65. निराश व्यक्तित्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के मशीनरी युग में ज्यादातर व्यक्ति निराशा रूपी अंधकार में डूबे हुए हैं। उनके दिलो-दिमाग पर निराशा रूपी राक्षस ने अपना डेरा जमा रखा है। उनके चारों तरफ का वातावरण निराशा रूपी धुएं से भरा हुआ है, जिसमें से रोशनी की एक छोटी-सी भी उम्मीद भरी किरण दिखाई नहीं देती। उन्होंने अपने आपको समाज से, रिश्ते-नातों से, अलग-थलग कर लिया है। उनके दिलो-दिमाग पर केवल एक चीज हावी है और वह है निराशा। क्योंकि उन्होंने अपने दिमाग में निराशा रूपी बीज को धारण कर लिया है और उनका, उससे बाहर निकलना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है।

ऐसे लोग एकांत पसंद होते हैं। उनके भीतर यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि- हम कौन हैं? इस दुनिया में क्यों आए हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? फिर इस सवाल की तलाश में वे अपने अंतर्मन में उलझते रहते हैं। जहां पहले ही निराशा रूपी दानव ने अपना आधिपत्य स्थापित किया हुआ है, जिससे उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगती है और वे स्वयं घुटते रहते हैं। थक- हार कर वे बाहर की दुनिया में जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें वहां से भी केवल निराशा ही मिलती है, क्योंकि बाहरी दुनिया से तो वे पहले ही नाता तोड़ चुके होते हैं। ये दुनिया तो उनके लिए बिल्कुल निराली है। क्योंकि बाहरी समाज में संबंध,समता, समन्वय, संवाद, सम्मान और सेवा अनिवार्य तत्व हैं। इन्हें ठुकरा कर हम इस समाज में स्थायित्व स्थापित नहीं कर सकते। ये सकारात्मक विचारों वाले व्यक्ति ही कर सकते हैं।

निराशा से भरे व्यक्ति को तो अंधकार के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसे लोग तो भगवान के घर में जाकर भी नकारात्मक विचारों से ही भरे रहते हैं। कहते हैं कि एक बार संत सूरदास से किसी निराश और हताश व्यक्ति ने पूछा कि- आप रोज भगवान के घर में जाते हो, आप तो देख भी नहीं सकते। फिर भी किस लिए अपना समय बर्बाद करते हो। संत सूरदास ने बड़ा सुंदर जवाब दिया—मैं तो नहीं देख सकता, लेकिन मेरा परमात्मा तो मुझे देख सकता है। मैं वहां इसलिए नहीं जाता कि मैं भगवान को देख सकूं, उसे रिझा सकूं। मैं तो भगवान के चरणों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने जाता हूं, कि आपने मुझे जो मानव शरीर दिया है, उसका शुक्रिया अदा कर सकूं। उसने फिर प्रश्न किया कि आपको अपने अंधे होने पर भगवान से कोई शिकायत नहीं है। तब संत शिरोमणि ने कहा—कि इसमें भी भगवान का कोई उद्देश्य होगा, वरना बगैर कोई उद्देश्य के वे मुझे अंधा क्यों बनाते। ये सकारात्मक और ऊंचे लोगों के देखने का, सोचने का दृष्टिकोण होता है। जबकि निराशा से भरे व्यक्ति को हर जगह नकारात्मकता का बोध होता रहता है। अपनी नकारात्मक सोच के कारण ही अपनी जिंदगी को बर्बाद करने पर उतारू रहता है।

इस संबंध में एक कथा प्रचलित है—एक बार एक आदमी कुएं पर पानी पी रहा था, तो उसे पानी पिलाने वाली बहन ने मजाक में कह दिया कि तेरे पेट में छोटी सी मछली चली गई। असल में एक छोटा सा पत्ता था, जो कुएं के पास लगे पेड़ से गिरा था। उस आदमी के दिमाग में यह बात बैठ गई, कि मेरे पेट में मछली चली गई। अब मैं ठीक होने वाला नहीं हूं। उस व्यक्ति के परिजनों ने बहुत इलाज करवाया, किंतु वह किसी से भी ठीक नहीं हुआ। तब एक अनुभवी वृद्ध वैद्य ने उस व्यक्ति का पूरा इतिहास सुना और सुनने के बाद उस आदमी को कहा, बेटा तू ठीक हो जाएगा। क्योंकि अब मछली के निकलने का समय आ गया। वैद्य ने उस पानी पिलाने वाली बहन को कहा कि उस आदमी को उसी कुए पर लाकर पुन: पानी पिलाना। जैसे ही वह व्यक्ति अंजलि बनाकर पानी पीने बैठा तो पीछे से किसी ने उसे जोर का थप्पड़ लगाया और कहा कि देखो वह मछली निकल गई। कितनी बड़ी होकर निकली। अगले दिन से वह आदमी धीरे-धीरे ठीक होने लगा। महीने भर बाद वह आदमी एकदम ठीक हो गया।

निराश व्यक्तित्व की यही गलतफहमी होती है -न किसी ने मछली पेट में जाती देखी, न बाहर आते देखी। अगर मनुष्य के दिमाग में कोई बात बैठ जाती है, तो वह असंभव को भी संभव बना देता है। एक बार किसी व्यक्ति को निराशा रूपी अंधकार में ढकेल दीजिए। फिर वह कुछ करने योग्य नहीं रहता। निराशा रूपी राक्षस को आप खुद पैदा करते हैं। आप खुद ही अपने दुश्मन बन जाते हैं।आप अपने आप से ही हार मान लेते हैं। जिससे आपके जीवन में समस्याओं का अंबार लग जाता है। बीमारियां आपको घेर लेती हैं। आप शारीरिक और मानसिक तौर पर टूट जाते हैं। जीवन आपको बोझ लगने लगता है। हर समय उदास और बेचैन रहते हैं। आप धीरे-धीरे अपने जीवन के उद्देश्य से भटक जाते हैं और आप निराशा के अंधकार से बाहर नहीं निकल पाते।

64. आत्मचिंतन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

महात्मा बुद्ध ने आत्मचिंतन के विषय में कहा है कि— “मनुष्य जितना अधिक आत्मचिंतन से सीख सकता है, उतना किसी बाहरी स्रोत से नहीं।” आत्मचिंतन की प्रवृत्ति वाला मनुष्य हमेशा अपने दोषों को सूक्ष्मता से देखता है और उनको अपनी आत्मिक शक्ति से दूर भी करने में समर्थ होता है। क्योंकि आत्मचिंतन स्वयं को परखने की प्रक्रिया है। हमारे ग्रंथों में ऋषि-मुनियों ने आत्मचिंतन को स्वाध्याय भी कहा है। यह स्वयं के द्वारा, स्वयं की चिकित्सा है। यह अंतस पर पड़े हुए तामसिक विचारों की परत को अलग कर देती है।

आज के समय भौतिक वस्तुओं का हमारे मानस पटल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कर्मों के प्रवाह में बहते हुए हमें उचित और अनुचित का आभास ही नहीं हो पाता। ऐसी विकट परिस्थितियों में आत्मचिंतन ही मनुष्य को मानसिक शांति प्रदान करता है। हमें प्रतिदिन अपना कुछ समय आत्मचिंतन के लिए अवश्य निकालना चाहिए। जिससे हमें अपनी त्रुटियों का बोध होता रहे। आत्मचिंतन से हम स्वयं को जान पाएंगे, समझ पाएंगे और स्वयं से रिश्ता जोड़ पाएंगे।

