36. मानव जीवन

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मानव का जन्म एक अद्भुत और अनोखे जीव के रूप में हुआ है। लेकिन समय के साथ वह कमजोरियों का शिकार होता जाता है। वह खुद में समाहित अदभुत शक्ति और अपार संभावनाओं के प्रति अविश्वास शुरू कर देता है। वह अपने जीवन में देखे गए सपनों को साकार करने के लिए प्रयास ही करना छोड़ देता है। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष मानव जीवन के चार लक्ष्य हैं। इन लक्ष्यों को प्राप्त करना मानव जीवन की सफलता है। सफल होने के लिए कामकाज व गतिविधियों की गति को बढ़ाकर भी सफल हो सकते हैं। पहाड़ पर चढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति एक झटके में कभी भी नहीं चढ सकता। पहाड़ पर चढ़ने के लिए ऊपर-नीचे आना ही पड़ता है। लेकिन कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो चढाव पर तो खूब खुशियां मनाते हैं, उत्साह से भरे होते हैं। लेकिन जीवन में जैसे ही कोई मोड़ या झटका आता है तो इतनी बुरी तरह से गिरते हैं कि कभी खुद को संभाल नहीं पाते। ऐसे लोग जिस तेजी से सफल होते हैं, उतनी ही तेजी के साथ असफल भी होते हैं।

हमें अपने जीवन में संतुलन बना कर रखना चाहिए। संतुलन जीवन का बेहतरीन नियम है। जो व्यक्ति जीवन में संतुलित रहते हैं, उनका जीवन सदाबहार होता है। उनके जीवन से बसंत कभी नहीं जाता। ऐसे लोगों के जीवन में कभी पतझड़ नहीं आता। जीवन को बसंती बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि संतुलित हो जाए। संतुलन को अपने जीवन का सिद्धांत बना लें। सफल हो या असफल, उतार हो या चढ़ाव, समतल सड़क हो या मोड, संतुलित रहिए। संतुलन के साथ-साथ आप अपने जीवन में एकाग्रता को भी स्थान दीजिए। अगर आप अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाए तो किसी भी कार्य को करने के लिए आपका जोश और जज्बा भी काम नहीं आएगा। ऐसी स्थिति में आप से तमाम गलतियां होती रहेंगी। कोई भी कार्य सहज नहीं होता। उसे सहज हम अपने विवेक से बनाते हैं।

एक कहानी है कि- एक व्यक्ति की घड़ी खो गई। उसने अपने पूरे घर में उसे छान मारा। लेकिन वह उसे नहीं ढूंढ सका। तब उसने बाहर खेल रहे बच्चों को बुलाया और उन्हें घड़ी ढूंढने के काम में लगा दिया और कहा कि जो भी खोई हुई घड़ी ढूंढ कर देगा, उसे एक चॉकलेट मिलेगी। सारे बच्चे उत्साह, जोश और जज्बे के साथ काम पर लग गए। आधा घंटा हो गया, पर वह नहीं खोज पाए। तब उनमें से एक बच्चा ऐसा था, जिसमें सिर्फ उत्साह और जोश ही नहीं, बल्कि समझदारी भी थी। वह उस व्यक्ति से बोला- अगर वह घड़ी इसी कमरे में है, तो मैं उस घड़ी को ढूंढ सकता हूं, लेकिन सभी को इस कमरे से बाहर जाना पड़ेगा। सभी को बाहर कर उसने भीतर से कमरे का दरवाजा बंद किया और 5 मिनट बाद उसने दरवाजा खोला तो, उसके हाथ में घड़ी थी। उस व्यक्ति ने पूछा- जिस घड़ी को सभी लोग ढूंढ-ढूंढ कर हार गऐ, उसे तुमने कैसे ढूंढा? तो लड़के ने  कहा -जब कमरे में शांति हो गई तो, मैं कमरे के बीच में एकाग्र होकर बैठ गया। धीरे-धीरे मुझे घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी और मैंने देखा कि घड़ी अलमारी के पीछे पड़ी थी। उस लड़के ने घड़ी जोश से नहीं बल्कि होश से ढूंढी थी। उसने घड़ी को एकाग्रता से ढूंढा था। इसी प्रकार अपने जीवन में हम जो भी कार्य करते हैं,उ सको लेकर हम उत्साहित तो बहुत हो जाते हैं, लेकिन उस होश और एकाग्रता को भूल जाते हैं। जिसकी उस कार्य को पूरा करने में सबसे बड़ी भूमिका होती है। मनुष्य हमेशा अपनी गलतियों से सीखता है। वह सीखता है, गलतियां करता है, फिर सीखता है। उसने हमेशा खुद को संवारा है। बुद्धिमान व्यक्ति भी वही है जो दूसरों से, व गलतियों से सीखता है।

