44. सुख-दुख

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानव जीवन रूपी उतार-चढ़ाव में, धुप और छांव की तरह सुख और दुख आते जाते रहते हैं। क्योंकि उतार-चढ़ाव जीवन का आधारभूत नियम है। शायद दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति हुआ हो, जिसके जीवन में सुख-दुख न हों। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि— सुख-दुख जीवन में नहीं होंगे तो जीवन निरस हो जाएगा। हमारी कहावतों में भी हमेशा कहा जाता है कि समय एक जैसा नहीं रहता। जीवन का नियम है —बदलाव।

मनुष्य जीवन पर्यंत तमाम दुखों से जूझता रहता है। इन दुखों से मुक्ति पाने एवं सुख की ओर कदम बढ़ाने के लिए मनुष्य तमाम तरह के उपाय करता है। लेकिन यह भी सत्य है कि सुख और दुख दोनों ही मनुष्य के अपने कर्मों का फल होते हैं। सुख के लिए वह भरपूर प्रयास करता है और दुख जाने-अनजाने किए पापों के कारण उसके सिर का बोझ बनते जाते हैं। यह भी एक विडंबना है कि दुखों से पिछा छुड़ाकर कुछ ही लोगों को सुकून की प्राप्ति हो पाती है। साथ ही यह भी पता नहीं होता कि सुखों की अवधि कितनी लंबी होती है। सुख रुपी मर्ग-मरीचिका की तलाश में अधिकांश लोगों की झोली अतृप्ति, असंतोष, अभाव,असफलता और उनसे उपजे अवसाद से ही भरी होती है।

लोग भटकते तो सुख की प्राप्ति के लिए हैं, परंतु कभी कभार ही इसमें सफलता मिल पाती है। प्रत्येक व्यक्ति की यही पीड़ा और वेदना है। सुख का आनंद वही जान पाता है, जिसने सुख प्राप्त किया हो।अपने कर्मों का सुख भोगना उसका अधिकार है। यदि वह सुख अन्य के साथ बांटता है तब भी अपने सुख पर उसका अधिकार वैसा ही अक्षुण्य रहता है। सुख की तलाश में भटकते लोग यह भूल जाते हैं कि दुख कहीं बाहर से नहीं आता बल्कि उनका स्रोत प्रायः हमारे भीतर ही होता है। चाहे हम कितना भी दुखों के कारणों को कहीं बाहर ढूंढना चाहें, लेकिन उनके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यदि समस्या स्वजनित है तो उसके समाधान के लिए उपाय भी स्वयं ही तलाशने होंगे। ये समाधान परिस्थितियों को बदलने से नहीं मन: स्थिति को बदलने से संभव होते हैं।

दुख जिस सघनता से आया है, वैसा ही रहेगा, चाहे जितने लोगों से चर्चा कर ली जाए। सुख का बढ़ जाना और दुख का कम हो जाना मात्र एक भ्रम है। जब मनुष्य अपने सुख की अभिव्यक्ति करता है तो इससे तात्पर्य है कि उसका अहम् संतुष्ट हो गया है। उसे दूसरों की अपेक्षा ऊपर उठे होने की अनुभूति होती है। दुख में प्राप्त होने वाली संवेदनाएं भी एक तरह से उसके अहम् को संबल देने का कार्य करती हैं। क्योंकि व्यक्ति अपने दुख से इतना दुखी नहीं होता, जितना दूसरों के सुख से होता है। यह मानवीय स्वभाव है। जब वह दूसरों को दुखी देखता है तो उसे सुकून मिलता है। जिससे वह खुश होता है।

दुखों से मुक्ति पाने के लिए हमें अपने अंतर्मन की गहराई में उतरना होगा। हमें अहम् को बाहर ही छोड़ना होगा। हमें समझना होगा कि अपने साथ उत्पन्न हुई समस्याओं के लिए मैं स्वंय उत्तरदायी हूं। बाहर जो घटता है, वह हमारे अपने कर्मों का ही फल है। हमें स्वयं से जुड़ी वास्तविकताओं को समग्रता से स्वीकार करना होगा। सुख हो या दुख, आनंद हो या विषाद, यश हो या अपयश, ऐसे ही तमाम भावों को समझकर उनका सही मर्म आत्मसात् करना होगा। हमें स्वीकार करना होगा कि ये स्थितियां कहीं ना कहीं हमारी स्वयं उत्पन्न की हुई हैं। स्वयं पर जिम्मेदारी लेने से न सिर्फ हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलेगा ,बल्कि परिस्थितियों से निपटने में भी हमें शक्ति मिलेगी।

सुख की अनुभूति को यदि पूर्ण रूप से अंतर ग्राह्य किया जाए तो सद्कर्म करने की प्रेरणा जागृत होती है। दुख की सघनता को यदि पूर्ण रूप में आत्मसात् किया जाए तो पश्चाताप पूर्ण होता है और मन सचेत होता है। जब हमें सुख की प्राप्ति होती है तो उसे हम ही भोगते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारा सुख कोई अन्य नहीं भोग सकता। सुख में तो हम बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं कि यह तो हमारे अच्छे कर्मों का फल है।

