203. मिटा दें, मन के विकार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय हममें से ज्यादातर मनुष्य मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, बीमार हैं। अधिकतर तो अपनी स्वयं की स्थिति से परेशान है क्योंकि वे अपनी परेशानी से परेशान नहीं है बल्कि उनके आस- पड़ोस वाले, उनके रिश्तेदार स्वस्थ क्यों हैं? उनको सफलता कैसे प्राप्त हो गई? वे हमारे से ज्यादा अमीर कैसे हो गए? ईश्वर उन पर इतने मेहरबान क्यों हैं? आदि-आदि। ऐसे ढेरों प्रश्न है, जिनसे वह परेशान रहता है। यह सोच हमारे मानसिक संतुलन को खराब कर देती है। हम में से प्रत्येक यही चाहता है कि वह हमेशा प्रसन्न रहे, सफल रहे, जीवन में उसको सब कुछ प्राप्त हो। विश्व में सबसे ऊंचा मुकाम हासिल हो। लेकिन दूसरों को यह सब मिले, वह बर्दाश्त नहीं कर सकता और अपने मन में ईर्ष्या को पाल लेता है, जिसके कारण वह हर समय परेशान रहता है, दुखी रहता है और अवसाद ग्रस्त हो जाता है।

मनुष्य अपने जीवन में हमेशा असंतुष्ट रहता है। उसे जीवन में जो भी प्राप्त हुआ है, उसमें कमियां ढूंढता रहता है। वह हर समय अपनी तुलना दूसरों के साथ करता रहता है। वह, यह समझना ही नहीं चाहता कि उसे जो प्राप्त हुआ है, वह उसके कर्मों का फल है। लेकिन वह इसे स्वीकार करने की बजाय प्रतिपल ईश्वर को कोसता रहता है। वह भूल जाता है कि ईश्वर ने उसे वही प्रदान किया है, जैसे उसने कर्म किए हैं।

जब हम दूसरों का सुखी देखकर, दुख महसूस करते हैं तो हमें अपने सुख की अनुभूति नहीं होती। हम इसमें सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। जिससे हम मानसिक रूप से परेशान रहने लगते हैं। हमें अपने नजरिए को बदलना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमें जो कुछ प्राप्त हुआ है, इसके जिम्मेवार हम स्वयं हैं इसलिए उसी में प्रसन्न रहना सीखना होगा। अगर हम मानसिक रूप से संतुष्ट नहीं रहेंगे तो शारीरिक रूप में बीमार रहने लग जाएंगे। मन और शरीर एक- दूसरे पर आश्रित हैं। मन खुश रहेगा तभी तन खुश रहेगा। मन का प्रभाव शरीर पर और तन का प्रभाव मन पर पड़ता है। ईश्वर ने किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है। हम सभी उसी ईश्वर की संतान है। अपनी संतान से ही वह भेदभाव कैसे कर सकता है? यह बात हमें समझनी चाहिए।जैसे सूर्य सभी को धूप, गर्मी और रोशनी देता है, वह सभी को समान रूप से प्राप्त होती है, वैसे ही ईश्वर ने सब चीजें सबके लिए समान रूप से बनाई हैं।

इसलिए जो मिला है, उसी में हमें संतुष्ट रहना चाहिए। आनंद की अनुभूति करनी चाहिए। कोई सुखी है तो उसे देखकर हमें खुश होना चाहिए। दूसरों की खुशी में शामिल होकर, अपने व्यक्तित्व को निखारना चाहिए। मन में करुणा का भाव जागृत करना चाहिए। दूसरों को दुख में देखकर उसकी मदद के लिए सोचें, उसके कष्ट दूर करने के बारे में सोचें, ऐसी स्थिति में जब करुणा हमारे भीतर पनपेगी तो मन का सारा मैल बाहर आ जाएगा।

किसी की मदद करके देखिए तो आप स्वयं महसूस करेंगे कि आप के भीतर कितना आनंद भर जाता है। करुणा का भाव हमें निर्मल बनाता है और मन जितना निर्मल होता है, हम ईश्वर के उतने ही निकट पहुंच जाते हैं। मन को निर्मल करने के लिए सत्य का सहारा लीजिए। अपने जीवन में सत्य को धारण कीजिए। सत्य से मन शुद्ध होता है। ज्ञान बुद्धि को शुद्ध करता है। अगर इन भावनाओं को साथ लेकर चलेंगे तो मन के विकार मिट जाएंगे।

वरिष्ठ मनोचिकित्सक मेडिटेशन डॉक्टर गिरीश पटेल कहते हैं कि— हम तब तक तनाव का अनुभव नहीं करते, जब तक कि उसके बारे में हमारे चेतन और अवचेतन मन में कोई विचार नहीं चलता है। जब हमारे विचार नकारात्मक होते हैं, उसमें बेचैनी, ईर्ष्या अथवा अवसाद का एहसास होता है तो वह तनाव उत्पन्न करता है। इनके बारे में चिंतन बंद कर देने से संभव है कि हमें तनाव का अनुभव भी नहीं हो। यदि हम प्रतिकूल या कथित तौर पर तनावपूर्ण वातावरण में भी शांत, खुश एवं रिलैक्स रहते हैं तो हमारा मन भी सकारात्मक रहता है और हम अपने मन के विकारों से काफी हद तक छुटकारा पाने में कामयाब हो जाते हैं।

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