179. संगति का प्रभाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

संगति का मानव जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। हम अक्सर देखते हैं कि हमारे चाहने वाले या दोस्त अगर शांत प्रवृत्ति के हैं तो हम भी उन जैसे ही हो जाते हैं अर्थात् धीरे-धीरे हमारे अंदर भी उस गुण की प्रधानता स्पष्ट दिखाई देने लगती है। अगर उनमें क्रोध और ईर्ष्या की भावना है तो धीरे-धीरे हमारा चरित्र भी वैसा ही होने लगता है। इसलिए महापुरुषों ने साधु संतों की संगति को मनुष्य के लिए लाभदायी, पुण्यदायी और मोक्षदायी बताया है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तरह सर्जन, पोषण एवं कल्याण के अधिष्ठाता साधु संत ही होते हैं।

जब मनुष्य का जीवन मोह- माया के वशीभूत होकर पतीत हो जाता है, तब साधु-संतों के प्रवचन हमारे अंतर्मन में ज्ञान की ज्योति जला कर और अंतरण के अंधियारे को मिटाकर उसे भटकने से बचाते हैं और सही दिशा की ओर अग्रसर करते हैं। परिवार, समाज तथा राष्ट्र में संस्कार का सृजन, शुभ विचारों से व्यक्तित्व का उत्थान करना, वैचारिक पोषण और शुभ कर्मों से जन- जन के कल्याण का कार्य, साधुओं द्वारा ही संभव हो सकता है, क्योंकि साधुओं के पास उत्कृष्ट विचारों का एक दिव्य स्त्रोत होता है। उनकी वाणी पवित्र होती है। उनमें स्वार्थ की भावना का नामोनिशान भी नहीं होता बल्कि वे तो अपने उपदेशों से मानव जन के कल्याण के लिए दिव्य कर्मों की प्रेरणा देते हुए उनका पोषण करते हैं।

अगर साधु संतों की संगति की जाए तो मानव के जीवन में दिव्य कर्म करने की आदत बन जाती है और निकृष्ट कर्म से उन्हें मुक्ति मिल जाती है। साधु संत हमारे जीवन में पारस पत्थर की तरह अपनी संगति का लाभ देते हैं। जिस प्रकार मूल्यहीन लोहा, पारस पत्थर की संगति से मूल्यवान स्वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार आम व्यक्ति, साधु की संगति से सोने की तरह मूल्यवान ही नहीं बल्कि महान भी बन जाता है। चंदन वन के आसपास का परिवेश उसकी सुगंध से महक उठता है, उसी प्रकार सामान्य जन भी साधु संगति की सुगंध से अपने जीवन को सुगंधित कर सकते हैं।

एक बार की बात है— गुरु नानक देव जी भ्रमण पर निकले हुए थे। रास्ते में गोष्ठियों बनाकर उपदेश भी देते जा रहे थे। भाई बाला और मर्दाना भी उनके साथ थे। गर्मी के दिन थे और दोपहर का समय था। गुरु नानक देव जी एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने के लिए बैठ गए। वैसे तो महापुरुष कभी भी विश्राम नहीं करते, वे तो केवल भाई बाला और मरदाना को थके हुए देखकर कुछ देर के लिए रुक गए थे, परंतु उस समय भी उन्होंने परमार्थ की चर्चा छेड़ दी। एकाएक उठ कर बैठ गए और मरदाना को संबोधित करते हुए कहने लगे—

मरदाना मौत कितनी दूर है?

मरदाना ने हाथ जोड़कर विनती कि—गुरु जी! आज का सूर्य देखा है, पता नहीं कल का सूर्य देखना नसीब में होगा भी या नहीं।

गुरु नानक देव जी ने कहा— मरदाना, तुम तो मृत्यु को बहुत दूर समझते हो। मृत्यु इतनी दूर भी नहीं है।

तत्पश्चात गुरु जी ने भाई बाला की तरफ देखा और उनसे भी यही प्रश्न किया।

भाई बाला, तुम मृत्यु को कितनी दूर समझते हो।

भाई बाला ने भी हाथ जोड़कर विनती कि— गुरु जी। आज की सुबह देखी है, पता नहीं शाम देखने भी है या नहीं।

गुरु नानक देव जी ने कहा— भाई वाला, तुम भी मृत्यु को बहुत दूर समझते हो।

तब दोनों ने हाथ जोड़कर विनती कि—गुरु जी! आप ही इस प्रश्न का उत्तर दे दीजिए।

गुरु नानक देव जी ने कहा—मृत्यु तो अत्यंत निकट है। जो सांस मनुष्य का बाहर आता है, यह यदि वापिस अंदर चला गया तो मनुष्य वरना मुर्दा। हमारी दृष्टि में इतनी निकट है मृत्यु कि— मनुष्य जो सांस ले रहा है, हो सकता है कि यही उसका अंतिम सांस हो।
यानी साधु, महात्मा और महापुरुष सदैव अपने दिव्य विचारों से आम जन को शिक्षित करते रहते हैं, जिससे उनका कल्याण होता है। इसलिए हमेशा साधु-संतों एवं महापुरुषों के संगति लाभकारी होती है।

178. आनंद पूर्वक जीवन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आनंद का शाब्दिक अर्थ होता है— सच्चा सुख या सच्ची खुशी।

प्रत्येक मनुष्य की यह जिज्ञासा रहती है कि— वह आनंद पूर्वक जीवन व्यतीत करे। आनंद पूर्वक जीवन जीने की इच्छा उसके मन में प्रबल रूप से विद्यमान रहती है और इसके लिए वह दिन- रात भागदौड़ करता है। पर्यत्न एवं पुरुषार्थ करता है। परंतु वास्तव में देखा जाए तो दिन-रात भाग दौड़ करने तथा प्रयत्न, पुरुषार्थ करने पर भी मनुष्य को सच्चे आनंद की प्राप्ति नहीं होती। दुख अशांति ही उसके पल्ले पड़ती है। इसका एकमात्र कारण यही है कि वह इस संसार के भौतिक माया जाल से अपने आप को बाहर नहीं निकाल पाता।