लेकिन जब दुख आते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि यह हमारे बुरे कर्मों का फल है। क्योंकि हमारा अहम् हमें यह स्वीकार करने ही नहीं देता कि हमने बुरे कर्म किए हैं। फिर हम सोचते हैं कि ईश्वर ने हमारे साथ नाइंसाफी की है। किसी दूसरे के बुरे कर्मों का फल हमें भोगना पड़ रहा है। सुख और दुख का भेद जानने के लिए हमें अंतर्मन को साधना होगा। लेकिन आज के समय में अंतरंग कुछ रह ही नहीं गया है। मन की भावनाएं, जिन्हें मन की शक्ति बननी चाहिए, अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती जा रही हैं। इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। लोग टूट रहे हैं। हताश, निराश हो रहे हैं। हर कोई अपने दुख का रोना रोने में लगा हुआ है। इससे बचना है तो मन की भावना को आत्मसात् करना आना चाहिए। भावनाओं को किससे और किस स्तर पर बांटना है, यह विवेकशील मनुष्य ही कर सकता है।

याद रखें कि जीवन में अहम् परिवर्तनों को केवल वही मूर्त्त रूप दे सकते है, जो स्वयं जिम्मेदारी लेना जानते हैं। इसमें दूसरों पर निर्भरता कभी उपयोगी नहीं हो सकती। यानी अपने जीवन में बदलाव लाना है तो यह किसी अन्य के माध्यम से नहीं बल्कि अपने प्रयासों से ही संभव है।

43. मानव चरित्र

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानव के चरित्र का उसके व्यक्तित्व निर्माण में सबसे बड़ा योगदान होता है। एक चरित्रवान व्यक्ति ही समाज और देश के उत्थान में अपना योगदान देकर, उसे विश्व में सर्वोपरि स्थान दिलवाने का माद्दा रखता है। यज्ञ की समिधा की तरह ही सुंदर चरित्र की खुशबू चारों ओर फैलती है। चरित्र ऐसी ज्योति है, जिसके अलौकिक प्रकाश से आत्मा की ज्योति को अखंडता और अमृता प्राप्त होती है। इसी से जीवन ज्योति भी जलती है।

चरित्र मानव के व्यवहारिक आभूषण के समान होता है। संयम और विचारों की दृढ़ता से व्यक्ति के चरित्र बल का अनुमान लगाया जा सकता है। यह एक ऐसी सुगंध है, जो सिर्फ चरित्रवान व्यक्ति के पास ही मिल सकती है, जिससे जीवन रूपी बगिया महक उठती है। कहने का अभिप्राय है कि— यदि चरित्र रूपी सुगंध जीवन रूपी बगिया से गायब हो गई, तो उस बगिया का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। यहां तक कि कीट-पतंगे और भंवरे भी उसके रस का आस्वादन नहीं लेंगे। बाह्य शरीर पर रंग रोगन लगाकर हम उसे खूबसूरत रूप में तो ढाल सकते हैं, लेकिन जो चरित्र रुपी सुगंध होती है, वह कहां से लाएंगे। असली खूबसूरती और वह सुगंध तो केवल एक चरित्रवान व्यक्ति के पास ही होती है।

मानव बाहरी रूप को खूबसूरत बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयोग करता है, इत्र आदि लगाकर उसे सुगंधित बनाने की कोशिश करता है, लेकिन एक चरित्रवान व्यक्ति के सामने इन सब का कोई महत्व नहीं होता। यह नकली सुगंध तो कुछ ही समय के बाद गायब हो जाती है। क्योंकि यह केवल बाहरी आवरण था, जो नष्ट हो गया। अंदर का प्रकाश तो चरित्र का है। जिसके आकर्षण से लोग खुद-ब-खुद खिंचते चले आते हैं।

चरित्र आत्मा का ऐसा चुंबक है, जिसकी खुशबू बहुत दूर से ही आ जाती है और हम उसकी तरफ खिंचे चले जाते हैं। यह चुंबक दरिद्र और रोगी व्यक्ति में भी हो सकता है। चरित्र की पूंजी जिसके पास है, वह चाहे निर्धन हो या रोगी, दुनिया का सबसे बड़ा पूंजीपति बन जाता है। चरित्र ऐसी पूंजी है, जो सबको अपनी और झुकाने की क्षमता रखती है। इस पूंजी को कमाने के लिए न तो किसी के शोषण की आवश्यकता पड़ती है, न तो व्यापार, नौकरी ,खेती या मजदूरी करने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए संवेदना, सद्गुण और स्वधर्म का सम्यक् पालन करना होता है। इसे प्राप्त करने के लिए किसी राजा-महाराजा या राजकुमार का होना भी आवश्यक नहीं है। चरित्र रूपी पूंजी को एक सामान्य मानव भी अर्जित कर सकता है।

चरित्र रूपी धन के स्वामी को अपनी पूंजी को सुरक्षित करने के लिए न तो किसी बैंक में जमा करने की आवश्यकताक है और न ही उसे चोरों से बचाने के लिए रात भर जागने की जरूरत है। क्योंकि यह ऐसी पूंजी है, जिसे चोर चुरा नहीं सकते, धूप सुखा नहीं सकती, अग्नि जला नहीं सकती और बारिश उसे गला नहीं सकती। यहां तक की आंधी और तूफान भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसे कोई नष्ट करने की हिमाकत नहीं कर सकता, क्योंकि यह मानव की आत्मा रूपी तिजोरी में सुरक्षित रखी हुई है। यह मानव के इस नश्वर शरीर के समाप्त हो जाने के बाद भी इस संसार में फलती-फूलती रहती है।

