55. सद्-बुद्धि और दुर्बुद्धि

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भक्ति की प्रगाढ़ता जब अपनी चरम-सीमा पर होती है, तो परमात्मा वरदान के रूप में भक्त को सद्बुद्धि के रूप में देवी संपदा प्रदान करते हैं। जिससे उसे नाना प्रकार के लौकिक सुख, संपत्ति, धन-दौलत, यश-कीर्ति, पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। वहीं ईश्वर के प्रति नास्तिकता का भाव होने के कारण दुर्बुद्धि-ग्रस्त व्यक्ति को पग-पग पर ठोकर, अपकीर्ति, दुख, संताप, पीड़ा, कष्ट प्राप्त होते हैं। ईश्वर के प्रति नास्तिकता के कारण ही उसकी मति क्षीण हो जाती है और समस्त संपदा नष्ट हो जाती है।

जबकि सद्बुद्धि के कारण असहाय, गरीब, दीन-हीन व्यक्ति भी अपनी जीविकोपार्जन कर लेता है। किसी के समक्ष उसे हाथ फैलाने, भिक्षा मांगने की जरूरत महसूस नहीं होती है। लेकिन जब परमात्मा भक्त को उसकी इच्छानुसार वरदान दे देता है, तो उसमें अहंकार भी आ जाता है और वह अपने आपको उस परम सत्ता से भी ऊंचा समझने लगता है। जैसे— रावण बहुत बड़ा विद्वान था। उसने अपने तपोबल से बहुत सारी शक्तियां और सिद्धियां प्राप्त की थी। ये उसकी दुर्बुद्धि थी, जो माता सीता का अपहरण कर लिया। चूंकि बहुत पढ़ा-लिखा विद्वान होने के कारण, अपने गलत कार्यों के पक्ष में तर्क भी बड़े ठोस दे देता था। जब उसे लगा कि युद्ध में राम का पलड़ा भारी है, मेघनाथ भी स्थिति को संभाल नहीं पा रहा, तो महल में सोए अपने मंझले भाई कुंभकरण के पास गया, जो एक बार सोता तो 6 महीने उठता नहीं था। दुर्गुणों की खूबी होती है, अपने सहयोग, अपने समर्थन में अपने ही दूसरे दुर्गुणों को तुरंत बुला लेते हैं। ये रावण की दुर्बुद्धि ही थी, कि जो ये सब करवा रही थी। बड़े प्रयत्न के बाद कुंभकरण को उठाया गया।

लेकिन जब रावण ने कुंभकरण को जगाया तो उसने राम जी की प्रशंसा और रावण की गतिविधि का विरोध करते हुए कहा—नारद जी ने मुझे जो ज्ञान दिया था, वह मैं तुम्हें बताता, लेकिन अब तो समय चला गया। रावण के बार- बार पूछने पर कुंभकर्ण ने बताया— कि मैं एक रात पत्थर की शिला पर बैठा था, तभी वहां से गुजर रहे नारद जी ने बताया “तुम दोनों भाइयों से परेशान होकर देवगण विष्णु जी के पास गए हैं” और विष्णु ने उन्हें आश्वस्त किया है—कि उन्हें मारने के लिए मैं मनुष्य रूप में अवतरित हो रहा हूं। नारद जी ने आगे कहा—तुम्हारी 6 महीने की नींद पूरी होने से पहले ही यदि कोई जगाएगा तो समझ लेना तुम सबका विनाश तय है। भाई तुमने मुझे बीच में जगाया है, अब नाश तो निश्चित है। वह वक्त बीत चुका जब मैं तुझे समझाता। अब परिणाम भी हमें भोगना ही पड़ेगा। वैसे भी अब ज्ञान बांटने का समय नहीं है। क्योंकि तुम व्याकुलचित्त और अहंकार से भरे हो। जन्म से ही तुम्हारा स्वभाव परद्रोह का रहा है। जो श्री राम भगवान विष्णु के अवतार हैं, तुमने उन्हीं से वैर ले लिया। बिना सद्बुद्धि के तुम्हारे जीवन का कायाकल्प होना कदापि संभव नहीं है।

विकास और विनाश की जड़ सद्बुद्धि और दुर्बुद्धि को माना गया है। सद्बुद्धि मानव मस्तिष्क में सकारात्मक सोच की उपज करने वाली ईश्वर प्रदत्त औषधीय शक्ति है। इससे अवरोधों से भरे मार्ग पर भी रास्ता तैयार करने की क्षमता विकसित होती है और लक्ष्य तय कर लिया जाता है। सद्बुद्धि को जीवन में धारण करने के कारण ही व्यक्ति का विकास होता है। वहीं दुर्बुद्धि-ग्रस्त होने से मनुष्य का हर तरह से पतन हो जाता है। देवता की पहचान सद्बुद्धि और दैत्य की पहचान दुर्बुद्धि के कारण ही होती है।

एक कथा के माध्यम से समझाना चाहती हूं—एक राजा था। एक बार वह कहीं जा रहा था। उसने देखा कि एक लकड़हारा बड़े परिश्रम से अपना काम कर रहा है। राजा उसके परिश्रम से प्रसन्न हो गए और उन्होंने उसे चंदन के पेड़ों का एक वन उपहार में दे दिया। लकड़हारा सामान्य व्यक्ति था। उसे नहीं पता था कि राजा ने उसे कितना कीमती उपहार दे दिया। वह चंदन की महत्ता और मूल्य से अनभिज्ञ था। वह चंदन की लकड़ियां काटकर उन्हें जलाकर भोजन बनाने के लिए प्रयोग करने लगा। जब राजा को अपने गुप्तचरों से यह बात पता चली तब उनकी समझ में आया कि धन का सदुपयोग हर व्यक्ति नहीं कर सकता। उसका उपयोग करने के लिए सद्बुद्धि परमावश्यक है।

