182. लक्ष्य की प्राप्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक मनुष्य के जीवन का एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिए। फिर भी समाज में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है, जिनका कोई लक्ष्य नहीं होता। देखा जाए तो ऐसे मनुष्य उस गेंदबाज की तरह होते हैं जो गेंद तो लगातार फेंकते रहते हैं लेकिन लक्ष्य यानी विकेट पर कभी नहीं लगती। लक्ष्य से विहीन होना उस बिना पता लिखे लिफाफे के समान है जो कभी भी कहीं भी नहीं पहुंच पाता। यदि लक्ष्य निर्धारित नहीं होगा तो परिणाम इसके विपरीत होगा। प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह सबसे पहले अपना लक्ष्य निर्धारण करें और उसके साथ आगे बढ़े।
कार्य सिद्धि या लक्ष्य प्राप्ति के लिए जरूरी है कि हम जिस कार्य को करें हर पल उसी के विषय में सोचें। धीरे-धीरे हम उसके अभ्यस्त हो जाएंगे।

एक बार गुरु जी ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने की सोची। वे चारों साइकिल से आते थे।

गुरु जी ने उन्हें अपने पास बुलाया और उन सभी से एक ही सवाल किया— तुम साइकिल क्यों चलाते हो?

पहले शिष्य ने उत्तर दिया— मुझे सामान अपनी पीठ पर नहीं ढोना पड़ता। सामान लाने व ले जाने में सुविधा रहती है।

गुरुजी ने कहा— तुम बहुत बुद्धिमान हो। साइकिल चलाने से तुम्हारा शरीर हमेशा स्वस्थ रहेगा।

दूसरे शिष्य ने उत्तर दिया— मुझे साइकिल पर सवारी करना अच्छा लगता है क्योंकि इससे प्रकृति के विभिन्न रंग देखने का अवसर प्राप्त होता है।

गुरुजी ने कहा—तुम प्रकृति को पसंद करते हो। तुम हमेशा सुखी रहोगे।

तीसरे शिष्य ने कहा— जब मैं साइकिल चलाता हूं तो मुझे ईश्वर का नाम लेने का समय मिल जाता है।

गुरुजी ने कहा— तुम्हारी ईश्वर के प्रति आस्था है। यह जानकर बहुत अच्छा लगा। ईश्वर हमेशा तुम्हारा ध्यान रखेंगे।

चौथे शिष्य ने कहा— मेरे साइकिल चलाने का कारण सिर्फ यही है कि मैं साइकिल चलाने के लिए साइकिल चलाता हूं।

गुरुजी उठे और अपने शिष्य के चरणों में बैठ गए और बोले— आज से आप मेरे गुरु हो और मैं आपका शिष्य हूं।

सभी शिष्यों ने गुरुजी से इसका कारण जानना चाहा तो गुरु जी ने अपने शिष्यों को समझाते हुए कहा—
अपने कार्य को जब हम पूर्णता से करते हैं यानी हमारा पूरा ध्यान हमारे उस कार्य पर ही होता है, तभी हम उस काम में श्रेष्ठता प्राप्त करते हैं और तभी हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

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