अक्सर देखा जाता है की हम दूसरों को कहते रहते हैं कि हम उनको समझ नहीं पा रहे हैं कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? ऐसा क्यों बोल रहे हैं? उनका व्यवहार ऐसा क्यों है? ठीक है, उनको नहीं समझ पाये, कोई बात नहीं, कभी अपने व्यवहार के बारे में सोचा, मैं ऐसा क्यों बोलता हूं? मेरा व्यवहार ऐसा क्यों है? यह तो समझ में आना चाहिए। जब तक हम अपने बारे में नहीं समझ सकते, तब तक किसी दूसरे को समझना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए यह सोचने की भी कोशिश नहीं करनी चाहिए कि वह ऐसा क्यों करता है? क्योंकि हम कितनी भी कोशिश क्यों न करें, हमें दूसरे का आचरण, व्यवहार तब तक समझ में नहीं आएगा, जब तक कि हम खुद को नहीं समझ लेंगे। जब तक हम स्वयं का रिश्ता स्वयं के साथ नहीं जोड़ेंगे, तब तक दूसरों को समझना बहुत ही मुश्किल है। जब हम स्वयं को समझ लेते हैं, तो दूसरे मनुष्य हमें अपने आप समझ में आने लगते हैं। जब हमें यह समझ में आ जाएगा कि हमें गुस्सा क्यों आता है और गुस्से के वक्त हमारे अंदर क्या-क्या घटित होता है, तो दूसरों के गुस्से को भी समझना हमारे लिए आसान हो जाता है और यह होता है आत्मचिंतन से।

आत्मचिंतन से हम अपने आप को अच्छी तरह से जान पाते हैं।आत्मचिंतन से जब हम अपनी मनोस्थिति को शांत, स्थिर, शीतल, संतुलित और सुखमय बना देते हैं, तो हम देखेंगे कि कोई भी परिस्थिति हमें दुखी, परेशान या क्रोधित नहीं कर सकती। हमारा शांत और खुशनुमा चेहरा अपने बिगड़े हुए रिश्तो में सुधार लाएगा और नए रिश्तों को भी सुंदर और मधुर बना देगा। इसलिए अपनी मनोस्थिति को सदा शक्तिशाली, खुशहाल, सकारात्मक व सुखदायी बनाने के लिए कुछ समय अपने लिए निकाल कर परमात्मा का चिंतन अवश्य करना चाहिए। इससे अंतरात्मा को शुद्ध संकल्प, स्फूर्ति और उमंग, उत्साह की ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारे मन में व्यर्थ और नकारात्मक विचारों का प्रभाव बंद हो जाता है और आंतरिक बल, क्षमता व प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाले सकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगते हैं।

आत्मचिंतन करने से आत्मा-परमात्मा की सुखद स्मृति में रहते हुए, कर्म करने से, हर कार्य में कुशलता प्राप्त होती है। इसके नियमित अभ्यास से व्यक्ति की वृत्ति-प्रवृत्ति, स्वभाव- संस्कार सकारात्मक एवं सुखदायी बन जाते हैं और आपसी संबंधों में स्नेह, सद्भाव, मधुरता व सहानुभूति स्वाभाविक रूप में आ जाती है।आत्मचिंतन से जीवन में नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। मनुष्य के अंत: करण पर अशुभ कर्मों का जो प्रभाव पड़ता है, आत्ममंथन से उसे अति शीघ्र दूर किया जा सकता है। सांसारिक कार्यों में मनुष्य कई बार इतना तल्लीन हो जाता है कि वह अपने जीवन की सभी खुशियों से वंचित होकर दुखों के अज्ञात बोझ को न चाहते हुए भी लादे फिरता है।

भौतिक जंजाल से ग्रस्त होकर विवेक हिनता के साथ न करने योग्य कार्यों को भी करता जाता है। यह स्थिति मनुष्य के जीवन में दुखों की बाढ ला देती है। हमारी चिंतन परंपरा में आत्ममंथन को साधना के मार्ग का प्रवेश द्वार कहा गया है। आत्मचिंतन से मनुष्य नर से नारायण तथा पुरुष से पुरुषोत्तम की उपाधि को प्राप्त कर सकता है। इसी के द्वारा अंतर्मन में सद्गुणों की संपत्ति का उदय होता है तथा अधोगति की ओर ले जाने वाली तामसिक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगता है। आत्मिक चिंतन मनुष्य जीवन को आध्यात्मिक आनंद की अनुभूतियों की ओर ले जाता है।

63. सफल जीवन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सफल जीवन की कोई परिभाषा नहीं है। कैसा जीवन जिएं, जिससे हमें आनंद की प्राप्ति हो। इसके संबंध में सभी के अपने-अपने मत हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि जीवन के संबंध में उसका मत ही सबसे अच्छा है, सर्वश्रेष्ठ है। प्रत्येक व्यक्ति का, जीवन जीने का नजरिया भिन्न-भिन्न होता है। सभी अपने अनुसार जीवन जीना चाहते हैं। किसी का जीवन खुशहाल और आनंदमय होता है, तो किसी का दुखदाई। कोई मनुष्य देशकाल, समय तथा परिस्थितियों के अनुसार ही अपने जीवन को ढालने का प्रयास करता है और उसी में खुश रहता है। उसे ऐसे ही जीवन में खुशी मिलती है और आनंद का अनुभव प्राप्त करता है।

विषम परिस्थितियों में भी वह लहरों के विपरीत बहना उचित मानता है। उदाहरण स्वरूप हम नदी को नाव में बैठकर पार कर रहे हैं और अचानक दुर्घटना हो जाती है। तब नदी को किसी भी तरह पार करने में ही बुद्धिमता कही जा सकती है । ऐसे विरले ही होते हैं जो विषम परिस्थितियों में नदी की विपरीत धाराओं को तैर कर पार करते हैं, अर्थात् संघर्ष कर नया रास्ता अख्तियार करते हैं। ऐसे मनुष्य संघर्ष का रास्ता अपनाते हुए, अपने जीवन को सफल बनाते हैं। कोई अत्यधिक अनुशासन और अधिक तप वाले जीवन को अच्छा कहता है, तो कोई “खाओ पियो मौज उड़ाओ” वाली प्रवृत्ति वाले जीवन को सफल जीवन की श्रेणी में रखता है। वैसे देखा जाए तो एक संतुलित और आत्मानुशासन वाला जीवन ही सफल जीवन कहा जाना चाहिए।

एक बार गौतम बुद्ध से राजकुमार श्रोण ने दीक्षा ली और अत्यधिक कठोर अनुशासन और तप का जीवन जीने लगा। इससे उसका शरीर सूख गया। शरीर के नाम पर हड्डियों का ढांचा ही शेष बचा था। बुद्ध को लगा श्रोण की यह हालत उनकी कठोर तपस्या के कारण हुई है। उन्होंने श्रोण से कहा— मैंने सुना है तुम सितार बहुत अच्छा बजाते हो। क्या मुझे सुना सकते हो?

श्रोण ने कहा— आप अचानक क्यों सितार सुनना चाहते हैं?

बुद्ध ने कहा— न सिर्फ सुनना चाहता हूं, बल्कि सितार के बारे में जानकारी भी प्राप्त करना चाहता हूं। मैंने सुना है कि यदि सितार के तार बहुत ढीले हों या बहुत कसे हुए हों तो उससे संगीत पैदा नहीं होता।

श्रोण ने कहा— आपने बिल्कुल ठीक सुना है। यदि तार अत्यधिक कसे हुए होंगे तो टूट जाएंगे और यदि ढीले होंगे तो स्वर बिगड़ जाएगा।

बुद्ध मुस्कुराए और बोले— जो सितार के तार का नियम है, वही जीवन का भी नियम है। मध्य में रहो। न अधिक भोग की अति करो, न तप की।

महात्मा बुद्ध की यह बात उत्तम है कि हमें सफल जीवन जीने के लिए, जीवन में संतुलन स्थापित करना चाहिए। मानव रूप में यह हमें अनमोल जीवन मिला है। इस जीवन रूपी पथ के हम यात्री हैं। हमारी यात्रा तभी सफल और मंजिल तक पहुंचने में कामयाब होगी, जब हम सावधानी से यात्रा करेंगे। आपने अक्सर देखा होगा कि सड़क के किनारे बोर्ड पर जगह-जगह लिखा होता है कि— सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। यह सावधानी अत्यंत आवश्यक है। यह तभी होगा, जब हमारे जीवन में संतुलन स्थापित होगा और यह संतुलन जीवन संबंधी नियमों का पालन करने से ही आएगा।

