148. दिव्य दृष्टि

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन की सार्थकता इसी में है कि— मनुष्य को दूरदर्शिता का ज्ञान हो।
दूरदर्शिता का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ होता है कि— दिव्य दृष्टि का जागृत हो जाना।
इसके बिना मनुष्य के जीवन के उद्देश्य का पता ही नहीं चलता। अपनी अंतर्दृष्टि को जागृत करके मनुष्य आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होते हुए महापुरुषों की श्रेणी मे खड़ा करना ही दूरदर्शिता कहलाता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईश्वर ने हमें मनुष्य का अमूल्य एवं दुर्लभ शरीर प्रदान किया है। मात्र पेटपूजा, कामवासना के दलदल में डूबे रहना मनुष्य की अदूरदर्शिता है, जो जीवन के पतन का मार्ग है। इस मानव शरीर में अमूल्य रत्नों से भी कीमती विभूतियों और कुबेर का भंडार भरा पड़ा है।

साधारणतः मनुष्य अपने जीवन को लोभ, मोह, स्वार्थ, माया, वासना, कामना तक ही सीमित रखता है, लेकिन दिव्य दृष्टि के जागृत होते ही वह व्यक्ति अपने जीवन को परमार्थ में लगा देता है। ऐसा व्यक्ति साधारण, तुच्छ, निंदनीय, निरर्थक जीवन से ऊपर उठ जाता है और महान गौरव का पद प्राप्त करने में समर्थ बन जाता है। भविष्य में घटित होने वाली अनहोनी घटना का पता दिव्य दृष्टि द्वारा ही संभव हो पाता है। जिसे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है, उसे भविष्य का युग दृष्टा कहा जाता है।

एक समय की बात है कि—
संत नामदेव अपने शिष्यों के साथ प्रतिदिन की तरह धर्म चर्चा में लीन थे। वे अपने शिष्यों को दिव्य दृष्टि के बारे में उपदेश दे रहे थे। अपने शिष्यों को समझा रहे थे कि—
एक बार जब दिव्य दृष्टि जागृत हो जाती है तो फिर संसार की कोई भी वस्तु अदृश्य नहीं रहती।
तभी एक शिष्य ने प्रसन्न किया— गुरुदेव! दिव्य दृष्टि के जागृत होने के पश्चात् क्या हम श्री हरि के दर्शन भी कर सकते हैं।
गुरुदेव ने कहा — क्यों नहीं वत्स! दिव्य दृष्टि के द्वारा ही हम सच्चिदानंद स्वरूप ईश्वर के साक्षात् दर्शन करने में समर्थ होते हैं।
तभी एक दूसरे शिष्य ने प्रश्न किया — गुरुदेव! तो क्या हम ईश्वर को ऐसे ही देख पाएंगे जैसे आपको देखते हैं? ऐसे ही बातें करेंगे जैसे आप से करते हैं? आप कहते हो कि ईश्वर हर जगह मौजूद है पर वह दिखाई तो कहीं नहीं देता तो क्या दिव्य दृष्टि के जागृत होने पर वह हमें हर जगह दिखाई देंगे? क्या आप उनकी प्राप्ति का यही उपाय हमें बता रहे हो।

अपने शिष्य के मुख से यह सब सुनकर संत नामदेव मुस्कुराए, फिर उन्होंने उसे एक लोटा पानी और थोड़ा-सा नमक लाने को कहा।
वहां पर बैठे हुए सभी शिष्यों की उत्सुकता बढ़ गई थी। वह सोचने लगे, पता नहीं उनके गुरुदेव कौन- सा प्रयोग करना चाहते हैं।
जब वह शिष्य नमक और पानी को लेकर आ गया, तब संत ने नमक को पानी में छोड़ देने को कहा।
जब नमक पानी में घुल गया तो संत ने पूछा— बताओ क्या तुम्हें इसमें नमक दिखाई दे रहा है।
शिष्य ने कहा— नहीं, गुरुदेव! नमक तो इसमें घूल गया है। संत ने उसे कहा—पानी को चख कर बताओ।
शिष्य ने पानी चखा और कहा—पानी तो नमकीन हो गया है। नमक इसमें पूरी तरह से मिल गया है। दिखाई नहीं दे रहा।
अब संत ने उस पानी को उबालने को कहा। जब सारा पानी भाप बनकर उड़ गया तो संत ने पूछा— क्या इसमें नमक दिखाई देता है?
शिष्य ने गौर से लौटे को देखा और कहा— हां गुरुदेव!
अब इसमें नमक दिखाई दे रहा है।
संत ने समझाया— जिस तरह नमक पानी में होते हुए भी दिखाई नहीं देता, उसी तरह ईश्वर सर्वव्यापी होने पर भी कहीं दिखाई नहीं देते। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है। जिस तरह पानी को गर्म करने नमक पा लिया, उसी प्रकार दिव्य दृष्टि को जागृत करके ईश्वर से साक्षात्कार किया जा सकता है।

147. भगवत कृपा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण मानव को स्पष्ट संदेश देते हैं— तू सच्चे मन से मेरी शरण में आकर तो देख, मुझ पर विश्वास करके तो देख, फिर देखना तेरे समस्त कार्य में करूंगा, तेरे कुशल-क्षेम की रक्षा भी मैं ही करूंगा। तुझे कोई तकलीफ नहीं होने दूंगा।
सुग्रीव, विभीषण तथा आधुनिक काल में मीराबाई के उदाहरणों से भगवान की इस कृपा को बखूबी समझा जा सकता है।
पांडव पांच थे और कौरव सौ थे। इसके अलावा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, अंगराज कर्ण, महाबली अश्वत्थामा, कुलगुरु कृपाचार्य आदि महान योद्धा दुर्योधन की सहायता के लिए हर समय उपस्थित रहते थे। वे सभी उस समय के महानतम योद्धाओं की श्रेणी में आते थे। पांडवों की सेना 7 अक्षोहिणी और कौरवों की 11 अक्षोहिणी थी और तो और श्रीकृष्ण की नारायणी सेना भी दुर्योधन के पक्ष में थी जो सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होने के साथ-साथ उनमें पारंगत भी थी। यह सब कुछ होने के बावजूद भी कौरव, पांडवों का कुछ नहीं बिगाड़ पाए और युद्ध में पराजित हो गए।

इतनी बड़ी सेना और बलशाली योद्धाओं के होने पर भी पराजित होना, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? तो स्पष्ट पता लगता है की कौरवों के ऊपर भगवत कृपा नहीं थी। दूसरी तरफ पांडवों के पास भगवत कृपा थी और यह कृपा असंभव को भी संभव बना देती है। यह ऐसे-ऐसे चमत्कार कर देती है जिसके बारे में मनुष्य सोच भी नहीं सकता, उसको वह चरितार्थ कर देती है। भगवत कृपा के कारण ही पांडवों को विजय श्री प्राप्त हुई। इसको नकारा नहीं जा सकता। जिसके सारथी स्वयं नारायण हों, उनको भला कौन पराजित कर सकता है?