ऐसे ही एक चरित्र के धनी व्यक्ति हैं—स्वामी विवेकानंद। जिसका उसके विरोधियों ने कई बार चरित्र हनन करने की कोशिश की। लेकिन उनका व्यक्तित्व विलक्षण था। उसके दो उदाहरण में प्रस्तुत करना चाहती हूं— एक बार स्वामी जी के पास किसी विदेशी महिला को भेजा। उसने स्वामी जी से कहा मैं आपसे शादी करना चाहती हूं। स्वामी जी ने कहा—मैं तो ब्रह्मचारी हूं देवी, आप मुझसे ही क्यों विवाह करना चाहती हैं। महिला ने जवाब दिया—क्योंकि मुझे आपके जैसा ही एक पुत्र चाहिए, जो पूरी दुनिया में मेरा नाम रोशन करे और वह केवल मुझे आपसे शादी करके ही मिल सकता है। इस पर स्वामी जी ने कहा—इसका एक और उपाय है। विदेशी महिला ने बड़े आश्चर्य से पूछा—वह क्या है? स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा—आप मुझे ही अपना पुत्र मान लीजिए और आप मेरी मां बन जाइए, ऐसे में आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जाएगा और मुझे अपना ब्रह्मचर्य भी नहीं तोड़ना पड़ेगा। महिला हतप्रभ होकर विवेकानंद को देखती रह गई।

जब विरोधियों की मंशा नाकाम हो गई तो उन्होंने शहर की एक प्रसिद्ध वेश्या को उसके पास भेजा। जैसे ही वह स्वामी जी के पास पहुंची, तो उन्होंने पूछा—कैसे आना हुआ मां? इतना सुनना था कि वह वेश्या रोते हुए बोली—जीवन में पहली बार किसी के मुंह से मां शब्द सुन रही हूं। यह मेरा अहोभाग्य है और स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ी। स्वामी जी के चरित्र की उत्कृष्टता के सम्मुख उनके विरोधियों की मंशा एक बार फिर विफल हो गई। यह होती है— चरित्र रूपी पूंजी।

इस पूंजी का मालिक चैन से सोता है। आराम करता है। वह किसी से नहीं घबराता, बल्कि उससे सभी घबराते हैं। हमें यह कभी नहीं बताया या पढ़ाया जाता है कि मानव पिछले 500 वर्षों में चरित्र के मामले में कितना नीचे गिरा है। मानव चरित्र पूरी तरह से निर्धन होता जा रहा है। जबकि मानव की संस्कृति और सभ्यता का यह आधार है। आज मानव हर समय हताशा और निराशा की अवस्था में रहता है। उसका सुख-चैन कहीं खो गया है। अकूत मात्रा में धन संपत्ति होते हुए भी वह दुखी क्यों है? इस पर गहन अध्ययन करेंगे तो बात समझ में आएगी कि मानव के अंदर मानवता, जो इंसान की सबसे बड़ी स्थाई पूंजी है, उससे वह खाली हो गया है। नैतिकता और सद्गुणों की पूंजी से वह कंगाल हो गया है। उसकी आंतरिक शांति खत्म हो गई है। वह हमेशा भाग दौड़ भरी जिंदगी को ढोता है। क्योंकि आगे बढ़ने की लालसा और गला- काट प्रतिस्पर्धा के कारण जिंदगी बोझ लगने लगी है। ऐसे में चरित्र रूपी पूंजी को वह भूल गया है।

बचपन में मिले संस्कारों का प्रभाव जीवन भर किसी न किसी रूप में असर डालता ही है। यदि अपनी संतानों को चरित्रवान, बलवान, साहसी और संवेदना से युक्त बनाना है, तो उन्हें ऐसे संस्कार देने चाहिए, जिनसे उनका संपूर्ण जीवन कुंदन बन जाए और वे देश व समाज की उन्नति में अपना योगदान दे सकें।

42. अध्यात्म और वैराग्य

श्री गणेशाय नम्ः

श्री श्याम देवाय नमः

अध्यात्म और वैराग्य एक दूसरे से भिन्न हैं। अध्यात्म से अभिप्राय ईश्वर को पाने के लिए साधना करने से है। लेकिन वैराग्य से अभिप्राय सांसारिक त्याग से है। वैराग्य धारण करने वाले मनुष्य का नजरिया ये है कि— यदि हम संसार का त्याग कर देते हैं, तो हमें ईश्वर प्राप्ति हो जाएगी। लेकिन यह संभव नहीं है। अध्यात्म के लिए हमें अपने विकारों को त्यागने की जरूरत है, न कि संसार को त्यागने की। यहां इस संसार में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो स्वयं को बैरागी बताते हैं और कथित तौर पर संसार को त्यागने की बातें करते रहते हैं। वे हर समय संसार को दोष देते रहते हैं। उन्हें हर समय यह चिंता सताती रहती है कि कहीं सांसारिक वस्तुएं उन्हें आकर्षित न कर लें। इसलिए वे लगातार उनसे भागते रहते हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि आप किसी वस्तु के नियंत्रण में नहीं हैं अर्थात् आपने संसार की सुख-सुविधा को त्याग दिया है और आप विकारों से परे हो गए हैं, तो वह वस्तु आप को प्रलोभन कैसे दे सकती है ? जो मनुष्य इस संसार से भागकर साधना करना चाहते हैं, वे कमजोर साधक हैं, जो संसार में रहकर ही साधना करते हैं उनका कभी पतन नहीं होता। हमारे जीवन रूपी चक्र में तीन गुणों की प्रधानता होती है-सत्व, रजस और तमस। जब सत्व गुण आता है—तो हर कार्य में सतर्कता, ज्ञान, रूचि और आनंद बढ़ता है। जब रजोगुण आता है— तो हमारे भीतर इच्छाओं, स्वार्थ ,बैचेनी और दुख का उदय होता है। जब तमोगुण आता है— तो उसके साथ भ्रांति, आसक्ति, अज्ञान और आलस्य आते हैं। जो केंद्रित हैं, वह इन पर ध्यान देता है। इनका साक्षी बन जाता है। यदि आप आत्म- ज्ञान से परिपूर्ण हो चुके हैं, तो आपको किसी भी प्रकार का प्रलोभन आकृष्ट नहीं कर पाएगा, क्योंकि एकाग्रचित होना ही योग का मुख्य उद्देश्य है। यही वैराग्य है।

