248. आत्मविश्वास

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक दिव्यांग युवक से एक दिन उसके सहपाठी ने पूछा— तुम्हारी इस दिव्यांगता का कारण क्या है? लड़के ने उत्तर दिया— मुझे बचपन में ही पोलियो हो गया था।
सहपाठी ने पूछा— इतने बड़े संकट के बावजूद तुम इतनी मुस्कुराहट और आत्मविश्वास के साथ संसार का सामना कैसे करते हो?
लड़के ने मुस्कुराकर जवाब दिया— इस रोग ने तो सिर्फ मेरे शरीर को छुआ है, मेरे मन और आत्मा को नहीं।
अक्सर कितनी बार ऐसा होता है कि हम स्वयं को, परिवार के सदस्यों को या किसी भी अन्य मनुष्य को छोटी-छोटी तकलीफों की शिकायत करते देखते रहते हैं। हमें कई बार शारीरिक चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है। मुश्किलों से परेशान होकर शिकायत करते रहते हैं‌। अगर आसपास नजर दौड़ाएं तो देखेंगे कि कितने ही मनुष्य गंभीर रोगों से ग्रस्त हैं। किसी- किसी का तो कोई अंग ही नहीं है तो किसी को कोई जानलेवा बीमारी है। इनमें से कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं जो इन चुनौतियों के बावजूद भी अपनी जिंदगी को भरपूर जीते हैं क्योंकि उस दिव्यांग युवक की तरह उसका असर अपने मन और आत्मा पर नहीं पड़ने देते।

हमारी शारीरिक स्थिति कैसी भी हो लेकिन हम आत्मविश्वास से भर कर भरपूर जिंदगी जी सकते हैं। दूसरे लोगों के बीच प्रेम और प्रसन्नता बांट सकते हैं। यदि बीमारी के कारणवश हम घर से बाहर नहीं जा सकते तो परिवार के सदस्यों को प्रेम दे सकते हैं। क्योंकि बीमार तो सिर्फ हमारा शरीर ही रहता है। आत्मा तो सदैव पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती है। आत्मविश्वास से भरा हुआ मनुष्य आशावादी और सकारात्मक रवैया अपनाकर हर विपरीत चुनौती पर विजय पा सकता है और दूसरों की जीवन बगिया को खुशियों से महका सकता है।

धर्मराज युधिष्ठिर में अनेक गुणों के होते हुए भी एक दुर्गुण था— धूत- क्रीडा का। जब दुर्योधन के साथ खेलते हुए धर्मराज हार रहे थे, तब उनके शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई।
युधिष्ठिर ने पूछा— आप कौन हैं?
ज्योति ने कहा कि— मैं विवेक सक्ती हूं। आपने मेरा त्याग कर दिया। इसलिए मैं आप को त्याग कर जा रही हूं।
थोड़ी ही देर पश्चात् उनके भीतर से दूसरी ज्योति प्रकट हुई।
युधिष्ठिर ने पूछा—अब आप कौन हैं?
ज्योति ने कहा— मैं धर्म हूं। जहां विवेक नहीं, वहां मेरा रहना संभव नहीं।
धर्म के जाते ही एक और ज्योति प्रकट हुई।
युधिष्ठिर ने फिर उससे पूछा कि— आप कौन हैं?
तो ज्योति ने कहा कि— मैं समृद्धि हूं।
जहां धर्म और विवेक नहीं, वहां मेरा भी वास नहीं।
समृद्धि के जाने के पश्चात् प्रसिद्धि प्रकट हुई। प्रसिद्धि भी कहां रहती, जहां समृद्धि नहीं।

