179. संगति का प्रभाव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

संगति का मानव जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। हम अक्सर देखते हैं कि हमारे चाहने वाले या दोस्त अगर शांत प्रवृत्ति के हैं तो हम भी उन जैसे ही हो जाते हैं अर्थात् धीरे-धीरे हमारे अंदर भी उस गुण की प्रधानता स्पष्ट दिखाई देने लगती है। अगर उनमें क्रोध और ईर्ष्या की भावना है तो धीरे-धीरे हमारा चरित्र भी वैसा ही होने लगता है। इसलिए महापुरुषों ने साधु संतों की संगति को मनुष्य के लिए लाभदायी, पुण्यदायी और मोक्षदायी बताया है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तरह सर्जन, पोषण एवं कल्याण के अधिष्ठाता साधु संत ही होते हैं।

जब मनुष्य का जीवन मोह- माया के वशीभूत होकर पतीत हो जाता है, तब साधु-संतों के प्रवचन हमारे अंतर्मन में ज्ञान की ज्योति जला कर और अंतरण के अंधियारे को मिटाकर उसे भटकने से बचाते हैं और सही दिशा की ओर अग्रसर करते हैं। परिवार, समाज तथा राष्ट्र में संस्कार का सृजन, शुभ विचारों से व्यक्तित्व का उत्थान करना, वैचारिक पोषण और शुभ कर्मों से जन- जन के कल्याण का कार्य, साधुओं द्वारा ही संभव हो सकता है, क्योंकि साधुओं के पास उत्कृष्ट विचारों का एक दिव्य स्त्रोत होता है। उनकी वाणी पवित्र होती है। उनमें स्वार्थ की भावना का नामोनिशान भी नहीं होता बल्कि वे तो अपने उपदेशों से मानव जन के कल्याण के लिए दिव्य कर्मों की प्रेरणा देते हुए उनका पोषण करते हैं।

अगर साधु संतों की संगति की जाए तो मानव के जीवन में दिव्य कर्म करने की आदत बन जाती है और निकृष्ट कर्म से उन्हें मुक्ति मिल जाती है। साधु संत हमारे जीवन में पारस पत्थर की तरह अपनी संगति का लाभ देते हैं। जिस प्रकार मूल्यहीन लोहा, पारस पत्थर की संगति से मूल्यवान स्वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार आम व्यक्ति, साधु की संगति से सोने की तरह मूल्यवान ही नहीं बल्कि महान भी बन जाता है। चंदन वन के आसपास का परिवेश उसकी सुगंध से महक उठता है, उसी प्रकार सामान्य जन भी साधु संगति की सुगंध से अपने जीवन को सुगंधित कर सकते हैं।

एक बार की बात है— गुरु नानक देव जी भ्रमण पर निकले हुए थे। रास्ते में गोष्ठियों बनाकर उपदेश भी देते जा रहे थे। भाई बाला और मर्दाना भी उनके साथ थे। गर्मी के दिन थे और दोपहर का समय था। गुरु नानक देव जी एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने के लिए बैठ गए। वैसे तो महापुरुष कभी भी विश्राम नहीं करते, वे तो केवल भाई बाला और मरदाना को थके हुए देखकर कुछ देर के लिए रुक गए थे, परंतु उस समय भी उन्होंने परमार्थ की चर्चा छेड़ दी। एकाएक उठ कर बैठ गए और मरदाना को संबोधित करते हुए कहने लगे—

मरदाना मौत कितनी दूर है?

मरदाना ने हाथ जोड़कर विनती कि—गुरु जी! आज का सूर्य देखा है, पता नहीं कल का सूर्य देखना नसीब में होगा भी या नहीं।

गुरु नानक देव जी ने कहा— मरदाना, तुम तो मृत्यु को बहुत दूर समझते हो। मृत्यु इतनी दूर भी नहीं है।

तत्पश्चात गुरु जी ने भाई बाला की तरफ देखा और उनसे भी यही प्रश्न किया।

भाई बाला, तुम मृत्यु को कितनी दूर समझते हो।

भाई बाला ने भी हाथ जोड़कर विनती कि— गुरु जी। आज की सुबह देखी है, पता नहीं शाम देखने भी है या नहीं।

गुरु नानक देव जी ने कहा— भाई वाला, तुम भी मृत्यु को बहुत दूर समझते हो।

तब दोनों ने हाथ जोड़कर विनती कि—गुरु जी! आप ही इस प्रश्न का उत्तर दे दीजिए।

गुरु नानक देव जी ने कहा—मृत्यु तो अत्यंत निकट है। जो सांस मनुष्य का बाहर आता है, यह यदि वापिस अंदर चला गया तो मनुष्य वरना मुर्दा। हमारी दृष्टि में इतनी निकट है मृत्यु कि— मनुष्य जो सांस ले रहा है, हो सकता है कि यही उसका अंतिम सांस हो।
यानी साधु, महात्मा और महापुरुष सदैव अपने दिव्य विचारों से आम जन को शिक्षित करते रहते हैं, जिससे उनका कल्याण होता है। इसलिए हमेशा साधु-संतों एवं महापुरुषों के संगति लाभकारी होती है।

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