वेदों में कहा गया है कि जीवन का निर्माण और विनाश दोनों हमारे हाथों में है। निर्माण करने का बेहतर तरीका क्या हो? इसे जो जानता है, उसका जीवन दूसरों के लिए प्रेरक बन जाता है। जीवन रूपी सितार से मधुर संगीत तभी बजता है, जब जीवन रूपी सितार के तार न कसे हों और न ढीले हों। जीवन में प्रत्येक वस्तु का संतुलन हों। क्षमता से अधिक श्रम करना या आलस्य में पड़े रह कर कोई भी कार्य न करना दोनों ठीक नहीं हैं। इसके लिए हमें अध्यात्म को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। क्योंकि अध्यात्म जीवन को संतुलित करता है। ऐसे जीवन का निर्माण करता है जो स्वयं के लिए सर्वोत्तम होता है और दूसरों के लिए प्रेरणादायक। जीवन रूपी सितार से निकले मधुर स्वर स्वयं को प्रिय लगते हैं और दूसरों को भी आकर्षित करते हैं। ऐसे जीवन के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा होता है और वह हमारे जैसे सफल जीवन की कामना करने लगते हैं।

संपूर्ण ब्रह्मांड नियमों से संचालित होता है। नियमों का पालन करना बेहद आवश्यक है। हमें स्वयं व्यवस्थित रहकर अपने कर्म करते रहना चाहिए। यही सबसे बड़ा नियम है। यही आध्यात्मिक जीवन है। जबरदस्ती भूखे- प्यासे रहना और शरीर को जर्जर करना आध्यात्मिक जीवन नहीं हो सकता। यदि जीवन रूपी यात्रा में हम विपरीत परिस्थितियों में घिर जाएं, तो उस समय थोड़ा ठहर जाएं, शांत मन से रास्ता खोजने की कोशिश करेंगे तो कोई न कोई रास्ता अवश्य मिलेगा। यदि कोई रास्ता न मिले तो एक बार नदी की विपरीत धारा से संघर्ष कर धैर्य, विवेक और साहस से तैर जाना चाहिए। नया जीवन बनाना, यही जीवन को, श्रेष्ठतम बनाने की सार्थक कला होगी। यही कला सीख कर जीवन सफल बन सकता है।

62. आत्मबल का प्रकाश

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रकाश अपने आप में एक पूर्ण शब्द है। यह जीवन का पर्याय है। जीवन में कई बार अनुकूल और सकारात्मक परिस्थितियां होने के बावजूद भी किसी मनुष्य को उचित फल प्राप्त नहीं हो पाता। दरअसल इसका प्रमुख कारण कर्म से ज्यादा आसक्ती में लिप्त होना है। यहां पर मनुष्यों में इच्छाशक्ति और आत्मबल का अभाव परिलक्षित होता है। अक्सर देखने में आता है कि हम राह पर चलने और आगे बढ़ने की बजाय मंजिल के दिवास्वप्न में ही खो जाते है और जिसके परिणाम स्वरूप चलना ही भूल जाते हैं, जो जीवन रुपी यात्रा के लिए बेहद आवश्यक है। उस समय हमारे पास आगे बढ़ने के लिए चाहे लाख संसाधन उपलब्ध हों, परंतु जब चलेंगे ही नहीं, तो लक्ष्य तक पहुंचेंगे कैसे?

अक्सर देखा जाता है कि मनुष्य के अंदर लक्ष्य प्राप्त करने की इच्छा तो बलवती होती है, परंतु उसको प्राप्त करने के लिए कर्म के प्रति हमारा आत्मबल ही कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में हमें आत्मबल के प्रकाश की जरूरत होती है। वास्तव में देखा गया है कि जब कर्म का उद्देश्य अंतःकरण से आता है, तब आत्मबल स्वत: सशक्त हो जाता है। फिर उस कर्म के प्रभाव भी निष्कलंक होते हैं। स्वार्थ और छल से रहित कर्म ही वास्तविक कर्म है और आत्मबल इसका प्रेरक है। यदि एक असहाय और दुर्बल- सा व्यक्ति भी कर्मठ और आत्मबल का धनी है, तो वह असाध्य को भी साध सकता है। दशरथ मांझी इसके अद्वितीय उदाहरण हैं। शारीरिक अक्षमता को प्राप्त दिव्यांग भी गजब के एथलीट और खिलाड़ी बन जाते हैं। इसके पीछे जिस जादुई शक्ति का हाथ होता है, वही आत्मबल है।

गुरु नानक देव एक ऐसे ही आत्मबल के धनी व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व से आत्मबल का प्रकाश हमेशा झलकता रहता था। एक बार गुरुजी जगन्नाथपुरी गए, तो उस समय मंदिर में सायंकाल की आरती हो रही थी। वह आरती में भाग लेने के स्थान पर दर्शकों की कतार में खड़े हो गए। वहां उपस्थित लोग उनकी दिव्य आभा को देखकर समझ गए कि यह कोई परम धर्मात्मा है। लोगों ने उनसे आरती में भाग लेने को कहा तो गुरुदेव जी ने प्रेम पूर्ण भाव से कहा कि— परमात्मा की आरती तो संपूर्ण सृष्टि कर रही है। आवश्यकता है उस व्याप्त विस्माद को जानने की। इस अवसर पर उन्होंने एक शब्द उच्चारित किया। वह शब्द श्री गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित है।

गुरुजी ने कहा कि— सारा आकाश आरती के थाल जैसा है। जिसमें सूर्य और चंद्रमा दीपक की तरह प्रकाशित हो रहे हैं। संपूर्ण तारामंडल आरती की थाली में सजे हुए अनमोल मोतियों की भांति शोभा बढ़ा रहे हैं। दक्षिण में मलयगिरी पृर्वतों की श्रृंखला हैं, जिस पर चंदन के वृक्ष उगते हैं। उन चंदन के वृक्षों का स्पर्श करके आने वाली सुगंधित वायु ही धूपबत्ती का कार्य कर रही हैं और मंद पवन का चंवर हिलाया जा रहा है। धरती पर खिले हुए सारे पुष्प आरती की थाली में रखे गए पुष्पों की तरह हैं, जो परमात्मा के चरणों में अर्पित किए जाने वाले हैं। गुरुदेव के द्वारा किया गया आरती का यह वर्णन अद्भुत है।

मानव जीवन का यह परम कर्तव्य है कि वह अपनी ऊर्जा के केंद्र, इस आत्मबल को जागृत करे और आत्मबल की इस शक्ति को पहचानें। शुद्ध, निर्मल और स्वच्छ विचारधारा तथा मन, शरीर, आचरण और व्यवहार आदि का योग आत्मबल के दरवाजे को खोल देता है। कलुषित मन या इच्छा पाप का कारण बनती हैं जो तीव्र इच्छाशक्ति तो उत्पन्न कर सकती हैं, परंतु आत्मबल को क्षीण करती हैं। आत्मसंयम का चरम पायदान आत्मबल की नींव रखता है।

भोग से योग की ओर प्रस्थान ही स्वयं का सशक्तिकरण है और यही आत्मविश्वास का उद्गम भी है। ईश्वर सभी जीवों के अंतर्मन में निवास करता है और उनके प्रकाश से ही सारी सृष्टि प्रकाशित हो रही है। ईश्वर के इस अप्रकट रुप का दर्शन, धर्म के मार्ग पर चलने वाले ही कर पाते हैं। ईश्वर सत्य को धारण करने वालों पर ही अपनी कृपा करते हैं और उनकी भक्ति को ही स्वीकार करते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम उस ईश्वर से ऐसी प्रार्थना करें जिससे हमारे आत्मबल का प्रकाश चारों ओर फैलनें लगे।

