201. बड़ा आदमी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

बड़ा आदमी एक ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन से ही सुनते आए हैं। हमारे बड़े-बुजुर्ग आशीर्वाद देते हुए यही कहते थे कि— बड़ा आदमी बनना। जीवन में सफलता प्राप्त करना, तरक्की करना। ये बड़ा आदमी क्या होता है? उस समय समझ नहीं आता था लेकिन कुछ बड़े होने पर माता-पिता का यह सपना बन जाता है। हर माता-पिता अपने बच्चे से यही उम्मीद करता है कि उसका बच्चा बड़ा आदमी बने और उस आशीर्वाद और सपने को मनुष्य जीवन भर भारी बोझ की तरह अपने कंधों पर ढोता रहता है।

बड़े होने पर यही समझ आता है कि— जिसके पास धन दौलत है जो बेशुमार संपत्ति का मालिक है, वही बड़ा आदमी है। जिसके पास बल और अधिकार है, वह बड़ा आदमी है। उस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए मनुष्य अनेक कर्म करता है। जीवन में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा तो प्रत्येक मनुष्य करता है, परंतु विरले ही मनवांछित सफलता प्राप्त कर पाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण परिश्रम और प्रयास के स्तर में अंतर है। अपेक्षित सफलता प्राप्त करने के लिए सतत् और सचेष्ट प्रयास करने होते हैं। उसे अपने जीवन में छोटी- बड़ी न जाने कितने परीक्षाएं देनी होती हैं।

सफलता और असफलता की परीक्षा में कभी मनुष्य सफल होता है तो कभी असफल होता है। ऐसे में असफलता मिलने पर निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी कमियों पर विचार कर स्वयं को कर्म की अग्नि में डालना चाहिए। इसके पश्चात् ही सफलता स्वर्ण की भांति प्रखर होकर हमारा स्वागत करती है। हमें संसार में प्रतिष्ठा दिलवाती है। तभी हम बड़े आदमी बनते हैं।

आपने देखा होगा जब कोई प्रतिस्पर्धी किसी प्रतिस्पर्धा में उतरकर नया कीर्तिमान स्थापित करता है तो समस्त संसार उससे चमत्कृत होकर उसकी उपलब्धि को नमन करता है। परंतु यह याद रखना चाहिए कि यह कीर्तिमान क्षण मात्र में किए गए प्रयास का परिणाम नहीं है। इस सफलता में उसके वर्षों के संकल्प की सिद्धि का समावेश है। जो कीर्तिमान उसने बनाया है, वह मैदान पर अभ्यास के दौरान न जाने कितनी बार स्थापित किया होगा। तब कहीं जाकर वह दुनिया के सामने प्रतिस्पर्धा में उतरकर स्थापित करता है।

सफलता प्राप्त करने के लिए हमें कर्म की अग्नि में खुद को झौंकना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे एक मक्के का दाना जब सिर्फ मक्का दाना ही होता है, तब उसका मूल्य बहुत कम होता है लेकिन यही मक्के का दाना जब आग में तपने के बाद भूनकर बाहर निकलता है तो उसके मूल्य में कई गुना वृद्धि हो जाती है। इसी तरह हमें अपने मूल्य में वृद्धि करने के लिए, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वयं को अग्नि के हवाले करना ही होता है। इसके पश्चात् हमें जो सफलता प्राप्त होगी, वह हमारे व्यक्तित्व के साथ- साथ हमारे भविष्य को भी प्रकाशित करेगी।

यह अच्छी बात है की प्रत्येक मनुष्य सफलता प्राप्त करे। उसके जीवन में खुशियां ही खुशियां हो। विश्व में वह अपना परचम लहराए लेकिन सिर्फ़ धन और बल हो, इसके आधार पर वह बड़ा आदमी बने। क्या इसमें ही जीवन की सार्थकता है? क्या बड़ा आदमी बनने का यही एक पैमाना है कि— वह जीवन में सफलता प्राप्त करे, अगर वह असफल हो गया तो क्या वह छोटा हो गया? क्या छोटा होना अयोग्यता है?

दरअसल मेरा तो यही मानना है कि मनुष्य का बड़ा होना नहीं, खरा होना मनुष्य जीवन की सार्थकता होनी चाहिए और वही उसका उद्देश्य होना चाहिए। क्योंकि बड़ा बनने के लिए बाहृय आधार की जरूरत है लेकिन खरा बनने के लिए अंतर की शुद्धता चाहिए। हमें अपने भीतर की अशुद्धियों को निकालना है। अपनी अंतरात्मा से अंधियारे को हटाकर सर्वव्यापी परमात्मा की ज्योति को प्रकाशित करना है।

सोना उतना ही खरा होता जाता है, जितना वह अग्नि में तपता है। शुद्धता ही सोने का असली मूल्य है। यदि मनुष्य के अवगुण छूट जाएं और गुण उसमें समा जाएं, उनसे ही उसकी श्रेष्ठता तय होती है, न की धन- दौलत से। मोंगरे के फूल छोटे होते हैं किन्तु सिंगार उन्हीं से किया जाता है। कोई महल बहुत बड़ा और आलीशान होने से वह पूज्यनीय नहीं होता। एक छोटे-से मंदिर में भी यदि आराध्य की मूर्ति स्थापित हो तो सिर झुकाने वालों की कतार लग जाती है और वह मंदिर उस विशाल और आलीशान महल से कहीं अधिक विशालता प्राप्त कर लेता है। इसलिए अपने अंतर्मन को शुद्ध कीजिए और ईश्वर के साथ संबंध स्थापित कीजिए। तभी आप सच में ही एक बड़े आदमी बन जाओगे।

200. सफलता के सूत्र

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है और सफल होना ही उसका सर्वमान्य लक्ष्य है।जीवन चुनौतियां और अवसरों से भरा हुआ है लेकिन केवल उन्हीं लोगों के लिए जो वास्तव में अवसरों को प्राप्त करने और चुनौतियों का सामना करने के लिए संघर्ष करते हैं।