एक बार देवताओं में अहंकार बहुत बढ़ गया। अग्नि देव, वायु देव और इंद्र देव आदि को अपनी शक्ति का अभिमान हो गया और वे अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। वह भूल गए कि नारायण की शक्ति के बगैर उनका कोई महत्व नहीं है। नारायण ने उनके अभिमान को तोड़ने के लिए लीला रची।
उसने अग्नि देव को यक्ष के पास भेजा।
यक्ष ने पूछा— तुम कौन हो?
अग्निदेव ने कहा—मैं अग्निदेव हूं! मेरे अंदर इतनी शक्ति है कि इस संसार के सारे पदार्थों को मैं जला सकता हूं।
यक्ष ने उन्हें एक तिनका दिया और कहा— इसको जला कर दिखाओ।
अग्निदेव ने कहा— इस तिनके की क्या औकात है? मैं तो सारे संसार को जलाने की शक्ति रखता हूं।
यक्ष ने कहा—अगर इस तिनके को जला दिया तो मैं आपकी शक्ति को मान लूंगा।
अग्निदेव ने अपना पूरा जोर लगाया लेकिन वह उस तिनके को जला न सका।
अग्नि देव का अहंकार चूर-चूर हो गया।
तत्पश्चात् वायु देव यक्ष के पास गए।
यक्ष ने उनसे भी यही प्रश्न किया कि— आप कौन हो?
वायु देव ने कहा— मैं वायु देव हूं! मैं पृथ्वी की किसी भी वस्तु को उड़ा सकता हूं‌।
यक्ष ने वही तिनका वायु देव को दिया और कहा—यह तिनका उड़ा कर दिखाओ।
वायु देव ने अपना पूरा जोर लगाया लेकिन वह भी उस तिनके को उड़ा नहीं सका।
अब इंद्रदेव की बारी थी।
यक्ष ने इंद्रदेव से भी वही प्रश्न किया कि— आप कौन हो? इंद्रदेव ने कहा— मैं इंद्र देव हूं! मैं इतनी बारिश कर सकता हूं, जिसके कारण पृथ्वी पर प्रलय आ जाएगी और सब कुछ जलमग्न हो जाएगा।
यक्ष ने वही तिनका इंद्रदेव को दिया और कहा— इसे पानी में डुबोकर दिखाओ।
इंद्रदेव ने अपना पूरा जोर लगाया लेकिन वह तिनके का कुछ न बिगाड़ पाया।

इस घटना से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि— ईश्वर जब देवताओं से अपने शक्ति खींच लिया करते है, तब यह देवता भी निस्तेज हो जाते हैं। पर्वत, वृक्ष आदि जो भी स्थिर हैं, इन सभी का वजूद तब तक है, जब तक इन पर भगवत कृपा है। ईश्वर की शक्ति के जाते ही यह सब धराशाई हो जाएंगे। युद्ध के पश्चात् श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले रथ से नीचे उतारा क्योंकि वे जानते थे की जब तक वे स्वयं रथ पर विराजमान हैं, तब तक रथ सही सलामत है। लेकिन जैसे ही वे रथ को छोड़ देंगे तो वह जलकर भस्म हो जाएगा। इसलिए उन्होंने पहले अर्जुन को नीचे उतर जाने को कहा। उसके पश्चात् स्वयं नीचे उतरे और उनके उतरते ही रथ जलकर भस्म हो गया क्योंकि उस रथ पर भगवत कृपा थी और जैसे ही ईश्वर की कृपा ने उसका साथ छोड़ा वह धराशाई हो गया।

146. सच्चा ज्ञान

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक बार अर्जुन ने वासुदेव से पूछा—
मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है और फिर पाप का फल भोगने के लिए 84 लाख योनियों में भटकता रहता है? जब उसको पता है कि— पाप करने से उसको सद्गति प्राप्त नहीं होगी, फिर भी वह पाप करता है।
हे वासुदेव! मनुष्य ऐसा क्यों करते हैं?

श्री कृष्ण ने कहा— मनुष्य की कामना, उससे यह पाप करवाती है और कामना से उत्पन्न होने वाला क्रोध तथा लोभ मनुष्य को पाप करने की तरफ धकेलते हैं। जिस कारण मनुष्य की दुर्गति होने लगती हैं।
मनुष्य के मन में, इंद्रियों में, बुद्धि में अहम् और विषयों की कामना का वास होता है। कामना ही मनुष्य की बहुत बड़ी दुश्मन है। उसके पतन का कारण है।

वासुदेव पुनः कहते हैं— हे पार्थ! ज्ञान रूपी तलवार से इसका भेदन करना चाहिए। सच्चा ज्ञान ही उसे इस पाप से छुटकारा दिला सकता है। मनुष्य के कर्म उसके बंधन का कारण बनते हैं, लेकिन वही कर्म यदि दूसरों की भलाई के लिए किए जाते हैं तो उसकी मुक्ति का कारण भी बन जाते हैं। कर्म यदि स्वार्थ की भावना से करें, कामना से करें तो वह बंधन है और दूसरों के कल्याण के लिए निष्काम भाव से करें तो वही कर्म मुक्ति का कारण बनते हैं।

किसी भी विषय के संबंध में जानकारी प्राप्त कर लेना ही ज्ञान नहीं है। कहीं से कुछ ग्रहण कर लिया और थोड़ा बहुत सीख लिया तो वह सच्चा ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञान प्राप्त करने की एक विशेष विधि होती है। उसका अनुसरण करके ही सच्चा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

अक्सर क्या होता है कि— मनुष्य कुछ इधर-उधर से पढ़ लेता है, कुछ कहीं से सुन लेता है और अपने मस्तिष्क में संकलित कर लेता है। फिर वह अपने आप को ज्ञानी समझने लगता है और दूसरों को भी ज्ञान बांटना शुरू कर देता है। लेकिन इस प्रकार के ज्ञान से उसकी आत्मा को कोई लाभ नहीं होता और न ही इससे वह दूसरों का कल्याण कर पाता है। ऐसे ज्ञान का कोई भी प्रभाव किसी पर नहीं पड़ता। हां वह स्वयं को संतुष्ट अवश्य कर लेता है।

दूसरों के विचारों को समाज के सामने अपना बताकर परोसना स्वयं के साथ-साथ दूसरों का भी अहित करना है। इससे मनुष्य पाप का भागी बनता है। चोरी तो चोरी होती है। चाहे वह धन की हो, वस्तु की हो या फिर किसी के विचारों की। सच्चा ज्ञान प्राप्त करने से ही मनुष्य का कल्याण होता है। इसमें कोई खर्च भी नहीं आता। यह मुक्ति का सीधा मार्ग है। हमें सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपनी कामनाओं की आहुति डालकर ईश्वर की शरण में जाना चाहिए।

