176. सेवा भाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक कहावत है— “सेवा स्वयं में पुरस्कार है” जो खुशी और आनंद की प्राप्ति हमें दूसरों की सेवा से मिलती है, उसे लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं पाया जा सकता।

ईश्वर ने मनुष्य को सेवा भाव से परिपूर्ण बनाया है। आज कोरोना वायरस के कारण हम सब आपदा से जुझ रहे हैं तो ऐसे समय में मानवता की पुकार यही सेवा भाव है। यह दौर कठिन अवश्य है लेकिन इसमें हमें अपनी विशेषताओं को उजागर करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे की मदद करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे के साथ खड़े होकर, साथ निभाकर इस कोरोना काल को मात दे सकते हैं। आज जब हम अपनों को खो रहे हैं तो ऐसे में संवेदना के दो बोल और साथ रहने का भरोसा ही सच्ची सेवा भाव है।

आज हमें अपने भीतर सेवा भाव को जगाने की आवश्यकता है। ऐसे समय में एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए चिंतन करना आवश्यक है। प्रकृति ने हमें अपने जीवन पर चिंतन करने का अवसर प्रदान किया है। जीवन शास्वत है, हमने इस सच्चाई पर कभी विचार ही नहीं किया, पर हमें समय के साथ बदलना चाहिए। हमारे जीवन का सत्य क्या है?

यह सत्य है कि— मेरे अंदर एक ऐसा तत्व है, जो कभी नष्ट नहीं होता, जो कभी कम नहीं होता, जो अमर है।

गीता में कहा गया है कि— शरीर मरता है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। वही आत्मा तो हम सब में अमर है। यदि इस समय हम इस पर थोड़ा-सा ध्यान दें लें तो निर्भीक हो जाते हैं और हमारा जीवन मुश्किल समय में भी थोड़ा- सा आसान और सरल हो जाएगा। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेंगे तो सभी बदलावों को स्वीकार करने लगते हैं और शुभ बदलावों के लिए प्रेरित होते हैं।जब हम सब में भी बदलाव लाते हैं तो हमारे भीतर से मुस्कान खिल जाती है। यदि इस समय हम खुद को बदल ले तो हम अपने समाज और दुनिया को बदल सकते हैं।

लोग अक्सर कहते रहते हैं कि—भगवान जाने अब क्या होगा? तो मेरा उनसे कहना है कि— ऐसे नकारा विचारों को अपने आसपास में न फटकने दें। अपने ईश्वर पर विश्वास रखें। जब आप एक बार ईश्वर में विश्वास कर लेते हैं तो डगमगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। क्योंकि एक बार जब आप रेलगाड़ी में सवार हो जाते हैं तो जान लेते हैं कि आप गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। यह तो निश्चित है।

इस समय हमने अपनी इच्छाओं के बारे में न सोच कर, दूसरों की इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति विकसित करनी होगी। हमारी जो इच्छाएं हैं, उन्हें ईश्वर पर छोड़ दें, इस विश्वास के साथ की वे अवश्य पूरी होंगी। हमें कुछ नहीं चाहिए, जब हम यह तय कर लेते हैं तो अंदर से मजबूत हो जाते हैं और जब अंदर से मजबूत हो जाते हैं, तब हम किसी से कुछ भी कहेंगे तो वह आशीर्वाद बन जाएगा।

175. ईश्वर की खोज

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

स्वामी विवेकानंद—

अपने जीवन में जोखिम लो। जीतोगे तो नेतृत्व करोगे, यदि हारोगे तो दूसरों का, जीतने के लिए मार्गदर्शन करोगे।

जो भी मनुष्य अध्यात्म में विश्वास करता है, उसका एक ही लक्ष्य होता है— ईश्वर की खोज।
यह उस मनुष्य का आत्मिक लक्ष्य है लेकिन ईश्वर के बारे में एक दिन में नहीं जाना जा सकता। उसे निरंतर प्रयास करना होगा। शुरुआत उसे स्वयं की खोज यानी आत्मसाक्षात्कार से करनी होगी। उसे स्वयं को जानना होगा। अपनी सभी इच्छाओं का त्याग करते हुए, मैं व मेरा की लालसा और भावना से मुक्त होने के बाद ही उसे अपार शांति की प्राप्ति होगी जो उसे ध्यान की अवस्था में ले जाने के लिए सहयोगी बनेगी। ध्यान के द्वारा ही हम ईश्वर की खोज कर सकते हैं।

