171. कर्म योग

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कर्म योग यानी कर्म के द्वारा ईश्वर के साथ योग अर्थात् कर्म करते हुए ईश्वर के साथ एकाकार हो जाना।
अनासक्त होकर किए जाने पर प्राणायाम, ध्यान-धारणा आदि अष्टांग योग या राजयोग भी कर्म योग ही हैं।
संसार में निवास करने वाले मनुष्य यदि अनासक्त होकर सिर्फ ईश्वर में भक्ति रखकर कर्म करें और फल की चिंता न करें तो यह कर्म योग की श्रेणी में आता है।

ईश्वर के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण कर, अपने को सिर्फ ईश्वर का दास समझकर, उसके चरणों में रहते हुए कर्म करना भी कर्म योग की श्रेणी में आता है।
ईश्वर का ध्यान तथा नाम जप करते हुए, स्वयं को समर्पण करके, अपने कर्तव्यों का पालन करना भी कर्म योग कहलाता है।
यह सदैव स्मरण रखें कि—ईश्वर को तुम जो कुछ भी अर्पित करोगे, उसका हजार गुना पाओगे।
इसलिए सब कार्य करने के बाद जलांजलि दी जाती है— श्री कृष्ण को फल समर्पण किया जाता है।

महाभारत के युद्ध के पश्चात् युधिष्ठिर अपने आप को माफ नहीं कर पा रहा था। वह कहीं न कहीं इस युद्ध का दोषी अपने आप को मान रहा था और स्वयं को बहुत बड़ा पापी समझ रहा था। जिसके कारण वह पश्चाताप की अग्नि में धधक रहा था। सभी पांडवों और सगे- संबंधियों ने युधिष्ठिर को पश्चाताप की पीड़ा से बाहर निकालने की बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। आखिर में सभी पांडवों ने अपनी परेशानी श्री कृष्ण के सामने रखी।

श्री कृष्ण ने कहा— बड़े भैया! अपने सभी पापों को मुझे दे दो क्योंकि वैसे भी सभी मुझे युद्ध का दोषी समझ रहे हैं।

युधिष्ठिर को श्री कृष्ण की यह बात अच्छी लगी और एक दिन वह अपने सभी पापों को, श्री कृष्ण को अर्पण करने के लिए जाने लगा, तब भीम ने उन्हें रोककर सावधान करते हुए कहा— बड़े भैया! ऐसा बिल्कुल भी मत कीजिए क्योंकि श्रीकृष्ण को जो कुछ भी अर्पित करेंगे, उसका हजार गुणा आपको प्राप्त होगा।

कलयुग में कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि की अपेक्षा भक्ति योग्य सर्वश्रेष्ठ है परंतु कर्म करना कोई छोड़ नहीं सकता। मानसिक क्रियाएं भी कर्म हैं। मैं विचार कर रहा हूं, ध्यान कर रहा हूं यह भी कर्म है। कर्म अर्थात् आलस्य छोड़ का श्रेष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी जी जान लगा देना। पूजा-अर्चना, अध्ययन, मनन, योग इत्यादि तपस्या रोज कीजिए।
तपस्या का अर्थ यह नहीं है कि— आप अपना घर, परिवार, व्यापार छोड़कर जंगल चले जाएं। आप चाहे कोई भी कार्य करते हो, टीचर हो, प्लंबर हो। कहने का अर्थ यह है कि आप चाहे जो भी कार्य करते हो, उसी भाव से करें। बस आपने तो निस्वार्थ भाव से कर्म करना है। फल की चिंता नहीं करनी।

प्रेम भक्ति के माध्यम से कर्म योग आसान हो जाता है। ईश्वर पर प्रेम भक्ति बढ़ने से कर्म कम हो जाता है और शेष कर्म अनासक्त हो कर किया जा सकता है। वैसे भक्ति का अर्थ भगवान से भीख मांगना नहीं होता। भक्ति तो एक विश्वास, एक प्रार्थना होती है जो हम अपने आराध्य के लिए करते हैं। भक्ति लाभ होने पर धन, मान-सम्मान अच्छे नहीं लगते। मिश्री का शरबत पीने के बाद गुड़ का शरबत भला कौन पीना चाहेगा। ईश्वर में भक्ति के बिना कर्म बालू की भीती की तरह निराधार हैं।