61. अपनी भूमिका पहचानें

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह विश्व एक रंगमंच है और ईश्वर उसके निर्देशक हैं। इस संसार के सभी प्राणी कठपुतली हैं और उनकी डोर उस परम ब्रह्म ईश्वर के पास है, जो हमें कठपुतली की तरह नचाते रहते हैं। हम सभी मनुष्य मानो रंगमंच के पात्र हैं। हमें कब और किस समय कितनी भूमिका निभानी है और कौन- सी भूमिका निभानी है, यह सब ईश्वर के हाथ में ही है। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि जैसे—निर्देशक जो पिक्चर बनाता है, वह अपने सभी पात्रों से ऐसे ही एक्टिंग करवाता है, जैसे वह चाहता है, यानी अपनी पिक्चर के प्रत्येक पात्र को कठपुतली की तरह नचाता रहता है। ऐसे ही हमारे जीवन की डोर ईश्वर के हाथ में है। वह हमारा निर्देशक है और हम रंगमंच के पात्र हैं जैसे— निर्देशक को पता होता है कि हमें कौन-सी भूमिका निभानी है और हमारी भूमिका कितनी लंबी चलने वाली है। वैसे ही ईश्वर को पता है। इन सब का निर्धारण करना उस विधाता के हाथ में ही है। वही परमपिता परमेश्वर ही प्रत्येक पात्र की क्षमता, योग्यता, कुशलता, पात्रता का परीक्षण कर उन्हें उनकी क्षमता के अनुरूप भूमिका वितरित करता है।

जिस प्रकार एक एक्टर अपनी एक्टिंग से निर्देशक को खुश कर देता है, तो निर्देशक उसे अपनी अगली पिक्चर में और अच्छा रोल प्रदान करता है। उसी प्रकार जो मनुष्य अपनी एक्टिंग से ईश्वर को प्रभावित करने में सक्षम रहता है, उसकी भूमिका का विस्तार भी उसी अनुपात में होता रहता है और जो ईश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते, उनकी भूमिका भी उसी अनुपात में सीमित होती जाती है। यहां एक्टिंग से अभिप्राय कर्मों से है, इस संसार रूपी रंगमंच पर जन्म लेने के बाद, जो जैसे कर्म करता है, उसको वैसा ही फल ईश्वर प्रदान करता है। हमारे कर्मों के अनुसार ही भाग्य का निर्माण होता है।
अपने उद्भव के समय से ही मनुष्य के मन में यह जिज्ञासा सदैव उत्पन्न होती रहती हैं कि— आखिरकार इस धरती पर मनुष्य के आने का उद्देश्य क्या है? उसकी भूमिका क्या है? क्या उसका जन्म लेना संघर्ष करके कुछ अर्जित कर लेना, बच्चे पैदा करना, फिर अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करते हुए, समय आने पर इस संसार को छोड़कर, चले जाना ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है? क्या यही उसकी भूमिका है कि— इस संसार में बार-बार जन्म लो, संसार रूपी रंगमंच पर अपना रोल प्ले करो और जैसे ही रोल खत्म हो इस संसार को छोड़कर चले जाओ।
84 लाख प्रकार के जीव इस धरती पर जन्म लेते हैं। जीवन धारण करते हैं और यथा समय सभी जीव मृत्यु के आगोश में चले जाते हैं। मनुष्य भी इन्हीं में से एक जीव है जो इन्हीं की तरह जन्म लेता है। जीवन धारण करता है और यथा समय मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। लेकिन ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि और विवेक जैसे विशिष्ट बल से नवाजा है। ऐसा बल अन्य किसी जीव के पास नहीं होता। इसी कारण मनुष्य को इस धरती का श्रेष्ठतम प्राणी कहा जाता है। लेकिन मनुष्य अपने इन गुणों को पहचान ही नहीं पाता और वह हमेशा दुखों का रोना रोता रहता है। वह हमेशा ईश्वर से शिकायत करता रहता है कि यदि उसके जीवन की भी अन्य जीवों की तरह ही, यही अंतिम परिणति है, तो फिर वह विशिष्ट कैसे हुआ। लेकिन वह यह भूल जाता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थ पा लेना मनुष्य के जीवन का उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति करने की क्षमता केवल मनुष्य को ही मिली है, दूसरे किसी भी जीव को नहीं।

यदि मनुष्य किसी भी देवस्थान में जाकर अपनी निष्ठा व्यक्त करना धर्म समझता है तो क्षमा, अस्तेय, सत्य पवित्रता, क्रोध, कामादि पर नियंत्र करते हुए परमार्थ चिंतन भी धर्म की श्रेणी में आता है। अर्थ तो मनुष्य के पूरे के पूरे जीवन- व्यवहार का आधार ही है। किंतु अर्थ वही सार्थक है जो मेहनत और इमानदारी से अर्जित किया गया हो। काम भी तब तक पूर्ण करने योग्य है जब तक मर्यादा- विरुद्ध नहीं है और मुक्ति जन्म- मरण के असहनीय दुःख से छुटकारा देने वाली है। इसलिए मनुष्य को अपनी भूमिका पहचान लेनी चाहिए और जीवन में आने वाले दुखों को भी उसी प्रकार देखा जाना चाहिए कि अगर ईश्वर ने उन्हें दुख दिए हैं, तो उनका भार वहन करने की ताकत भी दी है।

ईश्वर की सत्ता ही सबसे बड़ी है। उन्होंने जो हमें अमूल्य जीवन दिया है, उसका हमें हर संभव, हर प्रकार से सदुपयोग कर उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। ईश्वर ने हमारे लिए सब कुछ अच्छा ही रचा है। यह तो मनुष्य का कलुषित चिंतन और अल्पज्ञता है कि —वह श्रेष्ठतम में भी कुछ न कुछ नकारात्मक ढूंढ कर उसे एकदम विपरीत ही मानता चला जाता है। इसी कारण मनुष्य उचित अवसर प्राप्त करने के बाद भी अपनी योग्यता, क्षमता, अज्ञानता के कारण विपरीत दिशा में जाकर अवसर को गंवा देता है और अपना ही अहित कर बैठता है। नियत प्रारब्ध से अधिक व समय से पहले ही बहुत कुछ हड़प लेने की चाह ही हमें सत्कर्म के राजमार्गों से भटकाकर निरर्थक राह पर उन्मुख कर देती है। जहां से लाख चाहने पर भी मनुष्य सही राह पर नहीं आ पाता और वह हमेशा संघर्ष ही करता रहता है। यह सब कुछ इसी कारण होता है कि हम उस भूमिका को पहचान नहीं पाते, जिसे अभिनित करने के लिए ईश्वर ने हमें इस पृथ्वी पर भेजा है। यदि समय रहते मनुष्य ने अपनी भूमिका को नहीं पहचाना, तो उसका जीवन निरर्थक है। इसलिए हमें समय रहते हुए उस भूमिका को पहचान लेना चाहिए जो स्वयं ईश्वर ने हमें सौंपी है।

60. प्रकृति एवं संघर्ष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य जीवन में सफलता की राह संघर्ष से ही खुलती है। लेकिन जब हम जीवन में संघर्ष से पीछा छुड़ाकर भागने लगते हैं, तो इससे कई नई समस्याओं और संघर्षों को आमंत्रित करते हैं। इस प्रकार हम समाधान निकालने की बजाय समस्या में और गहरे फंसते चले जाते हैं। लेकिन यदि हम संघर्ष करते हैं, तो राह में आने वाली बाधाएं हमें अनेक गुणों से सुसज्जित कर जीवन का प्रत्येक पहलू समझा देती हैं। देखा जाए तो संघर्ष वास्तव में मानव जीवन का वह पहलू है, जो उद्देश्य प्राप्ति के लिए आवश्यक होता है।

