक सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करने का कारण बनती हैं।

117. ॐ की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ॐ हिंदू धर्म की जीवन ज्योति है। ॐ वह ध्वनि है, जो सृष्टि की उत्पत्ति के समय सबसे पहले सुनी गई थी। अर्थात् इस धरा की पहली ध्वनि जिसको ॐ के नाम से संबोधित किया जाता है। वास्तविक रूप में देखा जाए तो ॐ जीवन का सार है। सारी सृष्टि इसके चारों तरफ घूमती हुई प्रतीत होती है। ॐ ब्रह्मांड की ध्वनि है एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम इसी ध्वनि का स्फुरण हुआ, जो बाद में एक मंत्र बन गया। ॐ अपने आप में एक मंत्र है। इसके बाद ही (सात) 7 करोड मंत्रों का आविर्भाव होता है। ॐ, अ, उ और म से मिलकर बना है। यह एक ऐसे अक्षरों का सम्मिश्रण है, जिनका कभी अंत नहीं होता। संपूर्ण ब्रह्मांड में सदैव ॐ की ध्वनि निसृत होती रहती है।
प्रत्येक जीव की हर श्वास में ॐ की ध्वनि ही निकलती है। यही हमारे श्वास की गति को नियंत्रित करता है। ॐ को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। ॐ का यह चिन्ह अद्भुत है। यह पूरे ब्रह्मांड को प्रदर्शित करता है। बहुत सारी आकाशगंगाएं ऐसे ही फैली हुई हैं। ॐ शब्द के उच्चारण मात्र से शरीर में एक सकारात्मक ऊर्जा आती है। हमारे शास्त्रों में ओंकार ध्वनि के सौ (100) से भी ज्यादा अर्थ बताए गए हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि— मंत्रों में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिनका कोई अर्थ नहीं निकलता, लेकिन उनसे जो ध्वनि निकलती है, वह शरीर के ऊपर अपना प्रभाव डालती हुई प्रतीत होती है। यह उच्चारण के साथ ही शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है। भारतीय सभ्यता के प्रारंभ से ही ओंकार ध्वनि के महत्व से सभी परिचित रहे हैं। यह अनादि है, अनंत है तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।
ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि होने के कारण ही ॐ को ब्रह्मांड की आवाज कहा जाता है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय ही यह ध्वनि अस्तित्व में आई, इसलिए ब्रह्मांड स्थाई नहीं है। कुछ भी हमेशा ठोस या स्थिर नहीं होता। सब कुछ जो स्पंदित होता है, एक कंपन, एक तरंग या ये कहें कि एक ध्वनि का निर्माण करता है। जिसे ॐ की ध्वनि में कैद किया था। हम अपने जीवन में हमेशा इस ध्वनि के प्रति सचेत नहीं रहते, लेकिन अगर हम ध्यान से सुनें तो हमारे चारों तरफ पूरे वातावरण में एक ध्वनि गुंजायमान है और वह ध्वनि वृक्षों के पत्तों में, सागर की लहरों में, शंख की आवाज में, मंदिर की घंटी में सुन सकते हैं।
ॐ के तीन शब्द ओ,उ और म, त्रिदेव— ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा त्रिलोक भू भुर्व: स्व: —भूलोक, भुव: लोक तथा स्वर्ग लोक का प्रतीक है। अ से आकार, उ से उपकार, म से मरना और बिंदु को हमें परमपिता परमात्मा का रूप समझना चाहिए। जीवन का पूरा सत्य ॐ के अंदर ही समाहित है। कोई भी प्राणी जन्म लेता है, तो उसे एक शरीर मिलता है। तब उसका यह कर्तव्य बनता है कि— वह अपना जीवन परोपकार में लगाए, क्योंकि अंत समय में सभी प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इन सभी का साक्षी परमपिता परमात्मा हमारे अंतर्मन में जीवन भर हमारे साथ रहता है। जो हमें हर समय सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है। इसलिए हमें सदा ही धर्म के कार्य के लिए अपना जीवन लगाना चाहिए।
ॐ शब्द हिंदू धर्म का प्रतीक चिन्ह ही नहीं अपितु यह हिंदू परंपरा का सबसे पवित्र शब्द है। हिंदू धर्म के सभी वेद मंत्रों का प्रारंभ भी ॐ के उच्चारण से शुरू किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि— किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति संपन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों सेे पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है। जैसे—
ॐ रामाय नमः —श्रीराम का मंत्र
ॐ विष्णवे नमः —विष्णु का मंत्र
ॐ नमः शिवाय —शिव का मंत्र
कहा जाता है कि—ॐ से रहित कोई मंत्र फलदाई नहीं होता, चाहे आप उसका कितना भी जाप कर लो। ॐ स्वयं में एक पूर्ण मंत्र है। ऐसा भी माना जाता है कि—एक बार ॐ का जाप, हजार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। ॐ का दूसरा नाम प्रणव अर्थात परमेश्वर है।
“तस्य वाचक: प्रणव” अर्थात उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। प्रणव,ॐ, ब्रह्म ये तीनों एक ही हैं। ॐ एक ऐसा अक्षर है जिसका, क्षरण अथवा विनाश नहीं होता।