कर्म, भक्ति, ज्ञान के मार्ग, साधक को ध्यान के दरवाजे तक ले जाएंगे तथा ध्यान की दस्तक से ईश्वर का दरवाजा खुल जाएगा। तत्पश्चात् मनुष्य ईश्वर में उसी प्रकार एकाकार हो जाएगा, जिस प्रकार नदी पहाड़ों से निकलती, गिरती, चलती, कूदती आगे बढ़ती रहती है परंतु जैसे ही वह सागर में मिलती है तो उसमें विलीन हो जाती है। जिस प्रकार नदी की यात्रा समुद्र तक है, उसी प्रकार मनुष्य की यात्रा ईश्वर के साथ साक्षात्कार करने तक है। दोनों अपनी यात्रा में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने गंतव्य को प्राप्त करते हैं।

इस धरा पर आने के बाद मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है और वह, यहां की भौतिक वस्तुओं और मोहमाया के जाल में फंस जाता है। जिससे उसका ईश्वर से साक्षात्कार करने का कार्य अधूरा रह जाता है क्योंकि वह मोह माया के बंधन से मुक्त नहीं हो पाता। वैसे देखा जाए तो हम स्वयं सांसारिक बंधनों से बंधे हुए हैं। मनुष्य हर उस बंधन से मुक्ति चाहता है जो उसे बांधता है लेकिन वह, यह कभी नहीं सोचता कि— मैं स्वयं बंधा हुआ हूं। संसार ने हमें नहीं बांधा। हम सब स्वयं इस संसार में बंधे हुए हैं।

एक शिष्य अपने गुरु से कहने लगा कि— संसार के चक्रव्यूह ने मुझे जकड़ा हुआ है। लोगों ने मुझे पूरी तरह से बांधा हुआ है। मैं मुक्ति चाहता हूं पर मुक्त नहीं हो पा रहा हूं। इसलिए हे गुरुदेव! मुझे ज्ञान योग सिखाइए, जिससे मैं इन सांसारिक बंधनों से मुक्त हो सकूं।

गुरु ने अपने शिष्य की बात बड़े ध्यान से सुनी लेकिन कोई जवाब नहीं दिया और उसकी बात को टाल दिया। अगले दिन सुबह-सुबह गुरु और उनका वही शिष्य व्यायाम के लिए जा रहे थे, तभी गुरु महाराज एकदम जाकर पेड़ से चिपक गए और जोर- जोर से चिल्लाने लगे कि—पेड़ ने मुझे बांध लिया है। पेड़ मुझे छोड़ नहीं पा रहा। मुझे पूरी तरह से जकड़ लिया है।

गुरु की यह हरकत देखकर शिष्य बोला कि— गुरु देव! यह आप क्या कह रहे हो? आपको नहीं पता, आप खुद ही बंधे हुए हो। आप स्वयं ही आकर पेड़ पर लिपट गए। पेड़ ने आपको नहीं पकड़ा।

अपने शिष्य की बात सुनकर गुरुदेव जोर-जोर से हंसने लगा तत्पश्चात् शांत होकर कहने लगा— यही तो मैं तुम्हें समझा रहा हूं कि संसार ने किसी को बंधनों में नहीं बांधा बल्कि हम खुद ही संसार के बंधनों में जकड़े हुए हैं। हम स्वयं ही बंधन से मुक्त नहीं होना चाहते।

गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं— हे अर्जुन! तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है, जो कुछ स्वधर्माचरण स्वरूप तप करता है, वह सब मुझे अर्पण कर। अर्थात् मन में कर्ता भाव न लाकर, तू जो भी कर्म करता है, उसके फल की चिंता न कर और अपने कर्तव्य मार्ग पर आगे बढ़।

यहां तो भगवान श्री कृष्ण ने बड़े गजब की बात कह दी है, वे कहते हैं कि— मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों अथवा कर्त्तव्यों को, भगवान को, अर्पण करने को ही सन्यास योग कहते हैं। एक बार, तेरा मन इस सन्यास योग में रम जाए अर्थात् तेरी प्रकृति ऐसी बन जाए कि— तू कर्म तो करे पर उनके फल की इच्छा ना करे अपितु उनके फल को परमात्मा पर छोड़ दे, तू स्वयं को ऐसे मन वाला बना ले कि— हे ईश्वर! मैं तो आपका दास हूं। अच्छा- बुरा, मेरे से जो भी बन पड़ा है, उसे आपको अर्पण कर रहा हूं। आप चाहे जैसा फल दो, वह मुझे स्वीकार है। मैं तो आपकी रजा में ही राजी हूं।
भगवान आगे कहते हैं कि— जब तेरा ऐसा चिंतन, ऐसी प्रकृति अथवा ऐसा मन हो जाएगा, तब तेरे से चाहे शुभ कर्म हों अथवा अशुभ। तुझे उनका फल नहीं भुगतना पड़ेगा और तब तेरा- मेरा मिलन हो जाएगा।

One thought on “171. कर्म योग”

Leave a Reply