मनुष्य हमेशा सुख की प्राप्ति और दुख की निवृत्ति के लिए ही सब कर्म करता है। उसके समस्त जीवन की दौड़-धूप केवल इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती है, परंतु फिर भी वह सुख के बदले दुख ही पाता है और दुख, चिंता आदि से मुक्ति प्राप्त करने की अपेक्षा दुखों की दलदल में दिन-प्रतिदिन और भी अधिक धंसता जाता है। वह हमेशा यही चाहता है कि उसे ऐसा सुख, ऐसा आनंद और ऐसी राहत नसीब हो जाए, जिसके बाद उसे स्वपन में भी दुख, अशांति, चिंता आदि का मुख ना देखना पड़े। लेकिन यह इस संसार का कटु सत्य है कि— मनुष्य को न तो सच्चे सुख, आनंद की प्राप्ति होती है और न ही दुखों से उसका छुटकारा होता है। मानसिक सुख शांति ढूंढने वाले मनुष्य को उतार-चढ़ाव वाले इस संसार में अन्य हर वस्तु प्राप्त हो जाती है परंतु मानसिक सुख शांति नहीं मिलतीे। यहां पर किसी की आंखों में आंसू है और किसी का दिल गमों से भरा हुआ है। चाहे कोई भिखारी हो अथवा राजा। जिसको भी देखो वही दुखी है। यह संसार में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जिसे आनंद की प्राप्ति हो।

2 किसान थे। एक ने आम का बाग लगा रखा था और दूसरे ने लीची का। दोनों अपने फल लेकर बाजार में जाते थे तो रास्ते में अक्सर उनकी मुलाकात हो जाती थी। एक बार मौसम बहुत अच्छा रहा। कहने से अभिप्राय यह है कि— न तो ज्यादा गर्मी हुई और न ही ज्यादा बारिश हुई। फलदार वृक्षों के लिए मौसम बहुत अच्छा था, जिसके कारण वृक्षों पर बहुत सारे फल लगे।
जब फल समाप्ति पर आए तो उन्होंने सोचा कि अब तो अगले वर्ष ही फल खाने को मिलेंगे। इसलिए उन्होंने बाजार में सारे फल न बेच कर अपने लिए पांच-पांच किलो फल बचा लिए ताकि वे और उनका परिवार उनको खाकर आनंदित महसूस कर सकें।
बाजार से वापिस लौटते समय दोनों रास्ते में मिले। दोनों में गपशप होने लगी। आम वाला किसान बोला कि— मैंने फल बचा तो लिए लेकिन इस बार फसल बहुत अच्छी होने के कारण हम लोगों ने खूब आम खाए। अब और आम खाने का बिल्कुल भी मन नहीं करता।
दूसरे किसान ने कहा यही हाल मेरा भी है। दोनों ने फैसला किया कि दोनों आपस में फल बदल लेते हैं। लेकिन आम वाला किसान बहुत लालची था। उसने नजर बचाकर कुछ आम छुपा कर रख लिए। वह अपने इस चालाकी पर बहुत ही आनंदित महसूस कर रहा था। घर जाकर उसने पूरे परिवार को आम और लीची खिलाई और अपनी चालाकी का बखान भी किया कि— किस तरह उसने लीची वाले किसान को बेवकूफ बनाया‌। अब उसे लीची के साथ-साथ आम भी खाने को मिले।
दूसरी तरफ लीची वाले किसान को आम खाने को मिल गए। वह बहुत खुश था। उसने और उसके परिवार ने मजे से आम खाए और बहुत अच्छी नींद ली।
लेकिन आम वाला किसान रात भर जागता रहा। उसे यही लग रहा था कि— कहीं लीची वाले किसान ने भी उसी तरह कुछ लीची छुपा कर तो नहीं रख ली।

इस भौतिक संसार मे यह अक्सर होता रहता है कि— मनुष्य कोई कार्य करता है और यही सोचता है की इस कार्य को करने के बाद उसे आनंद की प्राप्ति होगी। लेकिन जब वह कार्य पूरा हो जाता है तो भी उसे आनंद की प्राप्ति नहीं होती। ऐसा क्यों होता है कि जब हमारी मनचाही वस्तु मिल जाती है तो भी हम खुश नहीं होते?
क्या कभी इसके बारे में सोचा है? तो क्या हम यह समझ लें कि— संसार में सच्चा सुख, सच्चा आनंद है ही नहीं। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
सच्चा सुख और सच्ची खुशी अवश्य है। यदि पर्यत्न एवं परिश्रम करने पर भी हमें इनकी प्राप्ति नहीं होती तो इसका कारण केवल एक ही है कि— हम गलत स्थान पर सच्चा सुख ढूंढ रहे हैं। हम सुख आनंद की खोज एंद्रिक विषयों में ढूंढते हैं, जिनमें सुख का नामोनिशान भी नहीं है। अपितु दुख ही दुख भरा है। विषय वासनाएं तो विष के समान हैं, इनमें सुख की कल्पना करना अज्ञानता की निशानी है। ये विषय रस तो ऐसे हैं जैसे विष की गोली पर चीनी चढ़ा दी जाए, जो मधुर प्रतीत तो होती है, लेकिन होती तो घातक ही है।

यदि सच्चा सुख, सच्चा आनंद प्राप्त करने की हृदय में आकांक्षा है तो ईश्वर की शरण में जाकर प्रभु- नाम के अमृत का पान करना चाहिए। ईश्वर के नाम के अमृत की बरसात तो निरंतर होती रहती है परंतु यह सुधा रस उनके मुख में ही गिरता है अर्थात् इस सुधा रस का पान वे सौभाग्यशाली ही कर पाते हैं जो पूर्ण रूप से स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं।