116. पाऐं, स्वयं पर विजय

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सिकंदर ने एक बार कहा था कि— मैंने दुनिया को जीतने में सफलता प्राप्त की, पर स्वयं से हार गया क्योंकि मेरे अंदर ही लोभ, मोह, अहंकार प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है।
दूसरों से तो सभी लड़ लेते हैं। विरोधी या शत्रु से लड़कर उन्हें परास्त करके विजय प्राप्त की जा सकती है। इसमें कोई खास बहादुरी नहीं है। अगर किसी को योद्धा या शूरवीर कहलाने का इतना ही शौक है तो सबसे पहले अपने भीतर बैठे शत्रु से लड़ कर तो देखें कि— क्या वह अपने दुर्गुण, बुराई जैसे असुरों से लड़ने में कामयाब हो सकता है? इससे पता चलता है कि वह कितना बड़ा शूरवीर है।

अक्सर देखा जाता है कि— मनुष्य समझ नहीं पाता कि जीवन कैसे सार्थक बनाया जाए? यह सारी सृष्टि परमात्मा द्वारा ही रचित है। यहां पर वही विजेता बनता है जो स्वयं के अंदर विद्यमान दुर्गुणों से लड़ कर उन्हें परास्त कर देता है। वह सिर्फ परमात्मा के सत्य गुणधर्म को स्वयं में स्थापित करने के लिए प्रयास करता है। स्वयं के अंदर की बुराइयां, कमजोरियां पग- पग पर परास्त करती रहती हैं और मनुष्य प्रत्येक सन उनसे हारता रहता है। इन कमजोरियों, बुराइयों को दूर किए बिना जीवन की ज्योति न कभी प्रज्वलित होती है और न अंतर्मन का तिमिर ही दूर होता है। सदैव भटकाव, अशांति, अभाव, दुख, परेशानी आदि की समस्या बनी रहती है। मनुष्य के अंदर समाहित काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे पिशाच जब तक मरते नहीं, तब तक जीवन में देवत्व की कल्पना अधूरी ही रहती है। इन्हें दूर करने के बाद ही अंतर्मन को देवत्व के प्रकाश से आलोकित करना संभव हो पाता है।

स्वयं के दुर्गुणों को दूर करने के लिए मनुष्य को प्रयास करना चाहिए। बगैर प्रयास किए अपने अंतर्मन में निहित इन दुर्गुणों से छुटकारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। अगर हम किसी कार्य में सफल होना चाहते हैं तो अपने प्रयासों में स्थायित्व और दृढ़ता लाना अति आवश्यक है। यदि हम अपने ध्येय पर, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो, निरंतर लगे रहते हैं तो एक दिन अवश्य सफल होते हैं। पानी की एक-एक बूंद में इतनी ताकत होती है कि वह भारी से भारी पत्थर में भी गड्ढा बना देती है। बेशक उसमें समय लगता है। दरअसल किसी कार्य को निरंतर और लंबे समय तक करते रहने से मनुष्य उस कार्य में निपुण हो जाता है और इस निपुणता में हम अपने लक्ष्य को साध सकते हैं।

