12. दृढ़-इच्छा शक्ति

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

जब हम कोई काम करना शुरू करते हैं, तब सबसे पहले हमें अपने आप से संकल्प लेना होगा। कहने का अभिप्राय है कि -हमें अपने आप को प्रिपेयर करना होगा कि हमारे अंदर इतनी काबिलियत है कि हम ये कार्य कर सकते हैं। अगर हमारे अंदर काम करने की इच्छा शक्ति नहीं होगी तो हम कभी भी उस कार्य को सफलता-पूर्वक नहीं कर पाएंगे। हम अपनी इच्छा-शक्ति से उस कार्य में सफल तो हो जाएंगे लेकिन जो कार्य दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर प्राप्त कर सकते हैं उतनी सफलता हम प्राप्त नहीं कर पाएंगे। जैसे एक विद्यार्थी परीक्षा में सफल होने की इच्छा शक्ति रखता है, तो वह परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण तो हो जाएगा लेकिन अगर वह दृढ़ निश्चय के साथ परीक्षा देता है तो उसकी सफलता की प्रतिशत ज्यादा होगी। वह अपना स्कूल, कॉलेज भी टॉप कर सकता है। कोई भी आविष्कार एक दृढ़ इच्छा-शक्ति के बगैर नहीं किया जा सकता।

एक सत्य घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। एक बच्चे की एक आंख खराब थी। उसको पढ़ने में रुचि थी। इसलिए वह एक आंख से ही पुस्तके पड़ा करता था। डॉक्टर ने दूसरी आंख खराब होने की आशंका जताई, परिवार वालों ने जब पढ़ाई करने से रोका, तो उसने दृढ़ होकर जवाब दिया, मैं पढ़ना लिखना तब छोडूंगा, जब मुझे कोई ना कोई प्रतिदिन पुस्तक पढ़कर सुनाता रहेगा और मुझे बीमार नहीं समझेगा ।परिवार वाले बच्चे की इस बात पर सहमत हो गए। उसने न सिर्फ अपनी दृढ़  इच्छा शक्ति से अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि अनेक पुस्तकें भी लिखी। वह अपने विचार दूसरों से लिखवाता था। उसकी पुस्तकों में जीवन को हर हाल में सकारात्मक नजरिये वआनंदमय तरीके से जीने के तरीके सहज रूप से बताए गए हैं। वह बच्चा कोई और नहीं बल्कि फ्रांस के प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यांपाल सात्रृ थे।

महान दार्शनिक अरविंदो कहते हैं -यदि मन को सकारात्मक रखा जाए तो किसी भी बीमारी को न सिर्फ नियंत्रित किया जा सकता है, बल्कि उसे पराजित भी किया जा सकता है। अगर हम नकारात्मक विचारों से अपने मन को भरते  रहेंगे, तो हमेशा बीमारी  और बहानेबाजी की बातें ही सोचते रहेंगे। हमें अपने मन को इस तरह कर लेना चाहिए, जो सिर्फ अच्छे और सकारात्मक विचारों के मोती ही चुने। हमें  अपने मन पर कंट्रोल होना चाहिए। हम जैसे कंप्यूटर को कमांड देते हैं और वो हमारी कमांड को फॉलो करता है। ऐसे ही हमारा ब्रेन एक कंप्यूटर है जिसे हमें कमांड देनी है और वो हमारी इच्छा से काम करने लगता है। लेकिन कमांड देने से पहले हमारे ब्रेन में दृढ़ इच्छाशक्ति का होना बहुत ही आवश्यक है। अगर डॉक्टर और परिवार वालों के कहने पर ज्यांपाल सात्रृ पढ़ाई छोड़ देता तो वह कभी भी एक फेमस राइटर नहीं बन सकता था। ये उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम ही था। मनोवैज्ञानिक आरती आनंद कहती हैं -कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से बीमारी को भगाने की सोच ले तो वह छोटी-छोटी बीमारी क्या, कभी जानलेवा बीमारी की चपेट में भी नहीं आएगा। अगर आप किसी कारणवश बीमार पड़ते हैं, तो दवा के साथ- साथ  संतुलित खान-पान, सकारात्मक विचार, मुस्कुराहट और परिवार का सहयोग लेकर और देकर अपने जीवन को स्वस्थ और सुंदर बना सकते हैं।

11. जैसा कर्म वैसा फल

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

कुछ लोग आस्तिक होते हैं और कुछ नास्तिक होते हैं। एक तीसरी टाइप के लोग भी होते हैं, जो ना आस्तिक होते हैं और ना नास्तिक होते हैं। ऐसे लोग मौकापरस्त होते हैं। वे सिर्फ अपना काम सिद्ध करते हैं। आस्तिक वह होते हैं जो भगवान में विश्वास करते हैं और नास्तिक जो भगवान में विश्वास नहीं करते। कुछ लोग सिर्फ इतना मानते हैं कि ईश्वर नहीं है, लेकिन कोई शक्ति है, जो इस संसार को चला रही है। कुछ लोग ईश्वर पर सिर्फ इसलिए यकीन नहीं करना चाहते क्योंकि बहुत सारे पूजा-पाठ, दान -धर्म, परोपकार आदि करने के बाद भी उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता। ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें अच्छे कर्मों के बदले अच्छा फल मिलने और बुरे कर्मों के बदले बुरा फल मिलने वाली बात पर संदेह है। यकीनन जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनके पास अपने अनुभव भी  होंगे। आप में से तमाम लोगों ने कभी अच्छे काम किए होंगे, फिर भी आपको उसके बदले में बुराई मिली होगी। आपके पास तमाम वे उदाहरण भी होंगे, जिनमें आपके जानने वाले ने कोई गलत काम किया, पर उसकी जिंदगी में अच्छा-अच्छा होता चला गया। ऐसे उदाहरण हमें यह मानने को मजबूर करते हैं, कि इस बात की गारंटी नहीं है कि पाप करने का अंजाम बुरा होगा और पुण्य करने के बदले में भला होगा। यह सोचने का एक तरीका है। इसे हम एक दूसरे सकारात्मक तरीके से भी सोच सकते हैं, फिर शायद हम यकीन कर सके कि -हम जैसा कर्म करेंगे वैसा फल हमें मिलेगा।