यदि कोई मनुष्य सांसारिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है तो सभी सगे- संबंधी उसका हौसला बढ़ाते हैं। वहीं यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कहे कि— वह परमात्मा की खोज करने जा रहा है तो कोई भी उसका उत्साहवर्धन करने नहीं आएगा बल्कि उसका मजाक बनाया जाएगा। लेकिन ईश्वर की खोज जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि ईश्वर का साथ पाकर ही मनुष्य इस आगमन के चक्कर से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार एक चित्रकार कपड़ों पर लगे दागों को बड़ी खूबसूरती से फूल का रूप दे देता है, वैसे ही हर मनुष्य को ईश्वर के सानिध्य की आवश्यकता होती है। ईश्वर का सानिध्य पाकर उसका जीवन पुष्प की भांति सुगंधित हो जाता है।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि— ईश्वर की खोज के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पड़ता, अपने शरीर को भी तपाने की आवश्यकता नहीं है। बस हमें ध्यान की गहराइयों में उतरना होगा। अपनी चेतना का विकास करना होगा। आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई किसी चीज में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है, तब उसमें सतत् सुधार के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है। यही विकास है। लेकिन जब हम आंतरिक विकास की बात करते हैं तो चेतना के विकास की बात होती है।

हमारे मानव शरीर की संरचना में शरीर, मन और आत्मा है।
जो हमारा स्थूल शरीर है, वह भौतिक पदार्थों से निर्मित है।
जबकि जो सूक्ष्म शरीर है, उसमें ऊर्जा व स्पंदन है। जिसे हम मानस कहते हैं।
और हमारा जो तीसरा शरीर है। वह कारण शरीर है। जो आत्मा है। जो हमारे अस्तित्व का आधार है।

स्थूल शरीर ज्यादा विकसित नहीं होता है।
आत्मा भी अपरिवर्तनीय है। जब हम एक बेहतर मनुष्य बनना चाहते हैं तो हम सूक्ष्म शरीर का विकास करते हैं। हम सूक्ष्म शरीर के चारों तरफ मौजूद परतों को हटाकर उसका शुद्धीकरण करते हैं जो ध्यान की गहराइयों में उतर कर ही संभव है।

हमारे सूक्ष्म शरीर के चार प्रमुख कार्य हैं—
चित्त यानी चेतना।
मनस यानी सोचना।
प्रज्ञा यानी बुद्धि और अहंकार।
ये सब मिलकर मन को बनाते हैं। हमारी चेतना अपने आप विकास को प्राप्त नहीं करती। यह विचार, बुद्धि व अहंकार की मदद से विकसित होती है। बुद्धि, विवेक में और सोच, अनुभूति में विकसित होती है।
अहंकार प्रेम में, निस्वार्थता में रूपांतरित हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप चेतना स्थिर व संकीर्ण अवस्था से गतिशील व सार्वभौमिक हो जाती है।

चेतना के विकास और विस्तार में अगर कोई सहायता करता है तो वह है— ध्यान की अवस्था। ध्यान के माध्यम से ही मनुष्य सूक्ष्म शरीर से उसकी सभी जटिलताओं को हटाकर, उसके रूपांतरण को संभव बनाते हैं, जिससे मन शांत हो जाता है। शांति और संतोष से रहने की कला जिसे आती है, वह ही चेतना का विकास करने में सफल होता है। बेचैन और अशांत मन मनुष्य को ध्यान की अवस्था में नहीं जाने देता।

एक परेशान व बेचैन मन तूफानी समुंद्र की तरह होता है जो इच्छाओं, कामनाओं, चिंताओं,भयों और आदतों द्वारा अनेक दिशाओं में खींचता रहता है और हमेशा अशांत व असंतुलित रहता है। वह माया रूपी विभिन्न प्रवाहों में बहकर बिखर जाता है। जबकि एक नियंत्रित व संतुलित मन केंद्रित रहता है और उससे सब का कल्याण होता है।

जब मनुष्य ध्यान करता है, तब मन अधिक शुद्ध सहज व हल्का बन जाता है और हमारी चेतना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उस समय मनुष्य अपने आंतरिक सामर्थ्य को उजागर कर पाता है। एक समय ऐसा आता है कि— ध्यान के फलस्वरूप प्राप्त ध्यानमयी अवस्था को पूरे दिन बनाए रखने की कला में माहिर हो जाते हैं। तत्पश्चात् हमारी चेतना जटिलताओं, प्रतिक्रियाओं और भावनाओं से अशांत नहीं होती। ऐसी शांतिपूर्ण अवस्था में विवेक विकसित होता है और हम अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग करते हैं। ऐसी अवस्था प्राप्त करने के बाद मनुष्य सभी कार्यों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है।