अगर देखा जाए तो चुनौतियां ईश्वर का शक्तिशाली हथौड़ा है और हम उसकी तिपाई पर रखे लोहे की तरह हैं। उसकी चोट हमें नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि फिर से तैयार करने के लिए पड़ रही है अर्थात् बिना कष्ट उठाए हम सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। जीवन में वे मनुष्य सफलता का वरण करते हैं जो तकलीफों की आंच में तप कर बाहर निकलते हैं।

संसार का भी यही दस्तूर है कि— वह उन मनुष्यों को ही सिर आंखों पर बिठाता है जो कठिनाइयों में पीछे नहीं हटते और चुनौतियों का डटकर सामना करते हैं। तभी वे कुंदन बनते हैं, जो मनुष्य कष्टों को झेल लेते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है और दुनिया उनका सत्कार करती है।

कड़ी मेहनत और समर्पण सफलता की यात्रा का एकमात्र मंत्र है। कड़ी मेहनत के बिना कोई भी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। अपने जीवन में लक्ष्य को धारण कीजिए और फिर उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से परिश्रम किजिए।

यह हमेशा याद रखिए रास्ता जितना दुर्गम, पथरीला और कष्टदाई होगा, उस पर चलने वाले के पैर भी उतने ही मजबूत होंगे। ऐसे मनुष्य ही दुनिया में कुछ कर पाने का माद्दा रखते हैं। जब तक आप अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक प्रयास करना मत छोड़िए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी गति धीमी है। अगर आप निरंतर प्रयास कर रहे हैं तो जीत संभव है। इतिहास में ऐसे अनेकों मनुष्य हुए हैं, जिन्होंने कठोर परिश्रम द्वारा असंभव को भी संभव कर दिया। किसी भी सफलता का प्रारंभ प्रयास करने से ही शुरू होता है।

हम में से बहुत से मनुष्यों ने अक्सर यह सुना होगा कि— हमारे भाग्य में जो लिखा हुआ है, वह होना ही है तो प्रयास करने से क्या फायदा। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि क्या पता भाग्य में यही लिखा हो कि प्रयास करने के बाद ही हमें सफलता मिलेगी। इसलिए कर्म कीजिए। स्वयं पर भरोसा करने वाला साहिल ही तूफानों के बीच अपनी नौका का लंगर डाल सकता है। जिसे अपनी क्षमता पर विश्वास होता है, उसके लिए प्रतिकूलता भी अनुकूलता को जन्म देती है।

परिश्रम और प्रयास से भी ज्यादा जरूरी होता है कि— संघर्ष के साथ जीवन जीने और स्वयं के भीतर विद्यमान अनंत संभावनाओं को उद्घाटित कर सकने का विश्वास। इसके विपरीत जिस मनुष्य में धैर्य और दृढ़ता के साथ कठिनाइयों का मुकाबला करने का साहस नहीं होता है, वह किसी भी पड़ाव को पार नहीं कर सकता, छोटी-छोटी परेशानियों या तकलीफों से बचकर भागना चाहता है। ऐसे मनुष्य ही जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं जो दूसरों द्वारा अपने पर फेंकी गई ईंटों से एक सुंदर महल का निर्माण कर डालते हैं।

199. भाग्य उनका भी है जो उसे नहीं मानते।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आपने अक्सर बहुत से लोगों को यह कहते सुना होगा कि— हम भाग्य को नहीं मानते। हम आस्तिक नहीं हैं। हम तो नास्तिक हैं। जो आस्तिक होते हैं, वही भाग्य पर विश्वास करते हैं। हम तो कर्म को मानते हैं। कर्म करने से ही भाग्य का निर्माण होता है।

वे बिल्कुल सच कह रहे हैं कि— आप जैसा कर्म करोगे, वही भाग्य बनकर आपके समक्ष होगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि— भाग्य होता ही नहीं। दरअसल कर्म और भाग्य एक- दूसरे के पूरक हैं। कई बार ऐसा होता है कि जो लोग आस्तिक होते हैं, वे नाकामयाब रहते हैं और जो नास्तिक होते हैं, वे कामयाब हो जाते हैं। इस तरह के परिणाम का कारण मनुष्य स्वयं होता है।

भाग्य का आस्तिक होने या न होने से कोई संबंध नहीं है क्योंकि भाग्य तो उन लोगों का भी होता है जो भाग्य को नहीं मानते। वास्तविकता में भाग्य अस्तित्व में तभी आता है, जब कर्म होता है। भाग्य हमारे प्रारब्ध कर्मों का ही फल होता है। हम जैसे कर्म करते हैं, वैसा ही भाग्य लेकर पैदा होते हैं। जैसे प्रकाश के बगैर छाया संभव नहीं है, वैसे ही कर्म किए बगैर भाग्य का लाभ संभव नहीं है।

यदि कोई नास्तिक अच्छे कर्म करता है तो यकीनन उसे भाग्य के सापेक्ष कामयाबी मिलेगी और यदि कोई आस्तिक कर्म की उपेक्षा करता है तो निश्चित रूप से उसे जीवन में नाकामयाबी मिलेगी। भाग्य तो महज किसी प्रयास की सफलता का प्रतिशत तय करता है।

इसलिए बगैर प्रयास के, बगैर कर्म के, केवल आस्तिक होने के दम पर सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। यही सत्य है कि—भाग्य की प्रबलता पूर्व जन्मों के सत्कर्मों पर निर्भर करती है जो हो चुका है, उसे बदलना हमारे हाथ में नहीं है लेकिन वर्तमान में सत्कर्म करके भाग्य को संवार जरूर सकते हैैं।

इसलिए यह तय है कि— सच्चा और सात्विक जीवन जीने वाला नास्तिक, किसी ढोंगी आस्तिक से ज़्यादा सफलता प्राप्त करता है और सुखी रहता है। भाग्य और सफलता का यही संबंध है और जो इसे अपना लेता है, वही सफल होता है, चाहे वह आस्तिक है या नास्तिक।

198. आत्म- समीक्षा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कोई भी मनुष्य जैसा है, वह वास्तव में वैसा नहीं होता क्योंकि मनुष्य की प्रकृति है कि— वह अपनी वर्तमान स्थिति से कभी भी संतुष्ट नहीं होता। वह आगे बढ़ना चाहता है। प्रगति करना चाहता है लेकिन कहता रहता है कि— समय पर दाल- रोटी मिल जाए और मुझे क्या चाहिए? लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। दाल- रोटी तो सिर्फ कहने के शब्द मात्र हैं। उसके जीवन में तो आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है।