संघर्ष करके ही व्यक्ति विकट परिस्थितियों को अपने लक्ष्य के अनुसार पलट सकता है। संघर्ष व्यक्ति में परिपक्वता विकसित करने में अहम् भूमिका निभाता है। जब परिपक्वता आ जाती है, तो मनुष्य के भीतर धैर्य जैसा मूल्यवान गुण उत्पन्न होता है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विकट हों, हमारे अनुकूल न होने पर भी, हम संघर्ष का रास्ता चुन कर आगे बढ़ सकते हैं। जब कोई भी मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा होता है, तो उसमें प्रतिकूल अवस्था में विचलित न होने, जीवन की प्रत्येक बाधाओं और कठिनाइयों से स्वत: लड़ने की मानसिक स्फूर्ति और ऊर्जा आ जाती है, जो नकारात्मक विचारों को उसके पास फटकने नहीं देती और व्यक्ति संकल्पित होकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध हो जाता है।

यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि जीवन का प्रत्येक क्षण हमारे अनुकूल ही हों, ऐसे में हमें संघर्ष का रास्ता चुन कर आगे बढ़ना होता है। इसका अर्थ यह है कि— जो जीवन में संघर्ष करता है, वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। यही सफलता का मार्ग होता है। क्योंकि सफलता की प्रत्येक राह संघर्ष से ही खुलती है। संघर्ष के वक्त हमें स्वयं को शांत बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। परंतु इस स्थिति में संयत बने रहने में ही सफलता सुनिश्चित होती है।हमारे जीवन में परेशानियां, जीवन को गर्त में ले जाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मबल और इच्छाशक्ति को मजबूत बनाने के लिए आती हैं। जिसने भी अपने आत्मबल को मजबूत बना लिया, वह समझो जग जीत गया। इसके विपरीत यदि किसी ने अपनी इच्छाशक्ति और आत्मबल को मजबूत नहीं किया, परिस्थितियां उन्हें निराश कर देती हैं और गर्त में ले जाती हैं। परिस्थितियों का दबाव उसे झुका देता है क्योंकि हम मानवीय गुण- दोषों से युक्त हैं। स्वार्थ और मोह-माया के वशीभूत रहते हैं। लाभ-हानि के चक्कर में पड़े रहते हैं। कर्म फल जल्दी मिलने की लालसा शायद हमें इन सब बातों पर खरा उतरने में बाधक बनाती है।

ऐसे समय में हमें प्रकृति से सीखने की जरूरत है। प्रकृति हमें अपने व्यवहार से बहुत कुछ सिखाती है। इतनी ऊंचाई से गिरने के बावजूद भी बारिश की बूंदे बिखर कर रचनात्मक कार्य करती हैं। प्यासी धरती को सींचती है और उसे हरियाली की चुनरी ओड़ा देती है। धरती को खुबसूरती से नवाजती है। झर-झर बहते झरने अलौकिक आनंद प्रदान करते हैं। सचमुच टूटना- बिखरना भी कहीं इतना खूबसूरत हो सकता है। यह हमें प्रकृति से सीखना चाहिए। पता नहीं कितनों ने धान या गेहूं की बालियों से अनाज निकलते देखा होगा। इतने जोर से उन्हें पटकते हैं, फिर अनाज के मोती जैसे दाने गिरने लगते हैं। पेड़ धरती के भीतर दफन होकर दाब और ताप सहकर कोयला बनते हैं। सैकड़ों वर्ष धैर्य रखकर हीरा बन जाते हैं। सोना कुंदन बनने के लिए असहनीय ताप को सहता है। प्रकृति हमें प्रत्येक क्षण संघर्ष करने की सीख देती है। वह हमें संदेश देती है कि— जीवन में कठिनाइयों से कभी घबराना नहीं चाहिए। हर परिस्थिति में भी उचित कर्म करते रहना चाहिए।

क्रोध, ईष्र्या और घृणा जैसी नकारात्मक शक्तियों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। नहीं तो यह हमारे सोचने समझने की ताकत को क्षीण कर देती हैं। जीवन में धैर्य के साथ किए गए कर्म का पर्याय कुछ भी नहीं होता। प्रकृति सबसे बड़ी शिक्षक है। वास्तव में कोई भी विपरीत परिस्थिति आप को सफल बनाने की ओर पहला कदम होती है। यदि हम ऐसे ही संघर्ष करते रहे, तो जीवन और सहज तथा आसान बन जाएगा।संघर्ष उपरांत मिली सफलता व्यक्ति को आत्मीय सुख, सकारात्मक ऊर्जा और आशाओं से परिपूर्ण कर देती है। वास्तव में देखा जाए तो संघर्ष मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारकर उसकी पूर्ण क्षमताओं से एकाकार कराने का उपकरण है। संघर्ष ही सफलता प्राप्त करने की कुंजी है।

59. अर्थपूर्ण हों विचार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मन में विचार आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। विचार सबके मन में आते हैं। लेकिन विचार उसी के मान्य होते हैं, या महान् होते हैं, जो अर्थपूर्ण हों, जिनका अपना कोई अस्तित्व हो। इसलिए अर्थपूर्ण विचारों के लिए जरूरी है कि आपका दृष्टिकोण सकारात्मक हो। इसके लिए आप अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ें, घूमें, लोगों से मिलें, व्यस्त जीवन में से थोड़ा-सा समय ध्यान-योग के लिए निकालें आदि। फिर देखना कि आपका दृष्टिकोण कैसे सकारात्मक होता है। इसके साथ-साथ आपकी व्यवहार कुशलता भी सफलता के रास्ते पर अग्रसर करती है। बहुत अधिक परिश्रम करने के बाद भी, अगर दुर्भाग्य अपना काम कर रहा है और आपको असफलता की तरफ धकेल रहा है, तो व्यवहार कुशलता अपना कार्य बखूबी करती है। व्यवहार कुशलता और जनसंपर्क दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं। दोनों एक- दूसरे के मददगार हैं। जीवन में इन दोनों का एक साथ उपयोग करके देखिए। आपका सोचने-समझने का नजरिया बदल जाएगा। इसे यूं भी समझ सकते हैं कि— श्री राम जी बड़े व्यवहार कुशल थे और श्री कृष्ण जनसंपर्क में माहिर थे।

हमें अपने विचारों को गति देने के लिए निरंतरता की आवश्यकता रहती है। जब हम निरंतर अभ्यास करते हैं, तो हमारी योग्यता निखरती है। हम अपनी कमजोरियों से खुद की रक्षा कर पाते हैं। एक ऐसे दौर में, जब लगभग हर जगह नकारात्मक और निराशा का वातावरण हो, तब जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सिर्फ एक ही राह बचती है, वह है सकारात्मक सोच की। हमारे बड़े-बुजुर्ग भी सकारात्मक सोच रखने की सलाह देते हैं और मनोचिकित्सकों का भी कहना है कि सकारात्मक सोच रखने वालों को सफलता मिलने की संभावना, नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों की तुलना में ज्यादा होती है। यू एस नेशनल साइंस फाउंडेशन ने विचारों पर एक रिसर्च किया और पाया कि हमारे दिमाग में आमतौर पर एक दिन में 50 हजार विचार आते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 70% से 80% तक विचार नकारात्मक होते हैं। अब सवाल यह उठता है कि नकारात्मक विचारों को हम कैसे अर्थपूर्ण और सार्थक बनाएं।

युवाओं से हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे नौकरी के लिए सपने देखने या परेशान होने की बजाय अपने टैलेंट को समझकर उसे आज की जरूरतों के अनुरूप तराशना शुरू कर दें। अगर अपनी प्रतिभा को निखार लेंगे, तो आपको नौकरी के पिछे भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि नौकरी आपके पिछे-पिछे चलेगी। अगर आप प्रतिस्पर्धा में आगे रहना और मनोवांछित नौकरी आसानी से पाना चाहते हैं, तो कंफर्ट जोन में रहने की बजाय, बदलाव को समझने और उसके साथ कदमताल करने के लिए पुरजोर प्रयास करना होगा। इसके लिए सबसे पहले अपने पैशन को अच्छी तरह समझते हुए, उसे हर समय जीने की ओर कदम बढ़ाना होगा। जब आप ऐसा करेंगे, तो उसके लिए जरूरी सभी कार्यों को जानने और सीखने की कोशिश अवश्य करेंगे। आप अपने आपको जागरूक बनाएं और अपने पैशन की दिशा में प्रयास करें। अगर आपको पर्याप्त मौका नहीं मिलता, तो निराश होने या हाथ पर हाथ रखकर बैठने की बजाय दूसरा रास्ता खोजना होगा। यह रास्ता भी कहीं और नहीं, बल्कि आपके पास ही है। अगर आप इसका भरपूर फायदा नहीं उठाते या इसके लिए तत्पर नहीं रहते, तो इसका मतलब यह होगा कि आप मन से अपने को पहचान नहीं दिलाना चाहते और अकर्मण्य स्थिति में ही पड़े रहना चाहते हैं।