विवेक, धर्म, समृद्धि और प्रसिद्धि सभी ने युधिष्ठिर का साथ छोड़ दिया। तभी युधिष्ठिर का राजपाट धन वैभव और प्रतिष्ठा सब खो गए। काफी वर्षों तक उन्हें जंगलों में भटकना पड़ा।
एक बार वन में असहाय घूमते हुए उनके शरीर से एक और ज्योति निकली।
युधिष्ठिर के पूछने पर उसने बताया कि— मैं आत्मविश्वास हूं‌।
युधिष्ठिर ने कहा— मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा। आत्मविश्वास ने कहा— तुम मेरा पोषण करोगे तो मैं भी तुम्हारा साथ दूंगा। यह कहकर युधिष्ठिर के शरीर में प्रवेश कर गया।
इतने में एक और ज्योति प्रकट हुई और बोली मैं तुम्हारी विवेक शक्ति हूं। जहां आत्मविश्वास है, मैं वहां वास करती हूं। यह कहकर वह भी युधिष्ठिर के शरीर में प्रवेश कर गई।
धर्म ने भी प्रकट होकर कहा— जहां विवेक है, मैं भी वहां रहता हूं।
इस प्रकार विवेक शक्ति, धर्म, समृद्धि तथा प्रतिष्ठा सब पुन: लौट आए।
इसलिए जब भी जीवन में संकट आए तो धैर्य न खोएं। आत्मविश्वास से हर कठिनाई पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जीवन की मुश्किलों को स्वीकार करें। उसे दूर करने के लिए विवेकपूर्ण ढंग से कर्म करें और उसे ईश्वर को समर्पित कर दें।

247. सार्थक हो, हर दिन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे विचार, चिंतन और कार्य ही हमें जीवन में संतुलन साधना सिखाते हैं और यह सब कुछ होता है, मन के द्वारा। मन ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे मनुष्य चिंतन, स्मरण एवं मनन करता है। मन में उपजी विचार संपदा से ही हमारे जीवन में परिस्थितियों का निर्माण होता है।

मन रूपी भूमि पर उपजने वाले बीज रूप विचार संपदा से मनुष्य के चरित्र का निर्माण होता है। इन विचारों से ही हमारे जीवन का निर्धारण होता है कि हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाएंगे या नहीं। दिन भर हमारे मन मस्तिष्क में जो विचार जन्म लेते हैं और मरते हैं, उन्हीं के द्वारा हमारे भविष्य का निर्माण होता है। जीवन में हम क्या प्राप्त करेंगे और प्रबल इच्छा के होते हुए भी क्या नहीं प्राप्त करेंगे? यह सब हमारे विचारों के अनुसार ही चलता है।

प्रत्येक सुबह हमारे लिए एक खूबसूरत उपहार के समान होती है। वर्ष का प्रत्येक दिन श्रेष्ठ होता है और प्रत्येक दिन का मानव जीवन में एक विशेष महत्व होता है। यह विचार मनुष्य के ज्ञान का ही निचोड़ होते हैं क्योंकि सकारात्मक विचारों से हम श्रेष्ठ बनते हैं और नकारात्मक विचारों से हम पतन में गिरते हैं। इसलिए स्वयं में सकारात्मक विचारों को विकसित करना चाहिए ताकि वर्ष के प्रत्येक दिन की सार्थकता पूर्ण हो सके। हमारा कोई भी दिन व्यर्थ न जाए, इस बात का हमें ख्याल रखना चाहिए। सुंदर विचारों से लैस हमारा प्रत्येक दिन अनमोल साबित हो।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि— मानसिक पटल पर जैसा चिंतन विचार एवं संकल्प होता है, हमारा परिचय भी उसी के अनुरूप ढल जाता है। मनुष्य अपने जीवन में जो भी कर्म करता है, उसकी पृष्ठभूमि मानसिक पटल पर ही तैयार होती है। उसी से जीवन में परिस्थितियों का परिवेश बनता है। अगर मन:स्थिति परिष्कृत एवं उत्तम संकल्पों से परिपूर्ण हैं तो बाहरी परिस्थितियां भी कल्याणकारी होंगी। यदि मन:स्थिति तामसिक चिंतन से युक्त हैं तो बाहरी परिस्थितियां मंगलमय नहीं बन सकती।

हमारे उत्तम विचार हमें मोह, लोभ, क्रोध और ईष्र्या जैसे स्वभावगत दुर्गुणों से दूर रखते हैं। हमें सत्य और मर्यादा की राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। हम अपनी रूचि और सोच विचार के हिसाब से ही अपनी दिनचर्या तय करते हैं। हमारा दिन हमारे अपने बनाए हुए तौर- तरीकों के अनुसार ही चलता है। जब सब सामान्य होता है तो हम खुश रहते हैं। लेकिन जब जरा- सी भी कुछ गड़बड़ हो जाती है तो हम धैर्य खोने लगते हैं।