सद्बुद्धि के जागरण से ही जीवन की समस्त अनसुलझी समस्याओं का समाधान किया जाना संभव है। प्राचीन समय में समस्त ऋषि-महर्षि और देवगण सद्बुद्धि के जागरण के लिए नित्य गायत्री-उपासना किया करते थे। यही अंतर्दृष्टि के जागरण का मूल था। वैसे तो दुर्गुणों से सीखने जैसा कुछ है नहीं, पर एक बात जरूर सीखी जा सकती है कि ये लोग जो भी करते हैं, तल्लीनता के साथ करते हैं। अच्छे लोगों की दिक्कत यह है कि ये तल्लीनता के साथ कुछ नहीं करते, जबकि अच्छे काम खुलकर पूरी लगन और निष्ठा के साथ किए जाने चाहिए।

सद्गुणों के बिना तो व्यक्ति मूढ़, मूर्ख, पशु- तुल्य निज जीवनयापन करता है। आत्मिक प्रगति और जीवन की सार्थकता का स्वर्णिम अवसर तो सद्बुद्धि के जागरण से ही संभव होता है। प्राचीन-काल में हमारे ऋषि-मुनि जीवन को संस्कारित एवं बंधन मुक्त बनाने के लिए बाल्यकाल से ही सद्बुद्धि के जागरण का अभ्यास कराते थे। जिससे बच्चों में उत्कृष्ट सोच, स्वभाव, कर्म का जन्म होता था और जिसके कारण उनका जीवन मनुष्यता को पाकर सुखी संपन्न, नैतिक प्रधान बनकर गौरवशाली एवं महान बन जाता था।

54. धैर्य से मिलते हैं—ज्ञान और शांति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्यों को आज सबसे अधिक आवश्यकता धैर्य की है। लोग सफल होने के बाद अशांत हो जाते हैं और शांति की तलाश करते हैं। शांति की तलाश में निकलने से पहले धैर्य, सहनशीलता के गुण हमें अपने अंदर विकसित करने होंगे। ज्यादातर लोगों की जिंदगी में इन दिनों चिंता का अंबार लगा हुआ है। जिसे देखो वह परेशान है, दुखी है। बहुत से लोग सबके सामने कुछ नहीं कह पाते, लेकिन वे अंदर से बिल्कुल टूट चुके हैं। वक्त कब कैसे बदल जाए, पता नहीं चलता।

जीवन में बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा हो जाता है, कि अचानक जिंदगी यू- टर्न ले लेती है, उसी को कहते हैं—विपरीत दौर या खराब समय। जब कभी जीवन में ऐसा वक्त आए, जो हमसे चुनौती मांग रहा हो, तो ध्यान रखिएगा चार बातों का सहारा लेना— संबंध, अपनी बुद्धि, निज बल और धन। लेकिन इन चार बातों का उपयोग करने में सर्वाधिक काम आएगा धैर्य। जब समय विपरीत हो, चुनौतियां सामने हों तो धैर्य मत छोड़िए। यदि धैर्य धारण करे रहे तो बाकी चार बातों का सदुपयोग कर आप उस बुरे दौर से बाहर निकल आएंगे। जैसे मछली पानी में तैरती है, ऐसे ही कुछ पक्षी भी हैं जो जल के भीतर तैर लेते हैं। इस बात से यह तो साबित हो गया कि ऊपर वाले की दुनिया में हर एक के भीतर कुछ बातें ऐसी हैं कि यदि वे उसका उपयोग करना सीख जाएं तो जैसे परिंदा पानी में भी तैर लेता है, वैसे वे भी नामुमकिन कार्य को भी मुमकिन कर पाएंगे।

आज हम अपने बच्चों को भौतिक रूप से तो समर्थ बना रहे हैं, लेकिन उनको आत्मिक रूप से कमजोर बना रहे हैं। हम उनको जो धन- दौलत और सफलता दे रहे हैं, एक दिन वह ज्वालामुखी बन जाएगी, यदि हम उनमें धैर्य और शांति के गुण विकसित नहीं करेंगे। नहीं तो हम अपने ही घर में विस्फोट देखेंगे और कुछ नहीं कर पाएंगे। बाद में पछताने से अच्छा होगा कि आज पहचानें कि इन्हें शांति कैसे दे सकते हैं। वरना आने वाले वक्त में ये शांति की भीख मांगते दिखेंगे। शांति के नाम पर कई लोग दुकानें चलाएंगे शांति कैसे मिले, इसके तमाशे होने लगेंगे। लेकिन क्या इससे किसी को शांति मिलेगी?