सफलता के लिए एक जुनून होना चाहिए। दृढ़ संकल्प और परिश्रम, ये सफल व्यक्ति के औजार हैं। कोई भी सफलता रातों-रात नहीं मिलती। मेहनत करनी पड़ती है। साथ ही साथ असफलता को स्वीकार करने की भी आदत डालनी पड़ती है। मेरा मानना है कि जुनून और धैर्य से आप लंबे समय तक काम कर सकते हैं और मनचाहा परिणाम हासिल कर सकते हैं। अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण आगे बढ़ने में बहुत सहायक होता है, क्योंकि किसी मुकाम तक पहुंचने के लिए हमारे विचार अर्थपूर्ण होने बेहद आवश्यक होते हैं। अगर हम हताशा और निराशा की स्थिति में रहेंगे तो हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचना कतई आसान नहीं होगा। ऐसे में हमारे जीवन में हम कोई भी कार्य करें, एक अनिश्चित- सी स्थिति बनी रहती है। इसलिए जुनून और समर्पण से अपनी नींव को मजबूत करना पड़ता है, तभी हम सफलता की सीढ़ी पर चढ़ते चले जाते हैं। ईश्वर ने हमें कोई न कोई प्रतिभा देकर इस संसार में भेजा है। आप ऐसे सैकड़ों- हजारों युवाओं को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए देख सकते हैं। फिर आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते? आप क्या सोचते हैं कि- आपमें ऐसी कोई प्रतिभा नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता। दरअसल आपको अपनी प्रतिभा का पता ही नहीं। जरा फिर से सोचें- विचारें और बाहर कुछ खोजने की बजाय अपने अंतर्मन में छिपी प्रतिभा की तलाश करना शुरू कर दें। आप ध्यान और योग का सहारा ले सकते हैं। फिर आप स्वयं देखेंगे और पाएंगे कि किस तरह आपके नकारात्मक विचारों की जगह सकारात्मक और अर्थपूर्ण विचारों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है।

आपके अंदर जो प्रतिभा छिपी हुई है, अगर उसको बाहर निकालने में आप सफल हो जाते हैं, तो भले ही आप कम पढ़े- लिखे हों और दूसरे मामलों में भी कमजोर हों, तो भी उतनी ही सफलता प्राप्त कर लेंगे, जितनी अत्यधिक पढ़े-लिखे और योग्य लोगों के खाते में आ पाती है। विंस्टन चर्चिल कहते थे कि—एक निराशावादी व्यक्ति को हर अवसर में कठिनाई दिखती है, वहीं एक आशावादी व्यक्ति को हर कठिनाई में अवसर दिखता है। सकारात्मक सोच तन और मन दोनों को स्वस्थ रखने में अहम् भूमिका निभाती है। ऐसी सोच न केवल आपके जीवन को संतुलित रखने में मदद देती है, बल्कि आपके रोजमर्रा के अनुभवों को भी आप ज्यादा सुखद बना पाते हैं। इससे जीवन के किसी भी बदलाव के साथ खुद को बदलने में भी मदद मिलती है। हमारे विचार ही हमारे व्यक्तित्व का आईना होते हैं। अर्थपूर्ण और सार्थक विचारों से ही हमारा व्यक्तित्व निखरता है और हम खुले आसमान में उड़ान भरने का हौसला रखते हैं।

58. दुख की अनुभूति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

दुख की अनुभूति तो अपनी मन: स्थिति पर निर्भर करती है। वह स्थूल न होकर निराकार होते हुए भी अति प्रचंड रूप ले सकती है। सत्य तो यह है कि—टेढ़े- मेढ़े रास्तों पर चलने से ही जीवन के कठिनतम पाठ कंठस्थ हो पाते हैं। जो जीवनयापन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ करते हैं। जिसने इस संघर्ष को चुनौती के रूप में स्वीकारा हो, उसे झेले गए कष्टों की पीड़ा कम होगी। निजी दु:खों के उस पार भी, एक दुनिया नए सिरे से खड़ी की जा सकती है। जीवन की बड़ी से बड़ी त्रासदियों को भी कभी-कभी हमारे एक्शन बौना बना सकते हैं। इतनीे भयानक त्रासदी हो जाने के बाद जीवन कहीं थम सा जाता है, वहीं से एक नई जीवन- रेखा भी शुरू हो सकती है।

शहीद स्क्वाड्रन लीडर समीर अबरोल की पत्नी गरिमा अबरोल ने यही कर दिखाया। उसने अपने आंसू पोंछ डाले। दर्द सीने में जब्त कर लिया और अपने दिल में उमड़ते दुख के बादलों को समेटकर उसी आसमान में उड़ने की तैयारी कर ली है, जिसमें कभी उसका हमसफर उड़ान भरता था। वह असाधारण हौसलों से बनी है, फौलादी इरादों से भरी है। उसने अपनी मन: स्थिति पर दुख को हावी नहीं होने दिया। वह एक मिसाल बन गई, उनके लिए जो अपने दुख का रोना रोते रहते हैं। शिकायतों का अंबार खड़ा कर देना उसका मकसद नहीं है और अपने भाग्य पर आंसू बहाना भी उसे गवारा नहीं है। गरिमा कोई अकेली नहीं है, जिसने अपने दुख की अनुभूति को अपने मानस-पटल पर हावी नहीं होने दिया। ऐसे बहुत सारे इंसान हैं, जो सकारात्मक जीवन जीने में विश्वास करते हैं। उनका मानना है कि— जैसे हम आनंद को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, उसी तरह पीड़ा को भी अदम्य साहस से भोगना आना चाहिए, वरना उससे पार पाना बेहद कष्टकारी होगा।

यह भ्रांति कि, समस्त दुख बाह्य परिस्थितियों की देन है और उसका निराकरण चारों ओर के प्रभामंडल को बदलने से ही हो सकता है, उपयुक्त नहीं है। यदि ऐसा होता तो समस्त सुख- सुविधाओं से लैस व्यक्ति संसार में सबसे सुखी होता। हमने तो गरीब की झुग्गी- झोपड़ी से फूटतीे किलकारीयों को सुना है। छोटे से बच्चे को सस्ता सा खिलौना पाते ही आनंद-विभोर होते और दूसरी ओर वैभव- सम्पन व्यक्ति को बिलखते देखा है। जीवन में सुख- दुख आते रहते हैं। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने कष्टों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। जितने ज्यादा संवेदनशील होंगे, दुख की अनुभूति उतनी ही ज्यादा होती है।

ईश्वर ने जीवन की भिन्न-भिन्न रंगों से अभूतपूर्व रचना की है। मनुष्य कितना भी चाहे कि उसके हिस्से में केवल सुख ही सुख हो, लेकिन संभव नहीं है। जहां सुख की लालसा हो, वहां कष्ट झेलने की क्षमता भी होनी चाहिए। पीड़ा एक सच्चाई है। जब हमारे अंतर्मन में शांति होती है,तो हमें सुख की अनुभूति होती है और जब अशांति होती है, तो दुख की अनुभूति होती है। हमारी हर एक सांस पर नादब्रह्म है। हमारे अलावा भीतर कोई है, जो सांस ले रहा है। जैसे गर्भवती के गर्भ में एक बच्चा सांस ले रहा होता है, वैसे ही हमारे भीतर परमात्मा सांस लेता है। भीतर-बाहर होती सांस पर ध्यान दें तो, उसकी ध्वनि सुनाई देगी और आप शांत हो जाएंगे। जब हमारा मन शांत होता है, तो हम आनंदविभोर होकर नाचने लगते हैं। तब हमारे हौसले इतने बुलंद होते हैं कि हम हर दुख का सामना करने को तैयार रहते हैं। लेकिन हम भीतर, दूसरों के शोर को इकट्ठा कर लेते हैं। विचारों की भीड़, एक-दूसरे पर दोषारोपण, अपनी किस्मत का रोना आदि। मानों हमारे अंतर्मन में विचारों का एक समुद्र हिलोरे मार रहा है। हमारे मन में दुख की अनुभूति इतनी तीव्र होती है कि हमें अपना दुख तो पहाड़ से भी ज्यादा ऊंचा लगने लगता है। जहां सुख का सदैव स्वागत होना सर्वथा निश्चित है, वही दुख और पीड़ा के आने पर अपने भाग्य को धिक्कारना या दूसरों को उसके लिए उत्तरदाई ठहराना, कहां तक तर्कसंगत है?