मान लीजिए हमारा जीवन एक  U आकार की ट्यूब की तरह है ।जन्म लेते समय इसके हिस्से में आधी अच्छाई भरी है और आधी बुराई। अध्यात्म में हम इसे आधा पुण्य और आधा पाप कहेंगे। अगर आप पाप -पुण्य के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते तो इसे आधा पॉजिटिव और आधा नेगेटिव कह लीजिए। यानी मान लीजिए कि अच्छा और बुरा जन्म के साथ जुड़कर आपके साथ आया है। अब आप जब कोई अच्छा काम करते हैं, तो इस यूट्यूब के आधे हिस्से में अच्छाई भरी होने वाले छोर से इसके भीतर अच्छाई चली जाती है। जाहिर है, जब उसमे थोड़ी अच्छाई अंदर जाती है, तो दूसरी तरफ से उतनी ही बुराई बाहर निकलती है। क्योंकि ट्यूब पूरी तरह भरी हुई है, इसलिए उसके एक छोर से उसमें अच्छाई भीतर जाने पर दूसरी तरफ से बुराई बाहर निकल गई। तब आप सोचते हैं -हे भगवान हमने तो भला किया, लेकिन हमारे साथ बुरा क्यों हो गया। अब मान लीजिए कि आपने किसी का बुरा कर दिया ।आपके यूट्यूब के दूसरे छोर से उसमें बुराई घुसी और दूसरी ओर से लबालब भरी अच्छाई में से थोड़ी सी अच्छाई बाहर निकल गई। आपको लगा मैंने तो पाप किया था, लेकिन मेरा भला हुआ। यानी ईश्वर नहीं है। फिर आप लगातार बुराई करते रहते हैं,और अधिक बुराई उस टयूब में अंदर जाती रहती है और अच्छाई बाहर आती रहती है। आप रिश्वत लेते हैं, चोरी करते रहते हैं, किसी का हक मारते हैं, अपमान करते हैं, फिर भी आपका जीवन लगातार रोशनी से चमकता रहता है। एक दिन सारी अच्छाई उस ट्यूब से बाहर निकल जाती है। उसके बाद उस टयूब से जो कुछ भी बाहर निकलता है, वह सिर्फ और सिर्फ बुरा निकलता है और हमारा बुरा होना शुरू हो जाता है और हम यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि- जब हम बुरा करते थे, तब भी हमारा अच्छा होता था, तो अब हमारा बुरा क्यों हो रहा है? और ईश्वर को कोसना शुरू कर देते हैं -कि ईश्वर है ही नहीं। अगर भगवान है तो यह कौन सा न्याय है।जब हम अच्छा कर्म कर रहे थे, तब उसका फल हमें बुराई के रूप में मिल रहा था। और जब हम बुरा कर रहे थे तो हमें उसका फल अच्छा मिल रहा था। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हमने कितने पाप किए हैं। जिसकी वजह से हमारे सारे पुण्य कर्म फल खत्म हो गए ।तभी तो अपने बड़े बुजुर्ग इसी को तो कहते थे कि पाप का घड़ा भर गया।

10. सहनशक्ति का महत्व

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

सहनशक्ति का अपना ही महत्व है। हर इंसान में सहन करने की शक्ति अलग-अलग होती है।किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी सहनशक्ति पर निर्भर करता है। उसमें बर्दाश्त करने की ताकत जितनी बढ़ती जाएगी उसका व्यक्तित्व उतना निखरता चला जाएगा ।उसमें धैर्य का विकास होगा ।वह विकट स्थिति में भी अपने कार्य को आसानी से अंजाम तक पहुंचा सकता है। सहनशक्ति वह गुण है ,जिससे व्यक्ति सफलता के शीर्ष को स्पर्श कर सकता है। यह गुण हमारी आत्मिक शक्ति को सफलता प्रदान करता है। यह चारित्रिक परिष्कार का कारक है। सहनशील  व्यक्ति के भीतर अथाह सामर्थ्य का भंडार संग्रहित होता है। सहनशीलता सद् विचारों एवं सत्संगति के प्रभाव से ही आती है। अच्छे विचार सहन शक्ति में वृद्धि करते हैं। सत्संगती भी संयम के जन्म का कारक है। अच्छे परिवेश, भद्रजनों के सामीप्य से सहनशील व्यक्ति में प्राण वायु का संचार होता है।सहन शक्ति एक ऐसा गुण है, जो इस नश्वर शरीर को अमरता प्रदान करता है। क्योंकि मनुष्य को सद्कार्यों के लिए उद्वेलित करता है। यह नकारात्मकता को पास नहीं फटकने देता। सहनशील व्यक्ति एवम् नकारात्मक विचारों का आपस में बैर है।

जब साहस के साथ सहनशीलता और शिष्टाचार जुड़ जाता है, तो वह व्यक्ति अनूठा हो जाता है अर्थात व्यक्ति में अनूठेपन के लिए सहनशक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है।व्यक्ति में मौलिक विशिष्टता उसकी सहनशक्ति से पोषित होती रहती है। पश्चिमी विचारक रूसो से जब  सहनशक्ति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि-सहन शक्ति मनुष्य के जीवन में नई रोशनी उत्पन्न कर देती है। स्पष्ट है कि सहनशीलता में वह शक्ति है, जो व्यक्ति के जीवन को प्रकाशवान बना सके। जिसमें सहनशक्ति नहीं है वह गुस्से में अपना कार्य खराब कर लेता है ।कभी-कभी हम गुस्से में दूसरों को हानि पहुंचाने की कोशिश करते हैं ।मगर समय बीतने के बाद पता चलता है, कि हमने अपने आपको ज्यादा नुकसान पहुंचाया है ।सहनशक्ति की कमी के कारण हम उस सांप की भांति हैं, जो गुस्से में अपने आपका जीवन खत्म  कर लेता।है।

एक बार की बात है ,कि एक बंद दुकान में कहीं से घूमता फिरता एक सांप घुस गया। दुकान में रखी एक आरी से टकराकर सांप मामूली सा जख्मी हो गया। घबराहट में सांप ने पलट कर आरी पर पूरी ताकत से डंक मार दिया, जिस कारण उसके मुंह से खून बहना शुरू हो गया ।अबकी बार सांप ने अपने व्यवहार के अनुसार आरी से लिपट कर उसे जकड़ कर और दम घोंटकर मारने की पूरी कोशिश कर डाली।अब सांप अपने गुस्से की वजह से पूरी तरह घायल हो गया ।दूसरे दिन जब दुकानदार ने दुकान खोली तो सांप को आरी से लिपटा मरा हुआ पाया ।जो किसी और कारण से नहीं बल्कि अपनी तैश और गुस्से की भेंट चढ़ गया था। सहनशक्ति जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। हमें अपनी जिंदगी सुचारू रूप से चलाने के लिए कभी-कभी कुछ चीजों को, कुछ लोगों को, कुछ घटनाओं को, कुछ कामों को ,और कुछ बातों को इग्नोर करना चाहिए। अपने आपको मानसिक मजबूती के साथ इग्नोर करने का आदी जरूर बनाइए। जरूरी नहीं हम हर एक्शन का एक रिएक्शन दिखाएं । सहनशक्ति ऐसी सवारी है ,जो अपने सवार को गिरने नहीं देती ना किसी के कदमों में, ना किसी की नजरों में।

09. आडंबर

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

आज के समाज में आडंबर एक गंभीर बीमारी का रूप ले चुका है। आडंबर छुआछूत की बीमारी की तरह हमारे चारों ओर के वातावरण में अपनी जड़ स्थापित कर चुका है। प्रत्येक मनुष्य इससे प्रभावित होकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है। वह एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में अपने आप को भिन्न-भिन्न रूप में पेश करने की कोशिश करता है। दूसरों को नीचा गिराने का कोई मौका नहीं चूकता।वह अपने कपड़े , गहने, गाड़ी- बंगले, यहां तक की वार्तालाप में भी हर वक्त ताना मारना, आम बात समझता है। हम धन दौलत से मनुष्य की अमीरी को देखते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि, जिसके पास संस्कारों की धन-दौलत है और जिसने काम- क्रोध आदि विकारों पर विजय प्राप्त कर ली है अगर उससे बात करने का मौका मिल जाए तो, वह हर वक्त भगवान की महिमा का गुणगान करेगा। जिसे अमीर लोग उसका दिखावा बोलेंगे। जबकि वे यह भूल जाते हैं कि, दिखावा वह नहीं बल्कि वे खुद कर रहे हैं। बाहरी सुंदरता कुछ समय के लिए मोहित कर सकती है, लेकिन आंतरिक सुंदरता हमेशा के लिए सुंदर रहती है।जो व्यक्ति ज्यादा छलावे की बात करता है, वह यह भूल जाता है,कि उसे छलावा ही वापस मिलेगा। क्योंकि इस संसार का यह सिद्धांत है, कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे। अगर आप प्यार दोगे तो प्यार वापस मिलेगा, खुशी बाटोगे तो खुशी मिलेगी। इसलिए बाहरी दिखावा करने वाले को जब दिखावा वापस मिलता है, तो बहुत दुख होता है।