ऊपर वाले ने जन्म के साथ प्रत्येक मनुष्य के भीतर धैर्य का गुण छोड़ा है, जैसे कोई वस्तु रखकर हम भूल जाते हैं, ऐसे ही हमारे भीतर के धैर्य को कहीं रख कर भूल गए हैं। हमारा मन धैर्य को कायरता या कमजोरी बता देता है, जबकि धैर्य एक ऐसा गुण है, जिसका परिणाम शांति है। अधीर व्यक्ति कभी शांत नहीं रह पाएगा। भीतर के धैर्य को बाहर निकालना है तो तीन चीजों पर काम कीजिए—विचार, वाणी और व्यवहार। जब भी ऐसा अवसर आए कि धैर्य से काम लेना हो, तो शुरुआत कीजिए विचार से। अपने भीतर तुरंत ऐसे विचार लाएं जो आपके धैर्य के गुण को प्रकट करें। फिर वाणी में धैर्य उतारिए। जितनी जरूरत हो उतना ही बोलें और अपनी बात व्यवहार में प्रकट करें। इन तीनों चीजों पर समय रहते काम करने पर धैर्य जाग जाता है, और जिसका धैर्य जाग गया, उसे कोई अशांत नहीं कर सकता। क्योंकि जहां धैर्य होता है, वहां शांति अवश्य होती है और धैर्य धारण करने से ही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है।

महात्मा बुद्ध का एक प्रसंग है— कि एक बार बुद्ध एक सभा को संबोधित करने वाले थे। बुद्ध आए और बिना कुछ बोले वहां से चले गए। उस समय सभा में लगभग डेढ़ सौ श्रोता थे। दूसरे दिन लगभग 100 लोग आए, लेकिन बुद्ध दोबारा बिना बोले चले गए। इस तरह तीसरे, चौथे दिन तो और भी कम लोग आए। बुद्ध रोज आते और बिना बोले चले जाते। पांचवें दिन तो सिर्फ 14 लोग आए। महात्मा बुद्ध उस दिन बोले और वह सभी लोग उनके शिष्य बनकर उनके साथ चल पड़े। उनमें से ही किसी ने पूछा— आपका 4 दिन तक कुछ भी नहीं बोलने का क्या कारण था? महात्मा बुद्ध ने कहा— मुझे भीड़ नहीं, काम करने वाले लोग चाहिए थे। यहां वे लोग टिक पाएंगे जिनके पास धैर्य होगा। क्योंकि धैर्यवान व्यक्ति ही ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है।

53. हो मन का प्रबंधन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे मन की भावनाएं और विचार हमारे व्यक्तित्व को एक आकार देते हैं। यह बात आधुनिक विज्ञान की ही स्थापना नहीं, बल्कि हमारे वैदिक शास्त्रों द्वारा उद्घाटित सत्य है। मनुष्य अपनी पूरी जिंदगी में कुछ ऐसे काम करता है कि “उसने ऐसा क्यों किया” यह जानने में विज्ञान भी हार मान चुका है। बहुत मुश्किल होता है, यह जानना कि किसी के भीतर क्या चल रहा है? खासतौर पर जब मनुष्य आत्मघात करता है तो पिछे जो लोग रह जाते हैं, वे तरह-तरह की बातें करते हैं, पर रहस्य अपनी जगह बना रहता है।

जिन लोगों ने आत्महत्या से दुनिया छोड़ी, उनके पिछे के हालात पर यदि चिंतन करें तो पाएंगे आपसी संबंधों में खटास, बीमारी, अकेलापन, कारोबार में नुकसान, कर्ज का बोझ, अपमान की चरम सीमा, किसी विशेष परिस्थिति का सामना नहीं कर पाने का भय जैसे अनेकों कारण निकल कर आते हैं। मनोवैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं। लेकिन अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो जिनका जीवन मन से संचालित है, वे लोग आत्महत्या के लिए जल्दी प्रेरित होंगे।

जिंदगी में मनुष्य के भीतर आत्महत्या का इरादा जगा सकते हैं और यदि मन नियंत्रित नहीं है तो वह उस इरादे को प्रेरणा देगा। यदि हम मन को नियंत्रित नहीं कर पाते अर्थात् अपने जीवन में आने वाली परेशानियों का ठीक से प्रबंधन नहीं कर पाते, तो हम इस जीवन रूपी यात्रा से भटक जाते हैं। इस भटकाव के कारण हम अपने हर कर्म से ऊबने लगते हैं।

अगर सुख ही सुख मिलता जाए, तो मन करता है कि थोड़ा दुख कहीं से जुटाओ और वह अपने आप परेशानियों को न्योता देता है। अगर सुख ही सुख मिले तो, फीका-फीका मालुम पड़ने लगता है। आदमी बड़े से बड़े महल में जाए, उससे ऊब जाता है। धन मिले, यश मिले, कीर्ति मिले उससे ऊब जाता है। जब तक कुछ पाने की उसको भूख रहती है तब तक वह प्रयत्न और संघर्ष की लड़ाई लड़ता रहता है। संसार में जितनी चीजें हैं उनको पाने की चेष्टा में कभी नहीं ऊबता, उन्हें पाकर ऊब जाता है।

जब मनपसंद कार्य नहीं होता तो अनिष्ट की आशंका होती है, इस स्थिति से पार पाने के लिए वह जो भी काम करता है, उसमें एक भटकाव आ जाता है, क्योंकि वह निराशा की अवस्था में होता है। उस समय हर कार्य का परिणाम गलत ही होता है। जिसके कारण हमारे मन का प्रबंधन अस्त-व्यस्त हो जाता है। मन का तो काम ही है, बातों को बढ़ा- चढ़ाकर दिखाना। इसलिए जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो मन उसे और डराता है। जिन लोगों की ऐसी वृति हो तो उनको समझाएं कि जीवन मन केंद्रित नहीं, बल्कि मन नियंत्रित है। जब हम मन को नियंत्रित करते हैं, तब शरीर से आगे बढ़कर आत्मा तक पहुंचते हैं और आत्मा एक बात बहुत अच्छे से समझा देती है कि इस जीवन रूपी यात्रा में मन का प्रबंध परम आवश्यक है।