एक बार किसी व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंद से पूछा कि—बहुत सारे व्यक्ति आपकी निंदा करते हैं, बुराई करते हैं। स्वामी जी उन्हें रोकने का कोई उपाय बताइए। उन्हें कैसे रोका जाए?
स्वामी जी ने उत्तर देते हुए कहा—मैंने अपने अंदर समाहित दुर्गुणों पर विजय प्राप्त कर ली है। अब मुझे किसी के कुछ कहने पर क्रोध की अनुभूति नहीं होती। इसलिए अगर मेरी कोई निंदा करता है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि मनुष्य अपनी आत्मा के समक्ष सच्चा है तो उसे संसार की परवाह नहीं करनी चाहिए। ये निंदक हमारा मनोबल क्षीण करना चाहते हैं। हमारे कार्य को सिद्धि तक पहुंचते देखना उन्हें अच्छा नहीं लगता। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि कार्य प्रारंभ करने से पहले भीतर से निर्भय बना जाए। उपहास की चिंता नहीं करनी चाहिए। निंदा पर ध्यान न दें क्योंकि ये ऐसे कारक हैं जो हमारी उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं।

निंदा से कोई भी महापुरुष नहीं बच पाया। उनके परलोक गमन के वर्षों बाद भी विरोधी उनकी निंदा ही करते हैं। यदि महापुरुष निंदा से घबराते तो क्या वे कोई महान् कार्य कर पाते? निश्चित रूप से नहीं क्योंकि उन्होंने निंदा को स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने पग-पग पर स्वयं के ही अंदर की कमजोरियों को दूर किया है। उन्होंने सबसे पहले भय को ही समाप्त कर दिया। जब यह भय समाप्त हो गया तो फिर दुगनी उर्जा के साथ श्रेष्ठ कार्यों में सलंगन हो गए। प्रायः देखा जाता है कि मनुष्य दूसरों को बराबर कोसता रहता है कि तुम्हारे अंदर अमुक दुर्गुण है पर उससे पहले अपने अंदर के दुर्गुणों को दूर करने की कोशिश नहीं करता। इसलिए महापुरुषों ने सबसे पहले अपने अंदर के दुर्गुणों को दूर किया।

हमारे कार्यों को हमारी आत्मा की स्वीकृति भी आवश्यक होती है। यदि किसी कार्य को करने में हमारी आत्मा भयग्रस्त है तो समझ लीजिए वह कार्य न तो हमारे लिए अच्छा है और न ही समाज के लिए। हमें उस कार्य को करने से पहले कई बात चिंतन करना चाहिए। ऐसे कार्यों को न करने में ही भलाई है। निंदकों के भय से श्रेष्ठ कार्य को त्याग देना बड़ी दुर्बलता और कायरता है। इस दुर्बलता को दृढ़ इच्छाशक्ति के बल से परास्त किया जा सकता है। हम बदलेंगे तभी तो युग बदलेगा। स्वयं पर विजय प्राप्त करके ही हम दूसरों को सुधार सकते हैं। परिवर्तन की शुरुआत वास्तव में स्वयं से ही होती है।

115. आत्म-शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आत्म-शक्ति में दो शक्तियों का मिश्रण होता है— भावनात्मक और आध्यात्मिक।
भावनाएं हमें व्यक्तिगत तौर पर तुरंत जाग्रत कर देतीे हैं और जब हम व्यक्तिगत प्रभावों से ऊपर उठ जाते हैं, उस समय हमारी उर्जा समाज से परे हटकर व्यापक कल्याण के लिए उन्मुख हो जाती है तब वह अध्यात्मिक शक्ति बन जाती है। इन दोनों शक्तियों का मेल ही आत्म-शक्ति है।

चंडीगढ़ की ट्रैफिक पुलिस की सिपाही प्रियंका अपने दूधमुहें बच्चे कोे लिए हुए ट्रैफिक नियंत्रित करती है, उसे देख कर कोई उनके जज्बे को सलाम करता है तो किसी को यह वायरल तस्वीर चिंता में डाल देती है। कुछ लोग बच्चे को इस तरह जोखिम में डालने वाली नौकरी पसंद करते हैं। कुछ उनके जज्बे को सलाम करते हैं।