इसी को दर्शाने के लिए एक कथा स्मरण हो आई है ।एक गुरुजी और एक शिष्य की – वह गुरु जी अपने शिष्यों को सुधारने के लिए बहुत कठिन दिनचर्या और कठोर नियम रखता था। उनके सबसे अच्छे और प्रिय शिष्य ने उनका अनुसरण करना चाहा। वह गुरु जी की तरह बिस्तर छोड़ कर जमीन पर सोने लगा ।सादा खाना शुरु कर दिया ।उसने सफेद वस्त्र पहनने शुरू कर दिए। गुरुजी को शिष्य का बदला हुआ रूप देखकर हैरानी हुई ।उसने शिष्य से इसका कारण जानना चाहा, तो शिष्य ने कहा- मैं कठोर दिनचर्या का अभ्यास कर रहा हूं ।मेरे सफेद कपड़े मेरे सुध ज्ञान की खोज को दर्शाते हैं। शाकाहारी भोजन से मेरे शरीर में सात्विकता बढ़ती है ,और सुख सुविधा से दूर रहने पर मैं आध्यात्मिक पथ की तरफ बढ़ता हूं। गुरुजी शिष्य की बात सुनकर मुस्कुराए, और उसे खेतों की तरफ ले गए। खेत में घोड़ा घास चर रहा था। गुरुजी ने कहा तुम खेत में घास चर रहे इस घोड़े को देख रहे हो, यह श्वेत रंग का है। यह केवल घास फूस खाता है, और अस्तबल में जमीन पर सोता है। क्या तुम्हें इस घोड़े में जरा- सा भी ज्ञान और सात्विकता दिखाई देती है। तुम्हारी बात माने तो यह घोड़ा आगे चलकर बड़ा गुरु बन सकता है। यह सब गुरुजी की बातें सुन कर शिष्य को अपनी गलती पर पछतावा हुआ और गुरु जी के चरणो में नतमस्तक हो गया।

ऊपरी व बाहरी दिखावा अंहकार को बढ़ाता है। इसलिए दिखावे के बजाय हमें अपने लक्ष्य वअपने अच्छे कर्म पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। क्योंकि सारा अंहकार जीते जी तक का है ।इस दुनिया में रहते हुए संसार हमारे लिए जितने मजेदार काम करता है ,उसमें से एक यह है कि- हमारे अहंकार को थपेड़े देकर उसे पोषित करता है ।क्योंकि आडंबर का मूल स्रोत अंहकार ही है ।अपने अंहकार को शांत करने के लिए ही वह आडंबर का सहारा लेता है ।मनुष्य खुद उतना अंहकारी नहीं होता जितना दूसरे उसे बना देते हैं ।ऐसी -ऐसी गलत-फहमियां पालते हैं कि, अहंकार स्वत: जाग जाता है। अच्छे-अच्छे लोह पुरुष भी अंतिम समय में चिता पर जल गए। दुनिया जिनकी ताकत, क्षमता और व्यक्तित्व का लोहा मानती थी, आखरी सांस के बाद उनका शरीर, जिसमें कई लोह तत्वों की कहानियां थी, धू-धू कर जल गया। बड़े-बड़े सूरमा इस अहंकार रूपी दानव ने निगल लिए। दुनिया के सिकंदरो का हिसाब लगाने निकले तो मिट्टी पल भर में दे देगी। फिर अंहकार किस बात का।

अंहकार मिटाना हो, उसको गलाना हो, तो भक्ति कीजिए। भक्ति की विशेषता होती है कि वह अंहकार को भुला देती है। हालांकि यहां सावधानी की आवश्यकता होती है। अगर सावधानी नहीं रखी जाए तो भक्ति खुद अंहकार बन जाती है और अहंकार आया तो फिर भक्ति भी आडंबर बन जाती है। इसलिए कोशिश यह की जाए कि किसी भी स्थिति में अंहकार न आए। हर परिस्थिति में निरंकारी बने रहने की कला बड़ी आसान है। आपका संबंध किसी भी धर्म से हो, सभी में भक्त होने की सुविधा आसानी से मिल जाती है, क्योंकि भक्त का मतलब होता है, भगवान के भरोसे का जीवन। भक्त आलसी नहीं होता। बस परम -शक्ति के भरोसे जीवन बिताता है और यहीं से अंहकार मिटता है। एक बार अहंकार खत्म तो समझो आडंबर खत्म। 

08. आनंद के रास्ते

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

इस धरा पर कोई व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो अपने ईश्वर से यह मांगता हो कि हमें अपार कष्ट दे दीजिए। शरीर रोग ग्रस्त हो, धन की कमी हो और हमें सुकुन की नींद ना मिले ।बल्कि हर व्यक्ति अपने इष्ट देव से आनंद और उत्तम जीवन ही मांगता है । इस प्रकार देखा जाए तो सब के अंतर्मन में ईश्वर के प्रति आस्था है और जो खुद को नास्तिक कहते हैं तथा ईश्वरीय शक्ति को नकारते हैं, वे भी अंतर्मन से परमानंद की सत्ता को स्वीकार कर आनंद ही चाहते हैं । प्रत्येक व्यक्ति का आनंद प्राप्त करने का एक अलग नजरिया है। छोटा बच्चा अपना मनचाहा खिलौना पाकर आनंदित हो जाता है। वहीं किसी की गाड़ी लेने की इच्छा पूरी हो जाती है तो वह आनंद से भर जाता है। बेरोजगार व्यक्ति नौकरी पाकर परम आनन्द प्राप्त करता है ।प्रत्येक व्यक्ति अपनी मनचाही इच्छा पूरी होने के बाद आनंद से ओतप्रोत हो जाता है ।लेकिन यह सब भौतिक वस्तुऐं हैं । फिर भी मनुष्य इन सबको पाने के लिए लालायित रहता है । राजा -महाराजा भी अपने राज्य को बढ़ाने के लिए युद्ध करते रहते थे। जिससे उनके शक्तिशाली होने का पता चलता था। उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त करके ही आनंद प्राप्त होता था। अब सवाल यह उठता है कि अधिकांश लोगों की इच्छा पूरी नहीं होती तो वे लोग इधर-उधर दुखी होने का रोना रोते दिख जाते हैं।

दरअसल आनंद के कई रास्ते हैं। व्यक्ति पंचमुखी चौराहे पर खड़ा होकर यदि सभी रास्तों की जानकारी नहीं करेगा तो वह एक ही रास्ते पर चलता रहेगा। ये पंचमुखी रास्ते हैं पांच ज्ञानेंद्रियां । अब कोई व्यक्ति केवल स्वाद के लिए जिएगा , तो संसार के अदभुत दृश्य, श्रवण, गंध और स्पर्श से वंचित रह जाएगा ।व्यक्ति को श्रवण के लिए सत्संग में प्रवचन, संगीत, मंत्रों के पाठ को सुनना चाहिए। इससे भी मन को सुकून मिलता है। दृश्य के लिए प्रकृति को भरपूर निहारना चाहिए, जिससे आत्मिक शांति मिलती है और तनाव दूर होता है ।प्रकृति के सानिध्य में आकर मनुष्य अपने को तरोताजा महसूस करता है। सूर्योदय के वक्त प्रकृति अपना अद्भुत श्रृंगार इसलिए करती है कि मनुष्य इससे लाभान्वित हों। ऋषि-मुनियों ने सूर्योदय काल को अति उत्तम कहा है । सूर्य की पहली किरणें जब पेड़ पौधों पर पड़ती हैं तो उन पर सुनहरी रंग की आभा झलकनें लगती है ।जो मन को अपनी ओर आकर्षित करती है और मनुष्य का चित आनंद से भर जाता है। गंध -सुगंध के लिए पेड़ पौधों के आस-पास कुछ समय व्यतीत करना चाहिए।स्पर्श सुख के तहत माता-पिता, गुरुजनों के चरण -स्पर्श, छोटे बच्चों को गोद लेने तथा खेलने से उर्जा मिलती है। जब आप अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करते हैं तो आपको एक अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है। जिससे आपको सकारात्मकता का अनुभव होता है और आप अपने काम को ज्यादा धैर्य और संतुलन के साथ करने में सक्षम होते हैं। क्योंकि जीवन में समता चाहिए, संतुलन चाहिए।जीवन यूं है जैसे कोई तलवार की धार पर चले। जरा इधर, जरा उधर हुआ नहीं कि जीवन का आनंद समाप्त हो जाता है।

