48. महानता का रहस्य

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में महानता प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति के अस्तित्व को खत्म करने की आवश्यकता नहीं होती। न ही उसे अपमानित और नीचा दिखाने की आवश्यकता है, बल्कि व्यक्ति को अपने जीवन में ऐसे आध्यात्मिक, चारित्रिक और नैतिक गुणों का विकास करना चाहिए कि— सामने वाले को खुद का कद बौना प्रतीत होने लगे। इस प्रकार से हासिल महानता, सर्वश्रेष्ठ और ऐसा महान व्यक्ति कालजयी होता है।

इसका एक उदाहरण महात्मा बुद्ध हैं— बात उस समय की है,जब राजकुमार सिद्धार्थ, जंगलों, नदी- झीलों, मैदान-पहाड़ आदि की यात्रा कर रहे थे, तो मार्ग में आ रही प्राकृतिक कठिनाइयों व मानसिक अवरोधों से एकबारगी वे भी विचलित हो गए। यहां तक कि वे घर वापिस लौट जाने के बारे में भी विचार करने लगे। इसी उधेड़बुन में जब उन्होंने अपनी अब तक की यात्रा पर विचारपूर्ण दृष्टि डाली, तो उन्हें ये अहसास हुआ कि— रास्ते में आई हर शारीरिक या मानसिक कठिनाई ने उन्हें कुछ न कुछ सीख दी है। उन अनुभवों ने मानव के तौर पर उन्हें और अधिक परिपक्व बनाया है और फिर वे बुद्धत्व पाने की यात्रा के लिए अग्रसर हो गए।

तभी तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कहा— “गंगा में धार तभी आती है, जब वह उबड़- खाबड़ रास्तों की यात्रा करती है।”
जीवन के कई पहलू और अवस्थाएं हैं और जीवन को पूर्ण रूप से ज्योतिर्मय करने के लिए आवश्यक है कि— आप जीवन के प्रत्येक पहलू और अवस्था पर प्रकाश डालें। दीपों की पंक्तियां आपको याद दिलाती हैं कि— जीवन के प्रत्येक पक्ष पर आपको ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे गुणों पर ध्यान केंद्रित करें।

प्रत्येक व्यक्ति में अच्छे गुण होते हैं। कुछ लोगों में सहनशीलता होती है, कुछ में प्रेम, शक्ति और उदारता होती है, जबकि कुछ लोगों में दूसरों को एक साथ लाने की योग्यता होती है। आप में अव्यक्त मूल्य एक दिये की भांति होते हैं। केवल एक दिया जलाकर ही संतुष्ट न हो जाएं, बल्कि हजारों दिये जलाएं। अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए आपको बहुत सारे दिये जलाने की आवश्यकता है। स्वयं में ज्ञान का दिया जला कर आप अपने अस्तित्व के सभी पहलुओं को जागृत कर सकते हैं।

एक दिये को जलाने के लिए बाती को तेल में आंशिक रूप से डूबा रहना आवश्यक है। यदि बाती तेल में पूर्ण रुप से डूबी रहेगी, तो दिया नहीं जलेगा। जीवन दीये की बाती की तरह है। आपको संसार में रहते हुए भी, इसमें होने वाली घटनाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि आप संसार के भौतिकवाद में डूब जाते हैं, तो आपके जीवन में आनंद और ज्ञान का उद्भव नहीं होगा। संसार में रहते हुए भी यदि आप भौतिकवाद में नहीं डूबते हैं, तब आप आनंद और ज्ञान का प्रकाश बन जाते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश हम व्यवहारिक जीवन में ऐसा नहीं कर पाते हैं और जीवन की अंतिम सांस तक दूसरों के मुकाबले आगे बढ़ने की कोशिश में मन को दुखी करते रह जाते हैं। दूसरों के प्रति छल- प्रपंच, ईर्ष्या और द्वेष के जहर से खुद के जीवन की शांति का गला घोट देते हैं। इतना ही नहीं गला- काट प्रतियोगिता के वर्तमान परिवेश में खुद को सफलता के शीर्ष पर देखने की अंधी चाह में हम पता नहीं कितनी भयानक योजनाएं बना बैठते हैं।