हमें सूर्य की तरह होना चाहिए, जो कभी किसी के कहने से न ही उदय होता  है और न ही छिपता है। लेकिन हम अपने जीवन में कई छद्म मानसिक बाधाओं से ग्रसित होते हैं। जो हमारे सफल होने के लिए प्रयास करने की राह में बहुत बड़े अवरोध की तरह कार्य करते हैं। महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडीसन का हजारों बार असफल होने के बावजूद बिजली के बल्ब के आविष्कार की सफलता में हमारे लिए यह संदेश अमिट होकर रह जाता है, कि जीवन में सफलता के लिए खुद की काबिलियत पर अगाध विश्वास से दूसरी बड़ी कोई चीज नहीं है। कहते हैं जब वे बार-बार असफल हो रहे थे, तब एक बार उनकी लैब में आग लग गईऔर पूरी लैब धू-धू कर जलने लगी। तब वह जल्दी से बाहर निकले और अपनी पत्नी को बुलाया। उसकी पत्नी बड़ी परेशान हुई। लेकिन थामस के चेहरे पर मुस्कान थी। जब उसकी पत्नी ने इसका कारण पूछा, तो उसने हंस कर कहा- अब मैं सफल हो गया। ऐसी स्थिति में भी वे निराश नहीं हुए बल्कि उनको इसमें सफलता नजर आई। यह उनका खुद में विश्वास ही था। खुद में विश्वास को अटूट रखते हुए हमें अपने मानव जीवन में सफलता की ओर अग्रसर होना चाहिए। हमारा जीवन ई-सी-जी की लाइन की तरह है। इ-सी -जी की लाइन जब ऊपर नीचे होती है, जीवन की पहचान होने की वही असली निशानी है। मुर्दा होने पर लाइन कभी ऊपर नीचे नहीं होती। उतार-चढ़ाव को जीवन की हकीकत मानिए। इसे स्वीकार कीजिए। सफलताएं व असफलताऐं दोनों मिलेंगी। इन का आनंद उठाइए, इनसे सीखिए व जीवन में आगे बढ़िए। यही मानव जीवन की परिभाषा है।

35. स्वयं की पहचान

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

उपनिषद के चार महावाक्यों में एक महावाक्य है- अहम ब्रह्मास्मि अर्थात “मैं ही ब्रह्म हूँ”। तात्पर्य यह है कि- इस मायावी संसार में मानव केवल ईश्वर की सबसे सुंदर कीर्ति ही नहीं है, बल्कि वह इस ब्रह्मांड में प्रत्यक्ष रूप से ब्रह्म्र का अंश है।ब्रह्म का स्वरूप  है। रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने कहा है कि- ईश्वर, अंश, जीव-अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख रासी। अर्थात जीव ईश्वर का अंश है और इसलिए वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि वाला है। लेकिन इस भौतिक संसार में अवतरित होकर वह अपने मूल स्वरूप को भूल जाता है। वह सदैव कुछ खोजने की, पाने की, संचित करने की, लालसा में लिप्त रहता है। वह यह पहचान ही नहीं पाता कि वास्तव में मेरा वजूद क्या है? वास्तव में उसको खुद पता नहीं होता कि वह कहाँ जा रहा है। वह भले ही यह न समझ पाए, किंतु उसकी यह जीवन रूपी यात्रा निरंतर चलती रहती है।

एक कहानी सुनी थी। एक बार एक घुड़सवार बहुत तेजी से सड़क से नीचे कच्चे रास्ते की ओर दौड़ रहा था। सड़क के दूसरी तरफ खड़े एक जानने वाले ने उसे आवाज लगाई, महोदय इतनी तेजी से कहाँ जा रहे हो? घुड सवार ने कहा नहीं पता। मेरे घोड़े से पूछ लो। वही तो हमें ले जा रहा है। वही हमारी जिंदगी को मुश्किल बना रहा है। वह घोड़ा कोई और नहीं बल्कि हमारा मन है। यह कहानी सुनाने का उद्देश्य यह है कि हम जीवन को सरल बनाने की दौड़ में शामिल नहीं हैं। हम इसे जटिल और कठिन बनाने का हर उपक्रम करते हैं। हम सब जिंदगी में ऐसे ही सवार हैं, जो नहीं जानते कि हम कहां जा रहे हैं क्योंकि हमने अपने मन रूपी घोड़े को खुला छोड़ दिया है। जीवन के उतार-चढ़ाव मनुष्य के अपने स्वभाव अनुसार होते हैं। क्योंकि हम अपने अस्तित्व को भूलकर भौतिक संसार के मायाजाल में फंस कर रह गए हैं। हम उस परमसाध्य एकमात्र परमात्मा, जिसे साध लेने पर कुछ भी साधना शेष नहीं रह जाती, उस ब्रह्म स्वरूप, निराकार परमात्मा के अस्तित्व को, जिसके हम अंश हैं, उसको भूल चुके हैं। उस साध्य में प्रवेश दिलाने वाले विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि दैवीय गुणों को हमने कब का पीछे छोड़ दिया है। हमने काम, क्रोध, राग, द्वेष वाली दूषित मानसिकता को अपने विचारों में शामिल कर लिया है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि उस ब्रह्म का अंश होते हुए भी हम अपने को पहचान ही नहीं पाते।

