07. भगवान की अदालत

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

भगवान अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करता। अगर सच्चे मन से हम उसकी आराधना करते हैं, तो उसका फल अवश्य मिलता है। एक सच्चे भक्त द्वारा निष्काम भाव से दिया गया आशीर्वाद भी अवश्य प्रफुल्लित होता है ।क्योंकि एक भक्त ही भगवान को झुकाने की ताकत रखता है। और एक सरल हृदय भक्त के द्वारा कही गई छोटी सी बात भी सच साबित होती है ।ऐसे भक्त यही मानते हैं कि मनुष्य के वही कर्म सफल होते हैं, जिनमें परमात्मा के प्रति मन में आस्था और भावना दृढ़ हो ।निष्काम भक्ति करने से जो पुण्य फल मिलता है, वही वास्तविक पूंजी होती है।ऐसी पूंजी भगवान की आराधना करने से ही प्राप्त होती है। और यह जन्म -जन्मांतर तक साथ रहते हैं।

जो भक्त परमात्मा के भक्ति रूपी सरोवर में स्नान करता है, उसके सारे दुख कलेश और पाप मिट जाते हैं। वह उस फलदार वृक्ष की तरह हो जाता है, जो बारिश तूफान में भी सीना तान कर खड़ा रहता है। कहने का अभीप्राय है कि उसे इस दुनिया में पैदा होने वाले दुख दर्द या शारीरिक पीड़ा ,परिवार के झगड़े आदि का उसके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भगवान की भक्ति करना ही उनका कार्य है। भक्ति करने से ही भगवान की महिमा स्थापित होती है।ऐसे भक्त परमात्मा की भक्ति के साथ-साथ सामाजिक सदभाव का माध्यम भी बनते हैं। भक्ति रूपी सरोवर में स्नान किए हुए व्यक्ति के सभी विकारों की मैल धुल जाती है। अज्ञानता का अंधकार मिटता है। सत्य के प्रति आस्था जागृत होती है। भक्ति भाव और आत्मज्ञान का संचार होता है। मानव जीवन का महत्व समझ में आने लगता है और जीवन को सही दिशा मिलती है ।

जनमानस को आज की विषमताओं से उबारने के लिए एक ही मंत्र की आवश्यकता है, ज्ञान के साथ समता, भक्ति के साथ विनम्रता और कर्म के साथ निष्कामता। ऐसे भक्तों के प्रति हृदय कृतज्ञता से भर जाता है। वे जनमानस के हृदय पटल पर ऐसा स्थान बना लेते हैं जहां से सत्य, पवित्रता, ज्ञान और भक्ति की भागीरथी प्रवाहित होकर चारों दिशाओं में प्रवाहित होने लगती है। ऐसे भक्तों में ममता, विनम्रता और निष्कामता के साथ-साथ विचारों की शुद्धता, व्यवहार की निश्चलता तथा सब के प्रति सौहार्द की भावना होती है। ऐसे भक्त सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ साथ जीवन से हताश और निराश हुए लोगों के दुखों को दूर करने के लिए सदैव जागरूक रहते हैं। इसके लिए अगर उन्हें अपने शरीर का थोड़ा सा मांस काटकर भी देना पड़े तो वे पीछे नहीं हटते।

