176. सेवा भाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक कहावत है— “सेवा स्वयं में पुरस्कार है” जो खुशी और आनंद की प्राप्ति हमें दूसरों की सेवा से मिलती है, उसे लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं पाया जा सकता।

ईश्वर ने मनुष्य को सेवा भाव से परिपूर्ण बनाया है। आज कोरोना वायरस के कारण हम सब आपदा से जुझ रहे हैं तो ऐसे समय में मानवता की पुकार यही सेवा भाव है। यह दौर कठिन अवश्य है लेकिन इसमें हमें अपनी विशेषताओं को उजागर करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे की मदद करने की आवश्यकता है। एक- दूसरे के साथ खड़े होकर, साथ निभाकर इस कोरोना काल को मात दे सकते हैं। आज जब हम अपनों को खो रहे हैं तो ऐसे में संवेदना के दो बोल और साथ रहने का भरोसा ही सच्ची सेवा भाव है।

आज हमें अपने भीतर सेवा भाव को जगाने की आवश्यकता है। ऐसे समय में एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए चिंतन करना आवश्यक है। प्रकृति ने हमें अपने जीवन पर चिंतन करने का अवसर प्रदान किया है। जीवन शास्वत है, हमने इस सच्चाई पर कभी विचार ही नहीं किया, पर हमें समय के साथ बदलना चाहिए। हमारे जीवन का सत्य क्या है?

यह सत्य है कि— मेरे अंदर एक ऐसा तत्व है, जो कभी नष्ट नहीं होता, जो कभी कम नहीं होता, जो अमर है।

गीता में कहा गया है कि— शरीर मरता है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। वही आत्मा तो हम सब में अमर है। यदि इस समय हम इस पर थोड़ा-सा ध्यान दें लें तो निर्भीक हो जाते हैं और हमारा जीवन मुश्किल समय में भी थोड़ा- सा आसान और सरल हो जाएगा। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेंगे तो सभी बदलावों को स्वीकार करने लगते हैं और शुभ बदलावों के लिए प्रेरित होते हैं।जब हम सब में भी बदलाव लाते हैं तो हमारे भीतर से मुस्कान खिल जाती है। यदि इस समय हम खुद को बदल ले तो हम अपने समाज और दुनिया को बदल सकते हैं।

लोग अक्सर कहते रहते हैं कि—भगवान जाने अब क्या होगा? तो मेरा उनसे कहना है कि— ऐसे नकारा विचारों को अपने आसपास में न फटकने दें। अपने ईश्वर पर विश्वास रखें। जब आप एक बार ईश्वर में विश्वास कर लेते हैं तो डगमगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। क्योंकि एक बार जब आप रेलगाड़ी में सवार हो जाते हैं तो जान लेते हैं कि आप गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। यह तो निश्चित है।

इस समय हमने अपनी इच्छाओं के बारे में न सोच कर, दूसरों की इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति विकसित करनी होगी। हमारी जो इच्छाएं हैं, उन्हें ईश्वर पर छोड़ दें, इस विश्वास के साथ की वे अवश्य पूरी होंगी। हमें कुछ नहीं चाहिए, जब हम यह तय कर लेते हैं तो अंदर से मजबूत हो जाते हैं और जब अंदर से मजबूत हो जाते हैं, तब हम किसी से कुछ भी कहेंगे तो वह आशीर्वाद बन जाएगा।

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