कहा गया है—कार्य में कुशलता ही योग है। योग जीवन जीने, मन व भावनाओं को संभालने, प्रेम से रहने और प्रेम को घृणा में न बदलने की कुशलता है। ये सभी गुण मिलकर व्यक्ति को सच्चा योगी बनाते हैं। योगी का अर्थ है -जो अपने कार्य को पूर्णता से करता है। सच्चा योगी कभी परिणाम की चिंता नहीं करता। योगी वह नहीं है, जिसनें सब कुछ छोड़ दिया है और हिमालय में बैठा हुआ है, जो अपने अंदर में विश्राम करता है, अपने भीतर के प्रकाश में डूब जाता है, उस योगी को ही अध्यात्म की प्राप्ति होती है।अध्यात्म कोई वस्तु नहीं है। जिसे हम बाजार से खरीद सकते हैं या यह हमें केवल पहाड़ों पर जाकर ही मिलेगी बल्कि अध्यात्म वहीं है, जहां पर आप हैं। लोगों के बीच में रहकर भी अध्यात्म को प्राप्त किया जा सकता है।

त्याग दिव्यता का एक गुण है। लेकिन कुछ वर्षों से हमने इसे गलत ही समझा है। हम आत्मज्ञान और त्याग की बाहरी धारणाओं में फंस गए हैं। प्रत्येक संस्कृति व धर्म की इसके बारे में अपनी ही विचारधारा है। कुछ कहते हैं कि— अमीर आदमी आत्मज्ञानी नहीं होता। यह सही नही है। आत्म ज्ञानी होने के लिए गरीब होना आवश्यक नही है। कुछ अन्य संस्कृतियां भी हैं जो यह सोचती हैं कि एक आत्मज्ञानी व्यक्ति या साधु को कपड़े नहीं पहनने चाहिए। उसे इन सांसारिक लोगों से ज्यादा मेल-जोल नहीं रखना चाहिए। उसे भौतिक वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।उनकी विचारधारा के अनुसार जो संसार में रहता है, जिनका अपना परिवार है, वो उनसे मिलता है, उनके साथ बैठता है, तो वो आत्मज्ञानी नहीं हो सकता। ये सरासर गलत धारणा है।

जब एक योगी अपने अस्तित्व के परमआनंद व परमसुख वाले स्वभाव को जान जाता है, तो उसके मस्तिष्क से अवगुणों का भय, संसार का भय आदि जैसे दुर्गुण भी मिट जाते हैं। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे डायबिटीज का मरीज, मिठाइयों से डरता है। उसे मिठाई को देखने से डर लगता है। इसके विपरीत जिसने अपने भीतर की मिठास को पा लिया है, वैसे व्यक्ति के सामने मिठाई हो या ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यही परम वैराग्य है। जिसमें व्यक्ति न तो संसार से भयभीत है और न ही संसार से भाग रहा है। वह संसार में रहते हुए पूर्ण रूप से विरक्त और केंद्रित है। जब आप कोई कार्य करते हैं, तो आपको कर्म करना पड़ता है, लेकिन जब आप विश्राम करते हैं, तो आपको कोई कर्म नहीं करना पड़ता। लेकिन हम बिल्कुल विपरीत कार्य करते हैं। जब हम विश्राम करते हैं, तब लगातार कुछ न कुछ सोच रहे होते हैं, या कुछ करने का प्रयास कर रहे होते हैं। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। जब आप किसी कार्य को करते हैं, तब उसे पूरी निष्ठा के साथ करिए। जब तक वह कार्य पूरा न हो जाए, तब तक आप विश्राम नहीं कर सकते। उसे पूरी लग्न और तन्मयता के साथ कीजिए। जब एक बार वह कार्य हो जाए तो बैठ जाइए और उसके बारे में सोचना बंद कर दीजिए।