गहराई से आत्मावलोकन करने पर सच्चाई मुखर होकर सामने आ जाती है कि— इसकी मुख्य वजह एक व्यक्ति का खुद को पहचान नहीं पाने की असफलता और शीघ्र सफल होने की लालसा होती है। मानवता के प्रति सद्भाव, प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति और अन्य मानवीय गुणों के अभाव में ही हम मर्यादित आचरण की सीमा लांघ जाते हैं। खुद को निरंतर परिमार्जित करते रहनें, मानव मात्र के कल्याण के भाव के साथ धैर्य पूर्वक सात्विक और संयमित जीवन के जीने में ही सच्ची महानता का रहस्य छिपा होता है। हम अपने मन में मानवता की सेवा करने की भावना रखें। अपने हृदय में प्रेम और करुणा का दीप जलाएं और दूसरों की सेवा करें। अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान का और ईश्वर ने जो हमें दिया है, उस समृद्धि के प्रति कृतज्ञता का दिया जलाएं।

जब आप अभाव महसूस करते हैं तो अभाव बढने लगता है। लेकिन जब आप अपना ध्यान समृद्धि पर केंद्रित करते हैं, तो समृद्धि आने लगती है। एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए प्रत्येक क्षण और प्रत्येक दिन समृद्धि लिए हुए होता है। ज्ञान की आवश्यकता हर जगह है। यदि परिवार का एक व्यक्ति अंधकार में डूबा हुआ है, तो हम खुश नहीं रह सकते। हमें परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ज्ञान का प्रकाश जगाने की आवश्यकता है।
शंकराचार्य के अद्वैतवाद दर्शन के विद्वान स्वामी रामतीर्थ के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग काफी प्रेरणादायी है। कहते हैं कि— एक बार स्वामी रामतीर्थ छोटे बच्चों को पढ़ा रहे थे। पढ़ाने के क्रम में उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर एक लाइन खींची और अपने शिष्यों से पूछा— इस रेखा को बिना स्पर्श किए हुए कौन छात्र इसे छोटा कर सकता है। थोड़ी देर के लिए पूरी कक्षा शांत रही। प्रश्न गूढ था। इस कारण छात्र विस्मित थे। कुछ देर बाद एक छात्र आगे बढ़ा और ब्लैक बोर्ड पर खींची गई रेखा के समानांतर एक बड़ी-सी लाइन खींच दी। परिणाम स्वरूप पहले वाली रेखा छोटी हो गई। इस प्रकार के विचार रखने वाले व्यक्ति ही महानता की श्रेणी में आते हैं।

47. बुराई का आईना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य अपने प्रत्येक कार्य की प्रशंसा सुनने के लिए व्यग्र रहता है। लेकिन जरूरी नहीं कि हमेशा ऐसा हो। कभी कमियां भी तो निकल सकती हैं। इसलिए व्यक्ति को अपनी बुराई सुनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। आलोचना को समझने में हमें सावधान रहना चाहिए और शुभचिंतकों की बातों पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि वे सदैव हमारा हित चाहते हैं। वे अपनी राय देकर हमारी मदद ही करना चाहते हैं। कई बार हम कुछ ऐसी आदतें पाल लेते हैं, जो न सिर्फ आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं, बल्कि वर्कप्लेस (कार्यस्थल) और सामाजिक दायरे में भी हमारी इमेज खराब कर देती हैं। हमारा अहंकार ही हमारी सोचने- समझने की क्षमता को सीमित करके रखता है। जो कि हमारी व्यक्तिगत प्रगति एवं स्वस्थ संबंधों के लिए अच्छा नहीं है।

कई लोग हर वक्त एक व्यक्ति की बात दूसरे व्यक्ति को बताते रहते हैं, जो सामने न हों उसके बारे में कुछ न कुछ बातें करते हैं और जमकर उसकी बुराई करते हैं। ये लोग भले ही खुद को कितना भी होशियार समझें, लेकिन विवेकशील और समझदार लोगों को समझते देर नहीं लगती कि— जो व्यक्ति दूसरे की बुराई उनके सामने कर रहा है, वह किसी दूसरे के सामने उनकी भी बुराई करता होगा। कुछ लोग हमेशा खुद को वक्त का मारा या दूसरों द्वारा सताया बताते रहते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य हर किसी से सहानुभूति की उम्मीद करना है।