145. ग्रंथों में स्वास्तिक की प्रमाणिकता/ प्रयोग

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

बाल्मीकि रामायण में भी स्वास्तिक का उल्लेख मिलता है। रामायण के अनुसार—
सांप के फन के ऊपर उपस्थित नीली रेखा भी स्वास्तिक का पर्याय है।
नादब्रह्म से अक्षर तथा वर्णमाला बनी, मातृका की उत्पत्ति हुई। नाद से ही पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी वाणियां उत्पन्न हुई। तदुपरांत उनके भी स्थूल तथा सूक्ष्म दो भाग बनें। इस प्रकार नाद सृष्टि के छः रुप हो गए। इन्हीं छः रूपों में, पंक्तियों में, स्वास्तिक का रहस्य छिपा है। अतः स्वास्तिक को समूचे नादब्रह्रम तथा सृष्टि का प्रतीक एवं पर्याय माना जा सकता है।

एक इतिहासज्ञ का कथन है कि—

सातवीं शताब्दी में स्वास्तिक का चिन्ह मवेशियों पर दाग दिया जाता था। विक्रम से 200 वर्ष पहले के बने हुए एक स्वर्ण पात्र के ऊपर भी स्वर्ण पात्र बना हुआ पाया गया है। इस पात्र में ब्राह्मीभूत भगवान बुद्ध देव की अस्थि रखी हुई मिली हैं। 2600 वर्ष के प्राचीन यूनानी बर्तनों पर भी स्वास्तिक के चिन्ह पाए गए हैं।

अत्यन्त प्राचीन स्वास्तिक का चिन्ह एक चरेर्व पर बना हुआ मिला है जो ट्रोय के तीसरे नगर से प्राप्त हुआ है और जो प्रायः 3800 वर्ष पुराना बताया जाता है।

भारत सरकार की पुरातत्व विभाग की अन्य कई महत्वपूर्ण खोजें भी स्वास्तिक की प्राचीनता और पवित्रता के प्रमाणों पर अच्छा प्रकाश डालती हैं।

आई-आई-टी खड़गपुर—

वहां के वरिष्ठ प्रोफ़ेसरों द्वारा आयोजित एक सभा में प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों को समकालीन विज्ञान के साथ मिश्रित करने का प्रयास किया गया। इन लोगों ने स्वास्तिक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई। इस प्रोग्राम को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्रायोजित किया था।
शोधकर्ताओं ने बताया कि—
उन्होंने विश्व को 9 खण्डों में बांटने के बाद भारत से स्वास्तिक को कहां ले जाया गया, के निशानों का फिर से पता लगाया है और वे प्राचीन मोहरों, शिलालेखों, छापों आदि के माध्यम से अपने दावे को स्पष्ट रुप से सिद्ध करने में सक्षम हैं।

स्वास्तिक बनाते समय रखें ध्यान कुछ बातों का—

घर में कभी भी उल्टा स्वास्तिक नहीं बनाया जाता। इस बात का हमेशा ध्यान रखें। उल्टा स्वास्तिक मंदिरों में बनाने की प्रथा है। वह भी अपनी किसी मनोकामना की प्राप्ति के लिए। जब आपकी मनोकामना पूरी हो जाए तो मंदिर में जाकर सीधा स्वास्तिक बनाएं।

स्वास्तिक कभी भी आडा-टेढ़ा नहीं बनाना चाहिए। यह एकदम सीधा और सुंदर बनाना चाहिए।

घर में स्वास्तिक जहां बनाना हो, वहां बिल्कुल साफ- सफाई हो, इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।

पूजा में हल्दी से स्वास्तिक बनाने से वैवाहिक जीवन में आ रही परेशानियां दूर होती हैं।

अन्य मनोकामनाओं के लिए कुमकुम का स्वास्तिक बनाकर पूजा की जाती है।

स्वास्तिक का मुंह हमेशा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।क्योंकि उत्तर दिशा को धन के देवता, कुबेर की दिशा माना जाता है। इसलिए इस दिशा में स्वास्तिक बनाने से धन लाभ होता है।

स्वास्तिक सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। जिससे दैविय शक्तियां आकर्षित होती हैं। इसलिए दरवाजे पर स्वास्तिक बनाने की परंपरा है।

स्वास्तिक का बॉर्डर बनाने के बाद उनके बीच चारों खाली जगह पर चार बिंदी अवश्य लगाएं।

स्वास्तिक चिंह केवल लाल रंग में ही क्यों बनाया जाता है?

भारतीय संस्कृति में लाल रंग को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिंदूर, रोली या कुमकुम के रूप में किया जाता है। लाल रंग शोर्य एवम् विजय का प्रतीक है। लाल रंग प्रेम, रोमांस एवं साहस को भी दर्शाता है। धार्मिक महत्व के अलावा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी लाल रंग को सही माना जाता है।

शारीरिक व मानसिक स्तर पर—
लाल रंग व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। हमारे सौर मंडल में मौजूद ग्रहों में से एक मंगल ग्रह का रंग भी लाल है। यह एक ऐसा ग्रह है जिसे साहस, पराक्रम, बल व शक्ति के लिए जाना जाता है। यही कुछ कारण हैं, जो स्वास्तिक बनाते समय केवल लाल रंग के उपयोग की ही सलाह दी जाती है।

यही सभी तथ्य हमें बताते हैं कि केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में स्वास्तिक ने अपनी जगह बनाई है। फिर चाहे वह सकारात्मक दृष्टिकोण से हो या नकारात्मक दृष्टि से। परंतु भारत में स्वास्तिक चिंह को हमेशा से ही सम्मान दिया गया है और इसको विभिन्न रुपों में इस्तेमाल किया गया है। अगर गौर किया जाए तो स्वास्तिक जैसा एक छोटा-सा धार्मिक चिन्ह ना केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में प्रचलित और समान रूप से पूज्य है। इसका प्रसार एवम् प्रभाव ही यह प्रमाणित करता है कि संपूर्ण विश्व ही उस परम- पिता परमात्मा की कर्मस्थली है।

विश्व-बंधुता की भावना के साथ, स्वास्तिक यह भी संकेत करता है कि—
विश्व का हर धर्म एक ही भावना जो विश्व कल्याण है—
के लिए जन्मा है और कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। स्वास्तिक में व्यष्टि और समष्टि के कल्याण का भाव समाहित है। स्वास्तिक विश्व के प्राणियों को कल्याण की ओर ले जाने का अपूर्व और अमर संदेश देता है। स्वास्तिक अनादि है, अभेद्ध है, अनंत है।

144. स्वास्तिक का पौराणिक इतिहास/कलंक को हटाने की कोशिश

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

*जर्मन अत्याचार के कलंक को मिटाने की कोशिश—

वर्ष 2013 में 13 नवंबर को कोपेनहेगन में स्वास्तिक दिवस मनाया गया। जहां दुनियाभर से टैटू कलाकार स्वास्तिक को पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए इकट्ठा हुए। आयोजकों का कहना था कि—
हिटलर की पार्टी ने इस चिन्ह पर धब्बा लगा दिया, उसे साफ करने की जरूरत है। स्वास्तिक पर लगे नाजी धब्बे को धोने के लिए दुनिया भर में प्रयास हो रहे हैं। भारत जो स्वास्तिक को अपना प्रतीक मानता है वह भी पीछे नहीं।विदेशों में रह रहे भारतीय स्कूलों और धार्मिक स्थलों पर इस प्रतीक की महत्ता समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