इस जीवन को बनाने वाले हम स्वयं हैं। हमारी पसंद से बने हुए जीवन की हलचल और हिचकोले हमें विचलित कर देते हैं। हम आत्म अवलोकन नहीं कर पाते। दूसरों पर दोष मढ़ते रहते हैं। यही सोचते हैं कि शायद हमारी इस हालत के लिए कोई और जिम्मेदार है। दूसरों पर आरोप लगाते हुए स्वयं साफ बच कर निकलने की कोशिश करते हैं। यह सच छिपाकर रखते हैं कि— यह हमारे द्वारा किए गए कर्मों का ही फल है।

कर्म का नियम यही है कि— जैसा कर्म करेंगे, वैसा ही फल प्राप्त होगा। हमारे जीवन में होने वाले कष्टों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। आज हम जैसे भी हैं, जैसा भी अनुभव कर रहे हैं, यह हमारे अतीत के कर्मों का ही परिणाम है। जब भी जीवन में बाधा, संकट आए तो समस्या को समझना चाहिए न की दूसरों पर दोष मढ़कर स्वयं बाहर निकल जाएं। समस्या से निपटने में पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। जब हम अपना मूल्यांकन करेंगे तभी कोई ना कोई मार्ग अवश्य मिलेगा।

प्रकृति सदैव एक मार्गदर्शक के रुप में हमें प्रेरित और उत्साहित करती रहती है। हर पेड़, पौधे, फूल, पत्ती का एक मौन संदेश होता है और वह है कि— स्वयं को निरंतर गतिमान और संतुलित रखने के लिए धैर्य रखना चाहिए। यह तो आप भली-भांति जानते होंगे की पेड़ों पर मंझरी या बोर आने के तुरंत बाद फल नहीं आता। धीरे-धीरे ही यह प्रक्रिया संपन्न होती है। मिट्टी हवा और पानी से जिस तरह एक पौधा धैर्य रख कर खुद को पुष्पित और पल्लवित करता है, हमें भी ऐसा ही जीवन दर्शन अपनाना चाहिए क्योंकि मनुष्य अपने जीवन का वास्तुकार स्वयं ही है। आशावादी और सकारात्मक रवैया अपनाकर हमें अपने प्रत्येक दिन को सार्थक बनाना चाहिए।

246. करें, सच्चा प्रेम ईश्वर से

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रेम का प्रथम लक्षण यही है कि— वह सदा देने वाला होता है, लेने वाला नहीं। मनुष्य जब प्रेम की बात करता है तो वह हमेशा मांगता ही रहता है। जब वह ईश्वर से प्रेम करने की बात करता है तो उसे भी प्रलोभन देने के लिए अनुष्ठान, पूजा- पाठ या यज्ञ आदि का सहारा लेता है।
जब भी वह ईश्वर से प्रार्थना करता है तो हमेशा यही कहता है कि— हे ईश्वर! मुझे यह दो, वह दो। अगर आप मुझे मनचाहा वरदान दे देते हैं तो मैं आपका अनुष्ठान, पूजा- पाठ, यज्ञ आदि करूंगा यानी वह एक तरह से दिखावे का आडंबर करता है। अगर ईश्वर उसे वह वस्तु नहीं देगा, जिसे वह प्राप्त करना चाहता है तो वह ईश्वर को ही भला बुरा कहने लगता है कि मैंने आपके लिए इतना पूजा-पाठ किया फिर भी आपने मेरी मनोकामना पूरी नहीं की।
एक तरफ तो वह ईश्वर से प्रेम करने की बात करता है और दूसरी तरफ ईश्वर के साथ व्यापार भी करता है। लेकिन यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि— जब तक हम किसी भी व्यक्ति से कुछ पाने की इच्छा से प्रेम करते हैं, तब तक वह प्रेम नहीं होता, वह व्यापार होता है और जहां प्रश्न व्यापार का आता है। वहां प्रेम नहीं रह जाता। इसलिए जब भी कोई ईश्वर से प्रार्थना करता है कि मुझे यह दो, वह दो। तब वह प्रेम नहीं करता।

