154. संकट से उबारता है, पारिवारिक संबल

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कोरोना काल से पहले बहुत से लोगों का यह मानना था कि— एकल परिवार ही अच्छा होता है। एकल परिवार में हम अपनी मनमर्जी से कोई भी कार्य कर सकते हैं। अगर परिवार बड़ा हुआ तो सभी की परेशानियां बढ़ जाती हैं क्योंकि ज्यादा लोग एक-दूसरे के कार्य में दखल देने लगते हैं। जिससे घर में अशांति का माहौल बना रहता है। लेकिन कोरोना काल में लोगों को समझ आ गया कि परिवार के क्या मायने हैं? संयुक्त परिवार का क्या महत्व है?

दिन-प्रतिदिन बहुत से कोरोना पॉजिटिव लोगों के विचार सामने आ रहे हैं। जिन्होंने भी कोरोना को मात दी है, उनमें से ज्यादातर का यही कहना है कि— यदि परिवार साथ न होता तो हम कोरोना संक्रमण की भेंट चढ़ गए होते। परिवार ने ही हमें मानसिक और शारीरिक संबल प्रदान किया और अब हम पूरी तरह से ठीक होकर सामान्य जिंदगी की तरफ बढ़ रहे हैं। आज के समय यह सब कुछ सुनना आम बात है। इससे पहले संयुक्त परिवार में सिर्फ कमियां निकाली जाती थी, फायदे के बारे में कोई बात नहीं करना था। लेकिन आज के समय यह धारणा बदल गई है और लोग खुलकर संयुक्त परिवार की तरफ आगे बढ़ने लगे हैं। कोरोना पॉजिटिव लोगों में से बहुत से लोगों का यही कहना है कि— कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी जरूर हुई लेकिन परिवार ने जिस प्राणवायु का संचार किया, वह अद्भुत है। जब कोई भी कोरोना वायरस से पीड़ित के पास फटकना भी नहीं चाहता था, तब परिवार ने अपने सदस्यों को बेहद गंभीरता और प्यार से संभाला। परिणाम सुखद रहा जो कभी अकेले रहते थे, परिवार के साथ रहने की इच्छा प्रकट करते हैं। उनका कहना है कि परिवार एक वट वृक्ष की भांति है। जिससे हमें संकट के समय मानसिक ताकत प्राप्त हुई। उस समय हमें मानसिक शांति और धैर्य की बहुत आवश्यकता थी, जिससे हम स्वयं को सशक्त बना सकें। तब परिवार ने हमें संबल प्रदान किया और हम इस दुख की घड़ी से बाहर निकल पाए।

जिन लोगों ने एकल परिवार को ही तरक्की का पैमाना मान रखा था, आज दुनिया में उलट-पुलट होने और हाहाकार मचने के बाद अब वे लोग भी परिवार में ही सहारा ढूंढ रहे हैं। जब चारों तरफ से जान पर बन आने का खतरा मंडरा रहा हो तो परिवार का साथ ही सहारा बनता है। आज के समय हर कोई यही मान रहा है कि—अगर परिवार का साथ है तो मुश्किल का सामना आसानी से किया जा सकता है। क्योंकि परिवार की जड़े मजबूत होंगी तो मुश्किल से मुश्किल वक्त भी आसानी से निकल जाता है। परिवार की एकजुटता के सामने कोई भी संकट अधिक समय तक नहीं टिक सकता। क्योंकि परिवार वटवृक्ष की भांति अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को जिंदगी की तेज हवाओं के सामने झुकने नहीं देता। आज के समय जिन लोगों ने जिंदगी की जंग लड़ी है, उन सब में परिवार का संबल ही काम आया है। जिन का परिवार साथ था, वे जिंदगी की रेस में जीत गए और जो अकेले थे, वे हार गए।

एक बार की बात है कि—पिता जी पतंग उड़ा रहे थे और बेटा उसे ध्यान से देख रहा था। पतंग आसमान में काफी ऊंचाई तक चली गई थी। एक जगह पर ही दिखाई देने लगी थी।
एक ही जगह पर देखकर बेटे ने अपने पिताजी से कहा— पापा आपने डोर पकड़ रखी है। उसे बांध रखा है इसलिए आसमान में और ज्यादा ऊंचाई पर नहीं जा पा रही।
पिताजी थोड़ा-सा मुस्कुराए और फिर उन्होंने डोर को छोड़ दिया। पतंग थोड़ी-सी और ऊंचाई तक गई लेकिन फिर हिचकोले खाती हुई तेजी से नीचे की ओर गिरने लगी और मैदान में जाकर गिर गई।

पतंग के नीचे गिरने से दुखी और निराश बेटा सोचने लगा की— पतंग की डोर तो आजाद हो गई थी, फिर वह कैसे गिर गई? वह आखिर हिचकोले खाती हुई नीचे क्यों गिर गई?
बेटे को इस प्रकार सोच में पड़ा देखकर पिताजी ने उसे प्यार से समझाया और कहा— बेटा, हम अपने जीवन में सफलता की ऊंचाई छूने लगते हैं। खूब धन दौलत कमा लेते हैं। ऐसे में कभी-कभी हमें महसूस होने लगता है कि—यह जिम्मेदारी नहीं होती तो हम और ऊंचाई पर पहुंच जाते और ज्यादा कमा सकते। अगर हम परिवार, संस्कार के बंधन में नहीं बंधे होते तो और आगे निकल जाते। ऐसे में हमें बंधनों से मुक्त होने का ख्याल भी आता है। हमें अपने संस्कार और घर परिवार बोझ लगने लगते हैं। लेकिन जब हमें कोई दुख होता है तो हम इन्हीं संबंधों, रिश्तों में संभल ढूंढते हैं। दरअसल खुशियां उसी घर में आतू है, जहां परिवार एकजुट होता है और उनके सुख-दुख सांझा होते हैं।
इसलिए हमें संयुक्त परिवार की महत्ता को समझना होगा, तभी हम इस अदृश्य शत्रु से आसानी से मुकाबला कर पाने में सक्षम होंगे।

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