189. सीखें, धैर्य रखना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आपने अपने बड़े बुजुर्गों से अक्सर सुना होगा कि—धैर्य का फल मीठा होता है। दरअसल जो मनुष्य धैर्य रखना सीख जाते हैं, उनको मुश्किल समय में समस्या का विश्लेषण करने का अवसर प्राप्त हो जाता है।
कहते हैं कि—स्वर्ग में सब कुछ है लेकिन मृत्यु नहीं है। गीता में सब कुछ है लेकिन झूठ नहीं है। दुनिया में सब कुछ है लेकिन सुकून नहीं है। आज के इंसान ने सब कुछ है लेकिन धैर्य नहीं है।
धैर्य एक ऐसा गुण है जिस पर सवार होकर मनुष्य आकाश की ऊंचाइयों को छू सकता है। इस भौतिक संसार में जो मनुष्य धैर्य धारण करना सीख गया सफलता उसके कदमों को चुमती है। जीवन में उतार-चढ़ाव का दौर चलता रहता है।
जब बुरा दौर चल रहा हो तब खामोशी से इंतजार के साथ काम करते हुए उसे व्यतीत करने की जरूरत होती है। जिसमें धैर्य धारण करने की आवश्यकता होती है। जो मनुष्य मुश्किल हालातों के सामने घुटने नहीं टेकते, वे समय के साथ मजबूत होते जाते हैं। लेकिन इस मजबूती तक पहुंचने के लिए पहले उनको धैर्य की अग्निपरीक्षा को पास करना होता है।
किस्मत एक दिन अवश्य बदलती है और जब बदलती है तो सब कुछ पलट देती है। इसलिए मनुष्य को अपने अच्छे दिनों में अंहकार नहीं करना चाहिए और बुरे दिनों में धैर्य धारण करना चाहिए।

भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। गांव के रास्ते में उनको जगह-जगह पर बहुत सारे गड्ढे मिले। भगवान बुद्ध के शिष्य उन गड्ढों को देखकर बड़े हैरान हुए। वे पूरे रास्ते यही सोच- विचार करते हुए चलते रहे कि— कैसे गांव वाले हैं, जिन्होंने रास्ते में गड्ढे खोद रखे हैं।

भगवान बुद्ध अपने शिष्यों की जिज्ञासा को समझ गए थे। उन्होंने बगैर कुछ पूछे उनसे कहा— यह सब धैर्य न रखने का परिणाम है लेकिन उनके कुछ शिष्य भगवान बुद्ध की बात को समझ नहीं पाए।
उन्होंने जिज्ञासा प्रकट की कि—आखिर इस तरह गड्डे खुदे होने में धैर्य की क्या आवश्यकता है?
भगवान बुद्ध ने कहा— पानी की तलाश में किसी व्यक्ति ने इतने सारे गड्ढे खोदे हैं। यदि वह धैर्य पूर्वक एक स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता पर वह थोड़ी देर गड्ढा खोदता होगा और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढा खोदना शुरू कर देता होगा। उसको परिश्रम करने के साथ-साथ थोड़ा- सा धैर्य भी रखना चाहिए था।

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