187. याचना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक मनुष्य अपने इष्टदेव से यानि ईश्वर से प्रतिक्षण कुछ न कुछ याचना करता ही रहता है। इसका कारण स्पष्ट है कि— मनुष्य के अंतर्मन में प्रतिपल कोई न कोई प्रबल इच्छा उभरती ही रहती है और यह भी सच्चाई है कि अंतर्मन से जो भी इच्छा या कामना की जाती है, वही मनुष्य की वास्तविक याचना होती है। प्रत्यक्ष में हम न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं परंतु सच्ची याचना वही होती है जो हमारे अंतर्मन में विद्यमान है।

हमारा इष्ट हमारे बाहरी रूप को नहीं देखता परंतु हमारे अंतर्मन के पर्दों के भीतर अवश्य झांकता है और हमारे मन की थाह लेता है। जो हमारे मन की आवाज होती है, उसी को ईश्वर सुनते हैं और हमारी याचना को पूरी करते हैं। इसलिए हमें स्वयं अपने अंतर्मन में झांककर देखना चाहिए कि हमारे मन की वीणा पर हर समय कौन-सा राग बज रहा है अर्थात् हमारे दिल से क्या आवाज निकल रही है? ऐसी कौन- सी प्रबल इच्छा है जो हमारे अंत: स्थल को प्रतिपल मथ रही है, इसका निर्णय तो हमें स्वयं करना होगा।

हमारी यह आंतरिक प्रबल इच्छा ही हमारी सच्ची याचना है और प्रकृति इसको पूरा करने का प्रबंध प्रतिक्षण करती रहती है। प्रकृति हमारी आंतरिक भावनाओं को जांचती, परखती और उसके अनुसार ही हमारे लिए वातावरण तथा अन्य आवश्यक सामग्री की रचना करती है। जब परिस्थितियां हमारे अनुकूल होती हैं तो हम अपने इष्ट देव को धन्यवाद देते हैं लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों में हम अपने इष्ट देव को ही कोसने लग जाते हैं। परंतु ऐसा करने से पहले हमें तनिक अपने अंतर्मन की जांच पड़ताल कर लेनी चाहिए।

हमें हमेशा अपनी आंतरिक कामनाओं को परखना और जांचना चाहिए। तदुपरांत ही यह विचार करना चाहिए कि जो कुछ हमें कुदरत से मिला उसी आंतरिक कामना के अनुरूप है या नहीं। अगर हम ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तो हम समझ जाएंगे कि हमारे साथ कोई अन्याय नहीं हुआ। हमें वही मिला जो हम ने मांगा था, फिर हम अपने इष्ट देव को शिकायत क्यों कर रहे हैं?

दरअसल हम जो कर्म करते हैं, उसी का फल ईश्वर हमें प्रतिक्षण देते रहते हैं। अक्सर क्या होता है कि— हम विष बो कर अमृत की मांग करते हैं। हम दूसरों के लिए विष रुपी शब्दों के बाण छोड़ते हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरे हमारे से बहुत अच्छा व्यवहार करे। हमारा आदर- सत्कार करें, समाज में हमारी मान- प्रतिष्ठा बढे। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि तुम्हारे कड़वे वचनों से दूसरे भी आहत होते हैं।

प्रत्येक मनुष्य यही सोचता है कि— मैं जो कुछ कहता हूं, वह सब ठीक है। मैं ही सर्वश्रैष्ठ हूं। इसलिए मेरा ही मान- सम्मान होना चाहिए। ईश्वर ने सिर्फ मेरी ही याचना को स्वीकार करना चाहिए। अगर उसके अनुसार उसको समाज में रुतबा नहीं मिलता, उसकी इच्छा पूरी नहीं होती तो वह अपने इष्टदेव को भी कोसने लगता है लेकिन वह यह भूल जाता है कि वह इष्टदेव उसका भी है, जिसके बारे में उसने कठोर वचन कहे थे। ईश्वर के लिए हम सभी एक हैं, बराबर है क्योंकि हम सभी उसी की संतान हैं। इसलिए ईश्वर हमारी वही याचना पूरी करता है जिसके हम अधिकारी हैं, जो हमारे कर्मों के अनुसार ईश्वर हमें प्रदान करता है।

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