112. समर्पण

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

समर्पण से अभिप्राय है कि— हम जो भी कार्य करें, उसे पूरी निष्ठा और लगन के साथ करें। अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य प्राप्त करने की तरफ ही लगाएं।
समर्पण वह भाव है जो जीवन को सार्थक बनाता है। यह मानवीय गुणों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। जीवन में सफलता कभी किसी चमत्कार से प्राप्त नहीं होती बल्कि लक्ष्य के प्रति समर्पण से प्राप्त होती हैं।

एक भक्त का ईश्वर के प्रति समर्पण उसे आदर्श बनाता है। ईश्वर का सामीप्य प्राप्त कर उसे अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। अगर पुत्र का माता- पिता के प्रति समर्पण हो तो वह श्रवण कुमार बन जाता है। ऐसे पुत्र माता-पिता की कृपा से सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगते हैं। एक किसान का समर्पण, जब अपनी खेती के लिए होता है तो फसलें झूमने लगती हैं, खेत गीत गाने लगते हैं। एक गुरु का शिष्य के प्रति और शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण हो तो वशिष्ठ और श्री राम, संदीपनी और श्री कृष्ण, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसी गुरु शिष्य परंपरा के दर्शन होते हैं।

माता का अपने बच्चों के प्रति समर्पण अद्भुत होता है। यह इतना गहरा होता है कि— मां बच्चे की भूख- प्यास एवं अन्य आवश्यकताओं को स्वयं अनुभव कर लेती है। किसी भी क्षेत्र में पूर्ण समर्पण से किया गया कार्य अवश्य सिद्ध होता है। समर्पण उस दिये की भांति होना चाहिए जो निरंतर
जलता है, तपता है फिर भी दूसरों को प्रकाश दिखाता है। समर्पण अमूल्य होता है। इसकी गणना अंकों या शब्दों में नहीं की जा सकती। समर्पण मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता है। उसके भीतर जीवटता पैदा करता है। समर्पण भाव से कार्य करने वाले व्यक्तियों के कारण राष्ट्र का समग्र उत्थान संभव है।

ऐसे ही एक संत हैं— गुरु गोविंद सिंह जी। जिनका पूरा जीवन धर्म की प्रतिष्ठा और धर्म के मार्ग पर चलने वालों का मार्ग प्रशस्त करने को समर्पित था। इस शुभ संकल्प को प्राप्त करने के लिए वे आरंभ से ही पूर्णतः प्रतिबद्ध थे। अल्पायु में पिता गुरु तेग बहादुर जी को काश्मीर के ब्राह्मणों के धर्म की रक्षा हेतु बलिदान के लिए प्रेरित करने वाले गुरु गोविंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु थे। गुरु जी संत भी थे और सिपाही भी थे। उन्होंने स्वयं को परमात्मा का दास बताया। वे परमात्मा के प्रति इतने समर्पित थे कि उनके चारों पुत्र शहीद होने के बावजूद भी, परमात्मा पर उनका विश्वास अटूट रहा।

One thought on “112. समर्पण”

Leave a Reply