*यूक्रेन—

यूक्रेन के नेशनल म्यूजियम में झांके तो इसकी झलक मिल जाती है। इस म्यूजियम की सबसे कीमती चीजों में से एक है—
एक चिड़िया की प्रतिकृति। वर्ष 1908 में रूस की सीमा के पास खुदाई में मिली। इस आकृति की धड़ पर स्वास्तिक का चिन्ह है जो लगभग 12000 साल पुराना बताया जा रहा है। यूक्रेन की राजधानी कीव में इस तरह के अनेक प्रतीक मिलते रहे हैं। यही वजह है कि—
जब नाजियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यहां कब्जा किया तो उन्हें यकीन हो गया कि ये उनके आर्य पूर्वजों की निशानियां हैं जो किसी तरह से यहां आ गई। युद्ध खत्म होने के बाद जर्मन सेना यूक्रेन से इन प्रतीकों को लेकर वापस लौटी।

*ग्रीक में घर सजाने के लिए भी इस्तेमाल—

इसके प्रमाण 12वीं सदी के अवशेषों से मिलते हैं। यहां इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि— द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक स्वास्तिक की लोकप्रियता, उसका महत्व, उसके प्रति आस्था कितनी रही होगी कि— एम्ब्रायंडरी में भी स्वास्तिक बनाया जाता था। ऐसी मान्यता थी कि—
स्वास्तिक बने हुए कपड़े पहनने से खुशकिस्मती आएगी।पश्चिम में स्वास्तिक को फासीवाद से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन हजारों वर्षों से इसे सौभाग्य के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है ।

*यूरोप—

नाजियों के आने से पहले के यूरोप के इतिहास की बातें अब सामने आ रही हैं और इसके साथ ही ये सवाल भी पूछा जाने लगा है कि—
क्या यह प्राचीन प्रतीक अपने साथ जुड़ी नकारात्मक बातों से कभी मुक्त होगा ?

*पश्चिम से एशिया की यात्रा करने वाले लोग इसकी सकारात्मकता से प्रभावित हुए और वापिस लौट कर उन्होंने इसका इस्तेमाल शुरू किया। 20 वीं सदी की शुरुआत तक इसकी लोकप्रियता सनक की हद तक बढ़ गई थी।

*अमेरिका के स्टीवन हेलर ग्राफिक डिजाइन पर”द स्वास्तिक :सिंबल बियांड रिडेम्पशन” नाम से एक किताब लिख चुके हैं ।
उन्होंने अपनी किताब में इस बात पर रोशनी डाली है कि— पश्चिम में वास्तु कला, विज्ञापन और उत्पा‌‌दों के डिजाइनों में स्वास्तिक को किस तरह से अपनाया गया है।
उन्होंने कहा —
कोका – कोला में इसका इस्तेमाल किया ।
*काल्र्जवैर्ग बियर की बोतलों पर इसे लगाया ।
*द ब्वाय स्काउट्स ने इसे अपनाया।
*गर्ल्स क्लब ऑफ अमेरिका ने अपनी मैगजीन का नाम स्वास्तिक रखा, यहां तक कि—
उन्होंने अपने नौजवान पाठकों को इनाम के तौर पर स्वास्तिक चिन्ह भेंट किए।

*फासीवाद का दंश— कोपनहेगन में ही टैटू पार्लर चलाने वाले पीटर मैेडसेन कहते हैं —
“स्वास्तिक प्रेम का प्रतीक था। लेकिन हिटलर ने इसका खराब इस्तेमाल किया। अगर हम लोगों को स्वास्तिक का वास्तविक अर्थ समझा पाएं तो हम फासीवादियों से इसे छीन सकते हैं। “
लेकिन इसके साथ ही फ्रेडी नॉलर जैसे लोग जिन्होंने फासीवाद का दंश झेला है, उनके लिए स्वास्तिक से प्यार करना सीखना आसान काम नहीं होगा।

*सौभाग्य सूचक स्वास्तिक पर कलंक—

हंकेन क्रूएज 2005 में इसे पूरे यूरोप में प्रतिबंधित किए जाने का नाकाम प्रयास किया गया। उस समय ब्रिटेन, भारत सहित कई देशों की सरकारों ने इस पर एतराज जताया था। जिससे इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका।

*2015 में अमेरिका ने भी स्वास्तिक को प्रतिबंधित करने की कोशिश की पर अनेक देशों और भारतीय संस्कृति से जुड़े संगठन पुरजोर तरीके से विरोध के साथ-साथ सौभाग्य के प्रतीक स्वास्तिक के पक्ष में विश्व को आगाह करने का प्रयास कर रहे हैं।

*ब्रिटेन स्थित हिंदू फोरम के रमेश कालीदयी ने स्वास्तिक के बारे में जागरूकता लाने के लिए पूरे ब्रिटेन में सेमिनार आयोजित किए जाने की घोषणा की।
*उन्होंने बताया कि— जिस चिन्ह को हम पिछले 5000 साल से प्रयोग करते आ रहे हैं, वह नाजियों के साथ जुड़ने के कारण आज प्रतिबंधित होने की कगार पर है। हिंदू इसे अपने धर्म का एक हिस्सा होने के कारण आगे भी इसे प्रयोग करना चाहते हैं। लेकिन नाजियों द्वारा इसके प्रयोग से लगने वाले संभावित प्रतिबंध के बाद, हिंदुओं के लिए भी इसका प्रयोग करना मुश्किल हो जाएगा।

143. रामनवमी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

रामनवमी हिंदुओं का सामाजिक और सांस्कृतिक पर्व है। इस दिन जन-जन के मन में बसने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न के शुभ मुहूर्त बेला में भगवान श्रीराम ने एक शिशु के रूप में माता कौशल्या की गोद में अवतार लिया था।

श्री राम हम सब भारतीयों के रोम- रोम में बसते हैं। वे सिर्फ हमारे आराध्य देव ही नहीं है बल्कि हम में से प्रत्येक मनुष्य को मुश्किलों के बीच में जीवन जीने की राह दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि— ऐसा उन्होंने कहा नहीं है बल्कि अपने जीवन में करके दिखाया। जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आए, अशांत नहीं होते, अपने पथ से भटकते नहीं, कर्म से विचलित नहीं होते और न ही अपने को निराश होने देते हैं। धैर्य धारण करके स्वयं को संयमित रखते हुए, शांति के साथ जीवन में आगे बढ़ते जाते हैं और हर मुश्किल पर विजयश्री प्राप्त करते हैं।