दुखानुभूति को कम से कम आत्मसात् किया जा सके, यह उसे चुनौती स्वरूप लेने में ही निहित है। यह सही है कि जो व्यक्ति दुख से जूझ रहा है, उसकी पीड़ा तो वही समझ सकता है। उसका विश्लेषण दूसरा नहीं कर सकता। दुख के प्रति सकारात्मक सोच व्यक्ति को जीवन के सहज मार्ग पर चलने में सहयोगी अवश्य हो सकती है। हमें हर हाल में संयम बरतना चाहिए। जब हम अपने दुखों को अच्छे विचारों से जोड़ेंगे, तो पाएंगे कि हमारा रोम-रोम फूलों की तरह महक रहा है। हमें अपने चारों तरफ के वातावरण में आनंद ही आनंद की अनुभूति हो रही है। जब हम अपनी मन स्थिति पर नियंत्रण पा लेते हैं, तो शरीर में जो रासायनिक परिवर्तन होंगे, उससे हमें बड़े से बड़े दुख से लड़ने की शक्ति मिलती है। दुख की अनुभूति को चुनौती मानकर आगे बढ़ने से प्राप्त सफलता फिर एक नई चुनौती को स्वीकारने के लिए तैयार कर देती है।

57.सहनशीलता‌

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सहनशीलता में एक ऐसी अद्भुत शक्ति समाई रहती है, जो आत्म चेतना को अमरत्व प्रदान कर अजेय बना देती है। दूसरी ओर जहां सहनशीलता का अभाव रहता है, वहां व्यक्ति के टूटने में ज्यादा देर नहीं लगती। वैसे भी इंसान की जिंदगी हर घड़ी इम्तिहान लेती हैै और इस परीक्षा में कुछ प्रश्नपत्र ऐसे होते हैं, जिनके लिए जिंदगी हमारे कानों में धीरे से कह जाती है—ध्यान रखना। इसका कोई परिणाम नहीं आएगा। आप सहनशीलता की परीक्षा देते रहो, परिणाम आएगा या नहीं, यह मत सोचो। लेकिन जिंदगी रूपी प्रश्नपत्र तो हल करना ही पड़ेगा।

परमात्मा और भक्त का रिश्ता ऐसा ही होता है। वह भक्त की परीक्षा लेता रहता है और भक्त परीक्षा देता जाता है। जीवन का सत्य सहनशीलता ही है। अंत में जीत उसी की होती है, जो जीवन में पड़ रही चोटों से विचलित ने होकर, परमात्मा का आशीर्वाद मानकर इन्हें धैर्य पूर्वक सहता और स्वीकार करता रहता है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता अधिक होती है, उसे जीवन में आने वाले दुख, कष्ट के रूप में नहीं लगते। सहनशीलता यदि सामान्य है तो जीवन में प्रति क्षण आने वाले अधिकांश कष्टों का निवारण, विवेक का प्रयोग करके किया जा सकता है। किंतु जहां सहनशीलता बिल्कुल भी नहीं होती, वहां ऐसे लोग जीवनपर्यंत अपने विवेक का प्रयोग नहीं कर पाते। ऐसे लोगों को अपने मानसिक विकास पर ध्यान देना चाहिए।

पिछले दिनों एक खबर बहुत पढ़ने-सुनने में आई कि भारत का एक सैनिक जब पाकिस्तान की कैद में था, तो उसे बहुत प्रताड़ना दी गई। उस सैनिक ने लौटकर बताया, इतनी भीषण प्रताड़ना दी जाती है, जो अकल्पनीय है, क्योंकि प्रताड़ना देकर वे कुछ उगलवाना चाहते हैं, जो हमारे मन और मस्तिष्क में रखा होता है। लेकिन ऐसे समय उसने सहनशीलता का परिचय देते हुए अपने माइंड को लॉक कर लिया और इसका परिणाम यह हुआ, कि इतनी प्रताड़ना के बाद भी कोई बात बाहर नहीं आई। इससे उस सैनिक के मानसिक विकास का पता चलता है, जिसने बुरे वक्त में अपने विवेक से काम लिया।

लेकिन जिन लोगों में सहनशीलता का अभाव रहता है, वे जीवन पर्यंत भारी आर्थिक, शारीरिक और मानसिक नुकसान उठाते रहते हैं। प्रकृति में जब-जब असामान्य स्थिति होती है, तब- तब प्रकृति इसे स्वयं ठीक कर लेती है, किंतु मानव स्वभाव में जो असामान्य स्थिति बन जाती है, उसे मानव को ही ठीक करना पड़ता है। अन्यथा वह असामान्य स्थिति में ही रहेगा, जिसका खामियाजा भी उसी को उठाना पड़ेगा। मानव स्वभाव में क्रोध, इच्छाएं, लालसाएं, अहंकार ऐसे अवगुण हैं, जो कुछ न कुछ हर व्यक्ति में रहते हैं। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिनमें इन चारों अवगुणों में से किसी भी अवगुण के कुछ अंश का समावेश न हो। जिन लोगों में इस प्रकार की कमियों का अंश बहुत ही कम होता है, वे लोग अपने विवेक का प्रयोग करके इन कमियों से होने वाले नुकसान से अपने को बचा लेते हैं।

ऐसे लोगों ने अपने आपको ध्यान और समाधि रूपी योग निद्रा में ढाल रखा है। वे परमात्मा द्वारा दिखाए गए ध्यान रूपी प्रकाश को अपने जीवन में आत्मसात करने की क्षमता रखते हैं। जिससे उनके आसपास का सारा वातावरण इतना अच्छा हो जाता है कि उनकी आत्म- चेतना को जागृत करने में संजीवनी बूटी का काम करता है। सहनशीलता हमें शांति, प्यार,पवित्रता और एकता में रहना सिखाती है। सहनशीलता का अर्थ है— आत्मज्ञान। जैसे- अगर आप पूरा दिन शांत रहें, किसी पर गुस्सा नहीं किया, सब से प्यार से बात की, अपने कार्य में उतावलापन नहीं दिखाया, धैर्य से कर्म किया तो इसका मतलब है कि आप में सहनशीलता रूपी गुण है। हमें अपनी हर सोच, हर कर्म में सहनशीलता रूपी गुण को शामिल करना है। किंतु बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिनमें सहनशीलता का गुण नहीं होता है। यह निश्चित ही मनुष्य की असामान्य स्थिति होती है। ऐसे में इन पर विशेष रूप से ध्यान देकर इन्हें सामान्य स्थिति में लाना ही पड़ेगा।