महाराज दशरथ ऐसे राजा थे जिन्हें श्राप के बारे में सोच कर भी आनंद प्राप्त होता था। दरअसल बात उस समय की है जब महाराज दशरथ को संतान प्राप्त नहीं हो रही थी। तब वे बड़े दुखी रहते थे ।ऐसे समय में उन्हें एक बात से ही हौसला मिलता था, जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था और उन्हें आनंद की अनुभूति कराता था। अनोखी बात यह थी कि इस हौसले की वजह किसी ऋषि- मुनि या देवता का वरदान नहीं, बल्कि श्रवण के पिता का श्राप था ।महाराज दशरथ जब-जब दुखी होते तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया हुआ श्राप याद आ जाता था ।श्रवण के पिता ने यह श्राप दिया था कि मेरी तरह आप भी पुत्र वियोग में तड़प -तड़प कर मरेंगे। दशरथ को पता था कि यह श्राप अवश्य फलीभूत होगा। इसका मतलब है कि- मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा, तभी तो उसके शौक में तड़प- तड़प कर मरूंगा। यानी यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया।

ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई। सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर -वीरों को पृथ्वी की अलग-अलग दिशाओं में भेज रहे थे, तो उसके साथ-साथ उन्हें यह भी बता रहे थे की किस दिशा में तुम्हें क्या मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए। प्रभु श्री राम सुग्रीव का यह भौगोलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे। उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि आपको यह सब कैसे पता? तब सुग्रीव ने उनसे कहा कि मैं भाई बाली के भय से जब मारा -मारा फिर रहा था, तब मुझे पूरी पृथ्वी पर कहीं भी शरण नहीं मिली। इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया। सोचिए, अगर सुग्रीव पर यह संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता सीता को खोजना कितना कठिन हो जाता। इसलिए किसी ने बहुत सुंदर बात कही है -अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियां वरदान हैं और जो उनके अनुसार व्यवहार करे वही पुरुषार्थी है।

ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है, तो हर एक कांटा भी वरदान ही समझो। कहने का मतलब है -अगर आज मिले सुख से आप खुश हैं, तो कभी अगर कोई दुख, विपदा, अड़चन आ जाए तो घबराना नहीं चाहिए क्या पता वह अगले किसी सुख की तैयारी हो। इसलिए सदैव सकारात्मक रहें, आनंद से रहें। कहते हैं कि -काशी हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण जब हो रहा था ,तो उसके संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय रात में जाकर मजदूरों द्वारा बनाई गई दीवारों को पुत्रवत स्पर्श कर आनंदित होते थे। उन्हें अपना विश्वविद्यालय पुत्र की तरह लगता था ।इन सभी उपायों से वैविध्यपूर्ण शरीर में आनंद के रसायनों का जो निर्माण होगा ,वह व्यक्ति को दुखी नहीं होने देगा ।भौतिक दौर में व्यक्ति सिर्फ भौतिक समृद्धि के लिए यदि उतावला रहेगा तो उसका जीवन केवल एक ही रस पाएगा जो आगे चलकर नीरसता उत्पन्न करेगा। इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह ईश्वर द्वारा प्रदत पंच ज्ञानेंद्रियों का हमेशा सदुपयोग करें।

07. भगवान की अदालत

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श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

भगवान अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करता। अगर सच्चे मन से हम उसकी आराधना करते हैं, तो उसका फल अवश्य मिलता है। एक सच्चे भक्त द्वारा निष्काम भाव से दिया गया आशीर्वाद भी अवश्य प्रफुल्लित होता है ।क्योंकि एक भक्त ही भगवान को झुकाने की ताकत रखता है। और एक सरल हृदय भक्त के द्वारा कही गई छोटी सी बात भी सच साबित होती है ।ऐसे भक्त यही मानते हैं कि मनुष्य के वही कर्म सफल होते हैं, जिनमें परमात्मा के प्रति मन में आस्था और भावना दृढ़ हो ।निष्काम भक्ति करने से जो पुण्य फल मिलता है, वही वास्तविक पूंजी होती है।ऐसी पूंजी भगवान की आराधना करने से ही प्राप्त होती है। और यह जन्म -जन्मांतर तक साथ रहते हैं।

जो भक्त परमात्मा के भक्ति रूपी सरोवर में स्नान करता है, उसके सारे दुख कलेश और पाप मिट जाते हैं। वह उस फलदार वृक्ष की तरह हो जाता है, जो बारिश तूफान में भी सीना तान कर खड़ा रहता है। कहने का अभीप्राय है कि उसे इस दुनिया में पैदा होने वाले दुख दर्द या शारीरिक पीड़ा ,परिवार के झगड़े आदि का उसके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भगवान की भक्ति करना ही उनका कार्य है। भक्ति करने से ही भगवान की महिमा स्थापित होती है।ऐसे भक्त परमात्मा की भक्ति के साथ-साथ सामाजिक सदभाव का माध्यम भी बनते हैं। भक्ति रूपी सरोवर में स्नान किए हुए व्यक्ति के सभी विकारों की मैल धुल जाती है। अज्ञानता का अंधकार मिटता है। सत्य के प्रति आस्था जागृत होती है। भक्ति भाव और आत्मज्ञान का संचार होता है। मानव जीवन का महत्व समझ में आने लगता है और जीवन को सही दिशा मिलती है ।

जनमानस को आज की विषमताओं से उबारने के लिए एक ही मंत्र की आवश्यकता है, ज्ञान के साथ समता, भक्ति के साथ विनम्रता और कर्म के साथ निष्कामता। ऐसे भक्तों के प्रति हृदय कृतज्ञता से भर जाता है। वे जनमानस के हृदय पटल पर ऐसा स्थान बना लेते हैं जहां से सत्य, पवित्रता, ज्ञान और भक्ति की भागीरथी प्रवाहित होकर चारों दिशाओं में प्रवाहित होने लगती है। ऐसे भक्तों में ममता, विनम्रता और निष्कामता के साथ-साथ विचारों की शुद्धता, व्यवहार की निश्चलता तथा सब के प्रति सौहार्द की भावना होती है। ऐसे भक्त सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ साथ जीवन से हताश और निराश हुए लोगों के दुखों को दूर करने के लिए सदैव जागरूक रहते हैं। इसके लिए अगर उन्हें अपने शरीर का थोड़ा सा मांस काटकर भी देना पड़े तो वे पीछे नहीं हटते।