यदि आपको ट्रेन पकड़नी है, तो आपको प्रयास करना पड़ेगा। तब आप घर पर बैठकर विश्राम नहीं कर सकते और यह भी नहीं कह सकते कि आप को ट्रेन पकड़नी है। जब एक बार आप ट्रेन में बैठ जाते हैं, उसके बाद ट्रेन के अंदर इधर-उधर दौड़ने से कोई लाभ नहीं है। इससे आप जल्दी अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते हैं। जब एक बार आप ट्रेन में बैठ जाए तो व्यर्थ की भाग-दौड़ न करें, बल्कि विश्राम करें। इसका अभिप्राय है गति के साथ जड़ता भी जरूरी है। इसी प्रकार ध्यान पर बैठने से पहले प्रयास करें। जब एक बार आप ध्यान करने के लिए बैठ जाएं, तब किसी प्रयास की आवश्यकता नही है। शुरू -शुरू में हमें पौधों को चारों ओर से घेरा लगाकर गाय-बकरी आदि से बचाना पड़ता है। वृक्ष बन जाने पर कोई भय नहीं रह जाता। तब तो सैकड़ों गाय-बकरियां आकर उसके नीचे आसरा लेती हैं। उसके पत्तों से पेट भरती है। इसी तरह साधना की प्रथम अवस्था में स्वयं को कुसंगति और सांसारिक विषय बुद्धि के प्रभावों से बचाना चाहिए।

एक बार अध्यात्म का अनुभव हो जाने पर कोई भय नहीं रहता। तब सांसारिक लोभ,मोह, वासना आदि आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकेंगी। बल्कि अनेक संसारी लोग आपके पास आकर उसका अनुभव प्राप्त करेंगे। जब आपको अध्यात्म रुपी ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी, तब आप सही अर्थों में वैराग्य का अर्थ समझोगे और आत्म ज्ञान को प्राप्त करोगे।

41. समय का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे जीवन रूपी चक्र में समय का अमूल्य योगदान है। जीवन की परिभाषा ही समय से है, क्योंकि जीवन समय से ही बनता है। समय का सदुपयोग जीवन को सार्थक और सफल बना देता है। दूसरी तरफ समय का दुरुपयोग जीवन को नर्क बना देता है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, वह निरंतर अज्ञात दिशा में जाकर विलीन होता रहता है। इसलिए हमारा परम कर्त्तव्य होना चाहिए कि हम समय का पूरा -पूरा सदुपयोग करें। समय परमात्मा से भी महान् है। भक्ति साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है, लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता। यह हमारे हाथ से रेत की तरह फिसल जाता है।

संत कबीर ने कहा है –जो काम कल करना है, उसे आज कर और आज करना है, उसे अभी कर। कल पर छोड़ देने से समय हाथ से निकल जाएगा, फिर उसको कब करेगा। इसलिए प्रत्येक काम का अवसर होता है। अवसर वही है, जब वह काम सामने पड़ा है। अवसर निकल जाने पर काम का महत्व समाप्त हो जाता है तथा बोझ बढ़ता जाता है। निश्चित रूप से इन बातों को कहने के पीछे एक बड़ा उद्देश्य यह है कि- मैं,आपके मन और मस्तिष्क में समय की सर्वोत्कृष्टता एवं उसके अस्तित्व को जागृत कर सकूं। यदि इसमें मुझे थोड़ी-सी भी सफलता मिल गई, तो आपको मेरे इस अनुरोध के अनुरूप अपने जीवन को जीने में सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाएगी कि— समय पर कार्य करना ही जीवन को जीना है। व्यवहार में होता यह है कि हमारा मस्तिष्क अतीत की गोद में बैठा रहता है या फिर भविष्य में जाकर कल्पनाओं की उड़ाने भरता रहता है। वह अपना कीमती समय, जो वर्तमान में रहने से है, उसको नष्ट करता रहता है। जिसके परिणाम स्वरूप हम हमेशा तनाव, दबाव और चिंताओं में दबे रहते हैं। ।हमारा दम घुटता रहता है, हमारी चेतना सिसकती रहती है। हमारे कर्म की तेजस्विता घट जाती है। इसका सीधा और तत्काल प्रभाव हमारे भविष्य पर पड़ता है। इस प्रकार हम समय के महत्व को न समझने की नादानी कर बैठते हैं, जिससे हम समय को एक ऐसे दुष्चक्र का शिकार बना देते हैं कि—न तो भविष्य संवर पाता है और न ही हम वर्तमान समय को जी पाते हैं।

हमारा यह अमूल्य जीवन जो वर्तमान समय के असंख्य छोटे-छोटे टुकड़ों से जुड़कर बनता है, उसका सारा रस निचुड़ जाता है। उसके आनंद के सारे स्रोत सूख जाते हैं। क्या यह हमारे आज के जीवन की बड़ी विडंबना नहीं है? अपने जीवन के उन क्षणों को टटोलें, जिन क्षणों में आप वर्तमान समय पर मौजूद थे। उदाहरण के तौर पर दोस्तों के साथ मटरगश्ती करते हुए, गप्पे मारते हुए, सिनेमा देखते हुए, संगीत सुनते हुए, अपने बच्चे के जन्म की खबर या इसी तरह की कोई अच्छी सूचना सुनते हुए और कभी- कभी तो ऐसा होता है कि—आप अचानक अपने हाथ में एक लंबी खरोंच देखते हैं, लेकिन आपको पता ही नहीं होता कि यह खरोंच आपको कब और कहां लगी थी। यह सब जीवन के सच्चे एवं व्यवहारिक उदाहरण हैं कि— उन क्षणों में आप वर्तमान समय को जी रहे थे। आपकी चेतना की संपूर्ण ऊर्जा वर्तमान समय के एक बिंदु के अग्रभाग पर इतनी केंद्रित हो गई थी कि— आपको अपने आसपास का एहसास ही नहीं था, न तो आप अतीत में थे और न ही भविष्य में। आप पूरी तरह समय का लुत्फ उठा रहे थे। क्योंकि आप आनंदित थे और उन क्षणों में इतने खोए हुए थे की— खरोंच लगने वाले दर्द का एहसास ही नहीं हो पाया।

