165. ईश्वर हमारे साथ हैं।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

महान आध्यात्मिक गुरु परमहंस योगानंद जी अपनी पुस्तक— “मानव की निरंतर खोज” में लिखते हैं— मानव “कुछ और” की निरंतर खोज में व्यस्त है। जिससे उसे आशा है कि उसके मिल जाने पर उसे संपूर्ण एवं असीम सुख मिल जाएगा। उन विशिष्ट आत्माओं के लिए, जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है, यह खोज अब समाप्त हो चुकी है। ईश्वर ही “कुछ और” है, यह बात उनकी समझ में आ गई है। उनको एहसास हो गया है कि ईश्वर प्रत्यक्षण हमारे साथ रहते हैं। लेकिन जिनको ईश्वर की मौजूदगी का एहसास नहीं है, वे अब भी उसको ढूंढने में, खोजने में लगे हुए हैं। हमारे जीवन में यह “कुछ और” यानी संपूर्णता की खोज सदैव चलती रहती है।

हमें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि जब कोई फूल अपने परम सौंदर्य में खिलता है या कोई स्वर दिल को छू जाता है, ऐसी अनगिनत घटनाएं जो प्रकृति में निरंतर चलती रहती हैं, हमें ईश्वर की उपस्थिति का बोध कराती हैं। इस सुख के परम उत्कर्ष का नाम ही ईश्वर है। वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह सिद्ध कर दिया था कि— भौतिक सुख को प्राप्त कर लेने से आंतरिक सुख को प्राप्त करना संभव नहीं है।

आज के समय हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, वह इस बात की पुष्टि करता है कि— चाहे हमारे पास कितनी भी भौतिक वस्तुएं हों, बाहरी समृद्धि हो, अच्छा बैंक बैलेंस हो, कहने से अभिप्राय है कि— समाज में चाहे उसका रुतबा कितना भी ऊंचा क्यों न हो लेकिन वह स्थाई खुशी नहीं प्राप्त कर सकता। सुख तो एक आंतरिक एहसास है। जो हमारे अंतर्मन में निहित है और हर पल ईश्वर की मौजूदगी का एहसास कराता है। जिससे हमें अहसास होता है कि ईश्वर और जीव एक ही हैं।

हमारी सबसे बहुमूल्य वस्तु की सुंदरता, जिसे हम अपनी आंखों से देख पा रहे हैं, उस वस्तु से विचार हटते ही भौतिक सुख लुप्त हो जाता है। जबकि आंतरिक सुख हमेशा बना रहता है। सच्चाई तो यह है की हम सब प्यासे हैं— आनंद के, शांति के और सुख के। लेकिन यह सुख हम भौतिक वस्तुओं में तलाशते रहते हैं। अद्भुत बात तो यह है कि समस्त वासनाओं के पीछे ईश्वर को पाने की उत्कंठा बनी रहती है क्योंकि परम वैभव एवं ऐश्वर्य के सभी रूप ईश्वर के ही हैं।

जिस प्रकार पानी और बुलबुला भी एक ही हैं। बुलबुला पानी में होता है, पानी में रहता है और पानी में ही समा जाता है। उसी प्रकार जीवात्मा और ईश्वर एक ही हैं। उनमें अंतर केवल यही है कि— एक सीमित है तो दूसरा अनंत। एक आश्रित है तो दूसरा स्वतंत्र। उस अनंत, सर्वव्यापी ईश्वर को जानना नमक के ढेले का समुंद्र की गहराई नापने जैसा प्रयास है। नमक का ढेला समुंद्र में घुलकर विलीन हो जाता है। उसी प्रकार जीव भी जब ईश्वर की थाह लेने जाता है तो अपना अस्तित्व खो देता है और ईश्वर में एकाकार हो जाता है।

इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि— यह मनुष्य का शरीर एक मटकी के समान है। मन, बुद्धि और इंद्रियां, पानी, चावल और आलू के समान मान लेते हैं। पानी, चावल और आलू मटकी में भरकर आग पर रख देने से वह गर्म हो जाते हैं। उन्हें हाथ लगाने से कोई भी जल जाएगा लेकिन जलाने की शक्ति न तो मटकी में है और न ही पानी, चावल या आलू में है बल्कि जलाने की शक्ति तो आग में होती है। इसी प्रकार मनुष्य के भीतर विद्यमान ईश्वरीय शक्ति के कारण ही मन, बुद्धि और इंद्रियां कार्य करती हैं। इनके अभाव में निष्क्रिय हो जाती हैं।

164. प्रेम से करें, क्रोध को पराजित

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य हर समय संघर्ष करता रहता है, जिससे उसका सुख- चैन कहीं गुम हो जाता है। वह हर समय यही सोचता रहता है की मेरे पास और ज्यादा भौतिक वस्तुओं का भंडार हो और जब उसे वह मिल जाता है तो वह ओर पाने की लालसा में लग जाता है। जितने ज्यादा, उसके पास भौतिक संसाधन होंगे, उतना ही उसमें अहंकार बढ़ता जाता है। अहंकार बढ़ने से क्रोध अपने आप आ जाता है। जब देखो, तब दूसरों को नीचा दिखाने में लगा रहता है। वह हमेशा क्रोधित रहता है और जब उसे समझ आता है कि क्रोध करने से मेरा अपना ही नुकसान हो रहा है तो वह उसे छुटकारा पाने की कोशिश में लग जाता है। क्रोध को पराजित करने के लिए तरह-तरह के उपाय करता है, लेकिन वह क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता।

एक बार शहर में एक बहुत बड़े संत आए हुए थे। लोग उनसे जीवन से संबंधित विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछ रहे थे।
तभी एक जोश से भरे हुए युवक ने उनसे पूछा— हे महात्मा! जब कोई व्यक्ति दूसरे पर क्रोधित होता है तो वह तेज आवाज में क्यों बोलता है?
ओर तो ओर जिस पर वह क्रोधित होता है वह तो उसके बिल्कुल नजदीक ही होता है, फिर उसे चिल्लाकर बोलने की क्या आवश्यकता है?