एक समय की बात है कि एक ब्राह्मण प्रतिदिन भगवान की अदालत में जाया करता था ।उसका एक पड़ोसी निसंतान था। उस ब्राह्मण के पड़ोसी ने ब्राह्मण से कहा ब्राह्मण देवता आप प्रतिदिन भगवान की अदालत में जाते हो, आप भगवान से पूछना कि मेरे भाग्य में संतान सुख है या नहीं। अगले दिन ब्राह्मण भगवान कि अदालत में पहुंचा तथा अपने पड़ोसी के विषय में पूछा ।ब्राह्मण की बात सुनकर भगवान बोले कि उसके इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्म तक संतान सुख भाग्य में नहीं लिखा। ब्राह्मण ने भगवान का उत्तर सुनकर निराश मन से अपने पड़ोसी को सारा वृत्तांत सुना दिया, संयोग से कुछ समय बाद एक भगवान का सच्चा भक्त उसी पड़ोसी के घर आकर भीख मांगने लगा ।उसे भक्त ने कहा, बेटा कुछ दिनों से मैंने भोजन नहीं किया है, मुझे भोजन करवा दो, मैं तृप्त हो जाऊंगा। उसकी यह बात सुनकर वह पड़ोसी कहने लगा, मैं स्वयं बहुत परेशान रहता हूं, क्योंकि मेरी कोई भी संतान नहीं है ।यह सुनकर भक्त बोला,आप मुझे भोजन करवा दो, आपको जल्दी ही दो पुत्रों की प्राप्ति होगी। भोजन से तृप्त होकर वह भक्त अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया। उस भक्त के आशीर्वाद से जल्द ही उस पड़ोसी का घर दो पुत्रों की किलकारियों से गूंज उठा। रास्ते में गुजरते हुए जब ब्राह्मण ने अपने पड़ोसी के घर बच्चों को देखा तो आश्चर्यचकित होकर रह गया। अगले ही दिन ब्राह्मण भगवान की अदालत में जा पहुंचा तथा भगवान के सामने बच्चों की कहानी को सुना कर बोला,आप कैसे भगवान हैं। आप झूठ बोलते हैं। आपने मेरे पड़ोसी के घर सात जन्म तक संतान का सुख नहीं होने की बात कही थी, तो फिर यह असंभव कार्य इतनी शीघ्रता से कैसे संपन्न हो गया। ब्राह्मण की बात सुनकर भगवान बोले -पहले तुम मेरी बात सुनो ।इस समय मेरे सिर में दर्द हो रहा है। अगर तुम मुझे किसी इंसान का थोड़ा सा मांस लाकर दे दो तो मेरा सिर दर्द ठीक हो जाएगा। तत्पश्चात में तुम्हें कथा का रहस्य बता दूंगा ।

ब्राह्मण भगवान की बात सुनकर बोला -ठीक है पहले मैं आपके लिए इंसान के मांस का प्रबंध करके लाता हूं। ब्राह्मण अपने घर की ओर प्रस्थान कर गया।ब्राह्मण ने अपने शहर में भगवान के लिए थोड़ा सा इंसान का मांस देने की बात कही ,परंतु कोई भी अपना मांस देने को तैयार नहीं हुआ ।इतना ही नहीं सब ने ब्राह्मण को प्रताड़ित कर अपने शहर से निकाल दिया। ब्राह्मण निराश होकर जंगल की ओर निकल गया। उसको समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। मैं तो ब्राह्मण हूं। मेरा तो कर्म ही भक्ति करना है। मैं भगवान का इतना छोटा सा कार्य भी नहीं कर सका। अब मैं भगवान को जाकर क्या कहुंगा। वह इसी सोच- विचार में चला जा रहा था ।यह सब सोच कर उसकी जान निकली जा रही थी। संयोगवश वह भक्त भी उसी जंगल में तपस्या कर रहा था ,जो उसके पड़ोसी को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देकर गया था। ब्राह्मण ने उस भक्त को देखा और उसके पास गया ।ब्राह्मण ने उस भक्त से भी भगवान के लिए थोड़ा सा मांस देने की बात दोहरा दी।ब्राह्मण की बात सुनकर वह भक्त बोला- बस इतनी सी बात के लिए तुम इतना परेशान होकर इधर-उधर भटक रहे हो। उस भक्त ने खुशी-खुशी अपने शरीर का थोड़ा सा मांस दे दिया।

ब्राह्मण उस भक्त का मांस लेकर भगवान की अदालत में पहुंच गया, तथा भक्त के बारे में बता दिया ।ब्राह्मण की बात सुनकर भगवान बोले-अरे ब्राह्मण!तुम भी तो अपना थोड़ा सा मांस दे सकते थे। परंतु तुमने कदाचित ऐसा नहीं किया। जो भक्त भगवान के लिए सदैव अपना तन-मन-धन न्योछावर करने के लिए तैयार रहते हैं ।भला भगवान ऐसे भक्तों की बात को कैसे मिथ्या कर सकते हैं ।भगवान का उत्तर सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर होकर अपने घर की ओर रवाना हो गया। शायद उसे भक्ति की महिमा का पता लग गया था, और भगवान की न्याय व्यवस्था पर विश्वास हो गया था। वह समझ गया था कि सच्चे भक्त की कही गई छोटी सी बात भी मिथ्या साबित नहीं हो सकती।

06. मेरे साथ ही ऐसा क्यों

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

जब हम कोई काम करते हैं तो काम अगर हमारे मन के अनुसार हो जाता है, तो हमें खुशी होती है और हम सोचने लगते हैं कि यह तो हमारी किस्मत में लिखा हुआ था, इसलिए होना ही था। तब हम उस परमपिता परमात्मा का शुक्रिया भी नहीं करते ।हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि जब हमारी किस्मत में यह लिखा हुआ था तो इसमें भगवान ने क्या किया ॽयह तो हमारे अच्छे कर्मों का फल है। अगर कोई भगवान को नहीं मानता तो वह सारा क्रेडिट अपनी मेहनत को देता है ।लेकिन जब वह काम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होता तो हम भगवान को कोसने लग जाते हैं ।फिर वह चाहे भगवान को माने या ना माने, तब तो भगवान उनका सबसे बडा दुश्मन हो जाता है। तब वे मानो सारी दुनिया में चिल्ला -चिल्ला कर कहने लगेंगे कि हमारी किस्मत ही खराब है ।भगवान ने हमारी किस्मत ही खराब लिखी है ।यह सब भूल जाते हैं कि यह भी हमारे कर्मों का ही फल है। यह भी तो हमारी किस्मत में ही लिखा हुआ है ।यह मानने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता।

मैं आपको एक सत्य घटना के बारे में बताना चाहती हूं। तीन ग्रैंड स्लैम पदक जीतने वाले अमेरिकी टेनिस प्लेयर आर्थरऎश जूनियर (10 जुलाई 1943 – 6 फरवरी 1993) की 1983 में हृदय की सर्जरी हुई थी ।इस सर्जरी के दौरान उन्हें गलती से एचआईवी संक्रमित खून चढ़ा दिया गया था। एड्स की चपेट में आकर वे मृत्यु शैया पर पड़े थे ।दुनिया भर से उनके प्रशंसक पत्र लिख रहे थे।ज्यादातर लोग लिख रहे थे कि भगवान ने उनके साथ ही ऐसा क्यों किया। हर कोई उनकी राय जानने को बेकरार था, कि अब क्या जवाब देंगे। क्या वह भी भगवान को या अपनी किस्मत को कोसेगें?