एक बार की बात है कि— एक राजा जंगल में शिकार के लिए गया। वहां पर एक साधु से उसकी भेंट हो गई। उन दोनों के मध्य कुछ वार्तालाप हुआ। राजा साधु के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उसको कुछ भेंट देने लगे।
लेकिन साधु ने राजा की भेंट लेने से इन्कार कर दिया।
राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा यह सोच कर बड़ा हैरान था कि इस साधु के पास अपना तन ढकने के लिए एक लंगोटी के सिवाय कुछ भी नहीं है, फिर भी यह कोई भी भेंट स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उसको कुछ भी समझ नहीं आ रहा था इसलिए वह बार-बार आग्रह कर रहा था ताकि वह साधु कुछ भेंट स्वीकार कर ले।
काफी आग्रह करने के पश्चात् भी जब साधु ने राजा से भेंट स्वीकार करने से मना कर दिया तो राजा ने साधु से पूछा कि—मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी आप यह भेंट स्वीकार नहीं करना चाहते। इसका कारण मुझे बताइए?
साधु ने कहा कि—हे राजन्! मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए। क्योंकि वृक्ष मुझे खाने को फल दे देते हैं। नदियां मुझे यथेष्ट जल देती हैं। गुफाओं में, मैं शयन करता हूं, तो फिर मेरी ऐसी कौन- सी जरूरत है जो आपके धन से पूरी होगी। इसलिए मैं आपसे कुछ नहीं लेना चाहता।
राजा साधु की बातों से ओर भी ज्यादा प्रभावित हुए और सोच- विचार करने लगे कि— अगर ऐसा मोह-माया से दूर रहने वाला साधु मेरे महल में रहेगा तो मेरे राज्य का और भी ज्यादा विस्तार होगा जिससे मेरे पास ओर भी ज्यादा हीरे जवाहरात होंगे और ऐसा विचार कर राजा ने साधु से कहा—ठीक है! आप मोह- माया के बंधनों से दूर हैं। लेकिन फिर भी मैं आग्रह करता हूं कि आप कुछ समय के लिए मेरे साथ महल में चलें, जिससे मैं आपसे बहुत कुछ सीख सकूं और प्रजा की भलाई के लिए कुछ कर सकूं।
साधु राजा के साथ चलने के लिए राजी हो गया। राजा उसे अपने राजमहल में ले गए। महल में पहुंचने के पश्चात् साधु ने देखा कि—महल में चारों तरफ हीरे- जवाहरात और मणि-माणिक्य भरे पड़े हैं। महल अद्भुत वस्तुओं के भंडार से भी परिपूर्ण था। सर्वोत्तम धन और शक्ति का साम्राज्य था।
साधु को महल लाकर राजा बड़ा खुश था। वह ईश्वर का शुक्रिया करना चाहता था। उसने साधु से कहा आप जरा विश्राम कर लीजिए। मैं ईश्वर की प्रार्थना कर लेता हूं।
यह कहकर राजा एक कोने में चले गए और प्रार्थना करने लगे— हे ईश्वर! यह साधु बहुत पहुंचा हुआ लगता है इसीलिए मैं इसे राज महल में ले आया। अब आप इस साधु के पुण्य कर्मों से मुझे और भी धन संपत्ति प्राप्त हो ओर मेरे राज्य का विस्तार हो।
साधु ने अपने तप के बल से राजा के मन के भावों को जान लिया और वह उठ कर महल से बाहर जाने लगा।
राजा ने उसे बाहर जाते हुए देखा तो कहने लगा— रुकिए महात्मन्! अभी तो आपने मेरी भेंट ली ही नहीं।
साधु ने कहा— मैं भिखारियों से भीख नहीं लेता। तुम मुझे क्या दोगे, तुम तो खुद ही मांग रहे हो।

साधु ने कहा— अगर आप सच में ईश्वर से प्रेम करते होते तो अपना जीवन उनकी शरण में लगा देते। ईश्वर से यही प्रार्थना करते कि— है ईश्वर! मैं अपना सर्वस्व तुम्हें अर्पण करता हूं और इसके बदले में मुझे कोई वस्तु नहीं चाहिए। मैं तो सिर्फ आपसे प्रेम करता हूं।

