223. जागृत रहो

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है। जो क्षण बीत गया वह कभी लौट कर वापस नहीं आता। इसलिए मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रत्येक क्षण जागृत रहे क्योंकि इस संसार में मनुष्य का जन्म ही जागने और जगाने के लिए हुआ है। जब वह जागृत होगा तभी प्रत्येक क्षण सार्थक बना सकता है। प्रत्येक क्षण की सार्थकता के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य को स्थिर बनाकर कार्य में लगे। लक्ष्य के प्रति समर्पित होने से जीवन में आने वाली बाधाओं से विचलित होने की आशंका नहीं रहती अन्यथा संकटों को पहाड़ जैसा दुरुह मानकर लक्ष्य से भटक जाते हैं।

जो व्यक्ति दृढ लक्ष्य वाला होता है, वह सभी बाधाओं को तृणवत समझकर विजय प्राप्त कर लेता है। बहुत सारे लोग यही समझते हैं कि जीवन में सांसारिक मोहमाया में उलझ कर, हम कभी अपने जीवन लक्ष्य यानी आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त नहीं कर सकते। इसके लिए हमें संसार का त्याग कर सन्यास धारण करना आवश्यक है। परंतु यह विचार भ्रम पूर्ण है। वास्तव में हम जिस स्थान पर हैं, जिस भूमिका में हैं, उसे निभाते हुए जीवन को सफल बना सकते हैं परंतु हमें प्रत्येक पल जागते रहना होगा और अपने लक्ष्य को नहीं भुलना होगा।

हमें लाख बाधाओं के बावजूद अंतिम सांस तक दृढ संकल्पित रहने को प्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ेगा। जीवन के उद्देश्य को सदैव दृष्टिगत रखकर उसके पथ पर निर्बाध गति और अविचलित भाव से चलने वाला मनुष्य सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त कर, अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। जागृत मनुष्य को कभी भी मार्ग की बाधाएं विचलित नहीं कर सकती क्योंकि लक्ष्य की लगन कांटो की परवाह नहीं किया करती।

धूप और छांव की तरह जीवन में कभी दुख तो कभी सुख आते- जाते रहते हैं। जीवन में जितनी अधिक समस्याएं होती हैं, सफलता भी उतनी ही तेजी से मिलती है। बिना समस्याओं के जीवन के कोई मायने नहीं हैं।
समस्या क्यों होती है? यह एक चिंतनीय प्रश्न अवश्य है परंतु यह भी एक प्रश्न है कि— हम समस्याओं को कैसे कम कर सकते हैं। इस प्रश्न का समाधान केवल जागृत रहकर, अध्यात्मिक परिवेश में ही खोजा जा सकता है। क्योंकि बगैर जागरण के मनुष्य अध्यात्म में प्रवेश कर ही नहीं सकता।
किसी चीज की अति जैसे अति चिंतन, अति स्मृति और अति कल्पना ये तीनों ही समस्या पैदा करती हैं। शरीर, मन और वाणी इन सब का उचित रूप से प्रयोग होना चाहिए। इनके द्वारा उत्पन्न समस्या का कारण मनुष्य स्वयं है और फिर वह समाधान खोजता है— दवा में, डॉक्टर में या बाहर ऑफिस में। यही समस्या मनुष्य को अशांत बनाती है। इसलिए संतुलित जीवन शैली की बहुत आवश्यकता है। जीवन शैली के शुभ मुहूर्त पर हमारा मन उगती धूप की तरह भरा होना चाहिए। यदि हमारे पास विश्वास, साहस, उमंग और संकल्पित मन है तो दुनिया की कोई ताकत हमें अपने पथ से विचलित नहीं कर सकती और यह सब जागृत अवस्था में ही होता है।

जीवन को चेतन बनाइए, जागृत कीजिए और फिर अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिए। इसे कभी भी कर्तव्य से विमुख मत रहने दीजिए। बहुत सारे लोग जागते हुए भी सोते रहते हैं। अपने कर्तव्यों का बोध नहीं कर पाते‌, बस अन्य जीवों की तरह खाते हैं, पीते हैं, सांस लेते हैं, सोते हैं, जागते हैं और फिर एक दिन मृत्यु के आगोश में समा जाते हैं। वे अपने पूरे जीवन यह समझ ही नहीं पाते कि वे मनुष्य हैं और उनका जीवन अमूल्य है। अपने को अन्य प्राणियों से पृथक नहीं कर पाते। इसलिए उनका दुर्भाग्य है कि वह सब कुछ हो कर भी कुछ नहीं हैं। भगवान से साक्षात्कार करने में समर्थ हैं परंतु अपना जीवन पत्थर की तरह गुजार देते हैं। उनमें जागने की शक्ति नहीं रहती। सोते रहने में ही सुख की अनुभूति करते हैं। ईश्वरत्व के रहते हुए भी शरीर के मोह में फंसे हैं और सदैव ऐसे सोए रहते हैं कि कभी जागने का नाम ही नहीं लेते।

आत्मिक ज्वाला जो प्रज्जवलित होती है, वह कभी बूझती नहीं। इसलिए सोने का अवसर है ही नहीं। निंद्रा में भी काम है और नींद भी एक क्रिया है। इसलिए जागृत मनुष्य निंद्रा को कर्तव्य समझ कर उसे करते हैं क्योंकि जागृत अवस्था को ही जीवन कह सकते हैं। सुषुप्तावस्था को अस्थाई मृत्यु मानना चाहिए। हर मनुष्य के लिए दिन और रात, जागना और सोना, चेतन और अवचेतन की स्थितियां नित्य आती हैं। फिर भी मनुष्य जागने की कोशिश नहीं करता। वह कुछ सीख ही नहीं पाता। प्रकृति ने, सूर्य और चंद्र ने, आकाश और पाताल ने कर्म के चक्कर का विधान बनाया है। जिसे मनुष्य को भी अपने जीवन में उतारना ही होगा। प्रकृति कभी सोती नहीं, सूर्य कभी ठहरता नहीं, अनवरत चलते जाना ही उनका कर्त्तव्य है। मानव भी इस कर्तव्य से अलग नहीं है, उसे यह बात आत्मसात् करनी होगी।

इसलिए इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य का सोना मना है। इस जगत् में सावधान होकर चेतन स्वरूप को धारण करना ही जागृत अवस्था होती है। जीवन को अंधकारमय रात्रि नहीं, प्रकाशमय दिन बनाना अनिवार्य है। स्वयं जागना और सोने वालों को जगाना यही धर्म की राह है‌। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम इस संसार में एक पथिक हैं और हमें हमेशा जागते रहना चाहिए।

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