श्री राम का जीवन संघर्ष को दर्शाता है। मनुष्य के जीवन में उतार- चढ़ाव आते ही रहते हैं। कभी वह दुखों रुपी भयंकर अग्नि में जलता है तो कभी चंद्रमा की शीतलता के समान सुख रूपी छाया भी प्राप्त होती है। दुख रुपी कांटो की डगर पर चलते हुए जब वह पराक्रम, साहस और धैर्य से हर कठिनाई को पार कर लेता है, तभी वह युग-दृष्टा या युगपुरुष कहलाता है और ऐसे ही ऐसे ही युगपुरुष हुए हैं— श्री राम।
जिनका पूरा जीवन कठिनाइयों और मुश्किलों से होकर गुजरता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन पिता, पुत्र, पति, भाई, सखा व प्रजा के हित में समर्पित कर दिया। जीवन को साक्षी भाव से तटस्थ मुद्रा में देखते हुए सिर्फ कर्म पर जोर दिया। कभी भी वे क्रोध के वशीभूत होकर विचलित नहीं हुए।

श्री राम राजसी वैभव को त्याग कर पिता की आज्ञा पाकर वन चले जाते हैं। वनवास के दौरान उन्होंने प्रकृति को बहुत नजदीक से देखा, उसे निहारा और अनुभव किया। पशु- पक्षियों और जीव-जंतुओं से प्रेम किया। वृक्षों से संवाद किया। उन्होंने सभी जीवो को मिल- जुल कर रहना सिखाया और अपरिचित को भी अपना मित्र बनाया। संसारी जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव, उथल-पुथल और झंझावातों के बीच से संतुलन बनाकर कैसे निकला जाए, यह हमें श्री राम के जीवन से सीखना चाहिए।

श्रीराम का संपूर्ण जीवन मानवीय मूल्यों का एक समुच्चय है। उनके जीवन में मानवोचित समस्त क्रियाकलाप देखे जा सकते हैं। उनके आचरण और व्यवहार ने ही उन्हें देवता के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। हमेशा मर्यादा में रहकर समस्त दायित्वों को पूरा किया।

अयोध्या के राजा के रूप में श्री राम ने अपने राज्य और नागरिकों के प्रति अपने धर्म का पालन करने को प्रमुख स्थान दिया। एक कुशल राजा के रूप में अपने आप को स्थापित किया। श्री राम के राज्य में जानवर भी न्याय की गुहार लगाते थे।

हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी श्री राम का जीवन विश्व भर के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का एक बहुत बड़ा स्रोत है। आज जब पूरे विश्व में कोरोना जैसी महामारी फैली हुई है, तब हमें श्रीराम के जीवन को आत्मसात् करना चाहिए। उनके गुणों को धारण करते हुए विपरीत परिस्थितियों का साहस और धैर्य के साथ डटकर मुकाबला करना चाहिए।

आज रामनवमी के दिन हमें प्रभु श्रीराम से प्रार्थना करते हुए यह संकल्प लेना चाहिए कि— संकट पर विजय प्राप्त करने का रास्ता आपने जो सदियों पहले हमें दिखाया था, उसी रास्ते पर चलने की हमें शक्ति प्रदान कीजिए। जिससे हम कोरोना जैसी महामारी पर विजय प्राप्त कर सकें।

142. मां की महिमा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भारतवर्ष देवी देवताओं का देश है। यहां स्थान- स्थान पर देवी देवताओं के मंदिर हैं। ये मंदिर लोगों की अटूट श्रद्धा के केंद्र हैं। मां के रूप में हमें यहां देवी के विभिन्न रूपों के दर्शन होते हैं, जिन्हें अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग नाम से जाना जाता है। नवरात्र में मां की आराधना करने का विशेष महत्व होता है। इन दिनों किया गया पूजा- पाठ सफल होकर उचित फल देता है। देवियां भक्तों को उनकी पूजा-अर्चना का उचित फल भी देती हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता के सभी रूप भगवान शिव की अर्धांगिनी जगत् जननी देवी पार्वती के हैं। मां के मंदिर विभिन्न नामों से भारत के कोने-कोने में विराजमान है। इन मंदिरों में जो भी श्रद्धा भाव से जाता है, माता उनकी मुरादें अवश्य पूरी करती हैं। मां की शक्ति का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। कोई भी शब्द उनका गुणगान करने में सक्षम नहीं है। उनकी शक्ति को तो केवल वही जान सकता है, जिनके जीवन में माता चमत्कार करती है।

जम्मू-कश्मीर में मां वैष्णो देवी का प्राचीन मंदिर है। जहां प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख से ज्यादा श्रद्धालु दर्शनार्थ के लिए जाते हैं। इतनी भारी संख्या में श्रद्धालुओं के जाने के पीछे कोई तो कारण अवश्य होगा और वह कारण देवी भगवती की शक्ति के चमत्कार के अलावा और क्या हो सकता है? यह मां की शक्ति ही है जो भक्तों को अपनी ओर खींच लाती है और इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पता नहीं कब से वहां जा रहे हैं।

मां वैष्णो देवी के बाल रूप के दर्शन हमें हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में नाहन नामक स्थान से लगभग 24 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण- पश्चिम में 430 मीटर ऊंची पहाड़ी पर, मां महामाया बाला सुंदरी के रूप में होते हैं। यह स्थान त्रिलोकपुर के नाम से जाना जाता है। मां बाला सुंदरी सच्चे मन और श्रद्धा से आए किसी भी श्रद्धालु को निराश नहीं करती। उनकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं, तभी तो वहां पर लगभग 40 लाख लोग मां महामाया के दर्शन करते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं। माता बाला सुंदरी न जाने कितने परिवारों की कुलदेवी हैं। नवविवाहित दंपति मां के दर्शन करने, शिशुओं का मुंडन करवा कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु जाते हैं।

इस स्थान पर हमें 3 शक्ति केंद्रों के दर्शन होते हैं, इसी कारण इस स्थान का नाम त्रिलोकपुर है। तीनों शक्ति केन्द्र मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को दर्शाते हैं। मुख्य मंदिर जो महामाया बाला सुंदरी को समर्पित है, त्रिलोकपुर में ही स्थित है।
दूसरा शक्ति केंद्र माता के अन्य रूप मां ललिता देवी के नाम से जाना जाता है जो एक पहाड़ी पर मुख्य मंदिर से 3 किलोमीटर ऊपर उपस्थित है।
तीसरा शक्ति केंद्र भगवती त्रिपुर भैरवी के नाम से मुख्य मंदिर से 13 किलोमीटर ऊपर एक पहाड़ी पर स्थित है।

माता के मुख्य मंदिर के पास ही ध्यानु भक्त का मंदिर भी है। ध्यानु भक्त के बारे में एक कथा प्रचलित है कि—
वह मां बाला सुंदरी के अन्य रूप मां ज्वाला का परम भक्त था। उस समय अकबर का शासन था जो अपने को परम शक्तिशाली और अल्लाह मानता था, पर ध्यानु भगत का कहना था की— परम शक्तिशाली तो मां ज्वाला है।
अकबर को यह बात अच्छी नहीं लगी, उसने ध्यानु के घोड़े का सिर धड़ से अलग कर दिया और कहने लगा कि— यदि तेरी मां के अंदर इतनी शक्ति है, तो घोड़े का यह सिर फिर से उसके धड़ पर लगा दे।
ध्यानु को मां की शक्ति पर पूरा भरोसा था। उसने अकबर की चुनौती को स्वीकार कर लिया और अकबर से कुछ समय मांगा जिसे अकबर ने स्वीकार कर लिया।

