175. ईश्वर की खोज

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

स्वामी विवेकानंद—

अपने जीवन में जोखिम लो। जीतोगे तो नेतृत्व करोगे, यदि हारोगे तो दूसरों का, जीतने के लिए मार्गदर्शन करोगे।

जो भी मनुष्य अध्यात्म में विश्वास करता है, उसका एक ही लक्ष्य होता है— ईश्वर की खोज।
यह उस मनुष्य का आत्मिक लक्ष्य है लेकिन ईश्वर के बारे में एक दिन में नहीं जाना जा सकता। उसे निरंतर प्रयास करना होगा। शुरुआत उसे स्वयं की खोज यानी आत्मसाक्षात्कार से करनी होगी। उसे स्वयं को जानना होगा। अपनी सभी इच्छाओं का त्याग करते हुए, मैं व मेरा की लालसा और भावना से मुक्त होने के बाद ही उसे अपार शांति की प्राप्ति होगी जो उसे ध्यान की अवस्था में ले जाने के लिए सहयोगी बनेगी। ध्यान के द्वारा ही हम ईश्वर की खोज कर सकते हैं।

यदि कोई मनुष्य सांसारिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है तो सभी सगे- संबंधी उसका हौसला बढ़ाते हैं। वहीं यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कहे कि— वह परमात्मा की खोज करने जा रहा है तो कोई भी उसका उत्साहवर्धन करने नहीं आएगा बल्कि उसका मजाक बनाया जाएगा। लेकिन ईश्वर की खोज जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि ईश्वर का साथ पाकर ही मनुष्य इस आगमन के चक्कर से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार एक चित्रकार कपड़ों पर लगे दागों को बड़ी खूबसूरती से फूल का रूप दे देता है, वैसे ही हर मनुष्य को ईश्वर के सानिध्य की आवश्यकता होती है। ईश्वर का सानिध्य पाकर उसका जीवन पुष्प की भांति सुगंधित हो जाता है।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि— ईश्वर की खोज के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पड़ता, अपने शरीर को भी तपाने की आवश्यकता नहीं है। बस हमें ध्यान की गहराइयों में उतरना होगा। अपनी चेतना का विकास करना होगा। आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई किसी चीज में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है, तब उसमें सतत् सुधार के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है। यही विकास है। लेकिन जब हम आंतरिक विकास की बात करते हैं तो चेतना के विकास की बात होती है।

हमारे मानव शरीर की संरचना में शरीर, मन और आत्मा है।
जो हमारा स्थूल शरीर है, वह भौतिक पदार्थों से निर्मित है।
जबकि जो सूक्ष्म शरीर है, उसमें ऊर्जा व स्पंदन है। जिसे हम मानस कहते हैं।
और हमारा जो तीसरा शरीर है। वह कारण शरीर है। जो आत्मा है। जो हमारे अस्तित्व का आधार है।

स्थूल शरीर ज्यादा विकसित नहीं होता है।
आत्मा भी अपरिवर्तनीय है। जब हम एक बेहतर मनुष्य बनना चाहते हैं तो हम सूक्ष्म शरीर का विकास करते हैं। हम सूक्ष्म शरीर के चारों तरफ मौजूद परतों को हटाकर उसका शुद्धीकरण करते हैं जो ध्यान की गहराइयों में उतर कर ही संभव है।

हमारे सूक्ष्म शरीर के चार प्रमुख कार्य हैं—
चित्त यानी चेतना।
मनस यानी सोचना।
प्रज्ञा यानी बुद्धि और अहंकार।
ये सब मिलकर मन को बनाते हैं। हमारी चेतना अपने आप विकास को प्राप्त नहीं करती। यह विचार, बुद्धि व अहंकार की मदद से विकसित होती है। बुद्धि, विवेक में और सोच, अनुभूति में विकसित होती है।
अहंकार प्रेम में, निस्वार्थता में रूपांतरित हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप चेतना स्थिर व संकीर्ण अवस्था से गतिशील व सार्वभौमिक हो जाती है।

चेतना के विकास और विस्तार में अगर कोई सहायता करता है तो वह है— ध्यान की अवस्था। ध्यान के माध्यम से ही मनुष्य सूक्ष्म शरीर से उसकी सभी जटिलताओं को हटाकर, उसके रूपांतरण को संभव बनाते हैं, जिससे मन शांत हो जाता है। शांति और संतोष से रहने की कला जिसे आती है, वह ही चेतना का विकास करने में सफल होता है। बेचैन और अशांत मन मनुष्य को ध्यान की अवस्था में नहीं जाने देता।

एक परेशान व बेचैन मन तूफानी समुंद्र की तरह होता है जो इच्छाओं, कामनाओं, चिंताओं,भयों और आदतों द्वारा अनेक दिशाओं में खींचता रहता है और हमेशा अशांत व असंतुलित रहता है। वह माया रूपी विभिन्न प्रवाहों में बहकर बिखर जाता है। जबकि एक नियंत्रित व संतुलित मन केंद्रित रहता है और उससे सब का कल्याण होता है।

जब मनुष्य ध्यान करता है, तब मन अधिक शुद्ध सहज व हल्का बन जाता है और हमारी चेतना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उस समय मनुष्य अपने आंतरिक सामर्थ्य को उजागर कर पाता है। एक समय ऐसा आता है कि— ध्यान के फलस्वरूप प्राप्त ध्यानमयी अवस्था को पूरे दिन बनाए रखने की कला में माहिर हो जाते हैं। तत्पश्चात् हमारी चेतना जटिलताओं, प्रतिक्रियाओं और भावनाओं से अशांत नहीं होती। ऐसी शांतिपूर्ण अवस्था में विवेक विकसित होता है और हम अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग करते हैं। ऐसी अवस्था प्राप्त करने के बाद मनुष्य सभी कार्यों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है।

ईश्वर की खोज की यात्रा में एक मोड़ ऐसा आता है, जिसे हम प्रज्ञा कहते हैं यानी बुद्धि विकसित होती है। यदि कोई प्रज्ञा पूर्ण हो जाता है तो वह सुख-दुख, स्वर्ग- नरक, सफलता- विफलता से मुक्त हो जाता है। वह प्रज्ञा की मदद से अपने लक्ष्य में स्थित हो जाता है। प्रज्ञा व्यक्ति को सूक्ष्म दृष्टि देती है। यह दृष्टि ही उसे सत्य जानने की प्रेरणा देती है।

यह भी संभव है कि सत्य की तलाश अलग-अलग रास्तों से हो लेकिन अंत में जो समझ प्राप्त होती है, वह एक जैसी ही होती है। इसी समझ से व्यक्ति को अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। इसी रास्ते पर चलने के बाद ही उसे मौन, कैवल्य, मोक्ष, समाधि मुक्ति और निर्माण की अनुभूति होती है। ऐसी अवस्था में पहुंचने के बाद कभी-कभी नकारात्मकता भी बहुत हावी हो जाती है लेकिन उस समय सकारात्मक रहना होगा। सकारात्मकता के पथ पर चल कर ही मनुष्य ईश्वर की खोज की यात्रा को पूर्ण करने में सफल होता है।

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