मैराथन रनर सोफी पावर रेस के बीच में अपने 3 माह के बच्चे को दूध पिलाने के लिए रूकती है तो यह तस्वीर भी लोगों को द्रवित कर जाती है। इस वायरल तस्वीर को भी कुछ लोग सलाम करते हैं तो कोई मातृशक्ति कहता है, किसी को एक सशक्त महिला की छवि नजर आती है जो रास्ते में आने वाली समस्त कठिनाइयों को पार करते हुए आगे बढ़ना चाहती है।
सोफी कहती है— इसमें महानता जैसी कोई बात नहीं, यह तो एक मां के लिए सामान्य- सी बात है लेकिन यह दोनों तस्वीरें एक स्त्री की होने के कारण मन पर एक अलग छाप छोड़ती हैं।
इस संबंध में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के मनोचिकित्सा विभाग के पूर्व अध्यक्ष रहे डॉक्टर सुधीर खंडेलवाल कहते हैं— दरअसल हमें स्त्री व पुरुष दोनों को एक खास भूमिका में देखने की आदत होती है। जब कभी भी वे एक निश्चित भूमिका से बाहर निकलते नजर आते हैं तो इस पर दूसरे लोग चौक जाते हैं। जब हम किसी को सामाजिक रुप से मिली भूमिका के दायरे में देखेंगे तो उसकी आत्म-शक्ति का अनुमान नहीं हो सकेगा। इंसान आत्मशक्ति की बदौलत हर बुलंदी को छू सकता है।

जीवन अपनी गति से चलता रहता है, इससे फर्क नहीं पड़ता कि हमारे अनुभव कितने बुरे रहे। अधिक से अधिक बेहतर करने की आकांक्षा कई बार हमारे से वह कार्य भी संपन्न करवा देती है, जिसे हम असंभव कहते हैं। यह आत्म- शक्ति होती है जो हमें असंभव से संभव की ओर ले जाती है। कई बार ऐसा देखने में आता है कि जब हम संघर्ष कर रहे होते हैं तो हमें महसूस होता है कि—हमारे अंदर एक अलग ही उर्जा और स्फूर्ति है जो हमें प्रत्येक बाधा से बाहर निकलने की प्रेरणा देती है और उन बाधाओं से बाहर निकलने के बाद हम देखते हैं कि— अरे! हम तो बाधाओं से बाहर निकल आए। कहां से आई वह शक्ति? यह बाहर नहीं हमारे भीतर ही है। यही हमारी आत्मशक्ति है।

कई बार देखने में आता है की परिस्थितियां हमारी क्षमता और शक्ति को सामने ला देती हैं फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। जब हम स्त्री और पुरुष की कार्य शक्ति के संबंध में बातें करते हैं तो यह सोचते हैं कि— पुरुष युद्ध और कठिन शारीरिक परिश्रम कर सकता है इसलिए वह अधिक श्रेष्ठ है। स्त्री के साथ जाति, शारीरिक दुर्बलता और युद्ध प्रमुखता की हम तुलना करने लगते हैं, पर यह अन्याय है। स्त्री भी उतनी ही सशक्त और साहसी होती है, जितने कि पुरुष।अपने- अपने ढंग से दोनों ही अच्छे हैं। संपूर्ण संसार पूर्णतया संतुलित है। विश्व की गति लहरों की गति के समान है, ऐसी कोई लहर नहीं जिसकी कोई ना हो।

स्त्री और पुरुष दोनों ही आत्म शक्ति से परिपूर्ण हैं। बस उसे जगाने की आवश्यकता है। फिर भी प्रकृति ने स्त्री को खास बनाया है। वह पहले से ही सशक्त है, पर अपने ही भीतर स्थित शक्ति को पाने के लिए खुद को जगाना ही पड़ता है।यदि स्त्री और पुरुष दोनों मिल कर चलते हैं तो जीवन संतुलन की ओर बढ़ जाता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी आत्मशक्ति के ऊपर एक आवरण पड़ा हुआ है।उसे हटाने का कार्य हमें स्वयं को करना है। सिर्फ सोचने मात्र से कुछ नहीं होता, उन्हें वास्तविकता की जमीन पर लाने के लिए आत्म- शक्ति को जागृत करना ही होगा।