136. स्वास्तिक का पौराणिक महत्त्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भारतीय संस्कृति में स्वास्तिक का पौराणिक महत्व—

*   स्वास्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है। यह चार रेखाएं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं की ओर संकेत करती हैं। ऐसी मान्यता है।                    

हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह चार रेखाएं, चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं।
*   कुछ का मानना है कि यह चार रेखाएं, सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं।
*   पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चार रेखाएं, चार पुरुषार्थ– (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चार आश्रम–( ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास )चार युग –(सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग )चार लोक–(भू लोक, पाताल लोक, स्वर्ग लोक और नरक लोक )और चार देवों–( ब्रह्मा, विष्णु, महेश और गणेश ) का प्रतिनिधित्व करती हैं।
*   ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है।
*   सिद्धांत सार ग्रंथ में इसे विश्व ब्रह्मांड का प्रतीक चित्र माना गया है।
*   स्वास्तिक की चार रेखाओं को जोड़ने के पश्चात् मध्य में बने बिंदु को भी विभिन्न मान्यताओं द्वारा परिभाषित किया गया है। उनका मानना है कि — यदि स्वास्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के समान माना गया है तो उसके मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं।
*   स्वास्तिक की चार रेखाएं एक घड़ी की दिशा में चलती हैं जो संसार के सही दिशा में चलने का प्रतीक हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार अगर स्वास्तिक के आसपास एक गोलाकार रेखा खींच दी जाए तो यह सूर्य भगवान की ओर इंगित करता है। सूर्य जो एक आग का गोला है और समस्त संसार को रोशनी प्रदान करता है।
*   स्वास्तिक की चारों भुजाओं से धर्म के सिद्धांतों का बोध होता है। इससे चारों दिशाओं में भगवान का दर्शन  एक समान होने से पक्षपात का भय नहीं रहता।
*   वैदिक धर्म में स्वास्तिक को भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। स्वास्तिक की चारों रेखाओं से विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की प्रतिमा उभरती है। श्री गणेश जी के सुडं, हाथ, पैर, सिर आदि अंग इस तरह से चित्रित होते हैं कि यह स्वास्तिक की चार भुजाओं के रूप में प्रतीत होते हैं।
*   ॐ को भी स्वास्तिक का प्रतीक माना जाता है। ॐ ही सृष्टि के सर्जन का मूल है। इसमें शक्ति, सामर्थ्य एवं प्राण सन्निहित हैं। ईश्वर के नामों में सबसे पहला स्थान ॐ का है। अतः स्वास्तिक ऐसा प्रतीक है जो सर्वोपरि है।
*   ऐसी मान्यता है कि — स्वास्तिक में भगवान गणेश और नारद की शक्तियां निहित हैं। स्वास्तिक को भगवान विष्णु और सूर्य का आसन माना जाता है। स्वास्तिक का बांया हिस्सा गणेश की शक्ति का स्थान होता है।
*   स्वास्तिक की चार बिंदियों में गोरी, पृथ्वी, कच्छप और अनंत देवताओं का वास होता है।
*   स्वास्तिक की खड़ी रेखा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है और आड़ी रेखा सृष्टि के विस्तार का प्रतीक है।
*   स्वास्तिक की संरचना गणित के धन चिन्ह यानी जोड़/ योग को दर्शाती है। इस तरह यह जोड़ या योग का प्रतीक भी माना जाता है।
*   स्वास्तिक 27 नक्षत्रों को संतुलित करके सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। यह चिन्ह नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलवाता है।
*   वैज्ञानिक हॉर्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटीना नामक यंत्र द्वारा कुमकुम से अंकित स्वास्तिक की सकारात्मक उर्जा को 100000 बोवीस यूनिट में मापा है। इस शोध के अनुसार ॐ जिसकी पॉजिटिव ऊर्जा तकरीबन 70000 बोवीस है से भी अधिक सकारात्मक उर्जा स्वास्तिक में  विद्यमान है।











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