ईश्वर की खोज की यात्रा में एक मोड़ ऐसा आता है, जिसे हम प्रज्ञा कहते हैं यानी बुद्धि विकसित होती है। यदि कोई प्रज्ञा पूर्ण हो जाता है तो वह सुख-दुख, स्वर्ग- नरक, सफलता- विफलता से मुक्त हो जाता है। वह प्रज्ञा की मदद से अपने लक्ष्य में स्थित हो जाता है। प्रज्ञा व्यक्ति को सूक्ष्म दृष्टि देती है। यह दृष्टि ही उसे सत्य जानने की प्रेरणा देती है।

यह भी संभव है कि सत्य की तलाश अलग-अलग रास्तों से हो लेकिन अंत में जो समझ प्राप्त होती है, वह एक जैसी ही होती है। इसी समझ से व्यक्ति को अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। इसी रास्ते पर चलने के बाद ही उसे मौन, कैवल्य, मोक्ष, समाधि मुक्ति और निर्माण की अनुभूति होती है। ऐसी अवस्था में पहुंचने के बाद कभी-कभी नकारात्मकता भी बहुत हावी हो जाती है लेकिन उस समय सकारात्मक रहना होगा। सकारात्मकता के पथ पर चल कर ही मनुष्य ईश्वर की खोज की यात्रा को पूर्ण करने में सफल होता है।

174. संजीवनी बूटी— योग और ध्यान

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि— हे अर्जुन योग में स्थित होते हुए सभी कर्मों को करोगे तो सफलता अवश्य मिलेगी।

योग का अर्थ है— संतुलन या संयम अर्थात् आहार, विहार, वाणी, व्यवहार और विचार पर स्वयं का नियंत्रण होना चाहिए।

अगर हमारे आचरण में अनुशासन होगा तो हम जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान सरलता से कर सकते हैं।

“योगो भवति दु:खहा” यानी योग ही हमारी सारी समस्याओं का निदान है। योग और ध्यान जीवन के लिए रामबाण हैं। संजीवनी बूटी हैं।
वर्तमान संकट के दौरान अगर देखा जाए तो स्वस्थ और सुखी रहने का महत्वपूर्ण मंत्र है— योग और ध्यान।
योग करने से शरीर स्वस्थ रहता है और ध्यान करने से मन प्रसन्न हो जाता है। मनुष्य की सबसे बड़ी अभिलाषा भी यही है कि— जीवन सुखी एवं खुशहाल रहे।
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए योग का काफी महत्व है। यह ऊर्जा को बढ़ाता है। योग करने से हमारा शरीर हर प्रकार के वायरस से लड़ने में सक्षम हो जाता है।
ऐसा देखा जाता है की चुनौतीपूर्ण समय में ज्यादातर मनुष्य, जीवन के सरल पहलुओं को भी संभालने में स्वयं को असमर्थ समझते हैं। एक भय का वातावरण बना रहता है क्योंकि मृत्यु की निकटता उन्हें पूरी तरह लाचार महसूस करवाती रहती है।
कोरोना जैसे वायरस का शारीरिक क्षति पहुंचाना एक अलग बात है लेकिन इसके संपर्क में आने के बाद जो मानसिक और भावनात्मक स्तर पर क्षति होती है, उसके बचाव के लिए हमें भरपूर ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकता होती है। इसलिए ऐसे समय में हमें योग और ध्यान का सहारा लेना चाहिए।
मनुष्य दो तरह के कष्टों से गुजरता है— शारीरिक और मानसिक।
योग से आप शारीरिक कष्ट से मुक्ति पा सकते हैं और ध्यान से मानसिक पीड़ा को दूर किया जा सकता है क्योंकि ऐसे समय में शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाकर रखना पड़ता हैं।

योग के अनेक लाभ हैं लेकिन सबसे प्रमुख है— अच्छा स्वास्थ्य।
यह हमें तनाव मुक्त जीवन जीने की कला सिखाता है। यह सिर्फ व्यायाम नहीं है बल्कि हर एक परिस्थिति में हमें कुशलता से कर्म करना सिखाता है। तनावपूर्ण परिस्थितियों में रहते हुए भी मुस्कान बनाए रखना योग का उद्देश्य है। योगाभ्यास से आप सर्वोच्च सत्य ज्ञान के लिए तैयार हो जाते हैैं। दुखी हैं तो यह दुख से बाहर ले जाता है। बहुत बेचैन हैं तो योग आपके अंदर धैर्य लाता है।