ध्यानु दिल्ली से चलकर हिमाचल प्रदेश में मां ज्वाला जी पहुंचा और माता के चरणों में बैठकर विनती की, कि— वह घोड़े के शीश को पुनः उसके धड़ पर लगा दे, ताकि अकबर को उनकी शक्ति के बारे में पता चल सके। ध्यानु कई दिन- रात लगातार मां के चरणों में ऐसी प्रार्थना करता रहा। लेकिन उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं हुई। अंत में ध्यानु ने अपना शीश काटकर माता के चरणों में चढ़ा दिया।

माता प्रकट हुई और उसने न केवल ध्यानु का शीश उसके धड़ से जोड़ दिया बल्कि प्रार्थना को स्वीकार करते हुए घोड़े का शीश भी उसके धड़ से जोड़ कर उसे जीवित कर दिया।

अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह 50 किलो सोने के छत्र के साथ नंगे पांव माता के दरबार में अपना प्रायश्चित करने के लिए पहुंचा। लेकिन माता ने छत्र को स्वीकार नहीं किया। सोने से बने छात्र को तुरंत किसी अनजान धातु में बदल दिया। वह छत्र आज भी मां ज्वाला जी के मंदिर के प्रांगण में पड़ा हुआ है और मां ने उसे कौन- सी धातु में बदला है, आज तक भी कोई उसे समझ नहीं पाया है, यानी उस धातु का पता नहीं लगा पाया है।

बाद में अकबर ने अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ मां के मंदिर में ध्वजा, नारियल, पान, सुपारी भेंट कर मां का आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस घटना के कुछ समय पश्चात् ध्यानु भगत ने अत्यंत श्रद्धा के साथ मां महामाया बाला सुंदरी के मंदिर में भी अपना शीश चढ़ाने का संकल्प लिया।
मां तुरंत प्रकट हो गई और उसे कहा— यह गलत है, अगर इस बार तुमने अपना शीश काट दिया तो वह उसे पुनः नहीं जोड़ेगी।
लेकिन ध्यानु भगत ने तो संकल्प ले लिया था। उसने कहा—जो आपकी इच्छा मां।
मैं संकल्प ले चुका हूं इसलिए मैं अपने संकल्प से पीछे नहीं हटूंगा और यह कह कर माता के चरणों में प्रणाम करने के पश्चात् अपना शीश काटकर मां के चरणों में अर्पित कर दिया।
मां ने भी बड़ी प्रसन्नता के साथ ध्यानु को आशीर्वाद दिया—आज के बाद यहां आने वाला मेरा प्रत्येक भक्त तेरा दर्शन अवश्य करेगा।
यह मां की महिमा ही है की— मां बाला सुंदरी का यह स्थान अत्यंत धार्मिक महत्व रखता है। यहां वर्ष में दो बार मेला भरता है और मां के दर्शनों के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। वैसे तो श्रद्धालु प्रतिदिन मां के दर्शन करने आते हैं, परंतु चैत्र और अश्विन के महीने में लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन करते हैं।

141. नवरात्र

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सनातन संस्कृति के अनुसार वर्ष में चार नवरात्र —चैत्र, आषाढ़, अश्विन और माघ महीनों में आते हैं। प्रत्येक नवरात्र का समय शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक रहता है। चैत्र और अश्विन मास के नवरात्र अधिक प्रचलित हैं। आषाढ़ और माघ मास में नवरात्र गुप्त नवरात्र के रूप में मनाए जाते हैं।

सनातन संस्कृति में नवरात्र पर्व की साधना का अपना विशेष महत्व है। इस समय मनुष्य अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृद्धि करने के लिए अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन, योग- साधना आदि करते हैं। सभी नवरात्रों में आंतरिक शक्तियों को जगाने के प्रयास किए जाते हैं, परंतु आषाढ़ और माघ मास में आने वाले नवरात्र में गुप्त विद्याओं की तथा तंत्र- मंत्र के माध्यम से शक्ति प्राप्त करने हेतु साधनाएं की जाती हैं।

हमारे विद्वानों ने वर्ष के 12 महीनों को छ: ऋतुओं में बांटा है। बसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर प्रत्येक नवरात्र ॠतुओं के संधिकाल में आते हैं।

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि की जननी मां भगवती है। मां भगवती ही कष्ट, दुख, बीमारी, हानि, निर्धनता, अपकीर्ति व अपमान को मिटाकर आयु, प्रजा, कीर्ति, सुख, शांति, संतोष, धन, वैभव, पद-प्रतिष्ठा, मान- सम्मान व मोक्ष दात्री है।

वैसे तो जगत् जननी का आशीर्वाद हम पर सदैव बना ही रहता है, किंतु कुछ विशेष अवसरों पर हमें उनकी कृपा दृष्टि का लाभ अधिक मिलता है। नवरात्र ऐसे ही विशेष अवसर हैं। नवरात्रों में साधकों के साधन का फल व्यर्थ नहीं जाता। मां अपने भक्तों को उनकी साधना के अनुकूल फल अवश्य देती है। मां भगवती जगजननी की आराधना तो सभी नवरात्रों में की जाती है। चैत्र मास में आने वाले नवरात्र में अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा का भी प्रावधान है। आज के समय अधिकांश मनुष्य अपने कुल देवी- देवताओं को भूलते जा रहे हैं, जबकि इस और उचित ध्यान देकर आने वाली अनजान मुसीबतों से बचा जा सकता है। यह अंधविश्वास नहीं बल्कि शाश्वत सत्य है।

अध्यात्म जगत् में मानव शरीर को 9 मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और उसके अंदर निवास करने वाली जीवनी शक्ति अथवा प्राण शक्ति का नाम ही दुर्गा, भवानी अथवा जगदंबा है। इन मुख्य इंद्रियों के अनुशासन, स्वच्छता तथा इनमें तारतम्य स्थापित करने के लिए तथा शरीर तंत्र को पूरे वर्ष के लिए सुचारु रुप से क्रियाशील रखने हेतु नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नवरात्र के रूप में मनाया जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक वर्ष में 4 संधियां हैं। मार्च और सितंबर में पड़ने वाली संधियों में वर्ष के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय वातावरण में हानिकारक जीवाणु ज्यादा होते हैं, जिसके कारण बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है। रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होने के कारण शारीरिक बीमारियां ज्यादा होती है। ऐसे समय में हमें अपने शरीर को निर्मल और पूर्णत स्वस्थ रखने की आवश्यकता होती है और नवरात्र हमारे इस कार्य में सहयोग करते हैं, क्योंकि नवरात्र के समय उपवास करने तथा सात्विक भोजन ग्रहण करने से शरीर की शुद्धि होती है और वह रोग मुक्त रहता है। अगर शरीर स्वस्थ होगा तो शुद्ध बुद्धि तथा उत्तम विचारों का वास होगा, जिससे हमारे कर् अच्छे होंगे और उत्तम कर्मों से मन व आत्मा शुद्ध होते हैं। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थाई निवास होता है।