आज हमारे जीवन में त्वरा है, तेजी है, एक दौड़-सी लगी हुई है, आगे निकलने की। किस से आगे निकलना है, यह किसी को भी नहीं पता। लेकिन प्रत्येक मनुष्य सिर्फ दौड़ लगा रहा है कि— आगे जाना है। जिंदगी एक रेस का मैदान बन चुका है। सबसे आगे निकलना है। जीवन में आनंद नहीं, खुशी नहीं, संतोष नहीं। बस पैसा, केवल पैसा। आज के जीवन का मापदंड बन गया। जिधर देखो, उधर पैसे वालों की ही चर्चा हो रही है और हमारा पूरा दिन पैसे कमाने में ही व्यतीत हो जाता है।

आज मनुष्य के जीवन को आर्थिक लाभ की चिंता और आर्थिक हानि के दुख ने निगल रखा है। उनके हृदय में हमेशा भविष्य की चिंता लगी रहती है। चिंता और संदेह का इतना अधिक प्रभाव मनुष्य पर अतीत काल में भी कभी नहीं रहा, जितना आज के समय है।

छोटे बच्चों को देख लीजिए छोटी कक्षा में ही किताबों का इतना भारी बोझ उनके कंधों पर डाल दिया जाता है कि— वे गर्दन उठाकर चल भी नहीं पाते। उनके मुंख पर बुढ़ापे का-सा सयानापन दीख पड़ता है। आज हम कितनी जल्दी जीवन को थकान से भर देते हैं। आज हमें कितनी जल्दी है कि— हम प्रत्येक वस्तु को तेजी से प्राप्त करने की चिंता में लगे रहते हैं। हमारे जीवन में तेजी इतनी बढ़ गई है कि प्रतीत होता है कि प्रत्येक मनुष्य अपने निश्चित समय पर पहुंचने को लेट हो रहा है।

आज हम प्रत्येक मनुष्य के चेहरे पर शीघ्रता और दौड़ की दुश्चिंता की रेखाएं स्पष्ट देख सकते हैं। हमारे कामों में भी प्रतिवर्ष तीव्रता और शीघ्रता बढ़ती जाती है। हम जिस भी यंत्र का आविष्कार करते हैं, उसकी गति को और अधिक बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं।

भागदौड़ भरी इस जिंदगी में हमारे शरीर के ढांचे झुक गए हैं। असमय ही बाल सफेद हो गए हैं। बेचैनी बढ़ रही है। असंतोष बढ रहा है। हम अपनी रोटी कमाते हैं, पर उसे हजम करने की शक्ति हममें शेष नहीं बची। हमारी अत्यधिक उत्तेजित नाड़ियां शीघ्र ही चिड़चिड़ी हो जाती हैं। इससे हमें शीघ्र बुरा मानने, शीघ्र नाराज होने की आदत आती है। यह आदत असामाजिक है। सभी यह भली-भांति जानते हैं, फिर भी वे अपनी आदतों को छोड़ना नहीं चाहते।

दरअसल जीवन एक युद्धक्षेत्र है, इसमें हिम्मत और संकल्प के साथ जो आगे बढ़ता है, वही विजय प्राप्त करता है। जो हिम्मत हार गया, समझो जीवन में असफल हो गया। जीवन को सफल बनाने के लिए अभ्यास बहुत जरूरी है। अभ्यास जरूरत के समय ही नहीं बल्कि हर समय करना चाहिए। अखाड़े में उतरने वाला पहलवान प्रतिदिन अभ्यास करता है। ऐसा नहीं है कि— जब कुश्ती लड़नी हो तभी अभ्यास शुरू करे। तैयारी बहुत पहले से शुरू करनी पड़ती है। इसके साथ- साथ आत्म समीक्षा भी होती रहनी चाहिए कि— ईश्वर का नाम जपते हुए कितने वर्ष बीत गए। हमारे जीवन में कुछ परिवर्तन आया कि नहीं। अगर परिवर्तन आया है तो उस क्रम को आगे बढ़ाते हुए उसमें नए आयाम भी शामिल करें।

जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब लगता है, मानो सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन सच तो यह है कि जीवन ठहरता नहीं है। यह निरंतर चलता रहता है। इसलिए कभी भी सब कुछ खत्म नहीं होता। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि खुद को और दूसरों को भी समझने का प्रयत्न करना चाहिए। जीवन कितना भी निरर्थक क्यों न लगे, उसमें अंतर्निहित की खोज कर मनुष्य सारे कष्टों को सहन कर, उनसे बाहर निकल सकता है।

197. प्रसन्नता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रसन्नता की शक्ति किसी बीमार और निर्बल व्यक्ति के लिए बहुत ही मूल्यवान है। यह कहावत शत- प्रतिशत सच है कि— एक प्रसन्नता से भरा हृदय, दवा का काम करता है। प्रसन्नता ईश्वर द्वारा दी गई औषधि है। यह एक ऐसी औषधि हैं, जिसमें प्रत्येक मनुष्य को स्नान अवश्य करना चाहिए। प्रसन्न रहने से बीमार जीवित बच जाता है और दुर्बल की आयु लंबी हो जाती है। इसलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि— जहां तक हो सके अपने मन को प्रसन्न रखने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रसन्नता से वह शक्ति प्राप्त होती है जो मानसिक क्रिया में परिणत हो जाती है और जो शरीर के प्रत्येक अंग की क्रिया के लिए आवश्यक है। मानसिक प्रवाह शरीर के अंदरूनी अंगों पर पूरा प्रभाव डालते हैं। यदि मन प्रसन्न है तो श्वासतन्त्र, पाचनतंत्र, रक्ततंत्र अति प्रसन्नता से कार्य करते हैं। प्रसन्नता के द्वारा शरीर में जीवनी स्फूर्ति का आविर्भाव होता है।
डॉक्टर यही सलाह देते हैं कि— स्वास्थ्य के लिए जी भर कर हंसना यानी खिलखिला कर हंसना अत्यधिक हितकर है।

