13. मानवीय जीवन का मूल्य

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मानवीय जीवन का मूल्य अनमोल है। इसके मूल्य की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। फिर भी हम पता नहीं क्यों इस अनमोल मानवीय शरीर को बर्बाद करने पर लगे हुए हैं। आज हर कोई परेशान है और अपने जीवन को बर्बाद करने पर या अपनी जीवन – लीला खत्म करने पर लगा हुआ है । वह यह भूल जाता है कि बड़ी मुश्किल से ये मानव शरीर मिला है। क्यों ना हम अच्छे कर्मों से अपने जीवन को सफल बनाएं और देश के निर्माण में सहयोग करें। क्योंकि अगर हर व्यक्ति अपनी सोच को सकारात्मक रखें तो वह उन्नति की ओर अग्रसर होता है। इससे समाज में सकारात्मक  विचारों का विकास होता है और मनुष्य अपने आसपास के वातावरण को सुगंधित करता है। लेकिन आज हम जहां निवास करते हैं, वहां हर व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है। उसको पता ही नहीं की वह क्या कर रहा है? कहां जा रहा है? खाना खाते हुए भी वह कहीं और होता है।

मैं एक उदाहरण से आप को समझाने की कोशिश करती हूं – एक शख्स अपने घर की चोथी मंजिल की छत पर घूम रहा था। जमीन से किसी व्यक्ति ने पुकारा – अरे श्याम लाल तेरी लड़की का एक्सीडेंट हो गया है। उसने बगैर सोचे -समझे छत से छलांग लगा दी। जब वह गिरता हुआ तीसरी मंजिल पर पहुंचा तो उसे याद आया कि उसकी कोई लड़की है ही नहीं। जब वह दूसरे मंजिल पर आया तो उसको याद आया कि उसकी शादी ही नहीं हुई और जब वह जमीन पर गिरने लगा तो उसे याद आया कि उसका नाम भी श्यामलाल नहीं है। यह है हमारे समाज में रहने वाले मनुष्यों का हाल। वे यह भूल जाते हैं – कि यह मानव जीवन कितनी योनियों में जन्म लेने के बाद बड़ी मुश्किल से नसीब होता है।

गुरु नानक देव जी ने मानव जीवन के मूल्य को बड़ी सरल व स्पष्ट भाषा में समझाया है – एक बार की बात है – एक व्यक्ति हताश और निराश होकर बार-बार गुरुजी के पास आता और उनसे मानवीय जीवन के मूल्य के बारे में पूछता। गुरुजी ने उनको बड़ी सरल भाषा में समझाया। लेकिन वह इतना परेशान था, कि कुछ समझना ही नहीं चाहता था।  फिर गुरु जी ने उन्हें एक सुर्ख लाल रंग की रूबी दी और उसको कहा मार्केट में जाकर इसके मूल्य का पता करके आना, ध्यान रहे कि उसने सिर्फ मूल्य का पता करना है इसको बेचना नहीं है। वह व्यक्ति उस कीमती रूबी को लेकर चल पड़ा लेकिन उसके लिए तो वह एक मामूली लाल रंग का पत्थर था। इसलिए वह एक आलू के व्यापारी के पास गया और उसका मूल्य पूछा। व्यापारी ने रूबी को देखा और बोला यह पत्थर मेरे किस काम का है, फिर भी यह देखने में सुंदर लग रहा है इसलिए एक बोरी आलू ले जाओ। उस व्यक्ति ने कहा- नहीं, बेचना नहीं है, सिर्फ इसकी कीमत पता करनी थी। फिर वह फल के व्यापारी के पास गया और उससे भी रूबी की कीमत जाननी चाही। उसने भी उसे हाथ में लेकर देखा और बोला यह बहुत सुंदर पत्थर है। मैं ज्यादा से ज्यादा एक पेटी संतरे दे सकता हूं। फिर उस व्यक्ति ने कहा – नहीं गुरु जी ने कहा है – कि बेचना नहीं है। फिर वह व्यक्ति सुनार के पास गया और सुनार को भी रूबी को दिखाया। सुनार को पत्थरों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी थी। इसलिए उसने उसे मलमल के कपड़े में रखा और अच्छी तरह जांचा परखा। फिर उस व्यक्ति से उसके मूल्य के बारे में पूछा। सुनार ने कहा इसकी सही कीमत तो मैं नहीं जानता लेकिन यह बहुत महंगी है। तुम जो भी मांगोगे, उतना ही दाम में तुम को दे दूंगा। वह व्यक्ति सोच में पड़ गया  कि इतना महंगा पत्थर गुरुजी ने मुझको क्यों दिया ।फिर उस व्यक्ति ने सुनार से पूछा कि इसकी असली कीमत कौन बताएगा। तो सुनार ने उसको जोहरी के पास भेज दिया। वह जोहरी के पास गया और उसने उस कीमती रूबी को दिखाया। जोहरी ने जैसे ही उस व्यक्ति के हाथ में उस सुर्ख लाल रंग की रूबी को देखा तो वह हैरान रह गया कि – इतनी बेशकीमती रूबी इस व्यक्ति के पास कैसे आई। उस व्यक्ति ने उस जोहरी  से गुरु जी की बात बताई और उसका मूल्य पूछा। उस जोहरी ने उसे मलमल के कपड़े से साफ किया और लाल रंग का कपड़ा बिछाया। फिर उस बेशकीमती पत्थर को उसके ऊपर रखा और नतमस्तक होकर उस को प्रणाम किया। वह व्यक्ति यह सब कुछ देख कर बड़ा हैरान हो रहा था – कि यह सब क्या हो रहा है? प्रणाम करने के बाद उस जोहरी ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और बोला तू इसकी कीमत पूछ रहा है। तुझे पता भी है कि यह क्या हैॽ यह बेशकीमती है। इसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता। इस हीरे पर तो सारी दुनिया की दौलत कुर्बान है। इसका मूल्य कोई नहीं लगा सकता यह इतनी बेशकीमती है – कि किसी के पास इसको खरीदने की हैसियत नहीं है। उस व्यक्ति ने उस लाल रंग की रूबी को मलमल के कपड़े में लपेटा और बड़ी सावधानी से लाकर गुरु जी के चरणो में बैठ गया। जो व्यक्ति अब तक  इसे एक मामूली सा पत्थर समझ कर सबको दिखाता घूम रहा था। अब उसकी सुरक्षा की चिंता भी उसे सता रही थी। उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि, उसको काटो तो मानो उसमें खून नहीं है। उसका गला सूख गया था। उसकी आवाज में कंपन था और उसका पूरा शरीर एक सूखे हुए पत्ते की तरह कांप रहा था।  गुरुजी ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और फिर बोले कितना मूल्य है इसका पता कर लिया। उस व्यक्ति ने सारी बात बता दी, फिर गुरुजी ने बड़े प्यार से समझाया, जैसे यह हीरा बेशकीमती है, वैसे ही यह मानव शरीर बेशकीमती है। अब तुम चाहो तो इसे एक बोरी आलू के भाव बेच दो, चाहे एक पेटी संतरो के भाव बेच दो, यह तुम्हारे हाथ में है। इस मानव शरीर की असली परख तो एक पारखी ही कर सकता है। अतः हर व्यक्ति को अपने जीवन का मूल्य समझते हुए, इसे अपने देश, समाज, परिवार इन सब की उन्नति में लगाना चाहिए। फिर देखना देखते ही देखते हमारे देश की तस्वीर क्या होगी।

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