शास्त्रों में मां दुर्गा के नौ रूप बताए गए हैं—

• देवी शैलपुत्री—

शैलराज हिमालय की पुत्री अथवा सती अथवा पार्वती। मां के इस रूप की पूजा नवरात्र के प्रथम दिन होती है।

• देवी ब्रह्मचारिणी—

यह रूप मां पार्वती के जीवन काल का वह समय था, जब वह भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थी। इस रूप की पूजा नवरात्र के दूसरे दिन होती है।

• देवी चंद्रघंटा—

इस रूप में मां अपने मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करती है। मां का यह रूप दुष्टों का नाश करने के लिए तत्पर रहता है। इस रूप की पूजा तीसरे नवरात्र को की जाती है।

• देवी कूषमांडा—

मां का यह रूप बेहद शांत, सौम्य और मोहक है। इस रूप में मां आदि शक्ति आदि स्वरूपा है। मां कूषमांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग मिट जाते हैं। उनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है, इस रूप की पूजा चौथे नवरात्र को की जाती है।

• देवी स्कंदमाता—

कुमार कार्तिकेय की माता को ही स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। इस रूप में मां की चार भुजाएं हैं, जिनमें से एक हाथ से मां ने कुमार कार्तिकेय का बालरुप अपनी गोद में पकड़ा हुआ है और एक हाथ भक्तों को वरदान देने की मुद्रा में है। अन्य तो हाथों में मां कमल का फूल लिए हुए हैं। मां के इस रूप की पूजा नवरात्र के पांचवें दिन की जाती है।

• देवी कात्यायनी—

प्रख्यात महर्षि कात्यायन ने कठोर तपस्या कर मां से उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेने का वरदान मांगा था, जिसे मां ने पूरा किया। देवी का यह रूप कात्यायनी कहलाया। इस रूप में चार भुजाधारी मां कात्यायनी सिंह पर सवार है। अपने एक हाथ में तलवार और दूसरे में अपना प्रिय पुष्प कमल लिए है। अन्य दो हाथ वर मुद्रा और अभय मुद्रा में हैं। मां के इस रूप की पूजा छठे नवरात्र को होती है।

• देवी कालरात्रि—

मां कालरात्रि का रंग रात्रि के समान काला है, परंतु वे अंधकार का नाश करने वाली हैं। दुष्टों व राक्षसों का अंत करने वाली मां दुर्गा का यह रूप देखने में अत्यंत भयंकर लेकिन शुभ फल देता है। इसलिए इस रूप में मां शुभंकरी भी कहलाती हैं। मां के इस रूप की पूजा नवरात्र के सातवें दिन की जाती है।

• देवी महागौरी—

मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। उनकी शक्ति अमोघ और फल देने वाली है। उनकी उपासना से भक्तों के सभी कलुश मिट जाते हैं। पूर्व संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप, संताप, दु:ख उनके निकट भी नहीं आते। वह सभी प्रकार के पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

• देवी सिद्धिदात्री—

नवरात्र के अंतिम दिन मां के इस रूप की पूजा होती है। मां सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान है और इनका वाहन सिंह है। यह भक्तों को मनोवांछित फल और सिद्धियां प्रदान करती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव को अष्ट सिद्धियां देवी सिद्धिदात्री से ही मिलती हैं।

मां की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें पूर्ण विश्वास और आस्था के साथ मां के सभी रूपों की आराधना करनी चाहिए।

140. स्वास्तिक का वैज्ञानिक महत्त्व/कलंक

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

स्वास्तिक का वैज्ञानिक महत्व—
सही तरीके से बने हुए स्वास्तिक से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। यह ऊर्जा वस्तु या व्यक्ति की रक्षा, सुरक्षा करने में मददगार होती है। स्वास्तिक की ऊर्जा का अगर घर, हॉस्पिटल या दैनिक जीवन में इस्तेमाल किया जाए तो व्यक्ति रोगमुक्त और चिंता मुक्त हो जाता है। गलत तरीके से प्रयोग किया गया स्वास्तिक भयंकर समस्याएं दे सकता है।

एनर्जी नापने वाले बोविस यंत्र द्वारा स्वास्तिक की जांच करने से पता चलता है कि—
स्वास्तिक के अंदर लगभग एक लाख सकारात्मक ऊर्जाओं का वास होता है।

बाएं हाथ के स्वास्तिक को काले जादू से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि तंत्र साधना में उल्टे हाथ का स्वास्तिक बनाया जाता है। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि स्वास्तिक को उस शख्स ने अपनी पार्टी का चिन्ह बना लिया, जिससे पूरा विश्व सबसे ज्यादा नफरत करता है। हिटलर की नाजी पार्टी का निशान बनने के पश्चात स्वास्तिक की पहचान पर खून के धब्बे पड़ गए।

1920 में नाजी पार्टी, जिसे (नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी) के तौर पर भी जाना जाता था के नेता एडोल्फ हिटलर ने अपनी पार्टी का प्रतीक चुना।
ये प्रतीक था— स्वास्तिक।
जर्मन में इसे हेकेनक्रुएज कहा जाता है।

चिन्ह का खूनी इतिहास — पार्टी का यह चिन्ह बहुत सोच समझ कर लिया गया, जिसके पीछे खुद को आर्यन बनाने की मंशा थी।

आर्यन यानि—सर्वश्रेष्ठ मानव।
इसके बाद हिटलर की अगुवाई में नरसंहार का सिलसिला चल पड़ा। नफरत के उस दौर में पार्टी के प्रतीक चिन्ह स्वास्तिक के हजारों वर्षों के इतिहास को धुंधला कर दिया।दस्तावेज बताते हैं कि करीब 35 हजार के आसपास यहूदियों को बेहद क्रूरता से मार दिया गया था। उसके बाद से लोग इस चिन्ह से दूरी बनाने लगे। उनका मानना था कि -स्वास्तिक को मानने वाले नाजियों ने यूक्रेन की राजधानी को खून से रंग दिया। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी पार्टी का प्रतीक चिन्ह बनने के बाद से लोग स्वास्तिक को रक्तपात से जोड़ कर देखने लगे।

139. अन्य देशों में स्वास्तिक का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अन्य देशों में—

स्वास्तिक को भारत ही नहीं अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। विभिन्न मान्यताओं और धर्मों में स्वास्तिक को महत्वपूर्ण माना गया है। इसके साथ-साथ विश्व भर में स्वास्तिक को एक अहम् स्थान हासिल है। हम यहां विश्व भर में मौजूद हिंदू मूल के उन लोगों की बात नहीं कर रहे जो भारत से दूर रहकर भी शुभ कार्यों में स्वास्तिक का इस्तेमाल कर, अपने संस्कारों की छवि विश्व भर में फैला रहे हैं बल्कि सच यही है कि स्वास्तिक का प्रयोग भारत के बाहर के देशों में भी होता है।