यदि हमारे पास बच्चे जैसा मन हो जाए और समय के सदुपयोग के प्रति पागलपन आ जाए तो हम हर क्षण को उत्सव के रूप में जीने लगेंगे। जब हम समय के महत्व की बात करते हैं, तो इसका स्वरूप लंबाई में नहीं होता। यह एक छोटे बिंदु से भी छोटा होता है। हां इसकी गहराई अनुमान से परे होती है। इसलिए वर्तमान समय को जीना इसकी गहराई में उतर कर ही संभव हो पाता है। लेकिन हम अपनी जवानी के समय को विश्राम के नाम पर नष्ट कर देते हैं। यह घोर मूर्खता है। क्योंकि यही वह समय है, जिसमें मनुष्य जीवन के भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठंडा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं, उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य का प्रयत्न व्यर्थ चला जाता है। विश्राम अवश्य करें। अधिक कार्य क्षमता प्राप्त करने के लिए विश्राम आवश्यक है, लेकिन उसका समय निश्चित करें।

समय बड़ा मूल्यवान है। उसे किफायत से व्यय करें। जितना समय रूपी धन को बचाकर, उसे आवश्यक उपयोगी कार्यों में लगाएंगे, उतनी व्यक्तित्व की महत्ता एवं हैसियत बढ़ेगी।आदत पड़ जाने पर स्वंय ही बड़ा आनंद आएगा। आपको अमुक दिन,अमुक गाड़ी में, अमुक जगह जाना है और आप गाड़ी की सीटी देने के एक मिनट बाद स्टेशन पहुंचे, तो फिर वह गाड़ी, वह दिन, वह समय कभी नहीं मिलेगा। निश्चित समय निकलने के बाद किसी दफ्तर में जाएं, तो निश्चित है, वह काम नहीं होगा। अपने काम और अपने समय में तालमेल बनाकर रखें तभी आप अपने समय का सही तरह से सदुपयोग कर पाएंगे।

आलस्य समय का सबसे बड़ा शत्रु है। यह कई रूपों में मनुष्य पर अधिकार जमाता है।कई बार कुछ काम किया कि विश्राम के बहाने हम अपने समय को बर्बाद करने लगते हैं, वैसे बीमारी, तकलीफ आदि में विश्राम करना बुरा नहीं है।लेकिन जैसे ही ठीक हो गए, तुरंत अपने काम में लग जाओ। समय की महत्ता का गुणगान करते हुए हमारे मनीषियों ने कहा है –कि समय को रेत की तरह हाथ से न फिसलने दो। जैसे रेत का एक-एक कण हमारे हाथ से फिसल जाता है और हमारे हाथ खाली हो जाते हैं। उसी तरह समय है, जो एक बार हमारे हाथ से छूट गया तो, फिर कभी वापस नहीं आएगा।

इसलिए वर्तमान समय का भरपूर आनंद उठाने के लिए हमें अपने विचारों को काबू करना होगा और इसकी विधि है— ध्यान। ध्यान यानी कि विचारों का एक बिंदु विशेष पर टिक जाना। विचारों के रुकते ही हमारी चेतना में जीवन ऊर्जा का संचार होने लगता है। उर्जा की यही अधिकता और सघनता हमें समय की गहराई की यात्रा पर ले जाती है। समय का यह अनुभव विचारों के द्वारा संभव नहीं हो सकता। इसके लिए ऊंचे स्तर की संवेदनशीलता की जरूरत होती है। हम अपने मन को हृदय में विलीन करके इस संवेदनशीलता को प्राप्त कर सकते हैं। आंतरिक रचनात्मक संघर्ष के बावजूद आप भी ऐसा कर सकने में सफल हो सकते हैं। जब एक बार हम अपने विचारों पर काबू पा लेते हैं, तो समय पर कार्य करने की आदत अपने आप बन जाती है और हम समय का सदुपयोग करना सीख जाते हैं।