177. कल्याणकारी मार्ग

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानवीय शरीर बड़ा दुर्लभ है, परंतु है यह अस्थाई एवं नश्वर। इसे एक दिन अवश्य मिट जाना है। बुद्धिमान मनुष्य वही है जो इस नश्वर शरीर से ईश्वर का स्मरण करता हुआ कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।

आज के समय संसार में चारों तरफ भौतिकता, विषय- लोलुपता, झूठ तथा छल-कपट आदि कुविचारों ने मनुष्य को अपने शिकंजे में दबोच रखा है। धार्मिकता, नैतिकता सत्य तथा परमार्थ के विचारों के प्रचार की अत्यधिक आवश्यकता है। ऐसे में हमें अपने सनातन धर्म की तरफ ध्यान लगाना चाहिए और यह देखना चाहिए कि किस प्रकार हमारे पूर्वज, जिनकी संतान होने का हमें गौरव प्राप्त है, उन ऋषियों, मुनियों, मनीषियों ने स्वयं तो आध्यात्मिकता, सत्यता, नैतिकता के मार्ग पर चलकर आत्मिक उन्नति के शिखर को छुआ ही, बल्कि इसके साथ-साथ समस्त संसार को भी इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हुए पूरे विश्व का मार्गदर्शन करते आए, ताकि संसार का प्रत्येक मनुष्य सुख-शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए अपना परलोक संवार सके।

अगर हमें अपने परलोक को संवारना है और आवागमन के चक्कर से छुटकारा पाना है तो हमें कल्याणकारी मार्ग को अपनाना होगा और उसके लिए हमें अपनी पुरातन संस्कृति में लौटना होगा। वही एक ऐसा मार्ग है, जिस पर चलकर हम अपना कल्याण कर सकते हैं क्योंकि आज हम अपने ऋषि- मुनियों और महापुरुषों की शिक्षा को भुलकर मोह- माया के चंगुल में बुरी तरह फंस चुके हैं, जिसके कारण हम में से प्रत्येक मनुष्य दुखी एवं परेशान हैं। चिंता से ग्रस्त हैं। हमें अपनी ध्यान- साधना वाली पद्धति को अपनाना होगा और मोह माया, काम क्रोध रूपी लोलुपता से बाहर निकलकर ईश्वर का स्मरण करना होगा, तभी हमारा कल्याण हो सकता है क्योंकि यही एक कल्याणकारी मार्ग है।

मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है, श्रेष्ठ है, परंतु है यह नश्वर, अस्थाई एवं क्षणभंगुर। यह हम में सेे प्रत्येक को पता है। हम यह भी भली-भांति जानते हैं कि— यह हमेशा रहने वाला नहीं है। एक दिन अवश्य ही इसे मिट्टी में मिल जाना है। इस संसार में न तो किसी का शरीर आज तक कायम रहा है और न ही हमेशा कायम रह सकता है। यह प्रकृति का अटल नियम है। यह सब कुछ जानते हुए भी हम मोह माया रुपी शिकंजे से बाहर नहीं निकल पाते।

जिस प्रकार शमा जलती है, प्रकाश देती है, परंतु उसका बुझना निश्चित है। जैसे फूल खिलता है, अपनी मुस्कुराहट और सुगंध से सबको आकर्षित करता है, परंतु उसका मुरझाना निश्चित है। वह अवश्य मुरझाएगा। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य के हृदय का स्पंदन एक दिन थम जाना है और जो सांस मनुष्य ले रहा है वह भी एक दिन निश्चित ही रुक जाएगी।

हम प्रतिदिन देखते हैं कि प्रातःकाल सूर्य उदय होता है। धीरे-धीरे आकाश की ऊंचाइयों को छूता हुआ शिखर पर पहुंचता है और उसके बाद ढलना शुरू हो जाता है और सायं होने पर अस्त हो जाता है। कली खिलती है, खिलकर फूल बनती है और फिर वह फूल कुम्हलाकर और पत्ता-पत्ता हो कर बिखर जाता है।

भवन का निर्माण किया जाता है तो उसकी नींव भरी जाती है। फिर सुदृढ़ दीवारें खड़ी की जाती हैं। उन दीवारों पर मजबूत छत डाली जाती है, परंतु चाहे कितना भी सुदृढ भवन क्यों न बनाया हो, धीरे-धीरे उसमें ह्रास होना प्रारम्भ हो जाता है और फिर एक दिन वह भी आता है जब वह आलीशान और सुदृढ़ भवन खण्डहर बन जाता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी जन्म लेता है और धीरे-धीरे उसकी आयु बढ़ने लगती है और वह यौवन में पदार्पण करता है। तत्पश्चात् उसके शरीर में ह्रास आरंभ हो जाता है और धीरे-धीरे वृद्धावस्था उसके शरीर पर अपना अधिकार जमा लेती है। मुरझाए और कुम्हलाए हुए फूल की तरह उसका शरीर हड्डियों का ढांचामात्र रह जाता है और अंत में वह शरीर मिट्टी में मिल जाता है।

हमने जरा विचार करके देखना चाहिए कि हमारे देखते-देखते कितने मनुष्य काल के मुख में चले गए। प्रतिदिन हम देखते भी हैं कि — हमारे बुजुर्ग जा रहे हैं। अड़ोसी- पड़ोसी जा रहे हैं। मित्र और सम्बन्धी भी जा रहे हैं। जिनसे हमने जन्म लिया था, उन्हें इस संसार से गए बहुत दिन हो गए। जिनके साथ हम बड़े हुए थे वे भी इस संसार को छोड़कर चले गए। अब हमारी दशा भी रेतीले नदी किनारे के वृक्षों की सी हो रही है जो प्रतिदिन जड़ छोड़ते हुए गिरने की हालत में होते चले जा रहे हैं।

यूनान के प्रसिद्ध विचारक एवं दार्शनिक सुकरात को जब विष दिया जाने वाला था तो उसके शिष्य रोने लगे।

सुकरात जो उस समय बिल्कुल शांत बैठा था, उसने पूछा— किस लिए रो रहे हो?