महान वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन जब मृत्यु शैया पर थे तो उनके मित्रों ने उनसे पूछा कि वह अपने जीवन की संपूर्ण यात्रा को किस रूप में देखते हैं ? इस पर उसने कहा था कि मैं यह तो नहीं जानता हूं कि मेरी बातों को दुनिया किस रूप में सोचती है। लेकिन हकीकत तो यह है कि मैं जीवन भर एक छोटे बच्चे की तरह किसी समुद्र-तट पर कंकड़ पत्थर ही चुनता रहा। जबकि सत्य का अगाध सागर बिना किसी खोज के मेरी नजरों के सामने बेकार ही पड़ा रहा। उसे नहीं देख सका। गंभीरता से विचार किया जाए तो क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि हम सभी में एक आइजक न्यूटन छिपा हुआ है, जो ज्ञान और सत्य के अथाह सागर के किनारे बैठ कर भ्रमवश कंकड़ पत्थर चुन-चुन कर अपनी थैलियों को भरता रहता है और एक दिन सहसा ही उसे आत्मज्ञान होता है कि उनके जीवन भर की कमाई के रूप में थैले में रखे गए धन-दौलत तो मिट्टी के मोल सरीखे हैं। असली मोतियों को तो वह अभी तक स्पर्श भी नहीं कर पाया है क्योंकि मनुष्य ने अमृत की खेती करना बंद कर दिया है।

एक बार भगवान बुद्ध भिक्षा के लिए एक किसान के यहां पहुंचे। बुध को भिक्षा के लिए आया देखकर किसान उपेक्षा से बोला- मैं हल जोतता हूं और तब खाता हूँ। आपको भी हल जोतना और बीज बोना चाहिए और तब खाना चाहिए। बुद्ध ने कहा मैं भी खेती ही करता हूँ। इस पर किसान को जिज्ञासा हुई। वह बोला- मैं न तो आपके पास हल देखता हूँ, न बैल और न ही खेत। तब आप कैसे कहते हैं कि आप भी खेती करते हैं। बुद्ध ने कहा- मेरे पास श्रद्धा के बीज, तपस्या रूपी वर्षा, प्रजा रूपी जोत और हल हैं। विचार रुपी रस्सी है। समृति और जागरूकता रूपी फाल और पेनी है। मैं वचन और कर्म में संयत रहता हूं। मैं अपनी इस खेती को बेकार घास से मुक्त रखता हूँ और आनंद की फसल काट लेने तक प्रयत्नशील रहने वाला हूँ। अप्रमाद मेरा बैल है, जो बाधाएं देखकर भी पीछे मुंह नहीं मोड़ता है। वह मुझे सीधा शांति धाम तक ले जाता है। इस प्रकार मैं अमृत की खेती करता हूँ। बुध के कहने का आशय यह है कि- हमें जो बहुमूल्य मानव शरीर मिला है उसे हमें केवल प्रभु की साधना में लगाना चाहिए। जीवन में उस परमात्मा की ही तलाश में अपना सारा ध्यान केंद्रित करना चाहिए। केवल मानव शरीर से ही उसे साधा जा सकता है। उसे पाया जा सकता है। उसे समझा जा सकता है। मानव जीवन पाकर तथा इस मार्ग पर आकर यदि आपको यह समझ में नहीं आता तब इससे बड़ा नुकसान और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि- जब मनुष्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, तब तक वह जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुका होता है। अर्थात बहुत देर हो चुकी होती है। क्या हमें अपनी पहचान जानने का कोई अधिकार नहीं है, यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना चाहिए।