संत ने कहा— दरअसल जब कोई व्यक्ति किसी पर क्रोधित हो जाता है तो भले ही उनमें शारीरिक निकटता हो पर उन दोनों के दिलों के बीच की दूरी बहुत बढ़ जाती है। वह जितना ज्यादा नाराज होगा, यह दूरी उतनी ही ज्यादा बढ़ जाएगी। इसी दूरी के कारण लोग चिल्लाकर बोलते हैं।

संत कुछ समय रूकने के बाद फिर कहते हैं—तुमने अक्सर देखा होगा, जब दो लोग प्रेम में होते हैं, तब वे धीरे-धीरे बातें करते हैं, क्योंकि उनके दिल काफी करीब होते हैं और जब वे एक-दूसरे को बहुत ज्यादा प्रेम करने लगते हैं तो उनके दिल आपस में मिल जाते हैं। उस समय उनको परस्पर बात करने के लिए बोलने की भी आवश्यकता नहीं होती। दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते हैं और एक-दूसरे की बात इशारों में ही समझ जाते हैं।

इसलिए क्रोध को पराजित करने का एक ही तरीका है, सबके दिलों के करीब पहुंचना अर्थात् सभी के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना।

163. पुण्य कर्म

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

पुण्य कर्मों का अर्थ केवल वे कर्म नहीं हैं, जिनसे हमें लाभ होता हो, अपितु वे कर्म हैं, जिनसे दूसरों का भला भी होता हो।
पुण्य कर्मों को करने का उद्देश्य मरने के पश्चात् स्वर्ग प्राप्त करना ही नहीं, अपितु जीते जी जीवन को स्वर्ग बनाना भी है।
स्वर्ग प्राप्त करने के लिए पुण्य कर्म करना बुरा नहीं, मगर परमार्थ के लिए पुण्य करना ज्यादा श्रेष्ठ है।

बगैर स्वार्थ किया गया प्रत्येक कर्म पुण्य कर्म है, लेकिन जिस कर्म में स्वार्थ की भावना निहित होती है, वह कर्म पाप कर्म कहलाता है।
जो कर्म भगवान को प्रिय होते हैं, वही कर्म पुण्य कर्मों की श्रेणी में गिने जाते हैं।
हमारे किसी आचरण से, व्यवहार से, वक्तव्य से या किसी अन्य प्रकार से कोई दुखी न हो। हमारा जीवन, दूसरों के जीवन में समाधान बने, समस्या नहीं, यही चिंतन पुण्य है और परमार्थ का मार्ग भी है।

सभी प्राणियों से प्रेम करना अर्थात् सभी जीवों के हितों की रक्षा करना, आवश्यकता होने पर उन्हें हर संभव सहायता प्रदान करना, उनके सुख- दुख के साथी बनना और ऐसा कोई कार्य न करना जिससे उनके मन को ठेस पहुंचे, दूसरों के कल्याण के लिए कर्म करते रहना, पुण्य कर्मों की श्रेणी में आते हैं।

अथर्ववेद में कहा गया है कि— जिस ईश्वर ने विश्व ब्रह्मांड की रचना की है, उसी ने, इस विश्व में हमारा छोटा- सा जीवन निर्धारित कर रखा है। ईश्वर ने हमें अपना जीवन चलाने के लिए कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। उनका मनुष्य जीवन के क्रियाकलापों में किंचित मात्र भी हस्तक्षेप नहीं है। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को, अपने श्रेष्ठ कर्मों की हवि से कितना सुगंधित बनाते हैं।

ईश्वर ने मनुष्य को विवेक रूपी हीरे से सुसज्जित करके इस जीवन को उत्तमता से संचालन करने के लिए इस धरा पर भेजा है। हमारा जीवन कर्मेंद्रियां, ज्ञानेंद्रियां, मन, बुद्धि व आत्मा द्वारा संचालित होता है। श्रवण शक्ति के माध्यम से हम अपने जीवन में श्रेष्ठ विचारों का श्रवण करें। वाणी रूपी शक्ति से मधुरता एवं शालीनता से परिपूर्ण वाणी का प्रयोग करें। मुख से शारीरिक पुष्टता देने वाले आहार का सेवन करें। समस्त ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेंद्रियों से इस जीवन को पावन बनाने का प्रयास निरंतर करना चाहिए। मन से श्रेष्ठ चिंतन- मनन, बुद्धि से आध्यात्मिक ज्ञान का संचय हमारे जीवन को आनंद के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।

कल्पना कीजिए आपके पड़ोस में कोई भूख से या दवा के अभाव में बीमारी से तड़प रहा हो, कंपकंपाती ठंड में कोई बच्चा बिना गर्म कपड़ों के ठिठुर रहा हो या फिर धन के अभाव में किसी माता- पिता को अपने बच्चे को स्कूल से निकालने पर मजबूर होना पड़ रहा हो और यह सब कुछ देख कर आपका दिल पसीज जाए, दया के भाव आपके मन में आ जाएं तो समझ लेना कि ईश्वर ने आपको पुण्य कर्म करने के लिए चुना है। आपने ईश्वर की तरफ जाने वाला रास्ता पकड़ लिया है। यदि आपका हाथ उनकी सहायता के लिए उठ गया हो तो सच में आपने पुण्य कर्म की ओर कदम बढ़ा लिया है।

162. ईश्वर की मौजूदगी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कोविड महामारी की दूसरी लहर का प्रकोप धीरे-धीरे मंदा पड़ता जा रहा है, पर इसने देश के अंदर भय और पीड़ा का एक ऐसा मंजर छोड़ दिया है, जिसके निशान मिलना मुश्किल है। इस महामारी से बचने का अगर कोई कारगर तरीका है तो वह है, सिर्फ अपने ईश्वर पर विश्वास। कोरोना संकट के बीच हम सब दुख और भय से आक्रांत हैं। यह संकट भी दूर हो जाएगा क्योंकि ईश्वर का संबल हमारे साथ है। बस हमें इतना करना है, ईश्वर को पहचानना है और उसे स्मरण रखना है।

