128. धर्म का स्वरूप

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

धर्म मंगलमय जीवन का आधार है। धर्म के पथ पर चलकर ही मनुष्य अपने जीवन को संवार सकता है क्योंकि मनुष्य प्रकृति की सबसे अद्वितीय, विशिष्ट एवं अनमोल कृति है। प्रकृति ने मनुष्यों को तरह-तरह के संसाधनों से सुसज्जित किया है। प्रकृति ने सिर्फ हमें ही नहीं अपितु अन्य जीव-जंतुओं को भी बनाया है किंतु उसने अन्य जीवो से थोड़ा- सा अधिक महत्व मनुष्य को दिया है। उसने हमें चिंतनशील एवं कल्पनाशील अत्यंत विकसित मस्तिष्क दिया है। जिससे मनुष्य धर्म की मर्यादा में रहकर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।

धर्म पुरुषार्थ सिद्धि का प्रथम और अंतिम सोपान है। यह जीवन रूपी नदी के दो किनारों की तरह है जो मनुष्य को मर्यादा में बांधकर रखता है। जो मनुष्य धर्म की मर्यादा में रहकर जीवन निर्वाह करता है, वही जीवन में सफलता के उच्चतम शिखर तक पहुंचता है। अधर्म के रास्ते से थोड़ी बहुत सफलता तो अवश्य प्राप्त की जा सकती है लेकिन वह स्थाई नहीं होती। जबकि धर्म दुर्गम जीवन पथ पर इंद्रिय रूपी अनियंत्रित अश्वों को नियंत्रित करने के लिए पवित्र बंधन है।

देखा जाए तो धर्म धन और मान के मद में चूर हुए मनुष्य के लिए नैतिक व सामाजिक मूल्यों का आवश्यक अंकुश भी है। जीवन की लंबी यात्रा को सुगम बनाने के लिए सुरुचिपूर्ण पथ है। यह मानवता के पथ का संवाहक बन कर एक सभ्य समाज का निर्माण करता है। यदि स्वार्थवश लोगों ने धर्म को आधार बनाकर गलत परंपराओं का पोषण किया तो इसमें धर्म का क्या दोष है?

धर्म ही इस संसार को धारण करता है। धर्म के कारण ही यह संसार अब तक टिका हुआ है, वरना अधर्मी समाज को नष्ट होने में एक पल भी नहीं लगता।
महाभारत में भी कहा गया है कि— धर्म वह है जो समाज को धारण करे।
ग्रंथों और शास्त्रों में ऋषियों में अपने- अपने अनुसार धर्म का स्वरूप बताया है। किसी ने सदाचार को सबसे बड़ा धर्म कहा है तो किसी ने सत्य को। किसी ने अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म माना है।
तुलसीदास कहते हैं— परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है। इन सब से यही निष्कर्ष निकलता है कि सत्य, अहिंसा त्याग, दया, करुणा, ममता, क्षमा, परोपकार और सदाचार से बड़ा कोई धर्म नहीं है। धर्म का पोषण इन्हीं से होता है।

जब मनुष्य अपने जीवन में इन्हें आधार बनाकर आचरण करता है तब ना केवल धर्म का बल्कि समाज और देश का भी पोषण होता है। हम चाहे जिस भी धर्म में आस्था रखते हों, उसी कड़ी में अगर मानव धर्म को समावेशित कर लें तो अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा- सा समय और थोड़ा-सा धन जनकल्याणकारी गतिविधियों में व्यय कर सकते हैं। यह मनुष्य का धर्म की दिशा में एक बहुत बड़ा सकारात्मक कदम होगा।

हम सब मिलकर धीरे-धीरे जनमानस तक धर्म का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। धर्म मनुष्य के अंतः करण में होना चाहिए क्योंकि धर्म जब मनुष्य के अंतःकरण में स्थापित होगा, तभी उसके व्यवहार और उसके कार्य में धार्मिक आचरण के झलक प्रतीत होगी। इसलिए धर्म बाहरी आडंबर का नहीं अपितु आंतरिक आचरण का विषय है।जिस प्रकार अलग-अलग रंग वाली गायों का दूध एक ही रंग का होता है, उसी प्रकार सभी धर्मों का मूल स्वरूप और स्वभाव भी एक ही है।

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