08. आनंद के रास्ते

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

इस धरा पर कोई व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो अपने ईश्वर से यह मांगता हो कि हमें अपार कष्ट दे दीजिए। शरीर रोग ग्रस्त हो, धन की कमी हो और हमें सुकुन की नींद ना मिले ।बल्कि हर व्यक्ति अपने इष्ट देव से आनंद और उत्तम जीवन ही मांगता है । इस प्रकार देखा जाए तो सब के अंतर्मन में ईश्वर के प्रति आस्था है और जो खुद को नास्तिक कहते हैं तथा ईश्वरीय शक्ति को नकारते हैं, वे भी अंतर्मन से परमानंद की सत्ता को स्वीकार कर आनंद ही चाहते हैं । प्रत्येक व्यक्ति का आनंद प्राप्त करने का एक अलग नजरिया है। छोटा बच्चा अपना मनचाहा खिलौना पाकर आनंदित हो जाता है। वहीं किसी की गाड़ी लेने की इच्छा पूरी हो जाती है तो वह आनंद से भर जाता है। बेरोजगार व्यक्ति नौकरी पाकर परम आनन्द प्राप्त करता है ।प्रत्येक व्यक्ति अपनी मनचाही इच्छा पूरी होने के बाद आनंद से ओतप्रोत हो जाता है ।लेकिन यह सब भौतिक वस्तुऐं हैं । फिर भी मनुष्य इन सबको पाने के लिए लालायित रहता है । राजा -महाराजा भी अपने राज्य को बढ़ाने के लिए युद्ध करते रहते थे। जिससे उनके शक्तिशाली होने का पता चलता था। उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त करके ही आनंद प्राप्त होता था। अब सवाल यह उठता है कि अधिकांश लोगों की इच्छा पूरी नहीं होती तो वे लोग इधर-उधर दुखी होने का रोना रोते दिख जाते हैं।

दरअसल आनंद के कई रास्ते हैं। व्यक्ति पंचमुखी चौराहे पर खड़ा होकर यदि सभी रास्तों की जानकारी नहीं करेगा तो वह एक ही रास्ते पर चलता रहेगा। ये पंचमुखी रास्ते हैं पांच ज्ञानेंद्रियां । अब कोई व्यक्ति केवल स्वाद के लिए जिएगा , तो संसार के अदभुत दृश्य, श्रवण, गंध और स्पर्श से वंचित रह जाएगा ।व्यक्ति को श्रवण के लिए सत्संग में प्रवचन, संगीत, मंत्रों के पाठ को सुनना चाहिए। इससे भी मन को सुकून मिलता है। दृश्य के लिए प्रकृति को भरपूर निहारना चाहिए, जिससे आत्मिक शांति मिलती है और तनाव दूर होता है ।प्रकृति के सानिध्य में आकर मनुष्य अपने को तरोताजा महसूस करता है। सूर्योदय के वक्त प्रकृति अपना अद्भुत श्रृंगार इसलिए करती है कि मनुष्य इससे लाभान्वित हों। ऋषि-मुनियों ने सूर्योदय काल को अति उत्तम कहा है । सूर्य की पहली किरणें जब पेड़ पौधों पर पड़ती हैं तो उन पर सुनहरी रंग की आभा झलकनें लगती है ।जो मन को अपनी ओर आकर्षित करती है और मनुष्य का चित आनंद से भर जाता है। गंध -सुगंध के लिए पेड़ पौधों के आस-पास कुछ समय व्यतीत करना चाहिए।स्पर्श सुख के तहत माता-पिता, गुरुजनों के चरण -स्पर्श, छोटे बच्चों को गोद लेने तथा खेलने से उर्जा मिलती है। जब आप अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करते हैं तो आपको एक अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है। जिससे आपको सकारात्मकता का अनुभव होता है और आप अपने काम को ज्यादा धैर्य और संतुलन के साथ करने में सक्षम होते हैं। क्योंकि जीवन में समता चाहिए, संतुलन चाहिए।जीवन यूं है जैसे कोई तलवार की धार पर चले। जरा इधर, जरा उधर हुआ नहीं कि जीवन का आनंद समाप्त हो जाता है।

महाराज दशरथ ऐसे राजा थे जिन्हें श्राप के बारे में सोच कर भी आनंद प्राप्त होता था। दरअसल बात उस समय की है जब महाराज दशरथ को संतान प्राप्त नहीं हो रही थी। तब वे बड़े दुखी रहते थे ।ऐसे समय में उन्हें एक बात से ही हौसला मिलता था, जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था और उन्हें आनंद की अनुभूति कराता था। अनोखी बात यह थी कि इस हौसले की वजह किसी ऋषि- मुनि या देवता का वरदान नहीं, बल्कि श्रवण के पिता का श्राप था ।महाराज दशरथ जब-जब दुखी होते तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया हुआ श्राप याद आ जाता था ।श्रवण के पिता ने यह श्राप दिया था कि मेरी तरह आप भी पुत्र वियोग में तड़प -तड़प कर मरेंगे। दशरथ को पता था कि यह श्राप अवश्य फलीभूत होगा। इसका मतलब है कि- मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा, तभी तो उसके शौक में तड़प- तड़प कर मरूंगा। यानी यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया।

ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई। सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर -वीरों को पृथ्वी की अलग-अलग दिशाओं में भेज रहे थे, तो उसके साथ-साथ उन्हें यह भी बता रहे थे की किस दिशा में तुम्हें क्या मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए। प्रभु श्री राम सुग्रीव का यह भौगोलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे। उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि आपको यह सब कैसे पता? तब सुग्रीव ने उनसे कहा कि मैं भाई बाली के भय से जब मारा -मारा फिर रहा था, तब मुझे पूरी पृथ्वी पर कहीं भी शरण नहीं मिली। इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया। सोचिए, अगर सुग्रीव पर यह संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता सीता को खोजना कितना कठिन हो जाता। इसलिए किसी ने बहुत सुंदर बात कही है -अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियां वरदान हैं और जो उनके अनुसार व्यवहार करे वही पुरुषार्थी है।

ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है, तो हर एक कांटा भी वरदान ही समझो। कहने का मतलब है -अगर आज मिले सुख से आप खुश हैं, तो कभी अगर कोई दुख, विपदा, अड़चन आ जाए तो घबराना नहीं चाहिए क्या पता वह अगले किसी सुख की तैयारी हो। इसलिए सदैव सकारात्मक रहें, आनंद से रहें। कहते हैं कि -काशी हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण जब हो रहा था ,तो उसके संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय रात में जाकर मजदूरों द्वारा बनाई गई दीवारों को पुत्रवत स्पर्श कर आनंदित होते थे। उन्हें अपना विश्वविद्यालय पुत्र की तरह लगता था ।इन सभी उपायों से वैविध्यपूर्ण शरीर में आनंद के रसायनों का जो निर्माण होगा ,वह व्यक्ति को दुखी नहीं होने देगा ।भौतिक दौर में व्यक्ति सिर्फ भौतिक समृद्धि के लिए यदि उतावला रहेगा तो उसका जीवन केवल एक ही रस पाएगा जो आगे चलकर नीरसता उत्पन्न करेगा। इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह ईश्वर द्वारा प्रदत पंच ज्ञानेंद्रियों का हमेशा सदुपयोग करें।

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