क्या आपने कभी सोचा है कि—दिन में हम कितनी बार ईश्वर को याद करते हैं, मुश्किल से एक या दो बार, शेष समय में हम ईश्वर को भूल जाते हैं और यही सोचते हैं कि जो कुछ है, वह हम ही हैं यानि हम ही कर्ता हैं और हमारे करने से ही सब कुछ होने वाला है। कोरोना के कारण आज परिस्थितियां विकट हैं। संकट एक अदृश्य वायरस की वजह से है। जब संकट अदृश्य शत्रु से है तो क्या अदृश्य ईश्वर हमें इस संकट से बाहर नहीं निकाल पाएंगे, क्या आपने कभी सोचा है? बहुत से मनुष्यों का तो यही कहना है कि ईश्वर को किसी ने देखा है तो मेरा उनसे कहना है कि— क्या इस वायरस को किसी ने देखा है? जिस प्रकार इस वायरस को कोई नहीं देख पा रहा, उसी प्रकार ईश्वर के दर्शन भी विरले ही कर पाते हैं। लेकिन मेरा यह विश्वास है कि जिस प्रकार वायरस अदृश्य है, वैसे ही अदृश्य ईश्वर ही हमें इस संकट से बाहर निकाल सकते हैं। बस हमें उन्हें हर समय याद करने की कोशिश करनी चाहिए। निश्चित रूप से ऐसा करने वाला मनुष्य सदा- सदा की खुशी को प्राप्त कर लेगा। वह इस संकट से ऊपर उठेगा और जीवन के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होगा।

अक्सर हम संकट के समय या दुख में परमात्मा को याद करने की कोशिश करते हैं लेकिन जब सुख में होते हैं, हमें खुशी होती है तो हम परमात्मा को भूल जाते हैं। हमें निश्चित रूप से हर समय ईश्वर को याद रखना चाहिए। कुछ समय के पश्चात् हमें उनकी मौजूदगी का आभास होने लगेगा और हम परमानंद और परमसुख को प्राप्त कर लेंगे। वह जीवन में आने वाली प्रत्येक समस्या से ऊपर उठा देगा और जीवन के झंझावतों से प्रभावित भी नहीं होंगे।

कई बार हम बहुत- सी परेशानियों में घिरे होते हैं, लेकिन उनसे भी हम बाहर निकल आते हैं, फिर हम सोचते हैं कि— यह कैसे हो गया? यह हमारे भीतर की ईश्वरीय शक्ति है जो हमें चुनौतियों का सामना करने के लिए शक्ति और साहस देती है। प्रत्येक मनुष्य को कभी न कभी किसी न किसी समय शारीरिक चुनौतियों का सामना अवश्य करना पड़ता है। उस समय हम यही सोचते हैं कि— क्या हम कभी इन परेशानियों से बाहर निकल पाएंगे? जब हम उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर लेते हैं तो हमें आश्चर्य होता है कि हमने यह सब कैसे कर लिया? प्रत्येक अनुभव उस शक्ति का प्रमाण है जो हमेशा हमारे साथ रहती है। हमें कभी अकेला नहीं होने देती। ईश्वर हमेशा हमारे साथ मौजूद रहते हैं।

अक्सर आपने देखा होगा कि जब भी हमें किसी चुनौती का सामना करना पड़ता है तो हमें लगता है कि बहुत मुश्किल है। तब हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि— हम अकेले नहीं हैं। ईश्वर का अदृश्य हाथ हमारे साथ है। हम उनको देख नहीं सकते, लेकिन उनकी शक्ति को अनुभव अवश्य कर सकते हैं। कई बार आपने स्वयं भी अपने भीतर परमात्मा की उस अदृश्य शक्ति को महसूस किया होगा। जो ईश्वर में जितना विश्वास करता है, उसी के अनुसार उसे, उस शक्ति का आभास होने लगता है। दरअसल जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह अधिक ग्रहणशील होता है और उस शक्ति को अधिक महसूस करता है।

एक बच्चा ईश्वर से मिलना चाहता था। उसने प्रार्थना कि— ईश्वर मुझसे बात कीजिए। मुझे दर्शन दीजिए।

तभी एक चिड़िया की चहचहाने की आवाज सुनाई दी। लेकिन बच्चे ने नहीं सुना।
उसने फिर ईश्वर से कहा कि— आप मेरे सामने आइये और मुझसे बात कीजिए।
तब आकाश से बादलों की गर्जना हुई, लेकिन बच्चे ने ध्यान नहीं दिया।
उसने फिर ईश्वर से कहा कि— मैं आपको देखना चाहता हूं।
तभी आकाश में एक सितारा चमका। बच्चे ने उसे भी नहीं देखा।
बच्चा चिल्लाया, कोई चमत्कार दिखाइए, प्रभु!

अचानक उसके सामने एक गिलहरी आई, लेकिन बच्चा प्रभु को पहचान नहीं सका।

बच्चे ने कहा— प्रभु! मुझे स्पर्श कीजिए।

तब ईश्वर तितली के रूप में बच्चे के हाथ पर बैठे, लेकिन बच्चे ने हाथ पर बैठी सुंदर तितली को हटा दिया।
प्रकृति में जो कुछ भी है, ईश्वरीय रूप है। वही हमारे समक्ष विभिन्न रूपों में आते हैं। कभी दुख तो कभी सुख के रूप में। कभी धनी तो कभी निर्धन के रूप में। पर हम उन्हें पहचान नहीं पाते। क्योंकि हम उस अदृश्य शक्ति पर विश्वास नहीं कर पाते। हमारे लिए वही ठीक है और विश्वास करने के योग्य है, जिसको हम देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त हमारा विश्वास किसी भी वस्तु पर नहीं होता। यहां तक की ईश्वर से हम बहुत कुछ प्राप्त करने के बाद भी, जब भी कोई संकट आता है तो डोलने लगते हैं। उस पर पूर्ण रुप से विश्वास नहीं कर पाते।