शिष्यों ने कहा— हम रो इसलिए रहे हैं कि कुछ ही क्षण बाद आपकी मृत्यु हो जाएगी।
सुकरात ने कहा— मृत्यु तो एक दिन होनी ही है। कोई भी प्राणी हमेशा तो जीवित नहीं रहता। जैसे कोई नाटक शुरू होता है तो यह जान लेना चाहिए कि कभी न कभी उसका पटाक्षेप अवश्य होगा। इसी तरह जन्म होते ही यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इस जीवन की भी एक दिन इतिश्री होनी ही है।
जीवन कितने दिन का है यह नहीं कहा जा सकता, परंतु मृत्यु इसकी एक दिन निश्चित है। यह दावे के साथ कह सकते हैं।

मृत्यु तो अनेक प्रकार से भांति- भांति के बाण लेकर और विषय- विकारों तथा रोगादि के अनेक प्रकार के शस्त्र लेकर हमारे पीछे लगी हुई है। चाहे कोई मनुष्य कितने ही प्रयत्न क्यों न कर ले, दान- पुण्य कर ले, ग्रह- नक्षत्र या देवी- देवता मना ले। यह शरीर एक दिन निश्चय ही नष्ट हो जाएगा।

हमारा यह शरीर अनित्य एवं अस्थाई है। एक दिन हमारे हाथों से चला जाएगा और कब चला जाएगा, इसका भी कोई अता-पता नहीं है। यह बात हमें हमेशा याद रखते हुए अपने कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

नियम के अनुसार तो बाल्यावस्था के पश्चात् किशोरावस्था फिर यौवनावस्था, फिर प्रौढ़ावस्था, फिर वृद्धावस्था और उसके पश्चात् ही मृत्यु आनी चाहिए। परंतु इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मनुष्य यह बता सके कि वह वृद्धावस्था तक जीवित रहेगा ही। इस शरीर को तो क्षणभंगुर कहा गया है। यह कभी भी मिट्टी हो सकता है।

संसार की प्रत्येक वस्तु की कुछ न कुछ अवधि निश्चित है। आपने अक्सर देखा होगा कि प्रत्येक वस्तु की एक्सपायरी डेट लिखी होती है। परंतु जीवन की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। क्या पता मृत्यु कब हमें अपने आगोश में ले ले। हो सकता है कि— जो सांस ले रहे हैं, वह हमारे जीवन की अंतिम सांस हो।

मृत्यु एक सच्चाई है और हमें इसे स्वीकार करते हुए अपने कल्याणकारी मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए।

176. सेवा भाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक कहावत है— “सेवा स्वयं में पुरस्कार है” जो खुशी और आनंद की प्राप्ति हमें दूसरों की सेवा से मिलती है, उसे लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं पाया जा सकता।

ईश्वर ने मनुष्य को सेवा भाव से परिपूर्ण बनाया है। आज कोरोना वायरस के कारण हम सब आपदा से जुझ रहे हैं तो ऐसे समय में मानवता की पुकार यही सेवा भाव है। यह दौर कठिन अवश्य है लेकिन इसमें हमें अपनी विशेषताओं को उजागर करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे की मदद करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे के साथ खड़े होकर, साथ निभाकर इस कोरोना काल को मात दे सकते हैं। आज जब हम अपनों को खो रहे हैं तो ऐसे में संवेदना के दो बोल और साथ रहने का भरोसा ही सच्ची सेवा भाव है।

आज हमें अपने भीतर सेवा भाव को जगाने की आवश्यकता है। ऐसे समय में एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए चिंतन करना आवश्यक है। प्रकृति ने हमें अपने जीवन पर चिंतन करने का अवसर प्रदान किया है। जीवन शास्वत है, हमने इस सच्चाई पर कभी विचार ही नहीं किया, पर हमें समय के साथ बदलना चाहिए। हमारे जीवन का सत्य क्या है?

यह सत्य है कि— मेरे अंदर एक ऐसा तत्व है, जो कभी नष्ट नहीं होता, जो कभी कम नहीं होता, जो अमर है।

गीता में कहा गया है कि— शरीर मरता है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। वही आत्मा तो हम सब में अमर है। यदि इस समय हम इस पर थोड़ा-सा ध्यान दें लें तो निर्भीक हो जाते हैं और हमारा जीवन मुश्किल समय में भी थोड़ा- सा आसान और सरल हो जाएगा। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेंगे तो सभी बदलावों को स्वीकार करने लगते हैं और शुभ बदलावों के लिए प्रेरित होते हैं।जब हम सब में भी बदलाव लाते हैं तो हमारे भीतर से मुस्कान खिल जाती है। यदि इस समय हम खुद को बदल ले तो हम अपने समाज और दुनिया को बदल सकते हैं।

लोग अक्सर कहते रहते हैं कि—भगवान जाने अब क्या होगा? तो मेरा उनसे कहना है कि— ऐसे नकारा विचारों को अपने आसपास में न फटकने दें। अपने ईश्वर पर विश्वास रखें। जब आप एक बार ईश्वर में विश्वास कर लेते हैं तो डगमगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। क्योंकि एक बार जब आप रेलगाड़ी में सवार हो जाते हैं तो जान लेते हैं कि आप गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। यह तो निश्चित है।

इस समय हमने अपनी इच्छाओं के बारे में न सोच कर, दूसरों की इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति विकसित करनी होगी। हमारी जो इच्छाएं हैं, उन्हें ईश्वर पर छोड़ दें, इस विश्वास के साथ की वे अवश्य पूरी होंगी। हमें कुछ नहीं चाहिए, जब हम यह तय कर लेते हैं तो अंदर से मजबूत हो जाते हैं और जब अंदर से मजबूत हो जाते हैं, तब हम किसी से कुछ भी कहेंगे तो वह आशीर्वाद बन जाएगा।

