102. मूर्ति-पूजा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आधुनिक युग में जब मूर्ति पूजा को अंधविश्वास माना जाता है तब भी हमारी सनातन परंपरा में मूर्ति पूजा की जाती है। आज के समय जहां आध्यात्मिक शोध और बौद्धिक बहस चरम पर पहुंच गई है, तब भी अधिसंख्य जनता अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है क्योंकि सरल हृदय भारतीय जनता मूर्तियों में मौजूद प्राण- तत्व से स्वयं के मन प्राण को जोड़े रखने में सफल रही है।

यहां रामकृष्ण परमहंस जैसे विलक्षण संत हुए, जो मां काली की मूर्ति से घंटों बातें करते थे। प्रारंभ में लोग उन्हें गलत समझते थे, वे उन्हें पागल भी कहते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनको समझ आया कि राम कृष्ण के भीतर कुछ घटित हो गया है। मां काली को भोग लगाना उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा था। भोजन की थाली लेकर मंदिर के गर्भ गृह में घुसते तो यह निश्चित नहीं होता था कि वह कब बाहर निकलेंगे। एक दिन उनकी पत्नी शारदा उन्हें ढूंढते हुए मंदिर में पहुंच गई। श्रद्धालु जा चुके थे और परमहंस गर्भग्रह के भीतर भोग लगा रहे थे। उन्होंने दरवाजे की दरार से अंदर झांका तो वह अंदर का नजारा देखकर स्तब्ध रह गई कि साक्षात् मां काली रामकृष्ण के हाथों से भोजन ग्रहण कर रही थी।

मौजूदा समय में करोड़ों लोग मूर्ति पूजा में लगे भी हुए हैं और विरोध भी कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने मूर्ति को बस मूर्ति में तो देखा, पर अपने में वह मूर्ति नहीं देख पाए। हमारी जो मान्यता है, धारणा है, वह हमारी बनाई हुई मूर्ति ही है, जिसकी पूजा हम 24 घंटे करते रहते हैं और लोगों से भी यही आशा करते हैं कि लोग उसी की स्तुति करें उसी का गुणगान करें। हमारी कृति, हमारा सर्जन, हमारा धर्म, हमारी परंपराएं, हमारी अपनी कल्पना से पोषित स्वनिर्मित मूर्तियां हैं। हम इसे ऐसे भी कह सकते हैं जैसे कोई मूर्तिकार अपनी बनाई मूर्ति के स्थान पर, अपनी ही पूजा की इच्छा करने लगे और इच्छा पूरी न होने पर मूर्ति- पूजा का विरोध करने लगे।

ईश्वर निराकार है, यह भी तो एक धारणा ही है। निराकार की धारणा जब तक साकार का चोला ओढ़कर आधार नहीं लेगी तो वह खड़ी कहां होगी अर्थात् हम जिस आदर्श की पूजा कर रहे हैं, वह कभी हमारे बीच मौजूद था यह नहीं स्वीकारेंगे तो पूज्य कौन होगा? भावना को कोई मूर्त रूप दिए बगैर हम न तो पूजा कर सकते हैं और न ही किसी आदर्श की स्थापना कर सकते हैं।
जैसे कोई अविवाहित कन्या अपने हृदय में अपने होने वाले पति का एक काल्पनिक चित्र उकेर लेती है जो निर्गुण और निराकार होता है क्योंकि वह प्रत्यक्ष नहीं होता पर समय आने पर वह अपने उन पूर्व कल्पित गुणों को साकार देखती है तो वह हृदय से उसका वर्णन कर लेती है। यही है हमारी वह सनातन परंपरा और अनेक देव- देवताओं की मूर्ति पूजा का आधार क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अभिरुचि होती है। उसका अपना लक्ष्य होता है‌। जब साधन और साध्य में रुचि का सामंजस्य हो जाता है तो अभीष्ट सिद्धि में सहजता आ जाती है।
माता सीता ने जो आकार अपने पति का बनाया था, वही साकार होने का आशीर्वाद उन्हें पार्वती जी से भी मिला था। यही है निराकार का साकार होना और मूर्ति पूजा का परम सत्य।

हमारी सनातन परंपरा में हजारों वर्ष पहले ही भगवान के प्रति अपने भावों की एकाग्रता और उनसे संवाद के लिए मूर्ति पूजन की परंपरा का विकास हुआ था। तब से लेकर आज तक यह परंपरा अटूट और अविच्छिन्न है। यह तब भी अटूट रही, जब ईशा के प्रारंभिक वर्षों में विश्व के अनेक भागों में एकेश्वरवाद पनपा और यह तब भी अटल रही, जब ईशा के छठवीं शताब्दी में इस्लाम का प्रचार हुआ। मूर्तियों को तोड़ा गया। मंदिरों को तहस-नहस कर दिया गया। मूर्ति- पूजा का विरोध किया गया और मूर्ति- पूजा करने वालों के लिए सजा का प्रावधान रखा गया, फिर भी हमारी सनातन परंपरा कम होने की बजाय और ज्यादा दृढ़ता के साथ खड़ी रही। जिस दौर में अपने-अपने एकेश्वरवाद के घमण्ड में धर्मयुद्धों के रूप में रक्तपात जारी था, तब भी हमारी सनातन परंपरा कम नहीं हुई बल्कि सगुण भक्ति और मूर्तियों में अपने इष्ट के साक्षात्कार का भाव हमारे अंदर यथावत जारी रहा।

दरअसल सनातन परंपरा में मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा का विज्ञान हजारों साल पहले से ही मौजूद रहा है। इसलिए यहां मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करने का विधान है। हमारी मूर्तियां में अटल श्रद्धा है। इसी कारण हम मूर्तियों में अपने इष्ट के साक्षात् दर्शन करते हैं।

One thought on “102. मूर्ति-पूजा”

Leave a Reply