46. नारी शक्ति

श्री गणेशाय नम्

श्री श्याम देवाय नम्

नारी विश्व-ब्रह्माण्ड में चैतन्य और क्रियाशील महाशक्ति का एक विशिष्ट केंद्र है। नारी को सम्मान, सृजन और शक्ति का प्रतीक माना गया है। हमारे वेद और ग्रंथ नारी शक्ति के योगदान से भरे है। नारी शक्ति को चेतना का प्रतीक माना गया है। मगर इस रहस्य से बहुत कम लोग परिचित होंगे कि पुरुष से अधिक नारी क्यों अधिक सुंदरता, कोमलता, सहनशीलता, क्षमाशीलता की मूर्ति है। नारी के व्यक्तित्व के भीतर कौन-सा ऐसा तत्व है, जो आनंद के लिए आकर्षित कहता है। इसका एक कारण है, जो बिल्कुल साधारण है। जिसकी हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

मानव कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या 46 होती है – उसमें 23 गुणसूत्र पुरुष के और 23 गुणसूत्र स्त्री के होते हैं। इन 46 गुणसूत्रों के मिलन से पहला सेल निर्मित होता है और इस प्रथम सेल से जो प्राण पैदा होता है, उससे स्त्री का शरीर बनता है। 23,23 का यह सन्तुलित सेल है। जिससे स्त्री के शरीर का निर्माण होता है। इनमें से 22 गुणसूत्र नर और मादा में समान और अपने-अपने जोड़े के समजात होते हैं। इन्हें सम्मिलित रूप से समजात गुणसूत्र कहते हैं। 23 वें जोड़े के गुणसूत्र स्त्री और पुरुष में समान नहीं होते। जिन्हें विषमजात गुणसूत्र कहते हैं। एक गुणसूत्र के विषमजात होने के कारण पुरुष के व्यक्तित्व का सन्तुलन टूट जाता है। इसके विपरीत स्त्री का व्यक्तित्व सन्तुलन की दृष्टि से बराबर है। इसी कारण स्त्री का सौन्दर्य आकर्षण, उसकी कला उसके व्यक्तित्व में रस पैदा करती है।

इसी एक गुणसूत्र के कारण पुरुषों में जीवनभर एक बेचैनी बनी रहती है। एक आंतरिक अभाव खटकता रहता है। क्या करूँ? क्या न करूँ? इस तरह की एक चिन्ता और बेचैनी जीवनभर और बराबर बनी रहती हैं। क्यों? इसलिए कि उसके सन्तुलन में एक गुणसूत्र में समता नहीं है। इसके विपरीत स्त्री का सन्तुलन बराबर है। तात्पर्य यह है कि एक छोटी-सी घटना यानि की एक गुणसूत्र का विषम होना स्त्री-पुरुष के सम्पूर्ण जीवन में इतना अन्तर ला देता है। मगर यह अन्तर स्त्री में सौन्दर्य और आकर्षण तो पैदा कर देता है, पर स्त्री को विकसित नहीं कर पाता। क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता होती है, वह कभी भी विकास नहीं कर पाता। वह जहाँ है, वही रुक जाता है। ठहर जाता है। इसके विपरित पुरुष का व्यक्तित्व सम नहीं है, विषम है, इसी विषमता के कारण वह जो कर्म करता है-वह स्त्री कभी नहीं कर पाती। स्त्री को परमात्मा ने एक ऐसी शक्ति से नवाजा है, जो दुनिया में किसी के पास नहीं हैं और वो शक्ति है-मातृत्व। हाँ, स्त्री इस सृष्टि को चलाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। माँ बनना किसी चमत्कार से कम नहीं है। नारी में ममता, मृदुलता और मानवता का समावेश है। वह कोमलता की प्रतीक है। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर यही नारी, चंडी बनने से भी परहेज नहीं करती।

भारतीय उपासना पद्धति में तो स्त्री को शक्ति से सम्बोधित किया गया है। शिव-शक्ति, यानि स्त्री। अथर्ववेद में नारी को सत्याचरण अर्थात् धर्म का प्रतीक कहा गया है, यानि कोई भी धार्मिक कार्य उसके बिना पूरा नहीं माना जाता है। हमारे सनातन धर्म में तो नारी को घर की लक्ष्मी कहा जाता है। इस संसार में समय – समय पर नारियों ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है। कभी वह मीरा के भक्तीतत्व में प्रकट होती है, तो कभी वह श्री कृष्ण की प्रेमिका राधा के रूप में। कभी अहिल्या के रूप में तो कभी रानी लक्ष्मीबाई जैसी विरांगना बनकर। लेकिन मध्यकाल के समय नारी के प्रति उत्पीड़न भी बढ़ता गया और नारी को केवल अबला और भोग-विलास का साधन समझा जाने लगा। उस समय राजा राममोहन राय, और स्वामी विवेकानन्द आदि, जैसे महापुरूषों ने कहा था —नारी का उत्थान स्वयं नारी ही करेगी। कोई और उसे उठा नहीं सकता। वह स्वयं उठेगी। बस,उठने में उसे सहयोग की आवश्यकता है और जब वह उठ खड़ी होगी, तो दूनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। वह उठेगी और समस्त विश्व को अपनी जादुई कुशलता से चमत्कृत करेगी।