एक तरफ हम विकास के नए-नए आयाम छू रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ चारित्रिक मूल्यों का हनन करते हुए अपने व्यक्तित्व की आधारभूत संरचना पर तीव्र प्रहार कर उसे गर्त की ओर ले जा रहे हैं। हमारे अपने खुद के जीवन में सहनशीलता,जोकि हमारे बुद्धि, विवेक का सकारात्मक निर्माण कर हमें जीवन में एक पहचान के योग्य बनाती है, हमें बताती है कि हमें किस प्रकार का आचरण और व्यवहार करना और स्वीकारना चाहिए। हमें ध्यान रूपी गहरी निद्रा में जाकर अपने व्यक्तित्व को निखारना होगा। सहनशीलता एक ऐसी औषधि है, जो सभी स्थितियों को सामान्य करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सहनशील व्यक्ति ही हर असंभव कार्य को संभव करने की शक्ति रखता है। हर व्यक्ति को इतना सहनशील अवश्य होना चाहिए, ताकि उसका क्रोध, उसकी लालसाएं, एवं अंहकार उसके मस्तिष्क पर अपना विपरीत प्रभाव न डाल सकें।

56. उम्मीद—”वो” है ना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में प्रत्येक कार्य के लिए बढ़िया योजना, अनुकूल परिस्थिति, धैर्य, सकारात्मक दृष्टिकोण और अपार मेहनत की जरूरत पड़ती है। यदि आप किसी काम को हर हाल में शुरू कर सफल होना चाहते हैं, तो उससे जुड़ी सारी जानकारियां जुटाएं, सारे उपलब्ध साधनों को जुटाएं और उस समय की परिस्थिति के अनुसार कार्य शुरू करें। हमें विपरीत परिस्थितियों में कभी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। हमें इस सिद्धांत पर चलना चाहिए कि— प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में बड़े लाभ का बीज दबा होता है। नेपोलियन बताते हैं कि— अपने लक्ष्य को हमेशा बड़ा रखो, तभी आप कठिन परिश्रम करेंगे। वे बताते हैं कि मैं आत्म अनुशासन का प्रयोग कई वर्षों तक करता रहा, ताकि मैं अपने आप को शोहरत और धन-दौलत से विनम्रता के साथ जोड़ सकूं।

आप कभी-कभार सोचते होंगे कि— आप इतना दबाव, इतनी परेशानियां, इतनी असफलताएं बर्दाश्त नहीं कर सकते। आपको लगता है कि आपने सब कुछ कर लिया लेकिन हालात काबू से बाहर हैं। इसके लिए ये बिल्कुल भी आवश्यक नहीं कि आप तुरंत कुछ कार्य करें। नहीं समझ आ रहा है, तो रुक जाने में भी कोई बुराई नहीं। नई आशा और उम्मीदों की धूप, देर-सवेर खुद भी पहुंच जाएगी। ताजी हवा और रोशनी भीतर आ सके, इसके लिए आवश्यक है कि आप अपने दिमाग की खिड़कियों को खुला रखें। उन पर भय, आशंका और अशुभता की कड़वी धूल को जमने न दें। अगर आप मजबूत हैं, कड़ी मेहनत करने का माद्दा रखते हैं, तो कोई कठिनाई आपको लक्ष्य से हिला नहीं सकती।

अनुशासन और नैतिकता का आपके लक्ष्य प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान होता है। कल पर टालने या फिर थोड़ी देर में कर लेने का बहाना यहां नहीं चलता। अनुशासन में रहना आदत बन जाती है। किसी भी कठिन लगने वाले काम को यह कहकर नहीं छोड़ें, कि यह काम आपके दायरे में नहीं है। आपको उस कार्य में डर लग सकता है, लेकिन यह डर सिर्फ एक कल्पना है। जब आप उस कार्य को करना शुरू करते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं, तब आप उस डर से बाहर निकल जाते हैं। ये जरूरी नहीं आप हर कार्य में सफल हों, फिर भी मन को छोटा करने की जरूरत नहीं।

संघर्ष एवं असफलता केवल निराश ही नहीं करते, बल्कि कुछ सिखाते भी हैं। ना उम्मीद में ही उम्मीद छिपी होती है। बीती बातों से भाग कर नहीं, उनसे सीख कर ही उबरा जा सकता है। जीवन में तो हर पल नया भी हो रहा है और पुराना भी। हम जिस पल नया महसूस करने लगते हैं, उसी पल से हमारी जिंदगी नई होने लगती है। नई राहों की तरफ कदम बढ़ाते समय, जो नहीं है, उस पर बेचैन होने की बजाय जो सामने है, उस पर केंद्रित होना चाहिए। चुनौतियां रास्ते की रुकावट नहीं हैं, रास्ता ही है। अपनी जिंदगी में जब भी कुछ करना चाहें, कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपके भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए और जज्बा होना चाहिए।

अगर आपने लक्ष्य तय कर लिया तो फाइटर की तरह उसे करते जाना है, बीच में छोड़ना नहीं है। उम्मीद की एक छोटी- सी किरण ही आप में जोश भर देती है। सफलता सिर पर जल्दी चढ़ती है और असफलता दिल पर। जीत के नशे में झूमते हुए को हार नहीं दिखती और हारे हुए को जीत की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। लेकिन असली जीत उसकी होती है जो सफलता को सिर नहीं चढ़ने देते और हार को दिल से नहीं लगाते। बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु कहती है—हार हो या जीत मैं अपना 100% देने पर ध्यान देती हूं। जो करती हूं, पूरे मन से करती हूं। आपकी सफलता का दरवाजा भी खुलेगा जरूर, कभी-कभी दरवाजा ज्यादा मजबूती से बंद होता है, तो उसे खोलने के प्रयत्न भी उतनी मजबूती से ही करने होते हैं।

जीवन की डगर पर आगे बढ़ते हुए हमारी नजर कई लोगों पर पड़ती है। उनमें से कुछ बातें या चीजें हमें विचलित भी करती हैं। हमारे मन में बुरे विचार आने लगते हैं और कभी दूसरों की संपत्ति पर, कभी उनके व्यक्तित्व पर नजर डालने लगते हैं, जिससे हमें उनसे ईर्ष्या होने लगती है और हमारे शरीर में उबाल-सा आने लगता है। जिसे समय रहते थोड़ा ठंडा कर दें, वरना वह हमारी उर्जा को गलत दिशा में ले जाएगा। आप उसी का चिंतन करते रहेंगे और अपने लक्ष्य से भटक जाएंगे। फिर आपको अपने कार्य में सफलता नहीं मिलेगी, और आप उम्मीद को छोड़कर ना उम्मीद का पिटारा अपने सिर पर रख लेंगे।

यदि समय रहते अपनी बुरी वृतियों पर लगाम नहीं लगाई, तो आप अपने भीतर या बाहर कुछ न कुछ गलत जरूर कर जाएंगे। मनोविज्ञानी कहते हैं कि हम उसी जाल में फंस कर रह जाते हैं, कि या तो सब कुछ चाहिए या कुछ भी नहीं और यह सोच हमारा संतुलन भी बिगाड़ देती है। कई बार कम रोशनी में ही चीजें गहराई से समझ आती हैं। धुंधलापन नई कहानियों को जन्म देता है। दिमाग साफ हो और हम धुंध का मजा लेने के लिए तैयार हों तो कहानियां अच्छी बनती हैं।

अध्यात्म में विश्वास करने वाले मानते हैं कि—हम अपनी आंतरिक शक्ति और इंद्रियों पर कंट्रोल करके ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। जीवन में जब कभी कोई संकट आए, तो उस परमात्मा को याद अवश्य करना। आपको उस परम सत्ता की ध्वनि सुनाई देगी। जिसमें वह कहता है—परेशान मत होना “मैं हूं ना”। ये कोई साधारण ध्वनि नहीं है, बल्कि यह उस परमेश्वर की ही है, जो कहीं हमारे अंतर्मन में बैठकर यह सब कुछ देख रहा है। ये उस उम्मीद की ध्वनि है, जो हमें कभी नाउम्मीद नहीं होने देती और हम अपने इस जीवन पथ की डगर पर उस छोटी- सी उम्मीद की किरण के साथ आगे बढ़ते चले जाते हैं।