यह तो सभी को पता है कि— हमारे कर्म ही हमारे सुख-दुख के कारण होते हैं। जब हमारे कर्म अच्छे होते हैं, तब हमें सुख मिलता है और जब हमारे कर्म बुरे होते हैं, तब हमें दुख की प्राप्ति होती है। जीवन में अधिक जिम्मेदार बनाने में योग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसे ही कर्म योग कहा जाता है।

योग अधिक ऊर्जा और उत्साह पैदा करता है। यदि हमारे पास पर्याप्त उत्साह और ऊर्जा है तो निश्चित मानिए कि हम अधिक जिम्मेदारी लेंगे और कभी उनका भार महसूस नहीं होने देंगे।

योग की एक अन्य परिभाषा है कि— दृश्य से द्रष्टा भाव में आना यानी बहीर्मुखी से अंतर्मुखी बनना।

पहले भौतिक शरीर से अपने ध्यान को मन की ओर ले जाना। मन में उत्पन्न विचारों को साक्षी भाव से देखने से वह भी दर्शक बन जाते हैं। हम उस तत्व तक पहुंच जाते हैं जो सब कुछ देख रहा है। यही योग है और ध्यान की अवस्था भी है। जब भी हम ध्यान की अवस्था में पहुंचकर खुशी, उत्साह, परमानंद और सुख का अनुभव करते हैं तो जाने अनजाने में उस परमात्मा से संपर्क स्थापित करने में थोड़े बहुत सफल अवश्य हुए हैं। योग और ध्यान के माध्यम से हम उस परम तत्व का अनुभव सहजता से कर सकते हैं।

योग से हम आंतरिक सौंदर्य को निहारना सीख सकते हैं। जब हम आंतरिक सौंदर्य को निहारना सीख जाते हैं, तभी हमें बाहरी सौंदर्य का अहसास होता है जो योग और ध्यान में अपना समय निवेश करते हैं, उन्हें बाहरी दुनिया में भी अद्भुत सौंदर्य दिखाई देने लगता है।

हमारे चारों तरफ सौंदर्य बिखरा पड़ा है। खूबसूरत पेड़ हैं, सुहावने बादल हैं, प्रकृति ने हमें ऐसे सुंदर- सुंदर फूल दिए हैं, जिनको हम कभी देखते ही नहीं। ऐसा- ऐसा सौंदर्य भरा पड़ा है, जिसे हमने कभी देखने की कोशिश ही नहीं की। हम तो अपनी ही परेशानियों, समस्याओं, इच्छाओं और चिंताओं में जरूरत से ज्यादा व्यस्त रहते हैं। हमने कभी किसी सूर्योदय या सूर्यास्त को नहीं निहारा।

सच तो यह है कि हमने पहले कभी बाहरी सौंदर्य की कद्र ही नहीं की लेकिन जब हमारे अंदर आंतरिक सौंदर्य की उपस्थिति होती है तो हमें बाहरी सौंदर्य का भी एहसास होने लगता है। देखा जाए तो सौंदर्य वस्तुओं, तस्वीरों, कहीं किसी सूर्यास्त अथवा किसी सुंदर फूल पर निर्भर नहीं करता। उस सौंदर्य का आगमन तभी होता है जब अगाध प्रेम, करुणा हमारे भीतर मौजूद हो। जब हम अंदर से मजबूत होते हैं, तभी हमें बाहरी सौंदर्य अच्छा लगता है क्योंकि जब तक हम अंदर से खुश नहीं होंगे, तब तक हमें सौंदर्य का प्रगाढ़ अहसास नहीं होगा और जब तक अहसास नहीं होगा तब तक हमें सौंदर्य कभी दिखाई नहीं देगा क्योंकि जब तक इच्छा प्रबल नहीं होगी, तब तक सब झूठ लगता है। जब अंदर से आंतरिक सौंदर्य का एहसास होता है, तभी इच्छाएं पनपती हैं और तब जब इच्छा होती है, तब हमें प्रकृति की हर वस्तु सुंदर लगती है।