स्वामी विवेकानंद का यह कथन सत्य साबित हुआ। आज की नारी जागृत एवम् सक्रियता के साथ जीवन में ऊँचे मुकाम हासिल कर रही है। बड़ी-बड़ी कम्पनियों की CEO नारी ही हैं। यहाँ तक की घर की रक्षा करते-करते उसने देश की रक्षा करने की काबिलियत भी आ गई है। आज की नारी आर्थिक व मानसिक रूप से आत्मनिर्भर है और शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के कारण वह पहले के मुकाबले अधिक जागरूक हुई है। शिक्षा की वजह से केवल आत्मनिर्भर ही नहीं हुई है, बल्कि रचनात्मकता में भी पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्रों में भी अपनी बुलंदी का झण्डा फहरा रही है। तकनीकी एवम् इंजिनियरिंग जैसे विषयों में उसकी पकड़ देखते ही बनती है। आज नारी ने अपनी शक्ति को पहचान लिया है, वह शक्तिस्वरूपा है।

स्वामी विवेकानंद जी यह बात भली-भाँति जानते थे। जब अमेरिका मे एक महिला ने स्वामी विवेकानंद जी से पूछा कि -“स्वामी जी आपने किस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है। मैं अपने बेटे को भी वही पढाना चाहती हूँ।” स्वामी जी ने उत्तर दिया कि – वह विश्वविद्यालय अब टूट चुका है। इस पर उस महिला ने पूछा कि वह विश्वविद्यालय कोन-सा था। स्वामी जी ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया कि- वह विश्वविद्यालय मुझे जन्म देने वाली माँ थी, जो अब इस संसार में नहीं है । इसलिए नारी की शक्ति को कम नहीं आंकना चाहिए। नारी है, तो हम हैं और हम हैं, तो यह सृष्टि है। बगैर नारी के इस सृष्टि का कोई वजूद नहीं।

45.दोषपूर्ण उपलब्धियां

श्री गणेशाय नम्ः

श्री श्याम देवाय नम्:

जीवन में ज्यादातर मनुष्यों का एक स्वप्न होता है, कि उनके पास प्रचुर मात्रा में धन-दौलत हो ताकि वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का वरण करते हुए आकाश की उंचाईयों को छूए। उनका उच्च स्तरीय रहन-सहन हो, ऐसो – आराम के सारे साधन उपलब्ध हों, नौकर – चाकर हों। बंग्ला-गाड़ी हो। कहने का तात्पर्य यह है कि वह संसार की महंगी से महंगी वस्तुओं को उपभोग करना चाहते हैं।

हमारे में से ज्यादातर मनुष्य यही चाहते हैं कि उनका समाज में खूब दबदबा हो, उनकी जयजयकार होती रहे। उनके पास सर्वाधिक भौतिक संसाधन हों। इस तरह के स्वप्न देखना या इच्छा रखना मेरे ख्याल से कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इसके लिए कड़ी मेहनत की ज़रूरत होती है। प्राय: देखने में आता है कि अधिकांश लोग इसी मामले में विफल हो जाते है। वे इस तरह की सारी उपलब्धियाँ रातों- रात प्राप्त करना चाहते हैं। बस वे यही भूल जाते हैं कि वे इन उपलब्धियों को पाने के लिए परिश्रम और धैर्य का रास्ता छोड़ देते हैं और उतावले होकर गलत रास्ते पर चले जाते हैं। अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने के चक्र में वे पथभ्रष्ट हो जाते हैं, उनके विवेक और बुद्धि काम करना बन्द कर देती है। ऐसे लोग सही- गलत, अपना-पराया का भेद भूल जाते हैं, जिसके कारण उनका नज़रिया नकारात्मक हो जाता है। उनके जीवन का उद्देश्य केवल ज्यादा से ज्यादा धन-दौलत कमाना है, फिर चाहे वह किसी भी रास्ते से प्राप्त हो। ऐसे लोग छल, कपट, धोखा और अनैतिक कार्यो में लिप्त हो जाते हैं। इस रास्ते पर चलकर वे भले ही अपने उद्देश्य में कुछ हद तक सफलता प्राप्त कर लें, लेकिन धीरे – धीरे उनमें एक अज्ञात भय भी सताने लगता है। वैसे भी कहा गया है कि किसी भी उपलब्धि के लिए ठोस आधार उसी प्रकार होना जरूरी है, जिस प्रकार किसी भवन या महल के लिए मजबूत आधार की ज़रूरत होती है।