40. जीवन मंथन

श्री गणेशाय नम्ः

श्री श्याम देवाय नम्ः

प्रत्येक मनुष्य कर्मों के अनुसार ही अपनी मनोवृत्ति एवं फल को प्राप्त करता है। कर्मों के अनुसार ही उसके भाग्य का निर्माण होता है। सृष्टिकर्त्ता ने सभी प्राणियों को उनके कर्मों के अनुसार शरीर दिए हैं। उसकी रचना को बिगाड़ने या मिटा देने का हमें कोई अधिकार नहीं है। सभी मनुष्य अपने कर्मों को करने के लिए स्वतंत्र हैं। पाप कर्मों में लिप्त मनुष्य अपने कर्मों के अपराध बोध के कारण अशांत रहता है। इसलिए उसमें नकारात्मक भाव जागृत होकर उसे तरह-तरह की व्याधियां घेर लेती हैं। नकारात्मकता उसके मानस-पटल पर अपना औचित्य स्थापित कर लेती है। वह लोभ के वशीभूत होकर, शास्त्रों की मर्यादा को तोड़कर,अन्याय द्वारा दूसरों की वस्तुओं पर जबरन कब्जा करने लगता है।वह पाप कर्मों में इतना लिप्त हो जाता है कि— उसे यह स्मरण ही नहीं रहता कि अनेक योनियों में,न जाने कितने भोगों को भोगा है। कितने पुण्य- कर्म किए हैं, तब जाकर हमें यह दुर्लभ मानव शरीर मिला है। इसे प्राप्त करने के बाद भी यदि हम पाप कर्मों में लिप्त रहे, हम धर्म विरोधी कार्य करते रहे, तो ये हमारे लिए ऐसी ही सिद्ध होंगे जैसे— किसी ने समुद्र में गोता लगाने के बाद भी मोतियों के स्थान पर कोड़ियां ही एकत्रित की हों, हम इस संसार में अपने कर्मों का पिटारा लेकर ही अवतरित हुए थे। यह धन- ऐश्वर्य हमारे साथ जाने वाला नहीं है। फिर क्यों व्यर्थ में इन अनावश्यक ईंट,पत्थरों और चंद्र धातु के टुकड़ों के लिए अपना अमूल्य जीवन नष्ट करें। दूसरी तरफ धर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य कर्मों के अनुरूप सकारात्मक स्थिति प्राप्त करता है। जिससे उसे परमानंद की अनुभूति होती है। परमानंद वास है— दिव्यता का, सभी देवों का। केवल मानव शरीर में ही इसे पाया जा सकता है।अपराध बोध से ग्रस्त मनुष्य संसार को नकारात्मक भाव एवं अशांति में ही छोड़ता है। जबकि धर्म मार्ग पर चलकर मनुष्य परम शांति की स्थिति में परमानंद में बिना मानसिक कष्ट के विलीन हो जाता है और यह अटल सत्य है कि— नए जन्म में जीव अपने पुराने कर्मों के अनुसार अपनी मनोवृत्ति प्राप्त करता है। धर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, मान-अपमान, सुख-दुख, हर्ष- शोक इत्यादि द्वन्द्वों को सहन करते हुए, अपने पथ पर निरंतर आगे बढ़ता जाता है। जैसे कुशल सारथी, चंचल घोड़ों को उबड़-खाबड़, ऊंची- नीची भूमि पर चलाता हुआ रथ को अपने गंतव्य स्थल तक पहुंचाने में सफल होता है, उसी प्रकार धर्म परायण व्यक्ति भी अपने जीवन में आने वाले सभी अवरोधों को पार करते हुए निरंतर अपने कर्त्तव्य पथ पर अडिग रहकर आगे ही बढ़ता जाता है।धर्म के मार्ग पर चलते हुए,जिसने तप के द्वारा अपने शरीर को तपाकर कष्टों को सहन करने योग्य नहीं बनाया वह कच्चा है। जैसे कच्चे घड़े में पानी नहीं ठहरता, उसी भांति बिना कष्टों के धर्म के मार्ग पर नहीं चला जा सकता। सनातन धर्म में वर्णित सागर मंथन की कथा हर युग में प्रासंगिक है। इसमें देवताओं ने अमृत और राक्षसों ने मदिरा पान किया था। वह अमृत और मदिरा अपनी प्रवृत्ति से पाता है। इस प्रसंग में स्वयं भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर राक्षसों को मदिरा का पान कराया था। यहां मदिरा से मेरा तात्पर्य नकारात्मक प्रवृत्ति से है। यह नकारात्मक प्रवृत्ति ही राक्षस रूप है। जो मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त करता है, तथा अपने कर्मों की मदिरा पीकर अपना विनाश करता है। सागर मंथन की कथा के अनुसार देवताओं ने अमृत का पान किया था। यह सकारात्मकता की ओर संकेत करता है। धर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य अमृत पीने का अधिकार रखता है। अपने आचरण को धर्म के अनुसार रखने वाला मनुष्य सम योग की स्थिति में रहकर सदैव परमपिता से जुड़कर अमृत रूपी शांति तथा परम आनंद का अनुभव करता है।मानव जीवन रूपी सागर मंथन की यह सबसे बड़ी मणियां, मोती उसे प्राप्त हो जाती हैं। अंतिम क्षणों में अक्सर प्रत्येक मनुष्य इस तत्व को महसूस करता है —कि मैंने जीवन रूपी समुद्र मंथन में नकारात्मक कर्म रूपी मदिरा क्यों चुनी? लेकिन शिशु हाथी की तरह हम सभी भी अपने जीवन में कई मानसिक विकारों से ग्रसित होते हैं, जो हमारी सफलता के रास्ते में बहुत बड़े अवरोध उत्पन्न करते हैं। जैसे हाथी के बच्चे को शुरू में मोटी जंजीरों से बांधा जाता है। वह उस जंजीर को तोड़कर स्वतंत्र होने के लिए जी जान से प्रयास करता है। लेकिन असफल रहता है। शिशु हाथी के जीवन की यही हार भविष्य में उसकी नियति बन जाती है। बड़ा होने पर चाहे उसे किसी धागे से भी क्यों नहीं बांधा जाए, वह उसे तोड़कर आजाद होने के लिए प्रयास ही नहीं करता। इसी प्रकार हम भी इस भौतिक संसार की मोह माया रूपी जकड़न से अपने आप को स्वतंत्र नहीं करा पाते और स्वयं को अत्यंत असहाय महसूस करते हैं। जबकि सत्कर्म के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य को परम शांति की अनुभूति होती है। मनुष्य को इस अटल सत्य को समझकर जीवन रूपी सागर मंथन में अमृत की ही खोज करनी चाहिए। उसे अपने कर्तव्य पथ से विचलित ने होकर आगे ही बढ़ता रहना चाहिए और अपने अमूल्य जीवन को सफल बनाना चाहिए।

