170. आत्मबल की शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय समस्त विश्व वैश्विक महामारी के अत्यंत कष्टदायक दौर से गुजर रहा है। इस स्थिति के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने भौतिक संसाधनों के आकर्षण में आकर अपनी सनातन प्रवर्त्ति को तिलांजलि दे दी है। आज जब एक छोटे से अदृश्य वायरस ने चारों तरफ कोहराम मचा रखा है तो हम अत्यंत दुख और संताप से भरे हुए हैं। हमारे चारों ओर अनिश्चितता और शंकाओं के बादल घुमड़ रहे हैं। हमारा मन द्रवित और व्यथित हो रहा है। अपनों को खोने का डर हमें अत्यंत पीड़ा में डाल रहा है। ऐसे समय में हमें आत्मबल की शक्ति की बहुत आवश्यकता है जो हमें सकारात्मकता प्रदान करती है।

आत्मबल का भाव ही हमें अजेय बनाता है। हमें स्वयं के आत्मबल की शक्ति को जाग्रत करना होगा और साथ-साथ दूसरों के आत्मबल को भी प्रबलता प्रदान करनी होगी। आज सकारात्मक विचारों के प्रभाव को बढ़ाने की बहुत जरूरत है। आज हमें इस अदृश्य शत्रु से लड़ने के लिए आत्मबल की बहुत आवश्यकता है क्योंकि आत्मबल के सहारे ही विपरीत परिस्थितियों को जीता जा सकता है।

जब चारों तरफ अंधकार का साम्राज्य फैला हो, ऐसे समय में आत्मबल का एक छोटा-सा दीया जलाकर उजाला फैलाया जा सकता है। आत्मबल का यह दीया ही अंधकार के साम्राज्य के समूल नाश का कारण बन सकता है। हमारे मन में जो अनावश्यक भय बना हुआ है, वह आत्मबल की ऊर्जा से ही कम हो सकता है और इसी ऊर्जा से हमें निडरता प्राप्त होती है।

आत्मबल की शक्ति ही हमें एक निर्भय भविष्य की दहलीज पर ले जाएगी। इसके सहारे ही हम सुंदर कल के सपने बुन सकते हैं। कल के उल्लास और उत्सावों के स्वागत के लिए विचार कर सकते हैं। महामारी के वीभत्स रूप को देखते हुए अब समय आ गया है कि हम अपने ऋषि-मुनियों द्वारा, जीने की जो कला बताई गई थी उस और लौटें और अपनी सनातन परंपरा को स्वीकार करें। जिसमें हम सूर्य को जल अर्पण और गायत्री मंत्र के जप से दिन की शुरुआत करते थे। जिससे हमारे ऊपर ईश्वर कृपा का वरदान बरसता रहता था।

ईश्वर कृपा का अर्थ सिर्फ पद- प्रतिष्ठा या पैसा ही नहीं है बल्कि शरीर और मन को आहत करने वाली शक्तियों से मुकाबला करने का सामर्थ्य पैदा करना भी है। इसकी कमी से ही रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है।
अगस्त्य ऋषि पर भी जब शत्रु रूपी आतापी नामक दैत्य ने हमला किया था, उस समय वह राक्षस ऋषि के खाद्य पदार्थ में छिपकर एक वायरस के रूप में पेट में चला गया था। उसने जैसे ही ऋषि के पेट में प्रवेश किया, ऋषि समझ गए और फिर योग शक्ति से उसे पेट में ही मारना शुरू कर दिया।

आतापी नामक दैत्य चिल्लाने लगा कि— हे ऋषिवर! मुझे माफ कर दीजिए। मुझे प्राण- दान दीजिए।
यह योग की ही शक्ति है, जिससे हमारे अंदर प्रवेश कर गए अदृश्य वायरस को हम अपने शरीर के अंदर ही खत्म कर सकते हैं। आज इस वायरस की वजह से शरीर में जो ऑक्सीजन की कमी हो रही है, उस कमी को हम अपने आत्मबल की शक्ति से पूरा कर सकते हैं। शरीर में ही हम ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना करते हुए उस वायरस को खत्म कर सकते हैं। योग के द्वारा हम जब अपनी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करेंगे तो इस वायरस की क्या मजाल जो हमें नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए अपनी पुरातन संस्कृति में लौटिये और अपने आत्मबल की शक्ति को पहचानिए, तभी हम एक अच्छा जीवन जी सकते हैं और हर प्रकार के वायरस से बच सकते हैं।

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