आदिशक्ति का अंश होने के कारण हम सभी शक्ति से सम्पन्न हैं। जो मनुष्य इस सत्य को समझता है, वह इसका सदुपयोग करते हुए आत्महित के कार्य करता है। इसके विपरीत जो इस सत्य की अनदेखी करता है और स्वयं को ही परम ज्ञानी और शक्तिशाली समझने की भूल करता है, वह व्यर्थ में ही अहम् के भाव से भरकर अपने साथ-साथ दूसरों का भी अहित कर बैठता है। वह खुद तो दोषपूर्ण उपलब्धियों का शिकार होता ही है, इसके साथ ही वह बहुत सारे मनुष्यों का जीवन जहन्नुम बना देता है। सफलता प्राप्त करने के लिए उसने जो छल, कपट, धोखे का रास्ता चुना था, उससे उनका जीवन बर्बाद हो जाता है, जो इसके चंगुल में फंस जाते हैं, वे लोग समाज में महामारी फैलाने का कार्य करते हैं। जीवन में विविध प्रकार की उपलब्धियों के लिए धर्म और धैर्य का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। दूसरों का हिस्सा हड़प कर उनको धोखा देकर प्राप्त उपलब्धियां दोषपूर्ण हैं। इससे परिवार से लेकर समाज तक में कटुता और वैमनस्य का वातावरण बनता है।

दोषपूर्ण उपलब्धियों का स्वामी बनकर वह अहंकार के वशीभूत हो जाता है। अहंकार का सम्बन्ध अनर्थ से है, विनाश से है। अहंकार से पीड़ित मनुष्य की बुद्धि कुटिल, संकीर्ण और संशयी हो जाती है। भक्त, विभक्त हो जाता है और आत्मा अंधकार से ग्रस्त हो जाती है। इन दुर्गुणों के दुष्प्रभावों से मनुष्य आत्मियहीन एवम् मित्रहीन हो जाता है । उसकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और अंततः अपयशों और असफलताओं का बोझ लिए ही उसका जीवन समाप्त हो जाता है।

लंकापति रावण इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है। रावण जैसा विद्वान, साहसी और शक्तिशाली राजा और कोई इस संसार में दूसरा नहीं हुआ। वह एक बहुत बड़ा शास्त्र ज्ञाता था। उसने बहुत सारी सिद्धियाँ अपने तप के बल पर प्राप्त की थी। लेकिन अपने अहंकार के मद में चूर होकर उसनेे सीता माता का हरण कर लिया। ये उसकी बहुत बड़ी दोषपूर्ण उपलब्धि थी। माता सीता कोई साधारण स्त्री नहीं थी। वह शक्ति स्वरूपा थी। वह रावण का अहंकार तोड़ने के लिए ही जन्मी थी। वह नारी शक्ति थी। लेकिन अहंकार के वशीभूत हुआ रावण यह सत्य जान न पाया और घोर पाप कर बैठा। इसका क्या दुष्परिणाम हुआ, इससे कोई अनभिज्ञ नही है। न केवल रावण मारा गया, उसकी वह सोने की लंका भी जल गई, जिस पर उसे बड़ा अभिमान था। यह दोषपूर्ण उपलब्धि उसके जीवन को कलंकित कर गई । इतने बड़े विद्वान का जहाँ सम्मान होना चाहिये था, वहाँ अपमान का सामना करना पड़ा। युग बीत जाने के बावजुद भी उसका कलंक कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ता ही जाता है।

ऐसी उपलब्धियों से अच्छा तो बगैर उपलब्धि के है। कम से कम अपमान और अपयश का सामना तो नहीं करना पड़ेगा। साधारण मनुष्य होने के कारण हम सभी परिस्थितियों के अधीन हो कभी-कभी अहंकार के प्रभाव में आ जाते हैं। यह कुछ हद तक सामान्य है, लेकिन दुर्गण तो हर परिस्थिति में त्याज्य है। कोई भी संसारिक सुख प्राप्त करने से पहले मन से खुद बात करनी चाहिए। जो ऐसा नहीं करता उसे दुख और कष्ट मिलता है। इसलिए कहा गया है कि-‘ बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताये ‘ लेकिन आज की स्थिति पर गौर किया जाए, तो हर कोई एक-दूसरे का विश्लेषण तो कर रहा है, पर खुद आत्म – विश्लेषण पर उसका ध्यान नहीं जा रहा है । यदि कोई व्यक्ति दूसरों के घर के कूड़े-करकट की सफाई करता है, तो उस व्यक्ति का घर तो साफ हो जायेगा, पर अपने घर में गंदगी बनी रहेगी। जबकि हर व्यक्ति को अपना घर साफ रखना चाहिये। यही बात आचरण के लिए भी ज़रूरी है। हमने अपने आचरण और व्यवहार में मर्यादा रखनी चाहिए। हमें इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए की कौन, कैसा है उसके आचरण को सुधारने की बजाय अपने स्वभाव और आचरण को उत्तम बनाऐं ,तो हमारी ही छवि उतम होगी। मर्यादा में रहकर कोई भी कार्य करेंगे तो एक न एक दिन सफलता अवश्य प्राप्त होगी और वही उपलब्धि ख्याति दिलवाएगी।