12. दृढ़-इच्छा शक्ति

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

जब हम कोई काम करना शुरू करते हैं, तब सबसे पहले हमें अपने आप से संकल्प लेना होगा। कहने का अभिप्राय है कि -हमें अपने आप को प्रिपेयर करना होगा कि हमारे अंदर इतनी काबिलियत है कि हम ये कार्य कर सकते हैं। अगर हमारे अंदर काम करने की इच्छा शक्ति नहीं होगी तो हम कभी भी उस कार्य को सफलता-पूर्वक नहीं कर पाएंगे। हम अपनी इच्छा-शक्ति से उस कार्य में सफल तो हो जाएंगे लेकिन जो कार्य दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर प्राप्त कर सकते हैं उतनी सफलता हम प्राप्त नहीं कर पाएंगे। जैसे एक विद्यार्थी परीक्षा में सफल होने की इच्छा शक्ति रखता है, तो वह परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण तो हो जाएगा लेकिन अगर वह दृढ़ निश्चय के साथ परीक्षा देता है तो उसकी सफलता की प्रतिशत ज्यादा होगी। वह अपना स्कूल, कॉलेज भी टॉप कर सकता है। कोई भी आविष्कार एक दृढ़ इच्छा-शक्ति के बगैर नहीं किया जा सकता।

एक सत्य घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। एक बच्चे की एक आंख खराब थी। उसको पढ़ने में रुचि थी। इसलिए वह एक आंख से ही पुस्तके पड़ा करता था। डॉक्टर ने दूसरी आंख खराब होने की आशंका जताई, परिवार वालों ने जब पढ़ाई करने से रोका, तो उसने दृढ़ होकर जवाब दिया, मैं पढ़ना लिखना तब छोडूंगा, जब मुझे कोई ना कोई प्रतिदिन पुस्तक पढ़कर सुनाता रहेगा और मुझे बीमार नहीं समझेगा ।परिवार वाले बच्चे की इस बात पर सहमत हो गए। उसने न सिर्फ अपनी दृढ़  इच्छा शक्ति से अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि अनेक पुस्तकें भी लिखी। वह अपने विचार दूसरों से लिखवाता था। उसकी पुस्तकों में जीवन को हर हाल में सकारात्मक नजरिये वआनंदमय तरीके से जीने के तरीके सहज रूप से बताए गए हैं। वह बच्चा कोई और नहीं बल्कि फ्रांस के प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यांपाल सात्रृ थे।

महान दार्शनिक अरविंदो कहते हैं -यदि मन को सकारात्मक रखा जाए तो किसी भी बीमारी को न सिर्फ नियंत्रित किया जा सकता है, बल्कि उसे पराजित भी किया जा सकता है। अगर हम नकारात्मक विचारों से अपने मन को भरते  रहेंगे, तो हमेशा बीमारी  और बहानेबाजी की बातें ही सोचते रहेंगे। हमें अपने मन को इस तरह कर लेना चाहिए, जो सिर्फ अच्छे और सकारात्मक विचारों के मोती ही चुने। हमें  अपने मन पर कंट्रोल होना चाहिए। हम जैसे कंप्यूटर को कमांड देते हैं और वो हमारी कमांड को फॉलो करता है। ऐसे ही हमारा ब्रेन एक कंप्यूटर है जिसे हमें कमांड देनी है और वो हमारी इच्छा से काम करने लगता है। लेकिन कमांड देने से पहले हमारे ब्रेन में दृढ़ इच्छाशक्ति का होना बहुत ही आवश्यक है। अगर डॉक्टर और परिवार वालों के कहने पर ज्यांपाल सात्रृ पढ़ाई छोड़ देता तो वह कभी भी एक फेमस राइटर नहीं बन सकता था। ये उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम ही था। मनोवैज्ञानिक आरती आनंद कहती हैं -कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से बीमारी को भगाने की सोच ले तो वह छोटी-छोटी बीमारी क्या, कभी जानलेवा बीमारी की चपेट में भी नहीं आएगा। अगर आप किसी कारणवश बीमार पड़ते हैं, तो दवा के साथ- साथ  संतुलित खान-पान, सकारात्मक विचार, मुस्कुराहट और परिवार का सहयोग लेकर और देकर अपने जीवन को स्वस्थ और सुंदर बना सकते हैं।

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