मनुष्य, वृक्ष, जानवर, चांद- तारे, नदियां, पहाड़ आदि सब उनके ही चिन्ह हैं। हम उनके निकट से, बिना किसी स्पर्श और संबंध के यूं ही गुजर जाते हैं। जब तक हम ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार नहीं कर लेते हैं अर्थातु यह नहीं मान लेते की कण-कण में ईश्वर का वास है, जब तक हम उनसे संपर्क कैसे कर सकते हैं? जब भी हमें चुनौतियों का सामना करना पड़े तो एक बार, उन लोगों के बारे में अवश्य सोचना चाहिए, जिन्होंने बहुत बड़े-बड़े संघर्षों को पार करते हुए सफलता प्राप्त की। उनके पीछे अवश्य ही कोई अदृश्य शक्ति थी। इसलिए जीवन की चुनौतियों का सामना हमें निडर होकर करना चाहिए। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करें लेकिन अंतिम निर्णय ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए। तभी हमें ईश्वर की मौजूदगी का आभास होगा।

161. वास्तविक मूल्य

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय में मनुष्य का यह स्वभाव बन गया है कि— उसे जो वस्तु जितनी ज्यादा सहजता से उपलब्ध हो जाती है, वह उसका उतना ही कम मूल्य आंकता है। उसके दृष्टिकोण में किसी भी वस्तु का मूल्य उसके बाजार मूल्य से ही निर्धारित होता है। परंतु यह दृष्टिकोण बिल्कुल भी ठीक नहीं है क्योंकि मनुष्य सोने को अधिक महत्व देता है, उसकी तुलना में अन्न को नहीं। सोना महंगा है और अन्न सस्ता। यदि हम गंभीरता से विचार करें तो देखेंगे कि व्यक्ति सोने के बिना तो जीवित रह सकता है परंतु अन्न के बिना नहीं। ठीक उसी प्रकार अन्न और जल की तुलना करने पर भी हम देखेंगे कि जल ज्यादा जरूरी है। अन्न के बिना तो हम कुछ दिनों तक जीवित रह सकते हैं परंतु जल के बिना नहीं। लेकिन अन्न का मूल्य जल से ज्यादा है। इसीलिए अन्न को जल से ज्यादा महत्व मिलता है। इसी प्रकार जल से अधिक वायु की आवश्यकता है। जल बिना मनुष्य कुछ समय तक जीवित रह सकता है परंतु वायु के बिना कुछ मिनट भी जीवित रहना संभव नहीं है। लेकिन वायु का कोई मूल्य नहीं होता।

लेकिन आज के समय वायु का मूल्य सोने के मूल्य से भी ज्यादा हो गया है क्योंकि कोरोनावायरस के संक्रमण के कारण ऑक्सीजन की कमी हो रही है। जीवन बचाने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ गई है। डिमांड बढ़ने से उसका वास्तविक मूल्य भी बढ़ गया है। जो ऑक्सीजन हम फ्री में प्राप्त करते थे आज पैसे देकर भी उपलब्ध नहीं हो रही।

आज मानव की स्थिति यह हो गई है की हमें जिस कार्य में धन की प्राप्ति हो, हम वही कार्य करना पसंद करते हैं। हम यह भी नहीं सोचना चाहते कि किस व्यक्ति या वस्तु का हमारे जीवन में धन से अधिक महत्व है। धन को महत्व देने वाले मनुष्य की स्थिति अंत में उसी राजा की तरह हो जाती है, जिसे यह वरदान मिला था की वह जिस वस्तु को भी हाथ लगाएगा वह सोने की हो जाएगी। जब वह भोजन करने के लिए हाथ लगाता है तो भोजन सोने का हो जाता है। अंत में उसे जीवन में वस्तुओं के वास्तविक महत्व का पता चला।

आज के भौतिकवादी युग में हमारी स्थिति भी वैसी ही हो गई है। हम यह भूल गए हैं कि जब तक ईश्वर के साथ एकाकार नहीं होते, तब तक हमारी कोई कीमत नहीं है। क्योंकि इस संसार में सभी को ईश्वर के साथ जुड़ने पर ही मूल्य प्राप्त होता है। जब तक वह ईश्वर के साथ संयुक्त रहकर उन्हीं के लिए कार्य करता है, तब तक ही उसे श्रेय प्राप्त होता रहता है। लेकिन जब वह ईश्वर की उपेक्षा करते हुए अपने स्वयं के गौरव के लिए कार्य सिद्ध करने में जुट जाता है, तब उसे कोई लाभ नहीं मिलता।

ईश्वर और जीव का निकट का संबंध है। जैसे लोहा और चुंबक। लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि— जिस प्रकार चुंबक, लोहे को अपनी ओर खींचता है, उसी प्रकार ईश्वर मनुष्य को अपनी तरफ क्यों नहीं आकर्षित करता? यदि लोहे पर बहुत अधिक कीचड़ लिपटा हो, तब चुंबक उसे आकर्षित नहीं कर सकता। ऐसे ही जीव है, इस संसार में अवतरित होकर जीव माया रूपी कीचड़ में अत्यधिक लिपट जाता है, तब उस पर ईश्वर के आकर्षण का असर नहीं होता। जिस प्रकार कीचड़ को जल से धो डालने पर लोहा, चुंबक को अपनी ओर खींचने लगता है, ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य प्रार्थना और पश्चाताप के आंसुओं से माया के कीचड़ को धो डालता है, तब वह तेजी से ईश्वर की ओर खींचता चला जाता है।

