101. पाएं, मन पर नियंत्रण

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में वही व्यक्ति श्रेष्ठ होता है जो मन को नियंत्रित कर लेता है। जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली, वही जिंदगी की रेस में विजेता बनता है। किसी दूसरे पर विजय प्राप्त करने से पहले स्वयं पर और अपने मन पर विजय प्राप्त करना परम आवश्यक है। मन से ही हमें सुख और दुख की अनुभूति होती है। अगर हम जीत जाते हैं तो हम सुखी हो जाते हैं और हार जाते हैं तो हमें दुख होता है। हार और जीत का निर्धारण करने वाला हमारा मन ही है। हमारा मन ही है जो हमें विजय और पराजय का अहसास करवाता है।

एक कहावत भी है— मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत अर्थात् जब हम मन से हार जाते हैं तो हमें कोई भी विजय प्राप्त नहीं करवा सकता, अगर मन से जीत जाते हैं तो कोई नहीं हरा सकता।

इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने मन को नियंत्रण किया और इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम अंकित करवाया। हमारे देश में अनेक सिद्ध पुरुष हुए हैं, जिन्होंने मन को नियंत्रित करने की अनेक युक्तियां बताई हैं और स्वयं मन को जीतकर दिखाया है।

विम हाफ एक महान डच एथलीट हैं। वे जमा देने वाले तापमान में अपनी बेहतरीन प्रतिभा व जज्बे को दर्शाने के लिए विश्व भर में मशहूर हैं। उन्होंने बर्फ के भीतर तैराकी ओर लंबे समय तक बर्फ के साथ रहकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। नंगे पांव बर्फ पर मैराथन का भी रिकॉर्ड बनाया है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में ऐसी गतिविधियां आपको चौंका रही होंगी, पर यही तो है, इंसानी जज्बे और दिमाग का कमाल। जिसकी कोई सीमा नहीं। कुछ भी संभव है।
जब उनसे पूछा गया कि आप यह सब कुछ कैसे कर लेते हो तो उन्होंने कहा—जब आप अपने मन को नियंत्रण करना सीख लोगे तब आप वह सब कुछ कर पाओगे, जिसके बारे में दुनिया कहती है कि—यह संभव नहीं है।
अगर आपको लगता है कि मेरी क्षमता इतनी ही है तो आप उसमे भी अधिक क्षमतावान् हैं। यही मेरी सोचने की प्रक्रिया है और इसी को मैं मकसद बनाकर आगे बढ़ता हूं।
मैं मरने से नहीं डरता हूं। बस मुझे इसकी चिंता है कि एक अच्छा जीवन कैसे जी लूं।

इस सत्य को नहीं नकारा जा सकता कि मन पंछी की तरह चंचल होता है। उसे पिंजरे में कैद करके रखना अव्यवहारिक है। उसे खुले आकाश में उड़ने देना चाहिए। यही मन का स्वभाव है, परंतु मन को नियंत्रित करने वाली डोर हमें मजबूती से पकड़ कर रखनी चाहिए। यदि यह डोर हाथों से छूट गई तो मन अनियंत्रित हो जाएगा। अनियंत्रित मन भटकाव पैदा करता है, जिससे शंकाएं जन्म लेती हैं। मन में भटकाव पैदा होने से सफलता हमारे से मीलों दूर चली जाती हैं। दूसरी तरफ मन में विश्वास उत्पन्न करने से ही हम विपरीत परिस्थितियों में लड़ पाते हैं।

मन की स्वतंत्रता जरूरी है लेकिन मन की बातों को विवेक के तराजू पर तोलकर ही कार्य रूप में परिणत करना चाहिए। अगर हम ऐसा कर पाए तो परिणाम सदैव सुखद एवं कल्याणकारी होता है। जब एक व्यक्ति प्रसन्न होता है तभी वह दूसरों को प्रसन्नता बांट सकता है। थका हारा मनुष्य सदैव विषाद से घिरा रहता है। उसमें नकारात्मकता का सीधा प्रभाव देखा जा सकता है। सकारात्मकता रूपी ताकत हमारे अंदर विद्यमान है। हम अपनी इसी अंदरूनी ताकत के बदौलत दुनिया की किसी भी मुश्किल से बाहर आ सकते हैं। यदि हम अपने मन को नियंत्रित करना सीख गए तो हम में आत्मविश्वास भी आएगा जिससे जीत सुनिश्चित है।

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