दुख, चिंता, भय, ये मनुष्य के बहुत बड़े शत्रु हैं। एक चिड़चिड़ा, अहंकारी और गुस्से से भरे हुए चेहरे वाला मनुष्य अपने जीवन की पवित्रता का विश्वास खो देता है। उसे अपनी स्वयं की शक्तियों पर भी भरोसा नहीं रहता। वह अपने जीवन के आदर्श तक को भूलकर झगड़ालू, घमंडी, निरुद्देश्य और निरर्थक जीवन जीने लगता है। हमें ऐसे सभी दुष्प्रभावों के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए जो मन को हीन बनाने का प्रयत्न करते हैं। हमें उनका इतना ही विरोध करना चाहिए, जितना कि हम मन में आए हुए अपराध की भावना का करते हैं।

कई बार हम किसी व्यक्ति को देखकर कहते हैं कि— यह व्यक्ति शुभ दर्शन वाला है और यह व्यक्ति अशुभ दर्शन वाला है। ऐसा क्यों होता है? हम यह निर्णय कैसे करते हैं कि— इसको देखने से हमारा शुभ होगा और इसको देखने से हमारा अशुभ ही होगा। कभी इसके बारे में सोचा है, तो चलिए सोच कर देखिए जो मनुष्य शुभ दर्शन वाला होता है, इसका कारण स्पष्ट है कि— वह प्रसन्नचित्त है, उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान बिखरी रहती है। मन की प्रसन्नता से हृदय स्वस्थ रहता है जिसका नूर चेहरे पर साफ दिखाई देता है। एक मुस्कुराता हुआ चेहरा चारों ओर खुशनुमा वातावरण बनाए रखता है। इससे हम अपने जीवन में सबसे उज्जवल और उत्तम वस्तुओं को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

शरीर- क्रिया- विज्ञान कहता है कि— सभी संवेदनात्मक नाड़ियां परस्पर संबंध रखती हैं। जब एक नाड़ी समूह मस्तिष्क तक कोई बुरा समाचार ले जा रहा होता है तो उसका प्रभाव सारी शिराओं, उपशिराओं एवं संवेदन-तन्तुओं पर पड़ता है। हम ऐसे समझ सकते हैं कि— जो नाड़ी-समूह अमाशय की ओर जाता है, उसके दुष्प्रभाव से अमाशय की गति अवरुद्ध हो जाती है, जिसके प्रभाव से चेहरे पर भी मुर्दनी-सी छा जाती है। ऐसे चेहरे को जो भी देखता है, उसे उसमें अशुभता ही नजर आती है क्योंकि उसको देख कर उसके स्वयं के भाव बदल जाते हैं और वह यही सोचता है कि— अब मेरा काम नहीं बनाने वाला और उसकी यही सोच उस चेहरे को अशुभ बना देती है।

दरअसल प्रसन्नता की शक्ति को, उसके महत्व को हम भलीभांति समझ ही नहीं पाए। हमें बच्चों को प्रारंभ से ही प्रसन्न रहने की आदत डालनी चाहिए और उनका स्वभाव प्रसन्नता से भरा हुआ बनाना चाहिए। इसलिए अपने बच्चों को प्रसन्नचित्त रहने के लिए प्रोत्साहन दीजिए और खूब खुलकर हंसिये। जी भर कर हंसिये। इससे छाती खुलती है और सारे शरीर में रक्त की लाली दौड़ती है।

अपने स्वभाव को ऐसा बनाइए कि— मुझे खुल कर हंसना पसंद है। दबी हुई हंसी हंसना पसंद नहीं है। ठहाके मार-मार कर हंसना पसंद है, जिससे सारा घर गुंज उठे। इससे आपके परिवार के सदस्यों का ही भला नहीं होगा बल्कि जो कोई हंसी को सुनेगा उनका भी भला होगा। घर की उदासी दूर हो जाएगी। प्रसन्नता बड़ी जल्दी फैलती है और दूसरे इसको बड़ी जल्दी ग्रहण कर लेते हैं। एक हार्दिक हंसी आन्नद से भरा संगीत है।

जो बच्चे विनोद पूर्ण स्वभाव के नहीं होते, वे कभी भी महान नहीं बन सकते। जिन पेड़ों पर फूल नहीं लगते, उन पर कभी फल भी नहीं लगेंगे। इसलिए प्रसन्नता की शक्ति को समझिए और हमेशा प्रसन्न रहने की भरपूर कोशिश कीजिए।

196. चिंता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

चिंता अर्थात् पागल बना देने वाला एक ही विचार या वह तीव्र विचार जो चाहने पर भी मस्तिष्क से दूर न हो सके अर्थात् जिस विचार को हम अपने दिमाग से निकाल ही न पाएं। यह एक ऐसी हथौड़ी है जो मस्तिष्क के सूक्ष्म एवं सुकोमल तंतुजाल को कुचलकर हमारी कार्यकारिणी शक्ति को नष्ट कर देती है।

हमारे मस्तिष्क के स्नायु तंत्र इतने सूक्ष्म होते हैं कि उनको केवल माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है लेकिन चिंता इन्हीं विचार तंतुओं पर अपना आधिपत्य स्थापित करती है और यदि हम उन्हें तुरंत बाहर न निकाल पाएं तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि हम उन विचारों को दूर करने में असमर्थ हो जाते हैं।

चिंता से मस्तिष्क का एक अंश घायल हो जाता है क्योंकि मस्तिष्क के सभी सैल परस्पर घनिष्ठ संबंध रखते हैं। इसलिए इस प्रक्रिया का दुष्प्रभाव समस्त चिंतन प्रक्रिया पर पड़ता है। तन्तुओं का संयोजन नष्ट हो जाने के कारण, क्रमबद्ध चिंतन की शक्ति क्षीण हो जाती है।

अगर यह कहा जाए कि— आज के समय चिंता करना पिछड़ेपन की निशानी है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब वाष्प इंजन का आविष्कार हुआ, तब 90% शक्ति बेकार चली जाती थी, केवल 10% ही उपयोग में आती थी। धीरे- धीरे इंजन में सुधार किया गया और आज ऐसा बिजली का इंजन बन चुका है जो 90% शक्ति का उपयोग करता है, केवल 10% शक्ति बेकार जाती है।

कुछ मनुष्य वाष्प इंजन की तरह होते हैं, जो अपनी शक्तियों का 90% भाग चिंता में, दुख तकलीफों में, शिकायतों में, जीवन की कठिनाइयों में व्यर्थ गंवा देते हैं। परंतु जो समझदार हैं, वे अपनी सारी शक्ति को कार्य में बदल डालते हैं। वे जी- जान लगाकर सिर्फ अपने कार्य पर फोकस करते हैं और अपनी मेहनत के बलबूते शिखर पर पहुंचते हैं। इससे उनका जीवन चमचमा उठता है।

जिसे जीने की कला की सच्ची शिक्षा मिल चुकी है,वे अपनी शक्तियों को चिंता में नही गवाएंगे बल्कि वे तो चिंतन करेंगे और अपने जीवन की कठोर डगर को सरल बनाएंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि— चिंता की यह प्रक्रिया जीवन की मशीन को तोड़ने फोड़ने के सिवा और कोई कार्य नहीं करती।

दुख, तकलीफ, दुर्घटनाएं जीवन को अंधकारमय नहीं बनाते लेकिन मनुष्य मामूली-सी चिंता से तिल- तिल कर क्षीण होता जाता है, जिससे उसके जीवन से सुखचैन खत्म हो जाता है। चिंता करने से उसके मस्तिष्क पर दबाव पड़ने लगता है लेकिन फिर भी जिस कार्य के लिए चिंता करता है, वह कार्य जरा- सा भी आगे नहीं बढ़ता।

मनुष्य को काम की अधिकता नहीं मारती बल्कि चिंता मारती है। काम तो शरीर को स्वस्थ रखने की एक वस्तु है। आपने स्वयं देखा भी होगा कि किसी मनुष्य की शक्ति से अधिक काम उससे नहीं करवाया जा सकता। लेकिन चिंता तो मनुष्य की शक्तियों की तेज धार को कुंद कर देती है।

डॉक्टर जैकोबी जो अमेरिका के मस्तिष्क चिकित्सकों में सर्वश्रेष्ठ डॉक्टरों में एक हैं, उनका भी यही कहना है कि— मस्तिष्क की चिकित्सा संबंधी खोजों से यही सिद्ध हुआ है कि— चिंता वास्तव में मनुष्य को मार डालती है। चिंता के घातक प्रभाव के बारे में ही नहीं बल्कि उसके मारने के ढंग क्या हैं, इस बात का भी पता लग चुका है। मस्तिष्क का विशेष अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक डॉक्टरों का समान रुप से विश्वास है कि— सैकड़ों मौतें, जिनके लिए अन्य कारण बताए जाते हैं, केवल चिंता के कारण ही होती हैं या यूं समझ लीजिए कि मस्तिष्क संस्थान के अंशों पर चिंता ऐसे घाव कर डालती है, जिनका निदान करना कठिन होता है।
जिस प्रकार एक स्थान पर पानी की बूंद लगातार पड़ती रहने से गड्ढा हो जाता है, ठीक उसी प्रकार एक ही बात का विचार करते रहने से, एक ही बात एकाग्र होकर सोचते रहने से, मस्तिष्क के सैल नष्ट हो जाते हैं।

एक स्वस्थ मस्तिष्क कभी-कभी होने वाली चिंता को तो सहन कर लेता है लेकिन बार-बार किसी एक ही विचार पर जोर देने से मस्तिष्क में होने वाले घाव का मुकाबला नहीं कर पाता। चिंता मस्तिष्क पर वैसे ही वार करती है, जैसे मस्तिष्क को खोल कर उसके ऊपर एक छोटी-सी हथौड़ी की निरंतर चोट की जा रही हो, जिसका परिणाम अंत में यही होता है कि मस्तिष्क के तंतु विकृत होकर अपनी कार्य शक्ति को खो बैठते हैं।

वर्तमान के संकट में शायद ही कभी किसी को ज्यादा परेशानी होती होगी। परंतु आने वाले संकटों की आशंका और चिंता से अवश्य होती है। जो बहुत दूर तक सोचते रहते हैं, चिंता करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क थक जाता है। वह काम करना कम कर देता है। ऐसे मनुष्य किसी पहाड़ी के पास पहुंचने से पहले ही उस पर चढ़ाई करना शुरू कर देते हैं।

आज की उन्नति में वे चिंता द्वारा जानबूझकर एक दीवार खड़ी कर देते हैं। वे बन्धन में बंधकर जीवन बिताते हैं। ऐसे मनुष्य जीवन जीते नहीं बल्कि उसे बोझ समझते हुए व्यतीत करते हैं। हो सकता है, भूतकाल में उनका जीवन संघर्षों में बिता हो, परंतु वह समय निकल चुका है। अब उनके बारे में सोच कर चिंता करने से क्या फायदा?

अनदेखी मुसीबतों की चिंता करने की अपेक्षा क्यों न अपने वर्तमान समय का आनंद लिया जाए। क्यों न अपने जीवन में आने वाले सुखों पर विचार कर आनंदित हुआ जाए? क्यों नित्य व्यर्थ की चिंता द्वारा गड्ढे खोदकर अपने आप को दयनिय अवस्था में पहुंचाते रहते हैं? क्यों हम अपनी तुलना दूसरों से करते रहते हैं?

यह विश्व कैसा है, इसको देखने का नजरिया सबका अपना-अपना है। यह विश्व एक दर्पण के समान है। इसमें जैसा हमारा चेहरा होगा, वैसा ही प्रतिबिंब दिखाई देगा। यदि चिंता से भरपूर मनहूस चेहरा बनाए रखेंगे तो यह विश्व हमें आनंदहीन दिखाई देगा और यदि हम चिंता विहिन चेहरा रखेंगे तो हमारे चारों तरफ आनंद ही आनंद होगा। हमें हर समय खुशियां प्राप्त होती रहेंगी। अब यह आपके हाथ में है कि— आप क्या चाहते हैं?

195. हंसने की शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह युक्ति तो आपने सुनी ही होगी कि— हंसो और मोटे हो जाओ।
अब यह युक्ति कितनी सारगर्भित है, इसके बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह सच है कि — यदि प्रत्येक व्यक्ति हंसने की शक्ति को पहचान ले और जान ले की हंसने से स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की प्राप्ति होती है तो संसार के समस्त रोगों का नाश अवश्य हो जाएगा। कोरोना काल में भी जो मनुष्य हंसता रहा, वह कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से छुटकारा पा गया यानी ठीक हो गया। लेकिन जो निराशा और अवसाद में चला गया, वह काल का ग्रास बन गया। आज भी जब थर्ड़ वेव की बात होती है तो जो हंसते हुए इसे स्वीकार रहा है, उसका कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। लेकिन अब भी कुछ मनुष्य ऐसे हैं जो घबराए हुए हैं, कोरोना उनको अवश्य ही अपना ग्रास बना लेगा। कोविड-19 के समय ऐसे मनुष्यों को देखा है जो फोन पर बात करते हुए भी डर रहे थे। उनको ऐसा लग रहा था जैसे हम बात करेंगे तो कहीं कोरोना हमारे को न हो जाए। ऐसे मनुष्यों का क्या हो सकता है? वह तो आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हो।

ईश्वर ने हमें हंसी इसलिए दी है कि— हम गंभीर बीमारियों से बचे रहें। प्रकृति ने हमारे भीतरी अंगों के व्यायाम और आनंद प्रदान करने के लिए हंसी बनाई है।

डॉक्टर ग्रीन का कहना है कि— जब आप पूरा खुल कर हंसते हैं, उस समय आपके शरीर की कोई भी छोटी- से- छोटी धमनी या रक्तवाहिनी ऐसी नहीं रहती, जिसमें लहर न उठती हो।

डॉक्टरों की भाषा में इस प्रकार समझ सकते हैं कि— हंसने से रक्तवाहिनी नियंत्रक नाड़ी केंद्र उत्तेजित होता है, इससे धमनियों या रक्तवाहिनियों का विस्तार होता है और उनमें ऐसी हरकतें पैदा होती हैं जिसके कारण रक्त का प्रवाह तेज हो जाता है। हंसने से हमारी श्वास की गति तेज होती है जिससे हमारे पूरे शरीर को ऑक्सीजन पहुंचती है और हम ताजगी महसूस करते हैं। इससे आंखों में चमक आती है। पसीना अधिक आता है। फेफड़े खेलते हैं और फेफड़ों के ऐसे कोष्ठकों में से भी गंदी हवा बाहर निकलती है जो साधारणतया श्वास लेने पर नहीं निकलती।

खुलकर हंसने से शरीर में एक ऐसी समता या संतुलित अवस्था आती है, जिसे हम स्वास्थ्य कहते हैं।
स्वास्थ्य का अर्थ ही है— शरीर के अंग- प्रत्यंग का सही- सही काम करना, एक- दूसरे अंग के संतुलन में ठीक- ठीक चलना।शरीर का यह संतुलन एक रात नींद न आने से अथवा किसी दुःख या चिंता से बिगड़ जाता है पर हंसने से बिगड़ा हुआ संतुलन फिर प्राप्त किया जा सकता है।

पुराने समय में राजा और महाराजाओं के पास विदूषक रहा करते थे, जिन का कार्य ही उनको हंसाना होता था। वे अपनी मनोरंजक उक्तियों और चुटकुलों द्वारा हमेशा हंसाते रहते थे। खाने के समय भी हंसी से बढ़कर कुछ नहीं होता। इससे भोजन तुरंत पच जाता है। नींद न आने का भी सबसे बड़ा इलाज हंसी है।

चेम्फोर्ट के ये शब्द कितने बुद्धिमतापूर्ण हैं कि— वह दिन पूरा का पूरा बेकार गया, जिस दिन हम हंसे नहीं।

इतिहासकार ह्यूम लिखते हैं कि— राजा एडवर्ड द्वितीय एक बार हंसाने का एक क्राउन पारितोषिक दिया करता थे।

जब मनुष्य कभी मुस्कुराता है तो उसके शरीर में कुछ न कुछ वृद्धि होती हैं परंतु मुस्कुराने की बजाय खिलखिला कर हंसने से शरीर की वृद्धि और भी अधिक होती है। देखा जाए तो हंसी में क्या कुछ नहीं छिपा है? यह एक कुंजी है, जिससे हम मनुष्य की पहचान कर सकते हैं।
कभी आपको किसी डॉक्टर के पास जाना हो तो ऐसे डॉक्टर का चुनाव किजिए जो हंसमुख हो। ऐसे डॉक्टर जल्दी ही आपकी बीमारी का पता भी लगा लेंगे और आपको निरोग भी कर देंगे।

आप अक्सर देखते होंगे कि— कुछ मनुष्यों के चेहरों पर अमिट गंभीरता छाई रहती है तो अन्य कुछ लोगों के मुख पर ठंडी मुस्कान होती है। बर्फ जैसी ठंडी। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हंस सकते हैं परंतु उनकी हंसी उनके गले से बाहर मुश्किल से निकल पाती है। इस प्रकार की हंसी का कोई विशेष लाभ नहीं होता। वास्तव में वह मनुष्य अत्यंत सुखी है जो अपने आप हंसता है और अपने आप को सौभाग्यशाली मानता है।

जब विपत्ति आती है, तब गंभीरतापूर्वक अकर्मण्य होकर बैठने की अपेक्षा हंसना चाहिए। जीवन में सदैव आनंद- क्रिड़ा नहीं मिलते। प्रत्येक दिन प्रकाशमय नहीं हो सकता। इसलिए जब संकट आते हैं, तब भी हंसना चाहिए। इससे आप को सांत्वना मिलेगी। पीड़ा और कष्ट कम होंगे। कई अदृश्य कष्ट जीवन में आते हैं। कई विपत्तियां सामने आ जाती हैं। उन गड्ढों में गिरने की बजाए कूदकर पार करना है। फिर आप क्यों नहीं हंसते? मन के उत्साह को कम मत होने दीजिए। अगर दूध उबल कर निकल गया है तो उसके लिए पछतावा मत कीजिए और दूध ले आइए, पर हंसते रहिए क्योंकि हंसने वाले की हमेशा विजय होती है। यदि आप हंस नहीं सकते तो जरा मुस्कुरा ही दीजिए। मुस्कुराने से उतना लाभ तो नहीं होगा जितना खिलखिला कर हंसने से होगा फिर भी आपके चेहरे पर गंभीर भाव लाने से जो हानि होती है, उससे तो बचा जा सकता है।

194. जल के किनारे टहलना अच्छा है।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रतिदिन सुबह के समय टहलना यानी मॉर्निंग वॉक स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है। यह तो लगभग सभी जानते हैं लेकिन शायद आपको यह न पता हो कि— समुद्र तट, तालाब, सरोवर या नदी के किनारे टहलने के बहुत सारे फायदे हैं। लहरों की आवाज, शांत वातावरण आदि सब कुछ का हमारे शरीर पर एक चिकित्सिय प्रभाव पड़ता है। हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह स्वचालित रूप से हमारे मूड को हल्का करता है और हमें तनावमुक्त बनाता है।

हरियाली के बीच टहलने का अपना ही मजा है। ऐसा कौन होगा जिसे प्रकृति के खूबसूरत नजारे मनमोहक न लगते हों। प्रकृति का सेहत से पुराना रिश्ता है।

स्पेन में हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक— यदि आप नदी, तालाब या किसी पानी के स्रोत के किनारे टहलते हैं तो मन को सुकून मिलता है, साथ ही आपकी मानसिक सेहत के लिए भी बेहतर परिणाम देने वाला हो सकता है।

बर्सिलोना इंस्टीट्यूट आफ ग्लोबल हेल्थ की रिसर्च टीम ने अध्ययन किया है। शोध के निष्कर्ष के अनुसार जल, नदी या समुद्र के किनारे रहने वाले लोगों में एक हफ्ते के भीतर ब्लड प्रेशर और हृदय गति का संतुलन बेहतर दिखने लगा साथ ही प्रतिभागियों का मूड अपेक्षाकृत शांत और बेहतर नजर आया। प्रतिभागियों के मुताबिक उन्होंने जल के नजदीक जाने के बाद मूड में त्वरित बदलाव महसूस किया।

193. गुरु की महिमा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गुरु विश्व की श्रेष्ठ पदवी है जो अपने शिष्य को सर्वोत्तम बनाने के लिए धर्म का निर्वहन करता है। विद्या प्राप्त करने के लिए गुरु की महती आवश्यकता होती है और गुरु इसी विद्या की अनेक धाराओं का संगम है। गुरु के बिना किसी भी क्षेत्र में उपलब्धि प्राप्त नहीं की जा सकती। यदि किसी मनुष्य ने गुरु का मंत्र धारण नहीं किया तो समझ लो वह पृथ्वी पर भार है। ऐसा मनुष्य कभी भी गुरु की महिमा को समझ ही नहीं सकता।

मानवीय शरीर धारण करने के पश्चात् गुरु का प्रेम और आशीष अवश्य प्राप्त करना चाहिए। तभी वह गुरु भक्ति और गुरु शक्ति का वाहक बनने में सक्षम हो सकेगा। भगवान स्वयं भी गुरु की ओर संकेत कर, उन्हें स्वयं से श्रेष्ठ बताते हैं। उसी तरह माता-पिता भी गुरु को अपने से श्रेष्ठ मानते हैं। वास्तव में देखा जाए तो माता-पिता तो जन्म देकर पालन- पोषण करते हैं। लेकिन किसी को आदर्श मनुष्य का दर्जा देने वाला तो गुरु ही है।

वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र में गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। परंतु अध्यात्म में गुरु की भूमिका को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मंत्र की दीक्षा से लेकर उसकी सिद्धि प्राप्त करने तक यानी की पूरी की पूरी मंत्र साधना में गुरु की कृपा की नितांत आवश्यकता होती है। शिष्य के ज्ञान एवं विश्वास को अपनी शक्ति से दिव्यशक्ति की ओर ले जाना और अपने प्रेम की बौछार करते हुए उसे सिद्धि तक पहुंचा देना ही गुरु के गुरुत्व को दर्शाता है। लेकिन गुरु भी श्रेष्ठ होना चाहिए, तभी वह अपने शिष्य को जीवन के गूढ़ रहस्य को समझा सकता है।

गुरु शिष्य संबंध ही आध्यात्मिक संबंध है क्योंकि गुरु ही ईश्वर का मार्ग दिखाता है। एक गुरु ही है जो जीव को जीवन के रहस्य से रुबरु करवाता है। वही मानव के जीवन से जुड़े लक्ष्य भेद को सिद्ध कराने में समर्थ हो सकता है। जिस भी साधक ने गुरु की महिमा को आत्मसात् कर लिया, वह भवसागर से पार हो गया।

जीवन का सच्चा निर्माता गुरु ही है। वह अपने बुद्धि कौशल से शिष्य के चरित्र का निर्माण करता है। यह गुरु की महिमा ही होती है कि— वह अपने से बढ़कर अपने शिष्य को महान बनाता है। भगवान श्री राम के लिए गुरु वशिष्ठ, पांडुवों के लिए गुरु द्रोण और चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त के लिए आचार्य चाणक्य जैसे गुरु ही उनकी सफलता के स्रोत थे। विद्यादान की गुरु कृपा ही अपने शिष्यों का महिमामंडन करने का माध्यम सिद्ध होती है। शरीर व आत्मा का तत्व दर्शन, जीव की मीमांसा, ईश्वर की खोज और संसार का आश्रय, गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव हो सकता है। गुरु को पारंपरिक एवं मूल पथ प्रदर्शक बताया गया है। जिस पर आत्मबोध की यात्रा सरल हो जाती है।

अब प्रश्न यह पैदा होता है कि— गुरु कैसा होना चाहिए? इसका उत्तर हमें कुलाणवितन्त्र में प्राप्त होता है। जिसने गुरु के बारे में विस्तार से बताया गया है कि—गुरु कैसा होना चाहिए। जो विद्वान वेद- वेदांगों का वेत्ता, सरल चित्त, मंत्र- शास्त्रज्ञ, उदार स्वभाव और परोपकारी हो, जिसके आचार- विचार में अद्भुत आकर्षण हो और जिसके व्यक्तित्व को स्मरण करते ही मन में निश्चिंतता या संतुष्टि आ जाती हो, वही गुरु होता है।

योगिनी हृदयतंत्र के अनुसार गुरु दो प्रकार के होते हैं—

लौकिक गुरु और परम गुरु

लौकिक गुरु—
जब तक साधक अपने अहंकार एवं अज्ञान जनित जन्म कर्मों को शास्त्र अनुरूप व्यवस्थित करने की क्षमता अर्जित नहीं कर लेता, तब तक उसको लौकिक गुरु की आवश्यकता होती है। लौकिक गुरु को सद्गुरु भी कह सकते हैं। लौकिक गुरु शास्त्र व साधना के विधि- विधान और मर्म के ज्ञाता होते हैं। वे साधना के क्षेत्र में आने वाली दुविधाओं एवं असुविधाओं को अपने वात्सल्य एवं उदार भाव से निष्ठा एवं विश्वास में परिणितकर साधना के मर्म को समझाते हैं और शिष्य को लक्ष्य तक ले जाते हैं।

परम गुरु —
हमारे परम गुरु तो अंतर्यामी ईश्वर ही हैं जो हमारे अंतर्मन में गुप्त रूप से विद्यमान हैं। वे अपने ज्ञानदीप से हमारे अज्ञान तिमिर का नाश करते रहते हैं। उनकी प्रभा हमारे कर्तव्य बोध का प्रकाश स्तंभ बनती है। यदि गुरु के इस ज्योतिर्मय स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हो पाता है तो साधक अहंकार, भ्रांति एवं किंकर्तव्य विमूढ़ता के घने अंधकार में भटकता रहता है। जब शिष्य में परम गुरु की कृपा पाने की इच्छा जाग्रत हो जाती है, तब वे अपना सर्वशक्तिमान एवं आनंदमय स्वरूप दिखला ही देते हैं। उनका यही स्वभाव कृपा भाव कहलाता है। यह कहा जा सकता है कि—अहंकार के प्रपंचों में उलझे अपने शिष्य के अज्ञान को दूर करना गुरु का पहला काम है।

लौकिक गुरु एवं परम गुरु दोनों की ही मनुष्य को महती आवश्यकता होती है। दोनों का सानिध्य पाकर ही वह इस भवसागर से पार हो सकता है। कवियों ने भी गुरु की महिमा का बखान अपने-अपने माध्यम से किया है।

कहा भी गया है कि— गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शिव है। गुरु साक्षात् परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं नमस्कार करता हूं।

192. शुभ- मुहूर्त से महत्वपूर्ण, शुभ-कर्म

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

शुभ- कर्म, शुभ- मुहूर्त से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि शुभ- मुहूर्त तो महज किसी कार्य के अच्छे परिणाम के लिए राह आसान करता है लेकिन शुभ कर्म के सदैव अच्छे ही परिणाम होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो न कभी रावण नाकामयाब होता और न ही दुर्योधन पराजित होता। रावण तो स्वयं ज्योतिष का बहुत बड़ा ज्ञाता था। वह तो प्रत्येक कार्य शुभ- मुहूर्त देखकर ही करता था, फिर वह असफल कैसे हो गया?

बहुत से लोगों को यह पता भी नहीं होगा कि श्री राम ने अपने पिता राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए एक पूजा करवाई थी। उस समय श्री राम को कोई पंडित नहीं मिल रहा था क्योंकि वे लंका में थे। तब विभीषण ने श्री राम को यह बताया था कि उनके भाई लंकेश बहुत बड़े पंडित और ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता हैं इसलिए आप उनसे पूजा करवा सकते हो। तब हनुमान जी लंकेश के पास श्री राम का संदेश लेकर गए थे और कुछ समय आनाकानी करने के बाद रावण ने श्रीराम का संदेश स्वीकार कर लिया था तत्पश्चात् स्वयं रावण ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए पूजा करवाई थी और इस पूजा के एवज में उन्होंने श्रीराम से दक्षिणा भी ग्रहण की थी।

वैसे भी सभी राजा- महाराजाओं के पास अपने खास ज्योतिषी होते थे अर्थात् शुभ समय जानने की सुविधा सभी के पास थी। दरअसल किसी शुभ समय में प्रारंभ किए गए कार्य का परिणाम अच्छा होता है लेकिन सूक्ष्मता से ऐसे शुभ क्षण को पहचानना और कार्य आरंभ करना बहुत मुश्किल होता है। आप अक्सर देखते होंगे की अच्छे ज्योतिषी से पूछने और शुभ मुहूर्त में कार्य प्रारंभ करने के बाद भी हमें नाकामयाबी हासिल होती है। इसका क्या कारण हो सकता है, कभी यह जानने की कोशिश की?

दरअसल जिनके इरादे नेक नहीं होते वे कभी भी शुभ मुहूर्त में कार्य आरंभ नहीं कर पाते। कोई न कोई अड़चन आती ही रहती है और उनका शुभ समय निकल जाता है। लेकिन जो शुभ संकल्प के साथ कार्य आरंभ करते हैं, उन्हें शुभ मुहूर्त अपने आप मिल जाता है क्योंकि ऐसे मनुष्य ईश्वर को साक्षी मानकर कार्य को प्रारंभ करते हैं। वे सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देते हैं और भला जिस कार्य में ईश्वर की मौजूदगी हो वह समय शुभ कैसे नहीं होगा और उस कार्य में कैसे सफलता प्राप्त नहीं होगी।

मुहूर्त के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं और विश्वास हैं। कहीं चौघड़िया महत्पूर्ण है तो कहीं राहुकाल। कहीं तिथि उपयोगी है तो कहीं वार। इसलिए कई बार एक क्षेत्र में जिस समय को शुभ मुहूर्त माना जाता है, किसी अन्य क्षेत्र में वही समय शुभ नहीं माना जाता। बाधारहित कामयाबी के लिए शुभ समय में कार्य शुरू करने का महत्व है लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि विश्वास, प्रसन्नता और शुभ संकल्प के साथ कार्य आरंभ किया जाए।