लेकिन उसका जवाब सुनकर हर कोई हैरान था ।उन्होंने लिखा पूरी दुनिया में 5 करोड़ बच्चे टेनिस खेलते हैं। 50 लाख बच्चे टेनिस सीख पाते हैं ,जिनमें से 5लाख बच्चे प्रोफेशनल टेनिस खेल पाते हैं। उनमें से 50 हजार टीम में जगह पाते हैं, जबकि 500 ही ग्रैंड स्लैम में भाग लेते हैं। इन 500 में से 50 विंबलडन तक पहुंचते हैं। 4 सेमी फाइनल खेलते हैं। सिर्फ दो को फाइनल खेलने का मौका मिलता है। जब मैंने विंबलडन का पदक अपने हाथों में थामा तब मैंने भगवान से ये नहीं पूछा कि मुझे ही पदक क्यों मिला। आज इस असहाय दर्द में भी मैं भगवान से नहीं पूछूंगा कि मुझे ही यह दर्द क्यों मिला।

इस सत्य घटना से हमें बहुत बड़ी सीख मिलती है। हमें भी अपनी जिंदगी में कभी भी निराश नहीं होना चाहिए ।अगर कोई काम हमारी इच्छा से नहीं भी हो रहा तो उसे भगवान की इच्छा मानकर अपना कर्म करना चाहिए। हमें निराश होकर अपने कर्म करने के सिद्धांत से पीछे नहीं हटना चाहिए ,बल्कि कर्म करते रहना चाहिए। हमें फल मिले या नहीं। स्वार्थ से परिपूर्ण होकर अगर कोई कर्म करते हैं तो हम अवश्य निष्फल होते हैं, लेकिन जब निस्वार्थ होकर कोई काम करते हैं, तो भगवान उसका फल अवश्य देते हैं।

05. सर्वोत्तम धन विद्या

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

हमारे शास्त्रों में विद्या को सबसे बड़ा धन माना गया है ।जिसे जितना खर्च करो वह उतना ही बढता जाता है। विद्या का उद्देश्य प्रथमत: मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना है।लक्ष्य के लिए दौड़ लगाते हुए अब तक के जीवन में हम लोगों ने मधुमक्खियों को फूलों पर मंडराते अवश्य देखा होगा।वे एक- एक फूल से मधु का संग्रह करती हैं, जो बाद में हमारे लिए अमृत समान बन जाता है ,इसी तरह हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने तप और ध्यान के बल पर जो ज्ञानार्जन किया उसे अमृत ज्ञान घट स्वरूप चार वेद ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद ग्रंथ तैयार हुए। इसमें शूक्तियों के रूप में दुर्लभ मोती समाहित हैं ,जो आज भी उपयोगी है।

मानव जीवन के साथ ही विद्या की महता बनी हुई है ।आधुनिक दौर में विद्या को शिक्षा का पर्याय माना जाता है। व्यक्ति, समाज, देश और वैश्विक समुदाय के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा ऐसी हो जो जीवन की आकर्षकता के साथ गुणों की आकर्षकता भी लाए।हमारी शिक्षा में वेदों की स्मृतियां होनी चाहिए। वेदों की जिन सूक्तियों को हम प्राचीन और अनुपयोगी मानकर भूल बैठे थे उनको हमें अपने जीवन में स्वीकारना चाहिए ।इन सूक्तियों के अर्थ समझकर और उन्हें आत्मसात कर न सिर्फ हम तनावमुक्त बल्कि अपने चित्त को जागृत कर स्वयं को प्रकाशमान भी कर सकते हैं ।लेकिन हम अपने मूल शिक्षा के उद्गम स्रोतों को ही भूल गए । जिसके कारण हमारे जीवन में विकार बढ़ने लगे।शिक्षकों का दायित्व है कि वे अपने विद्यार्थियों में से विकार निकाले और सद्गुणों का विकास करें। शिक्षक वो धूरी है जो विद्यार्थी को एक पूर्ण मनुष्य बना सकता है। क्योंकि शिक्षक सुधारने वाला होता है और विद्यार्थी सुधरने वाला।

हम कहा करते हैं कि जब तक बच्चा बचपन में है वह पाप नहीं करता। वह हत्या नहीं करता। वह चोरी नहीं करता ।वह मद का सेवन नहीं करता ।बच्चा निर्दोष होता है, उसे छल कपट करना नहीं आता ।हम उसे भगवान का रूप ही मानते हैं ।वह कच्ची मिट्टी की भांति होता है।जिस प्रकार एक कुम्हार कच्ची मिट्टी को भिन्न-भिन्न प्रकार की आकृतियों का आकार देता है, उसी प्रकार एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को तराशने का मादा रखता है ।जिसका एक जीवंत उदाहरण रानी लक्ष्मीबाई है, जिसको उसके शिक्षक ने तराश कर एक वीरांगना बना दिया। लेकिन वही बच्चा जब शिक्षा प्राप्त कर स्नातक हो जाए तो उसकी बचपन की वह परवर्ती बढ़नी चाहिए न की घटनी चाहिए। शिक्षा प्राप्त करने के बाद अगर उसका सर्वांगीण विकास नहीं होता तो, मानना पड़ेगा शिक्षा में कोई दोष है। जिन लोगों ने इस पर चिंतन किया उन्होंने बड़े खेद के साथ अपना मंतव्य सबके सामने रखा। पहले शिक्षक समझता था की मै तो विद्यादान करता हूं। शिक्षा आचार व्यवहार संपन्न रही तो, देश जाति और धर्म का रक्षण होगा।वह शिक्षा हितकारी होगी, वह देश, समाज के लिए कल्याणकारी होगी। शिक्षा से शांति आनंद और मैत्री भाव आएगा। अच्छी शिक्षा से न सिर्फ हमारा मन शांत रहता है, बल्कि हमारे चारों तरफ का बतावरण सुगंधित फूलों की सुगंध से महकता रहता है।

प्राचीन समय में शिक्षा शिक्षकों की रीति- नीति पर आश्रित थी ,पर आज ऐसा नहीं रहा ।वह शिक्षा जो देश और देशवासियों में मैत्री भाव बढ़ाने में सार्थक हो ।सद्गुण बढ़ाने में सहायक हो ।वह शिक्षा नि संदेह अर्थोपार्जन में अधिक सक्षम होगी ।प्राचीन समय में भी हमारे गुरु या शिक्षक किस्से कहानियों या व्याख्यानो के माध्यम से शिक्षा देते थे ।मैं भगवान बुद्ध के एक व्याख्यान को प्रस्तुत करती हूं। भगवान बुद्ध किसी गांव में जीवन के विभिन्न आयामों पर प्रतिदिन व्याख्यान देते थे। उनके प्रवचनों में जीवन का सार छिपा रहता ।एक व्यक्ति बिना नागा किए उनके व्याख्यान सुनता। काफी समय बीत जाने पर भी उसने अपने अंदर कोई बदलाव नहीं पाया, तब वह एक दिन बुद्ध के पास जाकर बोला कि वह लंबे समय से एक अच्छा इंसान बनने के लिए उनके प्रवचनों को सुनता आ रहा है। उसकी बात सुनकर बुद्ध मुस्कुराए उन्होंने उसके सामने उसके गांव का नाम,वहां तक की दूरी, वह वहां कैसे जाता है आदि जैसे प्रश्नों की झड़ी लगा दी ,जब बुद्ध ने उससे कहा कि क्या वह यहां बैठे बैठे अपने गांव पहुंच जाएगा तो वह झुझंला गया। उसने कहा कि ऐसा तो बिल्कुल भी संभव नहीं। उसने वहां तक पहुंचने के लिए पैदल चलकर जाना ही होगा ।इस पर बुद्ध ने कहा कि अब आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।