जब हम आत्मा और परमात्मा की बात करते हुए विश्वास की गहराई में जाएंगे तो श्रद्धा मिलेगी। श्रद्धा को थोड़ा और पकड़िए तो पता लगेगा कि आप परमात्मा के भरोसे हैं। अगर उस पर विश्वास नहीं है तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। हनुमान जी जब औषधि लेकर अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे, तो भरत जी को लगा कोई राक्षस है और तीर चला दिया, जिससे हनुमान जी मूर्छित होकर गिर गए। भरत जी ने बहुत प्रयास किया कि हनुमान की मूर्छा टूटे,पर नहीं टूटी, तब मन ही मन कहा—”जो मोरे मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया।।” यदि मन वचन और कर्म से श्री राम के चरणों में मेरा प्रेम निष्कपट है, तो यह वानर पीड़ा रहित होकर मूर्छा से बाहर आ जाए। ऐसा हो भी गया। बस यह जो सूत्र भरत जी ने हमें दिया, इसे याद रखिए और मन का प्रबंधन करके ही कार्य कीजिए। वैदिक धर्मग्रंथों के प्राचीन ज्ञान के माध्यम से हमें अपने मन के प्रबंधन को सुचारू रूप से करना चाहिये।

52. ईश्वर की व्यवस्था

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हम सभी परमपिता परमात्मा के पुत्र हैं। वे सभी पुत्रों को समान रूप से चाहते हैं, पर वे जिन्हें योग्य विश्वसनीय और ईमानदार समझते हैं, उन्हें अपनी राजशक्ति का कुछ अंश इसलिए सौंप देते हैं कि वे उसके ईश्वरीय उद्देश्यों की पूर्ति में हाथ बटाएं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक समृद्ध मनुष्य को प्रभु ने यह कर्तव्य सौंपा है कि अपने से जो लोग कमजोर हैं, उनकी मदद करने में इन शक्तियों को व्यय किया जाए। अगर दुनिया में सभी मनुष्यों को सभी कुछ मिल जाता तो ईश्वर इस चराचर जगत् की व्यवस्था को कैसे सुचारू रूप से चला सकते थे। ईश्वर की व्यवस्था में झांके तो पाएंगे, उसने एक बहुत अच्छा सॉफ्टवेयर बना रखा है, अगर कोई अपने कार्य का पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निर्वाह नहीं करता, तो उसे इसका फल अवश्य मिलता है।

भगवान गलत कार्य करने वालों का साथ नहीं देता, उसकी व्यवस्था में शामिल है— जैसा करोगे, वैसा फल मिलेगा। भगवान गलत काम करने के बाद कभी नहीं बचाएगा। हां उसके बचाने का तरीका अवश्य है कि— यदि आप उससे जुड़े हुए हैं, तो वह आपको गलत करने से रोक जरूर सकता है। पांडव जब राजा बन गए, तब जुआ खेले। क्योंकि भगवान से दूर हो गए थे। और इसका परिणाम भी उन्होंने 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास के रूप में भोगना पड़ा। पिछले दिनों एक बहुत ही ख्याति प्राप्त और धनवान व्यक्ति से जुड़े मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की—’यदि अब कानून तोड़ा तो फिर भगवान ही आपको बचा सकता है।’ जिस भी माननीय न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की, उन्होंने भगवान को इस रूप में भी याद किया। हम इसे ऐसे कह सकते हैं कि—कहीं न कहीं न्याय भी यह स्वीकार करता है कि—एक परम शक्ति होती है, जिसे भगवान कहा गया है। इससे हम यह मानने को बाध्य हो जाते हैं कि, कोई न कोई शक्ति है, जो इस सृष्टि की व्यवस्था का भार उठाए हुए है। भोजन,वस्त्र, आवास तथा जीवनयापन की उचित आवश्यकता पूरी करने वाली वस्तुएं, प्रभु प्रदत प्रत्येक व्यक्ति के लिए वेतन के समान हैं, आलसी, अकर्मण्य, उल्टे-सीधे काम करने वाले लोगों का वेतन कट जाता है और इसी कारण उन्हें अभावग्रस्त रहने को विवश होना पड़ता है। जो परिश्रमी, पुरुषार्थी और सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं, वे अपना उचित वेतन यथा- समय पाते रहते हैं।

इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की शक्तियां लोगों को जन्मजात मिली हुई हैं। ये शक्तियां केवल इस उद्देश्य के लिए होती हैं कि— इन से संपन्न कोई व्यक्ति अपने से कमजोर लोगों को ऊपर उठाने में लगाएं। धन, बुद्धि, स्वास्थ्य, शिल्प, चतुरता, मनोबल, नेतृत्व आदि की शक्तियां जिन्हें अधिक मात्रा में दी गई हैं, वे अधिकार नगराधिकारी को देकर राजा कोई पक्षपात नहीं करता, बल्कि अधिकार योग्य व्यक्ति से अधिक काम लेने की नीति रखता है। जीवन में जो कुछ भी मिले, थोड़ा मिले या अधिक मिले, दूसरों को बांटने का विचार अपने अंतर्मन में जरूर रखना। जैसे सूर्य देव सबको समान रूप से प्रकाश बांटता हैै और अमीर- गरीब, छोटा-बड़ा, योग्य-अयोग्य आदि की दौड़ में शामिल न होकर पूरी सृष्टि को समान रूप से प्रकाशित करता है, ऐसे ही हमें भी जो मिला है, उसे हम भी अवश्य बांटें। “मुझे मिला है तो मैं ही खाऊंगा” यह पाप है।