जब हम ईश्वर से प्रेम करते हैं तो हमारे जीवन से भय गायब हो जाता है। मान लो एक माताजी अपने बच्चे के साथ कहीं जा रही है, रास्ते में एक शेर आ जाता है और वह उस बच्चे पर झपटता है तो वह माताजी क्या करेगी? कहां जाएगी?
उस समय वह माताजी अपने बच्चे की रक्षा करेगी और सिंह के मुंह में प्रवेश करने से पीछे नहीं हटेगी क्योंकि उसे अपने बच्चे का जीवन बचाना है। वह अपने बच्चे से प्रेम करती है तभी तो वह अपने जीवन की परवाह नहीं करती। प्रेम सारे भय को जीत लेता है। इसी तरह ईश्वर का प्रेम भी है। ईश्वर से प्रेम करने वालों को किसी बात का भय नहीं रहता। जिन्होंने ईश्वर के प्रेम का स्वाद नहीं चखा, वही उससे डरते हैं और जीवन भर उसके सामने भय से कांपते रहते हैं।

245. जानिए, स्वयं को

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जब मनुष्य इस धरा पर जन्म लेता है तो वह अपने साथ कोई न कोई ऐसी खूबी जरूर लेकर आता है जो उसे विशिष्ट बनाती है। लेकिन अधिकांश लोग अपनी इस विलक्षणता से परिचित नहीं होते। उनको पता ही नहीं होता कि वह भी विशिष्ट हो सकता है। वह अपने अंदर से उठती आवाज को समझ ही नहीं पाता। वह स्वयं को एक साधारण मनुष्य के रूप में ही देखता है। जिसकी आकांक्षाएं सिर्फ भौतिक हैं। ऐसा उसकी अज्ञानता के कारण है। वह ज्ञान और शक्ति का अनंत भंडार होते हुए भी स्वयं को ज्ञान हीन और शक्तिहीन समझता है।

जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी जटिल क्यों न हो फिर भी खुश रहना सीखिए। क्योंकि परिस्थितियां जितनी जटिल होंगी, उतनी ही अधिक संभावनाओं के द्वार खुलने की उम्मीद होगी। सफलता मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होना नहीं है बल्कि सपनों का पीछा करते हुए बुलंदियों पर पहुंचकर अपने भीतर की विलक्षणता को साकार करना है। परिस्थितियों से जूझते हुए आगे बढ़ने की जिम्मेदारी सिर्फ आपकी है क्योंकि आपमें वे तत्व पहले से ही विद्यमान हैं जो आपको नायक बना सकते हैं, बशर्ते आप स्वयं को पहचान लीजिए। जब कोई आप को अनदेखा कर रहा हो, तब आप अपने को पुकारें। जीवन में कोई भी परिस्थिति ऐसी नहीं होती, जिससे बाहर न निकला जा सकता हो। चाहे कितनी भी जटिल परिस्थिति हो फिर भी कोई न कोई रास्ता अवश्य मिल ही जाता है।

जीवन में यह भी मायने नहीं रखता कि आप कितनी बार असफल हुए हैं। आप अपने आपको पहचानिए। अध्यात्म के रास्ते पर चलकर अपने अंदर प्रकाश उत्पन्न कीजिए। ईश्वर ने आपके अंदर जो गुण दिए हैं, उनके संकेत को समझिए और बिना रुके- थके उस दिशा में निकल जाइये। फिर वह दिन दूर नहीं, जब कोई भी कार्य आपके लिए नामुमकिन होगा। सच मानिए तब आप अपने सपनों को सही उड़ान देने में प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे। दरअसल जिस कार्य को करते हुए आप जोश से भर जाएं और अंदर से खुशी होने का भाव उछाल मारने लगे तो समझ जाइए कि उस कार्य से आपके जीवन को सही दिशा मिल सकती है। तभी आप स्वयं को पहचान पाएंगे।

मनुष्य के पास इंद्रिय अनुभूतियों के साथ चिंतन के आधार पर नवीन ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता होती है। इसलिए वह सत्य, शिव, सुंदर जैसे मुल्यों की प्राप्ति कर सकता है। वह प्राकृतिक और सामाजिक नियमों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक नियमों के आधार पर अपने लिए एक विराट आनंदपूर्ण विश्व का सर्जन कर सकता है। लेकिन जो लोग आध्यात्मिकता के रास्ते पर नहीं चले हैं, उनके लिए यह विश्वास करना कठिन होता है कि उनके अंतर में भी अंधेरे के पार कोई प्रकाश भी होगा।