आपको अपने गांव का रास्ता पता है, लेकिन इस जानकारी को व्यवहार में लाए बिना आप वहां नहीं पहुंच सकते ।उसी प्रकार आपके पास ज्ञान है, लेकिन इसको अपने जीवन में अमल में लाए बिना एक बढ़िया इंसान नहीं बन सकते। ज्ञान को अपने व्यवहार में लाना आवश्यक है। इसके लिए आपको निरंतर प्रयास करना होगा। ज्ञान को जीवन में उतारे बिना लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती। सृष्टि के उद्गम से लेकर वर्तमान तक, जन्म से लेकर मृत्यु तक, तमाम प्रकार के जीवन चक्र निरंतर चल रहे हैं। इन सभी के बारे में हमें विद्या बताती है। ईश्वर की सभी कृतियों में मानव श्रेष्ठ इसलिए हैं क्योंकि उसमें मनुष्यत्व है, विवेक है, बुद्धि है। बुद्धि तो सब प्राणियों में है लेकिन विवेक सिर्फ मनुष्य में होता है। सद्वविचार, सदाचार, व्यवहार से युक्त मनुष्य ही शांति पथ की ओर अग्रसर होता है, और उसमें मनुष्यता के गुण विकसित होते हैं और यह सब गुण विद्या ग्रहण करने के बाद ही विकसित होते हैं। इसलिए कहा गया है कि सर्वोत्तम धन विद्या है। और सभी धन चुराए जा सकते हैं लेकिन विद्या रूपी धन को कोई चुरा नहीं सकता।

04. खुद करें दृढ़ संकल्प

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

दुनिया में किसी भी विचार से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, उस पर अमल,हर विचार एक बीज की तरह होता है,जो इच्छित या अनिच्छित परिणाम देता है। देखना यह है कि उसका संकल्प कितना दृढ है।यदि आप किसी विचार को बोते हैं, तो आप कर्म को काटते हैं और कर्म को बोएगऺे ,तो आदत को काटेंगे और यदि आदत को बोएगऺे,तो आप चरित्र पाएंगे। चरित्र को बोएगेे ,तो आप नीयति को काटेंगे तो जाहिर है कि विचार को कर्म तक ले जाएं, यही जीवन का सार है इसी से हम खुशियों की खेती कर सकते हैं ।जिस विषय की इच्छा होती है मानव स्वभाव उसी के अनुरूप बन जाता है, और मन उसी के प्रति आकर्षित होने लगता है ।

आपके मन की आकांक्षा ,आपकी आशा की प्रेरणा अथवा इच्छा मात्र कल्पना, व्यर्थ की वस्तु नहीं अपितुू उससे भी बढ़कर कुछ है ,आप जिसके लिए इच्छा ओर प्रयत्न करते हैं,वास्तव में वही आपको प्राप्त होता है होता यह है कि आप जैसे ही किसी वस्तु को पाने के लिए कामना करते हैं,वैसे ही आप उस वस्तु के साथ संबंध स्थापित कर लेते हैं। हां कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आपको अपने प्रयासों में उतनी सफलता अर्जित नहीं होती जितनी आपने आशा की थी। ऐसा इसलिए होता है कि आप जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताओं की ओर अपना सारा ध्यान लगा देते हैं। इसका प्रभाव यह होता है कि आप अपने लक्ष्य की ओर उस गति में नहीं बढ़ पाते जिस गति में आपको बढ़ना चाहिए था ।आपको यदि सफलता पानी है तो अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना होगा और उसी अनुपात में गंतव्य की ओर बढ़ना होगा एक बात का सदैव ध्यान रखिए कि आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे हीआदर्श अपने सम्मुख प्रस्तुत करें और आप सदा यह अनुभव करें कि आपने ही उसके समान अभूतपूर्व कार्य करने की सामर्थ्य है।

हर दिन एक जैसा नहीं होता कोई दिन अच्छा और कोई दिन कम अच्छा होता है ।ऐसे में खुद को हर हाल में प्रेरित रखना एक मुश्किल चुनौती है ।हमेशा कठिन दिनों में हमें खुद अपने में बहुत सारी कमियां नजर आने लगती हैं ।इसी तरह जब परिस्थितियां गड़बड़ होती है तब हमें लगता है जैसे हर चीज हमारे खिलाफ जा रही है ,जबकि सामान्य दिनों में हमें सब कुछ अच्छा लगता है ,जीवन के उतार-चढ़ाव में खुद को हमेशा सकारात्मक बनाए रखना ही जीवन जीने की कला है। इस कला को समझें और इससे अपने जीवन को सकारात्मक बनाएं ।अपने जीवन का हर दिन आखरी दिन माने ।यह सुनने में बहुत अजीब लगेगा लेकिन ऐसा करके देखें, हर दिन को अपने जीवन का आखिरी दिन मानकर जिए ।यकीन मानिए जीवन का स्वाद और रंगत दोनों बदल जाएगी।माने की यही दिन आपके जीवन का अंतिम दिन है। इसलिए आज दिन के सूर्य को अपनी आंखों में भर लें, उन लोगों की खुशी के लिए कुछ करें जो आपके बहुत करीब हैं यही सोचे कि आज आखिरी बार आप अपने पैरों से इस धरती को स्पर्श कर रहे हैं, अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें।

अपने संकल्प को और दृढ़ करें, इसलिए अपने दिन का सबसे अच्छा उपयोग करें। जो आपको प्यार करते हैं उन्हें प्यार करें जिन लोगों से आपके रिश्ते खराब हैं उनसे रिश्ते बना ले,स्वयं को याद दिलाएं कि आप इस दुनिया में एक खास उद्देश्य से आए हैं ,यह भी हमेशा याद रखें कि आपको हर दिन अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना है। आप चाहे जो करें उसका परिणाम आता ही आता है संकल्प के साथ करेंगे तो परिणाम अच्छा मिलेगा, इसलिए अपने लक्ष्य ओर कार्य के प्रति गंभीर रहऺे ,बल्कि हरेक इंसान के प्रति भी अच्छा करें। यह न सिर्फ अच्छे परिणाम देगा बल्कि आपको मानसिक तौर पर भी खुश ओर संतुष्ट रखेगा।  किसी भी कार्य को करने में यदि किसी भी प्रकार की हीन भावना मन में उठने लगे और मस्तिष्क में घर करने लगे तो उसे मानस- पटल से मिटा देना चाहिए। यदि आप ऐसा कर सके तो कोई कारण नहीं की आप अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर सकें।

आशावादिता स्वय में एक विलक्षण शक्ति है। जिससे कार्य शक्ति में वृद्धि होती है। अभिलाषा, आशा, आकांक्षा की पूर्ति के लिए दृढ संकल्प और स्थिर स्वभाव की आवश्यकता है। यदि आप निरंतर प्रयत्नशील हैं, तो आपकी आशा पूर्ति सहज ही हो जाती है। यदि मार्ग में आने वाली बाधाओं से घबरा गए तो कोई कार्य संभव नहीं होगा।किसी भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए केवल कामना से बात नहीं बनने वाली, उसके लिए पर्यत्नऔर परिश्रम परम आवश्यक है।प्रत्येक वर्ष अनेक प्रतियोगितात्मक परीक्षाएं आयोजित होती रहती हैं , जिनमें लाखों की संख्या में परीक्षार्थियों की सहभागिता होती है। परंतु सफलता उन्हें ही प्राप्त होती है ,जिन्होंने पहले अपना एक यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित किया हो ,उसके अनुरूप ही समर्पित भाव से अध्ययन किया हो ।उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती,तो भी वे निराश नहीं होते। ऐसे में विफल विद्यार्थी अपनी विफलता के कारण ढूंढते हैं,ओर द्विगुणित ध्येय के प्रति निष्ठा के साथ प्रयत्न करते हैं। अंतत: वे सफलता के अधिकारी बनते हैं।