एक समय की बात है कि एक ब्राह्मण प्रतिदिन भगवान की अदालत में जाया करता था ।उसका एक पड़ोसी निसंतान था। उस ब्राह्मण के पड़ोसी ने ब्राह्मण से कहा ब्राह्मण देवता आप प्रतिदिन भगवान की अदालत में जाते हो, आप भगवान से पूछना कि मेरे भाग्य में संतान सुख है या नहीं। अगले दिन ब्राह्मण भगवान कि अदालत में पहुंचा तथा अपने पड़ोसी के विषय में पूछा ।ब्राह्मण की बात सुनकर भगवान बोले कि उसके इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्म तक संतान सुख भाग्य में नहीं लिखा। ब्राह्मण ने भगवान का उत्तर सुनकर निराश मन से अपने पड़ोसी को सारा वृत्तांत सुना दिया, संयोग से कुछ समय बाद एक भगवान का सच्चा भक्त उसी पड़ोसी के घर आकर भीख मांगने लगा ।उसे भक्त ने कहा, बेटा कुछ दिनों से मैंने भोजन नहीं किया है, मुझे भोजन करवा दो, मैं तृप्त हो जाऊंगा। उसकी यह बात सुनकर वह पड़ोसी कहने लगा, मैं स्वयं बहुत परेशान रहता हूं, क्योंकि मेरी कोई भी संतान नहीं है ।यह सुनकर भक्त बोला,आप मुझे भोजन करवा दो, आपको जल्दी ही दो पुत्रों की प्राप्ति होगी। भोजन से तृप्त होकर वह भक्त अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया। उस भक्त के आशीर्वाद से जल्द ही उस पड़ोसी का घर दो पुत्रों की किलकारियों से गूंज उठा। रास्ते में गुजरते हुए जब ब्राह्मण ने अपने पड़ोसी के घर बच्चों को देखा तो आश्चर्यचकित होकर रह गया। अगले ही दिन ब्राह्मण भगवान की अदालत में जा पहुंचा तथा भगवान के सामने बच्चों की कहानी को सुना कर बोला,आप कैसे भगवान हैं। आप झूठ बोलते हैं। आपने मेरे पड़ोसी के घर सात जन्म तक संतान का सुख नहीं होने की बात कही थी, तो फिर यह असंभव कार्य इतनी शीघ्रता से कैसे संपन्न हो गया। ब्राह्मण की बात सुनकर भगवान बोले -पहले तुम मेरी बात सुनो ।इस समय मेरे सिर में दर्द हो रहा है। अगर तुम मुझे किसी इंसान का थोड़ा सा मांस लाकर दे दो तो मेरा सिर दर्द ठीक हो जाएगा। तत्पश्चात में तुम्हें कथा का रहस्य बता दूंगा ।

ब्राह्मण भगवान की बात सुनकर बोला -ठीक है पहले मैं आपके लिए इंसान के मांस का प्रबंध करके लाता हूं। ब्राह्मण अपने घर की ओर प्रस्थान कर गया।ब्राह्मण ने अपने शहर में भगवान के लिए थोड़ा सा इंसान का मांस देने की बात कही ,परंतु कोई भी अपना मांस देने को तैयार नहीं हुआ ।इतना ही नहीं सब ने ब्राह्मण को प्रताड़ित कर अपने शहर से निकाल दिया। ब्राह्मण निराश होकर जंगल की ओर निकल गया। उसको समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। मैं तो ब्राह्मण हूं। मेरा तो कर्म ही भक्ति करना है। मैं भगवान का इतना छोटा सा कार्य भी नहीं कर सका। अब मैं भगवान को जाकर क्या कहुंगा। वह इसी सोच- विचार में चला जा रहा था ।यह सब सोच कर उसकी जान निकली जा रही थी। संयोगवश वह भक्त भी उसी जंगल में तपस्या कर रहा था ,जो उसके पड़ोसी को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देकर गया था। ब्राह्मण ने उस भक्त को देखा और उसके पास गया ।ब्राह्मण ने उस भक्त से भी भगवान के लिए थोड़ा सा मांस देने की बात दोहरा दी।ब्राह्मण की बात सुनकर वह भक्त बोला- बस इतनी सी बात के लिए तुम इतना परेशान होकर इधर-उधर भटक रहे हो। उस भक्त ने खुशी-खुशी अपने शरीर का थोड़ा सा मांस दे दिया।

ब्राह्मण उस भक्त का मांस लेकर भगवान की अदालत में पहुंच गया, तथा भक्त के बारे में बता दिया ।ब्राह्मण की बात सुनकर भगवान बोले-अरे ब्राह्मण!तुम भी तो अपना थोड़ा सा मांस दे सकते थे। परंतु तुमने कदाचित ऐसा नहीं किया। जो भक्त भगवान के लिए सदैव अपना तन-मन-धन न्योछावर करने के लिए तैयार रहते हैं ।भला भगवान ऐसे भक्तों की बात को कैसे मिथ्या कर सकते हैं ।भगवान का उत्तर सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर होकर अपने घर की ओर रवाना हो गया। शायद उसे भक्ति की महिमा का पता लग गया था, और भगवान की न्याय व्यवस्था पर विश्वास हो गया था। वह समझ गया था कि सच्चे भक्त की कही गई छोटी सी बात भी मिथ्या साबित नहीं हो सकती।

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