शास्त्रों में लिखा है कि जब कुछ मिले तो उसे सब में बांटिए। अपने साथ सब को आगे लेकर चलिए, आप उठे हैं, तो सबको उठाइए। उठाने के दो तरीके हैं। एक तो क्रेन यानी मशीन उठाती है और दूसरा आप अपना हाथ बढ़ाकर, सहयोग देकर किसी को ऊपर उठा सकते हैं। क्रेन का आविष्कार “डेरिक” नामक व्यक्ति ने किया था,जो पहले जल्लाद था। जल्लाद जब किसी को फंदा लगाकर ऊपर उठाता है, तो जीवन समाप्त हो जाता है। लेकिन भला इंसान फंदा हटाकर जब किसी को ऊपर उठाता है, तो जीवन शुरू होता है, तो हमें सूर्य देव की भांति अपने भीतर यह भाव जगाना है कि- ईश्वर ने मनुष्य बनाकर कुछ विशेष कार्य के लिए ही इस धरती पर भेजा है, तो सबको सही रास्ते पर चलाने के लिए भगवान द्वारा बनाई हुई व्यवस्था में सहयोग करें।

सामर्थ्यवान व्यक्तियों को अन्य के कष्ट निवारण में शामिल होना ही चाहिए। जैसे कि यदि कोई सुशिक्षित है तो उसका फर्ज है कि, अशिक्षितों में शिक्षा का प्रसार करें। कोई शक्तिशाली है तो उसका कर्तव्य है कि— निर्बलों को सताने वालों को रोकें। धनवान के पास धन इसलिए अमानत के रूप में रखा गया है कि वह उसके उपयोग से बुद्धि, व्यवसाय, संगठन, सद्ज्ञान आदि का इस प्रकार आयोजन करें कि उससे जरूरतमंद लोग अपनी चतुर्मुखी उन्नति कर सकें। प्राय: लोग यह कहते हैं कि जब इतना धनवान हो जाऊंगा, तब परमार्थ करूंगा, जबकि सोचना यह चाहिए कि आज मैं जितना संपन्न हूं, उतना परमार्थ तो कर सकता हूं। यह ईश्वर की व्यवस्था का ही परिणाम है, जिससे नवज्ञान का सृजन और विकास, उसका उपयोग करने का निर्देशन और उसे अगली पीढ़ी तक समर्पित करने का कार्य निरंतर बिना किसी भेदभाव के चलता रहता है। यह व्यवस्था मन-मानस में बसती गई, प्रेरणा देती गई और मानवीय सोच तथा क्षितिज को विस्तार देती गई। हम ईश्वर की व्यवस्था में भरोसा रखेंगे, तो उससे जुड़े रहेंगे, तो वह कोई भी बुरा विचार हमारे दिमाग में पनपने नहीं देंगे और हम उसकी बनाई हुई व्यवस्था में सहयोग देते रहेंगे। लेकिन जैसे ही हम उससे कट जाएंगे, कोई गलत कार्य कर बैठेंगे, क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था ही ऐसी है कि गलत बोओगे, गलत उगेगा, सही बोओगे, सही काटोगे।

51. विचारों की परिवर्तनशीलता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

इंग्लैंड के प्रधानमंत्री एवं प्रसिद्ध इतिहासकार विंस्टन चर्चिल का एक महत्वपूर्ण कथन है—”नजरिया एक छोटी-सी चीज है, जो बड़ा परिवर्तन लाती है।” सही नजरिया धारण करना नकारात्मक तनाव को सकारात्मकता में परिवर्तित कर सकता है। जीवन नजरिए का नाम है, अनगिनत खुशियां दूसरों के साथ बांटने में ही हमारी खुशियां छिपी हैं। खुशियां बांटने से ही लौट कर खुशियां बढ़ती हैं और इससे सभी प्रकार के मानसिक विकारों पर विजय पाई जा सकती है।

एक वाक्य सुनाती हूं—एक अस्पताल के कमरे में दो बुजुर्ग भर्ती थे। एक बुजुर्ग उठ कर बैठ सकता था, लेकिन दूसरा उठ नहीं सकता था। जो बुजुर्ग उठ सकता था, उसका बिस्तर एक ऐसी खिड़की के पास था, जो बाहर की तरफ खुलती थी। वह बुजुर्ग उठकर बैठता और दूसरे बुजुर्ग से, जो उठ नहीं सकता था, उसे बाहर के दृश्य के बारे में बताता। सड़क पर दौड़ती हुई गाड़ियां, काम के लिए भागते लोग, पार्क में खेलते बच्चे आदि। दूसरा बुजुर्ग आंखें बंद करके अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ दिमाग में उन दृश्यों की काल्पनिक छवियों का आनंद लेता रहता। ऐसे ही कई महीने गुजर गए। एक दिन दृश्यों का वर्णन करने वाला बुजुर्ग नींद में ही चल बसा। अब तो दूसरा बुजुर्ग बहुत दुखी हुआ। एक दिन उसने पड़ोस के अपने साथी के बिस्तर पर शिफ्ट किए जाने की इच्छा प्रकट की। अब बुजुर्ग ने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की तो उसे दूसरी तरफ सिर्फ दीवार दिखाई दी। उसने नर्स को बुलाकर पूछा, तो नर्स ने बताया कि- वह बुजुर्ग तो जन्म से अंधे थे। यह उनका अपना नजरिया था, जिसकी वजह से वे दीवार को भी सुंदर दृश्यों में तब्दील कर देते थे। इसी सोच के बल पर वे पिछले दो-तीन सालों से कैंसर जैसी बीमारी से लड़ते रहे।

यदि मनुष्य अपनी सोच को सकारात्मक रखे, तो मन में आए हुए सभी विकार शीघ्र दूर हो जाते हैं और मनुष्य का जीवन पूर्ण रूप से सुखों की अनुभूति करता है। नकारात्मक विचारों को केवल आत्मज्ञान के द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि— केवल आत्मज्ञान के द्वारा ही सभी प्रकार की नकारात्मकताओं और मन के द्वंद पर विजय प्राप्त की जा सकती है। कोई व्यक्ति गहरे विश्राम के द्वारा अपने भीतर आत्मज्ञान को जगा सकता है।

यह कथा हम सभी को ज्ञात होगी कि महाभारत काल में पांचो पांडव जब स्वर्गारोहण पर निकलते हैं, तो एक-एक कर भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव मूर्छित होकर धरती पर गिरते चले जाते हैं। मान्यता है कि—सिर्फ युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्गारोहण कर पाते हैं। माना जाता है कि युधिष्ठिर को छोड़कर सभी भाइयों के मन में कुछ न कुछ कुविचार शेष रह गए होंगे। यात्रा के दौरान हमारे मन में भी विचारों की यात्रा सतत् चलती रहती है। रूढ और पुराने विचार मिटते जाते हैं और उनके स्थान पर नए और सुंदर विचार उत्पन्न होते रहते हैं। यदि हम स्वयं को सकारात्मक और सुंदर विचारों से परिपूर्ण कर लेते हैं, तभी हमें परम आनंद की प्राप्ति होती है। हिंदी के पितामह माने जाने वाले और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के राहुल सांकृत्यायन ने अंतर्मन में उठ रहे कई तरह के सवालों के जवाब ढूंढने के लिए तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक की यात्रा की थी। इस दौरान रास्ते में सन्यासियों, वेदांतियों से लेकर खेतों में काम करने वाले किसानों, बौद्ध भिक्षुओं से प्राप्त हुए ज्ञान को भी वह आत्मसात् करते गए।

सच है कि— हम जब दूसरों से सकारात्मक संवाद करते हैं, तो खोखली और पुरानी धारणाएं टूटती हैं और उनके स्थान पर नए और सुंदर विचारों का जन्म होता है। विचारों की सुंदरता से मनुष्य का व्यक्तित्व झलकता है।

50. असंभव से संभव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कभी आपने सोचा है कि आपके जीवन को सबसे अलग क्या बनाता है? वह है असंभव से लगने वाले कार्य को संभव बनाना और यह कार्य करता है, आपका विश्वास तंत्र (बिलीफ सिस्टम) जो विशेष रूप से आपके खुद के विचारों से नियंत्रित होता है। जीवन में आपकी कामयाबी की बुलंदियां क्या होंगी, यह भी आपके स्वयं की धारणाओं पर ही निर्भर करता है। इतना ही नहीं अपनी सफलता और असफलता के लिए भी आप खुद ही जिम्मेदार हैं। भौतिक परिस्थितियां भी मजबूत बिलीफ सिस्टम (विश्वास तंत्र) के आगे बौनी हैं।

शरीर बीमारियों का घर है और मृत्यु की बीमारी हर व्यक्ति के लिए लाइलाज है। लेकिन मन की शक्ति इन बीमारियों से लड़ने का अद्भुत सामर्थ्य रखती है। स्टीफन हॉकिंग चिकित्सकीय संभाव्यता की भविष्यवाणी के बाद भी लंबे समय तक जीवित रहे, तो यह उनकी जिजीविषा और इच्छाशक्ति का ही परिणाम था। इतिहास और वर्तमान ऐसे कई व्यक्तियों की दास्तानों से भरा पड़ा है, जिन्होंने मृत्यु को भी अपनी अदम्य साहस शक्ति से विचलित करके उसे एक नए जीवन में रूपांतरित करने का करिश्मा किया। जिंदगी की जद्दोजहद पहले भी थी, आज भी हैं और आगे भी रहेगी। ऐसे समय में हमें अपने विचारों को इतना शक्तिशाली बनाना है, कि वे शाश्वत सत्य बन जाए। आपके ये विचार ही वे धारणाएं हैं, जो आपके लिए व्यक्तिगत नियम और कानून बन सकते हैं। ये आपके अनुभवों का निर्माण करने की भी क्षमता रखते हैं।

