134. स्वास्तिक

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज मैं आपको हिंदू धर्म में प्रचलित चिन्ह स्वास्तिक के बारे में बताना चाहती हूं। स्वास्तिक हिंदू धर्म में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है । अगर यह कहा जाए कि स्वास्तिक हिंदू धर्म का आधार स्तंभ है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
स्वास्तिक का शाब्दिक अर्थ होता है -शुभ हो, मंगलकारी हो। स्वास्तिक को साथिया या सतिया भी कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही मंगल प्रतीक माना जाता है। स्वास्तिक एक ऐसी सत्ता, जहां केवल कल्याण एवं मंगल की भावना ही निहित हो, जहां सभी के लिए शुभ भावना सन्निहित हो। यह देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगल कामनाएं, इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतीक होने के कारण भारतीय पुरातन संस्कृति में अपना विलक्षण स्थान रखता है। विश्व की सभी सभ्यताओं एवं धर्मों में स्वास्तिक का सौभाग्य, कल्याण, शुभता, पवित्रता, सकारात्मकता और मांगलिक कार्य के प्रतीक रूप में उल्लेख मिलता है।

सिंबॉलिज्म ऑफ द ईस्ट एंड वेस्ट नामक ग्रंथ में प्रतिपादित किया गया है कि– वैदिक प्रतीकों में गहन, गंभीर एवं गूढ अर्थ निहित हैैं। यही प्रतीक संसार के विभिन्न धर्मों में भिन्न-भिन्न ढंग से परिलक्षित होते हैं तथा देश-काल, परिस्थिति के अनुरूप, इनके स्वरूपों में रूपांतर एवं परिवर्तन होता रहता है। अत: स्वास्तिक प्रतिक की गति- प्रगति की एक अत्यंत समृद्ध परंपरा है। हम जहां भी स्वास्तिक को देखते हैं, वहां हमारे मन में धन, प्रेम, कल्याण, उल्लास, सुख, सौभाग्य एवं संपन्नता के भाव सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। स्वास्तिक एक ऐसा चिन्ह है, जिसे विश्व के ज्यादातर मानव पसंद करते हैं। यह केवल हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि बौद्ध, जैन, पारसी और दुनिया के दूसरे देशों में भी अपना स्थान बनाए हुए है।

पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि – यदि आप कोई भी कार्य निर्विघ्न रुप से संपन्न करना चाहते हैं तो कार्य का प्रारंभ मंगलाचरण से होना चाहिए। यह सदियों पुरानी भारतीय परिपाटी है और हमारे मनीषियों द्वारा सत्यापित की गई है।

प्राचीन काल में ऋषि-मुनि किसी भी कार्य को करने से पहले उस कार्य से संबंधित मंगल श्लोकों की रचना कर मंगलाचरण लिखते थे और जब वह कार्य शुरू करते उससे पहले उन श्लोकों का उच्चारण करके एक पॉजिटिव उर्जा उत्पन्न करते थे, जिससे उस कार्यस्थल पर एक सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बन जाए। लेकिन हमारे जैसे आम मनुष्यों के लिए ऐसे श्लोकों की रचना कर पाना और फिर उनका उच्चारण करना असंभव था। इसलिए हमारे ऋषियों के मन में एक ऐसे चिन्ह का निर्माण करने का विचार सूझा, जिससे आने वाले युगों में मानव-मात्र और विश्व के कल्याण के विकास के लिए वरदान के रूप में दे सकें, जिससे वे कोई भी कार्य प्रारंभ करने से पूर्व, उस चिन्ह के प्रयोग मात्र से, अपना कार्य निर्विघ्न रुप से संपन्न कर सकें।सृष्टि की स्थापना करते समय हमारे वैदिक ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर कुछ विशेष मंगल भावों को प्रकट करने वाले और हमारे जीवन को खुशियों से सराबोर करने वाले प्रतीकों का सृजन किया, जिनमें से एक है -स्वास्तिक। स्वास्तिक अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल प्रतीक माना जाता रहा है।

स्वास्तिक शुभ प्रतीक के रूप में अनादिकाल से विद्यमान होकर संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। सभ्यता और संस्कृति के पुरातन लेख, वेद और पुराण ही हैं और हमारे मनीषियों ने उनमें स्वास्तिक का प्रयोग किया है ।यह मानव समाज एवं विश्व के कल्याण की भावना का प्रतीक है। इसे शुभकामना, शुभभावना, कुशलक्षेम, आशीर्वाद, पुण्य-पाप, प्रक्षालन तथा दान स्वीकार करने के रूप में भी प्रयोग, उपयोग किया जाता है। स्वास्तिक में अतिगूढ़ अर्थ और रहस्य छिपा हुआ है। स्वास्तिक किसी जाति या किसी व्यक्ति के कल्याण के लिए प्रयुक्त नहीं होता बल्कि इसमें तो सारे विश्व के कल्याण की भावना समाई हुई है। स्वास्तिक सबके कल्याण का प्रतीक है। स्वास्तिक विभिन्न रूपों में और विभिन्न अर्थों में प्रयोग होता है। इसे प्रजनन प्रतीक, उर्वरता प्रतीक, पुरातन व्यापारिक चिन्ह, अग्नि, विद्युत, जल आदि का सांकेतिक स्वरूप, ज्योतिष प्रतीक आदि अनेक रूपों में माना गया है। स्वास्तिक में सद्भावना, सद्ज्ञान व सद्विचार का मिश्रित रूप है। इसमें वैयक्तिक विकास व विस्तार के साथ ही समाज की प्रगति एवं विश्व कल्याण की अनंत संभावनाएं सन्निहित है। इसलिए हमारी यह धार्मिक मान्यता है कि- किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वास्तिक चिन्ह को अंकित करके उसका पूजन किया जाता है।

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