175. ईश्वर की खोज

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

स्वामी विवेकानंद—

अपने जीवन में जोखिम लो। जीतोगे तो नेतृत्व करोगे, यदि हारोगे तो दूसरों का, जीतने के लिए मार्गदर्शन करोगे।

जो भी मनुष्य अध्यात्म में विश्वास करता है, उसका एक ही लक्ष्य होता है— ईश्वर की खोज।
यह उस मनुष्य का आत्मिक लक्ष्य है लेकिन ईश्वर के बारे में एक दिन में नहीं जाना जा सकता। उसे निरंतर प्रयास करना होगा। शुरुआत उसे स्वयं की खोज यानी आत्मसाक्षात्कार से करनी होगी। उसे स्वयं को जानना होगा। अपनी सभी इच्छाओं का त्याग करते हुए, मैं व मेरा की लालसा और भावना से मुक्त होने के बाद ही उसे अपार शांति की प्राप्ति होगी जो उसे ध्यान की अवस्था में ले जाने के लिए सहयोगी बनेगी। ध्यान के द्वारा ही हम ईश्वर की खोज कर सकते हैं।

यदि कोई मनुष्य सांसारिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है तो सभी सगे- संबंधी उसका हौसला बढ़ाते हैं। वहीं यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कहे कि— वह परमात्मा की खोज करने जा रहा है तो कोई भी उसका उत्साहवर्धन करने नहीं आएगा बल्कि उसका मजाक बनाया जाएगा। लेकिन ईश्वर की खोज जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि ईश्वर का साथ पाकर ही मनुष्य इस आगमन के चक्कर से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार एक चित्रकार कपड़ों पर लगे दागों को बड़ी खूबसूरती से फूल का रूप दे देता है, वैसे ही हर मनुष्य को ईश्वर के सानिध्य की आवश्यकता होती है। ईश्वर का सानिध्य पाकर उसका जीवन पुष्प की भांति सुगंधित हो जाता है।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि— ईश्वर की खोज के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पड़ता, अपने शरीर को भी तपाने की आवश्यकता नहीं है। बस हमें ध्यान की गहराइयों में उतरना होगा। अपनी चेतना का विकास करना होगा। आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई किसी चीज में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है, तब उसमें सतत् सुधार के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है। यही विकास है। लेकिन जब हम आंतरिक विकास की बात करते हैं तो चेतना के विकास की बात होती है।

हमारे मानव शरीर की संरचना में शरीर, मन और आत्मा है।
जो हमारा स्थूल शरीर है, वह भौतिक पदार्थों से निर्मित है।
जबकि जो सूक्ष्म शरीर है, उसमें ऊर्जा व स्पंदन है। जिसे हम मानस कहते हैं।
और हमारा जो तीसरा शरीर है। वह कारण शरीर है। जो आत्मा है। जो हमारे अस्तित्व का आधार है।

स्थूल शरीर ज्यादा विकसित नहीं होता है।
आत्मा भी अपरिवर्तनीय है। जब हम एक बेहतर मनुष्य बनना चाहते हैं तो हम सूक्ष्म शरीर का विकास करते हैं। हम सूक्ष्म शरीर के चारों तरफ मौजूद परतों को हटाकर उसका शुद्धीकरण करते हैं जो ध्यान की गहराइयों में उतर कर ही संभव है।

हमारे सूक्ष्म शरीर के चार प्रमुख कार्य हैं—
चित्त यानी चेतना।
मनस यानी सोचना।
प्रज्ञा यानी बुद्धि और अहंकार।
ये सब मिलकर मन को बनाते हैं। हमारी चेतना अपने आप विकास को प्राप्त नहीं करती। यह विचार, बुद्धि व अहंकार की मदद से विकसित होती है। बुद्धि, विवेक में और सोच, अनुभूति में विकसित होती है।
अहंकार प्रेम में, निस्वार्थता में रूपांतरित हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप चेतना स्थिर व संकीर्ण अवस्था से गतिशील व सार्वभौमिक हो जाती है।

चेतना के विकास और विस्तार में अगर कोई सहायता करता है तो वह है— ध्यान की अवस्था। ध्यान के माध्यम से ही मनुष्य सूक्ष्म शरीर से उसकी सभी जटिलताओं को हटाकर, उसके रूपांतरण को संभव बनाते हैं, जिससे मन शांत हो जाता है। शांति और संतोष से रहने की कला जिसे आती है, वह ही चेतना का विकास करने में सफल होता है। बेचैन और अशांत मन मनुष्य को ध्यान की अवस्था में नहीं जाने देता।

एक परेशान व बेचैन मन तूफानी समुंद्र की तरह होता है जो इच्छाओं, कामनाओं, चिंताओं,भयों और आदतों द्वारा अनेक दिशाओं में खींचता रहता है और हमेशा अशांत व असंतुलित रहता है। वह माया रूपी विभिन्न प्रवाहों में बहकर बिखर जाता है। जबकि एक नियंत्रित व संतुलित मन केंद्रित रहता है और उससे सब का कल्याण होता है।

जब मनुष्य ध्यान करता है, तब मन अधिक शुद्ध सहज व हल्का बन जाता है और हमारी चेतना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उस समय मनुष्य अपने आंतरिक सामर्थ्य को उजागर कर पाता है। एक समय ऐसा आता है कि— ध्यान के फलस्वरूप प्राप्त ध्यानमयी अवस्था को पूरे दिन बनाए रखने की कला में माहिर हो जाते हैं। तत्पश्चात् हमारी चेतना जटिलताओं, प्रतिक्रियाओं और भावनाओं से अशांत नहीं होती। ऐसी शांतिपूर्ण अवस्था में विवेक विकसित होता है और हम अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग करते हैं। ऐसी अवस्था प्राप्त करने के बाद मनुष्य सभी कार्यों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है।