मनुष्य और परमात्मा का योग वैसा ही है— जैसे घड़ी का छोटा कांटा और बड़ा कांटा। दोनों घंटे में एक बार मिलकर एक हो जाते हैं। दोनों परस्पर संबंध तथा एक- दूसरे पर आश्रित हैं। साधारण तौर पर देखने पर दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं, फिर भी अनुकूल अवस्था प्राप्त होते ही वे एक हो जाते हैं। जिस प्रकार एक की संख्या के बाद अनेक शुन्य लगाकर बड़ी से बड़ी संख्या बनाई जा सकती है पर यदि उसी को मिटा दिया जाए तो शुन्य का कोई मूल्य नहीं रहा जाता। उसी प्रकार मनुष्य भी है, जब तक वह ईश्वर के सानिध्य में है, तभी तक उसका वास्तविक मूल्य है। अगर वह ईश्वर से दूरी बना लेता है तो उसका मूल्य शुन्य के समान है।

160. प्राण ऊर्जा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कोरोनावायरस की दूसरी लहर ने चारों तरफ हाहाकार मचा रखा है और अभी तीसरी लहर आनी शेष है। यह वायरस मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। चारों तरफ मौत ने अपना आतंक फैला रखा है। आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, ऐसा वक्त पिछली दो तीन पीढ़ियों से नहीं देखा गया। इस समय हमें धैर्य और सहनशक्ति की परम आवश्यकता है।

जीव में जीवन शक्ति की संवाहक प्राण ऊर्जा उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक सक्रिय रहती है। चिंतन करने से आंतरिक शक्ति बढ़ती है। मानसिक और शारीरिक क्षमताओं को प्राण ऊर्जा से जोड़कर दैवीय शक्तियों का पात्र बनाया जा सकता है। मनुष्य ने इस महाशक्ति से परमात्मा को भी प्राप्त किया है। फिर अन्य उपलब्धियां तो तुच्छ हैं क्योंकि परमात्मा को प्राप्त करना ही सबसे उच्च लक्ष्य है। संसार में कभी-कभी महासंकट आते रहते हैं जो संपूर्ण पृथ्वी को शोक और संताप में डुबो देते हैं। ऐसे समय में मनुष्य को अपनी प्राण ऊर्जा पर विश्वास रखना चाहिए। अगर विश्वास डगमगा जाता है तो प्राण ऊर्जा में कंपन उत्पन्न हो सकता है। यह स्थिति हमेशा अत्यंत असहज हो जाती है जो भौतिक संरचना का क्षरण कर सकती है।

कोरोना का संक्रमण कुछ मामलों में हमारी प्राण वायु यानि ऑक्सीजन के स्तर को कम कर देता है। ऐसे में हमें सावधान रहकर अपनी प्राण शक्ति को निरंतर संबल, शोधन व नवीन क्रियाओं से पुष्ट करते रहना चाहिए। किसी भी प्रकार के रोग, संकट के विरुद्ध संघर्ष करने की पूर्ण क्षमता स्वयं में निहित प्राणशक्ति को मिली हुई है। अगर कोई मनुष्य इसका उपयोग नहीं करना चाहे तो क्या कर सकते हैं। प्रकृति ने समस्त संभावनाओं को इस शरीर में प्रविष्ट कराया होता है। ईश्वर का अंश आत्मा के रूप में इस शरीर में विद्यमान है, तब हम क्यों संदेह का वातावरण बनाएं?

ध्यान, ज्ञान और जीवन की सच्चाई जानने के बाद आंतरिक शक्ति प्राप्त की जा सकती है। एक मजबूत दिमाग एक कमजोर शरीर को भी खींच सकता है, लेकिन कमजोर दिमाग मजबूत शरीर को नहीं संभाल सकता। प्राणायाम के माध्यम से सुषुम्ना नाड़ी से, ध्यान का अभ्यास प्राणशक्ति को असीमित बढ़ा सकता है। प्राणायाम और ध्यान से शरीर और मन दोनों का शुद्धिकरण हो जाता है। इससे मन कलुषित नहीं होता और शरीर अधर्म के मार्ग पर नहीं चलता।

प्रकृति का साहचर्य और आत्मविद्या का ज्ञान, प्राण शक्ति को बढ़ाने में सहायता करता है। प्राण शक्ति को जीवनी शक्ति में प्रवाहित करता है। ईश्वर के इस उपहार को बढ़ाना एक आदर्श विज्ञान भी है। इसमें धन, सत्ता या संसाधनों की आवश्यकता भी नहीं होती बल्कि विश्वास के साथ निरंतर करते रहना चाहिए। जब तक वायरस कमजोर नहीं पड़ता तब तक हमें मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि हम उदास हैं और स्वयं को बीमार महसूस कर रहे हैं तो ऐसे में हम अवसाद ग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे में हमें अपनी प्राण शक्ति को बढाने की आवश्यकता है। ध्यान के माध्यम से प्राण ऊर्जा को बढ़ाया जा सकता है। सांस लेने की तकनीक या व्यायाम भी प्राण को बढ़ाता है।

159. सुख की कुंजी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

डब्ल्यू पी के किसेला के अनुसार— हम जो चाहते हैं, उसे पाना सफलता है। जो मिला है, उसे चाहना खुशी है। यकीनन संतोषी सोच से उपजी ऐसी खुशी और मन का ठहराव अच्छी सेहत, आत्मविश्वास और खुश मिजाजी की सौगात देने वाले होते हैं। हर हालात को संभालने का हौसला लिए रहते हैं। ऐसे मनुष्यों के मन में न तो आज की स्थितियों से शिकायत होती है और न ही आने वाले कल से जुड़ा कोई भय होता है। सहजता से यूं जीवन जीने का अंदाज मनुष्य को कई तरह की उलझनों से दूर रखता है जो असल मायने में सुख की कुंजी भी हैं।

यह सच्चाई है कि जिंदगी मे हर किसी के हिस्से में सब कुछ नहीं आ सकता। ऐसे में न तो किसी की झोली पूरी तरह खाली रहती है और न ही हर हाल में मनचाहा प्राप्त करने का सुकून सबके हिस्से आता है। ऐसे में अगर हम वर्तमान में रहकर जीवन को जिएं और सुखद लम्हों को सहेझते रहें तो इससे बढ़कर सुख की कुंजी और नहीं हो सकती। लेकिन और ज्यादा प्राप्त करने की आपाधापी में हम यह भूल जाते हैं कि जो मिला है, उसे संभालने और उस पर कृतज्ञ रहने वाले मनुष्य से ज्यादा खुश कोई नहीं हो सकता।