34. मानव धर्म

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मानव धर्म का आदर्श एवं इसकी पृष्ठभूमि अत्यंत ऊंची है, तथा इसके अनुसार जीवन जीने में मानव-जीवन की वास्तविकता निहित है। मानव धर्म, सभ्यता एवम संस्कृति की रीढ़ के सदृश है। इसके बिना सभ्यता एवं संस्कृति के विकास की कल्पना करना असंभव है। मानव धर्म की वास्तविकता एवं उपादेयता इसी में है कि मनुष्यत्व के विकास के साथ ही विश्व भर के लोग सुख, शांति एवं प्रेम भाव से रहें। लेकिन आज के समय में मूल्यों से रहित शिक्षा मनुष्यों को मानवता की बजाय दानवता की ओर लिए जा रही है। आज मनुष्य वासनाओं के वशीभूत होकर विषय भोग के साधनों को एकत्रित करने में लगा हुआ है। वह इतना स्वार्थी हो गया है कि उसने उचित और अनुचित का ख्याल रखना भी छोड़ दिया है। उसे इस बात का आभास भी नहीं है कि धन का संचय करना राष्ट्र की गति को रोक देता है। जैसे नदी-नालों का पानी गतिशील होने के कारण निर्मल बना रहता है, जबकि जोहड़ तालाब का पानी एक जगह पर खड़े रहने के कारण दूषित हो जाता है। उसी प्रकार मानव का धर्म है कि जब तक वह समाज, परिवार, राष्ट्र, सभ्यता, संस्कृति के बारे में सोचता है या कार्य करता है, व नदी-नालों के पानी की तरह गतिशील रहता है, तब तक वह फूलों की तरह महकता रहता है। लेकिन जिस दिन जोहड-तालाब के पानी की तरह स्थिर हो गया, उसी दिन वह मुरझाए हुए फूलों की तरह हो जाएगा।

ऐसी स्थिति में विचार कीजिए कि ‘वसुधैव कुटुंबकम‘ वाला हमारा मूल मंत्र कहां चला गया। विश्व के सभी मनुष्य जब एक ही विधाता के पुत्र हैं और इसी कारण यह संपूर्ण संसार एक विशाल परिवार के समान है, ऐसे में मनुष्य इतना स्वार्थी कैसे हो जाता है। वह कैसे भूल जाता है कि संसार के सभी धन-संपत्ति और साधन उस निरंकारी ब्रह्म  स्वरूप परमात्मा के दिए हुए हैं, जिसका हम अंश है। मानव धर्म सभी मनुष्यों के साथ स्नेह भाव का मूल मर्म समझता है क्योंकि मानवता मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। जाति, संप्रदाय, वर्ण, धर्म और देश आदि के भेदभाव के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। मानव धर्म का आध्यात्मिकता और नैतिकता से गहरा संबंध है। क्योंकि प्राणी मात्र में रहने वाली आत्मा उसी परमपिता परमेश्वर का अंश है। प्रत्येक में एक ही जगत नियंता प्रभु का प्रतिबिंब झलकता है। इसलिए हमें प्रत्येक मनुष्य के प्रति आदर भाव बनाए रखना चाहिए।

यदि कोई मानव सदाचारी नहीं है अथवा चारित्रिक एवं नैतिक आदर्शों में उसकी आस्था नहीं है। वह ईश्वरीय सत्ता में भी विश्वास नहीं करता। इसके अतिरिक्त सात्विकता, सहनशीलता, सहृदयता, परोपकारिता आदि सद्गुण उसमें नहीं हैं। तब यह स्वीकार करना होगा कि अभी उसने मानव धर्म का स्वर-व्यंजन भी नहीं सीखा है। वास्तव में मानव धर्म के विनाश हेतु मानव ने चहुंओर स्वार्थ वश एक संकीर्ण घेरा बना रखा है। जिसके बाहर वह निकल नहीं पाता। वहीं उसे तोड़े बिना कोई भी मानव, मानवतावादी नहीं बन सकता। वर्तमान भौतिक युग में यदि मनुष्य ने मनुष्य के साथ सद्व्यवहार नहीं सीखा तो भविष्य में इसकी भारी क्षति उठानी पड़ेगी। इसलिए अपने हृदय को परमोदार तथा सरल बनाने की नितांत आवश्यकता है। इसके लिए परमात्मा रूपी पयोधी में स्नान की नितांत आवश्यकता है, जो अत्यंत आनंद की अनुभूति भी करवाएगा। लेकिन आज के मानव की स्थिति उस व्यक्ति के समान है जो समुद्र में गोता लगाकर मोती प्राप्त करने के स्थान पर, किनारे पड़ी सीप और कौडियों को चुनकर ही प्रसन्न हो रहा है। मानव जीवन प्राप्त होना दुर्लभ है। इस जन्म को प्राप्त करके भी यदि हम निर्जीव वस्तुओं का संग्रह करने में लगे रहे तो हमारा जीवन व्यर्थ है। क्योंकि ईश्वर भक्ति तो केवल मनुष्य जीवन में ही संभव है। हमें यह मानव शरीर नौका के समान संसार रूपी सागर से पार होने के लिए मिला है। इसलिए मानव धर्म का प्रमुख लक्ष्य संसार रूपी उधान से सुगंधित पुष्पों को संग्रहित करना होना चाहिए।