14. विचारों की शक्ति

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

किसी भी मनुष्य की जिंदगी में उसके विचारों का बहुत महत्व है। विचारों से ही मनुष्य के व्यक्तित्व का पता चलता है। सकारात्मक सोच ही मनुष्य की जिंदगी को खूबसूरत बनाती है। जिस व्यक्ति की सोच सकारात्मक है, वह अपने आसपास के वातावरण को सुगंधित फूलों की तरह महका देता है। हंस की तरह हमें भी अपने जीवन के लिए सकारात्मक विचारों के मोती ही चुनने चाहिए। सकारात्मक विचारों के कारण व्यक्ति वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है, जो वह सोच भी नहीं सकता। इसका एक उदाहरण ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल हैं, जो एक इतिहासकार, साहित्यकार और एक कलाकार भी थे।वह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। एक बार उन्हें हाथ में लकवा मार गया। शुरुआत में उन्हें थोड़ी बहुत चिंता हुई, लेकिन बाद में उन्होंने अपने मन में असीम उत्साह का संचार करते हुए इसे ठीक करने का एक उपाय निकाल लिया। उपचार के साथ-साथ वे प्रतिदिन अपने हाथ को बार-बार आदेश देते हुए कहते तुम्हें ठीक होना है। इस बात का उसके हाथ पर जबरदस्त असर हुआ और वह ठीक हो गया।

दरअसल हमारे मन पर विचारों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। आप जैसी सोच रखते हैं उसी के अनुरूप आपका शरीर और हाव-भाव भी काम करते हैं। यदि आप खुद को हमेशा बीमार घोषित करते रहते हैं या घर ऑफिस में हमेशा बुझे बुझे से रहते हैं तो, ऐसे भाव न सिर्फ आप की कार्य क्षमता को प्रभावित करते हैं बल्कि जाने – अनजाने अपने इर्द-गिर्द नकारात्मक भाव का संचार भी करते रहते हैं। इससे दूसरे लोग भी प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर यदि आप सुबह की शुरुआत मन में सकारात्मक भावों से करते हैं, तो कोई भी बीमारी या नकारात्मक भाव आपके आसपास नहीं फटकता। यदि आप बीमारी की चपेट में आते भी हैं, तो आपकी इच्छा शक्ति उसे जल्द ठीक कर देती है। एन. के. भाटिया हमेशा बिस्तर पर पड़े रहते हैं। जब भी कोई उनसे कुशल- क्षेम पूछता है, तो उनका सिर्फ एक ही जवाब होता है – मैं तो बीमार हूं। थोड़ी बहुत तकलीफ होने पर भी वे इतने बेचैन हो जाते हैं, कि उनको संभालना बड़ा मुश्किल होता है। वह अपने साथ साथ घर के प्रत्येक सदस्य को परेशान कर देता है ।डॉक्टर जब उनका परीक्षण करते हैं, तो उनको शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ पाते हैं। यह सिर्फ उनके नकारात्मक विचारों का ही प्रभाव है, कि वे हमेशा बीमार ही बने रहते हैं

हम बीमार नहीं होते, बल्कि हमारा मन बीमार होता है,भाव बीमार होते हैं।

ओशो

अगर कोई व्यक्ति पेट दर्द की शिकायत कर रहा हो और बिस्तर पर पड़ा हो, तभी दूसरा व्यक्ति  यदि उसके बिस्तर पर सांप होने का शोर मचाए, तो लेटा हुआ व्यक्ति तुरंत उठ कर भाग जाएगा। पेट दर्द की बात वह उस क्षण बिल्कुल भूल जाएगा। अगर हम हमेशा खुश रहने की कोशिश करें और नकारात्मक विचारों को मन में न बैठने दें, तो हम जल्दी बीमार नहीं पड सकते।

बीमारी के बहाने बिस्तर पर पड़े रहने की बजाय हमें अपने मस्तिष्क को अच्छे विचारों से भरना चाहिए।

सवामी विवेकानंद

क्योंकि हम जैसा सोचते हैं ,वैसे ही बनते चले जाते हैं। हमारी नकारात्मक सोच हमें सभी संबंधों से दूर कर देती है, और हम अकेले पड़ जाते हैं। जबकि सकारात्मकता हमें जिन रिश्तो से जोड़ती है, वे हमारे जीवन को महका देते हैं। जब हम कोई भी काम अच्छे मन से करते हैं, तो उसका फल अच्छा होता है।जबकि दूसरी तरफ जब हम कोई काम बुरे मन से करते हैं, तो उसका फल बुरा होता है। सकारात्मक होकर जब हम रिश्तो के तार दूसरों से जोड़ते हैं, तो उसका सकारात्मक असर होता है, जो हमारे जीवन को महका देता है। जो व्यक्ति अपने अहम और अपनी श्रेष्ठता का गुलाम होता है। वह एक दिन इस संसार में अकेला रह जाता है। दुनिया के किसी भी तानाशाह की कहानी पढ़ लीजिए, उसकी जवानी चाहे जितनी हसीन रही हो, बुढापा बहुत तन्हा रहा है। अकेलेपन का दंश बेहद दुखद होता है। अपने टूटते रिश्तो को अगर आपने आज नहीं जोड़ा तो देर हो जाएगी। जोड़ लीजिए उन सब से अपने रिश्तो के तार, जिनसे आपने अपनी नकारात्मक ऊर्जा के कारण टूटने दिया। हमारे विचारों में जितनी सकारात्मकता होगी, हमारे आस-पास का वातावरण, रिश्ते, दोस्त सब सकारात्मकता से ओत-प्रोत होंगे।

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