ईश्वर की खोज की यात्रा में एक मोड़ ऐसा आता है, जिसे हम प्रज्ञा कहते हैं यानी बुद्धि विकसित होती है। यदि कोई प्रज्ञा पूर्ण हो जाता है तो वह सुख-दुख, स्वर्ग- नरक, सफलता- विफलता से मुक्त हो जाता है। वह प्रज्ञा की मदद से अपने लक्ष्य में स्थित हो जाता है। प्रज्ञा व्यक्ति को सूक्ष्म दृष्टि देती है। यह दृष्टि ही उसे सत्य जानने की प्रेरणा देती है।

यह भी संभव है कि सत्य की तलाश अलग-अलग रास्तों से हो लेकिन अंत में जो समझ प्राप्त होती है, वह एक जैसी ही होती है। इसी समझ से व्यक्ति को अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। इसी रास्ते पर चलने के बाद ही उसे मौन, कैवल्य, मोक्ष, समाधि मुक्ति और निर्माण की अनुभूति होती है। ऐसी अवस्था में पहुंचने के बाद कभी-कभी नकारात्मकता भी बहुत हावी हो जाती है लेकिन उस समय सकारात्मक रहना होगा। सकारात्मकता के पथ पर चल कर ही मनुष्य ईश्वर की खोज की यात्रा को पूर्ण करने में सफल होता है।

174. संजीवनी बूटी— योग और ध्यान

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि— हे अर्जुन योग में स्थित होते हुए सभी कर्मों को करोगे तो सफलता अवश्य मिलेगी।

योग का अर्थ है— संतुलन या संयम अर्थात् आहार, विहार, वाणी, व्यवहार और विचार पर स्वयं का नियंत्रण होना चाहिए।

अगर हमारे आचरण में अनुशासन होगा तो हम जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान सरलता से कर सकते हैं।

“योगो भवति दु:खहा” यानी योग ही हमारी सारी समस्याओं का निदान है। योग और ध्यान जीवन के लिए रामबाण हैं। संजीवनी बूटी हैं।
वर्तमान संकट के दौरान अगर देखा जाए तो स्वस्थ और सुखी रहने का महत्वपूर्ण मंत्र है— योग और ध्यान।
योग करने से शरीर स्वस्थ रहता है और ध्यान करने से मन प्रसन्न हो जाता है। मनुष्य की सबसे बड़ी अभिलाषा भी यही है कि— जीवन सुखी एवं खुशहाल रहे।
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए योग का काफी महत्व है। यह ऊर्जा को बढ़ाता है। योग करने से हमारा शरीर हर प्रकार के वायरस से लड़ने में सक्षम हो जाता है।
ऐसा देखा जाता है की चुनौतीपूर्ण समय में ज्यादातर मनुष्य, जीवन के सरल पहलुओं को भी संभालने में स्वयं को असमर्थ समझते हैं। एक भय का वातावरण बना रहता है क्योंकि मृत्यु की निकटता उन्हें पूरी तरह लाचार महसूस करवाती रहती है।
कोरोना जैसे वायरस का शारीरिक क्षति पहुंचाना एक अलग बात है लेकिन इसके संपर्क में आने के बाद जो मानसिक और भावनात्मक स्तर पर क्षति होती है, उसके बचाव के लिए हमें भरपूर ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकता होती है। इसलिए ऐसे समय में हमें योग और ध्यान का सहारा लेना चाहिए।
मनुष्य दो तरह के कष्टों से गुजरता है— शारीरिक और मानसिक।
योग से आप शारीरिक कष्ट से मुक्ति पा सकते हैं और ध्यान से मानसिक पीड़ा को दूर किया जा सकता है क्योंकि ऐसे समय में शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाकर रखना पड़ता हैं।

योग के अनेक लाभ हैं लेकिन सबसे प्रमुख है— अच्छा स्वास्थ्य।
यह हमें तनाव मुक्त जीवन जीने की कला सिखाता है। यह सिर्फ व्यायाम नहीं है बल्कि हर एक परिस्थिति में हमें कुशलता से कर्म करना सिखाता है। तनावपूर्ण परिस्थितियों में रहते हुए भी मुस्कान बनाए रखना योग का उद्देश्य है। योगाभ्यास से आप सर्वोच्च सत्य ज्ञान के लिए तैयार हो जाते हैैं। दुखी हैं तो यह दुख से बाहर ले जाता है। बहुत बेचैन हैं तो योग आपके अंदर धैर्य लाता है।

यह तो सभी को पता है कि— हमारे कर्म ही हमारे सुख-दुख के कारण होते हैं। जब हमारे कर्म अच्छे होते हैं, तब हमें सुख मिलता है और जब हमारे कर्म बुरे होते हैं, तब हमें दुख की प्राप्ति होती है। जीवन में अधिक जिम्मेदार बनाने में योग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसे ही कर्म योग कहा जाता है।

योग अधिक ऊर्जा और उत्साह पैदा करता है। यदि हमारे पास पर्याप्त उत्साह और ऊर्जा है तो निश्चित मानिए कि हम अधिक जिम्मेदारी लेंगे और कभी उनका भार महसूस नहीं होने देंगे।

योग की एक अन्य परिभाषा है कि— दृश्य से द्रष्टा भाव में आना यानी बहीर्मुखी से अंतर्मुखी बनना।