यह सब कुछ होता है योग और ध्यान से। इसलिए योग और ध्यान के माध्यम से स्वयं को तराशें। संकट के समय योग और ध्यान से ही हम जीवन को सुखी बना सकते हैं। यही एक मार्ग है जो हमें नीरोगता के पथ पर ले जाता है।

मैं यह बिल्कुल भी नहीं कह रही कि— आप योगी बनें। भले ही आप योगी न बने लेकिन इस संकट के समय सहयोगी और उपयोगी अवश्य बनें। अपनी चिंता को एक किनारे रख कर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से अपने को उन्नत अवश्य करें।

स्वामी विवेकानंद—
योग वह विज्ञान है जो हमें चित्त की परिवर्तनशील अवस्था से निरुद्ध कर उसे वश में करने की शिक्षा देता है।

173. मौन से करें संवाद

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मौन से अभिप्राय यह नहीं है कि— हम सिर्फ वाणी से चुप हो जाएं और बोलना बंद कर दें यानी वाणी को लगाम लगा लेना मौन की श्रेणी में नहीं आता। सच्चा मौन तो विचारों से मुक्ति है। मौन रहकर मनुष्य अपने अंदर झांकता है। जिससे वह अपनी अंतरात्मा से संवाद करता है, उस को जाग्रत करने की कोशिश करता है।

अंतरात्मा या यह कहें कि—आत्मा को जागृत करने की कोशिश करता है, जो सुप्तावस्था में है। आत्मा जो अजर- अमर है। अगर एक बार उसका अपनी आत्मा से संपर्क हो गया तो समझो उसने परमतत्त्व ईश्वर के साथ साक्षात्कार कर लिया।

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है की— बोलो या न बोलो, कहीं भी रहो, यदि तुम्हारा मन 24 घंटे ईश्वर के ध्यान में लगा हुआ है और प्रसन्न है तो वही मौन है। फिर गाओ तो भी मौन और चुप हो जाओ तो भी मौन। मन प्रसन्न है, तब खुशी मनाओ तो भी मौन और एकांत में बैठ जाओ तो भी मौन। ध्यान देना, कुछ नहीं करने की अवस्था नहीं बल्कि होने की अवस्था का नाम मौन है।

इससे यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि— श्री कृष्ण स्वयं यह कहते हैं की वाणी को लगाम देना मौन नहीं है बल्कि पूरा समय ईश्वर में ध्यान लगाना मौन की अवस्था को प्राप्त करना है। बहुत सारे ऋषि-मुनियों ने मौन को धारण किया। उन्होंने अपने जीवन का बहुत लंबा समय मौन रहकर या पहाड़ों, गुफाओं में एकांत अवस्था में रहते हुए व्यतीत किया और उस परमात्मा से अपने आप को एकाकार किया। लेकिन हमने मौन को केवल चुप रहना ही समझ लिया। हम अकेले बैठ जाते हैं और बोलना बंद कर देते हैं, यही मौन की परिभाषा है। लेकिन वास्तव में मौन ऐसा नहीं है। मनुष्य अकेला बैठता है तो उसके दिमाग में विचार ही विचार आते रहते हैं। हम अपनी जुबान पर तो रोक लगा सकते हैं लेकिन विचारों पर रोक लगाना हमारे सामर्थ्य से बाहर है। लेकिन जब किसी सिद्ध पुरुष के सानिध्य में बैठे हैं तो मन की हलचल स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं और हमें शांति महसूस होने लगती है।

मेरा मानना है कि यदि मनुष्य अपने जीवन में कुछ समय सिर्फ अपनी जुबान पर लगाम लगा ले तो वह भी, भले ही कुछ समय ही सही, मौन धारण तो कर ही सकता है। क्योंकि जिसको देखो, उसको सुनाने की लगी रहती है। वाणी पर बिल्कुल भी कंट्रोल नहीं है। बहुत ज्यादा बोलते हैं। अगर मौन धारण करेंगे तो कम बोलेंगे और कम बोलेंगे तो ज्यादा झूठ नहीं बोलेंगे। एक तो वह झूठ बोलने से बचेंगे और दूसरा किसी की निंदा करने से बचेंगे। इससे एक तो यह फायदा होगा कि उनमें सच बोलने की भावना पनपने लगेगी और दूसरा उनमें मौन रहने की क्षमता भी विकासित हो जाएगी।