वास्तव में देखा जाए तो अच्छा हो या बुरा, जुटाने की इस होड़ में हम जीवन जीना ही भूल जाते हैं। पाने की ऐसी इच्छाओं के बीच जो झोली में है, उसे भी संभालना भूल जाते हैं। ऐसी उलझनें जीवन भर ऐसे ही चलती रहती हैं। जो है उस का आनंद उठाने की बजाय थोड़ा और जुटाने की जुगत में कितने ही सुखद पल हमारे हाथ से ऐसे ही छूट जाते हैं। क्या कभी सोचा है कि और पाने के चक्कर में जो खुशी हमारे हिस्से में आई है, उस खुशी को भी हम प्राप्त नहीं कर पाते।

किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित एक व्यक्ति को अस्पताल लाया जाता है। उसी जगह पर एक खिड़की के पास एक अन्य बीमार व्यक्ति का बिस्तर लगा हुआ है। कुछ ही समय के बाद उन दोनों में दोस्ती हो जाती है।
खिड़की के पास वाला मरीज प्रतिदिन अपने दोस्त को बाहर की दुनिया की सजीव व्याख्या करता है। वह कभी बाहर की हरियाली व हवा के झोंकों के साथ वृक्षों के झूमने की सुंदरता के बारे में बताता तो किसी दिन अपने दोस्त का मनोरंजन अस्पताल में आते-जाते लोगों की बातें बता कर करता।
लेकिन एक दिन गंभीर बीमारी से पीड़ित रोगी की मृत्यु हो जाती है।
अब खिड़की वाली जगह पर दूसरा मरीज आ गया। वह खुश था कि अब मैं भी बाहर के नजारे देख पाऊंगा। लेकिन जैसे ही उसने बाहर की तरफ देखा तो वह हैरान रह गया। क्योंकि वहां ईंट की दीवार थी। उसे जल्दी ही समझ में आ गया कि मरीज कल्पनाओं के आधार पर उसके मुश्किल समय को खुशहाल बनाने की कोशिश करता था।
यह कहानी हमारे को एक नई दिशा देती है कि जीवन में चाहे जितनी भी मुश्किलें आएं, हमें अपने जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक रखना चाहिए। परिस्थितियां हमें तभी विचलित कर सकती हैं, जब हम नकारात्मक होते हैं।

भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग के अनुसार— हम एक अत्यंत छोटे तारे के, एक छोटे से ग्रह पर रह रहे हैं जो खरबों तारापुंजो से घिरा हुआ है। आपका इस दृष्टिकोण पर क्या कहना है? दरअसल, हमारी सारी परेशानियां या चुनौतियां उतनी गंभीर नहीं, जितना की हम सोचते हैं। हम इस ग्रह पर बहुत कम समय के लिए आते हैं। अगर पूरी तरह से देखा जाए तो हमारी जिंदगियां अनंतकाल की कायनात पर कुछ बूंदों के समान है। इसलिए हमें विवेकपूर्ण तरीके से इनका स्वाद लेना चाहिए और इस जीवन रूपी सफर को खुशियों से सराबोर रखना चाहिए।

158 जीवन गति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में गति का अपना विशेष महत्व है। गतिमान व्यक्ति ही जीवन में उन्नति की ओर बढ़ते रहते हैं। हम सब एक गति में चल रहे हैं। अगर इसके विरूद्ध जाएंगे तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा। हमें जो अमूल्य जीवन मिला है, उसका सदुपयोग करते हुए हमें प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित करना चाहिए। यदि हम ऐसा कर पाए तो कुछ ही समय में बड़ा बदलाव नजर आने लगेगा। यदि हम सौ फीसद उस पर चले तो हम उन्नति की चरम सीमा को प्राप्त कर सकते हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

आपने अक्सर देखा होगा कि—जब बच्चे खेल में मस्त होते हैं तो उस समय उन्हें न तो भूख की चिंता होती है और न ही भविष्य की परवाह। अगर डांट भी दो तो अगले ही पल भूल जाते हैं। तितलियों को देखिए एक फूल से दूसरे फूल पर इठलाती फिरती हैं। उनका नुकसान नहीं करती बल्कि फूलों का निषेचन कर जाती हैं। उन्हें पता है की प्रकृति का नियम अपने स्वरूप में जीना है। हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कोई किसी का नुकसान पहुंचाने के लिए यहां नहीं है। कबूतर को देखिए वह अपने लिए रखा दाना- पानी अपने समय से ही आकर खाता- पीता है। गाय जो धूप में खड़ी रहती है, अचानक अधिक धूप लगने पर वहीं किसी दूसरे छायादार वृक्ष के पास चली जाती है। इंसान हो या पशु- पक्षी सबको इसका आभास है, उसे क्या करना है?

नदियां इसीलिए पूज्यनीय हैं क्योंकि उनमें गति है। गति का यह गुण ही उन्हें अद्वितीय बनाता है। नदियों की निर्मलता, पवित्रता गति में व्याप्त है। अगर गति शुन्य हो गई तो नदियां दूषित हो जाएंगी। वायु यदि अपनी गति के गुण को छोड़ दे तो क्या होगा, कभी सोचा है। इसकी कल्पना ही डराने लगती है। हवा की गति ही उसे प्राणदायी बनाती है। सृष्टि का संचालन ही गति पर टिका हुआ है। अगर पृथ्वी अपनी गति छोड़ दे तो कितने भयंकर परिणाम आएंगे। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है यानि सब कुछ नष्ट हो जाएगा। पृथ्वी का संपूर्ण सृजन उसकी गति पर निर्भर है। हमारा शरीर रक्त की गति से ही चल रहा है। रक्त की गति थम जाए तो क्या होगा, सब कुछ समाप्त हो जाएगा। ठीक इसी तरह से जीवन में गति न होने पर सब कुछ समाप्त होने का भय बना रहता है।