39. कर्म मार्ग

हमारे जीवन में कर्म की बड़ी महत्ता है। कर्म ही जीवन का आधार है। कर्म ही सृष्टि का आधार है। कर्म हमारे जीवन की वह नींव है, जिससे हमारे भाग्य कर निर्धारण होता है। कर्म के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। फिर कर्म किए बिना कोई कैसे रह सकता है?स्वयं श्री कृष्ण ने गीता में कहा है— तू कर्म कर, फल की चिंता मत कर अर्थात् स्वयं ईश्वर भी कर्म से रहित नहीं हो सकते। लेकिन हम फल की इच्छा से जो कर्म करते हैं, तो हमें निराशा ही हाथ लगती है। निराश व्यक्ति तनाव का शिकार हो जाता है। जिससे उसके मन-मस्तिष्क में अच्छे-बुरे का भेद करने की क्षमता खत्म हो जाती है। इसका एक उदाहरण देती हूं— दार्शनिक सुकरात का नाम आपने जरूर सुना होगा। कहा जाता है कि— वह बहुत बदसूरत थे, लेकिन सुबह उठकर सबसे पहले आईने में खुद को जरूर देखते थे। कहा जाता है कि— उन्होंने इसका कारण यह बताया था कि— आईने में, मैं रोज सबसे पहले अपनी बदसूरती देखता हूं, इससे मुझे ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है, जिससे मैं अपने कर्मों से अपने अंदर समाहित गुणों को, इतना निखार सकूं कि— वे मेरी बदसूरती पर भारी पड़ जाए।जब उनसे पूछा गया कि— तब तो सुंदर लोगों को आईना नहीं देखना चाहिए, तो सुकरात ने कहा— आईना उन्हें भी देखना चाहिए, ताकि वह अनुभव करें कि उनके गुण भी उतने ही सुंदर हों, जितना उनका शरीर है। लेकिन उन गुणों को पहचानने के लिए, निखारने के लिए, कर्मों का बहुत बड़ा योगदान होता है। अगर हम कोई कार्य करेंगे ही नहीं तो हम उस में कुशलता कैसे प्राप्त करेंगे। निष्काम भाव से कर्म करते हुए हमें जीवन-रूपी नौका को पार लगाने का प्रयास करना चाहिए।लेकिन मनुष्य के कर्म, पाप और पुण्य दोनों प्रकार के होते हैं। कर्म बंधन का कारण भी है और बंधन से मुक्ति का कारण भी। अशुभ कर्म बंधन का कारण है, तो शुभ कर्म बंधन से मुक्ति का कारण है। जाहिर है यदि हमें अपने जीवन में बंधनों से मुक्त रहना है द्वंद्वो से मुक्त रहना है, दुखों से मुक्त रहना है और सदा आनंदित रहना है तो हमारे कर्म निष्काम होने चाहिए।हमारे प्राचीन ऋषि मुनि और सिद्ध पुरुषों ने कर्म को इतनी व्यापकता से समझाया कि सदैव कर्म करने में हमारी आसक्ति बढ़ जाती है। हम सदैव शुभ कर्म, पुण्य कर्म तो करें हि, पर सिर्फ इतना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि कामना एवं आसक्ति के लिए किए गए पुण्य कर्म एवं शुभ कर्म भी अंतत: हमारे लिए बंधन का ही कारण बनते हैं। दुखों का कारण बनते हैं। कामना एवं आसक्तिपूर्ण कर्म भी हमारे आनंद में बाधक होंगे।हमारी मुक्ति एवं मोक्ष में बाधक होंगे। प्रभु भक्ति में बाधक होंगे। इसलिए हमें शुभ कर्म करना तो है पर कामना रहित होकर, अनासक्त होकर, कर्म में कर्त्ता पन की भावना से मुक्त होकर।कर्म मार्ग पर चलते हुए हमें ईश्वर के गुणों में प्रीति उसके गुणों का कीर्तन-स्तुति तथा अपने को सर्वथा ईश्वर के अधीन मानकर समस्त कर्म और उनका फल भगवान को समर्पित कर देना, ईश्वर के प्रत्येक विधान में संतुष्ट रहना तथा निरंतर उनके नाम का स्मरण करते हुए ही कर्म करना चाहिए। हम जीवन में सफल हों या असफल, हमें अविचलित नहीं होना चाहिए। जीवन में मान मिले या अपमान हर्ष हो या विषाद दोनों में सम रहकर, दोनों ही स्थिति में अविचलित रहकर हमें कर्म को ही प्रधानता देनी चाहिए। जब हम स्वयं को कर्म के परिणाम से जोड़ लेते हैं, कर्म फल से जोड़ लेते हैं, तो हम सदैव ही सुख और दुख के झूले में झूलते रहते हैं। क्योंकि हमारे कर्म का परिणाम अगर हमारी आशा के अनुरूप आता है, तो हम खुशी से गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं, लेकिन हमारी आशा के अनुरूप नहीं आता तो हम तनाव और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। हमें अपने कर्मों में, कर्म फल की आशा,आसक्ति का त्याग करना चाहिए क्योंकि निष्काम कर्म करके ही हम अपने जीवन में आनंद की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।