लक्ष्य अर्जित करने के लिए मन- मस्तिष्क को संतुलित बनाए रखना पड़ता है। जो लक्ष्य को ही अपना जीवन कार्य समझते हैं, हर समय उसी का चिंतन करते हैं, उसी का स्वप्न देखते हैं, तथा उसी के सहारे जीवित रहते हैं सफलता उन्हीं का वर्णन करती है। आपको अपना लक्ष्य कभी नहीं भूलना होगा अन्यथा जो कुछ मिलेगा आप उसी में संतोष करने लगेंगे और अपनी इच्छा शक्ति तथा कठोर परिश्रम करने वाला ही निश्चित रूप से लक्ष्य का बेधन करता है। जो अपने संकल्प के प्रति सुदृढ़ हैं ,उसे ही सफलता का दर्शन होता है।

03. तनाव को संभालना सीखें

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

वेदों में तनाव दूर करने के लिए ध्यान और विश्रांति दोनों को जरूरी बताया गया है। यहां विश्रांति का अर्थ है, आंखें बंद कर दिमाग में सभी प्रकार के विचारों को आने जाने देना। निरंतर अभ्यास से कुछ दिनों बाद स्वयऺ विचार आने बंद हो जाते हैं, और मस्तिष्क शांत हो जाता है। हमारे जीवन में जब भी कोई बदलाव होता है, तो हमारा शरीर उसे लेकर जो प्रतिक्रिया करता है , उसे ही हम तनाव कहते हैं। क्योंकि हमारे जीवन में लगातार बदलाव होते रहते हैं, जैसे लक्ष्य को पूरा करने का प्रेशर नौकरी जाने का डर, किसी काम को तय समय पर पूरा न कर पाने का दबाव या उसे सही से न कर पाना आदि ऐसे में तनाव से बचना मुश्किल है। ऐसे में हमारा उद्देश्य  सभी तरह के तनाव को खत्म करना नहीं होना चाहिए क्योंकि यह संभव नहीं है, हां हमें अनावश्यक तनाव को दूर करने के साथ ही इसे बेहतर तरीके से मैनेज करने के प्रयास करने चाहिए।

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में गला काट प्रतिस्पर्धा है। हर कोई आगे बढ़ने में लगा हुआ है ।ऐसे में तनाव सामान्य बात है। लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के तनाव का शिकार है। हालांकि किसी भी तरह का तनाव हमारे मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होता है ।ऐसे में हम कह सकते हैं की किसी भी वास्तविक अथवा काल्पनिक डर, घटना अथवा बदलाव की वजह से हमारा दिमाग और शरीर जो प्रतिक्रिया करता है, वह तनाव कहलाता है। तनाव का कोई एक कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे तमाम कारण होते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसी भी घटना को लेकर किस तरह की प्रतिक्रिया करते हैं और यह आपकी सोच आपकी पर्सनेलिटी और मौजूदा संसाधनों पर निर्भर करता है ।किसी व्यक्ति के लिए कोई स्थिति तनावपूर्ण हो सकती है तो वही स्थिति दूसरे व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। जब हमें बड़ी अथवा अप्रत्याशित असफलता मिलती है तो हम तनाव में आ जाते हैं ।इसके अलावा कई लोग अपनी नौकरी, रिश्तों, वित्तीय स्थिति, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आदि को लेकर तनाव में रहते हैं। इन तनावों का सामना करने का कौशल सीख कर हम अपने तनाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं ।

तनाव दूर करने का सबसे अच्छा तरीका वह है जो आपको शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के तनाव से निजात दिलाएं ।जब हम बेहद तनाव में होते हैं तो हमें शारीरिक थकावट के साथ साथ मानसिक थकावट भी होने लगती है ।तब मन में यही सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए ?तो इसका एक बेहतरीन उपाय हैं,ध्यान जो ऐसी स्थिति में शारीरिक और मानसिक रूप से हमें मजबूत करता है। जब आप ध्यान लगाएंगे तो आपको आंतरिक सुकून का अनुभव होगा। ध्यान लगाना भी एक कला है ।जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति इसे एक ही तरीके से करें। आप अलग-अलग तरीके से भी से कर सकते हैं।मेडिटेशन करने के लिए मन को सुकून देने वाले संगीत का चयन कर सकते हैं। सितार वीणा बांसुरी यह कोई ऐसा ही मन को शांति देने वाला वादन से जुड़ा संगीत सुन सकते हैं ।इस दौरान आप आंखें बंद करे और अपना सारा ध्यान सिर्फ संगीत की ध्वनि पर केंद्रित करें ।इससे आप काफी हल्का महसूस करेंगे।मेडिटेशन आपके शरीर में सकारात्मकता लाता है। यदि आप नियमित रूप से मेडिटेशन करते हैं, तो आपके दिमाग में तनाव के कारण जो अंजाना- सा डर हावी रहता है, उसको काफी हद तक मैनेज करने में सहायता मिलेगी।

हमें अपना जीवन वर्तमान में रहकर जीना चाहिए। हमें भविष्य को लेकर तमाम तरह की चिंताएं और पुराने समय को लेकर पछतावा करने से तमाम तरह के तनाव का शिकार हो जाते हैं, और वर्तमान का आनंद नहीं उठा पाते, ऐसे में सिर्फ वर्तमान में फोकस करें और तनाव रहित जिंदगी जीने का मजा ले। गृह स्थ धर्म का पालन करने वाले लोग वेद पढ़ कर तनाव दूर कर सकते हैं ।इसके लिए उन्हें कमरे में नहीं बल्कि शांत- शीतल वातावरण में बैठकर वेदों का अध्ययन करना चाहिए। वेदों का अध्ययन करने से व्यक्ति में ऐसे संस्कार जागृत हो जाते हैं, जिससे वह न सिर्फ सकारात्मकता और आत्मविश्वास जैसे सद्गुणों से परिपूर्ण हो जाता है, बल्कि निरंतर लक्ष्य पथ पर चलते हुए परम लक्ष्य को भी हासिल कर लेता है। “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र बोलने से भी शांति मिलती है, वेद बताते हैं कि कोई भी काम उसका समय आने पर भी होता है, इसीलिए प्रतिस्पर्धा की बजाए हृदय को बड़ा करके रखना चाहिए।

हम जो भोजन करते हैं जनकल्याण के भाव के साथ ग्रहण करना ज्यादा लाभदायक होता है, साथ ही हमें यह विचार मन में अवश्य लाना चाहिए कि जो हम ग्रहण कर रहे हैं वह ब्रह्म का ही अंश है। यह भोजन, संस्कृति समाज, देश, सभ्यता के रक्षण- पोषण के लिए किया जा रहा है। जब हम इस तरह के भोजन को ग्रहण करना सीख जाएंगे तो हमारे शरीर में सकारात्मक हार्मोन उत्पन्न होंगे, जिससे हमारे दिमाग में सकारात्मक विचारों का उद्गम होगा और हमारे देखने का, सोचने का नजरिया बदल जाएगा।हम पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ते हुए अपने लक्ष्य को हासिल करने लगेंगे। अब हमारी प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी और हम एक अच्छी जिंदगी जीने लगेंगे। जिससे तनाव नामक राक्षस हमारे आसपास भी नहीं फटकेगा, जिससे हम तनाव को मैनेज करना सीख लेंगे।