जीवन में आने वाली स्थिरता आपको जड़ बना देती है। इससे प्रगति पर विराम लगने लगता है। प्रगति अविराम हो, इसके लिए गति आवश्यक है। गति हमारे व्यक्तित्व को चेतनता प्रदान करती है। गति ही है जो हमारे जीवन को प्रखरता देती है। अगर विचारों में गति हो तो आपकी बुद्धि विलक्षण हो जाती है। आपका वर्चस्व बढ़ने लगता है। दुनिया आपकी बुद्धिमता को सराहने लगती है। गति यदि चिंतन में हो तो आप आध्यात्मिक वैभव को प्राप्त करने लगते हैं। गति यदि वाणी में हो तो आप एक अच्छे वक्ता हो जाते हैं। अगर गति सामाजिक सरोकारों में हो तो समाज में आपका रुतबा बढ़ जाता है। कोई भी क्षेत्र हो यदि आप गतिशील हैं तो सदैव मुख्यधारा में रहेंगें। आपका गतिशील जीवन ही आपके आत्मबल को ऊंचा रखता है। स्थिरता से जीवन में उदासी छाने लगती है। मन में हमेशा उदासी छाई रहती है और विचारों में नकारात्मकता उत्पन्न होने लगती है। सदैव जीवन में बहुत कुछ समाप्त होने का भय बना रहता है। इसलिए हमें जीवन में गति के महत्व को समझना चाहिए।

157. दुख में निहित है, सुख

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में सभी मनुष्य सुख की कामना ही करते हैं। दुख तो कोई नहीं चाहता परंतु मनुष्य के चाहने या न चाहने से दुख नहीं आता। सुख और दुख तो हमारे कर्मों के अनुसार हमें प्राप्त होते हैं। हम जो कर्म करते हैं, उनके अनुसार हमें सुख और दुख का भागी बनना ही पड़ता है। लेकिन कोई भी दुख हमें जिंदगी की बहुत बड़ी सीख देकर जाता है। दुख में ही हमें अपनी शक्ति का आभास होता है।

अमेरिका के लेखक मैट मारिस एक लाइफ कोच भी हैं। उनका जीवन बहुत सारे दुखों से भरा हुआ है। उन्होंने अपने जीवन के कड़वे अनुभवों से सबक लेते हुए, अपने जीवन की घटनाओं को असंख्य लोगों के सामने प्रस्तुत किया। जिससे बहुत सारे लोगों में एक प्रेरणा जगी। उन्होंने एक किताब लिखी है—
पॉजिटिविटी लिविंग इन प्रेजेंट मूमेंट, स्मार्ट गोल सेटिंग।
इस किताब के माध्यम से उसने जीवन में आने वाले दुखों से बाहर कैसे निकाला जाए, इस बारे में अपने अनुभव शेयर किए हैं। मारिस बताते हैं कि— वह जब 10 वर्ष के थे तो एक वायुयान दुर्घटना में उनकी मां का निधन हो गया। जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा। इसके पश्चात् वे एक लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक यातना सहते रहे। हालांकि जीवन की क्रूर त्रासदियों ने उन्हें भले ही कुछ समय तक विचलित कर दिया हो, पर अपनी सकारात्मक शक्ति और दृढ़ निश्चय को उन्होंने कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका कहना है यदि हम भूत और भविष्य की आशंकाओं से परे होकर वर्तमान में जीना सीख जाएं तो जिंदगी जरूर आसान हो जाएगी। वैसे हमने स्वयं भी महसूस किया होगा की वर्तमान पल में रहने की बात पर अमल करना आसान नहीं होता। हमारा मन अतीत और वर्तमान के बीच कहीं फंसा रहता है। कभी यादों में तो कभी भविष्य की चिन्ताओं में, जिसका द्वार अभी खुला भी नहीं है। भविष्य की उस दुनिया के बारे में सोचता रहता है, जिसके बारे में कुछ अता पता ही नहीं है। हमारा मन ऐसी-ऐसी कल्पनाएं बना लेता है जो भविष्य में कभी घटित हों ऐसा जरूरी तो नहीं। लेकिन उनको सोच- सोच कर वह अपना वर्तमान जरूर खराब कर लेता है। इस क्रम में हम अपनी उर्जा ही नहीं एकाग्रता भी खोते जाते हैं। जिसके कारण हम अपना काम सही तरह से पूरा नहीं कर पाते और हम कुंठित हो जाते हैं। तनाव और अवसाद हमारे ऊपर हावी हो जाता है और हमारे को कोई रास्ता नजर नहीं आता।

आपने अक्सर देखा होगा कि संत महात्माओं के चेहरों पर एक अलग तेज और संतोष दिखाई देता है। वे उलझन भरे विचारों से परे होते हैं। इसलिए जीवन में आई बड़ी त्रासदी भी उन्हें अपने लक्ष्य से नहीं भटका पाती और वे आसानी से बाहर निकल जाते हैं। अक्सर लोग पूछते रहते हैं कि यदि हम हर पल शांत रहने और उसका आनंद लेने के बारे में ही सोचते रहेंगे तो हमारा काम कौन करेगा? हमारी जो अभिलषाऐं हैं, आकांक्षाएं हैं, वे कैसे पूरी होंगी? यदि हम भविष्य के बारे में नहीं सोचेंगे, योजनाएं नहीं बनाएंगे तो कैसे काम चलेगा? यह सवाल हर किसी के मन में रहते हैं तो शायद आप वर्तमान में रहने की बात को अलग से कोई काम मान रहे हैं। ध्यान कीजिए यह अलग काम नहीं है। बस इसके साथ दो चीजें ध्यान में रखनी है।
पहली प्रकृति के नियम और दूसरी अपने लक्ष्य और आकांक्षाओं के प्रति स्पष्ट नजरिया।
स्वयं को और परिवार व रोजगार को किस रूप में और कहां देखना चाहते हैं? क्या इस बारे में आप का निर्णय स्पष्ट है? उसका जवाब तलाशना होगा। इसके बाद देखें कि आप प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में कितने सक्षम हैं। यकीनन इन सवालों के जवाब से समझ पाएंगे कि आप वर्तमान को लेकर कितने सजग हैं और कहां तक उसके साथ जीवंतता से चल रहे हैं।

हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनका हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी की कोई बात या कोई कड़वा अनुभव हमारे मन को इस कदर भेद जाता है कि पीड़ा लंबे समय तक बनी रहती है। जिसके कारण दिमाग में ग्रंथियां बन जाती हैं। ऐसे में हम अपने जीवन में बदलाव चाहते हैं यानि स्वयं को लेकर सजग नहीं रहते। हमारे भीतर चल रहे संघर्षों के आगे घुटने टेक देते हैं। यह सच्चाई है कि हर इंसान सुखमय जीवन जीना चाहता है। इसलिए वह दुख को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहता। फिर भी जीवन में दुख आते ही रहते हैं। कुछ लोग अपने दृढ़ संकल्प से मन के संघर्ष पर जीत हासिल कर लेते हैं, वे निरंतर अभ्यास के बल पर ही विचारों की उलझन और उनके नकारात्मक प्रभाव से बाहर आ जाते हैं और कुछ उन पलों को याद करके हमेशा दुखी रहते हैं। जिससे वे भूत और भविष्य के साथ-साथ अपना वर्तमान भी खराब कर लेते हैं। इसलिए याद रखिए दुख हर मनुष्य के जीवन में आते हैं जो वर्तमान में रहता है, वह इनको पार करके सुख प्राप्त कर लेता है लेकिन जो भूत और भविष्य में रहता है वह हमेशा दुखी रहता है।

156. विपत्तिकाल—आस्था

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आस्था एक ऐसी औषधि है जो मनुष्य को किसी भी विपत्ति से बचा सकती है। आस्थावान व्यक्ति हमेशा खुश रहता है क्योंकि उसे अपने ईश्वर पर
अटूट विश्वास होता है। वह अच्छी तरह से जानता है कि मेरे ईश्वर, मेरे साथ कभी बुरा नहीं कर सकते। इसलिए वह हमेशा सकारात्मक रहता है, जिससे किसी भी विपत्ति का सामना वह खुशी-खुशी कर लेता है।

लेकिन आज के समय लोगों की आस्था भी डोलने लगी है। वे भूल गए हैं कि— कोई अदृश्य शक्ति है जो हर समय हमें सुरक्षा प्रदान करती है। क्योंकि आज सिर्फ उनको चारों तरफ कोरोनावायरस ही दिखाई दे रहा है। जिसके कारण वे दुखी और पीड़ित हैं और तनाव ग्रस्त होते हुए अपना जीवन जी रहे हैं। ऐसे में वह अपनी चिंताओं को विराम नहीं दे पा रहे। आज उनके जीवन में असंतुलन और आडंबर ने अपना स्थान बना लिया है। वे भूल गए हैं कि—ईश्वर तो हमारे अंदर विराजमान है। सिर्फ जरूरत है अपने अंदर गोता लगाने की।

जब हम कुछ समय के लिए कोरोनावायरस को भूल कर अपने अंदर विद्यमान उस ईश्वर से साक्षात्कार करेंगे तो हमारे अंदर छिपा हुआ डर खत्म हो जाएगा और हम इस पीड़ा से बाहर निकल आएंगे। हम स्वयं महसूस करेंगे कि जीवन तो बहुमूल्य है, श्रेष्ठ है और आनंदमय है। लेकिन आज हम अपने ईश्वर पर विश्वास नहीं कर पा रहे। इसलिए हम उनको अपने भीतर तलाशने की बजाय बाहर तलाशने की भूल कर रहे हैं। कभी हम उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में तलाशते हैं तो कभी सिद्धांतों, क्रियाकांडो रीति-रिवाजों और परंपराओं में खोजते हैं। जो जीवन के नैतिक मूल्यों को सम्मान देता है, अच्छाइयों के प्रति आस्था रखता है और बुराइयों के प्रति संघर्ष करने का साहस रखता है उसकी संवेदना दुखी और पीड़ित मानवता के लिए हर क्षण जीवंत रहती है। ऐसे मनुष्य सचमुच ईश्वर में आस्था रखते हैं।

हर कालखंड में मानव जाति की परीक्षा हुई है। उसके जीवन पर विपत्ति के बादल मंडराएं हैं। महामारी भी आई है। बहुत बड़ी संख्या में जनहानि भी हुई है परंतु उसके पश्चात् भी उर्जा और उल्लास का सूरज चमका है। आरोग्य की वर्षा हुई है।इतिहास गवाह है कि हर बार मानव जाति ने विपत्ति का सामना डटकर किया है और एक नई ऊर्जा और जोश के साथ पुनः जीवन को धरातल पर लाई है। मनुष्य ने खुशहाली के गीत भी गाए हैं। भले ही आसमान से महामारी के घनघोर बादल गर्जना कर रहे हैं। उनकी प्रबल ध्वनि हमारे कानों को विदीर्ण कर रही है लेकिन यदि हम आस्था के रथ पर सवार होकर चलेंगे तो निश्चित ही ये बादल छट जाएंगे। हमें स्वयं के अस्तित्व के लिए धैर्य पूर्वक लड़ना होगा। धैर्य और आस्था की नैया ही हमें इस विकट समय के चक्कर से बाहर निकाल लेगी। महामारी की विकराल लहरें जल्दी शांत हो जाएंगी। हम सब मिलकर पुनः जीवन के नव गीत गाएंगे।

लेकिन इस समय हमें सावधान रहने की परम आवश्यकता है। अगर इस समय कदम लड़खड़ा गए तो बहुत बड़ा विचलन पैदा होगा जो हमें इस युद्ध में कमजोर साबित करेगा। हमें स्वयं को ही इस विचलन से बचाना होगा और अपने ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को बनाए रखना होगा। हमारे ईष्ट अवश्य ही हमें इस महामारी से बाहर निकालेंगे।