221. आस्तिकता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आस्तिकता का सर्वाधिक लोकप्रिय आधार ईश्वर में आस्था से है। जगत् का सृजन, पालन और संहार ईश्वर की लीला है। सनातन धर्म में ईश्वर को पूर्ण माना गया है। वे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और पूर्णस्वतंत्र हैं।
हमारी सनातन परंपरा में आस्तिकता के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं।
पहला- वेद में विश्वास करना
दूसरा- आत्मा की अमरता में विश्वास करना और तीसरा- ईश्वर के अस्तित्व में श्रद्धा व्यक्त करना।

वेद अपौरूषेय हैं। ये किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा रचित नहीं हैं, न भगवान के द्वारा ही रचे गए हैं। दरअसल वेद भगवान की वाणी हैं। ऋषि वेदमंत्रों के दृष्टा यानी साक्षात्कारकर्ता हैं। इसलिए जो लोग वेद के मंत्रों में श्रद्धा व्यक्त करते हैं वे आस्तिक कहे जाते हैं। इसके अलावा आत्मा की अमरता में विश्वास करने वालों को भी आस्तिक कहा जाता है। आत्मा चेतन, शाश्वत और अविनाशी है। यह काल से परे है अर्थात् नश्वर है।

प्रत्येक जीव में अलग-अलग आत्मा है। इसे जीवात्मा भी कहा जाता है। आस्तिक व्यक्ति ईश्वर पर अटूट विश्वास करते हैं। वे अपना प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। वे ईश्वर में उस बच्चे की तरह विश्वास करते हैं जिसको आप हवा में उछालो तो भी वह हंसता ही रहता है। क्योंकि उसको पता है कि आप उसे गिरने नहीं देंगे। ठीक इसी प्रकार आस्तिक लोग निडर होकर कठिन से कठिन कार्य को भी ईश्वर को समर्पित कर हंसते हुए कर जाते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि ईश्वर उन्हें असफल नहीं होने देगा।

ईश्वर और आस्तिक व्यक्तियों का संबंध ऐसा है, जिसमें कुछ खर्च करना नहीं पड़ता। दुनिया में किसी से बात करने के लिए फोन की जरूरत पड़ती है और उसका बिल अदा करना पड़ता है। लेकिन ईश्वर से बात करने के लिए मन की गहराइयों में उतरना पड़ता है। मौन धारण करना पड़ता है। ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। सम्बन्ध उस जल के समान निर्मल और पवित्र होना चाहिए, जिसका कोई रंग और रूप नहीं है, लेकिन जिस में वह मिलता है, उसी के अनुरूप हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य को भी ईश्वर में एकाकार हो जाना चाहिए। जिन्होंने अपने सर्वस्व को ईश्वर को न्यौछावर कर दिया ईश्वर उन्हें उसी प्रकार अपनी शरण में ले लेता है, जिस प्रकार मां अपने छोटे बच्चे को अपने आंचल में छुपा लेती है और दुख, परेशानियों की छाया भी उस पर नहीं पड़ने देती।

जिस प्रकार भ्रमर पुष्प के पराग को ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्प को नष्ट नहीं करता, जैसे दूध दुहने वाला व्यक्ति बछड़े के हित को ध्यान में रखते हुए दूध को दुहता है। वैसे ही ईश्वर अपने भक्तों का ख्याल रखता है और जीवन की इस कठोर डगर पर चलने में सहायता करता है। ईश्वर अपनी कुशलता से जगत् का निर्माण करते हैं, वे जगत को अपने अंदर से उत्पन्न करते हैं। ईश्वर जगत् में व्याप्त रहने के कारण जगत् का उपादान भी करते हैं।

ईश्वर अनंत गुणों से युक्त हैं, परंतु छह गुण उनमें प्रधान हैं— आधिपत्य, सर्वशक्तिमता, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य।

ईश्वर मनुष्य को उसके नैतिक, अनैतिक कर्मों का परिणाम देते हैं। मनुष्य के जीवन में सुख- दुख इन्हीं के कारण आते हैं। लेकिन जो मनुष्य ईश्वर द्वारा बनाई इस सृष्टि में विश्वास करते हैं, उनके लिए सुख-दुख, धूप-छांव की तरह हैं। वे उनकी जीवन यात्रा में अपना योगदान देते हैं और चले जाते हैं। लेकिन जो ईश्वर में आस्था नहीं रखते वे दुखों के बोझ को सहन नहीं कर पाते और रास्ता भटक जाते हैं। फिर उन दुखों में अपने आप को बंधा हुआ महसूस करते हैं और ईश्वर को कोसते हुए अपनी जीवन यात्रा को पूरी करते हैं।

आस्तिकता में कितनी शक्ति होती है इसका मैं एक उदाहरण पेश करती हूं—
रामायण में जब श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तब वह मां सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में चला गया। वहां पर मां सीता का रावण हरण कर ले गया। रावण की कैद से जानकी को वापस लाने के लिए श्री राम को रावण के साथ युद्ध करना पड़ा। उस युद्ध में मेघनाथ के साथ युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिए संजीवनी का पहाड़ लेकर लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृतांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया और लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही सभी अपनी-अपनी बात कहने लगे। माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी, परंतु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो वह हतप्रभ रह गए। उसके चेहरे पर कोई दुख के भाव नहीं थे। हनुमान जी सोचने को मजबूर हो गए कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी है? क्या इन्हें अपने पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं है?
हनुमान जी पूछते हैं—देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जाएगा।

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किए बिना नहीं रह पाएगा। वे बोली— मेरा पति संकट में नहीं है, सूर्य कुल का दीपक बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात, तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिए, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने स्वयं कहा कि— प्रभु श्री राम, मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर, श्री राम की गोद में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वे दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गए हैं, तब से सोए नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था, इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं और जब खुद भगवान की गोद मिल गई तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जाएंगे और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो श्री राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम है, हर धड़कन में राम है, उनके रोम- रोम में राम है,उनके रक्त की बूंद- बूंद में राम है और जब उनके शरीर और आत्मा में सिर्फ राम है तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा है। इसलिए हनुमान जी आप निश्चिंत होकर जाएं। सूर्य उदित नहीं होगा।

वास्तव में सूर्य में इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते। एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा। ये उर्मिला का अपने इश्वर पर अटूट विश्वास था, जो मौत के मुंह में गए हुए अपने पति को भी सकुशल वापिस ले आया।

आस्तिक मनुष्यों का अपने ईश्वर पर यही अटूट विश्वास उन्हें विचलित नहीं होने देता। संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है। कहा भी जाता है कि भगवान की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं। जाहिर है ईश्वर ही इस जगत् का सर्वेसर्वा है। वह इस जगत के कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर में आस्था रखने वाले को भौतिक जीवन में सफलता मिलने पर अहंकार नहीं होता और असफलता मिलने पर निराशा नहीं होती। इसलिए हमें ईश्वर में श्रद्धा रखनी चाहिए। जिस प्रकार बीज की यात्रा वृक्ष तक है, नदी की यात्रा सागर तक है, उसी प्रकार आस्तिक मनुष्यों की यात्रा परमात्मा तक है।

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