37. मन्: स्थिति

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

दया, क्षमा, परोपकार और दान- ये हमारी मन की सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया है। सहज वह है जिसे समझने अथवा प्राप्त करने के लिए, किसी विशेष प्रयास की जरूरत नहीं पड़ती। ईश्वर ने हमारे शरीर के अंगों और मन की संरचना इस प्रकार से की है कि यदि वे सहज अथवा आसानी से प्राप्त चीजों पर ध्यान लगाएं तो उनमें सड़न की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। इससे अभिप्राय यह है कि यदि हम दया, क्षमा, परोपकार और दान जैसी सात्विक सहज प्रवृत्तियों को अंगीकार करते हैं तो हमारे दीर्घजीवी होने में कोई संदेह नहीं रह जाता। लेकिन मनुष्य की मन्: स्थिति हर समय बदलती रहती है। क्योंकि वर्तमान भौतिकवादी संसार में अधिसंख्यक लोग केवल पाना चाहते हैं। पाने अथवा लेने वालों की पंक्ति बड़ी लंबी होती है, जबकि देने वालों की पंक्ति खाली-खाली सी, लेकिन जो थोड़े लोग इस देने वाली पंक्ति में शामिल हैं, जरा उनसे जाकर पूछिए उनको कितना आनंद प्राप्त होता है।

पाने अथवा संग्रह करने की प्रवृत्ति के कारण आज मानव की मन्: स्थिति काफी गिर चुकी है। उसका व्यवहार कभी-कभी जानवर से भी नीचे चला जाता है। किसी मनुष्य पर रोष उतारने के लिए प्राय: जानवरों से तुलना कर दी जाती है। लेकिन जानवर भी अपना पेट भरने के लिए हमेशा एक ही काम करते हैं। जंगल में सबसे खूंखार जानवरों का राजा शेर होता है। लेकिन उसका भी अपना एक सिद्धांत होता है। एक तो वह अपने आहार के लिए शिकार खुद करता है और झूठे बासी मांस का भक्षण नहीं करता। इसके अलावा जब उसका पेट भर जाता है तो वह बचे हुए हिस्से को बांधकर संग्रह नहीं करता, उसे छोड़कर चल देता है। तब बचे हुए हिस्से का भक्षण दूसरे असहाय जानवर करते हैं। लेकिन सिर्फ पाने और उसे संग्रह करने की होड़ में कई बार असफलता हाथ लगती है। यह असफलता तनाव का कारण बनती है और फिर तनाव व्याधियों का कारण बनता है।

व्याधियों से घिरा शरीर, परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होता जाता है। अनुपयोगीता कि इस पीड़ा को लिए व्याधियुक्त शरीर अल्पायु में ही काल कवलित हो जाता है। अपनी मन्: स्थिति को सुधारने के लिए हमें अपने जीवन में संतुलन बना कर रखना होगा। इस भौतिक संसार में कुछ भी आपको तृप्ति नहीं दे सकता। बाहरी दुनिया में संतुष्टि खोजने वाला मन अतृप्त हो जाता है और यह अतृप्ति बढ़ती ही जाती है। पूरे वातावरण में नकारात्मकता का विष फैल जाता है। जब नकारात्मकता की अति हो जाती है, तो एक अत्यधिक फूले हुए गुब्बारे की तरह फूट जाती है। क्योंकि मनुष्य के मन की स्थिति ऐसी हो गई है कि वह केवल नकारात्मक बातों या कार्यों को ही स्थान देता है। यदि कोई आपकी प्रशंसा करता है, तो वह प्रशंसा आपके भीतर की गहराई में नहीं जाती। यह आपकी स्वास का हिस्सा नहीं बनती है। लेकिन यदि कोई आपका अपमान करता है, तब प्रत्येक श्वास जो आप लेते हैं और छोड़ते हैं तो उसका हिस्सा बन जाती हैं। सुखद घटनाएं भी आप का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन सामान्यतः लोग सकारात्मक बातों की बजाय नकारात्मक बातों में अधिक अटक जाते हैं।

आपने अक्सर यह ध्यान दिया होगा कि- अगर कोई हमारा एक बार अपमान कर देता है या अपशब्द कहता है तो हम अपनी जिंदगी में उन बातों को लेकर अपने आपको कितनी बार अपमानित करते रहते हैं। दूसरे तो केवल एक बार ही अपमानित करते हैं लेकिन हम अपने आपको बार-बार कोसते हैं। यह हमारी दोषपूर्ण मन: स्थिति का प्रभाव होता है। जब आप किसी से प्रेम करते हैं, तब वह प्रेम भी आपके भीतर गहराई में होता है, तब वह आपकी श्वास बन जाता है, लेकिन जब आप किसी से ईर्ष्या करते हैं तो वह हमारे श्वासों  की गति को तेज कर देती है। क्योंकि उससे जो नकारात्मकता रूपी तरंगें उत्पन्न होती हैं, वह सकारात्मकता पर भारी पड़ती हैं। वे आप के कामकाज पर प्रभाव डालती हैं। क्योंकि आप त्याग करना नहीं जानते। ऐसी स्थिति में हम अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं। अनिद्रा त्याग न करने का चिन्ह है। अगर आप त्याग करना जानते हैं, तो असफलता आपको डराएगी नहीं। हमारा मन किसी भी बात पर अटक जाता है और अपनी कमजोर मन्: स्थिति के कारण उसे त्याग नहीं पाते। इसलिए हमें असफलता से घबराना नहीं चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया जिसे आज सफलता मान रही है, वह अधिक से अधिक भौतिक है। कई मामलों में तो यह क्षणिक भी होती है। इसके साथ असफलता का भय भी बराबर बना रहता है। जबकि संतुष्टि जो हमारी सहज व स्वाभाविक मनोवृति है, हमारे अंतर्मन का द्वार खोलती है। इसमें असफलता का भय नहीं होता। यह क्षणिक नहीं है। भौतिक नहीं है। यह पराभौतिक है, सतत है, दीर्घजीविता का सूत्र है। जब हमारे जीवन में समता आ जाएगी तब हमारी मन्: स्थिति मजबूत हो जाएगी। ऐसी स्थिति में हम परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का बेहतर तरीके से निर्वहन करेंगे। यह सचमुच बड़ी आनंददायक स्थिति होगी।