जब कभी हम हवाई जहाज में बैठकर सफर करते हैं और हवाई जहाज नीचे से ऊपर उठता है तो उसे घने बादलों में से गुजरना पड़ता है। जब बादलों के बीच में हवाई जहाज पहुंचता है, उस समय अगर हम खिड़की से बाहर देखेंगे तो हमें कुछ दिखाई नहीं देगा। वहां पर उस समय केवल कोहरा दिखाई देता है। जब हवाई जहाज बादलों के पार चला जाता है तो वहां एक सुंदर नीला आसमान और चमकता हुआ सूर्य नजर आता है। जब हवाई जहाज घने बादलों को पार कर रहा था तो उस समय हम यह सोच भी नहीं सकते थे की बादलों के पार कोई सुंदर या मनमोहक आसमान भी है जहां सूर्य का प्रकाश चमक रहा है। लेकिन जब हम ऊंचाई पर जाते हैं तो हम देखते हैं कि वहां सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश मौजूद है।

अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले सभी महापुरुष हमें यही समझाते हैं कि आत्मज्ञान का अनुभव भी हवाई जहाज में उड़ने के समान ही है। जब हम ध्यान समाधि में बैठते हैं और अपनी आंखें बंद कर लेते हैं, तब हमें अपने चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है। लेकिन समय के साथ-साथ हम जैसे-जैसे अपने अंतर की गहराइयों में उतरते जाते हैं तो उस अंधेरे के पार ईश्वर रूपी रोशनी का अनुभव करते हैं। जिस तरह हवाई जहाज का पायलट हमें बादलों के पार ले जाता है, जहां हम सूर्य का प्रकाश देखते हैं। ठीक उसी तरह हमें अपने अंदर के सूर्य को देखने के लिए किसी योग्य साधक की आवश्यकता होती है जो हमें अपने अंतर के अंधेरे को चीरते हुए प्रकाश से भरे आध्यात्मिक मंडलों का अनुभव कराने में हमारी सहायता कर सकता है। ये आध्यात्मिक मंडल खूबसूरती और ईश्वर के प्रेम से भरपूर हैं और यही मंडल मानव जीवन के उद्देश्य को सार्थक भी बनाते हैं।

एक बूढ़ी अम्मा अमेरिका के प्रसिद्ध वक्ता और कवि राल्फ वाल्डो इमर्सन के व्याख्यान सुनने प्रतिदिन जाया करती थी।
लोगों को बड़ा आश्चर्य होता कि एक महान चिंतक इमर्सन की गूढ़ रहस्यों से भरी बातों को यह अनपढ़ अम्मा कितना समझ पाती होगी।

एक दिन किसी व्यक्ति ने उस अम्मा से पूछा कि — क्या इमर्शन की बातें आपको समझ में आती हैं?

उस अम्मा ने जवाब दिया कि— उनकी ढेर सारी ज्ञान की बातें तो मैं नहीं समझ पाती, बस एक बात जिसने मेरा जीवन बदल दिया—वह यह है कि मैं भी परमात्मा से दूर नहीं हूं और परमात्मा भी मुझसे दूर नहीं है। मैं भी ईश्वर के निकट जा सकती हूं।

अम्मा के इस उत्तर ने वहां मौजूद लोगों में हलचल मचा दी। वहां आने वाले लोग सारी बातों को समझने के प्रयास में सत्य की एक छोटी- सी चिंगारी से वंचित रह जाते थे।
क्योंकि वे लोग सिर्फ व्याख्यान सुनने के लिए आते थे। उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग पर अपना कदम नहीं रखा था। यही कारण था की अम्मा के पास कोई बड़ी-बड़ी डिग्रियां न होने के पश्चात् भी जीवन के सत्य को समझ गई थी और वे लोग इससे अनभिज्ञ थे।

244. करें त्याग, चिंता का

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि— चिंता, चिता के समान है क्योंकि चिता मुर्दे को जलाती है और चिंता जिंदा को जलाती है। यह एक मनुष्य को वैसे ही खोखला कर देती है जैसे लकड़ी को कीड़ा खत्म कर देता है। जब लकड़ी में दीमक लग जाती है तो वह लकड़ी का बुरादा बना देती है। ऐसे ही चिंता धीरे-धीरे हमारे शरीर को खोखला कर देती है।