जर्मनी में स्वास्तिक—
एक अध्ययन के मुताबिक जर्मनी में स्वास्तिक का इस्तेमाल किया जाता है। वर्ष 1935 के दौरान जर्मनी के नाजियों द्वारा स्वास्तिक के निशान का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन यह हिंदू मान्यताओं के बिल्कुल विपरीत था। यह निशान एक सफेद गोले में काले क्रास के रूप में उपयोग में लाया गया। जिसका अर्थ उग्रवाद या फिर स्वतंत्रता से संबंधित था।

द्वितीय विश्व युद्ध—
द्वितीय विश्व युद्ध के समय एडोल्फ हिटलर ने उल्टे स्वास्तिक का चिन्ह बना कर अपनी सेना के प्रतीक के रूप में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर उल्टा स्वास्तिक का चिन्ह अंकित था।
कहा जाता है कि यही उल्टा स्वास्तिक एडोल्फ हिटलर की बर्बादी का कारण बना।

संयुक्त राज्य अमेरिका की अधिकारिक सेना के नेटिव अमेरिकन की एक 45 वीं मिलिट्री इनवेंटेड डिवीजन का चिन्ह एक पीले रंग का स्वास्तिक था। नाजियों की घटना के बाद इसे हटा कर उन्होंने गरुड़ का चिन्ह अपनाया।

अन्य देश—
स्वास्तिक को भारत के अलावा जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वास्तिक का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है।

नेपाल में — हेरंब के नाम से
बर्मा में—प्रियेन्ने
मिस्र में — एकटन के नाम से स्वास्तिक की पूजा की जाती है।

प्राचीन यूरोप—
प्राचीन यूरोप में सेल्ट नामक एक सभ्यता थी जो जर्मनी से इंग्लैंड तक फैली थी। वह स्वास्तिक को सूर्य देव का प्रतीक मानती थी। उसके अनुसार स्वास्तिक यूरोप के चारों मौसमों का भी प्रतीक था।

मिश्र और अमेरिका— मिस्र और अमेरिका में भी स्वास्तिक का काफी प्रचलन रहा है। इन दोनों जगहों के लोग पिरामिड को पुनर्जन्म से जोड़कर देखा करते थे। प्राचीन मिस्र में ओसिरिस को पुनर्जन्म का देवता माना जाता था और हमेशा उसे चार हाथ वाले तारे के रूप में बताने के साथ ही पिरामिड को सूली लिखकर दर्शाते थे। इस तरह हम देखते हैं कि स्वास्तिक का प्रचलन प्राचीन काल से ही हर देश की सभ्यताओं में रहा है।

मध्य एशिया—
मध्य एशिया के देशों में स्वास्तिक का निशान मांगलिक एवं सौभाग्य का सूचक माना जाता है।

इराक— प्राचीन इराक में ( मेसोपोटेमिया ) अस्त्र-शस्त्र पर विजय प्राप्त करने हेतु स्वास्तिक चिन्ह का प्रयोग किया जाता था।

बुलगारी में स्वास्तिक—उत्तर-पश्चिमी बुल्गारिया के व्रात्स नगर के संग्रहालय में चल रही प्रदर्शनी में 7000 वर्ष प्राचीन कुछ मिट्टी की कलाकृतियां रखी हुई हैं, जिन पर स्वास्तिक का चिन्ह बना हुआ है। व्रास्ता शहर के निकट अल्तीमीर नामक गांव के एक धार्मिक कुंड की खुदाई के समय ये कलाकृतियां मिली थी।

पहला विश्वयुद्ध—अमेरिकी सेना ने पहले विश्वयुद्ध में इस प्रतीक चिन्ह का इस्तेमाल किया था। ब्रितानी वायु सेना के लड़ाकू विमानों पर इस चिन्ह का इस्तेमाल 1939 तक होता रहा।

जर्मन भाषा और संस्कृत में समानताएं —
करीब 1930 के आस-पास इसकी लोकप्रियता में कुछ ठहराव आ गया था। यह वह समय था जब जर्मनी की सत्ता में नाजियों का उदय हुआ था। उस समय किए गए शोध में एक दिलचस्प बात सामने निकलकर आई। शोधकर्ताओं ने यह स्वीकार किया कि जर्मन भाषा और संस्कृत में कई समानताएं हैं। इतना ही नहीं, भारतीय और जर्मन दोनों के पूर्वज भी एक ही रहे होंगे और उन्होंने देवताओं जैसे वीर आर्य नस्ल की परिकल्पना की।

स्वास्तिक का आर्य प्रतीक के रूप पर बल—
इसके बाद से ही स्वास्तिक चिन्ह का आर्य प्रतीक के तौर पर चलन शुरू हो गया। आर्य प्रजाति से अपना गौरवमय चिन्ह मानती थी। लेकिन उन्नीसवीं सदी के बाद बीसवीं सदी के अंत तक इसे नफरत की नजर से देखा जाने लगा।

नाजियों द्वारा कराए गए यहूदियों के नरसंहार में बचे 93 साल के फ्रेडी नालर कहते हैं— यहूदी लोगों के लिए इस चिन्ह को भय और दमन का प्रतीक माना जाता था। युद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी में इस प्रतीक चिन्ह पर प्रतिबंध लगा दिया था और 2007 में जर्मनी ने यूरोप भर में इस पर प्रतिबंध लगवाने की नाकाम पहल की गई थी।

स्वास्तिक की जड़ें—
इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि स्वास्तिक की जड़ें यूरोप में कहीं गहरी हैं।
पुरातत्वविदों ने पाया कि— इसका संबंध केवल भारत से ही नहीं था बल्कि प्राचीन ग्रीस के लोग भी इसका इस्तेमाल करते थे। पश्चिमी यूरोप में बाल्टिक से बाल्कन तक इसका इस्तेमाल देखा गया है।

यूक्रेन—
यूक्रेन के नेशनल म्यूजियम में कई तरह के स्वास्तिक चिन्ह देखे जा सकते हैं जो 15000 साल तक पुराने हैं। उक्रेन की गुफाओं में भी इस तरह के चिन्ह देखे जा सकते हैं।

रोम की प्राचीन सुरंगों में भी स्वास्तिक चिन्ह—
रोम की प्राचीन सुरंगों में भी स्वास्तिक चिन्ह पाए गए हैं।स्वास्तिक के पास zotica-zotica लिखा गया है। जिसका अर्थ होता है—जीवन का जीवन।

इसके अलावा स्वास्तिक चिन्ह इथोपिया के रहस्यमयी प्राचीन चर्च में भी पाया गया है। ग्रीक गणितज्ञ और वैज्ञानिक पाइथागोरस ने भी स्वास्तिक चिन्ह का प्रयोग अलग-अलग जगह किया है।