अगर हमें ज्ञात हो जाए कि हमारा बिलीफ इतना पावरफुल है तो क्या हम किसी कार्य को असंभव कह सकते हैं। वर्ष 1954 में रोजर बैनिस्टर 4 मिनट से भी कम समय में एक मील के रिकॉर्ड को तोड़ने वाले पहले धावक बने। हर बार जब वे प्रैक्टिस रेस करते, तो अपने दिमाग को 4 मिनट के अंदर रेस खत्म करने के लिए प्रशिक्षित करते, व अपनी टाइमर घड़ी को देख कर कहते 3:59। बाद में उन्होंने इस रहस्य को उजागर किया कि कुछ भी वास्तविकता में होने के लिए, वह पहले हमारे दिमाग में होना चाहिए। उन्होंने न केवल एक रिकॉर्ड तोड़ा, बल्कि अपने समय के सभी धावकों की उन आत्म-सीमित सीमाओं की एक वाधा को तोड़ दिया, जिन्होंने 4 मिनट-मील रिकॉर्ड को निराशाजनक रूप से असंभव मान लिया था। उनके अनुभव से प्रेरणा लेकर फिर न जाने कितने ही धावकों ने उनके रिकॉर्ड को तोड़ने की हिम्मत की।

परिस्थितियां सदैव एक समान नहीं होती। वे कभी मनुष्य के साथ होती हैं, तो कभी विपरीत। मनुष्य को हर समय परिस्थितियों से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। अस्तित्व की लड़ाई में विवेकवान् व्यक्ति ही सफलता की मंजिल चूम पाते हैं। लेकिन अक्सर संघर्ष की स्थिति में व्यक्ति का साहस घटने लगता है। वह इतना भयभीत होने लगता है कि— संघर्ष की चुनौती को स्वीकार करना ही छोड़ देता है। आप अपने बारे में क्या सोचते हैं, यह बहुत प्रभावशाली है। लेकिन हम जीवन भर इसी में फंसे रहते हैं, कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। लेकिन इस धारणा को बदलने वाले अमेरिकी लेखक वेन डब्ल्यू डायर ने कहा है—जब आप मन से कुछ मानेंगे, तब आप उसे अपने अनुभव में देखेंगे। इसलिए आपको अपनी वास्तविकता और अनुभव को बदलने के लिए, विश्वास को बदलने की जरूरत है और यह रातों-रात तो नहीं हो सकता। वैसे एक तरीका यह है कि—आप अपने से वे अपेक्षाएं रखें जो आपने कभी सोचा भी नहीं था, कि आप ऐसा कर सकते हैं। इस तरह आपके लिए सफलता की नई संभावनाएं खुलती चली जाएंगी।

इसलिए जो व्यक्ति किसी कार्य को असंभव मानकर मेहनत और उसके लिए साहस जुटाने का प्रयास ही नहीं करता, उसके समक्ष ये मिसालें किसी बड़े साक्ष्य से कमतर नहीं हैं। जो लोग भाग्य के भरोसे बैठ जाते हैं, उनके लिए भाग्य के दरवाजे भी सदैव बंद ही रहते हैं। क्योंकि भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है, जो कर्म करते हैं। जीवन में कुछ किए बिना ही जय- जयकार संभव नहीं है। व्यक्ति के कर्म ही उसे इस चराचर जगत् में यश, कीर्ति और वैभव के अलंकारों से अलंकृत कर सकते हैं। संघर्ष से मुंह मोड़ने वालों से जिंदगी की तमाम खुशियां भी मुंह मोड़ लेती हैं। दुनिया में जितने भी कुबेरपति हैं, उन्होंने अपनी शुरुआत बहुत ही छोटे से पड़ाव से की और वे परिणाम की चिंता किए बगैर निरंतर गतिशील रहे। उनके भाग्य ने भी उनका बखूबी साथ दिया और वे दुनिया के सरताज बन गए।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था— उठो, जागो और दौड़ो और तब तक दौड़ते रहो जब तक आपको अपना लक्ष्य छोटा न लगने लगे। लेकिन हमारे समाज में लक्ष्य का पीछा करते हुए मनुष्य इतना हताश हो जाता है, कि वह अपनी कल्पना करना ही छोड़ देता है। अक्सर यू पी एस सी और आई आई टी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर ऐसा हौवा बना दिया जाता है, कि कई छात्र उसमें सफल होने की कल्पना ही छोड़ देते हैं। उन्हें समझना होगा कि—यदि किसी व्यक्ति ने उस असंभव कार्य को संभव कर दिया है, तो आप क्यों नहीं कर सकते। इसके लिए सबसे पहले अपने बिलीफ और मान्यताओं के प्रति जागरूक होना होगा और उनकी जांच करें कि— क्या वे आपके लिए सकारात्मक तरीके से काम कर रहे हैं या वे आपके लिए बाधा बन रहे हैं? सही मायने में आपका अवचेतन मन ही सफलता में आपका साथी है और उसके पास असीमित शक्ति है।

49. शंकाग्रसित मन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानव मन हमेशा शंकाग्रसित रहता है। यदि मन में तनिक भी शंका आ जाए और हम अपने मन और बुद्धि की धार बनाए नहीं रख सकते, तो सफल नहीं हो सकते। इस स्पर्धात्मक संसार में, जो थोड़ा भी शंकाग्रसित रहता है, पिछे धकेल दिया जाता है। ज्यादातर लोग जो भी हैं, जैसे भी हैं, पॉजिटिव में जीने की कोशिश करते हैं, लेकिन पूर्णतः नहीं। उनके मन में थोड़ी बहुत शंका अवश्य होती है, जिसके कारण वे अपने कार्य में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। कोई भी कार्य या विचार करते समय वे उस क्षण को समर्पित अवश्य होते हैं, नहीं तो कार्य ही नहीं कर पाएंगे।

