15. सफलता और विफलता

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

दरअसल सफलता और विफलता जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। सही मायने में जीवन संघर्ष और विजय का फलसफा है। कोई जरूरी नहीं आपका हर प्रयास सफल ही हो, लेकिन यह भी सच है कि- कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। अगर किसी काम में सफल न भी हुए तो क्या -कम से कम अनुभव तो प्राप्त हो जाता है। जो बहुत बड़ी सीख का कारण बनता है। अगर हम असफल होने के डर से कुछ करेंगे ही नहीं, तो सफलता कहां से मिलेगी। अक्सर आदमी संघर्ष के रास्ते में उस वक्त भटक जाता है, जब वह मंजिल के करीब होता है। इसका प्रमुख कारण है कि वह अपनी कोशिश, सफलता और विफलता की तुलना दूसरों से करने लगता है। उसके मन में अपने पूर्वजों के मान- अपमान की गाथाएं और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह ठीक से न करने की भावनाएं प्रफुल्लित होती हैं। वह निराशा रूपी अंधकार से ग्रसित हो जाता है। उसको यह बात सताने लगती है कि – वह विफल हो गया तो मेरे पूर्वजों का, मेरे खानदान का, हमारी कुल परंपरा का नाम मिट्टी में मिल जाएगा। यह स्वाभाविक तौर पर हर मनुष्य सोचता रहता है। लेकिन कहीं ना कहीं हम वर्षों तक अंधकार में रहे हैं। यह अंधकार है- स्पष्ट लक्ष्य के न होने का। जब तक प्रकाश पुंज के रूप में सामने कोई लक्ष्य नहीं होता है, तब तक मनुष्य अंधेरे में हाथ-पांव मारता रहता है। विरासत, परंपरा, मान -सम्मान, यश -कीर्ति ये ही वे लक्ष्य हैं, जिन्हें मनुष्य पाना चाहता है, बल्कि इसके भी पार जाना चाहता है। बेहतर बनने और बनाने के लिए श्रेष्ठता चाहता है। लेकिन उसके लिए निराशा को दूर करना पड़ेगा और विफलता से मित्रता करनी पड़ेगी।

पूर्वजों के महानतम कार्यों में विश्वास जगाने और गलतियों को सुधारने की जिम्मेदारी भी हमारी है। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से विचार-विमर्श करके ही किसी काम की शुरुआत की जा सकती है। हम अपने जीवन और जीवन शैली दोनों में सकारात्मक परिवर्तन लाकर ही सफलता का स्वाद चख सकते हैं। आम तौर पर हम यह मानते हैं कि -हमारी नियति में जो लिखा है, उसके अनुरूप ही हमें सफलता मिलेगी, जबकि कर्म के माध्यम से उत्तम लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। विषम परिस्थितियों में भी हम स्वंय पर विश्वास बनाए रखें। हमें मुश्किलों को एक अवसर की तरह लेना चाहिए और हर चुनौती का सामना डट कर करना चाहिए। आज के समय में खुद को खुश रखने, उपयोगी बनाने और निराशा को मात देने के लिए जरूरी है कि -आप अपने काम को बेहतर तरीके से करें। जिम्मेदारियां लें और उसे शिद्दत से निभाएं ।

घर, ऑफिस या समाज, आप कहीं भी हो, खुद को दायरे में न बांधे। जो सही लगता हो और आप जो कर सकते हों जरूर करें। कुछ दिनों तक लोग आपके काम की व्याख्या अलग-अलग तरीके से करेंगे। लेकिन जब उन्हें आपकी क्षमता का एहसास होगा, तो वह आपका सम्मान करने लगेंगे। किसी भी काम के तुरंत परिणाम की उम्मीद ना करें। कई बार किसी काम में लंबा समय लग जाता है। समय-समय पर खुद का और अपने काम का आकलन करते रहें। जब कभी कोई दुविधा हो तो परिजनों, मित्रों, व विषय के जानकारों से चर्चा करें। मन में शंका की गुंजाइश कभी न छोड़ें। आपकी इस विशिष्टता पर कुछ दिनों तक कोई गौर न करें, लेकिन यह तय है आपका यह गुण बहुत दिनों तक छिपा भी नहीं रहेगा।