भगवद् गीता में श्री कृष्ण यह भी कहते हैं कि — क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे डरते हो? डर को त्याग दो? जब आत्मा न पैदा होती है, न मरती है तो फिर डरने की जरूरत क्या है? यह सभी मनुष्य जानते हैं लेकिन इसे अपने जीवन में कोई नहीं अपनाता। यह जानते हुए कि चिंता हमारे जीवन को तहस-नहस कर देगी, फिर भी वे चिंता का त्याग नहीं कर पाते। इससे हमारे शरीर में कष्ट उत्पन्न होने लगते हैं।

डैल कार्नेगी ने कहा है कि— हमें थकान अक्सर काम के कारण नहीं बल्कि चिंता, हताशा और नाराजगी के कारण होती है।

हमें यह समझना होगा की छोटी-छोटी बातों को लेकर चिंता करना कोई समाधान नहीं है। इससे हम अपने दुखों को दूर नहीं कर पाते बल्कि ओर दुखों को, तकलीफों को बढा अवश्य लेते हैं। यह हमारे आत्मविश्वास को भी खत्म कर देती है। आप स्वयं सोचिए क्या किसी ऐसी स्थिति से दुखी होने का कोई मतलब है, जिसे हम बदल ही नहीं सकते। जिनका समाधान नहीं होता उनके बारे में चिंता करना बेवकूफी है।

एक बार दो व्यक्ति एक ट्रेन में सफर कर रहे थे। उन दोनों के पास एक- एक थैला था।
एक व्यक्ति ने अपना थैला नीचे रख दिया।
जबकि दूसरे व्यक्ति ने उस थैले को उठाकर अपने सिर पर रख लिया।
वह बार-बार यह कहता है कि— यह थैला तो बहुत भारी है।
पहले व्यक्ति ने कहा— आप अपना थैला सिर पर क्यों रखे हुए हो? इसे नीचे रख दो।
उस व्यक्ति ने कहा लेकिन मैंने केवल अपने लिए टिकट खरीदा है, थैले के लिए नहीं।
ट्रेन में सवार होकर चाहे कोई व्यक्ति अपने सामान को सिर पर रखता है या नीचे रखता है, ट्रेन को इसका भार वहन करना ही है।

इसी प्रकार यदि हम यह समझें कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह ईश्वर की इच्छा से होता है। हम तो बस इतना कर सकते हैं कि अपने बोझ को सिर से हटा दें। कहने से अभिप्राय यही है कि जब समस्या आए तो उस पर दुखी होने की बजाय उचित प्रयास करें। यदि हम इस समझ के साथ जीवन में आगे बढ़ सकते हैं तो हम उचित प्रयास कर इसका परिणाम ईश्वर पर छोड़ सकते हैं। परिणाम चाहे कुछ भी हो, इसे ईश्वर के प्रसाद के रूप में स्वीकार कर हम अपने जीवन में शांति ला सकते हैं।

सुखी जीवन जीने के लिए सबसे पहले हमें चिंता का त्याग करना चाहिए। चिंता का कारण कुछ भी हो, हमें उसको त्यागना चाहिए। समाधान ढूंढने के लिए हमें उसके मूल में जाना चाहिए क्योंकि यदि हम यह पता लगाने में कामयाब हो जाएं कि हमारी चिंता का कारण क्या है तो हम समस्या का समाधान भी निकाल लेंगे।

चाहे हम हंसे या रोंएं। जिंदगी तो बीत ही जाएगी क्योंकि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता लेकिन हर छोटी- छोटी बात के लिए हम चिंता करें, दुखी रहें यह उचित नहीं है। हम दूसरों के दुख दूर करें, यही उचित होगा। इसके लिए हमने स्वयं से संकल्प लेना होगा कि हम हर परिस्थिति को स्वीकारेंगे और हर परिस्थिति में खुश रहेंगे। संकट के समय साहस ही काम आता है। इसी मनोवृति के साथ आगे बढ़ें और अपने जीवन में स्वस्थ और प्रसन्न रहें।