127. ईश्वर कहां है

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्नों में एक यह है कि— ईश्वर कहां है? वास्तविकता क्या है? ईश्वर सच में है भी या सिर्फ कल्पना है। विज्ञान ने आज बहुत तरक्की कर ली है। हमारे पास अंतरिक्ष का पता लगाने के लिए शक्तिशाली दूरबीन और स्पेसशिप हैं। माइक्रोस्कोप के द्वारा छोटे से छोटे कण भी देखे जा सकते हैं। फिर भी विज्ञान इस बात का पता नहीं लगा सका कि ब्रह्मांड में ईश्वर कहां है। सच्चाई तो यही है कि ईश्वर हमारे अंदर विराजमान है। साधु संत और महापुरुष सदियों से यही कह रहे हैं। उन्होंने ध्यान साधना के द्वारा समाधि की अतल गहराइयों में जाकर ईश्वर को अपने भीतर ही खोजा है।

ध्यान साधना को बहुत से मनुष्य केवल शरीर और दिमाग को आराम देने का एक तरीका मानते हैं, लेकिन वास्तविकता में ध्यान साधना के द्वारा हम इस प्रश्न का उत्तर भी प्राप्त कर लेते हैं कि मृत्यु के बाद हमारे साथ क्या होता है? क्या इस जीवन के बाद भी कोई जीवन है? ऐसे अनेकों प्रश्न हैं, जिनका समाधान केवल ध्यान साधना के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

ध्यान साधना सरल है। हम केवल बैठने के लिए एक शांत और आरामदायक जगह ढूंढे। जहां हमारा मन और शरीर स्थिर हो सके। प्रायः देखने सुनने में आता है और लोगों की ऐसी मान्यताएं भी बनी हुई हैं कि ईश्वर की पूजा, भक्ति, ध्यान, उपासना मंदिर में होती है। किसी पहाड़ विशेष पर होती है। नदी के किनारे होती है। जंगल में होती है। इन्हीं स्थानों पर ध्यान लगाया जा सकता है। साधना की जा सकती है। सामान्य स्थानों में नहीं हो सकती। लेकिन यह ठीक नहीं है। ईश्वर की उपासना के लिए स्थान का इतना महत्व नहीं है, जितना कि मन की एकाग्रता, ईश्वर के प्रति समर्पण, प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा का है। हां इतना अवश्य है कि स्थान शांत होना चाहिए। अगर शांत होगा, एकांत होगा, रमणीय होगा स्वच्छ होगा, कोलाहल से रहित होगा तो वहां पर ध्यान लगाने में कोई असुविधा नहीं होगी।

यदि मन पर नियंत्रण हो, ईश्वर के प्रति रुचि हो, प्रेम हो और प्राणायाम के माध्यम से विधिवत् मन को रोककर, मंत्रों के माध्यम से ध्यान लगाया जाए तो ध्यान कहीं पर भी लग सकता है। घर से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। घर में ध्यान लग सकता है। किसी कमरे में लग सकता है। किसी भी बिस्तर पर लग सकता है। कुर्सी पर बैठकर भी आराम से ध्यान लगा सकते हो।

पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण किसी भी दिशा में बैठकर ईश्वर का ध्यान कर सकते हैं। जिधर से शुद्ध वायु आती हो, सूर्य उदय होता हुआ अस्त होता हुआ दिखाई देता हो, पानी हो, समुद्र हो, नदी हो, तालाब हो, झरना हो तो ऐसी परिस्थितियों का मन की प्रसन्नता और एकाग्रता पर प्रभाव पड़ता है, लेकिन यह सब बातें भी गोण प्रतीत होती हैं। यदि ईश्वर में ध्यान करने की रुचि है, प्रेम है तो इन सबका कोई महत्व नहीं है क्योंकि ध्यान आंख बंद करके होता है और आंख बंद करने के उपरांत हम कहां बैठे हैं, किस दिशा में बैठे हैं, किस स्थान पर बैठे हैं, इसके विस्मृति हो जाती है।

मन के विषय में प्रायः हम ऐसा सोचते हैं कि मेरा मन तो रुकता ही नहीं। मन में अनेक प्रकार के विचार आते रहते हैं और जितना मैं इन्हें रोकने का प्रयत्न करता हूं उतने ही अधिक विचार आने लगते हैं। लेकिन यह सब सच नहीं है। सच्चाई तो यही है कि मन की डोर हमारे अंदर विराजमान जीवात्मा के हाथ में है। अज्ञानता के कारण ही मनुष्य मन को ही विचार उत्पन्न करने वाला मान लेता है।

आध्यात्मिक जगत् में हम ईश्वर के किसी भी नाम को या किसी मंत्र को मानसिक रूप से दोहराते रहते हैं ताकि मन के विचारों से हमारा ध्यान न भटके। अभ्यास करने से धीरे-धीरे हमारी आत्मा को एक अध्यात्मिक अनुभव होने लगता है जो हमें ईश्वर की खोज की तरफ ले जाता है। धीरे-धीरे हम ध्यान अभ्यास के द्वारा आध्यात्म की गहराइयों में चले जाते हैं। जहां पर हमें यह पता लगेगा कि ईश्वर कहां है और हम सृष्टि के सबसे बड़े रहस्य को सुलझा सकते हैं। सभी संतो ने मानव शरीर को हरी मंदिर कहा है, जिसमें सृष्टिकर्ता ईश्वर निवास करते हैं क्योंकि आत्मा परमात्मा का ही अंश है और प्रत्येक जीव के अंदर परमात्मा विराजमान रहता है।

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