डॉक्टर विनीत कौशिक

इसको मैं एक कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश करती हूं। एक व्यक्ति लॉन्ड्री चलाता था। अपने काम के सिलसिले में उसने एक गधे और कुत्ते को पाल रखा था। गधा ग्राहकों के कपड़ों को नदी तक पहुंचाता और ले आता, तो कुत्ता घर की रखवाली करता। गधा कारोबार का हिस्सा था और ज्यादा काम करता था। इसलिए मालिक उसकी ज्यादा चिंता करता था। उसके खानपान पर खास ध्यान देता था। यह बात कुत्ते को बुरी लगती थी। धीरे-धीरे कुत्ते के मन में यह बात बैठ गई की मालिक उसके साथ भेदभाव करता है। वह परेशान रहने लगा। एक रात लांड्री मालिक के घर चोर घुस आए। कुत्ते ने चोरों को देखा लेकिन चुप बैठा रहा। गधे ने कुत्ते को उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाते हुए कहा कि उसे भोकना चाहिए। इस पर कुत्ते ने कहा कि मालिक तुम्हें ज्यादा चाहता है, इसलिए तुमसे जो कुछ भी हो सकता हो तुम करो। मैं नहीं भौंकता। गधे से नहीं रहा गया। वह जोर से ढेंचू -ढेंचू करने लगा। उसकी आवाज सुनकर मालिक की नींद खुल गई और चोर भाग गए। मालिक ने घर में सब कुछ सही सलामत पाया तो उसने गुस्से में गधे की पिटाई कर दी। कुत्ता बहुत खुश हुआ और कहा, जिसका काम उसी को साजे- दूसरा करे तो डंडा बाजे। इसके बाद भी लॉन्ड्री मालिक के यहां कई बार चोरी के प्रयास हुए और गधे ने हर बार ढेंचू-ढेंचू करके चोरों को भगा दिया। लेकिन इनाम की बजाय हर बार उसे पिटाई मिलती और कुत्ता हर बार खुश होकर उसे चिढ़ाता। कुछ दिनों बाद फिर लॉन्ड्री मालिक के घर चोर घुस आए। लेकिन वह चुप रहा। चोर काफी देर तक घर में रुके और सामान समेटकर जाने लगे। तब गधे से नहीं रहा गया। अपने मालिक का नुकसान बचाने के लिए उसने ढेंचू-ढेंचू करना शुरू कर दिया। चोर सामान छोड़कर भाग गए। लांड्री मालिक की नींद खुली और जब उसकी नजर घर के खुले दरवाजे पर पड़ी तो, वह ठिठक गया। बाहर निकल कर देखा तो पास में ही गठरियां दिखाई दी। जिसमें उसके घर का सामान था। लांड्री मालिक सब समझ गया। इस बार पिटाई की बारी कुत्ते की थी। उसने न सिर्फ कुत्ते की पिटाई की बल्कि उसकी जगह दूसरे कुत्ते को पाल  लिया। गधे की मंशा शुरू से ठीक थी। वह काम भी ठीक कर रहा था। लेकिन उसे गलत समझा गया। बाद में उसे सफलता मिली।

हमें सफलता और विफलता से ऊपर उठकर अपने द्वारा खींची गई परिपाटी और घरोंदो से बाहर निकलना होगा। हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो आशा का बोध कराए, शील का संस्कार दे,  शिष्ट मर्यादाओं और आदर्शों की ओर उन्मुख हो। तभी वैचारिक और ऐतिहासिक दीनता से मुक्ति मिलेगी और शिक्षा राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान का उपक्रम बनती नजर आने लगेगी। यह शिक्षा हमें परंपरागत, धार्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों के प्रति सुमुख भी बनाएगी। जिससे हमारा बौद्धिक विकास होगा और हमें सफलता और विफलता का कीड़ा नहीं काटेगा। हम निर्भीक होकर किसी भी कार्य को करने में पीछे नहीं हटेंगे।

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