यदि आप अपने को पूर्ण रूप से शंकारहित करना चाहते हैं, तो आपको अहंकार के पार जाना पड़ेगा। अहम् के पार जाने का अर्थ यही है कि आप अपनी सभी कमजोरियों पर विजय पा लेते हैं। तब आपका कायाकल्प हो जाता है। आपकी आंतरिक क्षमताएं पूर्ण विकसित हो जाती हैं। तब बिना किसी भेदभाव के आप संसार की सेवा के लिए भी तत्पर हो जाते हैं। यदि पूर्ण रूप से शंकारहित होना है तो आत्मज्ञान पाना जरूरी है। आत्मज्ञान पाना है, तो समर्पण का भाव जरूरी है। चाहे साधना कितनी ही तीव्र क्यों न हो, यहां तीव्र साधना का अर्थ है, लगन और प्रेम से साधना करना। किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य होता है— छोड़ना। वास्तव में ध्यान क्रिया नहीं है, वह ईश्वर या आत्मा से एकाकार होने के लिए हृदय की तीव्र उत्कंठा है। इस प्रक्रिया के दौरान जितनी गहराई में हम उतरते हैं, उतना ही हमारा अहंकार कम होता है और उतना ही हम हल्का महसूस करते हैं। अतः यह बात ठीक से समझ लें कि आध्यात्मिक साधना का एकमात्र उद्देश्य धीरे-धीरे, मैं, मेरा की भावना को छोड़ना है।

इस प्रक्रिया को भिन्न-भिन्न तरीके से कहा गया है। उसे अलग-अलग नाम दिया गया है। जब हम इस अवस्था में पहुंच जाते हैं, तो शंकारहित हो जाते हैं। क्योंकि हमारे मन को आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। लेकिन हमारे मन में कोई न कोई शंका अवश्य लगी रहती है। क्योंकि वर्तमान समय में चलते रहने वाला मानव समाज या तो दौड़ रहा है, या फिर जड़ता का शिकार है। अब तो जीवन शैली में शामिल तकनीक और साधन दोनों मनुष्य को तब भी दौड़ा रहे हैं, जब वह कहीं बैठा है। आप घर या बाहर बैठे लोगों पर एक नजर डालिए, ज्यादातर लोगों के हाथ में स्मार्टफोन होगा और वे बैठे होंगे, लेकिन मन से दौड़ रहे होंगे। मन में वही शंकारूपी दानव ने अपना आधिपत्य स्थापित कर रखा होगा। यदि यह कहा जाए कि मनुष्य अब नींद में भी दौड़ रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सोते हुए भी मनुष्य दौड़ रहा है, तो उसके पीछे शायद कारण यही है कि —हमने अपने सदियों के चिंतन को बेकार मान लिया है और अपने मन रूपी मंदिर में शंका को अपने जीवन की कमान सौंप दी है। जैसे एक सारथी सारे अश्वदल की लगाम अपने पास रखकर रथ का संचालन करता है, वैसे ही मन सारे जीवन के विभिन्न आयामों को साध रहा है।

जरा सोचिए हमारा मन कितना महत्वपूर्ण है। भारत में सदियों से मनुष्य के अंतःकरण को टटोला है और पाया है—कि यह हमारा मन ही है, जो सब कुछ रचता है। विज्ञान को मन पर नहीं, बल्कि साधनों पर भरोसा है। भारत का चिंतन बिल्कुल स्पष्ट है, यह मन से संचालित प्रत्येक कर्म को संकल्प से युक्त करने का अनुशासन रचता है। हमारा चिंतन यह भी जानता है कि यह मन ही है, जो सोते में भी चलता रहता है और मन में कोई ना कोई शंका भ्रमण करती रहती है। यह तो साइंस ने भी साबित कर दिया है, कि हमारे मन में डाली गई कोई शंका मौत का कारण भी बन सकती है।

मैं एक सच्ची घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं—अमेरिका में जब एक कैदी को फांसी की सजा सुनाई गई तो, वहां के कुछ वैज्ञानिकों ने सोचा कि- क्यों न इस कैदी पर कुछ प्रयोग किया जाए। तब कैदी को बताया गया कि हम तुम्हें फांसी देकर नहीं, परंतु जहरीला कोबरा सांप से डंक मरवाकर मारेंगे और उसके सामने बड़ा- सा जहरीला सांप ले आने के बाद, कैदी की आंखें बंद करके, कुर्सी से बांधा गया और उसको सांप नहीं बल्कि दो सेफ्टी पिन चुभाई गई। फिर कैदी की कुछ सैकेंड में ही मौत हो गई। पोस्टमार्टम के बाद पाया गया कि कैदी के शरीर में सांप के जहर के समान ही जहर है। अब ये जहर कहां से आया जिसने उस कैदी की जान ले ली। वो जहर उसके खुद शरीर ने ही सदमे में उत्पन्न किया था। हमारे हर संकल्प से पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी (ऊर्जा) उत्पन्न होती है और वह हमारे शरीर से उसके अनुसार हारमोंस उत्पन्न करती है। 75% बीमारियों का मूल कारण नकारात्मक सोच से उत्पन्न ऊर्जा ही है। आज इंसान खुद ही अपनी बर्बादी का कारण है। उसके मन में जो दानव रूपी शंका ने अपना रैन- बसेरा बना रखा है, वह उसको नकारात्मक सोचने पर मजबूर करती है और हमारा मन शंका से ग्रसित रहता है।