पहले भौतिक शरीर से अपने ध्यान को मन की ओर ले जाना। मन में उत्पन्न विचारों को साक्षी भाव से देखने से वह भी दर्शक बन जाते हैं। हम उस तत्व तक पहुंच जाते हैं जो सब कुछ देख रहा है। यही योग है और ध्यान की अवस्था भी है। जब भी हम ध्यान की अवस्था में पहुंचकर खुशी, उत्साह, परमानंद और सुख का अनुभव करते हैं तो जाने अनजाने में उस परमात्मा से संपर्क स्थापित करने में थोड़े बहुत सफल अवश्य हुए हैं। योग और ध्यान के माध्यम से हम उस परम तत्व का अनुभव सहजता से कर सकते हैं।

योग से हम आंतरिक सौंदर्य को निहारना सीख सकते हैं। जब हम आंतरिक सौंदर्य को निहारना सीख जाते हैं, तभी हमें बाहरी सौंदर्य का अहसास होता है जो योग और ध्यान में अपना समय निवेश करते हैं, उन्हें बाहरी दुनिया में भी अद्भुत सौंदर्य दिखाई देने लगता है।

हमारे चारों तरफ सौंदर्य बिखरा पड़ा है। खूबसूरत पेड़ हैं, सुहावने बादल हैं, प्रकृति ने हमें ऐसे सुंदर- सुंदर फूल दिए हैं, जिनको हम कभी देखते ही नहीं। ऐसा- ऐसा सौंदर्य भरा पड़ा है, जिसे हमने कभी देखने की कोशिश ही नहीं की। हम तो अपनी ही परेशानियों, समस्याओं, इच्छाओं और चिंताओं में जरूरत से ज्यादा व्यस्त रहते हैं। हमने कभी किसी सूर्योदय या सूर्यास्त को नहीं निहारा।

सच तो यह है कि हमने पहले कभी बाहरी सौंदर्य की कद्र ही नहीं की लेकिन जब हमारे अंदर आंतरिक सौंदर्य की उपस्थिति होती है तो हमें बाहरी सौंदर्य का भी एहसास होने लगता है। देखा जाए तो सौंदर्य वस्तुओं, तस्वीरों, कहीं किसी सूर्यास्त अथवा किसी सुंदर फूल पर निर्भर नहीं करता। उस सौंदर्य का आगमन तभी होता है जब अगाध प्रेम, करुणा हमारे भीतर मौजूद हो। जब हम अंदर से मजबूत होते हैं, तभी हमें बाहरी सौंदर्य अच्छा लगता है क्योंकि जब तक हम अंदर से खुश नहीं होंगे, तब तक हमें सौंदर्य का प्रगाढ़ अहसास नहीं होगा और जब तक अहसास नहीं होगा तब तक हमें सौंदर्य कभी दिखाई नहीं देगा क्योंकि जब तक इच्छा प्रबल नहीं होगी, तब तक सब झूठ लगता है। जब अंदर से आंतरिक सौंदर्य का एहसास होता है, तभी इच्छाएं पनपती हैं और तब जब इच्छा होती है, तब हमें प्रकृति की हर वस्तु सुंदर लगती है।

यह सब कुछ होता है योग और ध्यान से। इसलिए योग और ध्यान के माध्यम से स्वयं को तराशें। संकट के समय योग और ध्यान से ही हम जीवन को सुखी बना सकते हैं। यही एक मार्ग है जो हमें नीरोगता के पथ पर ले जाता है।

मैं यह बिल्कुल भी नहीं कह रही कि— आप योगी बनें। भले ही आप योगी न बने लेकिन इस संकट के समय सहयोगी और उपयोगी अवश्य बनें। अपनी चिंता को एक किनारे रख कर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से अपने को उन्नत अवश्य करें।

स्वामी विवेकानंद—
योग वह विज्ञान है जो हमें चित्त की परिवर्तनशील अवस्था से निरुद्ध कर उसे वश में करने की शिक्षा देता है।

173. मौन से करें संवाद

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मौन से अभिप्राय यह नहीं है कि— हम सिर्फ वाणी से चुप हो जाएं और बोलना बंद कर दें यानी वाणी को लगाम लगा लेना मौन की श्रेणी में नहीं आता। सच्चा मौन तो विचारों से मुक्ति है। मौन रहकर मनुष्य अपने अंदर झांकता है। जिससे वह अपनी अंतरात्मा से संवाद करता है, उस को जाग्रत करने की कोशिश करता है।

अंतरात्मा या यह कहें कि—आत्मा को जागृत करने की कोशिश करता है, जो सुप्तावस्था में है। आत्मा जो अजर- अमर है। अगर एक बार उसका अपनी आत्मा से संपर्क हो गया तो समझो उसने परमतत्त्व ईश्वर के साथ साक्षात्कार कर लिया।

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है की— बोलो या न बोलो, कहीं भी रहो, यदि तुम्हारा मन 24 घंटे ईश्वर के ध्यान में लगा हुआ है और प्रसन्न है तो वही मौन है। फिर गाओ तो भी मौन और चुप हो जाओ तो भी मौन। मन प्रसन्न है, तब खुशी मनाओ तो भी मौन और एकांत में बैठ जाओ तो भी मौन। ध्यान देना, कुछ नहीं करने की अवस्था नहीं बल्कि होने की अवस्था का नाम मौन है।

इससे यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि— श्री कृष्ण स्वयं यह कहते हैं की वाणी को लगाम देना मौन नहीं है बल्कि पूरा समय ईश्वर में ध्यान लगाना मौन की अवस्था को प्राप्त करना है। बहुत सारे ऋषि-मुनियों ने मौन को धारण किया। उन्होंने अपने जीवन का बहुत लंबा समय मौन रहकर या पहाड़ों, गुफाओं में एकांत अवस्था में रहते हुए व्यतीत किया और उस परमात्मा से अपने आप को एकाकार किया। लेकिन हमने मौन को केवल चुप रहना ही समझ लिया। हम अकेले बैठ जाते हैं और बोलना बंद कर देते हैं, यही मौन की परिभाषा है। लेकिन वास्तव में मौन ऐसा नहीं है। मनुष्य अकेला बैठता है तो उसके दिमाग में विचार ही विचार आते रहते हैं। हम अपनी जुबान पर तो रोक लगा सकते हैं लेकिन विचारों पर रोक लगाना हमारे सामर्थ्य से बाहर है। लेकिन जब किसी सिद्ध पुरुष के सानिध्य में बैठे हैं तो मन की हलचल स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं और हमें शांति महसूस होने लगती है।