अपनी असफलताओं या जमाने से पिछड़ जाने के लिए ये कभी अपनी खराब सेहत का रोना रोते हैं, तो कभी खराब मूढ का। ऐसे लोग हर समय अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। किसी की आदत होती है, कि किसी भी काम में कोई गड़बड़ी हो जाए या सफलता हासिल न हो, तो खुद पल्ला झाड़ कर दूर खड़े हो जाएंगे और सारा दोष अपने परिजनों या टीम के दूसरे साथियों पर थोप देंगें, क्योंकि किसी भी कार्य की सफलता या असफलता में पूरी टीम का हाथ होता है, किसी अकेले व्यक्ति का नहीं। कुछ की यह खराब आदत होती है कि वे हर जगह लंबी-लंबी डींग हांकते हैं। चारों तरफ बताते फिरते हैं कि यह कार्य उनकी वजह से हुआ है।

कंपनी आज जिस ऊंचाई पर है, उसमें उनकी भूमिका सबसे ज्यादा है। किसी भी परिवार में या कंपनी में किसी भी तरह की अचीवमेंट में हमेशा टीम वर्क ही होता है, भले ही किसी की भूमिका कम या ज्यादा हो सकती है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर बात पर तारीफ करने वाले लोग, हमें लाभ की बजाय हानि या नुकसान अधिक पहुंचा सकते हैं। ऐसे लोग हमें आने वाले खतरों से आगाह नहीं करते और हमारी चेतना को भी जागृत करने की बजाय सुप्त करते हैं। इसलिए आलोचनाओं को स्वीकार करके हम वास्तविकता से अधिक परिचित होते हैं, अधिक जागरूक होते हैं और जीवन में दूसरों से सही व्यवहार करना भी सीखते हैं।

हम अपने जीवन में जितना आगे बढ़ते जाते हैं, उतनी ही आलोचनाएं भी बढ़ती हैं। एक संत ने अपने शिष्य की बुराइयों को दूर करवाने के लिए आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा आईना दिया, जिसमें व्यक्ति के मन के छिपे हुए भाव दिखाई देते थे। शिष्य ने परीक्षा लेने के लिए आईने का मुंह सबसे पहले गुरु की ओर कर दिया। शिष्य ने दर्पण में देखा कि— उसके गुरु में मोह, अहंकार, क्रोध आदि जैसे मनोविकार हैं। यह देख कर शिष्य को दुख हुआ। शिष्य ने फिर आईना लेकर अपने मित्रों और परिचितों की परीक्षा ली, तो उसे सभी के मन में कोई न कोई बुराई दिखाई दी। वह तुरंत गुरुकुल पहुंचा। तब उस गुरुजी ने आईने का मुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य ने आईने में देखा कि उसके मन में भी अहंकार, क्रोध जैसी बुराइयां विद्यमान हैं। उन्होंने शिष्य को समझाते हुए कहा कि—यह आईना, मैंने तुम्हें अपनी बुराइयां देखकर, खुद में सुधार लाने के लिए दिया था, दूसरों की बुराइयां देखने के लिए नहीं। तुमने जितना समय दूसरों की बुराइयां देखने में लगाया, उतना समय खुद को सुधारने में लगाया होता, तो अब तक अच्छे मनुष्य में तब्दील हो गए होते।

हमें शुभचिंतकों की राय को बड़े ध्यान से सुनना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति आलोचनाओं को सहन करना सीख लेता है, तो वह अपने आप को पहले से ज्यादा संतुलित बना पाता है। अपने परिजनों या सहयोगियों के साथ यदि हम प्रतिस्पर्धा का भाव रखते हैं, तो इससे न सिर्फ हमारा मन अशांत रहता है, बल्कि समाज में भी अशांति फैलती है। कुछ बड़ा मुकाम हासिल करने के लिए यह जरूरी है कि अपना आत्मविश्वास बनाए रखते हुए हम अपनी बुरी आदतों को सहज भाव से स्वीकार करें। क्योंकि समय के साथ हमें इस बात का अभ्यास भी हो जाता है, कि कौन- सी आलोचनाएं उचित हैं और कौन- सी अनुचित। किन्हें स्वीकारना चाहिए और किन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए।

हमारे कार्यों में स्वाभाविक रूप से गलतियां हो जाती हैं और यदि कोई व्यक्ति उन गलतियों को उजागर करता है, तो उस पर नाराज होने की बजाय उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए अपनी आलोचनाओं को सुनना, उस पर विचार करना, कमियों को सुधारना, हमें आगे बढ़ने में सक्षम एवं समर्थ बनाता है। हमें अपने जीवन की सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि सत्य हमेशा कड़वा होता है। लेकिन फिर भी सत्य, सत्य ही होता है। स्वामी शंकराचार्य ने कहा— सत्य की परिभाषा मात्र इतनी है कि—जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा।