279. क्रोध के दुष्परिणाम

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं कि — क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव पैदा होता है क्योंकि इससे स्मृति भ्रमित हो जाती हैं और ज्ञान का नाश हो जाता है। ज्ञान का नाश होने से मनुष्य, मनुष्य नहीं रहता। वे काम, क्रोध और लोभ को नरक का द्वार कहते हैं।

शास्त्रों में कहां गया है कि—क्रोध मानव की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है।

ऋग्वेद में कहा गया है कि— यदि जीवन में धन-संपत्ति अर्जित करना चाहते हो तो क्रोध का त्याग करके नम्रता का व्यवहार सीखना होगा। जिससे अपना और समाज का हित कर सकते हो।

क्रोध मनुष्य का एक ऐसा अवगुण है जो हृदय की गति को बढ़ाने के साथ-साथ तनाव के स्तर में भी वृद्धि कर देता है। मनुष्य के क्रोधित होने के अनेक कारण हो सकते हैं। लेकिन कारण चाहे कोई भी हो क्रोध एक भयावह स्थिति ही उत्पन्न करता है। उसके हमेशा दुष्परिणाम ही होते हैं। अक्सर देखा जाता है कि क्रोध का प्रमुख कारण व्यक्तिगत या सामाजिक अवमानना है। आमतौर पर ऐसे लोग क्रोध करते हैं जो समाज द्वारा उपेक्षित या तिरस्कृत कर दिए जाते हैं और उनको समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है।

ऐसे और भी बहुत से कारण हो सकते हैं, जिसके कारण मनुष्य क्रोधित हो जाता है। कई बार अपमानित होने के कारण भी क्रोध आना स्वाभाविक है। इसके अलावा भी कोई ऐसी घटना जिसे हम स्वीकार नहीं कर पाते तो क्रोधित हो जाते हैं। लेकिन कारण चाहे कोई भी हो हम केवल यह कह सकते हैं कि जब कोई कार्य हमारे मन के अनुकूल नहीं होता है तो क्रोध आना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। वैसे देखा जाए तो क्रोध मनुष्य के पतन का कारण बनता है।

क्रोध उस जहर के समान है, जिससे सदैव हानि ही होती है। जिस प्रकार स्वयं विष पीने वाला मनुष्य अपने अनिष्ट को आमंत्रित करता है वैसे ही क्रोध करने वाले मनुष्य सदैव अपना ही अहित करता है। यह हमारी निर्णय लेने की शक्ति को प्रभावित करता है। हमारे विवेक को क्षीण कर देता है। यह हमारी बुद्धि के प्रभाव को नष्ट कर देता है। ऐसे व्यक्ति को कोई भी अपना दोस्त नहीं बनाना चाहता। क्रोध करने वाला व्यक्ति सामने वाले से ज्यादा स्वयं का अहित करता है। यह अनेक मानसिक विकारों को जन्म देता है, जिससे व्यक्ति शारीरिक तौर पर भी दुर्बल हो जाता है। उसे अपने पारिवारिक जीवन में भी कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसे संबंधों में दूरियां बढ़ जाती हैं।

क्रोध हमारे जीवन के प्रेम को खत्म कर देता है। पारिवारिक स्नेह एवं मर्म रसातल में पहुंच जाता है। हमारे स्वभाव में माधुर्य का अभाव हो जाता है। ऐसे मनुष्य अलोकप्रिय हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को देखकर लोगों में भय उत्पन्न होने लगता है। संयुक्त परिवारों का विघटन व्यक्ति के क्रोध का ही परिणाम है। हम विनम्रता छोड़कर चले आ रहे हैं। सामंजस्य का भाव मन से तिरोहित कर रहे हैं। इस भाव के न्यून होने से पारिवारिक एवं सामाजिक कलह उत्पन्न होते हैं।

क्रोध के हमेशा दुष्परिणाम ही होते हैं। क्रोध मनुष्य के पतन का कारण है। इसलिए क्रोधी स्वभाव वाले मनुष्य को चाहिए कि वह क्रोध को त्याग कर नम्रता का व्यवहार करे। उसे काम, क्रोध और लोभ को छोड़कर सात्विक रहने का संकल्प लेना चाहिए। तभी वह अपने व्यक्तित्व को नए आयाम प्रदान कर सकता है। अन्यथा क्रोध की अग्नि उसे सदैव झुलसाती रहेगी।

278. जीवन और इच्छाएं

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य अपने जीवन में अनेक चरित्र एक साथ निभाता हुआ अपने पथ पर अग्रसर होता है। घर में वह पारिवारिक संबंधों से जुड़ा होता है। घर के बाहर सामाजिक संबंध उसके सामने खड़े हो जाते हैं। इन संबंधों से जन्म लेती इच्छाएं उसकी मानसिक शांति को छिन्न -भिन्न करने का कार्य करती हैं, क्योंकि मनुष्य का मन बड़ा चंचल है। यह चंचल मन ही अशांति का मूल कारण है।

मनुष्य की इच्छाएं और आकांक्षाएं इस चंचल मन की ही देन हैं, जो उसे दिन-रात व्यस्त रखती हैं। कभी शांत नहीं होने वाली इच्छाओं और आकांक्षाओं के पीछे हम अंधे होकर भागते रहते हैं। मनुष्य के जीवन का एक बड़ा भाग इनकी पूर्ति में ही व्यय हो जाता है। एक इच्छा पूरी होते ही हम दूसरी इच्छा अपने मन में पाल लेते हैं। हमें लगता है कि यही हमारा जीवन है।

सम्बन्धों का मोह मनुष्य को भ्रम के संसार में ले जाता है। वह अपने परिवार के दूसरे सदस्यों की इच्छाओं की पूर्ति के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है। वह उनकी इच्छाओं की पूर्ति करते-करते पाप का भागी भी बन जाता है, क्योंकि मनुष्य की भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छाएं बलवती होती जा रही हैं। इसलिए उसके जीवन में मोह माया की तृष्णा निरंतर बढ़ रही है। जल्दी पाने की अधीरता शांति के मार्ग में बाधक बन रही है और व्यग्रता मनुष्य को तनावशील बना रही है।

मोह-माया जीवन के क्षणिक आनंद हैं। ये सब कुछ जानते- समझते हुए भी वह अपने सम्बन्धों के पोषण के लिए गलत कार्य करते हुए भी नहीं हिचकता। मोह और माया से ग्रस्त मानव का पागलपन दूसरों के लिए सदैव कष्टकारी साबित होता है, किंतु समाज में अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मनुष्य की इस प्रवृत्ति को गृहस्थ, सामाजिक और जिम्मेदारी जैसे भारी शब्दों से महिमामंडित तो कर दिया, परंतु उसके स्व तत्व की उपेक्षा की कभी चिंता नहीं की।

इच्छा पूर्ति के लिए मोह- माया में फंसे हुए मनुष्य का जीवन नीरस हो जाता है। उन भौतिक वस्तुओं का सुख तो अन्य लोग भोगते हैं, लेकिन उनको प्राप्त करने के लिए जो अनजाने में पाप कर बैठा, उनका दंड उसे अकेले ही भोगना पड़ता है। संसाधनों की बढ़ोतरी जीवन में सुख का क्षणिक आनंद दे सकती हैं, लेकिन इनसे चिरस्थायी सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता।

इच्छाओं की प्रकृति यदि बुरी हो तो वह हमें पाप की राह पर धकेल देती है। बुरी इच्छाओं का वेग मानवीय गुणों को नष्ट कर देता है, जिससे मानव अपने सद्गुणों को भूलकर दुर्गुणों यथा दंभ और मद्यपान का शिकार हो जाता है। मोह- माया में केवल हासिल करने की ललक रहती है। स्वयं के स्वार्थ के आगे सब कुछ गौण होने लगता है, जिससे वह कर्तव्य पथ से भटक जाता है। वह इच्छाओं की पूर्ति में इतना उलझ जाता है कि उसे अपने तन के भीतर का स्व: दिखाई ही नहीं देता।

इच्छाओं के स्वच्छंद आकाश का कोई अंत नहीं है। इच्छाएं ही तृष्णा बढ़ाती हैं। तृष्णाओं के कारण ही मनुष्य स्वार्थ की संकीर्णता से ग्रस्त हो जाता है।
मानव के लिए चंचल मन में उठ रहे इच्छाओं के वेग को रोकना कठिन है, लेकिन अपने मन को एकाग्र करके उन्हें सीमित तो किया जा सकता है। इच्छाएं यदि नेक हों, समाज व राष्ट्र हित में हो तो वे एक अद्भुत शक्ति का कार्य करती हैं और यदि वे ईर्ष्या, बुराई एवम् घृणा जैसे कलुषित भावों में पली-बढ़ी हों, तो समाज, राष्ट्र के साथ ही स्व विनाशकारी साबित होती हैं।

इच्छाओं को सीमित करने में ही जीवन का सुख छुपा है। जब हमें भौतिक वस्तुओं से लगाव नहीं रहेगा तो हमारे जीवन में उनको पाने की लालसा भी खत्म हो जाएगी, जिससे हमारे जीवन में तृप्ति का भाव उत्पन्न हो जाएगा, जो हमें चिरस्थाई शांति प्रदान करेगा। तृप्ति के कारण ही हम अपने चंचल मन को शांत करके अपनी उर्जा को सद्कर्मों में लगा सकते हैं।

आज के दौर में इच्छाएं इतनी बलवती हो गई है कि वे हिंसा और दुराचारों का मुख्य कारण बनती जा रही हैं। इसलिए मनुष्य को अपनी बेलगाम होती इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण रखना होगा। समस्या का समूल समाधान परमात्मा के ध्यान में ही निहित है। इससे मन विचलित नहीं होता। गलत विचारों, इच्छाओं को नष्ट कर मन में शुद्धता आती है, तो निश्चित ही मन की शांति के साथ-साथ मानसिक सुख की अनुभूति होती है।

मन में तभी शुद्धता आएगी जब हम अपने अंदर पनपती हुई इच्छाओं को नष्ट कर दें। शांति की स्थापना के लिए शून्यता का सिद्धांत जरूरी है, अर्थात् हमारा मन खाली होगा, तभी उसमें कुछ समा सकता है। हमें अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए चित्त में परिवर्तन लाना पड़ेगा। आध्यात्मिक मार्ग में ऐसा होता है, जब आप ध्यान करते हैं, तो आप मन के प्रभाव से परे हो जाते हैं और स्वंय में चले जाते हैं। जिससे हमारे चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आने लगते हैं। प्रसन्नता से हमारी चेतना जाग्रत होती है।

जब मन सभी संस्कारों और अवधारणाओं से मुक्त होता है, तो आप इन सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। जब आपको ज्ञात होता है कि सब कुछ बदल रहा है— सभी संबंध, व्यक्ति, शरीर, भावनाएं, अचानक मन जो दुख से चिपका है, आपके पास वापिस आता है। जिससे आपके स्व का पता चलता है। आपके स्वयं से स्वयं तक की वापसी आपको दुख से मुक्ति देकर संतोष प्रदान करती है।

यह ठीक उसी प्रकार होता है कि— जब कमरा बहुत गर्म हो जाता है, तो आप शरीर को कुछ आराम देने के लिए वातानुकूल का प्रयोग करते हैं। मन के लिए ए. सी. ध्यान है। अपने मन को पूर्ण विश्राम देने के लिए जब आप ध्यान करते हैं, तो आप मन के प्रभाव से परे हो जाते हैं और स्वयं में चले जाते हैं। जब आप स्वंय में जाते हैं तो आपको स्व का बोध होता है। जिससे आपकी इच्छाओं पर लगाम लग जाती है।

ध्यान ही हमारे कष्टों को कम कर हमारे जीवन की राह को सुगम कर सकता है। अतः इच्छाओं रूपी व्यर्थ की भावनाओं के पीछे दौड़ने की बजाय हमारा ध्यान ईश्वर पर केंद्रित होना चाहिए। यह जगत् तो चार दिनों की चांदनी और भ्रम का मायाजाल है। जिसे एक न एक दिन खत्म हो जाना है। लेकिन ईश्वर अविनाशी, अजर और अमर है। उसका सान्निध्य ही अतृप्त इच्छाओं से पीड़ित मनुष्य को सही राह दिखा कर इस धरा पर उसके जीवन को सार्थक करता है।

277. बढ़ाऐं कदम, कामयाबी की ओर

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हम जीवन में तभी कामयाब हो सकते हैं, जब हम किसी भी कार्य को पूरी निष्ठा के साथ करते हैं। लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परिश्रम और पुरुषार्थ करते हैं। लेकिन हम तो प्रत्येक कार्य को आसानी से करने की चेष्टा करते हैं। हम यह भली- भांति जानते हैं की सफलता तो तभी प्राप्त होगी जब हम पूर्ण रूप से समर्पित होकर उस कार्य पर फोकस करके करेंगे। सब कुछ जानते हुए भी हम आलस्य के कारण उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते।

अक्सर ऐसा होता है कि हम किसी भी कार्य को आधे अधूरे मन से करते हैं, जिससे उसमें कामयाबी मिलना स्वाभाविक रूप से संदिग्ध होता है। अगर देखा जाए तो सही तरीका तो यही है कि हम अपना प्रत्येक कार्य इस प्रकार से करें जैसे यह हमारे जीवन का अंतिम कार्य है, तभी हम उस पर अपना हंड्रेड परसेंट दे पाएंगे और जब हम किसी भी कार्य में अपना हंड्रेड परसेंट देते हैं तो उस कार्य में सफलता अवश्य प्राप्त होती है।

12वीं के बाद युवा अक्सर ऐसी गलती करते रहते हैं। उनको यह समझ नहीं आता कि उन्हें किस क्षेत्र में कार्य करना चाहिए। ऐसे में उन्हें कोई भी रास्ता चुनने से पहले अपनी पसंद और नापसंद पर फोकस करना होगा। अपनी पसंद को जान लेने के बाद ही आगे के रास्ते तय करें। उस क्षेत्र में जाने के बाद कौन से विकल्प उपलब्ध हैं और आप अपनी स्थिति के अनुसार कौन- सा विकल्प चुन सकते हैं।

अगर आपको उस क्षेत्र में कामयाबी नजर आ रही है और आपको अपने सपने साकार होते नजर आ रहे हैं तो आगे बढ़िए और पूरे उत्साह के साथ इन्जवाय करते हुए अपने सपनों को मूर्त रूप दीजिए। आपके रोम-रोम से आवाज आए तभी आप उस सपने को पूरा करने के लिए किसी भी तरह की मेहनत करने को तैयार हो पाएंगे।

जब आप सही दिशा में और पूरी तन्मयता के साथ भरपूर मेहनत करेंगे तो, निश्चित रूप से कामयाबी के शिखर पर पहुंचेंगे। जितने सफल मनुष्य हुए हैं उन सभी ने अपने हुनर की पहचान समय रहते कर ली थी और उसका परिणाम भी सामने है।

सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि हम अपनी प्रतिभा की पहचान करें और अपनी रूचि के क्षेत्र को भविष्य का आधार बनाने के कार्य में सलंग्न हो जाएं। यदि हम उस दिशा में परिश्रम करेंगे, जिस क्षेत्र के हम लायक हैं, तो हमारी दिशा में परिवर्तन होते समय नहीं लगेगा। अन्यथा अंधेरे में हम कितने ही तीर मार लें, हमारे हाथ खाली ही रहने वाले हैं।

276. सुनें, आवाज मन की

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

वैसे देखा जाए तो मनुष्य को किसी भी कार्य के बारे में सोचने से पहले एक बार अपने अंतर्मन की आवाज को अवश्य सुनना चाहिए क्योंकि उसका अंतर्मन यह अच्छी तरह जानता है कि उसके लिए क्या ठीक रहेगा और क्या गलत। खासकर युवा जब अपने कैरियर की शुरुआत करते हैं तो दूसरों के कहने पर अलग-अलग फील्ड का चुनाव कर लेते हैं। वे ऐसे फील्ड में अपने भविष्य को तलाशना शुरू करते हैं, जिसमें उनकी कोई रुचि नहीं होती। वे अपनी मेहनत से कामयाब तो हो जाते हैं लेकिन उनको खुशी नहीं मिलती। कुछ युवा दो हिम्मत करके अपने फील्ड को बदल लेते हैं लेकिन कुछ पूरी लाइफ उसी फिल्ड में गुजार देते हैं।

इसलिए कैरियर के बारे में सोचने से पहले अपने मन पर फोकस कीजिए। क्योंकि किसी भी युवा के अन्तर्मन की आवाज उसका कैरियर और भविष्य का निर्धारण करेंगी। इसलिए युवा हो या बड़ा हो, सब को जीवन में कार्य और भविष्य का निर्धारण करने से पूर्व अपना आत्मनिरिक्षण करना चाहिए। क्योंकि जितना हम स्वयं को जानते हैं, उतना इस संसार में अन्य कोई हमें नहीं जानता।

कई बार देखने को मिलता है कि— किसी क्षेत्र में गहरी रूचि होती है, अगर उसके प्रति आपके भीतर जुनून भरा है, तो उससे जुड़े क्षेत्र में अपने को आगे बढ़ाने का उपक्रम करें। अगर ऐसा नहीं है और आप अपने लिए उपयुक्त क्षेत्र चुनने में दुविधा महसूस कर रहे हैं, तो आज के दौर में तो आपके पास हजारों विकल्प हैं, जिनके जरिए आप अपनी प्रतिभा को परख सकते हैं।

आजकल ऑनलाइन, ईमेल, फोन, फेसबुक आदि किसी भी जरिए किसी अनुभवी काउंसलर से संपर्क करके अपने लिए उपयुक्त रास्ते का समाधान कर सकते हैं। अगर किसी कारणवश इनमें से कोई विकल्प उपलब्ध नहीं भी करना चाहते तो भी कोई बात नहीं, आप खुद से अपनी पसंद को समझ सकते हैं। इसके लिए आपको शांत होकर अपनी आदत, व्यवहार, पसंद-नापसंद, अपनी दिनचर्या आदि पर गौर करना शुरू कर दें। ऐसा कुछ दिनों तक करने के पश्चात आप किसी परिणाम पर पहुंच सकते हैं।

इसके लिए आप जरूरी समझें तो अपने परिवार की, यार- दोस्तों की राय भी ले सकते हैं। लेकिन कोई भी राय लेने से पहले खूब अच्छी तरह से सोच- विचार कर लें। दूसरों के द्वारा बनाई गई परिपाटी पर न चलें। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हम दूसरों से प्रभावित बहुत जल्दी हो जाते हैं। यदि अन्य किसी क्षेत्र में सफल व्यक्ति को देखते हैं, तो उसकी भौतिक सम्पन्नता, वैभव, सुख इत्यादि हमें उस क्षेत्र के प्रति आकर्षित करते हैं और हम उस क्षेत्र में अपना भविष्य तलाशने निकल पड़ते हैं।

उस क्षण स्वयं से प्रश्न करना भी उचित नहीं समझते कि वह क्षेत्र हमारे लिए अनुकूल भी है या नहीं। यह भी संभव है कि हम उस क्षेत्र से भी ज्यादा बेहतर किसी और क्षेत्र में कर सकते हों, लेकिन यह तो तभी संभव होगा जब हम दूसरों से आकर्षित होने के बजाय अपने व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करेंगें। अपनी छिपी हुई प्रतिभा को परखने के साथ-साथ उस पर और परिश्रम करके उसमें निखार लाएंगे। अपने भीतर की प्रतिभाओं को बाहर लाकर ही उस दिशा में आगे बढ़ना सार्थक होगा।

275. परखें अपनी प्रतिभा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, जो इसे पहचान लेता है, वह खुद को उसी मार्ग पर ले जाने का भरपूर प्रयत्न करता है। पर हमारे में से बहुत सारे लोग अपनी पसंद, अपने भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान ही नहीं पाते। जिसका परिणाम यह होता है कि वे दूसरों को देखकर उसका असफल अनुसरण करने की कोशिश करते हैं।

फिर उनकी स्थिति उस धोबी के कुत्ते जैसी हो जाती है कि— धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।

यह कहावत हमारे समाज में बहुत प्रचलित है। क्योंकि जीवन में जो कुछ प्रतिभा उनके अंदर छुपी हुई है, वह तो समझ नहीं पाते और दूसरों की नकल करने लग जाते हैं, अर्थात् वह कार्य करने लगते हैं, जिसके बारे में उन्हें ज्ञान ही नहीं होता। अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए और किसी भी प्रकार की कुढ़न से बचने के लिए जरूरी है, समय रहते अपने अंदर छिपी प्रतिभा को पहचानना। अपने टैलेंट को जानना, समझना और उसे निखारना उतना ही जरूरी है, जितना भूख से मर रहे किसी व्यक्ति को खाना खिलाना। तभी हम समाज में अपने आप को स्थापित कर पाएंगे।

यह सच है कि परमात्मा ने हमारे अंदर कुछ विशिष्टताएं प्रदान की हैं। जिनकी शक्ति से हम अपनी जीवन यात्रा को सुचारू रूप से चला सकें।

संसार में दो तरह के लोग पाए जाते हैं —
एक तो वे होते हैं, जिन्हें अपनी प्रतिभा के विषय में ज्ञात है
दूसरे वे जो उससे अनभिज्ञ रहते हैं कि वे किस प्रयोजन के लिए बने हैं।

पहले वर्ग वालों की स्थिति दूसरे वर्ग वालों से बेहतर होती है, क्योंकि मेहनत तो सभी करते हैं। किंतु जिन्हें अपनी प्रतिभा के विषय में ज्ञात होता है, उनकी मेहनत उस दिशा में होती है, जो उन्हें निश्चित मार्ग की ओर अग्रसर करती है। ऐसे लोग जिन्हें यह ज्ञात ही नहीं कि उनमें किस कार्य को करने का हुनर है, उन्हें किस क्षेत्र में जाना चाहिए, ऐसे लोग अपना समय एवम् श्रम व्यर्थ करने में लगे रहते हैं।

अक्सर देखने को मिलता है कि युवा बारहवीं के बाद बड़ी असमंजस की स्थिति में रहते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि वे कौन-सा क्षेत्र चुनें। दोस्तों के चक्कर में कुछ युवा तो अपने नापसंद विषयों को ही चुनकर कैरियर बनाने की सोचने लगते हैं। कुशाग्र होने के कारण पढ़ाई और परीक्षा में उनका प्रदर्शन तो ठीक रहता है, पर उन विषयों में बहुत मन नहीं लगने के कारण वे उनका बहुत आनंद नहीं उठा पाते। लेकिन अब उनके सामने उसी क्षेत्र में जाने के सिवाय कोई रास्ता भी नजर नहीं आता। वे सिर्फ मन मसोसकर ही रहने लगते हैं। ऐसे में अधिकतर युवा तो भटक जाते हैं और कुछ अपना नसीब समझकर उसी क्षेत्र में कैरियर बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं।

विभिन्न कंपनियों में ऐसे तमाम लोग मिल जाएंगे, जो अपने काम से संतुष्ट नहीं होते। आमतौर पर ऐसा इसलिए ही होता है, क्योंकि इन्होंने जिस कैरियर को अपनाया, वह संभवतः उनकी रूचि का नहीं था। लेकिन नौकरी करने के लिए किसी क्षेत्र को तो चुनना ही था, इसलिए उन्होंने उस समय तो उत्साह के साथ उसे स्वीकार कर लिया, लेकिन वक्त बीतने के साथ वे उससे बोरियत महसूस करने लगते हैं, और अपनी पूरी जिंदगी तनाव और परेशानी में गुजार देते हैं। अगर शुरुआत में ही युवा इस बात को महसूस कर लेते और अपनी रूचि पर अच्छी तरह विचार कर लेते तो शायद उनको ये नौबत न आती।

दरअसल बीते समय में अधिकतर युवाओं को पहले जो नौकरी मिल जाती थी, वे उसी में खुश रहते थे, चाहे उनकी पसंद की हो या ना हो। उस समय अपनी पसंद से ज्यादा नौकरी मिलने का उत्साह होता था। कुछ लोग तो भाग्य पर भरोसा करके, उस नौकरी में रुचि लेकर और उस क्षेत्र में खुद को निखार कर तरक्की की राह तैयार कर लेते, पर कई युवा ऐसा नहीं कर पाते। कुछ वर्ष बीतने पर वे उस क्षेत्र से उबने लगते हैं।

काम में रुचि न होने के कारण वे अपनी जिम्मेदारियां अच्छी तरह नहीं निभा पाते, जिससे उनकी छवि खराब हो जाती है। ऐसे में तरक्की पाना एक सपने की तरह लगने लगता है। उम्र भी बढ़ जाती है और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं, जिसके कारण वे अपने कार्य में यू-टर्न लेने की सोच ही नहीं सकते। क्योंकि ऐसा करने का उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है। ऐसी स्थिति होने पर भी कुढ़न, हताशा और कुंठा को खुद पर हावी होने देने की बजाय अपने काम में नए सिरे से रूचि पैदा करने का प्रयास करना चाहिए।

अगर आप मन से ऐसा करोगे तो कुछ ही समय में इसका परिणाम आपके सामने होगा। कुछ ही दिनों में आपके अंदर ऊर्जा का संचार होगा और आप अपने आपको तरोताजा महसूस करने लग जाओगे। आपका कार्य अच्छा होने के कारण आपकी छवि में भी सुधार आएगा।

274. दोहरा व्यक्तित्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य के अंतःकरण में और बाहरी व्यवहार में जब विचारों का सामंजस्य स्थापित होने में अवरोध उत्पन्न होता है, तो यह दोहरे व्यक्तित्व की स्थिति होती है। मनुष्य समाज में अपने आप को दूसरों से सर्वश्रेष्ठ दिखाने के लिए दोहरे व्यक्तित्व का सहारा लेता है।

जिंदगी की रेस में पहले पायदान पर खड़ा होने के लिए वह अनेक नैतिक और अनैतिक कार्य करता है। समकालीन दौर में भौतिकता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ा है, लेकिन जीवन में कुछ दबाव तो आदिकाल से ही रहते आए हैं और आगे भी बने रहेंगे। इन दबावों को रचनात्मक रूप से झेलने की प्रवृत्ति के कारण मानव का पृथ्वी पर अस्तित्व बना हुआ है। कुछ दबाव तो जीवन को मधुर और सार्थक बनाते हैं, जिनके कारण परिश्रम करने का अभ्यास बना रहता है। जीवन के दैनिक कार्यों में दबाव और तनाव को सर्वथा समाप्त नहीं किया जा सकता, वरना जीवन नीरस बन जाएगा और उसकी जीवन्तता एवं रचनात्मकता जाती रहेगी।

दोहरे व्यक्तित्व की समस्या में इंद्रिय सुख समस्या का मूल कारण है। इसके वशीभूत प्रत्येक मनुष्य इंद्रिय सुख के सभी साधनों को उचित या अनुचित तरीके से एकत्रित करना चाहता है। इस आपाधापी में कभी-कभी वह संस्कारों के विरुद्ध आचरण कर देता है, जिसे उसके अंतःकरण में विद्यमान मन स्वीकार नहीं करता। हमारे मन में कई प्रकार की प्रेरणाएं, आवश्यकताएं, प्रयोजन, लक्ष्य और अभिप्रेरणाएं पाई जाती हैं। जब वे समुचित रूप से तृप्त नहीं हो पाती, तब मन में एक प्रकार का खिंचाव, कुंठा और संघर्ष उत्पन्न होता है।

ये कुण्ठाएं और बाधाएं सामाजिक परिस्थितियों से उत्पन्न होती हैं अथवा दूसरे लोगों के द्वारा खड़ी की जाती हैं। ये बाधाएं हमारे सामाजीकरण में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन्हीं के कारण हमारे अंदर अहम् का भाव उत्पन्न होता है। अहम् के वशीभूत होकर हमारे मन में भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने की लालसा और तीव्र हो जाती है। इसलिए हम हर प्रकार से धन- संग्रह करने के नए-नए तरीके ढूंढते हैं।

अधिक धन की प्राप्ति के लिए दूसरों का शोषण, अन्याय, असत्य व्यवहार, चोरी आदि अनैतिक कार्यों का सहारा लेना ही पड़ता है। इतना सब कुछ करने के बावजूद भी यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी हो जाएं। इसलिए जब कोई व्यक्ति सफलता के मार्ग में आने वाली बाधा को दूर करने में हार जाता है या किसी विरोध के प्रबल आघात से पीड़ित हो जाता है, तो स्वाभाविक है कि मन में निराशा या क्रिया शून्यता छा जाती है जो कि आगे भी असफलता का हेतु बनती है और असफलता तथा निराशा का यह कुचक्र चलता रहता है।

इसी कारण व्यक्ति के अंतःकरण में द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और वह अपराध बोध से ग्रस्त होकर मानसिक अवसाद की स्थिति में पहुंच जाता है, जिसके कारण कभी-कभी व्यक्ति आत्महत्या जैसा महापाप भी कर बैठता है। आजकल ऐसा अक्सर देखने में भी आता है। इसलिए इस समस्या से निपटने के लिए इंद्रियों को विषयों से हटाकर चित्त के अनुकूल करना बेहद आवश्यक है, जैसे तीसरे प्रहर में सूर्य अपनी प्रभा को सिमेटने लगता है, वैसे ही हमें इंद्रियों के स्वामी मन पर नियंत्रण करना चाहिए। कछुए के समान अपनी इन्द्रियों को संकुचित कर उन्हें आत्मोन्मुख करने का प्रयत्न करना चाहिए।

जिस प्रकार गोपालक वन में विचरण करती हुई गायों को लेकर सायंकाल वापिस गांव की ओर लौटता है, उसी भांति विषय रूपी वनों में संलिप्त इंद्रियों को वहां से हटाकर उन्हें नियंत्रण में रखना चाहिए। जैसे मधुमक्खियां रानी मक्खी के बैठने पर बैठती हैं और उसके उड़ने पर उड़ने लगती हैं। वैसे ही इन्द्रियां चित्त के अधीन होकर कार्य करती हैं। चित जब यम- नियम, आसन, प्राणायाम के अभ्यास से बाहर के विषयों से विरक्त होकर समाहित होने लगता है, तब उसका अनुकरण करती हुई इंद्रियां भी अपने व्यापार को रोक देती हैं।

चित्त की एकाग्रता के कारण इंद्रियों को अपने विषयों में प्रवृत्ति न होना ही इंद्रिय जय है। इंद्रियों एवं उनके स्वामी मन को विषयों को हटाने के लिए उन्हें अन्तर्मुख होने का कोई कार्य दिया जाए। जैसे— रोते हुए बालक को उसकी माता खिलौना देकर अथवा बातों में लगाकर उसका ध्यान परिवर्तित कर देती है, जिससे बालक रोना बंद कर दूसरी और लग जाता है, ठीक वैसे ही चित्तवृत्तियों को एक कार्य में संलग्न कर उन्हें एक स्थान पर एकाग्र करने का प्रयत्न किया जाता है।

इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए महर्षि पतंजलि द्वारा दिया गया यम- नियम का सिद्धांत सर्वोत्तम माना गया है।
यम— ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, अस्तेय एवम् अपरिग्रह।
नियम— सोच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवम् ईश्वर प्राणी धन है।
इसमें अस्तेय से तात्पर्य है—चोरी न करना एवम् अपरिग्रह से तात्पर्य है— जरूरत से ज्यादा संग्रह न करना।
अहिंसा में भावनात्मक एवं शारीरिक हिंसा दोनों आती हैं। इसी प्रकार सोच से अभिप्राय मन की सोच से है। अक्सर व्यक्ति मन की सोच न करने के कारण पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर अपने व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसलिए मनुष्य को पतंजलि के उपरोक्त सिद्धांतों को अपनाकर इंद्रियों के स्वामी मन पर विजय प्राप्त करके दोहरे व्यक्तित्व की समस्या पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

इस प्रकार वह दोहरे व्यक्तित्व से मुक्ति पाकर समाज में अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रखते हुए, सबके साथ समता का व्यवहार करता हुआ, हर समय परमानंद की अनुभूति प्राप्त कर, अपनी जीवन यात्रा पूरी करेगा।

273. क्रोध

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

“कामात् जायते क्रोध:” जब अपने मनोवांछित कार्य पूर्ति की इच्छाओं में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो उस समय क्रोध उत्पन्न होता है।
जिसके मूल में लोभ होता है। कामादि विकारों को तो छिपाया जा सकता है, परंतु क्रोध को छिपाना सम्भव नहीं है।

क्रोधाविष्ट व्यक्ति अंधा और बहरा बन जाता है। क्रोध मानव के लिए हानिकारक है। मानव जीवन में तमाम अवगुणों की चर्चा होती है, जिनमें क्रोध एक बड़ा दुर्गुण है। क्रोध में मनुष्य का विवेक, बुद्धि कुंठित हो जाते हैं। वाणी पर संयम नहीं रहता, आंखों में लालिमा छा जाती है। कई बार मनुष्य इतने भयंकर क्रोध से भर जाता है कि वह दूसरे व्यक्ति की हत्या, आत्महत्या और अनेक जघन्य कर्मों का कारण बनता है।

यदि किसी कारण क्रोध तत्काल प्रकट न हो सके तो वह ईर्ष्या और बदले की भावना में परिणत होकर और भी भयंकर रूप में प्रकट होता है। क्रोध एक दुधारी तलवार है जो अपना और दूसरों का एक साथ नुकसान करती है। क्रोध की अवस्था में शरीर से अनेक विषैले रसायन स्रावित होते हैं। ऐसे समय में मां अपने छोटे बच्चे को स्तनपान करवाती है, तो उसके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

अक्सर कहा जाता है कि क्रोध की स्थिति में कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, न ही कोई बड़ा निर्णय लेना चाहिए। क्योंकि वह निश्चित रूप से गलत ही होगा। हमारे ग्रंथ भी क्रोध के अतिरेक से बचने की सलाह देते हैं। वास्तव में क्रोध मनुष्य के मन को कलुषित कर देता है।

एक बार की बात है— एक महात्मा भिक्षा मांगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगाई, “भिक्षां देही”।
घर के अन्दर से एक महिला बाहर आई, उसने उनकी झोली में भिक्षा डाली और कहा— महात्मा जी! कोई उपदेश भी देते हो या महात्मा होने का आडम्बर करते हो।
महात्मा जी बोले —आज नहीं कल दूंगा।
यह सुनकर वह महिला बिफर गई और महात्मा जी को अनाप-सनाप कहने लगी।
ऐसी अपमानजनक बातों को सुनकर वह महात्मा अपने गुरु जी के पास गया और उसने सारा वृत्तांत कह सुनाया। क्योंकि महात्मा जी पर भी क्रोध हावी होने लगा था।
उसके इस व्यवहार को गुरुजी भांप गये थे। उसने अपने शिष्य को समझाया कि तुम कल भी उसी घर से भिक्षा लेकर आना और तब तक लेकर आते रहना, जब तक वह महिला तुम्हें खुद बुलाकर भिक्षा के लिए आग्रह न करे। यही तुम्हारी परीक्षा होगी।

न चाहते हुए भी वह महात्मा उस घर से भिक्षा लेने के लिए जाने लगा। वह महिला कभी तो क्रोध के आवेश में भिक्षा डाल देती और कभी उसे खाली हाथ ही लौटना पड़ता। कुछ दिनों के बाद महिला का क्रोध शांत हो गया और सोचने पर विवश हो गई, कि मैं इस महात्मा का इतना अपमान करती हूं, कभी तो भिक्षा भी नहीं डालती, फिर भी यह महात्मा प्रतिदिन मेरे द्वार पर आ जाता है, इसका कोई न कोई कारण तो होगा। वह यह सोचते- सोचते सो गई।

अगले दिन सुबह वह महात्मा जी का इंतजार करने लगी। इस सारी घटना पर गुरुजी दृष्टि लगाए हुए थे। उन्हें प्रत्येक दिन की खबर पता थी। गुरु जी समझ गए थे कि— अब महिला का हृदय परिवर्तन हो रहा है। अब वह क्रोध रूपी राक्षस से बाहर निकल रही है। इसलिए उसने अपने शिष्य से कहा कि कुछ दिनों के लिए तुम उस महिला के घर भिक्षा मांगने मत जाना।

शिष्य को बड़ी हैरानी हुई, लेकिन वह गुरुजी के सामने कुछ बोल नहीं सका। इधर महिला भी बड़ी बेचैन थी, क्योंकि कई दिनों से वह महात्मा भिक्षा के लिए नहीं आया था। उसे अपने व्यवहार पर पछतावा हो रहा था। वह उस महात्मा को मिलने के लिए आतुर थी। क्योंकि अपने व्यवहार से वह बहुत शर्मिंदा थी और महात्मा के चरण पकड़ कर माफी मांगना चाहती थी।

कई दिनों के बाद गुरु जी ने अपने शिष्य को बुलाया और कहा— अब तुम उस महिला के घर भिक्षा लेने के लिए जा सकते हो और उसे उपदेश भी दे सकते हो।
अब शिष्य भी गुरुजी की बात समझ गया था और उसके मन में जो थोड़े- बहुत द्वेष के भाव थे वे भी खत्म हो चुके थे। सुबह उठकर महात्मा जी ने उसी घर के सामने जाकर आवाज लगाई— भिक्षाम् देही, वह महिला दौड़ती हुई बाहर आई और महात्मा जी का कुशलक्षेम पूछा। उस दिन उसने खीर बनाई थी, जिसमें बादाम- पिस्ते भी डाले हुए थे। वह खीर का कटोरा लेकर आगे बढ़ी, तो महात्मा जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया।

वह महिला जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गये।
वह बोली—महाराज! यह कमंडल तो गंदा है। महात्मा जी बोले— हां, गंदा तो है, किंतु खीर इसी में डाल दो।
वह महिला बोली— नहीं महाराज! तब तो खीर खराब हो जाएगी। यह कमंडल दीजिए, मैं इसे शुद्ध करके लाती है।
महात्मा जी बोले— इसका मतलब जब यह कमंडल साफ हो जाएगा, तभी खीर डालोगी न?
महिला ने कहा— जी महाराज!
तब महात्मा जी ने कहा— मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक क्रोधग्नि प्रज्वलित है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ नहीं होगा। यदि उपदेशमृत पान करना है, तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए। इसलिए किसी भी व्यक्ति के स्वभाव में यदि क्रोध हावी हो जाए तो वह अलोकप्रिय हो जाता है। उसके सोचने -समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है। इससे मन अशांत रहने लगता है।

अशांत मन से व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता। कई बार आपने देखा होगा या अनुभव किया होगा कि— विनम्र या धैर्यशाली व्यक्ति कम योग्यता के बावजूद भी सफलता के शिखर चूमता है। वह समाज में सर्वोपरि स्थान रखता हुआ लोकप्रियता के कीर्तिमान स्थापित करता है। दूसरी तरफ क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति अधिक योग्यता होने के बावजूद भी सफल नहीं हो पाता। जब यह क्रोध बढ़कर विकृत भाव को प्राप्त होता है, तब इसके कारण नाना प्रकार के रोगों की उत्पत्ति होती है।

क्रोध का आवेग ज्ञान के ऊपर पर्दा डालकर मन, बुद्धि को भी आच्छादित कर देता है। युवावस्था के प्रारंभ में बढ़ा हुआ क्रोध अनैतिक कार्यों में प्रवृत्त करता है। जिससे उसका पूरा जीवन खराब हो जाता है। जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और भी अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे ही युवावस्था में छोटी- सी बात भी क्रोध को और ज्यादा प्रज्वलित कर देती है। ऐसे में क्रोध के वशीभूत होकर मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने लगता है। ऐसा करने से उसकी स्मृति में भ्रांतियां पैदा होने लगती हैं। अंततः उसकी बुद्धि का नाश हो जाता है। जिस व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो गई हो, वह स्वयं एवं दूसरे का अहित करने में पीछे नहीं हटता। वह स्वत: अपने विनाश के लिए मार्ग तैयार करता है।

गौतम बुद्ध ने कहा है—”क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नियत से पकड़े रखने के समान है। इससे आप ही जलते हैं”। इससे स्पष्ट हो जाता है कि— क्रोध के वशीभूत हुआ व्यक्ति जितना सामने वाले का अहित नहीं करता, उससे कई गुना स्वयं का अहित कर लेता है। क्रोध का जन्म इंद्रियों के वश में न होने से ही होता है। हमें स्वयं पर नियंत्रण रखने की क्षमता का विकास करना चाहिए। क्रोध जब हावी होने लगे तो हमें स्वयं को एकांत प्रदान करना चाहिए। एकांत हमारे क्रोध को अपने वश में रखने की सामर्थ्य रखता है। जिस कारण से क्रोध उत्पन्न हो रहा हो उससे दूरी बनाकर रखें। जब क्रोध आने लगे तो स्वयं को संयमित करने का प्रयास करना चाहिए।

भगवत गीता ने कहा है—
” क्रोधाद् भवति संमोह:”

क्रोधाविष्ठ व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। इसके मूल में अज्ञान रहता है। न्यायदर्शन में मोह को सब पापों की जड़ कहा है। उस अवस्था में ममता अर्थात् मेरेपन का भाव बढ़ जाने से बुद्धि उचित- अनुचित का निर्णय करने में असमर्थ हो जाती है। क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है। सम्मोह से स्मरणशक्ति का भ्रशं और स्मरणशक्ति के भ्रशं से बुद्धि का नाश हो जाने के कारण व्यक्ति सर्वनाश के गर्त में धंसता चला जाता है।

272. स्वयं से संघर्ष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हम अपने जीवन में अक्सर छोटी-छोटी बातों या घटनाओं को प्रतिष्ठा का विषय बना लेते हैं और एक दूसरे के साथ लड़ते- झगड़ते रहते हैं। इस प्रकार बेवजह की लड़ाई कई बार बड़ा रूप ले लेती है। छोटी-छोटी बातें अक्सर विनाश का कारण बन जाती हैं। दूसरों से लड़ाई करने में समय की बर्बादी के साथ-साथ अपना भी शारीरिक और मानसिक नुकसान अवश्य होता है। क्योंकि इससे अक्सर देखने में आता है कि हम तनाव का शिकार हो जाते हैं जिससे हम अस्वस्थ रहने लगते हैं।

जिसका असर हमारे कामकाज, घर- परिवार पर भी पड़ता है और हम निराशावादी हो जाते हैं। इससे कोई लाभ नहीं है, बल्कि हर प्रकार से हानि ही होती है। इसके विपरीत यदि आप खुद से लड़ाई लड़े, तो न केवल आपका व्यक्तित्व निखर उठेगा, बल्कि आपके अंदर आत्मविश्वास, धैर्य, सफलता और संघर्ष इंद्रधनुष के रंगों की भांति रंगीन हो जाएंगे।

आत्मविश्वास में आत्मा शब्द है और आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से होता है। अगर आत्मविश्वास बढ़ाना है, तो परमात्मा की शक्ति की आवश्यकता अवश्य होगी। परमात्मा से जुड़ने के कई तरीके हैं— कर्मकांड, ज्ञानयोग, भक्तियोग। आपको जो ठीक लगे, उस रास्ते से उस परमशक्ति तक पहुंचिए।

आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए— गुरु की कृपा और माता- पिता के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। आजकल मनुष्य में आत्मविश्वास की कमी नजर आती है। आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए नए- नए तरीके ईजाद करते रहते हैं। कुछ तो टेक्नोलॉजी से आत्मविश्वास प्राप्त करने के लिए उतावले रहते हैं, लेकिन हमेशा याद रखिए, टेक्नोलॉजी आपकी किसी कार्य विशेष में सहायता कर सकती है, लेकिन आपका सहारा नहीं बन सकती। सहारा तो परमात्मा का ही लेना पड़ेगा, तभी आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी। यदि आप अंदर से आत्मविश्वास से लबरेज हैं और बाहर कोई शब्द अतिरेक के साथ निकल गए हों तो उसे पूरा करने में परमात्मा आपका पूरा सहयोग करेगा।

आत्मविश्वास के साथ धैर्य रूपी गुण को धारण करने से मनुष्य का व्यक्तित्व सोने की तरह चमकने-दमकने लगता है। लेकिन आजकल तो कोई किसी को सहन करना नहीं चाहता। सब एक- दूसरे पर आक्रमण करने में लगे हैं। अकारण दूसरे को आहत करने में लोगों को बड़ा आनंद प्राप्त होता है। वेदों में झुकने को ही शौर्य की पराकाष्ठा बताई गई है। जिसमें झुकने का साहस हो, जो विनम्र हो, सहनशील हो, उसके आगे ईश्वर भी हार जाता है।

धैर्यवान व्यक्ति अपनी उर्जा को अतीत, वर्तमान और भविष्य में बांट कर चलता है। जब वह ऊर्जा को अतीत में ले जाता है तो प्रथम कार्य करता है— अनुभव प्राप्त करना। अतीत में स्मृतियां ही नहीं, अनुभव भी होते हैं। वर्तमान में ऊर्जा के उपयोग का अभिप्राय है—घोर परिश्रम। लेकिन सबको सहयोग देते हुए, सहनशीलता और विनम्रता के साथ, और जब भविष्य को दृष्टि में रख उर्जा का उपयोग करता है, तो उसे दूरदर्शिता कहते हैं। अपनी उर्जा का हर स्थान पर सदुपयोग करने वाला व्यक्ति ही धैर्यवान कहलाता है।

आत्मविश्वास और धैर्य के गुणों को धारण करने वाला व्यक्ति संघर्ष करना सीख जाता है, जिससे सफलता उसके कदम चूमती है। इसलिए जब व्यक्ति खुद से लड़ने का साहस जुटाता है, तो वह अपने नकारात्मक कार्यों और भावों पर विजय प्राप्त कर लेता है। वहीं दूसरों से लड़ने में अधिकतर नकारात्मक भाव ही व्यक्तित्व पर हावी हो जाते हैं। इसके विपरीत स्वयं से लड़ने में व्यक्तित्व में निखार आता है।

एक अफ्रीकी कहावत भी है कि— यदि आप अपने भीतर के शत्रु को जीत लेते हैं, तो बाहर का शत्रु आप को नुकसान पहुंचाने में सफल नहीं हो पाएगा।

यदि आप लोगों की परवाह किए बिना पूर्ण निष्ठा एवम् समर्पण के साथ अपने नेक कार्यों को पूरा करने में लगे रहते हैं, तो आप इतिहास रच सकते हैं। इसलिए आप अपने कर्म कीजिए। कर्म ही मानव धर्म है। कर्म ही मनुष्य का सच्चा साथी और उसकी असली कमाई है। कर्म पर ही मनुष्य का भविष्य निर्भर करता है। कर्मों से ही मनुष्य का जीवन सफल होता है। लगातार मेहनत से कमजोर दिमाग भी हर बाधा, परेशानी पर विजय प्राप्त कर सकता है, बस लोगों की बातों पर ज्यादा ध्यान न देकर आरोप-प्रत्यारोपों की परवाह न करते हुए अपने पथ पर आगे बढ़ना है, न कि उनसे लड़- झगड़कर अपने आपको कमजोर करना है, बल्कि खुद से लड़ने की तकनीक आजमाएं।

सूर्य हमेशा चमकता है, कभी-कभी जब काले बादल उस पर छा जाते हैं, तो हर और अंधकार छा जाता है। लेकिन उस समय सूर्य शांत रहता है और बादलों के छटने का इंतजार करता है। बादलों के छटते ही उसकी सोने जैसी रोशनी पूरे विश्व में छा जाती है। स्वयं से संघर्ष करने के बाद मनुष्य जीवन के किसी भी मोड़ पर आने वाली कठिनाई का आसानी से मुकाबला करने में सक्षम बन सकता है। इसलिए जब लोग आपका मजाक बनाएं, आपकी असफलता पर हंसी उड़ाएं और आपको लड़ने के लिए प्रोत्साहित करें तो शांत रहकर अपनी प्रतिभा को निखारते रहें। यह कार्य इतना मुश्किल भी नहीं होता, बस इसके लिए आपको दूसरों से नजरें हटाकर स्वयं पर लगातार नजरें रखनी होती हैं।

लोगों के असफल होने का मुख्य कारण यही होता है कि वे अपनी असफलता और दोषों पर सुधार करने की बजाय दूसरे लोगों पर दोषारोपण कर उनसे लड़ने में अपनी शक्ति लगा देते हैं। इसलिए मनुष्य को समय-समय पर आत्म-चिंतन या आत्म- निरीक्षण करना चाहिए। जैसे दुकानदार सांयकाल दिनभर की आय और व्यय का लेखा देखता है, वैसे ही व्यक्ति को अपने दिनभर किए कार्यों का निरीक्षण करना चाहिए।

उसे यह विचार करना चाहिए कि— मेरे कौन से कार्य पशुओं के तुल्य और कौन से मानवोचित हैं। आहार ग्रहण करना, निद्रा, शक्तिशाली से डरना और दुर्बल को डराना एवं बच्चे उत्पन्न करना ये कार्य तो मनुष्य और पशुओं के समान हैं। धर्म का आचरण ही मनुष्यों में पशुओं से अधिक है। जो कि पशुओं के लिए करना सम्भव नहीं है। धर्म के बिना मनुष्य पशु के तुल्य है। मनुष्य के जीवन में धर्म का स्थान बहुत अहम् है। जो व्यक्ति धर्म के अनुसार जीवन यापन करता है, वह दूसरों की अपेक्षा ज्यादा सुखी और निश्चित होता है। धर्म परायण व्यक्ति जीवन के हर मोड़ पर सहज होता है।

धर्म सर्वोपरि है। बड़ों की आज्ञा का पालन करना मनुष्य का पहला धर्म है। आने वाली पीढ़ी को भी आज्ञा पालन और अनुशासन का संदेश देने के साथ ही पूरी तरह से नियोजित दिनचर्या, मनुष्य को धार्मिक बनाती है। इससे मनुष्य का जीवन स्वस्थ रहता है। दिनचर्या के मुताबिक काम करना भी धर्मपरायणता का एक हिस्सा है।

एंथनी राबिन्स कहते हैं कि— आपका भाग्य आपके निर्णयों से निर्धारित होता है। इसलिए जीवन को अपने हिसाब से ढालने का प्रयत्न करें। दूसरों के अनुसार अपने जीवन को न जिएं। जीवन आपका है, इसलिए इसको अपने अनुसार ही जिएं।

271. आसक्ति से मुक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आसक्ति एक मानसिक भाव है। यह एक लगाव है— उन वस्तुओं या व्यक्तियों से जिनके बिना उन्हें कुछ भी अच्छा न लगे। आसक्ति एक तरह का नशा है, नशे में व्यक्ति की जो मनोदशा होती है, वही आसक्ति में भी होती है। आसक्त हुए व्यक्ति को अच्छे-बुरे की कोई पहचान नहीं होती।
जैसे— एक शराबी को ही लें, वह बिना पिये नहीं रह सकता। वह, यह जानते हुए भी कि शराब से उसके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है, इसके बावजूद भी वह पी रहा है।
ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि वह व्यक्ति शराब के प्रति आसक्त है।
जिन व्यक्तियों ने मानव चेतना को जाना है, समझा है, उसकी सच्चाई का अनुभव किया है, उनका स्पष्ट कहना है कि जब कोई व्यक्ति आसक्ति या अहंता के प्रभाव में आ जाता है या उनसे घिर जाता है, तो उसके लिए पाप के अनेकों द्वार खुल जाते हैं। वह चाहे, अनचाहे पाप करने लगता है।

आसक्ति का भाव ही पाप का स्रोत है। क्योंकि वह सही गलत की पहचान करने में समर्थ नहीं होता। ऐसे में वह जो भी करता है, वही पाप बन जाता है या ऐसी स्थिति में जो भी सोचता है, उस पर भी नकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होता है।

भौतिक वस्तुओं का उपभोग करने के पश्चात उनकी वासना पुनः उन्हीं वस्तुओं के लिए प्रेरित करती रहती है। इसी वासना के वशीभूत हुआ व्यक्ति भौतिक साधनों को एकत्रित करने के लिए प्रवृत्त होता है तथा अन्य लोगों की आवश्यकताओं की ओर ध्यान न देकर, निजी सुखोपभोग के लिए साधनों को एकत्रित करने लगता है। सुखोपभोग के साधनों को एकत्र करने के लिए बहुत सा समय, बुद्धि और श्रम लगाना पड़ता है। जब वे साधन इकट्ठे हो जाते हैं, तब उनकी रक्षा करने की चिंता हो जाती है। यदि किसी कारणवश ये साधन छिन गए या नष्ट हो गए तो फिर दुख का पारासर ही नहीं रहता।

आसक्ति के वशीभूत हुआ व्यक्ति भौतिक साधनों को प्राप्त करने में इतना व्यस्त हो जाता है कि वह, यह भूल जाता है की इस मोह माया से उसकी मुक्ति कैसे होगी? इस शरीर को चाहे कितने भी ऐशो- आराम के साधनों का उपभोग करके आराम से रखा जाए, अंत में इसे जीर्ण होना ही है। हम देखते हैं कि— हिरण- ‘शब्द’, हाथी- ‘स्पर्श’, पतंगा-‘रूप’, भौंरा-‘गन्ध’, और मछली- ‘स्वाद’ के वशीभूत होकर अपने प्राण दे देते हैं। इन प्राणियों की केवल एक-एक विषय में आसक्ति के कारण दुर्गति होती है। जो व्यक्ति पांचों इंद्रियों के विषयों में आसक्त होकर विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहा है, वह क्यों न मारा जाएगा? जैसे- चमड़े से बने पात्र में एक भी छिद्र हो जाए तो उसमें रखा हुआ सारा जल बाहर निकल जाता है, इसी प्रकार जो व्यक्ति एक भी इंद्रिय का दास है, उसकी प्रज्ञा नष्ट हो जाती है।

एक संत हुए हैं— पीडी आस्पेन्स्की
जो विचारशील और दार्शनिक थे। जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी।
आस्पेन्स्की के शिष्य बेनेट ने अपने शब्दों में लिखा है कि जब उसने अपने गुरु से पाप-पुण्य की चर्चा की तो उन्होंने कहा— अहंकार व आसक्ति के रहने पर पुण्य करना असंभव है और इनके ‘न’ रहने पर पाप बिल्कुल नहीं होते।
अपने गुरु की इस शिक्षा को बेनेट ने कई बार परखा और पाया कि अंहकार और आसक्ति से मुक्त मन: स्थिति में पाप नहीं हो सकता।
तब समझ आया कि पाप के लिए अंहकार व आसक्ति जरूरी है और पुण्य के लिए अंहकार व आसक्ति से मुक्ति जरूरी है।
इसके विपरीत जब अहंता व आसक्ति की मूर्छा टूटती है, तो व्यक्ति अपने आप जाग जाता है, क्योंकि आसक्ति के कारण ही व्यक्ति की मूर्छा गहरी होती है। जितना ज्यादा अंहकार होता है, उतनी ज्यादा ही आसक्ति होती है। इसलिए यदि आसक्ति से मुक्ति पानी है तो अंहकार का त्याग करना होगा।

हम कितने ही गुणों से भरे हों, लेकिन साथ में उन गुणों के होने का अंहकार भी हो तो वे गुण किसी काम के नहीं रहते।
मैं अक्सर सोचती हूं कि— काम और अर्थ की भी जीवन में एक संतुलित मात्रा में आवश्यकता होती है, लेकिन अंहकार की कोई जरूरत ही नहीं है।

अंहकार एक तरह का कैंसर है। अंहकार और आसक्ति ने ही रावण को राक्षस बना दिया। जबकि राम को उनकी उदारता और त्याग ने सूर्य बना दिया।

भर्तृहरि ने कहा है—पहले हृदयाघात या कैंसर जैसे रोगों से इतने व्यक्ति पीड़ित नहीं होते थे। एड्स जैसे भयंकर रोग का तो नामो-निशान भी नहीं था। इन विविध घातक रोगों की उत्पत्ति के पीछे अंहकार और आसक्ति का भाव ही है।
जब आसक्ति की तंद्रा टूटती है तो चैतन्यता के अनेकों द्वार खुल जाते हैं। चारों तरफ प्रकाश अनेकों द्वारों से अस्तित्व में प्रवेश करता हुआ ऐसा लगता है जैसे रात्रि के अंधकार को भेदन करती हुई उषा, पूर्व दिशा में प्रकट होती है।
उगते सूर्य की लालिमा से सारा आकाश अरुण वर्ण का हो गया है, जिसने हमारे मस्तिष्क, हृदय और समस्त शरीर को भी रक्त वर्ण बना दिया है। ऐसे में व्यक्ति की मूर्छा टूट जाती है तथा व्यक्ति का चेतन बढ़ जाता है। जब चैतन्यता पूर्ण रूप से अपना अधिकार स्थापित कर लेती है तो मनुष्य का हृदय निर्मल और पवित्र हो जाता है। निर्मल हृदय से भाव-विभोर हुए व्यक्ति को सितारों की माला ऐसे चमकती दिखाई देती है, जैसे बिजली कौन्धती हो। ऐसे लगने लगता है कि बहुत से चांद और सूर्य आकाश में चमक रहे हों, तथा सारा संसार झिलमिल-झिलमिल होकर प्रकाशित होता दिखलाई देता है। यह देखकर अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है।

जब व्यक्ति आनंद विभोर होता है, तो पुण्य के अनेक द्वार खुलते हैं। ऐसी स्थिति में जो भी कर्म किए जाते हैं, वे वास्तव में पुण्य ही हो जाते हैं। क्योंकि मनुष्य के जागृत हो जाने के बाद पुण्य के अनेक रास्ते बन जाते हैं। इस पाप और पुण्य के बारे में सामान्य व्यक्तियों से लेकर विद्वान तक अनेक चर्चा करते रहते हैं। इस पर वे अनेकों प्रकार के तर्क देते हैं और समीक्षा भी करते रहते हैं।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—जिस काल में मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं का परित्याग कर देता है और आत्मसंतुष्टि के लिए कर्म करता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ जानना चाहिए। जो सर्वत्र आसक्ति से रहित हो जाता है, शुभ समाचार को जान मन में फूला नहीं समाता और अशुभ में दुखी नहीं होता। उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।
ऐसा समझना चाहिए जैसे— कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब मनुष्य इंद्रियों के विषयों से, इंद्रियों को सब ओर से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर माननी चाहिए। इस स्थितप्रज्ञ मनुष्य की विषयों के प्रति आसक्ति, परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है। निष्कर्ष कुछ भी हो, परंतु आसक्ति और अहंता ही पाप का स्रोत है। इसको नहीं झुठलाया जा सकता।

जब यह स्पष्ट है कि आसक्ति हमें सिर्फ भौतिकता और पतन की राह पर ले जाती है, तो ऐसी आसक्ति से मुक्ति में ही जीवन का सार छिपा हुआ है। सब बन्धनों, दबावों तथा समस्याओं से मुक्त होकर स्वतंत्र कर्म करने के लिए आसक्ति से मुक्ति परम आवश्यक है।

270. आहार का प्रभाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे मनीषियों ने ‘योग के सिद्धांत’ में आहार को भी प्रमुखता से शामिल किया है। उनका कहना था कि मनुष्य के जीवन में उसके खान-पान का सीधा असर पड़ता है। वे जैसे आहार ग्रहण करते हैं, वैसे ही उनके विचार होते हैं।

उनके अनुसार—” जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन”

सात्विक आहार से मन, बुद्धि सत्वगुण युक्त रहते हैं।

जो आहार घृत से स्निग्ध, मधुर गुण युक्त और भूख का चतुर्थांश रखकर किया हो तथा केवल ईश्वर की भक्ति करने के लिए शरीर स्वस्थ बना रहे, इस भावना से लिया गया हो, उसे मिताहार कहते हैं।

अधिक भोजन से आलस्य उत्पन्न होता है। कहावत है— एक बार खाना योगी का, दो बार भोगी का, तीन बार रोगी का।
प्रातः सायं दूध, फल, दोपहर में सीमित मात्रा में भोजन करना, शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखता है।
आयु, बल, बुद्धि, आरोग्य, सुख, प्रसन्नता को बढ़ाने वाला, स्निग्ध, रस युक्त और हृदय को रुचिकारक भोजन सात्विक जानना चाहिए।

गेहूं, चना, चावल, जौ, ज्वार, घृत, दूग्ध, मिष्ठ, मधु, सौंठ, परवल, लौकी, तोरई, बथुआ आदि स्वच्छ जल एवं सुपाच्य खाद्य पदार्थों का सेवन प्राणायाम और ध्यान से उत्पन्न, खुश्की को दूर करता है और कब्ज नहीं होने देता।

धर्म ग्रंथों में उल्लिखित “यथा अन्न तथा मन” के सिद्धांत को तो चिकित्सक भी मानते हैं। शरीर में कोई बीमारी आने पर खान-पान में परहेज की सलाह दी जाती है व हल्का और सात्विक भोजन करने के लिए कहा जाता है। खानपान का संबंध शरीर से ही नहीं मन से भी जुड़ा होता है।

सात्विक भोजन के बाद मनुष्य ऊर्जावान महसूस करता है। उसके चेहरे के हाव-भाव से धैर्य, प्रसन्नता, दया, परोपकार आदि गुण झलकते हैं। उसके मन में जो विचार पनपते हैं, वे सब की भलाई ही करने के लिए होते हैं। वे हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहते हैं। सात्विक आहार करने वाले में अहंकार की भावना नहीं होती। वे ईश्वर की आराधना करने में ही अपने जीवन का निहितार्थ समझते हैं। उनके लिए हर कार्य भगवान की इच्छा से ही होता है। ऐसे मनुष्य परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए हमेशा योगदान देने को तैयार होते हैं।

सात्विक भोजन का उल्लेख ‘गीता उपदेश’ में भी है। युद्ध न करने का मंतव्य प्रकट करने वाले अर्जुन के मन को बदलने के लिए भगवान श्री कृष्ण उचित आहार संबंधित उपदेश भी देते हैं। श्री कृष्ण सात्विक, राजस, और तामस आहार की व्याख्या करते हैं तथा उससे पड़ने वाले सत्, रज, तम गुणों का भी अर्थ बताते हैं।

श्रीकृष्ण की इस व्याख्या में गहरे भाव छिपे हुए हैं। सात्विक आहार से जहां मनुष्य का मन मजबूत बनता है, उसके साथ-साथ उसके व्यक्तित्व का विकास भी होता है। उसमें सकारात्मकता आती है, जिससे बौद्धिक विकास के साथ-साथ ज्ञान की प्राप्ति भी होती है। बहुत से मनुष्य समुचित तरीके से भोजन न करने से शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से अस्वस्थ देखे जाते हैं। व्यक्ति का आहार के रूप में जो भी खानपान है, वह कितना सात्विक है, यह कोई और जाने या न जाने पर वह खुद तो जानता है।

अक्सर लोग कहते सुने होंगे कि— वे तथा उनके परिवार वाले सादा और सात्विक आहार ग्रहण करते हैं, फिर भी उनके घर कोई ना कोई बीमार रहता है। इसका कारण स्पष्ट है कि भोजन में सात्विकता नहीं है। वास्तव में सात्विक भोजन वह है जो हम ईमानदारी के साथ परिश्रम करके धन अर्जित करते हैं और उस धन से जो भोजन ग्रहण किया जाता है। सात्विक एवं परिश्रम से अर्जित धन के उपभोग से शरीर ही नहीं आत्मबल भी मजबूत होता है।
परिश्रम करने से स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। बहुत सारी बीमारियों की वजह तो शारीरिक श्रम का अभाव है।

छल, कपट, धोखा, ठगी, पराए व्यक्ति के हिस्से से अर्जित धन का उपयोग महाघातक होता है। इसलिए भोजन पूर्ण रूप से सात्विक होना चाहिए। राजसी एवंम् तामसी आहार शरीर एवं मन को बीमार बना देता है। मांस, अंडे, शराब आदि तामसी भोजन करने से शरीर एवंम् मन पर घातक प्रभाव पड़ता है। शरीर में बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। मन तामसी स्वभाव वाला, कामी, क्रोधी, चिड़चिड़ा, चिंताग्रस्त हो जाता है। ऐसे लोगों का हृदय निष्ठुर हो जाता है। उनके हृदय में दया, परोपकार आदि गुणों का अभाव हो जाता है।

इस विषय में ब्रिटेन के मान्चेस्टर मेडिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में एक प्रयोग किया गया था।
प्रयोगशाला में पालतू सफेद चूहों में से एक सफेद चूहे को अलग पिंजरे में रखा गया और उसे तामसिक आहार दिया गया।
आठ दिन के बाद उसको सभी के साथ रखा गया, तो उसने सभी चूहों को लहूलुहान कर दिया। पुनः उसको अलग पिंजरे में रखा गया और सात्विक आहार जो सभी चूहे खाते थे दिया गया। एक माह तक सभी ने एक जैसा आहार ग्रहण किया। वहीं चूहा पुनः शांत प्रकृति का हो गया। इससे यही प्रमाण मिलता है कि हम जैसे आहार ग्रहण करते हैं, हमारे विचार वैसे ही बन जाते हैं और फिर जैसे विचार होंगे, वैसा ही कर्म करेंगे। इसलिए सात्विक आहार को ही अहमियत देनी चाहिए, जिससे जीवन हमेशा खुशियों से भरा रहे।