बहुत से मनुष्य ऐसे भी हैं जो यह दावा करते रहते हैं की हम सिर्फ मौन की भाषा ही समझते हैं। वास्तव में देखा जाए तो मौन को समझने की आवश्यकता ही क्या है? मौन कोई समझने की भाषा नहीं है। कोयल की कुहू- कुहू कोई समझने का विषय है। नदी के कल- कल को क्या भाषांतर की जरूरत है। चांद धीरे-धीरे निकलता है, उसे समझने की जरूरत नहीं है, उसे देखना ही पर्याप्त है। हवा की सरसराहट क्या कोई समझ पाया है, उसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है। इसी तरह मौन है, इस का आनंद लो। शब्दों में सब कुछ नहीं कहा जा सकता।

मौन को समझने के लिए कोई साधन नहीं है और उसे समझने की चेष्टा भी नहीं करनी चाहिए। बस अपने आप को मौन में उतारने की आवश्यकता है। ध्यान देना, कुछ नहीं करने की अवस्था नहीं बल्कि होने की अवस्था का नाम मौन है। आप एक बार अपने जीवन में मौन रहने की कोशिश जरूर करना। शुरू- शुरू में बाहरी आवाजें बहुत आएंगी क्योंकि हम चुप हो जाते हैं। जब हम बोल रहे होते हैं तो बाहरी आवाजों का हिस्सा होते हैं। अब मौन हो गए तो बाहरी आवाजें हमारे ऊपर हावी होने लगती है। थोड़ा- सा धैर्य रखने की जरूरत है। तत्पश्चात् बाहरी आवाजें कितनी भी हों, शोर कितना भी हो, मौन रखने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लगातार अभ्यास करते रहने से बाहर की आवाजें सुननी बंद हो जाती हैं और अंदर की आवाजें सुनाई देने लगती हैं।

जब हमें अपने ही अंदर की आवाजें सुनने लगें तो हम ध्यान की अवस्था को प्राप्त करने लगते हैं। अनेक प्रकार की आवाजें हमारे अंदर से आने लगती हैं। उस समय डरना नहीं है बल्कि उनको शांत करना है। यह सच है कि उनको शांत करना थोड़ा- सा मुश्किल है परंतु अपने आप पर विश्वास और थोड़ा- सा धैर्य हमें उस अवस्था से भी पार ले जाता है।

उसके बाद मौन की एक और अवस्था आती है कि— अंदर की आवाज आनी बंद हो जाती हैं और हम बिल्कुल शांत हो जाते हैं। एक सन्नाटा छा जाता है और हमारे विचार बंद हो जाते हैं। हम शांत चित्त होकर सिर्फ एक दृष्टा की भांति उनको देखते रहते हैं‌। यही मौन की असली अवस्था है। इस अवस्था में हम अपनी आत्मा से संपर्क करके परम तत्व परमात्मा में एकाकार होने की कोशिश में लग जाते हैं। जब हम उस परम तत्व से संपर्क स्थापित कर लेते हैं तो असलियत में यही मौन है और यही आत्मा की चेतन अवस्था है।

रमण महर्षि कहते हैं कि— भाव विचार शुन्य हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसी सिद्ध पुरुष का हाथ हमारे सिर पर होना बहुत आवश्यक है। उनका होना हमें संतुलित करता है।

मौन एक ऐसी साधना है, जिसमें किसी भी प्रकार का दासत्व एवं अहंकार नहीं होता। मौन रहकर मनुष्य स्वयं को जानने की कोशिश करता है। मौन एक ऐसा समर्पण है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार आता है जो मौन धारण करना सीख लेता है, उसको भक्ति अपने आप आ जाती है। मौन एक प्रकार की भक्ति ही है, जिसमें भक्त मौन रहकर सिर्फ अपने ईश्वर के बारे में विचार करता है। जो मौन धारण कर लेते हैं, उनको सिर्फ नाद मुक्त वीणा की आवाज ही सुनाई देती है। मौन एक ऐसी साधना है जो भक्ति, प्रेम, करुणा और उपासना का संगम है।

भक्ति भाव के इस संगम को प्राप्त करने के लिए मौन सबसे अच्छा माध्यम है‌। मौन साधन भी है और श्रद्धा भी। उत्तम वाणी भी मौन की श्रेणी में आती है। जो मौन की भाषा को समझ गया, वह अपनी वाणी को वश में करना सीख जाता है और जो वाणी को वश में करना सीख जाता है, समझो उसने मौन की भाषा सीख ली है। इसलिए जितनी आवश्यकता हो, उतना ही बोलना चाहिए और यदि बोलना पड़े भी तो सिर्फ सत्य बोलें।