117. ॐ की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ॐ हिंदू धर्म की जीवन ज्योति है। ॐ वह ध्वनि है, जो सृष्टि की उत्पत्ति के समय सबसे पहले सुनी गई थी। अर्थात् इस धरा की पहली ध्वनि जिसको ॐ के नाम से संबोधित किया जाता है। वास्तविक रूप में देखा जाए तो ॐ जीवन का सार है। सारी सृष्टि इसके चारों तरफ घूमती हुई प्रतीत होती है। ॐ ब्रह्मांड की ध्वनि है एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम इसी ध्वनि का स्फुरण हुआ, जो बाद में एक मंत्र बन गया। ॐ अपने आप में एक मंत्र है। इसके बाद ही (सात) 7 करोड मंत्रों का आविर्भाव होता है। ॐ, अ, उ और म से मिलकर बना है। यह एक ऐसे अक्षरों का सम्मिश्रण है, जिनका कभी अंत नहीं होता। संपूर्ण ब्रह्मांड में सदैव ॐ की ध्वनि निसृत होती रहती है।
प्रत्येक जीव की हर श्वास में ॐ की ध्वनि ही निकलती है। यही हमारे श्वास की गति को नियंत्रित करता है। ॐ को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। ॐ का यह चिन्ह अद्भुत है। यह पूरे ब्रह्मांड को प्रदर्शित करता है। बहुत सारी आकाशगंगाएं ऐसे ही फैली हुई हैं। ॐ शब्द के उच्चारण मात्र से शरीर में एक सकारात्मक ऊर्जा आती है। हमारे शास्त्रों में ओंकार ध्वनि के सौ (100) से भी ज्यादा अर्थ बताए गए हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि— मंत्रों में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिनका कोई अर्थ नहीं निकलता, लेकिन उनसे जो ध्वनि निकलती है, वह शरीर के ऊपर अपना प्रभाव डालती हुई प्रतीत होती है। यह उच्चारण के साथ ही शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है। भारतीय सभ्यता के प्रारंभ से ही ओंकार ध्वनि के महत्व से सभी परिचित रहे हैं। यह अनादि है, अनंत है तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।
ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि होने के कारण ही ॐ को ब्रह्मांड की आवाज कहा जाता है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय ही यह ध्वनि अस्तित्व में आई, इसलिए ब्रह्मांड स्थाई नहीं है। कुछ भी हमेशा ठोस या स्थिर नहीं होता। सब कुछ जो स्पंदित होता है, एक कंपन, एक तरंग या ये कहें कि एक ध्वनि का निर्माण करता है। जिसे ॐ की ध्वनि में कैद किया था। हम अपने जीवन में हमेशा इस ध्वनि के प्रति सचेत नहीं रहते, लेकिन अगर हम ध्यान से सुनें तो हमारे चारों तरफ पूरे वातावरण में एक ध्वनि गुंजायमान है और वह ध्वनि वृक्षों के पत्तों में, सागर की लहरों में, शंख की आवाज में, मंदिर की घंटी में सुन सकते हैं।
ॐ के तीन शब्द ओ,उ और म, त्रिदेव— ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा त्रिलोक भू भुर्व: स्व: —भूलोक, भुव: लोक तथा स्वर्ग लोक का प्रतीक है। अ से आकार, उ से उपकार, म से मरना और बिंदु को हमें परमपिता परमात्मा का रूप समझना चाहिए। जीवन का पूरा सत्य ॐ के अंदर ही समाहित है। कोई भी प्राणी जन्म लेता है, तो उसे एक शरीर मिलता है। तब उसका यह कर्तव्य बनता है कि— वह अपना जीवन परोपकार में लगाए, क्योंकि अंत समय में सभी प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इन सभी का साक्षी परमपिता परमात्मा हमारे अंतर्मन में जीवन भर हमारे साथ रहता है। जो हमें हर समय सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है। इसलिए हमें सदा ही धर्म के कार्य के लिए अपना जीवन लगाना चाहिए।
ॐ शब्द हिंदू धर्म का प्रतीक चिन्ह ही नहीं अपितु यह हिंदू परंपरा का सबसे पवित्र शब्द है। हिंदू धर्म के सभी वेद मंत्रों का प्रारंभ भी ॐ के उच्चारण से शुरू किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि— किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति संपन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों सेे पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है। जैसे—
ॐ रामाय नमः —श्रीराम का मंत्र
ॐ विष्णवे नमः —विष्णु का मंत्र
ॐ नमः शिवाय —शिव का मंत्र
कहा जाता है कि—ॐ से रहित कोई मंत्र फलदाई नहीं होता, चाहे आप उसका कितना भी जाप कर लो। ॐ स्वयं में एक पूर्ण मंत्र है। ऐसा भी माना जाता है कि—एक बार ॐ का जाप, हजार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। ॐ का दूसरा नाम प्रणव अर्थात परमेश्वर है।
“तस्य वाचक: प्रणव” अर्थात उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। प्रणव,ॐ, ब्रह्म ये तीनों एक ही हैं। ॐ एक ऐसा अक्षर है जिसका, क्षरण अथवा विनाश नहीं होता।

One thought on “117. ॐ की महत्ता”

Leave a Reply