मेरा मानना है कि यदि मनुष्य अपने जीवन में कुछ समय सिर्फ अपनी जुबान पर लगाम लगा ले तो वह भी, भले ही कुछ समय ही सही, मौन धारण तो कर ही सकता है। क्योंकि जिसको देखो, उसको सुनाने की लगी रहती है। वाणी पर बिल्कुल भी कंट्रोल नहीं है। बहुत ज्यादा बोलते हैं। अगर मौन धारण करेंगे तो कम बोलेंगे और कम बोलेंगे तो ज्यादा झूठ नहीं बोलेंगे। एक तो वह झूठ बोलने से बचेंगे और दूसरा किसी की निंदा करने से बचेंगे। इससे एक तो यह फायदा होगा कि उनमें सच बोलने की भावना पनपने लगेगी और दूसरा उनमें मौन रहने की क्षमता भी विकासित हो जाएगी।

बहुत से मनुष्य ऐसे भी हैं जो यह दावा करते रहते हैं की हम सिर्फ मौन की भाषा ही समझते हैं। वास्तव में देखा जाए तो मौन को समझने की आवश्यकता ही क्या है? मौन कोई समझने की भाषा नहीं है। कोयल की कुहू- कुहू कोई समझने का विषय है। नदी के कल- कल को क्या भाषांतर की जरूरत है। चांद धीरे-धीरे निकलता है, उसे समझने की जरूरत नहीं है, उसे देखना ही पर्याप्त है। हवा की सरसराहट क्या कोई समझ पाया है, उसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है। इसी तरह मौन है, इस का आनंद लो। शब्दों में सब कुछ नहीं कहा जा सकता।

मौन को समझने के लिए कोई साधन नहीं है और उसे समझने की चेष्टा भी नहीं करनी चाहिए। बस अपने आप को मौन में उतारने की आवश्यकता है। ध्यान देना, कुछ नहीं करने की अवस्था नहीं बल्कि होने की अवस्था का नाम मौन है। आप एक बार अपने जीवन में मौन रहने की कोशिश जरूर करना। शुरू- शुरू में बाहरी आवाजें बहुत आएंगी क्योंकि हम चुप हो जाते हैं। जब हम बोल रहे होते हैं तो बाहरी आवाजों का हिस्सा होते हैं। अब मौन हो गए तो बाहरी आवाजें हमारे ऊपर हावी होने लगती है। थोड़ा- सा धैर्य रखने की जरूरत है। तत्पश्चात् बाहरी आवाजें कितनी भी हों, शोर कितना भी हो, मौन रखने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लगातार अभ्यास करते रहने से बाहर की आवाजें सुननी बंद हो जाती हैं और अंदर की आवाजें सुनाई देने लगती हैं।

जब हमें अपने ही अंदर की आवाजें सुनने लगें तो हम ध्यान की अवस्था को प्राप्त करने लगते हैं। अनेक प्रकार की आवाजें हमारे अंदर से आने लगती हैं। उस समय डरना नहीं है बल्कि उनको शांत करना है। यह सच है कि उनको शांत करना थोड़ा- सा मुश्किल है परंतु अपने आप पर विश्वास और थोड़ा- सा धैर्य हमें उस अवस्था से भी पार ले जाता है।

उसके बाद मौन की एक और अवस्था आती है कि— अंदर की आवाज आनी बंद हो जाती हैं और हम बिल्कुल शांत हो जाते हैं। एक सन्नाटा छा जाता है और हमारे विचार बंद हो जाते हैं। हम शांत चित्त होकर सिर्फ एक दृष्टा की भांति उनको देखते रहते हैं‌। यही मौन की असली अवस्था है। इस अवस्था में हम अपनी आत्मा से संपर्क करके परम तत्व परमात्मा में एकाकार होने की कोशिश में लग जाते हैं। जब हम उस परम तत्व से संपर्क स्थापित कर लेते हैं तो असलियत में यही मौन है और यही आत्मा की चेतन अवस्था है।

रमण महर्षि कहते हैं कि— भाव विचार शुन्य हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसी सिद्ध पुरुष का हाथ हमारे सिर पर होना बहुत आवश्यक है। उनका होना हमें संतुलित करता है।

मौन एक ऐसी साधना है, जिसमें किसी भी प्रकार का दासत्व एवं अहंकार नहीं होता। मौन रहकर मनुष्य स्वयं को जानने की कोशिश करता है। मौन एक ऐसा समर्पण है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार आता है जो मौन धारण करना सीख लेता है, उसको भक्ति अपने आप आ जाती है। मौन एक प्रकार की भक्ति ही है, जिसमें भक्त मौन रहकर सिर्फ अपने ईश्वर के बारे में विचार करता है। जो मौन धारण कर लेते हैं, उनको सिर्फ नाद मुक्त वीणा की आवाज ही सुनाई देती है। मौन एक ऐसी साधना है जो भक्ति, प्रेम, करुणा और उपासना का संगम है।

भक्ति भाव के इस संगम को प्राप्त करने के लिए मौन सबसे अच्छा माध्यम है‌। मौन साधन भी है और श्रद्धा भी। उत्तम वाणी भी मौन की श्रेणी में आती है। जो मौन की भाषा को समझ गया, वह अपनी वाणी को वश में करना सीख जाता है और जो वाणी को वश में करना सीख जाता है, समझो उसने मौन की भाषा सीख ली है। इसलिए जितनी आवश्यकता हो, उतना ही बोलना चाहिए और यदि बोलना पड़े भी तो सिर्फ सत्य बोलें।